हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४४ ☆ लघुकथा – प्रवृत्ति… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रवृत्ति… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४४ ☆

✍ लघुकथा – प्रवृत्ति… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हर नगर, महानगर में चौक होता है और हर चौक में गाड़ियाों की भीड़। जी हां भीड़। अब भीड़ आदमियों की नहीं होती वरन वाहनों की भी होती है। लेकिन पुणे महानगर के कात्रज चौक की अपनी ही बात है। पुणे को दक्षिण में सातारा, कोल्हापुर व बंगलुरु से जोड़ता है तो दूसरी ओर मुंबई से जोड़ता है। यानी मुंबई बंगलुरु हाईवे पर स्थित है कात्रज चौक। हालांकि नया हाईवे और उस पर लंबी टनल बने कई साल हो गए हैं और बंगलुरू को सीधे जाने वाले वाहन टनल होकर जाते आते हैं फिर भी कात्रज चौक पर वाहनों की भीड़ कम नहीं हुई।

मैं पत्नी के साथ जब शहर की ओर जाता हूँ तो इसी चौक से जाना होता है क्योंकि इस चौक पर हर जगह के बस मिलती है और हमें बस से ही जाना पड़ता है। मैं वृद्धावस्था में कोई गाड़ी चला नहीं पाता और हर समय टैक्सी से जाना आना हो नहीं सकता। मुंबई की ओर से आने वाले पुराने हाईवे के अलावा आंबेगांव खुर्द बुद्रुक जैन मंदिर से और विपरीत कोंढवा से वाहन आते हैं। इसके अलावा एक बड़ा चौड़ा रास्ता स्वारगेट को जाता है शहर में जाने वाला प्रमुख रोड है। मैं जब भी जाता हूँ तो पत्नी के साथ चौक के एक किनारे खड़ा होकर वाहनों के बंद होने और सड़क पार करने की गुंजाइश की तलाश में रहता हूँ परंतु क्या टूव्हीलर क्या फोर व्हीलर और बड़े ट्रक व टैंकर, हरेक को जल्दी जाने की पड़ी रहती है। टू व्हीलर वाले बसों कारों के सामने बाजू से एकदम निकल जाते हैं। हम जैसे बुजुर्गों पर कभी कोई ध्यान नहीं देता। बस छूटने के समय को देखते हुए मैं पत्नी का हाथ पकड़ कर चौक की सड़कों को पार करता हूँ और नजदीक आने वाले वाहनों की ओर हाथ उठाकर रुकने का इशारा करता जाता हूँ। कभी भी किसी वाहन से कुचले जाने का डर बना रहता है। बाहर निकलना अब बंद सा कर दिया है परंतु अस्पताल तो जाना ही पड़ता है। एक घर में हर सदस्य के पास अलग वाहन रखने की प्रवृत्ति से बढ़ते हुए वाहनों की स्थिति और हरेक की जल्दी जाने की प्रवृत्ति ने दिल में अजीब सा डर बिठा दिया है, जिससे न निजात नहीं मिल रही है और न अस्पताल घर आ सकता है। न जाने इस प्रवृत्ति का अंजाम क्या होगा।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२६ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २६ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२६ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २६ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

जहाँ घृणा के गान मिलेंगे, 

इन्सां लहूलुहान मिलेंगे, 

नफरत फैलाने वालों को 

नहीं राम-रहमान मिलेंगे।

0

बंद नफरत का अगर बाजार हो जाये, 

दुश्मनों से भी हमें यदि प्यार हो जाये, 

चमन यह राष्ट्र का सींचें मुहब्बत से, 

तो हर मौसम गुलो-गुलजार हो जाये।

0

हमारे घर पे आया हर अतिथि भगवान है यारो, 

समूचे विश्व में फैला यहाँ से ज्ञान है यारो, 

जहाँ वेदों, पुराणों ने कहा परिवार दुनिया को 

अहिंसा का पुजारी देश हिन्दुस्तान है यारो।

0

जो सूखा सहरा होता है, 

उसमें जल गहरा होता है, 

जहाँ रहें अनमोल वस्तुएँ 

उन पर ही पहरा होता है।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “पुरुष…!” (मराठी कविता) – सुश्री प्रभा सोनवणे ☆ हिन्दी भावानुवाद – हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆ “पुरुष…!” (मराठी कविता) – सुश्री प्रभा सोनवणे  ☆ (हिन्दी भावानुवाद) हेमन्त बावनकर ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे जी की मराठी कविता “पुरुष…!” पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक कीजिए 👉 मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ पुरुष… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

☆ पुरुष…! ☆

तुम वास्तव में एक महान पुरुष हो,

कदाचित, मैं कुछ भी नहीं हूँ।

मैंने तुमसे पूछा था,

तुम्हारी सिगरेट का ब्रांड,

तब तुमने कहा था,

“ऐसी कोई आदत नहीं है मुझे!”

ऐसे हो तुम स्वच्छ, सात्विक,

सद्गुणी!

 

लोग कहते हैं,

तुम्हें कोई जरूरत ही नहीं,

अध्यात्म की

तुम स्वयं ही अध्यात्म हो,

इतने निष्कलंक!

 

तुम्हारी कटु भाषा,

पुरुष अहंकार,

अनुभव से भी, मैंने स्वीकारा

तुम्हारा महान होना,

तुम ही हो पुरुषोत्तम!

 

किन्तु, मैं बहुत अलग हूँ,

तुमसे—

अत्यंत सामान्य!

इसीलिए मैं कभी पहुँच ही न सकी,

तुम्हारी ऊंचाइयों तक!

 

बस, इतना ही भाग्य है

हम दोनों का!

☆ ☆

भावानुवाद – हेमन्त बावनकर

पुणे 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चादर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चादर ? ?

लिखनेवाले की चादर

अनुभूति समझ लेती है,

कम से कम शब्दों में

अभिव्यक्त हो लेती है..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९९ – सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९९  – सजल – बरगद बनकर छाँव बनाई ☆

(समांत—- पदांत-आना, मात्रा भार-16)

(चौपाई छंद)

☆

सोते को है सरल जगाना।

पर जगते को कठिन उठाना।।

*

जीवन दाँव लगाया फिर भी।

मात-पिता का लुटा खजाना।।

*

बरगद बनकर छाँव बनाई।

चिड़िया उड़ती सुना बहाना।।

*

उँगली थामे बड़े हुए पर।

सबल पैर का नहीं ठिकाना।।

*

उमड़-घुमड़ कर आँसू सूखे।

पर मुखड़े को है हर्षाना ।।

*

प्रश्न चिन्ह तब लगा हुआ है।

कैसा आया नया जमाना।।

*

संस्कृति और सभ्यता रूठी।

जागो मानव क्यों पछताना।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २६० – अधिनायक वादी प्रजातंत्र ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – अधिनायक वादी प्रजातंत्र…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २६० – अधिनायक वादी प्रजातंत्र ✍

(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )

प्रजातंत्र में

प्रजा ने जिसे चुना

हमने उसे गुना ।

यह क्या

विदेशी वेशभूषा

और

अधिनायकवादी स्वर ।

हम उसे उखाड़ देंगे

उसे पछाड़ देंगे

उच्च स्वर में कहेंगे

केवल हम ही रहेंगे

इस बस्ती में रहेंगे वे

जो हमारा आदेश मानेंगे

हमें सहेंगे।

क्या किसी के पास है

इस कालिया के काटे का मंत्र

आखिर कब तक चलेगा

यह अधिनायकवादी प्रजातंत्र

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६० – “इंतजार मे रही सूखती…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “इंतजार मे रही सूखती...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “इंतजार मे रही सूखती–...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

एक सकोरा पानी, दाना

रक्खा करती,  माँ ॥

औरों की खातिर चिडिया सी

उड़ती रहती,  माँ ॥

 

छाती में दुनिया – जहान की

लेकर पीड़ायें –

आँचल भर, उसको

जैसे हों क्रीड़ायें ।

 

आगे खिडकी में आँखों के

चित्र कई टाँगे,

पीड़ा को कितनी आँखों से

देखा करती,  माँ ॥

 

बाहर हाँफ रही गौरैया

उस मुडेर तोती ।

जहाँ दिखाई देते सबको

आशा के मोती ।

 

वहीं दिखाई देती सबकी

खुली सजल आँखें ।

इन्ही सभी में भरे कलश सी

छलका करती,  माँ ॥

 

लम्बे -चौड़े टीम -टाम हैं

बस अनुशासन के ।

जहाँ टैंकर खाली दिखते

नगर प्रशासन के ।

 

गरमी गले गले तक आकर

जैसे सूख गई ।

इंतजार मे रही सूखती

पानी कहती, माँ ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

(17 – 4- 2022 को लिखा गीत – पोस्टिंग तिथि > 13-11-2025)

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मन ? ?

सार्वकालिक चर्चा है,

प्रकृति की

सनातन गूढ़ता,

अध्यात्म दिखाता है

कण-कण में छिपा गूढ़,

विज्ञान दर्शाता है

सजीवों की संरचना में

अंतर्निहित दुरूहता…,

दर्शन और मनोविज्ञान

गूढ़ता की सरलता और

क्लिष्टता के बीच,

शोधन और

संशोधन में विचरते हैं,

ये सब पढ़ते-सुनते-गुनते,

मन जाने कहाँ-कहाँ

चक्कर लगा आया,

अपवादस्वरूप ही

देह के साथ रहा,

बाकी विदेह-सा

ब्रह्मांड का भ्रमण कर आया,

एक निष्कर्ष मेरा भी है-

कस्तूरी मृग-सा रूढ़ है,

बाहर क्या देखें

मन सबसे गूढ़ है!

?

© संजय भारद्वाज  

दोपहर 4:34 बजे, 11.11.2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शबद का मोल…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – शबद का मोल…!

☆ ॥ कविता॥ शबद का मोल…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

शबद-शबद का मोल रे भाई,

रसभीने शबद तू बोल रे भाई।

 *

जाति-धर्म, भाईचारे के बीच,

वैमनस्य तो मत घोल रे भाई।

 *

कुछ कहने औ’ कुछ करने से,

पहिले  तुला पर तोल रे भाई।

 *

हर किसी ऐरे-गैरे के सम्मुख,

हृदय के पट ना खोल रे भाई।

 *

क्या कहता तू, क्या करता है,

तेरे कहे में बड़ा झोल रे भाई।

 *

राम  नाम का रसायन पीकर,

मस्त गयन्द-सा डोल रे भाई।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४२ ☆ # “वृद्ध आदमी…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “वृद्ध आदमी…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४२ ☆

☆ # “वृद्ध आदमी…” # ☆

☆

जीवन के अंतिम पहर में

अपने ही दौड़ते हुए शहर में

अपने ही रहते हुए घर में

वृद्ध आदमी अनजान सा रहता है

 

सभी प्रसन्न है ,मस्त है

सभी रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त है

सभी निपुण और सिद्ध हस्त है

वृद्ध आदमी चुपचाप सब  देखता है

 

आंगन में  चिड़ियों की चहचहाहट है

हवाओं मे किरणों की गर्माहट है

वाटिका में भंवरो के आगमन की आहट है

वृद्ध आदमी फूलों की सुगंध के साथ बहता है

 

बाहर भीड़ है पर वह अकेला है

कोई उसे नहीं पूछने वाला है

रंगीनियों का लगा हुआ मेला है

वृद्ध आदमी मन मसोस कर सब कुछ सहता है

 

उसका होता तिरस्कार रोज है

परिवार पर वह एक भारी बोझ है

शायद वह दूसरी दुनिया की खोज है

वृद्ध आदमी सब सहकर भी कुछ नहीं कहता है

 

जीवन भर रिश्तो को जोड़ता है

जीवन भर धाराओं को अपनी ओर मोड़ता है

विषम परिस्थितियों में भी संघर्ष नहीं छोड़ता है

वृद्ध आदमी मरते मरते भी खुश रहो सबको कहता है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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