हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४४ ☆ इंतज़ार ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४४ ☆ इंतज़ार ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

धूप के पीछे छुपकर

बैठा हुआ है सूरज

फेंक रहा है किरणों का जाल

फँसा रहा है हर छोटी बड़ी मछली को

मछलियाँ सिर पर बाँधे कफ़न

कर रहीं हैं अपना बचाव

ठंडे पानी के घड़े निकल पड़े हैं

बचाने प्यास के भूचाल से

चिड़ियों का झुलस रहा है आबोदाना

तिनके की ओट लिए बैठे

पंख फैलाकर चूज़ों को बचाने

घने पेड़ों की छाँव नहीं मिलती

जंगल अब हो गए हैं वीरान

सन्नाटों ने बना लिए हैं घर

चहल पहल वाली बस्तियों में

मज़दूरों की टोली लगी है काम में

पोंछ रही है माथे से रिसता पसीना

और हम बैठ कर सेंक रहे हैं

एसी कूलर में अपना वजूद

उधर पहाड़ों पर बर्फ़ गिरी है

नीचे फट गया है धरती का आँचल

उभर आए हैं नदिया के घाव

बादल तुम कब आओगे?

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है…!

☆ ॥ कविता॥ मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

जीत- हार का ये खेल पुराना है,

अंत समय कर्म ही संग जाना है।

*

जीत पर फजूल जश्न मनाना है,

हार पर नाहक अश्क बहाना है।

*

ये सत्ता तो आती-जाती रहती है,

सच्चा  सुख तो राम को पाना है।

*

सुख  में साथी कई मिल जाएँगे,

दुख का भार खुद को उठाना है।

*

ये  सुंदर  तन मिट्टी की थाती है,

मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना है।

*

हम  सब  दो दिनन के मेहमां हैं,

एक  दिन अलविदा हो जाना है।

*

कविता करना मनोरंजन नहीं है,

कवि-कर्म सुप्त-जन जगाना है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समानांतर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समानांतर ? ?

…….???

…..???

…???

पढ़ सके?

फिर पढ़ो!

नहीं…,

सुनो मित्र,

साथ न सही

मेरे समानांतर चलो,

फिर मेरा लिखो पढ़ो..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४९ ☆ जीने में आसानी है क्या? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जीने में आसानी है क्या?“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४९ ☆

✍ जीने में आसानी है क्या? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मुझ पर ये मनमानी है क्या

अपने पर हैरानी है क्या

 *

मरना तो आसान बहुत है

जीने में आसानी है क्या

 *

पूछ रहे मासूम परिंदे

छत पर दाना पानी है क्या

 *

घर की सब मर्यादा टूटी

रही न दादी नानी है क्या

 *

सर पर शुहरत बोल रही है

कहना मेरा सानी है क्या

 *

बन जाता मैं तेरा आशिक़

उससा तू लासानी है क्या

 *

टकराने जाते पर्वत से

तुमको मुँह की खानी है क्या

 *

हाथ सफलता कब आ जाये

तुमने किस्मत जानी है क्या

 *

बच्चे किस्सा सुनते बोलें

इक राजा इक रानी है क्या

 *

उस नादाँ को क्या समझाएं

पूछ रहा सब फ़ानी है क्या

 *

सोच अरुण हालत पे अपनी

बात बड़ों की मानी है क्या

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५४ – तनकीद के पहले… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना  – तनकीद के पहले।)

☆ हेमंत साहित्य # ५४ ☆

✍ तनकीद के पहले… ☆ श्री हेमंत तारे  

राहों की तीरगी को मिटाते रहना

चराग़ रखा है साथ जलाते रहना

कोई रूठे अपना तो ग़ज़ब क्या है

उसे मनाना, मनाना, मनाते रहना

 *

फ़िर बरपा है कहर तपिश का यारों

तुम परिंदों को  पानी पिलाते रहना

 *

तनकीद के पहले गिरेबां में झांक लेना

आसां नही इतना सही राह बताते रहना

 *

अपनी दौलत, शोहरत पे गुरूर न करना

रब से डरना,  फकीरों को खिलाते रहना

 *

मिल जाए गर कोई नाख़ुश, नाउम्मीद तुम्हें

हमदर्द हो जाना और होंसला दिलाते रहना

 *

सीखने को बहुत कुछ है ‘हेमंत’ जमाने में

बदकिस्मत हैं वो जो सीखे हैं रुलाते रहना

तीरगी       =  अंधकार, तनकीद     = उपदेश देना

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६३ ☆ कविता – राम और कृष्ण एक ही हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “राम और कृष्ण एक ही हैं“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६३ ☆

✍ कविता – राम और कृष्ण एक ही हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम नाम में श्याम बसे हैं,

श्याम में रघुनाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

कभी अयोध्या में राम बने वो,

कभी गोकुल के श्याम।

एक ने धनुष उठाया जग में,

एक ने बजाई बांसुरी मधुर नाम॥

 

रूप बदलकर आए जग में,

एक ही उनकी बात।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

राम बने मर्यादा पुरुषोत्तम,

श्याम प्रेम अवतार।

एक ने रावण का संहार किया,

एक ने कंस संहार॥

 

धर्म की रक्षा करने वाले,

दोनों दीनानाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

सीता-राम की पावन महिमा,

राधे-श्याम का प्यार।

एक में त्याग और तपस्या,

एक में रस की धार॥

 

भक्तों के हित दोनों दौड़े,

पकड़ कर प्रेम का हाथ।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

 

राम कहूँ या कृष्ण पुकारूँ,

दोनों सुनते पुकार।

नाम अलग पर ज्योति वही है,

एक ही पालनहार॥

 

सत्येंद्र मन हरि में रमे तो,

मिट जाएँ सब घात।

मेरी दृष्टि में दोनों एक हैं,

दोनों मेरे साथ॥

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४७ – बुन्देली कविता – ”जो दारू के दास हो गए” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जो दारू के दास हो गए।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४८ ☆

☆  बुन्देली कविता – जो दारू के दास हो गए ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

 जो दारू के दास हो गए

घर के सत्यानाश हो गए

 *

मौड़ा-मौड़ी खबीब पढ़त राय

पैलें नम्बर पास हो गए

 *

हिम्मत कर लो, हार न मानो

तुम तौ अबइ निराश हो गए

 *

स्थान की अब कदर होत नई

मानों कूड़ा-घास हो गए

 *

जब से सारे जंगल कट गय

ओझल कहाँ पलास हो गए

 *

बीस महल, लाखों झोपड़ियाँ

ऐंड़ आइ, विकास हो गए

 *

भिनकत रैन कुठरिया में बे

‘भगवत’ जिन्दा लाश हो गए

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी/मराठी साहित्य – कविता ☆ “बिना शीर्षक के शब्द-पुष्प ” – श्री विजयसिंह चौहान ☆ संकलन एवं मराठी भावानुवाद – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ “बिना शीर्षक के शब्द-पुष्प ” – श्री विजयसिंह चौहान ☆ संकलन एवं मराठी भावानुवाद – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

अब नहीं लिख पाता हूँ,

न सुन पाता हूँ,

और न बोलना चाहता हूँ

माँ…

 

अरसा हो गया

माँ कहे हुए।

लोग कहते हैं

दुनिया में अमीर बनो,

पर सच तो यह है…

सबसे अमीर वही हैं

जिनके सिर पर

आज भी

माँ का आँचल है।

 

तुम्हारी रिक्तता…

समूचा ब्रह्मांड भी मिलकर

नहीं भर सकता।

वो ममता,

वो आँचल,

जिसमें दुनिया की

हर चिंता हार जाती थी…

जहाँ डाँट में भी

प्यार छुपा होता था।

 

तुम सचमुच

एक स्कैनर थीं,

माँ

चेहरा देखतीं

और दिल पढ़ लेतीं।

मै चुप रहता,

और तुम पूछ ही लेती थीं

क्या हुआ बेटा?”

 

अब…

कोई समझने वाला नहीं,

कोई बिना कहे

जानने वाला नहीं,

कोई पूछने वाला नहीं…

 

अब जीवन तो है,

साँस भी चल रही है,

चलती-फिरती काया भी है

पर तुम्हारे बिना

सब कुछ जैसे

निष्प्राण है।

कवी : श्री विजयसिंह चौहान

संकलनकर्ता  एवं मराठी भावानुवाद : सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆☆☆☆

ही तर शब्दफुले .. .. या भावनांना ‘ शीर्षक ‘ ??? कशाला ना ?.. .. .. ☆ 

आता काही लिहू नाही शकत .. ना काही ऐकू शकत ..

आणि बोलायची तर इच्छाच नाहीये आई ..

किती काळ लोटला गं .. .. ‘ आई ss ‘ अशी हाक मारून .. .. ..

 

लोक म्हणतात .. ‘ तू श्रीमंत हो ‘ ..

पण सत्य तर हे आहे ना की ..

जगातला सर्वात श्रीमंत माणूस तोच आहे …

ज्याच्या डोक्यावर आजही आईच्या पदराची आश्वासक सावली आहे .. .. ..

 

पूर्ण ब्रह्मांड एकत्र आलं तरी .. तरी तुझी उणीव भरून काढू शकणार नाही गं ..

ते प्रेम .. तो मायेने ओथंबणारा पदर ..

ज्याच्या उबदार छत्रापुढे प्रत्येक चिंता नि दु:ख हरत होतं ..

आणि तुझं रागावणंही .. मनातलं प्रेम कसंतरी दडवणारं होतं .. .. ..

 

तू खरंच एक ‘ स्कॅनर ‘ होतीस आई ..

चेहेरा नुसता बघूनच मन वाचायचीस ..

मी काही न बोलता गप्प बसायचो ..

आणि तू लगेच विचारायचीस .. ‘ काय झालं बाळा ? ‘ .. .. ..

 

पण आता .. ..

आता मात्र समजून घेणारं कुणी नाही ..

न सांगताही समजणारं कुणीही नाही ..

आपणहून जाणून घेणारंही कुणी नाही ..

आणि विचारणारंही कुणी नाही .. .. ..

 

आता आयुष्य तर पुढे सरकतंय ..

श्वासही सुरु आहे अव्याहत ..

हिंडतं फिरतं शरीरही आहेच की .. पण ..

पण तुझ्याशिवाय सगळं .. सगळंच ..

.. कसं गतप्राण झाल्यासारखं वाटतंय .. .. ..

  

मूळ हिंदी कविता :  ‘बिना शीर्षक के शब्द-पुष्प ‘

मूळ कवी : श्री. विजयसिंह चौहान

मराठी भावानुवाद –  सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

संपादिका – ई-अभिव्यक्ति (मराठी)

सांगली, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विचार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विचार ? ?

मेरे पूर्ववर्तियों ने जहाँ छोड़ा था;

उसीके आगे का अध्याय

लिख रहा हूँ मै,

मेरे बाद के कलमकार

बढ़ायेंगे इस

अनंत ग्रंथ को आगे,

मेरी बात

गाँठ बाँध लेना मित्र-

अखंड दीया

केवल कर्मकाण्ड में

नहीं जलता,

लेखक चाहे रहे अनाम

विचार कभी नहीं मरता।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ इश्क़ का काजल… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मुसल्सल देखते जाना नज़र में इश्क़ का काजल

नहीं होना कभी भी तुम हमारी आँखों से ओझल

 *

उतरकर आँखों में देखो गिराँखातिर कि गहराई

हजारो हैं वहाँ तूफाँ बरसते है कहीं बादल

 *

उसी में है रवादारी उसे कमजोर मत समझो

सवारे जो यहाँ गुलशन उसे नादाँ कहें पागल

 *

नहीं है दोश भी कोई परिन्दे कैद है फिर भी

गिरेबाँ में जरा झाँको कफ़स में बंद है कोयल

 *

नहीं हिम्मत किसी में थी करे मैला यहाँ दामन

नहीं धब्बा जरासा भी रखा है पाक ये आँचल

 *

उसे पत्थर समझ बैठा नजर ने दे दिया धोखा

नहीं हीरा समझ पाया कहाँ का जौहरी कायल

 *

जवानी का ढला सूरज बुढापा पार करना हैं

अकेले हैं वहाँ जाना जहाँ पर ले चले पायल

 

मुसल्सल = एकटक, गिराँखातिर = उदासी, रखादारी = सहनशीलता, कफ़स = पिंजरा

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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