हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३० – आशनाई… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “आशनाई…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३० ?

? आशनाई… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

क्यों आप मेरी ओर कभी झाँकते नहीं

चाहत की कीमतों को कभी आँकते नहीं

=2=

है साथ निभाने का अटल वादा हमारा

हम इश्क़ में कभी भी डींग हाँकते नहीं

=3=

हम इश्क के धागे में पिरोते हैं मुहब्बत

पर आप कभी उसमें वफ़ा टाँकते नहीं

=4=

अपना पड़ाव दिलरुबा की रहगुजर में है

हम दूसरी गलियों की धूल फाँकते नहीं

=5=

अपनी खुली क़िताब है ‘राजेश’ ज़िन्दगी

हम अपनी आशनाई  कभी ढाँकते नहीं

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’ जी का ई-अभिव्यक्ति में  स्वागत। लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता मन और वाणी।)

☆ कविता ☆ मन और वाणी ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

हो कमान जब वाणी पर तो, दे अलग पहचान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

०

क्यों लड़ना है प्यारे तुझको, जीवन क्षणभंगुर।

पल का भी क्या तनिक भरोसा, किस नशे में चूर।।

प्रेमभाव की बोली से ही, तेरी बढ़े शान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

०

शब्द चीर देते हैं मन को, गहरा लगे घाव।

बरसों के संबंध मिटाता, कुछ पलों का ताव।।

करो मौन ये वाणी जब हो, मन में घमासान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

०

बातें सुन मिश्री सी मीठी, मन में जगे आस।

हो अवसाद दूर जीवन से, सारा मिटे त्रास।।

त्याग करें कटुता का हम भी, दो हमे वरदान।

सोच समझकर मीठा बोलो, जग में मिले मान।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०३ ☆ गीत – ।। बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०३ ☆

☆ गीत ।। बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है।

सूख रहा पौधा भी रोज  सींच कर हरा बनता है।।

**

अच्छा भलाआदमी भी जल-भुन के खाक हो जाता है।

अहंकार में पलते-पलते  आदमी राख हो जाता है।।

आचरण में शिक्षा को उतार आदमी ज्ञान भरा बनता है।

बदरंग सोना तपकर तराश कर खरा बनता है।।

***

सुख समृद्धि में नहीं संघर्ष कष्ट में आदमी निखरता है।

कठनाईं में भी आगे  बढ़ कर ही आदमी संवरता है।।

अपने बुरे वक्त से लड़ कर आदमी निर्भिक बनता है।

बदरंग सोना तप कर तराश कर खरा बनता है।।

**

अगर रास्ते जिद्दी तो मंजिल पाने की जिद बढ़ जाती है।

अगर चलते ही रहे तो मुश्किल  खुद ही घट जाती है।।

जन्म काफी नहींअपने कर्म से इंसान धरा पर बनता है।

बदरंग सोना तप कर तराश कर खरा सोना बनता है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६६ ☆ कविता – बापू का सपना… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – बापू का सपना …” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६६ ☆

☆ बापू का सपना…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

बापू का सपना था—भारत में होगा जब अपना राज ।

गाँव-गाँव में हर गरीब के दुख का होगा सही इलाज ॥

*

कोई न होगा नंगा – भूखा, कोई न तब होगा मोहताज ।

राम राज्य की सुख-सुविधाएँ देगा सबको सफल स्वराज ॥

*

पर यह क्या बापू गये उनके साथ गये उनके अरमान।

रहा न अब नेताओं को भी उनके उपदेशों का ध्यान ॥

*

गाँधी कोई भगवान नहीं थे, वे भी थे हमसे इन्सान ।

किन्तु विचारों औ’ कर्मों से वे इतने बन गये महान् ॥

*

बहुत जरूरी यदि हम सबको देना है उनको सन्मान ।

हम उनका जीवन  समझें, करे काम कुछ उन्हीं समान ॥

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – नौजवान ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – नौजवान ? ?

बूढ़े किस्सों

और अबोध

सपनों के बीच

बिछ जाता है

सेतु की तरह,

लोग, उसे

नौजवान

कहने लगे हैं!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९३ – नवगीत – मधु मिलन राग… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – मधु मिलन राग…।

? रचना संसार # ९३ – गीत – मधु मिलन राग…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

क्यों कलंकित लोग करते,

हैं सदा अनुराग को।

गा न पाती कोकिला है,

मधु मिलन के राग को।।

*

काँपती है हर कली भी,

अब भ्रमर गुंजार से।

तोड़ बंधन प्रीत के सब,

झाँकते क्यों द्वार से।।

कौमुदी कब तक बचेगी,

दानवों के वार से।

दग्ध हिय प्रतिबिम्ब तेरा,

ताकता है बाग को।

*

सुप्त फेरे प्रीत के हैं,

हारती है दामिनी।

ठग गया है काम तन को,

है बिलखती कामिनी।।

राह प्रियतम नित निहारे,

प्रेम आकुल भामिनी,

पूछती है केश वेणी।

तन लगे इस दाग को

*

रो रहा है देख अम्बर,

टूटते विश्वास को।

छल गया है चाँद छलिया,

फिर मिलन की आस को।।

दे रहे आवाज आँसू,

जा रहे मधुमास को।

नित गरल के घूँट पी कर,

देखते बस झाग को।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२१ ☆ भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

बरगी जल के बाँध में, गूँजी चीख हज़ार।

गोद मिली है नर्मदा, समा रहे जलधार।

*

अश्रु बहे कैसे? रुकें, देखा जब ये त्रास।

हृदय फटा मन रो पड़ा, बुझी जीवनी आस।।

*

करुण दृश्य यह देखकर, मौन रहा आकाश।

सोए नीर समाधि में, कैसे? हों विश्वास।।

*

माँ ने थामा लाल को, लहर बहाती साथ।

बढ़ा रही माँ नर्मदा, देती अपना हाथ।।

*

अन्तस आहत हो रहा, सुनकर करुण पुकार। 

असमय घटना देखकर, मचता हाहाकार।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०३ ☆ कविता – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता  – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०३ ☆

☆ कविता – ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

ये  चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

देकर   लोभ  लुभा  जाते   हैं ||

आए   कभी  न  वर्षों  से  जो |

गले   लगाकर   सहलाते    हैं ||

*

जन  नेता  बन  जाते  भिक्षुक |

चरण चूमते छलिया झुक-झुक ||

एक  लक्ष्य   बस  सत्ता  पाना |

परिणामों की मन में धुक-पुक ||

जामा  पहने  जन  सेवक  का |

अपना  परचम    फहराते   हैं ||

ये   चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

*

जाति – धर्म   की  बातें  करते |

वादों    के    आडंबर    रचते ||

वोट   खींचने  करते  साजिश |

दाँव-पेंच   में   माहिर   लगते ||

ये   कानून    हाथ   में   लेकर |

प्रतिद्वंदी    को    धमकाते  हैं ||

ये   चुनाव  जब  भी  आते  हैं |

*

रंग  –  बिरंगे      नारे       रटते |

अपने   स्वयं    कसीदे    गढ़ते ||

इनकी    मोटी   चमड़ी     यारो |

लज्जा-शर्म   ताक  पर  रखते ||

इनकी  तिकड़म  को  पहचानो |

जाल   वोट   का   फैलाते    हैं  ||

ये   चुनाव   जब  भी   आते  हैं |

*

खूब     बहाते      नेता     पैसा |

कोई   चतुर   न   उनके   जैसा ||

मत  की  कीमत  पहचानो  तुम |

करो     न    सौदा    ऐसा   वैसा ||

ध्यान    रखें    ‘संतोष’    हमेशा |

देश    भक्त   तब   कहलाते   हैं ||

 ये   चुनाव  जब   भी  आते   हैं |

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २२ – कविता – मन… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मन…‘।)

☆ शशि साहित्य # २३ ☆

? कविता – मन…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

मन पर कोई जोर चले ना,

मन का वेग अनंत,

कभी यहां तो कभी वहां,

विचरे लोक परलोक,

कठोर बने ,तो पत्थर भी शर्माए,

कोमल इतना , मोम सा पिघला जाए,

कभी सूरज से ऊष्मा ले ले,

कभी शीतलता को ले अपनाए,

कभी मुखरित हो जाता है,

कभी धारण कर लेता है मौन,

कभी विश्व पर शासन करता,

कभी दुबक ,सिमट ,अपने में जाए,,

मन की लीला मनमोहन जाने,

और जान सका ना कोई,

जिसने पाई मन की थाह…

सम ईश् तुल्य हो जाए…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४४ ☆ इंतज़ार ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४४ ☆ इंतज़ार ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

धूप के पीछे छुपकर

बैठा हुआ है सूरज

फेंक रहा है किरणों का जाल

फँसा रहा है हर छोटी बड़ी मछली को

मछलियाँ सिर पर बाँधे कफ़न

कर रहीं हैं अपना बचाव

ठंडे पानी के घड़े निकल पड़े हैं

बचाने प्यास के भूचाल से

चिड़ियों का झुलस रहा है आबोदाना

तिनके की ओट लिए बैठे

पंख फैलाकर चूज़ों को बचाने

घने पेड़ों की छाँव नहीं मिलती

जंगल अब हो गए हैं वीरान

सन्नाटों ने बना लिए हैं घर

चहल पहल वाली बस्तियों में

मज़दूरों की टोली लगी है काम में

पोंछ रही है माथे से रिसता पसीना

और हम बैठ कर सेंक रहे हैं

एसी कूलर में अपना वजूद

उधर पहाड़ों पर बर्फ़ गिरी है

नीचे फट गया है धरती का आँचल

उभर आए हैं नदिया के घाव

बादल तुम कब आओगे?

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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