हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५३ ☆ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गिला शिकवा नहीं करते“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५३ ☆

✍ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

अभी हिम्मत नहीं हारी हमारी

फ़तह की अब रही बारी हमारी

 *

न होना रार है माशूक़ से फिर

ख़ता बतलाइये सारी हमारी

 *

मुसीबत कोई आये बे-असर है

अगर रहती है तैयारी हमारी

 *

तू नामुमकिन तभी बतला रहा है

अभी देखी न दमदारी हमारी

 *

अमानत दोसतों की जान बोला

परखने आ गए यारी हमारी

 *

गिला शिकवा नहीं करते वो हरगिज़

समझते है जो लाचारी हमारी

 *

तुम्हारी हरकतों को रोक तो दूँ

खड़ी है बीच बेज़ारी हमारी

 *

सिखाया इल्म है उस्ताद का ये

ग़ज़ल में कब कलाकारी हमारी

 *

न रंभा मेनका के है ये वश का

अरुण जो तोड़ दें तारी हमारी

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५० – बुन्देली कविता – ”जिनको खादी को लिबास है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जिनको खादी को लिबास है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५० ☆

☆  बुन्देली कविता – जिनको खादी को लिबास है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

जिनकी खादी कौ लिबास है

उनके हाँतों में विकास है

इतै रैत पतझर कौ मौसम

उतै खिलो मधुमास खास है

 *

हमें मिलत हैं नीम, करेला

उन्हें संतरा, अनानास है

 *

महलों सें उन्नति नें आँकौ

बहुमत में तौ भूख-प्यास है

 *

बे गमलों में मुरझाउत हैं

खिलत जंगलों में पलाश है

 *

इक तरफा हो रई तरक्की

इतै गरीबी सर्वनास है

 *

भगवतहैं नीची करतूतें

भले उँचाई में निवास है

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (११) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (११) ? ?

मेरे शब्द

चुराने आये थे वे,

चुप्पी की मेरी

अकूत संपदा देखकर

मुँह खुला का खुला

रह गया,

मेरी चुप्पी के

वे भी पात्र हो गए!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 8:07 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२२ – है जीवन क्षण भंगुर प्यारे… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२२ ☆

☆  है जीवन क्षण भंगुर प्यारे…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

है जीवन क्षण भंगुर प्यारे।

बन कर जियो बहादुर प्यारे।।

*

सद्भावों के बीज बोइए।

निकस पड़ें सद्-अंकुर प्यारे।।

*

जीवन में घिर आते संकट।

कभी न होना आतुर प्यारे।।

*

होती आत्म परीक्षा निशिदिन।

कभी न बनना निष्ठुर प्यारे।।

*

आएँगें शादी के दिन जब।

गूँजेंगे मंगल सुर प्यारे।।

*

छल-छद्मों की है यह दुनिया।

कहे जगत से माहुर प्यारे।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

29/5/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८६ – चिन्ताकुल…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८६ – चिन्ताकुल…२ ✍

ये बाढ़ / अनोखी है / अजब है

अछोर महत्वाकाँक्षाओं की

क्षुद्र स्वार्थी और

सर्वनाशी बाढ़

में

मनुष्य और प्रकृति

दोनों घिर गये हैं

गिर गये हैं

इरादे

आदमी के ।

हम / ढो रहे हैं

आजादी का दंभ

और आम आदमी

आज भी बेबस है, मजबूर है

चन्द्रमा भले पास आ गया हो

रोटी अभी भी दूर है

जाने कितने शिशुमन

दफन हो जाते है

किसी नदी के तट पर

या किसी स्कूल के अहाते में

बहुत कम जगह है

सुविधा के छाते में।

है

मेरे खाते में

जमा है

कुछ 

घुटने चलती यादें

और कुछ असफल फरियादें

क्या करेंगें आप

और क्या करूँगा मैं

संकटों / यादों और फरियादों का

सिलसिला

अशेष है, असमाप्त है,

कविता अमर है

कविता समाप्त

है।

✍

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८५ – “मर्यादा को लाँघे था…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मर्यादा को लाँघे था...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “मर्यादा को लाँघे था...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

कम्बल एक चार लोगों

को जिसे ओढ़ सोना।

तिस पर हैं आश्वस्त एक

मिल जायेगा कोना ।।

 

रही पूस की रात और

मावठ  का भी गिरना।

तिस पर टपरे के कोने

से पानी का रिसना।

 

मर्यादा को लाँघे था

दुख, ब्यालू नहीं मिली।

चाट-चाट खा गये

प्रसादी में पाया दोना ।।

 

इधर कभी बेटी खींचे

तो पुत्र उघडता था ।

उधर खींच लेती मुनरी

तो बिरजू चिढ़ता था।

 

और कर्ज के सख्त तकाजे

सी थी शीत  लहर ।

हिला-हिला जाती

बिरजू को जो आधा- पौना।।

 

बोरा फटा बचा सकता

था थोड़ा बहुत इन्हें ।

गीला किया मावठे ने

संकट में डाल उन्हे ।।

 

सहने की क्षमता से

बाहर हुई ठण्ड बेहद।

सिसके माँ,ठिठुरे बापू

तय बच्चों का रोना।।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15-04-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१०) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (१०) ? ?

पूर्ण से

पूर्ण जाने पर भी

पूर्ण ही शेष रहता है..,

चैनलों पर सुनता हूँ

प्रायोजित प्रवचन

चुप हो जाता हूँ..,

सारी चुप्पियाँ

समाप्त होने के बाद भी

बची रहती है चुप्पी,

पूर्णमदः ……

……..पूर्णमेवावशिष्यते!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 7:49 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६६ ☆ # “बुझी बुझी आंखें…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बुझी बुझी आंखें…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६६ ☆

☆ # “बुझी बुझी आंखें…” # श्री श्याम खापर्डे ☆

 ☆

बुझी बुझी आंखें

ना जाने

आकाश में क्या ढूंढती रहती है ?

मन ही मन बुदबुदाते हुए

ऊपर वाले से क्या पूछती रहती है ?

कब बदलेंगे हमारे हालात

कब होगी हम पर

सुखों की बरसात

कब बीतेगी यह काली रात

कब आएगी

जीवन में नई प्रभात

 

काल तो घात लगा कर बैठा है

अहंकार में अपनी गर्दन ऐंठा है

हमारे घर और

 हमारी झोपड़ियों को

बुलडोजर से मिटाया है

हमें खुले आकाश के तले

चिथड़ो में लिपटे

प्रचंड गर्मी में बैठाया है

परिवार और बच्चे

रो रहे हैं

महिलाओं संग वृद्ध

अपना आपा खो रहे है

मुंह में अन्न का

नहीं कोई निवाला है

पानी के लिए भी

नहीं कोई पूछने वाला है

पूरी बस्ती में

त्राहि त्राहि मचा है

विधाता तूने

यह कैसा खेल रचा है

हमारी उपासना का

क्या हमें यह मिला फल है ?

कितना भयानक

हमारा आने वाला कल है ?

 

कुछ सियासतदानों  ने

अपनी सियासत के लिए

हमें यहां बसाया था

क्या उन्हें हमारे आशियां को

उजाड़ते हुए

तरस नहीं आया था ?

 

किसी सरमायेदार की

यहां कॉलोनी

बनने वाली है

इसीलिए हमारी बस्ती

जबरदस्ती हमें

करनी पड़ी

खाली है

सब नियम कानून

ताक पर रखे हैं 

हम सब यहां पर

चिंतित और हक्के-बक्के हैं 

 

हम जानते हैं

इस सत्य को मानते हैं

उस कॉलोनी में

तुम्हारा भव्य मंदिर बनेगा

पूजा पाठ के लिए

एक पूजा स्थल तनेगा

तुम्हारा पुजारी और ट्रस्ट

बनेगा मालामाल

हम जैसे भक्त

सीढ़ियों पर बैठकर

हाथ में कटोरा लिए

भीख मांगते

सदा रहेंगे बेहाल

 

क्या हम और हमारी पीढ़ियां

भीख पर ही जिंदा रहेंगी ?

क्या अपने गरीब इंसान होने पर

शर्मिंदा रहेंगी?

क्या कभी होगा चमत्कार ?

क्या दूर होगा यह अंधकार ?

कब सुध लोगे  तुम पालनहार ?

क्या हमारे जीवन में कभी आएगी

झूमती हुई खुशियों की बहार ?

 

कभी यह इंतजार

अन्याय और अत्याचार

कोई सैलाब लायेगा

तो यह कॉलोनी

और तुम्हारा मंदिर भी

उस तूफान में

बह जाएगा /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०९ – ये दुनिया, ये दुनिया… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ये दुनिया, ये दुनिया।)

☆ अभिव्यक्ति # १०९ ☆

☆ ये दुनिया, ये दुनिया☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

ये दुनिया, ये दुनिया

कैसी है, ये दुनिया,

जैसी नज़र से देखोगे,

लगेगी वैसी ही दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

*

जन्म अकेला, पास न कोई,

सफ़र अकेला, साथ न कोई,

दूर है मंजिल, लंबा रास्ता,

कभी है, समतल, कभी चढ़ाई,

राह नहीं देती ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

कभी सुख, कभी दुख मिलता,

जीवन ऊपर नीचे चलता,

*

लोग मिलेंगे, और छूटेंगे,

जीवन भर का साथ न मिलता,

रंग बिरंगी दिखती है पर,

रंगीन नहीं है, ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया,

*

सुख में ये, अपनी बन जाती,

दुख में, दूर नजर है आती,

सुख दुख हो या जीना मरना,

चलती रहती, ये दुनिया,

ये दुनिया, ये दुनिया.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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English Literature – Poetry ☆ “~ She Walks in Beauty ~” by Byron / “लावण्यपूर्ण रात्रि-अभिसारिका” (Hindi Version) ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

It was a deeply memorable literary moment when Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “लावण्यपूर्ण रात्रि-अभिसारिका” was recited during the Bicentenary Celebration dedicated to the legendary Romantic poet Lord Byron in London, United Kingdom. This poem is based on Lord Byron’s legendary poem She Walks in Beauty.

? ~ “Lavanyapoorn Ratri-Abhisarika” ??

An Indian Poetic Tribute at the Bicentenary Celebration of Lord Byron, London

It was a deeply memorable literary moment when Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “लावण्यपूर्ण रात्रि-अभिसारिका” was recited during the Bicentenary Celebration dedicated to the legendary Romantic poet Lord Byron in London, United Kingdom.

The poem drew its emotional inspiration from Byron’s timeless masterpiece “She Walks in Beauty” — a work celebrated across centuries for its sublime portrayal of feminine grace, inner purity, and the perfect harmony between light and darkness.

Byron immortalized beauty through the unforgettable imagery of “cloudless climes and starry skies,” where external elegance reflected an inward serenity and innocence. Deeply moved by that poetic vision, I attempted to reinterpret a similar celestial aura through the sensibilities of Indian literature, classical Hindi expression, and Sanskritised poetic aesthetics.

Thus emerged “लावण्यपूर्ण रात्रि-अभिसारिका” — a poem that seeks to portray not merely physical beauty, but a divine feminine presence illuminated equally by grace, tranquility, compassion, and spiritual luminosity.

The poem consciously embraces the classical Indian tradition of aesthetic contemplation, where beauty is not confined to appearance alone but becomes an expression of inner harmony and elevated consciousness. Moonlit imagery, divine metaphors, contemplative stillness, and emotional purity form the essence of the composition.

What made the occasion especially meaningful was the warm appreciation the poem received from poets, scholars, literary admirers, and members of the international audience present during the celebration. Many listeners observed that while the emotional spirit of Byron’s Romanticism resonated throughout the poem, its voice remained profoundly Indian in imagery, diction, and philosophical undertones.

For me, the recitation became more than a literary presentation.

It became a symbolic dialogue between two poetic civilizations — the Romantic imagination of the West and the introspective aesthetic tradition of India.

Poetry ultimately transcends geography, language, and time.

Its truest identity lies in its ability to awaken beauty within the human soul.

~ Pravin Raghuvanshi ‘Aftab’

We present the Original English Poem by Lord Byron “~ She Walks in Beauty ~and Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s Hindi version “~ “लावण्यपूर्ण रात्रि-अभिसारिका… ~.

????

Original English Poem by Lord Byron

? ~ She Walks in Beauty ~ ??

She walks in beauty, like the night

Of cloudless climes and starry skies;

And all that’s best of dark and bright

Meet in her aspect and her eyes;

Thus mellowed to that tender light

Which heaven to gaudy day denies.

*

One shade the more, one ray the less,

Had half impaired the nameless grace

Which waves in every raven tress,

Or softly lightens o’er her face;

Where thoughts serenely sweet express,

How pure, how dear their dwelling-place.

*

And on that cheek, and o’er that brow,

So soft, so calm, yet eloquent,

The smiles that win, the tints that glow,

But tell of days in goodness spent,

A mind at peace with all below,

A heart whose love is innocent!

?

 – Lord Byron

लार्ड बायरन की मूल कविता का कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा हिंदी अनुवाद  

☆ लावण्यपूर्ण रात्रि-अभिसारिका ☆

*

अप्सरा की भाँति, वो  सौन्दर्य-प्रतिमा,

बादलों से विहीन, तारों भरी रात्रि में

अतिशय प्रकाश की अप्रतिम छटा लिये

वो निरंतर चहलकदमी करती रही…

*

आकर्षक डील-डौल, मृगनयनी चक्षु

भीनी-भीनी चाँदनी में पिघलता यौवन

ऐसी लावण्यपूर्ण वो दिव्य अनामिका

वो रमनीय सौन्दर्य जो कदापि 

ईश्वर प्रदत्त भी संभव नहीं,

*

एक स्वर्गिक रंगीन छटा लिए,

लहराती स्याह वेणियां से युक्त

अर्ध-प्रच्छादित मुखाकृति को

और भी निखारती हुई…

अभिलाषा की वो परम उत्कटेच्छा…

*

जहाँ विचार मात्र ही मधु-सुधा टपकाते…

कितना पवित्र, कितना प्यारा उसका संश्रय…!

दैवीय कपोलों, के मध्यास्थित,

उन वक्र भृकुटियों  में वो इतनी निर्मल, शांत,

फिर भी नितांत चंचल एक विजयी मुस्कान लिए!

*

वो दैदीप्यमान आभा,

सौम्यता में व्यतीत क्षणों को

अभिव्यक्त करते हुए

एक शांतचित्त मन

एक निष्कपट प्रेम परितृप्त

वो कोमल हृदय धारिणी नवयौवना…!

 *

–  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, पुणे

☆ 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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