हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९० – “अश्रु जल का विरल सा…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत अश्रु जल का विरल सा...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “अश्रु जल का विरल सा...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

 उसकी औखे थीं  या बस

दो फूल थे ॥

जिनमे सपनो के कई

स्कूल थे ॥

 

बहुत सी आँखे टिकी

रहती उन्ही पर ।

खोजती आलम्ब व

धीरज उन्हीं पर ।

 

जहाँ काजल लगा

यूनीफार्म जैसा –

दृष्टि के बच्चे प्रणय

का मूल थे ॥

 

जहाँ चेहरे के

प्रगत जनतंत्र में ।

लोक -जीवन बसा था

जिस मंत्र में ॥

 

जो निरंतर उड़रही

जुल्फें बताती –

हमीं तो सौन्दर्य के

अनुकूल थे ॥

 

सदा जिनमें निगाहों

की नाव थी बस ।

अश्रु जल का विरल

सा ठहराव थी बस।

 

पाल खोले पलक के

जो झुक रही थीं –

उसी के गर्वित हुये

मस्तूल थे ।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

12-07-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – बारिश ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बारिश  ? ?

देखी तो होगी

तुमने बारिश,

सारा गर्द

झाड़-पोंछकर

प्रकृति का

मूल शृंगार लौटाती;

उसे हरा बनाती,

बस कुछ इसी तरह है

मेरी आँख का पानी

और उसका बरसना..,

सारा गर्द धोकर

फिर भर देता है

पुतलियों में अनंत स्वप्न,

सपने देखने की अभीप्सा,

और यथार्थ कर सकने की

अदम्य जिजीविषा..!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 9:45 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७२ ☆ # “आम आदमी की व्यथा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता आम आदमी की व्यथा…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७२

☆ # “आम आदमी की व्यथा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

एक आम आदमी

व्यवस्था से पीड़ित आदमी

अपनी बदहाली के लिए

अपनी बर्बादी के लिए

अपनी तंगहाली के लिए

अपनी जेब खाली के लिए

किससे शिकायत करे

किससे फरियाद करे

किसको अपना दुखड़ा बताए

किसको घायल तन का टुकड़ा दिखाएं

 

किसी के पास उसके लिए

वक्त नहीं है

हर कोई मदमस्त है

कानून भी कोई सख्त नहीं है

वही इसी परेशानी मे खड़ा है

अपनी बेबसी पर रोता पड़ा है

वक्त ने उसके जिस्म पर

एक पैदाइशी जख्म जड़ा है

उससे वह जीवन भर लड़ा है

आज वह थक हार कर

चुपचाप है

जीवन उसके लिए अभिशाप है

मुस्कुराना उसके लिए एक श्राप है

 

न्याय उससे कोसों दूर है

व्यवस्था अपने मद में चूर है

उसका पसीना अब सूखने लगा है

उसका अंग अंग अब दुखने लगा है

कोई मरहम लगाने वाला नहीं है

कोई वंचितों को जगाने वाला नहीं है

सारे लोग सामंतशाही के शिकारी है

वह शोषित आज नंगा भिखारी है

 

वह सोचता है

ऐसे जीने से क्या फायदा

हर किसी ने तोड़ा है

उससे किया हुआ वायदा

उसके लिए जीना दुश्वार है

ऐसा जीना तो वाकई धिक्कार है

परिवार की गरीबी और भूख

उसे अंदर ही अंदर तोड़ चुकी है

उसे एक भयानक निर्णय की तरफ

मोड़ चुकी है

या तो वह परिवार सहित

आत्महत्या कर लेगा

या फिर शस्त्र उठाकर

व्यवस्था की हत्या कर देगा

क्या उसके लिए यही न्याय होगा?

क्या उस गरीब के साथ यह अन्याय नहीं होगा?

 

अगर ऐसा ही है

तो हम कब जाएंगे?

पीड़ितों के लिए

कब न्याय मांगेगे?

या उनको उनके हाल पर छोड़कर

उनके जख्मों को रिसता छोड़कर

उनके जीवन में कटुता का जहर घोलकर

क्या हम रोज अपनी प्रशंसा के गीत गाएंगे ?

क्या हम उनकी बर्बादी का उत्सव जोर-शोर से मनाएंगे ? /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११५ – फौजी की पहचान है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता फौजी की पहचान है।)

☆ अभिव्यक्ति # ११५ ☆

☆ फौजी की पहचान है☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

आन बान शान है, फौजी की पहचान है,

फ़ौज की वर्दी में गरिमा, फौजी की मुस्कान है,

*

आंधी हो या बारिश, सीमा पर ही डटा रहे

सभी चैन से सो पाएं, इस खातिर वो जगा रहे,

*

देश की खातिर, जीना मारना, यही तो अरमान है,

आन बान शान है, फौजी की पहचान है,

*

भारत माता का आँचल, कोई मैला कर न पाए,

सीमा पर आकर, बैरी, मां को आँख दिखा न पाए,

*

सीने पर गोली खाऊं, फौजी का अरमान है,

आन बान शान है, फौजी की पहचान है,

*

दुश्मन की ललकार सुनी तो, सीमा पर दौड़ के आया,

नई नवेली दुल्हन को, घर में रोता छोड़ के आया

*

माँ की खातिर, सारी नेमतें, मां पर ही कुर्बान है,

आन बान शान है, फौजी की पहचान है.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८५ – ग़ज़लिका – श्रमवीर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – श्रमवीर)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८५ ☆

☆ ग़ज़लिका – श्रमवीर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

दिन भर ईंटें-माटी-गारा बिन बोले जो ढोता है।

चुप रह श्रम-सीकर में भीगे नहीं भाग्य को रोता है।।

.

उससे कोई क्या छीनेगा, नहीं जोड़ पाता जो कुछ।

रोज उगाता फसल काट खा, बेफिक्री से सोता है।।

.

कर्मवीर गीता को जीता कभी न पूजे-पढ़ता है।

रोटी-चटनी भोग लगाता, शांति न मन की खोता है।।

.

है वह पत्थर लगा नींव में उस पर बनते देवालय।

पुजे दूसरा पत्थर विग्रह बन जो निष्क्रिय होता है।।

.

सार्थक किसका जन्म सोचिए, जो सक्रिय या जो निष्क्रिय?

तैर रहा जो ऊपर ऊपर या जो खाता गोता है??

.

भाग्य भरोसे बैठे न सोचो होगा वह जो प्रभु चाहे।

कर्म प्रधान विश्व में कर्ता जो करता वह होता है।।

.

जीव वही संजीव सलिल सम, लगातार जो बहता है।

बूढ़ा बंदर खाय कुलाटी, टें-टें करता तोता है।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

११.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बरखा की बहार  ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ बरखा की बहार ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

ताल-तलैयां रीत गए थे  नदियाँ भी थीं सूखी।

बुझा-बुझा मन रहता था और काया भी थी रूखी।।

बरखा की बूँदों से पर अब,मिला खुशी का खत है।

बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।।

*

कंठ शुष्क थे,जी घुटता था,बेचैनी मुस्काती।

सारा आलम व्यथित हुआ था,साँसें भी थम जाती

हरियाली धरती पर बिखरी, लगता सुखद सतत है।

बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।।

*

स्वेद बहा करता था निशिदिन पर अब जल साथी है।

आसमान से अमिय बरसता,हर शय अब गाती है।।

मौसम तो मनभावन लगता,हर पल उल्लासित है

बहुत दिनों के बाद सभी की,खिली-खिली तबियत है।।

*

बूँदें लाईं नवल सँदेशे ,अमन-चैन के मेले।

बच्चे नाव चलाते जल में,लिए हर्ष के रेले।।

जीवन को नवरूप मिला,कृषक हुआ आनंदित है।

बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शोषण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शोषण ? ?

मीलों यात्रा करती हैं,

फूल-फूल भटकती हैं,

बूँद-बूँद संचित करती हैं,

परिश्रम की पराकाष्ठा से

छत्ते का निर्माण करती हैं,

मधुमक्खियाँ…,

 

मनुष्य, तोड़कर

निकाल लाता है छत्ता,

चट कर जाता है शहद,

देखती रह जाती हैं

हताश, निराश मधुमक्खियाँ..,

 

आदिकाल से शोषित हैं

मधुमक्खियाँ,

पर अफ़सोस,

शोषण के इतिहास में

मधुमक्खी का उल्लेख नहीं मिलता..!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 7:51 बजे,  10 जुलाई 2024

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० – !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! मानवता !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० ☆

☆ !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

भरे हुए मन अँधियारों से, कर्म भाव की कलुषित समता।

बचा नहीं अब नर में पौरुष, नहीं रही नारी में ममता।।

व्यथित रुग्ण मन नर नारी के, इक दूजे पर घात लगाए।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

सियाराम सी अमर प्रीत को, भूल गए क्यों सब नर- नारी।

प्राण हनन करने को आतुर, ढोंग रचाते अत्याचारी।

धर्म-कर्म की परिभाषा नव, कोई तो आकर सिखलाए।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

नारी तन सामान बना क्यों, बेच रहे जन बन व्यापारी ।

अस्मत नित्य विलाप करे है, कैसी नारी की लाचारी ।।

दंड मिले दोषी को ऐसा, अग्रिम पाप सभी रुक जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३८ – कविता – साजिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “साजिश“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३८ ?

? कविता – साजिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

फन कुचल दो वरना वो तुम्हें ही डसेगा

चूके अगर ज़रा कहीं,वो तुमपे हँसेगा

=2=

दोगे आस्तीन में पनाह ग़र उसे

हौले-हौले अपना वो शिकंजा कसेगा

=3=

जाल जो बिछायेगा दूजों के वास्ते

अपनी रची साजिशों में ख़ुद ही फंसेगा

=4=

सोचा न था इक दिन मेरे कलेजे का टुकड़ा

रोजी के वास्ते कहीं जा दूर बसेगा

=5=

‘राजेश’ जिसकी फ़ितरतें हैं टाँग अड़ाना

देखना महफ़िल में वो ज़बरन आ ठसेगा

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २११ ☆ गीत – ।। मैं से हम की यात्रा सब कुछ बदल देती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २११ ☆

☆ गीत ।। मैं से हम की यात्रा सब कुछ बदल देती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

मैं से हम   की यात्रा   सब कुछ बदल देती है।

सामूहिक शक्ति ही  अतुलनीय बल असल देती है।।

**

मिलकर सहयोग की ताकत कहीं अधिक होती है।

कार्य सम्पूर्ण होताऔर बात अहम में नहीं खोती है।।

मैं की नीति अधिकतर कार्य को राह रसातल देती है।

मैं से हम  की यात्रा सब   कुछ बदल देती है।।

**

ऊँचीआवाज नहीं शब्दों में वजन की बात होनी चाहिए।

तार्किक दृष्टि की इसमें भरपूर सौगात होनी चाहिए।।

सहयोग सरोकार की बात हर समस्या का हल देती है।

मैं से हम  की यात्रा   सब कुछ बदल  देती है।।

**

मानवताआज तरस रही एक दूजे का प्यार पाने के लिए।

हर एक कोशिश होनी चाहिएअहम दूर भगाने के लिए।।

मिलकर काम करने की भावना ही सुनहरा कल देती है।

मैं से हम की  यात्रा सब   कुछ  बदल देती है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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