हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६४ ☆ लघुकथा – सीख… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लघुकथा – “सीख“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६४ ☆

✍ लघुकथा – सीख… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

बनवारी लाल जी सरकारी स्कूल में एकाउंटेंट के पद से रिटायर हुए थे।  जितना वेतन मिलता था उससे कम  पेंशन मिलती थी।    दवाइयों और छोटे मोटे खर्च का निर्वहन हो जाता। उनका बेटा राहुल एक छोटी-सी कंपनी में नौकरी करता था। वेतन बहुत कम था। उसके वेतन और बनवारीलाल जी की पैंशन से  घर की जरूरतें  पूरी तो हो जातीं पर कोई अचानक जरूरत सामने आ जाए तो बहुत परेशानी होती।  ऐसे समय राहुल की पत्नी सीता कई बार बच्चों की फीस, कपड़े और राशन के खर्च को लेकर परेशान हो जाती। बच्चे बड़े हो रहे थे तो खर्च बढ़ रहा था परंतु आमदनी नहीं बढ़ रही थी। इसको लेकर राहुल और सीता अक्सर चर्चा किया करते कि समझ नहीं आता आगे कैसे चलेगा। राहुल की चिंता यह भी थी कि  वह अपने पिता को यथेष्ट सुख नहीं दे पा रहा था।

बनवारी लाल जी यह सब सुनते देखते और दुखी भी होते। कहीं नौकरी कर सकते थे पर बेटा पसंद नहीं करेगा यह सोचकर रुक जाते। सोचते सोचते उन्हें एक युक्ति सूझी। टीचर नहीं रहे तो क्या छोटे बच्चों को पढा तो सकते हैं। अपने छोटे पोते का ट्यूशन बच जाएगा। उन्होंने अपने  बक्स से कुछ किताबें और कॉपियाँ निकालीं और मोहल्ले के बच्चों को शाम को मुफ्त पढ़ाना शुरू कर दिया। उनका पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि बच्चे बहुत रुचि लेने लगे। बच्चों की संख्या बढ़ने लगी।  मोहल्ले के लोगों को भी अच्छा लगने लगा। कुछ लोगों ने बनवारी लाल जी से आग्रह किया कि वे नियमित ट्यूशन लें और फीस भी देने लगे।

घर में थोड़ी अतिरिक्त आमदनी होने से खुशी की एक लहर दौड़ गई  घर का माहौल बदल गया था।

बनवारी लाल जी ने स्वयं कुछ करके सबको ऐसी सीख दी कि लोगों ने समय व्यर्थ करना बंद कर दिया और कुछ न कुछ अतिरिक्त काम करने लगे। बनवारी लाल जी  कहते कि  कमाई छोटी-बड़ी नहीं होती, मन छोटा नहीं होना चाहिए। अब रात में सोने से पहले हर घर से हँसी की आवाज सुनाई देने लगीं हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११३ – नौतपा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नौतपा…।)

☆ लघुकथा # ११३ – नौतपा… श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“बहुत अधिक गर्मी है मोना और तरुण तुम लोग कहाँ जा रहें हो?” सुनीता जी ने कहा।

मोना ने कहा – “मम्मी जी हम जब भी कही घूमने जाते हैं तो आप अवश्य रोक टोक करती हो?”

तरुण ने कहा – “माँ बच्चों की स्कूल की छुट्टी है इसलिए पास की  पार्क में जा रही है। वहां  पर वाटर पार्क और चिड़ियाघर घूम कर आएगे।”

मोना ने गुस्से से कहा – “आप की माँ तो हमें कहीं घूमने नहीं जाने देती हैं?”

तरुण की माँ सुनीता ने कहा-

“बेटा तुम लोग घूमने जाओ मुझे कोई एतराज नहीं है पर नौतपा लगा है इसलिए मना कर रही हूँ।”

मोना ने कहा -“क्या नया नाटक है नौतपा क्या है?”

सुनीता जी ने कहा- “मोना बच्चों को भी बुला लो मैं बताती हूँ कि यह नौतपा क्या है यह जानकारी सभी को रहनी चाहिये।”

तरुण ने बच्चों को बुला लिया और बोला “माँ बोलो हम सभी सुनेंगे।”

सुनीता जी ने कहा-ज्येष्ठ मास में जब सूर्य, रोहिणी नक्षत्र के प्रथम चरण में होता है, तो पहले 9 दिनों तक सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं। बहुत अधिक गर्मी पड़ती है उसी को नौतपा कहते हैं 9 दिन अधिक तकनीक से वर्षा अच्छी होती है यदि इस बीच पानी गिर गया तो वर्षा कम होती है।”

मोना ने कहा – “हमारे घूमने जाने पर आप क्यों रोक लगा रही हैं?”

“बेटा उन दिनों बहुत अधिक धूप सीधी पड़ती है गर्मी अधिक रहती है लू चलती है लू लग जाने के कारण तुम और बच्चे बीमार हो जाओगे तुम्हारी चिंता है इसलिए कह रही हूँ, यदि तुम्हें मेरी बात पर यकीन ना हो तो गूगल में देख लो क्योंकि आजकल सारी बातें तो तुम गूगल की ही मानती हो न”

सुनीता जी ने धीमी स्वर  में कहा वह गंभीर हो गई।

मोना तुरंत गूगल में देखने लग गई और उसने कहा कि- “माँ आप सही कह रही हैं, गूगल बता रहा है कि इन दोनों मांगलिक कार्य भी नहीं होते इसीलिए मेरी बड़ी बहन अपनी बेटी की शादी बाद में कर रही है।”

इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कम हो जाती है, जिससे वातावरण में भीषण तपिश बढ़ जाती है।

तरुण ने कहा- “माँ की बात में मानता हूँ तो तुम्हें गुस्सा आता है माँ सही कहती है चलो मौसम अच्छा होगा बारिश में तो हम सब मिलकर घूमने चलेंगे।”

बच्चों ने कहा “हमने देखा दादी की बात कितनी सही है तुम्हारे चक्कर में हम घूमने जाते और बीमार पड़ जाते घर में आराम से हम सब खाएंगे और नौतपा के विषय में भी हमने कितनी अच्छी जानकारी ली लिख लिख कर स्कूल में सबको बताऍंगे।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६५ – मापनी ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “मापनी”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६५ ☆

🌻लघु कथा🌻 मापनी 🌻

वैशाली एक साहित्य साधना में लीन महिला है। गृहणी के साथ ही साथ सभी की सेवा श्रद्धा भावना से करती है।

सृजन करते समय सभी तुकांत पदांत मापनी और विधा का ध्यान रखती है।

सदैव की भांति आज वह फिर अपनी ही खास सखी से छली गई क्योंकि उसे चाटुकारिता, चापलूसी की मापनी, विधा नही आती।

कब दीर्घ लघु बन जाता है और कब दो लघु दीर्घ बन जाते हैं। ये मापनी उसने दोस्ती, संबंधों में शायद नही सीख पाई थी।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०५ – क्रांति वीर – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– क्रांति वीर …” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०५ — क्रांति वीर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

सन् 1857 के अपने एक कल्पित दस्तावेज के हवाले से मैं यह कहानी रच रहा हूँ। इस तारीख से बात करने की मेरी एक भावनात्मक सोच है। बात यह है उन्हीं दिनों बलिया वासी मेरा परदादा मॉरिशस आया था। पर यह मेरे परदादा की कहानी नहीं है। यह एक भारतीय परम वीर की कहानी है। अंग्रेजों के अधीन अपनी जन्मभूमि में क्रांति के जुनून के कारण गिरफ्तार हुआ था। वह किसी तरह जेल से भागा था। भारतीय मजदूर मॉरिशस लाने वाले जहाज की एक खेप में वह यहाँ आ गया था। अगले जहाज में अंग्रेज सरकार के सिपाही उसे यहाँ ढूँढने आ गए थे, लेकिन वे उसे पा न सके थे। उसे एक गुफा में छिपा कर रखा गया था। दिनों बाद यहीं उसकी मृत्यु हुई थी। सम्मान के साथ उसका दाह संस्कार किया गया था।

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ चिंता मुक्त ☆ मोहम्मद जिलानी ☆

मोहम्मद जिलानी

(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रतिनिदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – चिंता मुक्त.)

🌱 लघुकथा – चिंता मुक्त🌷

“चल! भाग यहां से, बदमाश कहीं का” डांटते हुए ट्राफिक सिग्नल पर खड़े पुलिस वाले ने कहा। यह सुनकर भीख मांगने वाला दूर हटते हुए कहने लगा, “साहाब, दो दिन से भर पेट खाने तक के लिए पैसे नहीं मिल रहे है। तो, सोचा सिग्नल पर पैसे वालों की गाड़ियां रूकती है। कुछ ज्यादा पैसे मिल जायेंगे। यह सोच कर..।” यह सुनकर पुलिस वाला चिढ़कर कहने लगा,”अरे! बेवकूफ यही अमीरजादे हमारे अधिकारियों से शिकायत करते हैं कि पुलिस वालों की लापरवाही से ही सिग्नल पर भिखारियों की तादाद बढ़ रही है। अब दुबारा दिखेंगा, तो तीन महिने के लिए अंदर करा दूंगा।”

यह सुनकर भीख मांगने वाला दूर के फ्लाई ओव्हर ब्रिज के नीचे जाकर बैठ़ गया। बैठ़े बैठ़े सोचने लगा,”मैं पढ़ा लिखा होने के बावजूद अपने गांव में मुझे कोई काम नहीं मिल पाया, तो मुंबई आ गया। यहां भी अजनबियों को काम देने से लोग डरते है।”

पिछले तीन महिनों से उसका अपना ठिकाना कभी इस पुल के नीचे, तो कभी उस फुटपाथ पर, और धंदा भीख मांगना रह गया है। कहने को तो उसका नाम सुखवीर था। पर यहां उसे भिखारी के नाम से लोग पुकारने लगे।

दुपहर की गमी॔ से भूख और प्यास बढ़ने लगी, तो सोचा मंत्रालय के सिग्नल पर जाना चाहिए। यह सोचकर सुखवीर सिग्नल के पास जाकर खड़ा हो गया। एक दो गाड़ियों के पास गया भी था। लेकिन ज़ोरदार झिड़कियां ही मिली। कुछ देर और ठहरता, इतने में पुलिस की पेट्रोलिंग जीप आ गयी। उसे दरोगा की कड़क आवाज सुनाई दी. “अरे! कोई इस भिखारी को पकड़कर जीप में डालो। पास में ही मंत्रालय है।  इसकी वजह से हमारी नौकरी चली जायेंगी।”

इतने में एक पुलिस वाला जीप से उतरा और उसका कालर पकड़कर जीप में बिठ़ा दिया। थाने पहुंचकर दरोग़ा ने सुखवीर को मंत्री की गाड़ियों के सामने भीख मांगने के जुम॔ में तीन महिने की सज़ा सुना दी।

यह सुनकर सुखवीर को बड़ी ख़ुशी हुई। वह अपने आप से कहने लगा, ” चलो, अच्छा ही हुआ। अब तो तीन महिने के लिए खाने और रहने की चिंता से मुक्ति जो मिल गयी है।”

© मोहम्मद जिलानी

संपर्क – चंद्रपुर (महाराष्ट्र) मो 9850352608 (व्हाट्सएप्प), 8208302422

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “मोमबत्तियां” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “मोमबत्तियां” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– मां ये मोमबत्तियां जलाकर क्यों चल रहे हैं अंकल लोग?

– बेटा, ये कुछ अक्ल के अंधों को रोशनी दिखाने निकले हैं !

– मम्मी, मोमबत्तियां पिघलने लगेंगीं तो गर्म मोम उंगलियों‌ पर गिरेगा, ये तो किसी का क्या बिगड़ा? अपना ही हाथ जलेगा !

– बात तो ठीक है तेरी। फिर तेरी नज़र में क्या करना चाहिए?

– मैं तो कहती हूँ कि ये मोमबत्तियां लेकर उस पापी को जलाओ, जिसने यह गंदा काम किया है !

मां अपनी नन्ही सी बेटी का मुंह देखती रह गयी !!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या?… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # ११२ – रिश्ते जिंदा है क्या? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अरे! देवर जी तुम कब आ गए आश्चर्य पूर्वक कमल जी ने कहा।

“अपनी भाभी भाई के घर में आने के लिए क्या मुझे कोई इजाजत लेनी पड़ेगी या कार्ड छपवाना पड़ेगा” नवीन बोला।

कमल जी ने कहा – “नहीं नहीं भैया मैं ऐसा नहीं बोल रही इतने दिनों तक आपने दर्शन नहीं दिया आज अचानक आप आए इसलिए मैंने ऐसा कहा।“

“भाभी भैया कहाँ है?” नवीन बोला।

“तुम्हारे भैया 13वीं का इंतजाम करने के लिए बाजार गए हैं” कमल जी ने कहा।

नवीन बोला- “तुम लोगों ने घर और खेत ले लिया है मेरे पास सिर्फ मेरा हिस्सा और दुकान है सब चीजों का बंटवारा तो हो जाना चाहिए।”

कमल जी ने कहा- “ठीक है देवर जी मैं भी यही चाहती हूँ लेकिन दुकान और घर का एक बहुत बड़ा हिस्सा तो आपके ही कब्जे में है जहाँ आप हमें जाने भी नहीं देते अभी पिताजी को गुजरे दो ही दिन हुए हैं। हम पर पहाड़ टूट पड़ा है और आप हमें आकर इस तरह बोल रहे हैं कम से कम 13 दिन तो रुक जाना था।”

नवीन बोला “भाभी रोने धोने का नाटक तो तुम बहुत अच्छा कर लेती हो गरीब बनाकर सबसे हमदर्दी लेकर पूरे समाज में हमारी बदनामी कर रही हो कि हमने सबसे ज्यादा हिस्सा ले लिया।”

रोते हुए कमला ने कहा – “अब हमारा तुम्हारा कैसा नाता चले जाओ अभी मैं तुमसे बात करने के मूड में नहीं हूँ, कुछ दिन बाद हम आराम शांति से बैठेंगे दीदी लोग को  बुला लेंगे।  दो बहने भी है तुम्हारी और फिर तय करेंगे कि किसी क्या मिलना चाहिए सारी पिताजी की विरासत में तुम्हारा ही हक  है।”

नवीन ने कहा- “ठीक है देखता हूँ, कैसे तुम सब हिस्सा लेते हो? नवीन गुस्से से बड़बड़ाता हुआ गया।”

कमल जी कहती है कि “हे भगवान इस दुनिया में क्या रिश्ते नाते जिंदा है? जाना सबको है छोड़कर लेकिन फिर भी लोग कैसे लड़ते हैं।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०४ – कसौटी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कसौटी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०४ — कसौटी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

ईश्वरीय कसौटी की एक अद्भुत कहानी है। सम्राट अनादिकाल से जन्म लेता आया है और उसी अनुपात से उसकी मृत्यु होती रही है। उसके जन्म और मृत्यु के इस परिवेश में देखा तो यही जाता है आधा संसार ही उसकी जीत में आता है और आधा उसकी जीत से मुक्त रह जाता है। शेष आधे की जीत उसके वश में हो भी नहीं सकती। यह ईश्वरीय है। ईश्वर उसे आधा ही ताज पहनाता है और आधा पहनाये बिना उसे बुला लेता है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

27 – 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ अपना काम करती रहो… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा अपना काम करती रहो

? लघुकथा – अपना काम करती रहो ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

आज उसे आईसीयू से निकाल कर प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया गया था. पति के साथ ही दोनों बच्चे भी वहां उसका इंतजार कर रहे थे . कमरे में अपने परिवार को देख उसके मन में गहरे संतोष के भाव उभर आए . कुछ देर बाद बच्चे घर चले गए तो वह पति से धीरे से बोली – “ कल मैंने एक कविता लिखी…..”

 पति हैरानी से बोले- “ आईसीयू में तुमने कविता कैसे लिख ली…?”

“ आपने ही तो मुझसे कहा था बीमारी को अपना काम करने दो तुम अपना काम करती रहो . बहुत चिंतन मनन चल रहा था. मैंने नर्स से कहा तो उसने अपने मोबाइल में मेरी कविता रिकॉर्ड कर ली. फिर मेरे मोबाइल में भेज दी . देखिए मेरे मोबाइल में होगी ….”

पति ने बड़ी उत्सुकता से जेब में से पत्नी का मोबाइल निकाला. कविता का ऑडियो साफ नजर आ रहा था .

“ चलो ,सुनते हैं…..” कह कर उसने ऑडियो ऑन किया. बहुत संवेदनशील कविता थी. अंत में पति के प्रति कृतज्ञता भी जाहिर की गई थी . पति ने उसके हाथ पकड़ कर चूम लिये .

“मुझे तुम पर गर्व है ….तुम्हारी हिम्मत पर…. तुम्हारी योग्यता पर… कला पर….”

“ और मुझे आपके सहयोग , प्रेरणा पर..” पत्नी भी हौले से मुस्कुरा दी. बेशक चेहरे पर दर्द भी साफ नजर आ रहा था.

“ चलो अब तुम बिल्कुल ठीक हो गई हो. केवल चार  कीमो लेनी होंगी …” पति के कहते ही वह फौरन कह उठी – “ अब मुझे किसी बीमारी का डर नहीं. जिसे आना है आए…. मैं तो अपना काम करती रहूंगी . आपने कहा था ना ….” फिर दोनों ही मुस्कुरा दिए . पत्नी की आंखों में गजब का आत्मविश्वास, दृढ़ता नजर आने लगी थी.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – मन की गाँठ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी, बी एड, प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । ‘यादों की धरोहर’ हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह – ‘एक संवाददाता की डायरी’ को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह- महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा – मन की गाँठ… ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-बाबू! बुरा तो नहीं मानोगे?

-नहीं! कहो, क्या बात है?

-अब आपकी चप्पल की लाइफ पूरी हो चुकी ! इस बार तो गांठ देता हूँ। ‌आगे मुश्किल है ! फिर नयी ले लेना! मैं  गांठ नहीं पाऊंगा!

-अरे! चप्पल को क्या हुआ? थोड़ी सी तो ठीक करनी है!

-वही तो कहा, बाबू जी! थोड़ी थोड़ी करते भी टांके लगाऊं तो आंखें जैसे इसी में टंक जाती हैं। आपको क्या है, नयी ले लेना, बाबू जी! अब तो बहुत ऑपरेशन कर लिये इसके ! अब इसकी लाइफ नहीं बची!

-ठीक है, मैं तो तुम्हारे बारे में सोच रहा था! अब काम ही कितना बचा है तुम्हारे पास!

-हां बाबू जी! काम तो पहले रेडिमेड जूतों, चप्पलों ने ले लिया ! अब रिपेयर भी कम ही आती है! लोग बाग घर पर ही जूते पालिश कर लेते हैं, पर आता हूँ  तो बाज़ार में आप जैसे लोगों से दिल बहल जाता है! और तो क्या! काम ही कहां बचा है?

-फिर गुजारा कैसे?

-बेटा पढ़ लिख गया, नौकरी लग गयी! बस, उसका सहारा ! आप बाबू जी! कैसे दिन बिताते हैं?

-बस, तुम्हारी तरह ! कुछ इधर बैठ लिया, कुछ उधर! निकल जाता है, दिन!

-कैसे?

-दिनों की मरम्मत करके, गांठें लगाते, कभी दुख की, कभी सुख की !

-लो, बाबू, आपकी चप्पल तैयार!

-ठीक है। पैसे कितने?

-अंतिम संस्कार के कैसे पैसे?

बाबू की आंखें भीग गयीं अपनी चप्पल को आखिरी बार देखकर !

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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