हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ख़ुश्बू-ए-गुलाब-से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – ख़ुश्बू-ए-गुलाब-से…!

☆ ॥ कविता॥ ख़ुश्बू-ए-गुलाब-से…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सरहदों  के  पार  भी धड़कते हैं दिल,

ख़ुश्बू- ए-गुलाब-से महकते हैं दिल।

*

ये आस्मां  किसी की मिल्कियत नहीं,

स्वाधीन  पँछियों-से  चहकते हैं दिल।

*

दासता की ज़ंजीरों में जिस्म जकड़े हैं,

समंदर की  मौजों-से मचलते हैं दिल।

*

सूरज- चाँद का मिलन मुमकिन नहीं,

विरहा  की  आग  में  दहकते हैं दिल।

*

जज़्बातों पर कब किसका ज़ोर चला,

यादों  के  मैखानों  में बहकते हैं दिल।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८१ – दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – दोहा सलिला – आम खास का खास है)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८१ ☆

☆ दोहा सलिला – आम खास का खास है ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आम खास का खास है, खास आम का आम.

सलिलदाम दे आम ले, गुठली ले बेदाम..

.

आम न जो वह खास है, खास न जो वह आम.

आम खास है, खास है आम, नहीं बेनाम..

.

पन्हा अमावट आमरस, अमकलियाँ अमचूर.

चटखारे ले चाटिये, मजा मिले भरपूर..

.

दर्प न सहता है तनिक, बहुत विनत है आम.

अच्छे-अच्छों के करे. खट्टे दाँत- सलाम..

.

छककर खाँय अचार, या मधुर मुरब्बा आम .

पेड़ा बरफी कलौंजी, स्वाद अमोल-अदाम..

.

लँगड़ा, हापुस, दशहरी, कलमी चिना बदाम.

सिंदूरी, नीलमपरी, चुसना आम ललाम..

.

चौसा बैगनपरी खा, चाहे हो जो दाम.

सलिलआम अनमोल है, सोच न- खर्च छदाम..

.

तोताचश्म न आम है, तोतापरी सुनाम.

चंचु सदृश दो नोक औ‘, तोते जैसा चाम..

.

हुआ मलीहाबाद का, सारे जग में नाम.

अमराई में विचरिये, खाकर मीठे आम..

.

लाल बसंती हरा या, पीत रंग निष्काम.

बढ़ता फलता मौन हो, सहे ग्रीष्म की घाम..

.

आम्र रसाल अमिय फल, अमिया जिसके नाम.

चढ़ा देवफल भोग में, हो न विधाता वाम..

सलिलआम के आम ले, गुठली के भी दाम.

उदर रोग की दवा है, कोठा रहे न जाम..

चाटी अमिया बहू ने, भला करो हे राम!.

सासू जी नत सर खड़ीं, गृह मंदिर सुर-धाम..

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (९) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (८) ? ?

किसी बात की

अति अच्छी नहीं होती

माँ कहती हैं..,

सोचता हूँ

क्रोध की अति

अपने साथ

दूसरे के लिए भी

घातक होती  है,

पर चुप्पी की अति

मारकेश का

कारक होती है!

?

© संजय भारद्वाज  

( 2.9.2018, प्रातः 7:28 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ४ – ले लो हरि अवतार यहाँ!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ले लो हरि अवतार यहाँ!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ४ ☆

☆ ले लो हरि अवतार यहाँ!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

 कृष्ण कन्हैया तुम्हे दिखाऊं, बिखरे पग पग खार यहां

, जगह-जगह पर जंजालों का, लगा हुआ अंबार यहांँ ।।

*

गैया तेरी रोती कान्हा, सड़कों पर कूड़ा खाती ।

 कृषि कार्य को छोड़ा जब से, नंदी है बेकार यहांँ ।।

*

दूध दही घृत माखन होता, अमृत तुल्य यह बतलाया ।

 इन सब में ही मिला रसाय*न, होता कारोबार यहांँ ।।

*

माखन सबको बांँटा तुमने, भोग बांँटना सिखलाया।

अन्न भरा है गोदामों में, जन भूखे लाचार यहांँ।

*

युद्ध महाभारत करवाया, हर नारी को मान मिले।

धवल चदरिया ओढ़े कुछ जन, करते तन व्यापार यहांँ।।

*

चीर बढ़ाने की लीला रच, लाज अमूल्य बताई थी।

अंग-प्रदर्शन को समझे पर, नारी शिष्टाचार यहाँ ।।

*

दंश धरा अति झेल रही है, निशदिन अत्याचारों के ‌

मानव में फिर मानवता हो, ले लो हरि अवतार यहाँ ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३२ – कविता – ईद… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “ईद“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३२?

? कविता – ईद… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

दीदार बिन तुम्हारे, मेरी कैसे ईद हो

तुम चाँद, मेरा चैन, आँख ख़्वाब, नींद हो

=2=

दिल से दिल मिला तो दिल ने दिल दिया मुझे

तुम चाहते हो इसकी भी कोई रसीद हो

=3=

इक दिन ज़रूर आएगा देखोगे इस तरफ़

अच्छे-बुरे की तुम ही मेरी चश्मदीद हो

=4=

हमने नहीं कहा कभी गुस्सा न हो मगर

कुछ यूंँ करो कि आपका गुस्सा मुफ़ीद हो

=5=

हसरत हो आरज़ू हो कामना हो तमन्ना

ख़्वाहिश तुम्हीं पहली और आख़िरी उम्मीद हो

=6=

मर-मिट गये जिनके लिये, हम रुसवा हो गये

वे फ़रमा रहे आशिक़ हो, न कि तुम शहीद हो   

=7=

सियासत है इतनी बदनाम चीज़ उफ़्फ़

क्यों शरीक़ इसमें अब कोई फ़रीद हो

=8=

यूँ धृष्टता के छू रहे हो सारे पायदान

तुम आदमी हो यार कि घोड़े की लीद हो

=9=

अच्छे-बुरे का ख्याल ज़रूरी है हर घड़ी

पहले कि इससे आपकी मिट्टी पलीद हो

=10=

मेरे अज़ीज़ आज मैं दिल खोलकर कहूँ

इस दिल में दिल से आपका ख़ुशामदीद हो 

=11=

धूमिल हैं चाँद आपके हुस्नो जमाल से

‘राजेश’ क्यों न आपका दिल से मुरीद हो

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०५ ☆ गीत – ।। उदाहरण पेश करके नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ  ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०५ ☆

☆ गीत ।। उदाहरण पेश करके नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।

चुनौती के सामने तुम अपना   सीना तन कर दिखाओ।।

**

मत रोको कोशिशअगली बार सफलता मिल सकती है।

निरंतर अभ्यास से चट्टान पत्थर की भी   हिल सकती है।।

केवल कथनी नहीं तुम इसे आचरण में रंग कर दिखाओ।

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।।

****

वह झरना भी कैसा झरना जो पत्थर से न टकराता हो।

वही आदमी साहसी जो मुश्किल में भी न घबराता हो।।

आगेबढ़ नेतृत्व क्षमता आवरण में उतर  कर दिखाओ।

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।।

***

जब हम सामने बढ़ चलते हैं तो कारवां पीछे आता है।

जो संघर्ष से परिचित   होता  वह ही चर्चित हो पाता है।।

वही होगी सच्ची सेवा किसीके दुखहरण बनकर दिखाओ।

उदाहरण पेश कर नहीं उदाहरण बन कर दिखाओ।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६८ ☆ कविता – वह शिक्षा क्या है?… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – वह शिक्षा क्या है?। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६८ 

☆ आदर्श भाषण कला : वह शिक्षा क्या है? स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

वह शिक्षा क्या जो मानव को सामाजिक शुभ संस्कार न दे

जन जीवन में मिल जीने को हितकर आचार विचार न दे।।

कई नई समस्याएं हर दिन जीवन में प्रायः आती हैं

सरिता की चंचल लहरों सी उठ गिर प्रश्न उठाती है

उलझन सुलझा सकने को जो सद्बुद्धि न दे आधार न दे ।।।।।

ज्यों मृग मरीचिका आकर्षित करती है रेगिस्तानों में

जीवन में भी बिन समझ भटक जाते यात्री वीरानों में

जो सूझबूझ औ’ दूरदृष्टि का मानव को उपहार न दे ।।2।।

जग में जीवन का केन्द्र बिन्दु सुख पाने की अभिलाषा है

इससे ही जीवन में रस है इससे ही जीवित आशा है

मस्तिष्क हदय औ’ हाथों को जो सर्जन का अधिकार न दे ।।3।।

सिद्धान्त सदा आदर्शों के उज्ज्वल सम्मार्ग दिखाते हैं

पर भावुकता की भंवरों में सिद्धान्त डूब भी जाते हैं

जो चिन्तन को वैज्ञानिक मन को आध्यात्मिक आधार न दे ।।4।।

जिससे गुण गरिमा भय सुगंध सात्विक विनम्रता आती है

जो मुक्ति दायिनी सतत मित्र पथ का अंधकार मिटाती है

वह है शिक्षा सत्साधन जो अभिमान न दे कुविचार न दे ।।5।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (८) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (८) ? ?

चुप रहो…

क्यों?

देर तक

तुम्हारी खामोशी

सुनना चाहता हूँ!

?

© संजय भारद्वाज  

(2.9.2018, प्रातः 6:52 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९५ – नवगीत – नव चिंतन है नवल चेतना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतनव चिंतन है नवल चेतना

? रचना संसार # ९५ – गीत – नव चिंतन है नवल चेतना…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

मन तुरंग उड़ता ही जाता

डालो भले नकेल।

*

कभी पढ़े कबीर की साखी,

कभी पढ़े वह छंद।

तृषित हृदय की प्यास बुझाता,

पीकर मधु मकरंद।।

अंग-अंग में बजती सरगम,

चलती प्रीति गुलेल।

*

संकल्पों की सीढ़ी चढ़ता,

हों कितने अवरोध।

हर चौखट पे अमिय ढूँढ़ता,

करता है अनुरोध।।

चढ़कर अनुपम शुचिता डोली,

नवल खेलता खेल।

*

नव चिंतन है नवल चेतना,

शब्द-शक्तियाँ साथ।

शब्दकोश करता समृद्ध भी,

सजे गीत हैं माथ।।

मधुरिम नवरस अलंकरण की,

चलती जैसे रेल।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२३ ☆ भावना के दोहे – प्रेम ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्रेम)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्रेम ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

प्रेम बिना कुछ भी नहीं, प्रेम मधुरतम राग।

प्रेम अनोखी साधना, यही प्रेम अनुराग।।

 *

प्रेम अगर सच्चा मिले, हो जीवन गुलज़ार।

समझा जिसने प्रेम को, छाई मधुर बहार।।

 *

प्रेम नदी की धार है, बहता शीतल नीर।

इसमें जो भी डूबता, हर जाती है पीर।।

 *

प्रेम सुधा का भाव है, मन का मिटता क्लेश।

जिसके उर में प्रेम हो, बनता वही विशेष।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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