हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५० – कविता – हे राजाराम मै ओरछा में आ गया ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५० ☆

☆ कविता ☆ ~ हे राजाराम मै ओरछा में आ गया ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

हे राजाराम मै ओरछा मै आ गया ।

तेरे रंग में रंगा, और तुझमे समा गया ।।

अवध  जन्मभूमि , छवि  ओरछा में।

दुःख वन में सहे, सुख मिला ओरछा में।।

रानी कुंवरी की भक्ति पर लुभा गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

*

तुम सरकार सबके, यहां सरकार तेरी।

बुंदेलो की धरती पर   जयकार तेरी।।

राजा बुन्देला बुलाये और मै आ गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

*

राजेश राम रसिया – मिलेंगे, यहां पर।

महेंद्र भीष्म जी हैं पहुंचे  है जहाँ पर।।

सभी से मिलने मै ओरछा आ गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

*

रामरस वाला अमृत यहाँ पर ।

भक्तों का रेला जुटा है यहाँ पर।।

चाहा था वह सब कुछ पा गया।

हे राजाराम  मै ओरछा में आ गया।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २९ – शेखी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “शेखी“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २९ ?

? कविता – शेखी☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

ना जान-बूझकर ज़ुबान हारिये हुज़ूर

शेखी न शेखचिल्ली सी बघारिये हुजूर

=2=

वादाखिलाफी शौक़ पसंदीदा आपका

मुद्दे जन-हितों के न नकारिये हुज़ूर

=3=

मुकरना बदल जाना फ़ितरत है आपकी

अब मुखौटा नकली ये उतारिये हुज़ूर

=4=

जितनी बड़ी हो आपकी औकात की चादर

पाँव अपने उतने ही पसारिये हुजूर

=5=

ग़र देखना है आँगन अमराई सुहानी

सुदूर किसी गाँव में पधारिये हुजूर

=6=

गंगा में डुबकियों से,यूँ न पाप धुलेंगे

मन को भी संस्कार में पखारिये हुजूर

=7=

मानकर रहनुमा चुना हमने आपको

उम्मीदें आम जन की न डकारिये हुज़ूर

=8=

तुनक़मिज़ाज़ होना बात-बात पे गुस्सा

वक़्त रहते आदतें सुधारिये हुजूर

=9=

लहज़ा नरममिज़ाज़ हो दरियादिली दिखे

शख़्सियत को अपनी यूँ निखारिये हुजूर

=10=

कुछ तो काम कीजिये आवाम के लिए

मुसीबतों से देश को उबारिये हुज़ूर

=11=

जीने न देगी आपको ख़ामोशमिज़ाज़ी

नये दौर में ‘राजेश’ सच उघारिये हुजूर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०२ ☆ मुक्तक – ।। शत शत नमन हर श्रमिक कामगार को ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०२ ☆

☆ मुक्तक ।। शत शत नमन हर श्रमिक कामगार को ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

//1//

मेहनत से ही तो आज खड़े ये

सब बंगलें कोठी मकान हैं।

किसान ही तो उपजाते ये सब

खेत और खलिहान हैं।।

कठोर परिश्रम से ही उत्पत्ति

होती प्रगति और विकास की।

लाखों प्रणाम उन श्रमिकों को

जो बना रहे नया हिंदुस्तान हैं।।

//2//

जैसे भवन की नींव वैसे ही तो

श्रम विकास का नींव होता है।

श्रमिक ही अपने खून पसीने

से प्रगति का बीज बोता है।।

उद्योग व्यापार कार्यालय जहाँ

देखें श्रमिक को हम पाएंगे।

यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी

कि मजदूर भूखा नहीं सोता है।।

//3//

शत शत नमन राष्ट्र निर्माण के

इन परिश्रमी कर्णधारों को।

थल जल नभ मे रत इन सभी

पुरुषार्थ के आधारों को।।

पसीना सूखने से पहले ही मिले

उचित पारिश्रमिक इन सब को।

बनाया जिसने है इन सड़क

बाँध और हमारे घर दीवारों को।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६५ ☆ कविता – आजाद देश की पहचान… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – आजाद देश की पहचान। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६५ 

☆ आजाद देश की पहचान…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

आजाद देश की कई होती अलग पहचान

जैसे कि राष्ट्र चिह्न राष्ट्र ध्वज व राष्ट्रगान ॥

*

हर एक को हो इनका ज्ञान और सदा ध्यान

हर नागरिक को चाहिये दे इनको वे सन्मान ॥

*

इनका स्वरूप कैसे बना, क्या है इनका अर्थ

यह समझना जरूरी है जिससे न हो अनर्थ ॥

*

भारत के ये प्रतीक क्या हैं इनको जानिये

तीनों का अर्थ समझिये मन से ये मानिये ॥

*

सम्पन्नता, बलिदान, त्याग, गति, विकास की ।

देती है इनसे निकलती किरणें प्रकाश की ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभी अभी # ९८३ ⇒ तीन तेरह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता  – “तीन तेरह।)

?अभी अभी # ९८३ ⇒ कविता – तीन तेरह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

3.13

रात्रि के तीन बज गए

तेरह, फिर भी रह गए …

मैं सोया रहता हूं,

मेरे पास पड़ा रहता है

मेरा मोबाइल

और चलती रहती है

उसकी डिजिटल घड़ी ..

समय के साथ सोना

और जागना, एक साथ।

अभी समय है मेरे उठने में

अभी समय है मेरे जागने में

मैं इसलिए सोया हुआ हूं, क्योंकि मैं सुबह

चार बजे उठता हूं।

3.47

मैं उठ गया हूं

जाग भी गया हूं

तेरह फिर भी रह गए

अभी चार बजने में ..

यानी मैं समय से

पहले उठ गया हूं

तेरह मिनिट पहले।

मैं जागता रहूंगा

और तेरह मिनिट

जब तक

चार नहीं बज जाती ..

अब आप इसे डिजिटल

स्लीप कहें अथवा

डिजिटल ध्यान,

लेकिन मुझे समय के साथ

जागना भी पसंद है

और सोना भी।।

4.00

अब और तीन तेरह नहीं

क्योंकि चार बज गए हैं

घड़ी ने अपना काम किया

मुझे समय से उठा दिया..

आपका सोने का

समय समाप्त ..

शुभ प्रभात !!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ थोथी उम्मीद लगाए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – थोथी उम्मीद लगाए…!

☆ ॥ कविता॥ थोथी उम्मीद लगाए…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

तुम्हें बचाने के लिए

कोई मसीहा नहीं आएगा

और अगर आया भी,

तो जन-जागरण के जुर्म में

सूली पर चढ़ा दिया जाएगा।

 

ज़िंदा रहने के लिए

प्राणी मात्र को अपनी लड़ाई

खुद लड़ना पड़ती है

यही बात तो गीता में

कृष्ण ने अर्जुन को कही है।

 

ऊपर आसमान में

सूरज, चाँद, तारों, ग्रह, नक्षत्रों

और सिवाय शून्य

नीलिमा के कुछ भी नहीं है।

 

फिर भी पागल मन है

कि अवतार की अवधारणा के

अश्व पर सवार होकर

अपने उद्धार की

थोथी उम्मीद लगाए बैठा है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कस्तूरी मृग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कस्तूरी मृग ? ?

अपने ही पसीने से

नम हुआ बिस्तर

ठंडा हो जाता है,

अनिद्रा का मारा

उफनते पारे में भी

गहरा सो जाता है,

चिंतन की भूमि पर

विवेचन उगता है

कानों में कहता है,

एक कस्तूरी मृग

हर आदमी के

भीतर रहता है।

 

?

© संजय भारद्वाज  

(प्रातः 5.20 बजे, 30.3.19)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९२ – नवगीत – जीवन में उद्धार है… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतजीवन में उद्धार है

? रचना संसार # ९२ – गीत – जीवन में उद्धार है…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

मानव आप अहं को तजिए,

वह तो एक विकार है।

क्रोध मोह को तज दोगे तब,

जीवन में उद्धार है।।

*

रावण अत्य अंहकारी था ,

करता वो अभिमान था।

माँ सीता का हरण किया था,

बहुत बड़ा नादान था।।

तोड़ा दर्प राम ने उसका,

रख लो मानव ध्यान भी।

मारा प्रभु ने रण में उसको,

सकल जगत को ज्ञान भी।।

धूल अहंकारी हैं मिलते,

करिए आप विचार है।

*

मिट्टी की तो काया है यह,

दूर रहो तुम पाप से।

मानवता के सेवक बन जा,

नित्य डरो संताप से।।

अहंकार है दंश साँप का,

परम शत्रु है प्राण का।

जीवन में वह जहर घोलता ,

काल बने हैं त्राण का।।

करे खोखला दीमक जैसा,

अहंकार अंगार है।

*

मात-पिता का आदर कर लो,

उनका नित सम्मान हो।

प्रेम पंथ पर नित्य चलो तुम,

धर्म कर्म संज्ञान हो।।

अहम् भाव में मत खोओ तुम,

उन्नति में व्यवधान है।

गरल पियो मत इसका सुन लो,

खो जाता सब मान है।।

अहंकार का नाम बुरा है ,

जीवन होता भार है।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२० ☆ भावना के दोहे – अवसाद ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – अवसाद)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२० – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – अवसाद ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कठिन राह में आपको,आया सूरज  याद।

क्लेश मिटेंगे आपके, पूरी हर मुराद।।

 *

लगी  तपन तो धूप की, बरस रहे अंगार।

छाँव नहीं है तनिक भी, बढ़े ताप का ज्वार ।।

 *

बयार चले बैसाख की, झुलस रहे हरियाल।

तेज धूप के पाँव है,बुरा हो रहा हाल।।

 *

तेरे तेवर देखकर, कैसे करें संवाद।

मन की बातें रह गई,अधरों के अवसाद।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३०२ ☆ गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०२ ☆

गीत – इक  दिन  सबको  ही जाना है☆ श्री संतोष नेमा ☆

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

द्वार   मृत्यु   के  ही  आना  है ||

साथ  सदा   यह  देह  न  देगी |

मिट्टी  में  सब   मिल  जाना है ||

*

चार   दिनों का जीवन फ़ानी |

करी   खूब   सबने   मनमानी ||

चला  जोर ना यहाँ किसी का |

द्वार   ईश   के   भरते   पानी ||

जीवन  मिथ्या  मृत्यु  सत्य  है |

गीत   सदा   ही  यह  गाना  है ||

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

*

सबने   स्वयं   अहम   हैं  पाले |

लालच   ईर्ष्या   के    रखवाले ||

रखें  होड़ बस  इक   दूजे   से |

भूल   गए  सच   ये   मतवाले ||

इन्हें    कौन   समझाए   भाई |

झूठा   सब   ताना – बाना   है  ||

इक  दिन  सबको  ही जाना है |

*

ईश्वर      ने     इंसान    बनाया |

हमने    ईश्वर   को    बिसराया ||

भेदभाव    की  खोद   खाइयाँ|

मानवता   का   खून    बहाया||

जाति – धर्म  में  बँटकर  हमने |

नहीं  स्वयं   को   पहचाना   है ||

इक  दिन  सबको  ही  जाना है |

*

परमेश्वर    के   अंश    हमी  हैं |

दूर   दृष्टि   की   सिर्फ  कमी हैं ||

इष्ट  कृपा  को   कभी  न   भूलें |

जिसके कारण  साँस   थमी  हैं ||

शुभ  ‘संतोष’  यही  जीवन  का |

ध्येय    सुपावन   अपनाना    है |

इक  दिन  सबको  ही  जाना  है |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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