हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९५ ☆ गीत – हँस रहा नीला गगन है… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९५ ☆ 

☆ गीत – हँस रहा नीला गगन है ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

हर तरफ वातावरण में,

एक तीखी-सी चुभन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़ रही मन की तपन है।।

 *

धुंध, कुहरा, तिमिर गहरा,

कर बहाना लोग हँसते।

देर तक जागें निशा में,

अपनी किस्मत आप गढ़ते।

 *

सूर्य-किरणें दिव्य पाकर,

हँस रहा नीला गगन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़  रही मन की तपन है।।

 *

कालिमा भरसक छिपाए,

रात का घनघोर काजल।

खिल रहे हैं पुष्प अगणित,

चाँदनी का ओढ़ आँचल।

 *

दूर छिटकी क्षुब्ध आभा,

बिखरता टूटा सपन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़ रही मन की तपन है।।

 *

गुंजते हैं  भ्रमर, तितली,

मोहते वन बाग उपवन।

विहग गाते गीत खुश हो,

है प्रफुल्लित मुदित जीवन ।

 *

घोलते विष बोल कर के,

योग में किंचित लगन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़ रही मन की तपन है।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४३ ☆ जय प्रकाश के दोहे – गर्मी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय “जय प्रकाश के दोहे – गर्मी” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४३ ☆ जय प्रकाश के दोहे – गर्मी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पाँवों में छाले पड़े, उधड़ रही है खाल

हरियाली के गाँव में, सूखे का भूचाल।

नदी किनारे बैठकर, देख सुलगती रेत

नाव लहर को कोसती, बंजर गाते खेत।

 *

सड़क पिघलती धूप में, पगडंडी के पाँव

पनघट प्यासे रह गए, पेड़ न देते छाँव।

 *

पोंछ पसीना माथ से, बैठा समय किसान

धूप लिए कागज कलम, लिखती रोज मसान।

 *

लू लपटें अख़बार की, ख़बर सनसनीख़ेज़

सूरज पढ़ता रोज़ ही, तपते दस्तावेज़।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – वर्तमान ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – वर्तमान ? ?

(कविता-संग्रह ‘क्रौंच’ से)

कल, आज और कल का

यूँ उपमान हो जाता हूँ,

अतीत में उतरकर

देखता हूँ भविष्य,

वर्तमान हो जाता हूँ।

 

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रात: 9:44 बजे, 01/04/2023)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४८ ☆ जबसे आया है हुनर ये शाइरी का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जबसे आया है हुनर ये शाइरी का“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४८ ☆

✍ जबसे आया है हुनर ये शाइरी का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

आशिक़ी समझी इबादत ख़ुश पयंबर हो गया

बर्फ जैसा इश्क़ के दरिया का आज़र हो गया

 *

जबसे आया है हुनर ये शाइरी का कुछ मुझे

बोलता हिंदी फ़िदा उर्दू पे जी भर हो गया

 *

होती थी वाइज़ की इज्ज़त  ख़ास पहले सच यहाँ

अब गिरा किरदार से तो जेल में घर हो गया

 *

था हवेली जैसा पहले भाइयों  में  जब बँटा

जाल दीवारों का मेरे घर के अंदर हो गया

 *

अब सियासत में शराफ़त का न कोई काम है

जिसको अय्यारी न आई है वो बाहर हो गया

 *

नाम होते जो नदी नाला न बन उफना रहा

अपनी हद में रहके वो दिल से समुंदर हो गया

 *

खैर दुनिया की नहीं इससे बचाये अब ख़ुदा

उस्तरा ले हाथ में हज्जाम बंदर हो गया

 *

देव देवों का नहीं ऐसे ही कहते है सभी

शिव पिया विष खैर-ए-आलम को महेश्वर हो गया

 *

जिसको अंतर है नहीं अपने पराये में कोई

अय अरुण यह मान ले अब वो कलंदर हो गया

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५३ – बीज… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बीज।)

☆ हेमंत साहित्य # ५३ ☆

✍ बीज… ☆ श्री हेमंत तारे  

स्वाभाविक है,

छूट जाये बहुत कुछ

किसी मोड़, किसी पड़ाव पर,

किसी खेल में

कहते हैं जिसे

आपाधापी,

रेलमपेल,

या फिर,

ट्रांसफर- प्रमोशन का जंजाल।

 

फिर अचानक,

फ़ूट पड़ती है

विस्मयकारी लहर की तरह

पीपल की एक कोंपल

फाड़ कर एक दीवार।

 

सहसा,

मरता नहीं है बीज

बस, दब जाता है

किसी दीवार में, किसी भार तले

पर कभी-कभी

कोंपल नहीं, बीज बन जाता है, जीवाश्म

और ऐसे भी करवा देता है

बीज

अपने कभी होने का एहसास।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४५ – बुन्देली कविता – ”सजनइ होन लगी गुड़ियों की” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४५ ☆

☆  बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सजनइ होन लगी गुड़ियों की

गुँथन लगी माला गुरियों की

जे नन्हे नटखट कम नइयाँ

नकल करत बुढ़वा-बुढ़ियों की

 *

साहुन में सज गईं दुकानें

छला – फूँदरा उर चुरियों की

 *

होत बाम्हनों में कइ पातें

दुबे, तिवारी, चनपुरियों की

 *

ऐंसी भइ बरसात हनक कै

धार न टूटन दइ उरियों की

 *

रंग-बिरंगे फूल झरे हैं

जेजम बिछ गइ पंखुरियों की

 *

भगवतचुगली सें घर फोरत

कमी नोंइ विष की पुड़ियों की

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कटखने दिन हुए है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – कटखने दिन हुए है…!

☆ ॥ कविता॥ कटखने दिन हुए है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

कटखने  दिवस हुए, कुलाँचे भरती रातें,

सूरज  सिर चढ़कर हँसकर करता घातें।

*

वसुधा  जलती जैसे ‘देवराला’ की सती,

पानी  के अभाव में  सरिता प्यासी मरती,

भूखा पेट नहीं भरे, चिकनी-चुपड़ी बातें।

*

दुर्दशा वन- उपवन की हुई जैसे भिखारी,

खुद सियासतदानों ने  ऐसी चलाई आरी,

दिन- दहाड़े मौत की होने लगी वारदातें।

*

दहाड़ी के तन से टप-टप टपक रही बूँदें,

ताप  के मारे परिंदे पँख समेटे दृग हैं मूँदे,

लू की लपटों से उबल रहे हैं घर-अहाते।

*

वक्त बड़ा बेढंगा है देखकर चलना जरा,

एक  जैसा लगता है आदमी खोटा-खरा,

कि मतलबी हो गई यारों की मुलाक़ातें।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आज ? ?

अपने शब्दकोश से

निष्कासित कर दिया मैंने

एक शब्द… ‘कल’..,

फिर वह

बीता कल हो या

आता कल..,

अब केवल अपना

आज जीता हूँ,

यही कारण है;

बीते और आते कल का

आनंदरस भी पीता हूँ…!

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रात: 9:44 बजे, 01/04/2023)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१८ – मनोज के दोहे ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है  “मनोज के दोहे। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१८ – मनोज के दोहे ☆

प्रफुल्लित डाल पर आरी को चलाता वह ।

सभी के मन  में सदा लालच जगाता वह।।

 *

वृक्षों का काम, छाया और फल को देना।

कर्तव्य के भाव हर पल में बताता वह।।

 *

इंसानियत के मापदंडों को भुलाकर।

अपनी उंगलियों में सबको नचाता वह।।

 *

बढ़ रहे हैं धरा पर सब अपनी ही डगर।

ले उड़ा आकाश में सपने दिखाता वह।।

 *

कुछ के मन की चाहना तो है बड़ी विचित्र।

कंधे में गन को रख, खुद को रिझाता वह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ दिव्य गीत यह है गाना ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’ जी का ई-अभिव्यक्ति में  स्वागत। लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता दिव्य गीत यह है गाना।)

☆ कविता ☆ दिव्य गीत यह है गाना ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

वंदे मातरम गान प्यारा, हर लब तक है पहुंँचाना।

हेलो हाय छोड़ सबको नित, दिव्य गीत ये है गाना।।

*

भरा हुआ है आंचल माँ का, भिन्न-भिन्न उपहारों से।

कोई उऋण नहीं हो सकता, माँ के इन उपकारों से।।

वृक्ष घनेरे मलयागिरि के, पवन सुवासित कर देते।

 फल फूलों से लदे बाग ये, बरबस मन को हर लेते।।

 मातृभूमि के श्री चरणों में, है अपना शीश झुकाना।

 हेलो हाय छोड़ सबको नित, दिव्य गीत यह है गाना।।

*

 परे कल्पना के हरदम ही, रूप तुम्हारा माँ लगता।

 धवल चांदनी रातों में जब, हर कोना दमका करता।।

 शीश हिमालय ताज सजा है, दिनकर बिंदी बन चमके।

 कर में खप्पर धारण करती, अरि भागा करते डर के ।।

जन्म मिले यदि पुनः पुनः तो, हिंदुस्तान सदा पाना।

 हेलो हाय छोड़ सबको नित, दिव्य गीत यह है गाना।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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