हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आदिबीज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आदिबीज ? ?

ये ज़मीन मेरी है

इसकी रजिस्ट्री मेरी है,

कोठी, गाड़ी, इज़्ज़त

जायदाद, जेवरात मेरे हैं,

इन्हें छू नहीं सकता कोई,

औरत बनती है

कभी ज़मीन

कभी रजिस्ट्री

इज़्ज़त और ़

जायदाद भी मर्द की,

मुर्दा सम्पत्ति का

ज़िंदा आदिबीज होती है औरत!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१७ – विश्व प्रेम आराधना… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी समसामयिक कविता “विश्व प्रेम आराधना… । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१७ – विश्व प्रेम आराधना…  ☆

(समसामयिक रचना)

जग डूबा अवसाद में, छेड़ा जबसे युद्ध।

दोनों को समझा सकें, कहाँ से लाऊँ बुद्ध।।

 *

विश्व प्रेम आराधना, सुख शांति प्रासाद।

हिल -मिलकर सब रह सकें, हटे दूर उन्माद।।

 *

गीता के प्रतिसाद में, कर्म भाव ही तत्व।

जिसने जीवन को जिया, उसका बढ़ा महत्व।।

 *

जीव जगत को है मिला, आशीर्वाद प्रसाद।

नेक राह पर चल पड़ो, कभी न हो उन्माद।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७९ – अब तो जागो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास’ की एक भावप्रवण कविता – शब्द नहीं रहे शब्द।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७९ – अब तो जागो…२ ✍

(काव्य संग्रह‘उजास ही उजास’ से )

ऋतुओं का रहस्य भी उसने ही बताया था।

हमसे बार बार होती थी भूल

और वह

हमें समझाता था

मनुष्य

के मन का भूगोल।

और इतिहास ?

हाँ, उसने कहा था-

इतिहास की बेवकूफियों से बचो

अपना इतिहास खुद रचो।

उसकी याद करते-करते

मन दहने लगा

उसका कहा सुना

आँसुओं की नदी संग बहने लगा।

और तभी

एक शिशु स्पर्श ने चेताया

हाँ,

वह घुटनों के बल आया

और बैठ गया आगे।

हमने उसकी नि:शब्द वाणी सुनी-

वह कह रहा था

अभागो!

जागो।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७८ “कहने को आखिर क्या कहते…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत कहने को आखिर क्या कहते...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “कहने को आखिर क्या कहते...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जाते हुये नहीं कुछ बोले

जर्जर खिन्न पिता ।

कहने को आखिर क्या कहते

मरणासन्न पिता ॥

 

पड़े तख्त पर ताका करते

घर की चौखट को ।

कभी जोड़ते थे जो  दोनों

नदिया के तट को ।

 

घर की प्रथक बुनावट को जो

सहज समेटे थे –

उसे बिखरता देख रह गये

जैसे सन्न पिता ॥

 

आगे की दीवार और

छत की वे शहतीरें ।

जिस पर टँगी अनेकों

धुँधली सी कुछ तस्वीरें ।

 

एक एक कर सभी नजर

आ जाती थी उनको –

जिन्हें याद कर हो जाते थे

तनिक प्रसन्न पिता ॥

 

उन्हीं घरेलू तस्वीरों में

दिखती भी निश्छल ।

अम्मा की मुस्कान सहज ही

करती उन्हें विकल ।

 

सारी स्मृतियाँ उनको

करतीं असहज सी थीं,

जो थे कभी स्वस्थ –

सामाजिक, पड़े विपन्न पिता ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

05-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – स्त्रीलिंग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – स्त्रीलिंग ? ?

नवजात का रुदन

जगत की पहली भाषा,

अबोध की खिलखिलाहट

जगत का पहला महाकाव्य,

शिशु का उंगली पकड़ना

जगत का पहला अनहद नाद,

संतान का माँ को पुकारना

जगत का पहला मधुर निनाद,

प्रसूत होती स्त्री केवल

एक शिशु को नहीं जनती,

अभिव्यक्ति की संभावनाओं के

महाकोश को जन्म देती है,

संभवत: यही कारण है

भाषा, स्त्रीलिंग होती है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पहले आम तोड़ने के लिए पत्थर मारते थे – कवि: अज्ञात ☆ संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ कविता ☆ पहले आम तोड़ने के लिए पत्थर मारते थे – कवि: अज्ञात ☆ संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे☆

अब खुद ही गिर जाओ तुम, टूट कर जमीं पर ।

पत्थर मारने वाला बचपन, मोबाइल मे व्यस्त है।।

अच्छी थी, पगडंडी अपनी।

सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।

 *

फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।

सबके पास, काम बहुत है।।

 *

नहीं जरूरत, बूढ़ों की  अब।

हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।

 *

उजड़ गए, सब बाग बगीचे।

दो गमलों में, शान बहुत है।।

 *

मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं।

कहते हैं, ज़ुकाम बहुत है।।

 *

पीते हैं, जब चाय, तब कहीं।

कहते हैं, आराम बहुत है।।

 *

बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री।

व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है।।

 *

आदी हैं, ए.सी. के इतने।

कहते बाहर, गर्मी बहुत है।।

 *

झुके-झुके, स्कूली बच्चे।

बस्तों में, सामान बहुत है।।

 *

नही बचे, कोई सम्बन्धी।

अकड़,ऐंठ,अहसान बहुत है।!

 *

सुविधाओं का, ढेर लगा है।

पर इंसान, परेशान बहुत है परेशान बहुत है।।

🙏🏻

साभार – सोशल मीडिया 

कवि – अज्ञात 

संकलन – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

संपादिका ई-अभिव्यक्ति (मराठी)

९८२२८४६७६२

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५९ ☆ # “बाप की व्यथा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बाप की व्यथा…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५९ ☆

☆ # “बाप की व्यथा…” # ☆

सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर

हमारे एक पुराने मित्र से मुलाकात हुई

हाय हेलो के बाद बैठकर बात हुई

हमने पूछा-

यह क्या हाल बनाया है ?

क्या कोई बीमारी का तुम पर साया है  ?

वह बोला यार

क्या बताऊं?

कैसे जी रहा हूं ?

रोज जी रहा हूं

और रोज मर रहा हूं ?

भाई पत्नी के बिना जीना

लोहे के चने चबाना है

रोज जीना है रोज मरना है

छोटे बेटे के परिवार के साथ रहने लगा,

उनको ही अपना कहने लगा

कहने को तो तीन बेटे है

पर वह दोनों अपने परिवार में मस्त है

अपने आप में ही व्यस्त है

 

कुछ दिनों बाद परिवार में अचानक कलह हो गई

घर और संपत्ति वजह हो गई

दोनों बेटे आकर अपना हक मांगने लगे

हम कशमकश में रात भर जागने लगे

समझाने पर भी वह दोनों नहीं माने

रोज बहू बेटे आकर मारने लगे ताने

थक हारकर

हमने घर और संपत्ति बेचकर

तीनों में बराबर बांट दिया

अपना हिस्सा नहीं लिया

मैंने पूछा-

मैं कहां रहूंगा ?

कैसे जिऊंगा ?

 

उन्होंने चार-चार महीने के लिए मुझे आपस में बांट दिया

मेरी सहमति या असहमति का कोई विचार नहीं किया

तब से हर एक के पास चार-चार महीने रहता हूं

बहू बेटे के अत्याचार चुपचाप सहता हूं

कोई प्यार या कोई लगाव नहीं है

रुखे सूखे खाने में कोई चाव नहीं है

सब लोग एक-एक दिन गिनते हैं

4 महीने से एक दिन भी ज्यादा रहने नहीं देते है

मैं आजकल कुत्ते की तरह जी रहा हूं

जीते जी यह जहर पी रहा हूं

साहब मैंने जो गलती की है

वह कोई ना करें

जीते जी अपना घर और संपत्ति

बच्चों के नाम ना करें

मैं आज पैसे पैसे के लिए मोहताज हूं

कल था संपन्न

पर फकीर आज हूं

मैंने कहा-

भाई निराश ना हो

धैर्य न छोड़

कानून की सहायता ले

आस ना छोड़

वृद्ध दंपति के भरण पोषण के लिए

संतान जिम्मेदार है

कानून का राज है

न्यायालय में जाना

हमारा अधिकार है

तुम आवेदन लगाओ

और अपना हक पाओ

रिश्तो के मोह में पड़कर

तुम भावनाओं में बह गए

अपना सब कुछ लुटा दिया

अब कहीं के नहीं रहें

 

तुम्हें मेरी दोस्ती का वास्ता है

कानून की शरण ही एक रास्ता है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०२ – विभीषिका युद्ध की… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता विभीषिका युद्ध की।)

☆ अभिव्यक्ति # १०२ ☆ विभीषिका युद्ध की☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

एक धमाका,

धुएं का गुबार,

गिरा हुआ मलबा,

जलते जिस्मों की गंध,

रिश्तों का अंत

युद्ध  का परिणाम,

क्या मिलता है,

युद्ध से,

सीमा का विस्तार,

संसाधनों पर कब्जा,

संबंधों का अंत,

अहम की तुष्टि,

चीखों में वृद्धि,

पर्यावरण की क्षति,

मानवता का रुदन,

मानवता पर घाव,

विनाश के बादल,

युद्ध विनाशक,

विभीषिका युद्ध की,

क्या यही है,

मानव का विकास,

सोचिए न…

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एक मुट्ठी आसमाँ ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ एक मुट्ठी आसमाँ ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

करो जागरण अंतर्मन का,मन संकल्प सजाओ।

करना है जो कर ही डालो,रोग दूर कर जाओ।।

बंधु ज़रा ! निज मन की बात मानकर तो देखो।

एक मुट्ठी आसमाँ ज़रा हासिल कर तो देखो।।

  *

साहस का भाव निभाकर,संयम ह्दय जगाओ।

करना है जो,कर ही डालो,मंज़िल को पा जाओ।।

ख़ुद की कमियों को ज़रा ईमानदारी से लेखो।

ज़रा,एक मुट्ठी आसमाँ  हासिल कर तो देखो।।

 *

जीवटता से तो मार्ग स्वास्थ्य का मिल जाता है।

सब कुछ होना,इक दिन हम में बल लाता है।।

करना है जो,कर ही डालो,मंज़िल को पा जाओ।। 

ज़रा,एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।।

 *

रीति-नीति के पथ पर चल,मंगल को तो पाओ।

अंधकार को परे हटाओ,हथेली पर नूर उगाओ।।

इंसानी जज़्बातों को संग ले जीवन को लेखो।

ज़रा,एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७४ – ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७४ ☆

☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जल प्रवाह में नर्तित रवि-किरणों में झलक तुम्हारी है।

चंद्र-रश्मियों में बिंबित छवि हमने हुलस निहारी है।।

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अवधविहारी सदा अवध तज वन सीता के साथ गया।

पंचवटी की कुटिया में महकी जीवन फुलवारी है।

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जहाँ बाँसुरी बजी, राधिका की पैंजनिया थिरक उठी।

जहाँ रँभाई गाय वहीं हँस रमता विपिन विहारी है।।

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नित्य नवल नर्मदा धार की लहर-लहर चक्रित पल-पल।

श्याम-श्वेत चट्टानों ने की चुप रह भागीदारी है।।

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बीज अंकुरित हुआ पल्लवित पुष्पित फल कर झरता है।

जर्जर तरु हर शाख अपर्णा, जाने की तैयारी है।।

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कौन कहीं का सगा यहाँ है?, किस बिन किसका काम रुका?

चार दिनों का सफर, लदी क्यों सिर पर गठरी भारी है?

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सलिलनगद सौदा करता जो, साहूकार सुखी रहता।

दुखी वहीं जिसने फैलाई जहँ-तहँ बहुत उधारी है।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१६.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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