हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११५ – फौजी की पहचान है… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता फौजी की पहचान है।)

☆ अभिव्यक्ति # ११५ ☆

☆ फौजी की पहचान है☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

आन बान शान है, फौजी की पहचान है,

फ़ौज की वर्दी में गरिमा, फौजी की मुस्कान है,

*

आंधी हो या बारिश, सीमा पर ही डटा रहे

सभी चैन से सो पाएं, इस खातिर वो जगा रहे,

*

देश की खातिर, जीना मारना, यही तो अरमान है,

आन बान शान है, फौजी की पहचान है,

*

भारत माता का आँचल, कोई मैला कर न पाए,

सीमा पर आकर, बैरी, मां को आँख दिखा न पाए,

*

सीने पर गोली खाऊं, फौजी का अरमान है,

आन बान शान है, फौजी की पहचान है,

*

दुश्मन की ललकार सुनी तो, सीमा पर दौड़ के आया,

नई नवेली दुल्हन को, घर में रोता छोड़ के आया

*

माँ की खातिर, सारी नेमतें, मां पर ही कुर्बान है,

आन बान शान है, फौजी की पहचान है.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८५ – ग़ज़लिका – श्रमवीर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – श्रमवीर)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८५ ☆

☆ ग़ज़लिका – श्रमवीर ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

दिन भर ईंटें-माटी-गारा बिन बोले जो ढोता है।

चुप रह श्रम-सीकर में भीगे नहीं भाग्य को रोता है।।

.

उससे कोई क्या छीनेगा, नहीं जोड़ पाता जो कुछ।

रोज उगाता फसल काट खा, बेफिक्री से सोता है।।

.

कर्मवीर गीता को जीता कभी न पूजे-पढ़ता है।

रोटी-चटनी भोग लगाता, शांति न मन की खोता है।।

.

है वह पत्थर लगा नींव में उस पर बनते देवालय।

पुजे दूसरा पत्थर विग्रह बन जो निष्क्रिय होता है।।

.

सार्थक किसका जन्म सोचिए, जो सक्रिय या जो निष्क्रिय?

तैर रहा जो ऊपर ऊपर या जो खाता गोता है??

.

भाग्य भरोसे बैठे न सोचो होगा वह जो प्रभु चाहे।

कर्म प्रधान विश्व में कर्ता जो करता वह होता है।।

.

जीव वही संजीव सलिल सम, लगातार जो बहता है।

बूढ़ा बंदर खाय कुलाटी, टें-टें करता तोता है।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

११.६.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ बरखा की बहार  ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ बरखा की बहार ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

ताल-तलैयां रीत गए थे  नदियाँ भी थीं सूखी।

बुझा-बुझा मन रहता था और काया भी थी रूखी।।

बरखा की बूँदों से पर अब,मिला खुशी का खत है।

बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।।

*

कंठ शुष्क थे,जी घुटता था,बेचैनी मुस्काती।

सारा आलम व्यथित हुआ था,साँसें भी थम जाती

हरियाली धरती पर बिखरी, लगता सुखद सतत है।

बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।।

*

स्वेद बहा करता था निशिदिन पर अब जल साथी है।

आसमान से अमिय बरसता,हर शय अब गाती है।।

मौसम तो मनभावन लगता,हर पल उल्लासित है

बहुत दिनों के बाद सभी की,खिली-खिली तबियत है।।

*

बूँदें लाईं नवल सँदेशे ,अमन-चैन के मेले।

बच्चे नाव चलाते जल में,लिए हर्ष के रेले।।

जीवन को नवरूप मिला,कृषक हुआ आनंदित है।

बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शोषण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शोषण ? ?

मीलों यात्रा करती हैं,

फूल-फूल भटकती हैं,

बूँद-बूँद संचित करती हैं,

परिश्रम की पराकाष्ठा से

छत्ते का निर्माण करती हैं,

मधुमक्खियाँ…,

 

मनुष्य, तोड़कर

निकाल लाता है छत्ता,

चट कर जाता है शहद,

देखती रह जाती हैं

हताश, निराश मधुमक्खियाँ..,

 

आदिकाल से शोषित हैं

मधुमक्खियाँ,

पर अफ़सोस,

शोषण के इतिहास में

मधुमक्खी का उल्लेख नहीं मिलता..!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 7:51 बजे,  10 जुलाई 2024

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️

💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० – !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! मानवता !!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १० ☆

☆ !! मानवता !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

भरे हुए मन अँधियारों से, कर्म भाव की कलुषित समता।

बचा नहीं अब नर में पौरुष, नहीं रही नारी में ममता।।

व्यथित रुग्ण मन नर नारी के, इक दूजे पर घात लगाए।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

सियाराम सी अमर प्रीत को, भूल गए क्यों सब नर- नारी।

प्राण हनन करने को आतुर, ढोंग रचाते अत्याचारी।

धर्म-कर्म की परिभाषा नव, कोई तो आकर सिखलाए।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

नारी तन सामान बना क्यों, बेच रहे जन बन व्यापारी ।

अस्मत नित्य विलाप करे है, कैसी नारी की लाचारी ।।

दंड मिले दोषी को ऐसा, अग्रिम पाप सभी रुक जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

*

मेरे मन की एक तमन्ना, हे ठाकुर पूरी हो जाए ।

घृणित सोच हो खत्म सभी की, मानव में मानव मिल पाए ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३८ – कविता – साजिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना “साजिश“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३८ ?

? कविता – साजिश… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

फन कुचल दो वरना वो तुम्हें ही डसेगा

चूके अगर ज़रा कहीं,वो तुमपे हँसेगा

=2=

दोगे आस्तीन में पनाह ग़र उसे

हौले-हौले अपना वो शिकंजा कसेगा

=3=

जाल जो बिछायेगा दूजों के वास्ते

अपनी रची साजिशों में ख़ुद ही फंसेगा

=4=

सोचा न था इक दिन मेरे कलेजे का टुकड़ा

रोजी के वास्ते कहीं जा दूर बसेगा

=5=

‘राजेश’ जिसकी फ़ितरतें हैं टाँग अड़ाना

देखना महफ़िल में वो ज़बरन आ ठसेगा

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २११ ☆ गीत – ।। मैं से हम की यात्रा सब कुछ बदल देती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २११ ☆

☆ गीत ।। मैं से हम की यात्रा सब कुछ बदल देती है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

मैं से हम   की यात्रा   सब कुछ बदल देती है।

सामूहिक शक्ति ही  अतुलनीय बल असल देती है।।

**

मिलकर सहयोग की ताकत कहीं अधिक होती है।

कार्य सम्पूर्ण होताऔर बात अहम में नहीं खोती है।।

मैं की नीति अधिकतर कार्य को राह रसातल देती है।

मैं से हम  की यात्रा सब   कुछ बदल देती है।।

**

ऊँचीआवाज नहीं शब्दों में वजन की बात होनी चाहिए।

तार्किक दृष्टि की इसमें भरपूर सौगात होनी चाहिए।।

सहयोग सरोकार की बात हर समस्या का हल देती है।

मैं से हम  की यात्रा   सब कुछ बदल  देती है।।

**

मानवताआज तरस रही एक दूजे का प्यार पाने के लिए।

हर एक कोशिश होनी चाहिएअहम दूर भगाने के लिए।।

मिलकर काम करने की भावना ही सुनहरा कल देती है।

मैं से हम की  यात्रा सब   कुछ  बदल देती है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७४ ☆ कविता – महाराज छत्रपति शिवाजी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – महाराज छत्रपति शिवाजी…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७४

☆ महाराज छत्रपति शिवाजी…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अति पराक्रमी चपल गति नीति निपुण गुणवान

छोटे कद के सुगठित, देशभक्त बलवान

धर्म परायण,  दयालु पर प्रचण्ड रणधीर

महाराष्ट्र के शिवाजी थे एक वीर महान ।।।।।

रणकौशल में अप्रतिम, सजग, सहित अनुमान

उड़ती चिड़िया के परों की जिनको पहचान

घोड़े की ही पीठ पर बीता जीवन काल

गुरू पूजक यों शिवाजी थे पवित्र इन्सान ।।2।।

थे प्रयास हो संगठित बिखरा हुआ समाज

हो देश में स्थापित पावन हिन्दू राज प्रबल

विदेशी शत्रु का हो मूलोच्छेद भारत में

हो उदित नव सुखकर स्वर्ण विहान ।।3।।

यों थे शिवाजी छत्रपति के शुभ उच्च विचार

पूरी होती चाह तो होता कुछ संसार।

आज कार्य के नाम पर होते जो उत्पात

कहीं न होते होता तब जन-जीवन आसान  ।।4।।

सामाजिक व्यवहार में जो थे सहज उदार

राजनीति में नीति का जिसने किया विचार।

जिसके हर व्यवहार की छवि अब भी है आदर्श

ऐसे व्यक्ति महान का करते हम यशगान ।।5।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतहे राम धरा पर आ जाओ

? रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हे राम धरा पर आ जाओ,

प्रभु फिरती अकुलाई।

खोई है मानवता जग ने,

कली-कली मुरझाई।।

‌*

दानवता प्रभु खूब बढ़ी है,

रक्षक बनकर आओ।

संस्कारों को भूल गए सब,

आकर नाथ सिखाओ।।

समरसता का पाठ पढ़ा दो,

दूर करो कठिनाई।

*

भ्रष्टाचारी पनप रहे हैं,

भ्रष्टाचार मिटादो।

भय से हीन जगत् हो सारा,

अत्याचार हटादो।।

अंत करो मन के रावण का,

हर उसकी परछाई।

*

राह प्रगति की खोलो सारी,

हो संस्कृति संस्थापक।

पोषित कर दो धर्म सनातन,

प्रभु हो शांति उपासक।।

राम राज्य फिर से आ जाए,

सुरभित हो अँगनाई।

*

रघुकुल रीति निभाने वाले,

प्रभु हो अन्तर्यामी।

तकती राह अहल्या फिर से,

दे दो दर्शन स्वामी।।

कलियुग के सब कलुष दूर हों,

मुक्तिधाम रघुराई ।

*

विनती करते रघुकुल भूषण,

शरणागत आते हैं।

वंदन अभिनंदन हैं प्रभुजी,

रामचरित गाते हैं।।

करुणानिधि सुख के सागर हो,

समय बड़ा दुखदाई।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२९ ☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – संवाद)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

पूछा हमने प्यार से, तेरी हाँ थी जान।

अब मैं तो पछता रहा, नहीं किया हैं मान।।

 *

घड़ी मिलन की देखता, आओगी अब पास।

अन्तस में तुम! ही बसी, बस चाहत की आस।।

 *

तेरे इस व्यवहार से, छूटे मेरे प्राण।

उमड़ा मन में ज्वार था, मगर दूर अरमान।।

 *

नहीं कहा मैंने गलत, जलता मैं दिन-रात।

उमड़ा सागर भाव का, सुन मेरी यह बात।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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