हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२४ ☆ शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२४ ☆

✍ शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

क़द्र घर में न किसी भी बशर की होती है

और की नजरों में कीमत हुनर की होती है

 *

फूल माला न गलीचों से खैर मक़दम हो

भूमिका खास समझ ले नजर की होती है

 *

चोट खाके भी हमें जो अता समर करता

आदमी की नहीं फ़ितरत शज़र की होती है

 *

सात तालों में वो महफ़ूज रखने बंद करे

जिस किसी के लिए कीमत गुहर की होती है

 *

शायरी कोई भी अच्छी बुरी नहीं होती

बात बस उंसके दिलों पर असर की होती है

 *

जब भी डूबी है कोई नाँव बीच दरिया में

इसमें साज़िश रची अकसर भँवर की होती है

 *

कौन फैला रहा नफरत पड़ोसियों में अरुण

ये शरारत न इधर की उधर की होती है

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ग़ज़ल # ३१ – विजेता… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – विजेता…।)

✍ विजेता… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

कभी-कभी,

जीत कर भी,

विजेता,

होता नहीं,  बहुत खुश,

क्यों कि,

पता है उसे

जीता नहीं है वो,

जीता है, प्रारब्ध उसका,

कमतर थी कूबत उसकी

अपने ही प्रतिद्वंदी से,

जो,

पराजित, कुंठित और अपमानित बैठा है

किसी ठौर ।

 

कुरूक्षेत्र में

पराजित हुआ कर्ण,

विजीत हुआ अर्जुन,

प्रारब्ध था दोनो का, अपना – अपना,

अपनी – अपनी

योग्यता और कौशल्य से परे ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४० ☆ कविता – तलाश… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता  – “तलाश… “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ४० ☆

✍ कविता – तलाश… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

अस्तित्व की तलाश

मैं से शुरू होकर

तू तक पहुंची तो

पर

मैं के साथ अहम् जागा

और तू के साथ मैं मद।

 

अहम् की कारा में कैद

अस्तित्व को ढूंढ़ता हूं

परिधानों के कहीं सूक्ष्म

शब्दजाल और यशाकांक्षा

दूर ले जाती है

जहां न मैं रहता हूं, न तुम।

 

तुम कण कण में हो

आप्त वचन है

फिर

एक ही प्रस्तर में क्यों?

न शून्य होता हूँ

न शून्य का विस्तार होता है,

मेरा मैं

इसी ऊहापोह में

समय के कगार पर

खड़ा रहता है,

अस्तित्वगत।

 

निरालंब होने हेतु

ढूंढ़ता हूं अवलंब

संकल्प विकल्पों से

आवृत्त मार्ग

लक्ष्य से पूर्व

तान देता है

एक झीनी चादर

और मैं उस चादर में

लिपट जाता हूं,

अंदर बाहर के सत्य में

उलझ जाता हूं।

 

फिर भी

तलाश जारी रहती है।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५५ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ६ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५५ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ६ ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

☆

नौ चर दस तक गिनत गय, परै चरन लपटाय ।

नौ पर खे आये सरन, बरन न पूँछो जाय ||

*

मिलत मिलत मन मिलत है, लगत लगत लग जात।

दघि मिसरी कितनउ मिलै, पै मन नई अघात ||

*

माँग कुँआरी लै गई, मान-सरोवर गैल ।

पाप गलाये जुगत में, सुदर गये बिगरैल ||

*

मंजु मधुर फिर मद भरे, भरे भरे अधरान ।

छू अत ही छिद जात मन, खैंचे बिना कमान ॥

*

मुसुक मुलक जाहर भयी, जैसे लछमन रेख ।

बिजुरी घाँईं गिर परै, बचै न बाँमन-सेव ॥

*

माखन घाँईं गात है, मिसरी सी मुस्कान |

बोली बानी सहद-सी, कलपतरू सो धियान ||

*

मुख दरपन, मुखमंजरी, मुख मोती दरसाय ।

मुख में मौआ गुरीरो, मुख से कओ न जाय ||

*

जानें कैंसो लग रओ, हो रइ देह सकाम ।

पवन पलागन कै गई, लयें पिया कौ नाम ॥

*

जो बौड़ी फूलन लगी, लगी भौंर की भीर ।

रितु राजा ने आय कें, बदल दई तासीर ॥

*

जे आयॆ बॆ कढ़ गये, भये पसीना-पूर 1

दोउ ग्रहन के बीच में, धरती धारें घूर ॥

*

देखें सें ठंडक मिलै, मिलबे पे गरमाय ।

बिना मिले सूखो परै, याद करै सरसाय ॥

*

मनरथ जब समरथ भओ, दसरथ पाओ नाम ।

अमर अजर मन अजुध्या, जस जोती श्रीराम ||

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५५ – “खुद की छबि की परछाईं-…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “खुद की छबि की परछाईं –...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “खुद की छबि की परछाईं –...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

गीलेतन पर चिपक

गयासाड़ी का हर रेशा ।

वही हुआ जो शंकित

मन में था इक अन्देशा ॥

 

ओट पेड़ की लेगी

सोचे डूबी पानी से।

तभी वचा सकती है

खुद को नई कहानी से।

 

नई नई तरकीबे

बचने की पानी बाहर –

फैलायेगी छाती पर

बालों को अन्वेषा ॥

 

लोग बहुत चालाक

“नहीं देखा” अभिनय करते ।

मनमें सुगठित देहयष्टि से

यों परिचय करते ।

 

अतिशय यौवनपर किंचित

साडी का आच्छादन –

पुरुष हृदय पर छायी वह

अभिनव अनुपम वेशा ॥

 

कभी गलेतक जल में

ठहरी बाल झटकती है।

कभी सतह पर जल की

हलके थाप पटकती है ।

 

कभी उभरकर आती

खुद की छबि की परछाईं –

से, लहरों संग बातें करती

क्षुब्ध दीर्घ केशा ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16 – 10 – 2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ? ?

आती-जाती

रहती हैं पीढ़ियाँ,

जादुई होती हैं

उम्र की सीढ़ियाँ,

जैसे ही अगली

नज़र आती है,

पिछली तपाक से

विलुप्त हो जाती है,

आरोह की सतत

दृश्य संभावना में,

अवरोह की अदृश्य

आशंका खो जाती है,

जब फूलने लगे साँस,

नीचे अथाह अँधेरा हो,

पैर ऊपर उठाने को

बचा न साहस मेरा हो,

चलने-फिरने से भी

देह दूर भागती रहे,

पर भूख-प्यास तब भी

बिना नागा लगाती डेरा हो,

हे आयु के दाता! उससे

पहले प्रयाण करा देना,

अगले जन्मों के हिसाब में

बची हुई सीढ़ियाँ चढ़ा देना!

मैं जिया अपनी तरह,

मरूँ भी अपनी तरह,

आश्रित कराने से पहले

मुझे विलुप्त करा देना!

 ?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 8:01 बजे, 21.4.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३७ ☆ # “रोशनी के दीए जलते हैं…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रोशनी के दीए जलते हैं…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३७ ☆

☆ # “रोशनी के दीए जलते हैं…” # ☆

☆

देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते हैं

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

 

कितना सुकून है कितनी यहां शांति है

ना कोई पाखंड ना कोई भ्रांति है

हजारों दीपक एक साथ जल रहे हैं यहां

तम की दुनिया में रोशनी की यह नई क्रांति है

अंधेरे के पोषक तत्व अब हाथ मलते हैं

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

 देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते हैं

 

दिया और बाती का यह कैसा मेल है

दोनों में प्रेम भरता यह दिए का तेल है

जहां पतंगा खुशी-खुशी जल जाए, उफ्फ ना करें

प्रीत का यह कैसा अद्भुत खेल है

प्रीत को अमर करने पतंगे

 हर बार यूं ही जलते हैं

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते हैं

 

यह जलते दीपक प्रेम का संदेश लाए हैं

अंधकार में डूबे दीलों में रोशनी का दिया जलाए हैं

तुम भी एक दीपक किसी के दिल में जलाओ दोस्तों

समझ लो जीवन भर तुम्हारे साथ उसकी दुआएं हैं

यही मुक्ति है यही मोक्ष है

फिर हम क्यों खुद को छलते है

चलो कुछ देर वहां पर चलते हैं

देखो वहां पर रोशनी के दीए जलते /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ और क्या होता ?… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘और क्या होता ?…‘।)

☆ कविता – और क्या होता ?… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆

क्या होता,क्या न होता,

होता तो ये,कैसे होता,

गर होता तो क्या होता,

क्या बतलाएं,क्या होता,

ऐसा होता,वैसा होता,

जाने कैसे कैसे होता,

क्या सब कुछ अच्छा होता,

या कुछ बुरा भी होता,

सब कुछ अच्छा अच्छा होता,

नहीं बुरा कुछ भी होता.

कुछ क्या होता,

कुछ भी होता,

न जाने फिर कैसे होता,

जब भी होता,अच्छा होता,

और क्या होता ???

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २५३ – नवगीत : परिवर्तन का मंचन ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – नवगीत : परिवर्तन का मंचन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २५३ ☆

☆ नवगीत : परिवर्तन का मंचन ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

एक शाम

करना है मीत मुझे

अपने भी नाम

.

अपनों से,

सपनों से,

मन नहीं भरा.

अनजाने-

अनदेखे

से रहा डरा.

परिवर्तन का मंचन

जब कभी हुआ,

पिंजरे को

तोड़ उड़ा

चाह का सुआ.

अनुबंधों!

प्रतिबंधों!!

प्राण-मन कहें

तुम्हें राम-राम.

.

ज्यों की त्यों

चादर कब

रह सकी कहो?

दावानल-

बड़वानल

सह, नहीं दहो.

पत्थर का

वक्ष चीर

गंग

सलिल सम बहो.

पाये को

खोने का

कुछ मजा गहो.

सोनल संसार

हुआ कब कभी कहो

इस-उस के नाम?

.

संझा में

घिर आयें

याद मेघ ना

आशुतोष

मौन सहें

अकथ वेदना.

अंशुमान निरख रहे

कालचक्र-रेख.

किस्मत में

क्या लिखा?,

कौन सका देख??

पुष्पा ले जी भर तू

ओम-व्योम, दिग-दिगंत

श्रम कर निष्काम।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

बेंगलुरु, २२.९.२०१५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ डॉ. सुमित्र विशेष – भावना के दोहे – पिता ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  आपकी विशेष रचना – भावना के दोहे  – पिता।)

☆ भावना के दोहे – पिता ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

जिनकी ममता को नहीं, सकता कोई तोल।

पिता हमारे है कवच, माता हैं अनमोल॥

*

पिता बनाते हैं सदा, बच्चों की तक़दीर।

संकट के हर दौर में, सही हमेशा पीर॥

**

पिता शिला आधार की, उनसे ही परिवार।

हौले-हौले आपसे, सीखा शिष्टाचार॥

**

पकड़ उंगलियाँ आपने, मुझे दिखाई राह।

साथ हमेशा हों पिता, दिल में रहती चाह॥

**

पापा मेरी प्रेरणा, पापा मेरी शान।

पापा से हम सीखते, जीवन का हर ज्ञान॥

**

पिता गुणों की खान है, दिया बहुत अवदान।

नाम बहुत साहित्य में, बहुत किया उत्थान…

**

पापा मेरे साथ हैं, मैं हूँ बड़ी महान।

साहित्यिक आकाश में, मिली उन्हें पहचान॥

**

छंद जगत में आपकी, बनी एक पहचान।

मिलता है साहित्य को, इनका ही अवदान॥

**

पिता धरा आकाश हैं, पिता हमारी छाँव।

मुश्किल के हर समय में, पार लगाई नाव॥

**

अपनी इच्छा हम कहें, पूरी हों हर बार।

पिता सभी सुख त्यागते, रखा सुखी परिवार॥

**

कमी आपकी खल रही, चले गए क्यों दूर।

यादें तडपाती हैं हमें, जीने को मजबूर…

**

दूर नहीं हो आज भी, मेरे पापा ख़ास ।

हर पुकार पर हे पिता, आना मेरे पास…

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares