हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆

☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆

☆

यह माना कि जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है

 

कभी अंधेरों ने धमकाया

कभी उजालों ने भरमाया

कभी हवाओं ने जुल्म ढाया

कभी मौसम ने है रुलाया

कभी हार नहीं मानी

यह खुद्दारी का असर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

यह चिलचिलाती धूप

झुलसाती हुई रूप

‘लू ‘ चल रही है खूब

सांस हो रही है चुप

धरा पर भीषण गर्मी का

मचा हुआ कहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

जुल्म सहते सहते

सदियां बीत गई है

हक अधिकारों के लिए

लड़ने की क्या रीत नई है?

तोड़कर रूढ़ियों को आती

यह नई सहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

उनकी आवाज बने

जो बेबस बेघर हैं

उनके आंसू पोंछे

जिनका जीवन बदतर है

दिलों में ज्योत जलाएं 

अंधेरा बहुत पथ पर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

लाचार निर्धन शोषितों के लिए

चलो कुछ करते हैं

इनके लिए जीते हैं

इनके लिए ही मरते है

नेक इरादा हो तो

 आसान हर सफर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

हमारे पथ पर चलकर

आगे कई लोग आएंगे

आजादी के जश्न में

नए तराने गुनगुनाएंगे

इन दीवानों के कदमों में

अर्पित हमारा सर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

यह माना जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०८ – नारी तुम खुद की पहचान हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘नारी तुम खुद की पहचान हो…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १०८ ☆

☆ नारी तुम खुद की पहचान हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

नारी, तुम खुद की पहचान हो,

छाया नहीं किसी की तुम हो,

तुम ही घर की शान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

संस्कार को देने वाली,

प्रेम सभी से करने वाली,

सृजन की पहचान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम्ही अंगनी, तुम्हीं वंदनी,

तुम्हीं संगनी, तुम्हीं नंदनी,

तुम ही लय और तान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम ही शिव की शक्ति हो,

तुम ही पावन भक्ति हो,

तुम धरा का मान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम धरा की श्रेष्ठ कृति हो,

ममता, प्रेम की अनुभूति हो,

ईश्वर का प्रतिदान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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English Literature – Poetry ☆ The Priceless Silence…/ अनमोल ख़ामोशी ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ The Priceless Silence… ~”.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ The Priceless Silence… ~ ??

(ई-अभिव्यक्ति में 23 मई को प्रकाशित संजय जी की रचना – चुप्पियाँ से प्रेरित कविता (इंग्लिश और हिंदी वर्जन))

☆

 Your silence

is exquisitely rare

 

The more you

keep your lips sealed,

the more

its worth keeps rising

 

I often wonder

what price

your silence commands now…

 

Will it

rise even further…?

 

And once again,

I wrapped myself

in a long silence…!

 ============

 

? ~ अनमोल ख़ामोशी… ~ ??

तुम्हारी ख़ामोशी

बहुत नायाब है

 

जितना तुम

लब सिले रहते हो

उतना ही

उसका मोल बढ़ता जाता है

 

हैरत होती है

कि तुम्हारी ख़ामोशी की क़ीमत अब

कितनी होगी

 

क्या ये अभी

और बढ़ेगी…?

 

मैंने एक बार फिर

लंबी ख़ामोशी

ओढ़ ली…!

(Inspired by Shri Sanjay Bhardwaj Ji’s poem चुप्पियाँ ) 

☆हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

☆

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८० – ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – मत रोको।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८० ☆

☆ ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

मत रोको, जो होता है, हो जाने दो।

सोना खोना मत, सोना खो जाने दो।।

.

सत्ता जिनका लक्ष्य उन्हें वह पाने दो।

उनको अपने मुख, अपना गुण गाने दो।।

.

हम-तुम निर्धन, कम हो तो भी जी लेंगे।

चैन बिकी, बेचैन न हो बिक जाने दो।।

.

क्रूर बेरहम हैं सारे सत्ताधारी।

पत्रकार चारण बनते बन जाने दो।।

.

चलो पसीना सींच रोप लें आशाएँ।

कुछ कुम्हलाएँ-सूखेँ तो कुम्हलाने दो।।

.

देव मूर्तियाँ दानव जैसी बना रहें।

नादां, मत रोको उनको बनवाने दो।।

.

मन मंदिर में तन की पूजा मत करना।

चाह रहा जो तन, उसको तन पाने दो।।

.

वनवासी के भक्त, भागते पद-पीछे।

सच को झूठ बताते तो बतलाने दो।।

.

जो जा चुके, कोसकर उनको खुश होते

यदि कृतघ्न पामर कुछ तो हो जाने दो।।

.

जन-गण मौन भले हो, गूँगा मत मानो।

पलटेगा यह तंत्र समय तो आने दो।।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “विरासत के गवाह” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – विरासत के गवाह… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

इमारतें और स्मारक

चाहे किसी शहर की हों

समेटे रहती हैं अतीत का

” बहुत कुछ “

बहुत कुछ यानि

वास्तुकला की भव्यता के संग

तत्कालीन गतिविधियां, प्रसंग, संस्मरण

स्मृतियाँ, और अतीत की तमाम धरोहर

जहाँ कभी रौनकें इतिहास बनाती थी

आज पुरातत्व के अवशेष के रूप में

मूक स्तंभों, दीवारों और मेहराबों में

खामोशी को दफ़्न किये हुए

आधुनिकीकरण की चक्की में पिसतीं

या नेस्तनाबूद होने की कगार पर खड़ीं

अपने गौरवशाली गुज़रे कल पर

सूखे आंसू बहातीं

” बहुत कुछ ” कहती-सुनतीं है

जो न हम, तुम और ” वो ” ( प्रशासन और जनप्रतिनिधि)

समझ सके कभी  … !!!!!

☆

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆ आशीर्वाद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव 

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी लेखिका व कवयित्री श्रीमती अभिलाषा श्रीवास्तव जी एक प्रेरणादायक महिला हैं। साहित्य की सेवा में निरंतर रत | आपको 2024 में अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मान पत्र से नवाजा गया। विशेष सम्मान : एक्सीलेंट कवयित्री अवार्ड से सम्मानित तथा पुरस्कृत |उनके द्वारा संवाद टीवी पर फाग प्रसारण में प्रस्तुत किया गया और विभिन्न राज्यों के प्रमुख अखबारों व पत्रिकाओं में उनकी कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी लेखनी में समाज के प्रति संवेदनशीलता और सृजनात्मकता का सुंदर संगम देखने को मिलता है।

☆ कविता ☆ आशीर्वाद ☆ श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव ☆

अक्सर मिलने वाला आशीर्वाद भी

दूजे के खाते में आया

फिर भी

एक अलौकिक हर्ष मन में छाया

दूधो नहाओ पूतों फलों

व कभी सदा सुहागन रहो के आशीर्वाद ने

स्त्रियों के माथे पे हाथ फेरा

अपनी अपनी हाथों के मुट्ठी में सबने प्रेम बांधा

लेकिन हर बार स्त्रियों के खाते में

दूजे के लिए जीने का हुनर आया

क्यो कभी किसी ने कहा नहीं उसको भी

खुद की जिंदगी जीयो

क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी जानती है

‘स्त्रियों के लिए ही गृहस्थी मकान बनीं है

बात अगर पुरुषों पे आतीं तो

धर्मराज युधिष्ठिर जैसे दो अर्धांगिनी भी निर्णय सही लगता

क्या वस्तु थीं स्त्रियाँ

जो भाई भाई मे वस्तुओं के जैसे बांटी गई

अरे पंचाली स्त्री थी

तभी तो बंट कर भी बंधन में बंधीं रह गई

तुलसी सीता और अहिल्या पुरुषों के छल में छली गई

अपने स्त्रीत्व के आगे इतिहास गढ़ गई

हाँ स्त्री जानती है

तभी तो युगों युगों से यही आशीर्वाद स्त्री को देतीं गई

☆

© श्रीमति अभिलाषा श्रीवास्तव

गोरखपुर, उत्तरप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पहाड़ टूटता है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – पहाड़ टूटता है…!

☆ ॥ कविता॥ पहाड़ टूटता है…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆ 

किसी के होने, नहीं होने से

दूसरों को कोई

विशेष अंतर नहीं पड़ता है

सिवाय घरवालों

और उसमें भी माँ-बाप, बीवी-बच्चों के।

 

बाक़ी कुटुंब-कबीले के लोग

यार-दोस्त और अड़ोसी-पड़ोसी

मात्र औपचारिकता निर्वहन के नाम पर

घंटे, आध घंटे ढाढ़स का चूसना

थमाकर अपनी राह चलते नज़र आते हैं।

 

पर वास्तव में जिसके सिर पर

विपदा का पहाड़ टूटता है

वही उसके भार की पीड़ा को जानता है।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (५) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (५) ? ?

तुम्हारी चुप्पी मूल्यवान है

जितना चुप रहते हो

उतना मूल्य बढ़ता है,

वैसे तुम्हारी चुप्पी का मूल्य

कहाँ  तक पहुँचा?

…और बढ़ेगा क्या..?

मैं फिर चुप लगा गया।

 

?

© संजय भारद्वाज  

1.9.18, रात11:40 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५२ – कविता – अलग अलग हैं रंग ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५२ ☆

☆ कविता ☆ काव्य कथा विथिका ~ अलग अलग हैं रंग ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

 (खंड दो )

 गांव से भोलू शहर आ गया, खूब लगी थी भूख ।

 गोरा चेहरा लाल हो गया, कड़क कटीली धूप ।।

 काम किया पूरा दिन भोलू, नहीं मिली मजदूरी।

 हाथ पांव जोड़ा बेचारा, कह डाला मजबूरी ।।

*

 बच्चे मेरे भूखे साहब, आधे पैसे दे दो ।

 ईश्वर तेरा भला करेगा, विनती मेरी सुन लो।।

 पर मलिक था क्रूर कुटिल, डांट के उसे भगाया ।

 पत्नी भी ना कोई कम थी, नहीं तनिक थी माया ।।

*

 खोटी किस्मत लेकर भोलू*, घर को किया प्रस्थान ।

 पाँव सड़क पर आगे बढ़ता, कहीं था उसका ध्यान

 मन में भोले भोले कहता, भोलू खुद को भूला ।

 गमछे से आँशु को पोछे, पीठ पर लटका झोला ।।

*

 भोलू भोलू सुनो न मुझको, छत से आई आवाज ।

 एक पुरानी मालकिन उसकी, खड़ी थी  छत पर आज ।।

 दो सौ रूपये पकड़ो भोलू, ले आना तुम खाद ।

 बगिया सुखी, फूल रो रहे, पौध हुए बर्बाद ।।

*

 इसको भी पकड़ो तुम भोलू, लाल मिठाई खास ।

 बात बताओ, मेरे भोलू, क्यों हो अधिक उदास ।।

 भोलू की आँखें भर आई, देख जगत का रंग।

 यही देव-दानव दोनों है, अलग-अलग है ढंग।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-05-2026

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६७ ☆ कविता – सदा स्वार्थ-व्यवहार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सदा स्वार्थ-व्यवहार …” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६७ ☆

☆ सदा स्वार्थ-व्यवहार…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

आजादी के पहले भारत में था अंग्रेजों का राज।

लूट रहे थे वे हम सबको दीन दुखी था यहाँ समाज ॥

*

तिलक और गाँधी ने देखे सपने, चाहा देशी राज।

कष्ट सहे, समझाया सबको, लाई चेतना और स्वराज ॥

*

उनके उस निस्वार्थ त्याग का सुख हम भोग रहे हैं आज ।

किन्तु खेद है उन्हें भुला कर स्वार्थमुखी हो चला समाज

*

सदा स्वार्थ-व्यवहार जगत् में होता है दुख का आधार ।

धन सुख का आधार नहीं है, वह तो है ममता औ’ प्यार ॥

*

जो चरित्र का पतन दिख रहा यह है बड़ी हमारी हार ।

बहुत जरूरी जन हित में फिर सुधरे हम सबका व्यवहार ॥

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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