हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४२ ☆ कविता – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “चौथी सीट… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४२ ☆

✍ कविता – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

☆

मालूम है अपनी जगह हमको,

तुम न दिखाओ जगह हमको।

*

माना तुम्हारे हाथ हैं लंबे पर

अपने हाथ मत दिखा हमको।

*

तुम गैर हो गैर ही रहोगे सदा,

अपना होना न सिखा हमको।

*

दिल में  बसने की कोशिश न कर,

प्यार ने ही तो छला सदा हमको।

*

सीखना है तो खिले फूल से सीखो,

मुस्कुराना उसीने सिखाया हमको।

*

तुम अपने आप में ही सुखी रहो,

अपने आप में रहने दो हमको।

*

न कोई गिला शिकवा न उम्मीद,

अपने आप पर भरोसा है हमको।

*

मेहनत ने नहीं पैदा किए भेद कभी,

सुविधाओं ने ही बांट दिया हमको।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १२४ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २४ ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह से प्रस्तुत हैं “चिंतन के चौपाल” के विचारणीय मुक्तक।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १२४ – मुक्तक – चिंतन के चौपाल – २४ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

तेरे दीवानों में तो शामिल हुआ, 

प्यार मेरा किन्तु नाकाबिल हुआ, 

हम वफा की राह पर जब भी बढ़े 

सिर्फ नफरत का जहर हासिल हुआ।

0

जब अनुभव की आग तपाती है, 

पीड़ा से सहकार कराती है, 

अहंकार के सारे दोष जला देती, 

कुंदन सा हमको दमकाती है।

0

तू सच्चा किरदार निभा, 

बिना स्वार्थ व्यवहार निभा, 

लाभ-हानि पर ध्यान न दे 

अगर किया है प्यार निभा।

0

श्रम करने में कैसी लाज, 

श्रम देगा उन्नति के ताज, 

कवच बनाना तुम पौरुष का 

झपटेंगे दुर्दिन के बाज।

0

तेरी तृष्णा न खा जाये ईमान को, 

भेड़िया यह बनाती है इन्सान को, 

संग लाती है दौलत, सभी व्याधियाँ 

चाटना पड़ती है धूल धनवान को।

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कवित्व ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कवित्व ? ?

वह बाँच लेती है,

मेरे शब्दों में छिपा

अपना नाम,

मेरी लेखनी का

कवित्व निखारने लगा है,

या उसकी आँख में

कवित्व उतरने लगा है,

…पता नहीं!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९७ – हल कुछ निकले तो सार्थक है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – हल कुछ निकले तो सार्थक है…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९७ – हल कुछ निकले तो सार्थक है… ☆

☆

हल कुछ निकले तो सार्थक है, लिखना और सुनाना ।

वर्ना क्या रचना, क्या गाना, क्या मन को बहलाना ।।

*

अविरल नियति-नटी सा चलता, महा काल का पहिया ।

विषधर सा फुफकार लगाता, समय आज का भैया ।।

*

भीष्म – द्रोण अरु कृपाचार्य सब, बैठे अविचल भाव से ।

ज्ञानी – ध्यानी मौन साधकर, बंधे हुये सत्ता सुख से ।।

*

ताल ठोंकते दुर्योधन हैं, घूम रहे निष्कंटक ।

पांचों पांडव भटक रहे हैं, वन-बीहड़ पथ-कंटक ।।

*

धृतराष्ट्र सत्ता में बैठे, पट्टी बाँधे गांधारी ।

स्वार्थ मोह की राजनीति से, धधक रही है चिनगारी ।।

*

गांधारी भ्राता शकुनि ने, चौपड़ पुनः बिछाई है ।

और द्रौपदी दाँव जीतने, चौसर – सभा बुलाई है ।।

*

शाश्वत मूल्यों की रक्षा में, अभिमन्यु की जय है ।

किन्तु आज भी चक्रव्यूह के, भेदन में संशय है ।।

*

क्या परिपाटी बदल सकेगी, छॅंट पायेगी घोर निशा ।

खुशहाली की फसल कटेगी, करवट लेगी नई दिशा ।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५८ – शब्द अब नहीं रहे शब्द ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द अब नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – शब्द अब नहीं रहे शब्द…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५८ – शब्द अब नहीं रहे शब्द ✍

(काव्य संग्रह – शब्द अब नहीं रहे शब्द) 

शब्द को ब्रह्म कहा गया है

और ब्रह्म को देखा नहीं किसी ने

शब्द को भी कोई कहाँ देख पाता है

हाँ सुन पाता है उसे

अगर सुनना चाहे तो ।

मगर, क्या होता है मात्र सुनने से

जबकि अर्थहीन हो गए हों शब्द

लगता है शब्दों की केंचुली उतर गई है

बदल गई है उनकी तासीर

अब प्रेम शब्द न तो स्निग्धता देता है

न ऊर्जा

और विश्वास का दावा

कानों में उड़ेल देता है पिघला शीशा

सम्बोधन के सारे शब्दों से

सड़ी मछली की बू आने लगी है

शब्द अब शब्द नहीं रहे।

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५८ – “सुरमइ – तम का कलश…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “सुरमइ – तम का कलश–...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “सुरमइ – तम का कलश–...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

बैठी है झोपड़ी में

फूस की ।

मूरत कोई ज्यों

आबनूस की ॥

 

लगती है शहद में

नहाई सी ।

होठों पर ठहरी

शहनाई सी ।

 

बेशक मीठी मीठी

दिखती है –

गोली जैसे

लेमनचूस की ॥

 

सुरमइ – तम का कलश

छलका है ।

कुहरीला रंग तनिक

हलका है ।

 

विठुर रही व्याकुल

अमावस में –

रात विकट हो जैसे

पूस की ॥

 

काँपी पत्तों की

वन्दनवा रें ।

टिटहरियाँ मंत्रों को

उच्चारें ।

 

घोंसला बया का

था लटक रहा –

फीकी कर रंगत

फानूस की ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

11 -11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विषधर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विषधर ? ?

केंचुली उतारते

साँप को देखा,

कौन अधिक विषधर,

चेहरे चढ़ाते

इंसान को देखा।

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४० ☆ # “चलो जिंदगी को…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “चलो जिंदगी को…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४० ☆

☆ # “चलो जिंदगी को…” # ☆

☆

चलो जिंदगी को

नई उमंग के साथ जीते हैं

पुरानी बोतल में नई मदिरा

रोज थोड़ी-थोड़ी पीते हैं

 

खुशियों से भरा संसार है

कांटे थोड़े फूल बेशुमार है

खुशबू ही खुशबू है चारों तरफ

चमन में बहार ही बहार है

क्यों याद करें जो पल हमारे बीते

चलो जिंदगी को

नई उमंगों के साथ जीते हैं

 

पतंगों सी हमारी प्रीत है

जल जाना प्रीत की रीत  है

एक रात के मेहमान है हम

एक रात के सब यहां मीत है

फिर क्यों अपने जज्बातों को सिते हैं

चलो जिंदगी को

नई उमंग के साथ जीते हैं

 

सब दिखावे के यहां रिश्ते हैं

सब दिखावे के यहां फरिश्ते हैं

किसी को फिक्र नहीं है तेरी

क्यों तेरे जख्म दिन रात रिसते है

चल जो बची है मय

उसे बेहिसाब पीते हैं

चलो जिंदगी को

नई उमंग के साथ जीते हैं

पुरानी बोतल में नई मदिरा है

रोज थोड़ी-थोड़ी पीते हैं  /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बाल दिवस विशेष – बचपन में सपने भरना है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘बचपन में सपने भरना है…‘।)

☆ बाल दिवस विशेष – कविता – बचपन में सपने भरना है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

अब बच्चों के हाथों में,

ये चांद नहीं देना है,

चांद उन्हें खुद पाना है

मेहनत, को अपनाना है,

बचपन में सपने भरना है,

सपनों को पूरा करना है,

सूरज के जैसे चमकें वो,

कर्म यही बस करना है,

मन में हो अपनत्व सदा,

सम्मान गुरु का करना है,

मुट्ठी में ही सपने हों,

सपनों को ऐसे पाना है,

नींद त्याग,हौसला रख,

पढ़ने में ध्यान लगाना है,

अपनो को अपना जाने,

रिश्तों का पालन करना है,

निज गौरव का मान करें

सदा गर्व से जीना है,

गुरुओं का सम्मान करें,

भाव यही बस भरना है,

अनुशासन पालन करना है,

सम्मान सभी का करना है,

छल दंभ द्वेष से दूर रहें,

राष्ट्र धर्म, पालन करना है.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गीत – घाव बहुत गहरे हैं ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गीत – घाव बहुत गहरे हैं ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

☆

रोदन करती आज दिशाएं,मौसम पर पहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे हैं वो,घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

बढ़ता जाता दर्द नित्य ही,

संतापों का मेला।

कहने को है भीड़,हक़ीक़त,

में हर एक अकेला।।

 *

रौनक तो अब शेष रही ना,बादल भी ठहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे वो,घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

मायूसी है,बढ़ी हताशा,

शुष्क हुआ हर मुखड़ा।

जिसका भी खींचा नक़ाब,

वह क्रोधित होकर उखड़ा।।

 *

ग़म,पीड़ा औ‘ व्यथा-वेदना के ध्वज नित फहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

व्यवस्थाओं ने हमको लूटा,

कौन सुने फरियादें।

रोज़ाना हो रही खोखली,

ईमां की बुनियादें।।

 *

कौन सुनेगा,किसे सुनाएं,यहां सभी बहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे है वो घाव बहुत गहरे हैं ।।

 **

बदल रहीं नित परिभाषाएँ,

सबका नव चिंतन है।

हर इक की है पृथक मान्यता,

पोषित हुआ पतन है।।

 *

सूनापन है मातम दिखता,उड़े-उड़े चेहरे हैं ।

अपनों ने जो सौंपे हैं वो घाव बहुत गहरे हैं ।।

 ☆

© प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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