हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१३ ☆ मुक्तक – ।। आज खुद अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१३ ☆

☆ मुक्तक ।। आज खुद अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

हर पल हर क्षण    बदल  रहा है आदमी।

पाने कोऔर हीऔर मचल रहा है आदमी।।

प्रभु तेरी दुनिया का क्या   रूप हो रहा है।

जाने किस ओर आज चल रहा है आदमी।।

=2=

दया दुआऔर भावना सब गौण हो गए हैं।

धन के समक्ष जैसे सब ही मौन हो गए हैं।।

पैसे की ही बोली भाषा समझते हैं लोगअब।

रिश्ते गहरे वाले जैसे अब कौन हो गए हैं।।

=3=

कमियां ही कमियां आज निकाल रहा आदमी।

दिल में नफरत के बीज बस पाल रहा आदमी।।

प्यार के लिए भी बहुत कम है यह एक जिंदगी।

फिर भी किस रूप में खुद को ढाल रहाआदमी।।

=4=

स्नेह प्रेम भावआज कर तार-तार रहा हैआदमी।

कई-कई मखोटेआज तो उतार रहा है आदमी।।

जाने कैसा भविष्य होगा   हमारे इस संसार का।

अपने ही पांव खुद कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १२ – हरी भरी वसुंधरा!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता हरी भरी वसुंधरा!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १२ ☆

☆ हरी भरी वसुंधरा!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

हमें भली सदा लगे हरी भरी वसुंधरा ।

करे सभी प्रयास ये सुखे नहीं कभी जरा ।।

मृदा बहाव रोकते तने खड़े यहाँ घने ।

बचा रहे जहान को समान देवता बने ।।

*

कटाव वृक्ष का थमे नवीन संपदा बने ।

उमंग में रहे समाज पर्व ये नया मने ।।

लगे मुझे समान नार वृक्ष भी यहांँ कदा ।

करे महान कार्य देख दर्द भी सहे सदा ।।

*

सदैव नेह डोर बाँधती हरेक भावना ।

सजा रही जहान को मिले भले प्रताड़ना ।।

विडम्बना मिटे सभी करो प्रयास ये जरा ।

प्रसन्न नार वृक्ष हो हरी भरी वसुंधरा ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अलार्म ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अलार्म ? ?

बतियाने के लिये

अब बचा नहीं

किसीके पास समय,

यूँ ही अकारण

हँसने-हँसाने के लिये

अब बचा नहीं

किसीके पास समय,

बातों में अब

होती है मार्केटिंग,

प्रचार, प्रसार,

विस्तार, व्यापार,

आजीविका के लिये

व्यापार करना

प्राकृतिक धर्म होता है,

पर आदमी का

व्यापारी भर रह जाना

संकट का अलार्म होता है…!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 9:51 बजे, 10 जुलाई 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०४ – गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतघूँघट पट से झाँके गोरी

? रचना संसार # १०४ ?

☆ गीत – घूँघट पट से झाँके गोरी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ?

बैरन कोयल कूके प्रियतम,

प्रीति गगरिया छलकाती।

कंगन खनकें नथनी डोले,

सजनी चलती बलखाती।।

*

अधर गुलाबी कंपन करते,

कुंतल लट मुख पर आए।

घूँघट पट से झाँके गोरी,

छम-छम पायल झनकाए।।

अल्हड़ यौवन ललचाता मन,

चंचल चितवन शरमाती।

*

प्रेम-वलय उर बगिया पलती,

कलियाँ लेतीं अँगड़ाई।

कत्थक करती मोहक मणियाँ,

झूला झूले तरुणाई।।

डाल-डाल मधुमासी डेरा,

चतुर चमेली इतराती।

*

करें सुवासित मस्त बयारें,

गुल मकरंद लुटाते हैं।

अठखेली करते भँवरे हैं,

प्रेमिल उर मुस्काते हैं।

मन में निश्छल प्रेम पला है,

कामदेव छवि बहकाती।

*

मनभावन गीतों की लड़ियाँ,

रस पीयूष भरी प्याली।

बौराते हैं बौर प्रीति के,

कहती होठों की लाली।।

प्रेम पताका फैली नभ तक,

चूमे माथा लहराती।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३१ ☆ भावना के दोहे – रथ यात्रा ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे  – रथ यात्रा )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – रथ यात्रा ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

जन मन में उत्साह है, रथ यात्रा का हर्ष।

जगन्नाथ करते भ्रमण, करें वही उत्कर्ष।।

 *

संग सुभद्रा बलभद्र, जग के पालनहार।

रथ यात्रा उनकी चले, दर्शन दें सब द्वार।।

 *

भक्त हृदय के भाव में, होती जय-जयकार।

तेरा महिमा गान हो, हो तुम! तारणहार।।

 *

कृपा बरसती आपकी, महिमा अपरंपार।

भाव हृदय में भक्ति का, होती नैया पार।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१३ ☆ संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है  – संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१३ ☆

संतोष के मुक्तक – कड़वाहट सच्चाई की☆ श्री संतोष नेमा ☆

कभी खुद को भी अंदर  से झांक  लिया करो

खुद को जमाने की नजर से आंक लिया करो

मत  पालो  गलत फहमी  सिकंदर  बनने की

कड़वाहट  सच्चाई  की  भी  फांक  लिया करो

*

वह  जितने  दूध  के  धुले  हैं

उतने अवगुण  उनमें  घुले  हैं

ये वहम पाल कर खुश  न हों

राज सब आपके यहां खुले हैं

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३२ – कविता – वो मेरा मार्गदर्शक… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘वो मेरा मार्गदर्शक।)

☆ शशि साहित्य # ३२  ☆

? कविता – वो मेरा मार्गदर्शक…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

एक पूरा समुद्र उफान पर है दिल में मेरे,

एक बूंद को भी आंसू बनने से रोका है मैंने…

*

जज्ब कर ली है, कठोरता सारे जहान की,

खुद को मोम की तरह पिघलने से रोका है मैंने…

*

परख लिया है, पहले हर एक पैमाने को,

खुद से रूबरू होने का, फिर फैसला लिया मैंने…

*

सिर्फ,फूलों सी नाजुक, पावन मुस्कुराहटें रोकती है मुझे,

और सारे बंधनों से खुद को आज़ाद कर लिया मैंने…

*

ना कर कोशिश, कि टूट कर जर्रा जर्रा हो जाऊं,

टूट कर लाख गुना हो जाना खुद का, चुन लिया मैंने…

*

उंगली पकड़कर जब “वो ” करें अगुवाई मेरी…

हर फिक्र को धुआं धुआं कर लिया मैंने…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ह्रास ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – ह्रास ? ?

इसने कहा,

उसके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

उसने कहा,

उसके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

सबने कहा,

सबके भीतर

कुछ कम हो रहा है,

हरेक को भीतर

कुछ कम होने का भास है,

मनुज! संभवत: यही

मनुष्यता का ह्रास है..!

?

© संजय भारद्वाज   

14 जुलाई 2020प्रात: 11:13 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सबकी जुदा गेल है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – सबकी जुदा गेल है…!

☆ ॥ कविता॥ सबकी जुदा गेल है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

कुदरत का भी अजीब खेल है,

कहीं सूखा, कहीं रेलमपेल है।

*

ये कौन है जो जुल्म ढा रहा है,

कौने हाथों मेघों की नकेल है।

*

फकत जमीं पर ही नहीं होता,

ऊपरे चलता सियासी खेल है।

*

तालीमशुदा सड़कें नाप रहे हैं,

मुक़द्दर लिख रहे 5वीं फेल हैं।

*

दोषी आवारा साँड़-से घूम रहे,

निरीह- निर्दोषी भीतर जेल हैं।

*

जाना सभी को एक जगह पर,

पर सबकी जुदा-जुदा गेल है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०४ ☆ पाँच शिशु कविताएँ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०४ ☆ 

☆ पाँच शिशु कविताएँ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

 १. सूरज नारंगी 

साँझ ढली सूरज नारंगी

चले जा रहे पश्चिम ओर।

करें नमस्ते हाथ जोड़कर

कल को आकर करें सुभोर।।

 २. चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं 

 

सूरज करते रोज सवेरा।

दूर भगाते रोज अँधेरा।

चिड़ियाँ आकर हमें जगातीं

आलस सारा दूर भगातीं।।

३. हाथी जैसी सूंढ़ न मेरी 

भिन – भिन – भिन – भिन ,

भिन – भिन – भिन ।

मच्छर हूँ कानों से सुन ।

गज जैसी सूंढ़ न मेरी,

काटूँ जैसे चुभती पिन।।

☆☆☆☆

४. इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर 

फूल बड़े होते हैं सुंदर।

इन्हें न तोड़ो नटखट बंदर।

तोड़ेगे तो पाप पड़ेगा।

कहतीं नदियाँ कहे समुंदर।।

५ . दाना खातीं फुदक – फुदक कर 

चीं – चीं – चीं – चीं गीत सुनातीं।

सूरज के उगते आ जातीं।

दाना खातीं फुदक – फुदक कर।

पानी पीतीं मटक – मटक कर।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares