हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(ई-अभिव्यक्ति- में ‘पूर्णिका’ जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’का स्वागत.)

संक्षिप्त परिचय 

सम्प्रति : आयुध निर्माणी खमरिया से सेवा निवृत्ति के पश्चात मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत।

कृतियाँ: अनुराग (कहानी संग्रह) फरवरी 2009, धरती की धरोहर (कहानी संग्रह) नवंबर २०११। किलकारी (बाल काव्य-संग्रह) जनवरी 2014 विचार (काव्य-संग्रह) 2017. बुंदेली भोजपुरी गीत समागम 2020. गांव की बेटी (उपन्यास) जनवरी 2021, आह (पूर्णिका संग्रह) 2021, घर संसार (गीत संग्रह) 2023, सुखानुभूति (पूर्णिका संग्रह). का मओ…बिन्ना (बुन्देली पूर्णिका संग्रह) 2025, पूर्णिका विद्या पर विमर्श के साथ ही ‘बधाई हो बघाई’ (पूर्णिका संकलन) आपके जन्म दिवस को समर्पित 93 पूर्णिका-कारों ने केवल एक विद्या विशेष ‘पूर्णिका’ पर अपनी पूर्णिकाएं समर्पित की, इसके साथ ही नगर, प्रदेश, देश से प्रकाशित होने वाले करीब 130 संकलनों में आपकी रचनाएँ यथा प्रकाशित हुई हैं। अभी आप कई पत्र पत्रिकाओं के साथ साहित्य परिवार पत्रिका नदियाद गुजरात के सह संपादक, काव्यामृत पत्रिका पीलीभीत के क्षेत्रीय संपादक भी है। ‘माई’ उपन्यास प्रकाशाधीन है आप आकाशवाणी जबलपुर से निरंतर कहानी पाठ करते हैं।

सहभागिता : आपने विभिन्न विभागीय और अविभागीय अनेक प्रतियोगिताओं में भाग लेकर तथा त्वरित – भाषण, निबंध-लेखन, कविता-लेखन, बाद-विवाद और कविता पाठ में विजय श्री प्राप्त की है।

सम्बध्दता : आप विभिन्न सामाजिक, साहित्यक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक संगठनों से जुड़े हैं। जैसे पूर्व नगर महासचिव स.पा. अध्यक्ष विधिक साक्षरता समिति पंजीकृत जबलपुर हैं।

संयोजक / संस्थापक: अंतर्राष्ट्रीय पूर्णिका मंच, आमा साहित्य संघ जबलपुर मप्र, उपाध्यक्ष यादव महासभा, उपाध्यक्ष त्रिपुर वरिष्ठ नागरिक महासंघ जबलपुर मप्र, इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स आर्गनाइजेशन – विधिक सलाहकार मप्र … आदि।

सम्मान : अनेक प्रांतीय एवं राष्ट्रीय साहित्यिक, सामजिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं मानद उपाधियों से अलंकृत / विभूषित।

विशेष : विक्रम शिला हिन्दी विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) भागलपुर बिहार से पूर्णिका- जनक की उपाधि से सम्मानित (2022)

 

आत्मकथ्य – सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह)☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

(डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ जी को हिंदी साहित्य की विधा पूर्णिका का जनक होने का श्रेय है. आपकी पुस्तक सफल हुआ अभियान (पूर्णिका संग्रह) के आत्मकथ्य के माध्यम से आपने पूर्णिका के इतिहास पर प्रकाश डाला है जिसे हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. इसके पूर्व हमने इसी प्रकार गद्य क्षणिका के जनक श्री रामदेव धुरंधर जी, मारीशस के आलेख को भी प्रकाशित किया था जिसे आप निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं. – संपादक (ई-अभिव्यक्ति))

👉 हिंदी साहित्य – आलेख ☆ दस्तावेज़ # 30 – मारिशस से ~ गद्य – क्षणिका : मेरे लेखन का एक सबल पक्ष ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

“सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह को पुस्तक रूप तक लाने में मुझे भी बहुत कुछ नये नये अनुभव प्राप्त हुए है। जब से हमने सन् 2017 से पूर्णिका पर काम करना प्रारम्भ किया है।

अनुभव यह हुआ कि यदि कोई भी चीज या चलन सदियों से चल रहा है तब भी उसे हमें बिना सोचे समझे आँख बंद करके नहीं मान लेना चाहिये हमें ईश्वर ज्ञान बुध्दि प्रदान किये हैं उसका धनात्मक, ऋणात्मक समझ बूझकर नुकसान फायदा सोच कर स्वीकार करना चाहिये मानना चाहिये और यदि हमें लगता है कि यह तो गलत है हमारे या जन हित में नहीं है तो उसे स्वीकार करने की जगह अस्वीकार करना चाहिये।

लेकिन हाँ यदि आप ने ऐसा किया तो उस प्रथा चलन को आँख बंद करके मानने वाले आप के विरोध में खड़े हो जाते हैं यह मेरे साथ पूर्णिका को लेकर ही नहीं बड़े बड़े वैज्ञानिको के साथ भी हुआ लेकिन वो अपने उद्देश्य से विरोध के पश्चात भी भटके नहीं तभी आज विश्व विज्ञान में इतनी प्रगति कर चुका है कि आज वर्तमान में चाँद पर बस्ती बनाने की चर्चा जोरों पर है। यदि आज भी लोग चाँद को चन्दा मामा जानते रहते हमें बताते रहते और हम वही मानते रहते तो आज भी विकास से दूर होते।

एक महान होमियोपैथी चिकित्सा पद्यति की खोज करने वाले जब डॉ. हैनीमन साहब ने कहा कि रोग जिस तत्व की कमी से हो जाये तब उसे ही पूरा कर दो रोग ठीक हो जायेगा।

लेकिन उनकी इस बात का उस समय पुरजोर विरोध हुआ फिर भी वो अपने काम में विरोध को दर किनारे कर के लगे रहे और आज होमियो पैथी चिकित्सा पद्यति से रोगियों का इलाज कर उन्हें खुशहाल किया जा रहा है रोग मुक्त किया जा रहा है।

यदि आज सारे के सारे लोग दुनियाँ की उन्हीं पुरानी विचार धाराओं प्रथाओं को मान कर चल रहे होते तो ऐसा विकास जो हम देख रहे हैं किसी भी क्षेत्र में न हुआ होता वह चाहे दूर संचार, सुरक्षा अथवा किसी भी क्षेत्र में अकल्पनीय, विकास न हो पाया होता।

हाँ किसी खोज का विरोध यदि तर्क संगत हो तो होना भी चाहिये किन्तु तर्क हीन नई खोज का विरोध तो नहीं होना चाहिये किन्तु कुछ लोग तर्क संगत खोज का तर्क हीन विरोध करते हैं।

कुछ लोग उस तर्क हीन विरोध करने वाले व्यक्ति को अपने पाले में करने के लिये उस व्यक्ति जिसने तर्क हीन विरोध उस नई खोज का किया बिना उसकी योग्यता का उचित अध्ययन मूल्यांकन किये पावर या क्षमता न होते हुए भी किसी उपाधि विशेष से अलंकृत कर देते हैं जो न तो अलंकृत होने वाले को और न ही अलंकृत करने वाले को कोई लाभ पहुँचा पाती है बस इतना ही होता है अपने मुँह मियां मिट्ठू बने रहिये खुश होते रहिये।

हम लोग यह भी जान लें कि जब कोई व्यक्ति, वैज्ञानिक, साहित्यकार नई बात उठाता है तब भी जो लोग स्थापित नहीं होते हैं वो विरोध इसलिये करते हैं कि हमने तो इतने बड़े बड़े काम किये हैं लेकिन नया कुछ भी नहीं कर पाये है जो सदियों से चल रहा है वही किये हैं लेकिन यह व्यक्ति नया कुछ कर के अपना नाम इतिहास में दर्ज करा लिया है हम ऐसे ही रह गये।

लेकिन आगे चलकर जो विरोध होता है वह यह साबित करता है कि अब वह व्यक्ति अपने उद्देश्य में सफल हो रहा तभी यह विरोध हो रहा है। यही हाल पूर्णिका जनक और पूर्णिका के साथ भी है।

साहित्य हो विज्ञान हो या अविष्कार का कोई नया क्षेत्र हो। विरोधियों के अलावा एक समय ऐसा आता है कि उस व्यक्ति (जो नया काम कर रहा है) के साथ उसकी विचार धारा से सहमत हो कर अनेकानेक लोग, अनुयायी साहित्यकार वैज्ञानिक उस व्यक्ति के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते हैं

जिससे वह खोज दुनिया स्वीकार कर लेती है और विरोधियों कि जुबान बंद हो जाती है उन्हें विवश हो कर उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना पड़ता है या मुँह छुपाना पड़ता है।

यही हाल पूर्णिका और पूर्णिका जनक के साथ हुआ आज पूर्णिका हिन्दी साहित्य की जानी मानी एक सशक्त विधा है जिसे हिन्दी साहित्य में एक सम्मान जनक स्थान प्राप्त हो जिसके लिखने पढ़ने वाले पूर्णिकाकारों की एक लंबी सूची बन गई है जिसमें सर्व प्रथम डॉ. प्रो. खेदू भारती ‘सत्येश’ जी धमतरी छत्तीसगढ़ का नाम आता है जिनकी पूर्णिका की पचास पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जो छत्तीसगढ़ी बोली और हिन्दी में हैं।

जबलपुर के पूर्णिका पुरोधा कदम जबलपुरी जी नों सौ दिन से निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं इनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। शिव अलग जी जिनकी तीन पूर्णिका संग्रह के साथ पूर्णिका में एक महाकाव्य प्रकाशित हो रहा है जो लगभग तीन हजार पृष्ठों का होगा। मारीशस से भाई गोवर्धन सिंह फौदार सच्चिदानंद जी निरंतर पूर्णिका लिख रहे हैं डॉ. कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ जी जिन्होंने बुन्देली बोली में पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित करा दी है। रजनी कटारे जी जिनकी तीन पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दीन दयाल यादव जी जिनकी पूर्णिका की पुस्तक प्रकाशित हो चुकी। भाई श्री ओम प्रकाश खरे और रमेश सेठ तथा चन्द्रभान चन्द्र और डॉ ललित कुमार सिंह ‘ललित’ अलीगढ़ उत्तरप्रदेश के साथ ही देश के अनेकानेक पूर्णिका कारों की पूर्णिका की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिसमें कुंज बिहारी यादव नरसिंहपुर मप्र, नीलम यादव एहसास प्रयाग राज उप्र, किरत सिंह यादव भिण्ड मप्र, गायत्री सिंह ठाकुर ‘सक्षम’ नरसिंहपुर मप्र, सतीश तिवारी भी शामिल हैं। और अभी दिसम्बर 2024 में एक साथ पैतालिस पूर्णिका की पुस्तकों का विमोचन हुआ जो ऐतिहासिक है। अभी तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक समय में एक मंच से किसी एक विधा विशेष की इतनी पुस्तकों का विमोचन हुआ हो।

और यह बात सिध्द करती है कि “सफल हुआ अभियान” सत्य और सही है कि अभी पूर्णिका जनक के 3 फरवरी 2024 को जन्मदिन पर चार हिन्दी साहित्य अकादमी भारत सरकार उच्च शिक्षा विभाग की पत्रिका, दो विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि ने और मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी ने पूर्णिका को अपनी मान्यता प्रदान कर इस बात पर और चाँद लगा दिये कि “सफल हुआ अभियान” पूर्णिका संग्रह अद्वितीय पुस्तक है।

अंत में मै अपने समस्त पूर्णिकार मित्रों को नमन करता हूँ कि यह केवल और केवल पूर्णिका के प्रति आप के लगाव और अभियान” समर्पण के कारण हो पाया है। कि “सफल हुआ अभियान’ (पूर्णिका संग्रह) अब आप और समस्त पूर्णिका कारों और पूर्णिका पाठको के हाथों में यह पुस्तक “सफल हुआ अभियान’ पूर्णिका पहुँच पा रही है।

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १८९ ☆ “व्यंग्य : कल आज और कल” – ☆ आत्मकथ्य – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है आपके द्वारा लिखित  व्यंग्य : कल आज और कलपर आपका आत्मकथ्य।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १८९ ☆

“व्यंग्य : कल आज और कल☆ आत्मकथ्य – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – “व्यंग्य : कल आज और कल”

लेखक – विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

पृष्ठ संख्या – १६६

प्रकाशक – न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली 

मूल्य – २२४ रु 

☆ एक दार्शनिक एवं सांस्कृतिक अन्वेषण – – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य विधा के समय के साथ बदलते स्वरूप, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डालती यह नई किताब है। ‘व्यंग्य आलोचना के वर्गीकरण बिंदुय् लेख व्यंग्य के मूल्यांकन के लिए आवश्यक सैद्धांतिक ढांचे और मानदंडों की पड़ताल करती है, यह समझने का प्रयास है कि व्यंग्य की आलोचनात्मक समझ कैसे विकसित हो सकती है। पुस्तक व्यंग्य की अभिव्यक्ति की विविधता को भी रेखांकित करती है। काव्य रचनाओं में हास्य, व्यंग्यऔर हिंदी नाटकों में व्यंग्य जैसे लेख स्पष्ट करते हैं कि कैसे कविता की सघनता और नाटक की नाटकीयता में भी व्यंग्य अपनी पैनी धार बनाए रखता है। नुक्कड़ नाटकों में प्रायः व्यंग्य ही वह रोचक अस्त्र होता है जो दर्शकों को बांधे रखता है। इसी तरह लघुकथा में जो चमत्कृत करता अंत किये जाने की परंपरा दृष्टव्य है उसमें भी व्यंग्य का सहारा लघुकथा को आकर्षक बनाता है। ‘व्यंग्य के विविध आयाम’ लेख विधा की बहुरूपता को और विस्तार से व्याख्यायित करता है।

166 पृष्ठ की पुस्तक में व्यंग्य विषयक 22 अध्याय हैं। समकालीन महिला व्यंग्यकारों की चर्चा पर एक अध्याय है। परसाई, त्यागी, जोशी जी पर स्वतंत्र आलेख हैं तो समकालीन व्यंग्यकारों से चर्चा भी शामिल है। किताब का मूल्य 224 रु में अमेजन पर सुलभ है। पुस्तक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन दिल्ली से अच्छे कागज पर साफ तरीके से पेपर बैक आवरण में प्रकाशित है। व्यंग्य संदर्भ है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “स्वयंसिद्धा…” (बुंदेली कथा संग्रह)– डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है  डॉ. सुमलता श्रीवास्तव जी की कृति स्वयंसिद्धा की समीक्षा)

☆ “स्वयंसिद्धा…” (बुंदेली कथा संग्रह)– डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ☆ पुस्तक चर्चा – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆ 

पुस्तक चर्चा 

पुस्तक ‏: स्वयंसिद्धा 

कथाकार  : डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव

☆ बुंदेली में रचित डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव की भावभरी कहानियां – श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

स्वयंसिद्दा” (स्वयंसिद्धा) जबलपुर की विदुषी लेखिका  डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव की बुंदेली में रचित भाव भरी कहानियों का संग्रह है। कहानियों में हमसे जुड़े, हमारे आसपास, हमारे समाज, हमारे देश के आमजन की परिस्थितियों, विषमताओं, संघर्ष, उनके दुःख – सुख, संतोष, उनकी संकल्प शक्ति का ऐसा शब्द चित्र है कि पाठक पात्रों को चलचित्र की भांति जीता जागता, जीवन संघर्ष करता देखता है। पात्रों के सुख दुख, संघर्ष उसे अपने महसूस होते हैं। कभी उसे लगता है कि काश वह कहानी के किसी विशिष्ट पात्र को कोई सलाह दे पाता अथवा उसकी कोई मदद कर पाता। क्षेत्रीय बोलियां/भाषाएं चाहे वह बुंदेली हो अथवा बघेली, मालवीय, निमाड़ी आदि आदि …. यदि हम चाहते हैं कि ये जीवित रहें तो हमें इनमें लिखना, बोलना होगा। इनका संरक्षण आवश्यक है। बुंदेली बोली में रचित यह कृति निःसंदेह बुंदेली को समृद्ध करेगी। कृति की  प्रथम कहानी “स्वयंसिद्दा” का  कथानक, पात्रों की सहजता – सरलता, भाषा शैली, प्रवाह पाठकों को बांधने में सक्षम है। भाव भरी यह कथा काल्पनिक नहीं ऐसी घटनाएं समाज में होती रहती हैं। “स्वयंसिद्दा” कहानी निरमला के इर्द गिर्द घूमती है। निरमला के पिता उसका विवाह गांव के सम्पन्न व प्रतिष्ठित पुरोहत जू के पुत्र से कराना चाहते हैं। कथा का एक प्रसंग प्रस्तुत है जिसे पढ़ते हुए आपकी आँखें उसे देखने भी लगेंगी।

“मिसरा जू प्रबचन के बाद पुरोहत जू खों अपने घरे लोआ लै गए। घर की देख-संभार निरमलइ करत ती। घिनौची तो, बासन तो, उन्ना-लत्ता तो, सब नीचट मांज-चमका कें, धो-धोआ कें रखत ती। छुई की ढिग, उम्दा गोबर सें लिपौ आंगन देखकें पुरोहत जू की आत्मा प्रसन्न हो गई। दोई पंडत तखत पै बैठकें बतयान लगे कै बालमीक की रामायन और तुलसी के मानस में का-कित्तौ फरक है? मौका देखकें मिसराजी बात छेड़बे की सोचइ रए ते, कै ओइ घरी निरमला छुइ-गेरू सें जगमग तुलसी-चौरा में दिया धरबे आई। दीपक के उजयारे में बिन्ना बाई कौ मों चंदा सो दमक उठौ। पुरोहत जू ने संध्याबंदन में हांत जोरे और निरमला खों अपने घर की बहू बनाबे कौ निस्चै कर लओ। “

सुमनलता जी की एक अन्य कथा “संतान – सातें” में पुत्र की प्रताड़ना से त्रस्त मां –

“मैंने कल्ल घाट पै संतान – सातें के कड़ा के संगे – संगे मोड़ा खों भी तिलांजलि दै दई। घाट के पंडत सें ओको किरिया-करम करबा दऔ। जोई मोड़ा मोरे बदन पै कित्ती लातें पटकत तो, जब ऑपरेशन के बाद ओखों दर्द  होत तौ, मैं चूं नैं करत ती, मनों अब लात चलाबे कौ का मतलब? ऊनें द्रोपदी घाईं मोरे केस पकर कें मोहे घसीटो थो, बाई साब! बो तो दुस्सासन सें भी खराब निकरौ। ई कौरब ने भौजाई खों नईं, जनम देबे बारी मताई खों घसीटो है। ऐंसे पापी पूत की महतारी होबे सें तो मैं निपूती भली। “

यह कथा है चंदा नामक एक गरीब महिला की जिसने चार पुत्रियों के बाद ईश्वर से मनौती मांग कर एक पुत्र की प्राप्ति की थी। गरीब श्रमिक महिला को पुत्र मिला किंतु शक्तिहीन पैरों वाला। अधिक श्रम करके, भूखे रह कर उसने पुत्र का इलाज करवाया, पढ़ाया – लिखाया। पति की उपेक्षा का शिकार तो वह पहले से ही थी, विवाह उपरांत पुत्र ने भी बहू के साथ मिलकर उस पर अत्याचार शुरू कर दिए। अंततः मां को अपनी ममता का दमन करना पड़ा। एक स्त्री का पीड़ा से भरा जीवन, उसका जीवन संघर्ष और स्वाभिमान जागृत होने पर उसका कठोर निर्णय पाठकों के मन को झकझोर कर वेदना से भर देता है। यह सिर्फ इस कथा की नायिका चंदा की कहानी नहीं है। देश – दुनिया में लाखों  महिलाएं इसी तरह का जीवन जी रही हैं। मुझे लगता है कि  इस कथा को पढ़ कर अवश्य ही उन लोगों में अपनी मां के प्रति कर्तव्यबोध जागृत होगा जो मां के द्वारा अपने लालन – पालन, उनकी त्याग – तपस्या से अनभिज्ञ और उनके प्रति निष्ठुर हैं।

इस संग्रह की कहानी “एक कटुरिया दूध” भी मन को द्रवित कर देती है जिसमें अत्यधिक गरीब किंतु ईमानदार मजदूरन अपने बच्चे को बार बार मांगने पर भी चोरी करके मालकिन के यहां का दूध नहीं पीने देती। बच्चा पूछता है – दूध का स्वाद कैसा होता है मां?

सुमनलता जी के इस बुंदेली कहानी संग्रह में जलसमादी, नजर, कचोंट, देसनिकारो, डर, मूसरचंद, कुल्फी, सौ-बटा-सौ, अपराधन, परास्त, सांचे की मूरत, लायसेंस, बुद्धिजीवी और कलाबन्त शामिल हैं। अपने विषयों, पात्रों, परिवेश, कथा पर केंद्रित रहते हुए उसके कसे हुए विस्तार, सहज सरल प्रवाहपूर्ण बुंदेली भाषा/बोली और पाठकों के मन में सजीव हो उठते पात्रों के कारण यह “कथा संग्रह” न सिर्फ बुंदेली बोली में रचित कथाओं में वरन अन्य भाषाओं में सृजित कथा संग्रहों में विशिष्ट स्थान बनाएगा।

डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव  संस्कृत और संगीत में एम.ए. तथा संस्कृत में ही संगीतशास्र में पी. एच-डी हैं। पूर्व में उनके कुछ अन्य ग्रंथों के साथ ही दो (हिन्दी ) कहानी संग्रह “जिजीविषा” एवं “सरे राह” भी प्रकाशित हो चुके हैं। इन संग्रहों में प्रकाशित कहानियों ने उनके पाठकों और प्रशंसकों का विशिष्ट वर्ग बनाया है।

मुझे विश्वास है कि “बुंदेली बोली” में रचित उनके इस नव कथा संग्रह “स्वयंसिद्दा” से न केवल उनकी यश – कीर्ति में, उनके पाठकों की संख्या में वृद्धि होगी वरन और लोगों को भी बुंदेली में सृजन की प्रेरणा मिलेगी। बुंदेली कथा साहित्य में वर्तमान समाज की समस्याओं, विसंगतियों का ऐसा मार्मिक सजीव चित्रण शायद ही इससे पूर्व प्रस्तुत किया गया हो। हो सकता है कि बुंदेलखंड के कतिपय बुंदेली रचनाकार इसकी  बुंदेली बोली/भाषा को मानक न माने, इसकी आलोचना करें, किंतु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि “कोस –  कोस पै बदलै पानी, ढाई कोस पै बानी”। अब गांव में शहर और शहर में गांव घुस गए हैं अतः शहरी क्षेत्रों के निकटवर्ती गांवों की भाषा/बोली ठेठ क्षेत्रीय नहीं रह गई। बोलियों के बदलते स्वाभाविक स्वरूप को स्वीकार करते हुए हमें इन्हें रक्षित करने और आमजन के समझने योग्य बनने में बाधक नहीं होना चाहिए। हिन्दी (खड़ी बोली) पूरे देश के लिए तैयार की गई संपर्क भाषा है अतः यह कश्मीर से कन्याकुमारी तक संपूर्ण देश में एक सामान होना चाहिए किंतु विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों, विभिन्न भाषा भाषियों द्वारा जब सुगढ़ित हिंदी बोली अथवा लिखी जाती है तो उसके  उच्चारण और लहजे में भी अनचाहे, स्वाभाविक दोष उत्पन्न हो जाता है जो लेखन में भी प्रकट होता है अतः हमें ठेठ क्षेत्रीय भाषाओं में ही साहित्य सृजन होने जैसी जिद छोड़ कर लोगों द्वारा क्षेत्रीय बोलियों के सहज स्वीकार्य स्वरूप को मान्यता देना चाहिए।

डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव जी का बुंदेली प्रेम और बुंदेली में सृजन का प्रयास प्रशंसनीय है। बहुत बहुत बधाई, मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर, मध्यप्रदेश – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “देख फ़रीदा जो थिआ (उपन्यास)” – श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री हरभगवान चावला जी द्वारा लिखित उपन्यास ““देख फ़रीदा जो थिआ (उपन्यास)” – श्री हरभगवान चावला पर चर्चा।

☆ “देख फ़रीदा जो थिआ (उपन्यास)” – श्री हरभगवान चावला ☆ समीक्षा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक चर्चा

पुस्तक – देख फ़रीदा जो थिआ [उपन्यास]

लेखक – हरभगवान चावला/9354545440

कीमत – 350/- पेपर-बैक (पृष्ठ199)

प्रकाशक – आधार प्रकाशन, पंचकूला।

संपर्क – 0172-2566952

विभाजन के दर्द का दस्तावेज – श्री जयपाल

देख फरीदा जो थिआ, शक्कर होई वेस्स।

साईं बाँझों आपणे, वेदन कहिए केस्स। ।

बाबा फ़रीद कहते हैं–शक्कर विष हो गई है यानी सुख के दिन‌ दुख में बदल गए, अपना दुखड़ा साईं को छोड़कर किसको कहें। देख फरीदा जो थिया- दोहड़े/दोहे में जो दर्द बाबा फरीद का है , वही दर्द इस उपन्यास में रचनाकार हरभगवान चावला का है।

‘देख फरीदा जो थिआ’-हरभगवान चावला का उपन्यास विभाजन की एक दुःख भरी मार्मिक दास्तान है।

1928 में पाकिस्तान में बनी एक नहर की चर्चा के साथ इस उपन्यास का फ़लक 1939/40 से शुरू होकर 1947 तक और आजादी के बाद से 2022 तक जाता है। यह पाकिस्तान के कौड़ा राम, उत्तम चंद, नौबतराय, नूर मोहम्मद ख़ान, भोजराज, बशकण ख़ान, चार-पाँच मुख्य-परिवारों और तीन-चार गाँवों ( कोटला अली-दस्ती, डाबराँ, खंगराँवाला ) की बसने, उजड़ने और विस्थापित होने की दर्द भरी कहानी है। 1946 तक रावलपिंडी से मुल्तान तक सारा इलाक़ा पूरी तरह हिन्दू-मुस्लिम के भेद से अनजान एक परिवार की तरह रहता है। हिन्दू, मुस्लिम सब एक दूसरे की शादियों, जनेऊ संस्कार, आदि में शामिल होते हैं l नाड़ से टोकरियाँ, रोटी रखने का डिब्बा, पंखे, पंखियाँ, आसन आदि सब हिन्दू-मुस्लिम औरतें मिल-जुलकर बनाती हैं। ग्राम-पंचायत के इकठ्ठ, पुलिस के मसले, दरगाह, मेले, ताश के पत्तों की बाज़ी, धार्मिक-यात्राओं, आदि में सब शिरकत करते हैं। एक दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं।

नौबत राय की बैठक में हर रोज ताश खेली जाती है। ताश खेलने के लिए हिन्दू भी आते, बलोच भी, मोची भी। तीन हुक्के लगातार चलते रहते। एक हिन्दुओं के लिए, दो मुसलमानों के लिए।

लियाक़त और नियामत व जुम्मा-दाया की जोड़ी इस इलाके की दो मशहूर गवैयों की जोड़ियाँ थीं जिनकी गायकी के हिन्दू-मुस्लिम दोनों दीवाने थे। लियाकत और नियामत रसखान के भजन गाते। जब वे दोहड़े, ग़ज़लें, बैंतें, बाबा फरीद के दोहड़े आदि गाते तो लोग झूम उठते। हीर-राँझा, सस्सी-पुन्नु, सोहणी-महिवाल मिर्ज़ा-साहिबाँ शीरीं-फ़रहाद , ..आदि के क़िस्से सुनते समय लोग खुद भी प्रेम-प्यार की पींगें लेने लगते। एक दूसरे के साथ क़िस्सागोई में समय व्यतीत करते।

इस ख़ुशनुमा हँसते-गाते माहौल को एक दिन किसी की नज़र लग जाएगी..यह तो कोई सोच भी कैसे सकता था ..??

नूर मोहम्मद की माँ फ़ातिमा और भोजराज की माँ ज्ञान देवी दोनों पक्की सहेलियाँ हैं। बचपन में ‘सखी सरवर की दरगाह’ पर जाने के बाद वे दोबारा से दोनों परिवारों के साथ वहाँ जाती हैं और मुल्तान शहर को भी देखती हैं। इस उपन्यास में भोजराज और नूर मोहम्मद की साली नूराँ की अद्भुत प्रेम कहानी भी है। भोजराज हिन्दू और नूराँ मुस्लिम, दोनों प्रेम विवाह करते हैं लेकिन अपना धर्म नहीं बदलते। इस उपन्यास में यह प्रेमकथा मानवीय प्रेम की मिसाल साबित होती है और यही इस उपन्यास का मुख्य-संदेश भी है।

आख़िर वही हुआ जिसका डर था।

दोनों तरफ़ कुछ कट्टरपंथी सामाजिक और राजनीतिक संगठन भी थे, जो दो राष्ट्रों के सिद्धांत का प्रचार कर रहे थे और बँटवारे के पक्ष में थे। ये दोनों ख़ुद को राष्ट्रवादी और देश-भक्त मानते थे। दोनों तरफ महात्मा गाँधी की जय बोलने वाले भी थे और हिन्दोस्तान और पाकिस्तान के नारे लगाने वाले भी। इन कट्टरपंथी हिन्दू- मुस्लिम संगठनों ने आग में घी डालने का काम किया। कुछ अपराधी और समाज-विरोधी तत्व भी इसमें शामिल हो गए थे। उन्होने घरों का क़ीमती सामान, सोना ज़ेवरात, रुपये-पैसे और पशु सब लूटने शुरू कर दिए। लेकिन इस सबके बीच अल्लारखा शाह, ख़ुदायार ख़ान, दोस्तमंद ख़ान पठान, आगू बलोच, मंजूर शाह, फ़ातिमा, संभावित कत्लेआम के बारे में पूर्व सूचना देने वाले मुस्लिम मर्द और मुस्लिम औरतें आदि सबने अपनी जान पर खेलकर बेक़ुसूर हिन्दुओं को बचाने का प्रयत्न भी किया। इन्सानियत को बचाने का यह जज़्बा अभी भी बचा हुआ था, हिन्दू और मुस्लिम दोनों में..और इसी जज़्बे को दिखाने और स्थापित करने का प्रयास इस उपन्यास में भी हुआ है।

बँटवारे का ऐलान हो गया था। असामाजिक/अपराधी तत्व और कट्टरवादी गिरोह सक्रिय हो गये थे।

नूर मोहम्मद खान की माँ फ़ातिमा को जब अपनी बचपन की सहेली ज्ञान देवी के संदेश से यह पता चला कि उसका अपना बेटा नूर मोहम्मद दंगों की साज़िश रच रहा है और वह भोजराज से अपनी पुरानी रंजिश के कारण ज्ञान देवी के परिवार पर हमला कर सकता है तो वह अपने बेटे नूर मोहम्मद को कहती है–” बदले का जिन्न सवार है न तुझ पर, तू आज बदला ले ही ले, मैं ज्ञान देवी के घर चलती हूँ। तू आजा पीछे-पीछे, पहले मेरी लाश बिछा देना, फिर आराम से अपना बदला लेना। ” अपनी माँ के इस रौद्र रूप का नूर मोहम्मद सामना नहीं कर पाता है और माँ को वचन देता है कि अब वह भोजराज पर हमला नहीं करेगा, बल्कि उसकी सुरक्षा करेगा। वह अंत तक भोजराज और उसके परिवार की सुरक्षा करता है। यहाँ तक कि भोजराज के आग्रह पर उसकी पत्नी नूराँ को भी अपने घर रखकर उसको यथासंभव सुरक्षा देता है, क्योंकि भोजराज को डर था कि नूराँ अगर उस के साथ हिन्दोस्तान जाएगी तो रास्ते में उसके साथ दरिंदगी हो सकती है। जब भोजराज हिंदुस्तान जाने के लिए कैंप में होता है तो नूराँ मर्दाने भेस में घोड़े पर सवार होकर उसे कहरोड पक्का स्टेशन-कैंप में मिलने जाती है l दोनों मिलते हैं l दोनों के मिलन का यह दृश्य लैला-मजनूं, हीर-राँझा सोहणी-महिवाल, शीरीं-फ़रहाद, मिर्ज़ा-साहिबाँ और सस्सी-पुन्नु के मिलन को साकार कर देता है।

इसके बाद तो लोगों का उजड़ना शुरू हो गया और दुनिया के सबसे बड़े ख़ौफ़नाक और ख़ूनी विभाजन में बदल गया। ट्रेनें लाशों से भर गईं। परिवार के सदस्य बिछुड़ गए। सब कुछ लूट लिया गया। खेत, खलिहान, पशु सब वहीं छूट गया। न आबरू बची, न दौलत…देखते-देखते सब भूखे-नंगे हो गए..बीमार, गर्भवती औरतें, बच्चे, बूढ़े, अपंग कैसे वहाँ से आए..इसके लोमहर्षक दृश्य उपन्यास में पढ़ते हुए मन बार-बार भर आता है और इसका कोई जवाब नहीं मिलता कि जिनका क़त्लेआम हुआ और जो विस्थापित हुए, आख़िर उनका क़ुसूर क्या था? जिन्होंने इस कत्लेआम को अंजाम दिया, उनकी इन लोगों से क्या दुश्मनी थी? बस इंसानियत से बड़ा मज़हब हो गया था। एक अनुमान के मुताबिक़ इस मारकाट में लगभग 10-15 लाख लोग मारे गए और 1.5 से 2 करोड़ विस्थापित हुए।

आख़िर जो किसी तरह बच पाए , वे आधे-अधूरे, भूख-प्यासे, कटे-फटे, लुटे-पिटे, टूटे-फूटे और बचे-खुचे किसी तरह हिन्दोस्तान के पंजाब क्षेत्र मे बने कैंपों में पहुँचे और यहाँ पाँच-छः साल तक रहने के बाद इन्हें घर और खेत अलॉट हो सके। इसके बाद दिल्ली और पानीपत में छोटे-छोटे कामों की तलाश की गई। एक पीढ़ी तो इसी संघर्ष में मर-खप गई। 1966 में एक और विभाजन होता है। पंजाब से कटकर हरियाणा अलग राज्य बनता है। इस राज्य में विस्थापितों को आज तक परायेपन का दर्द झेलना पड़ रहा है। आज भी पाकिस्तानी, खत्री, रिफ्यूजी, सिंधी, झांगी, मुल्तानी, भाप्पे, पंजाबी आदि शब्दों से जब उन पर व्यंग्य किया जाता है तो उनके ज़ख़्म फिर से हरे हो जाते हैं। आज भी वे सामाजिक/राजनीतिक/धार्मिक/आर्थिक क्षेत्र में इस उत्पीड़न का शिकार हैं। हरियाणा की राजनीति में पंजाबी/गैर-पंजाबी का विवाद हर इलेक्शन में मुद्दा बन जाता है।

लेखक की मानवीय पक्षधरता के कारण यह उपन्यास विभाजन की त्रासदी का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया है l इस प्रकार की साहित्यिक रचनाओं के बारे में ही कहा जाता है कि इतिहास में तथ्य होते हैं तो साहित्य में सत्य। आम जीवन की सच्चाई तो साहित्य में ही मिलती है। इस उपन्यास में विभाजन के इस सत्य को दिखाने का ईमानदाराना-रचनात्मक प्रयास है। स्थानीय बोलियों के शब्दों, लोक-कथाओं, लोकगीतों, लोक-संगीत, कहावतों आदि से वहाँ के गाँवों की साँझी संस्कृति जीवंत हो उठी है। सरल/सहज भाषा, स्थानीयता के रंग में रंगे संवाद और कथानक की रोचकता, उपन्यास की पठनीय तो बनाती ही है, साथ में पाठक में विचारशीलता , संवेदनशीलता और मानवता के मूल्यों को भी मज़बूती प्रदान करती है।

अपने अतीत से सबक़ लेकर अगर हम अपने वर्तमान को बेहतर मानवीय स्वरूप देना चाहते हैं और एक बेहतरीन भविष्य की ओर बढ़ना चाहते हैं तो इस उपन्यास को हमें ज़रूर पढ़ना चाहिए। आशा की जानी चाहिए कि देख फरीदा जो थिआ विभाजन की अन्य महान कृतियों में शुमार होकर वैश्विक मानवीय मूल्यों की स्थापना में अपना साहित्यिक योगदान देगा।

लेखक को बहुत-बहुत बधाई!!

समीक्षा-… श्री जयपाल 

संपर्क- 112-ए /न्यू प्रताप नगर, अम्बाला शहर( हरियाणा)-134007 – फोन-94666108

jaipalambala62@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “बूंद बूंद शब्द” (काव्य संग्रह) – सुश्री मनजीत मानवी  ☆ श्री जयपाल ☆

श्री जयपाल

(सुप्रसिद्ध लेखक श्री जयपाल जी पंजाब शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। आपका एक कविता संग्रह ‘दरवाजों के बाहर‘  आधार प्रकाशन  से प्रकाशित। (इस संग्रह पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में शोधकार्य), कुछ कविताएं पंजाबी में  अनुदित (पुस्तक रूप में प्रकाशित)।पत्र-पत्रिकाओं में लगातार रचनाएं प्रकाशित। देस-हरियाणा पत्रिका (कुरुक्षेत्र) के सह संपादक  प्रदेशाध्यक्ष- जनवादी लेखक संघ हरियाणा।

आज प्रस्तुत है श्री जयपाल जी द्वारा  सुश्री मनजीत मानवी  जी के काव्य संग्रह “बूंद बूंद शब्द” पर सार्थक विमर्श ।

☆ “बूंद बूंद शब्द” (काव्य संग्रह) – सुश्री मनजीत मानवी  ☆ पुस्तक चर्चा – श्री जयपाल ☆

पुस्तक —  बूंद बूंद शब्द [ काव्य संग्रह ]

लेखिका — मनजीत मानवी [9896850047]

कीमत — 295/- [पेपर बैंक]

प्रकाशक — ‘आथर्स प्रेस,  नई दिल्ली

कविता और व्यथा का अंतरंग रिश्ता – श्री जयपाल ☆

मैं लिखती हूँ कि

अब बदले दुनिया

अन्तिम व्यक्ति के हक में

 

मैं लिखती हूँ कि

सपनों की घुटन

नहीं और  समा सकती मन में

 

मैं लिखती हूँ कि

खुद का अपना दावा

मैं पेश करूँ हर सूरत में

उपरोक्त पंक्तियाँ है—‘बूद बूंद शब्द’–कविता-संग्रह की एक कविता से । कविता संग्रह है मंजीत मानवी का । इन पंक्तियों में जीवन के प्रति जैसी जिजीविषा दिखाई देती है, जीवन जीने की उत्कट लालसा जैसी इन पंक्तियों में मौजूद है,वैसी ही जीवन की धड़कन इस संग्रह की हर कविता में सुनी जा सकती है–‘

कभी कोई बूंद

मेरी पीर लिए

बरसे वहां

तुम हो जहां

 

कभी कोई पत्ता

तेरी प्रीत लिए

यूं सरसराए

कि तुम आए !

निश्छल प्रेम से लबालब इन कोमल भावनाओं को समर्पित है यह काव्य-संग्रह । इसका एहसास पाठक को हर पन्ने पर कविताओं को पढ़ते हुए होता है l दरअसल  कवयित्री के काव्य सरोकार और जीवन सरोकारों को अलग अलग नहीं किया जा सकता । उनके जीवन आदर्श और जीवन संघर्ष दोनों इन कविताओं के असली सर्जक हैं । जीवन से प्यार और जीवन से संघर्ष-यही है इन कविताओं का सारांश—

ऊपर से कठोर

उलझी

सुप्त

भीतर से उजली

स्पष्ट

तृप्त….

 

बहुत दिन हुए

कोई चेहरा नहीं देखा

दर्द की लौ से

साबुत और रोशन

कवयित्री महिला-जनान्दोलनों से जुड़ी रही है । एक स्त्री की मानसिक पीड़ा और उसके संघर्ष को बड़ी शिद्दत के साथ महसूस करती है l अंतिम व्यक्ति के साथ  अंतिम स्त्री के दर्द और संघर्ष को भी अपनी कविताओं में अभिव्यक्ति देती है–

मेहरबानी की

जूठन पर पलती

वह अंतिम स्त्री भी

चाहती है

पंख पसार के जीना..

 

पांव में छाले हैं

सर पर मैला

महिला के प्रति पुरुषवादी-पितृसत्तात्मक रवैये को वह महिला शोषण का एक हथियार करार देती है जो महिला को मात्र एक शरीर समझता है और उसकी गरिमा और सम्मान को कोई महत्त्व नहीं देता–

मेरा शरीर

तुम्हारे खेल का

मैदान नहीं

 

न ही तुम्हारी

सत्ता का

तुच्छ गलियारा

कवयित्री दलित स्त्री, मजदूर स्त्री, गुलाम स्त्री, बलात्कृत स्त्री, पितृसत्ता/ पुरूष सत्ता की शिकार स्त्री आदि स्त्रियों के सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ सीधे विद्रोह का आह्वान करती है कि इस व्यवस्था को अब बदलना ही  होगा, इसे अब और  सहन नहीं किया जा सकता ।

प्रबुद्ध और प्रतिबद्ध कवयित्री शुभा  मनजीत की काव्य कला पर अपनी  सारपूर्ण टिप्पणी में कहती हैं– ‘सरल प्रवाहमयी भाषा, मार्मिक बिम्ब और उपमाएं, प्रतिगामी सामाजिक ढांचों,शास्त्रों के प्रतिरोध में चिन्हित की गई विषय वस्तु और एक तरह की गीतात्मकता मनजीत की लेखन शैली की विशेषता है …..।’

कवयित्री न केवल सामाजिक संबंधों  और अंतरंग मानवीय रिश्तों के प्रति संवेदनशील है बल्कि वह शब्दों के प्रयोग के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील है। शब्दों की मितव्ययिता सभी कविताओं की विशेषता है। शब्दों और वाक्यों की तराश कविताओं को गंभीरता प्रदान करने में सफल रही हैं l

मनजीत स्वयं स्वीकार करती हैं–

कितना अंतरंग रिश्ता है

कविता और व्यथा का

 

छंदों की आत्मा में

अनायास ही

घुल मिल जाता है

इस दौर की आर्थिक/सामाजिक, राजनीतिक/साँस्कृतिक विकृतियों के विरोध में खड़ी और गहरे मानवीय सरोकारों की पक्षधर इन कविताओं को पढ़ा जाना बहुत जरूरी है।

© श्री जयपाल 

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हिंदी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ गहरे पानी पैठ – लेखिका : डॉ. मुक्ता ☆ समीक्षक – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’ ☆

डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’

☆ गहरे पानी पैठ – लेखिका : डॉ. मुक्ता ☆ समीक्षक – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’

पुस्तक- गहरे पानी पैठ

लेखिका – डॉ मुक्ता

प्रकाशक – SGSH Publications

मूल्य– 350

पृष्ठ संख्या– 264

☆ मानव मूल्यों एवं सामाजिक सरोकारों के बहुमूल्य प्रकरणों का दस्तावेज: गहरे पानी पैठ – डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’ ☆

निबंध लेखन अथवा शैली गद्य साहित्य की एक गूढ़ विधा है जिसे गहरे पानी में बैठने के समान योग साधक की भांति रचनाकार को बैठना पड़ता है, वह भी खुली आँखों के। निबंध के अनेक प्रकार हैं जिनमें सामाजिक, साहित्यिक, शैक्षिक, ललित एवं चिंतनपरक आदि। विवेच्य निबन्ध संग्रह ‘गहरे पानी पैठ’ के साथ प्रस्तुत होती हैं डॉ मुक्ता। लेखिका एवं कवयित्री साहित्यिक जगत में विलक्षण प्रतिभा की धनी हैं। इनके सर्जनात्मक क्रम में इनकी विलक्षणता को देखा जा सकता है। इनका संपूर्ण साहित्य चुनौतीपूर्ण, दुर्लभ और लीक से हटकर है जिसमें गूढ़ से गूढ़तम रूप में विविध रचनाधर्मिता पाई जाती है। इसलिए हम इन्हें अन्य विद्वानों से विलग श्रेणी में खडा पाते हैं। डॉ मुक्ता जी प्रथमतः काव्य की मर्मज्ञ पाठक हैं, किंतु प्रस्तुत निबंध संग्रह के अतिरिक्त उनके अब तक 300 से अधिक निबंध सामने आ चुके, जो इन्हें निबंध लेखन के क्षेत्र में अग्र-पंक्ति में खड़ा करते हैं। जो अपने आप में साहित्यिक जगत में कीर्तिमान संस्थापित करती हैं। वर्तमान में इनसे अधिक निबंधों का सृजन-प्रकाशन एवं प्रस्तुतिकरण शायद ही अन्य किसी का हो। वह साहित्य की गद्य-पद्य दोनों विधाओं की एक समान मर्मज्ञ एवं अधिकारी विद्वान हैं। मैं जब कभी उनकी रचनाओं को पढ़ने बैठता हूँ तो समझ नहीं पाता कि उनका गद्य पढ़ा जाए या पद्य है। उनके सृजन में गहनता तो है ही, रचनाओं के विषय बड़े सामयिक और सामाजिक मूल्यों से संपृक्त होते हैं, जो एक सजग रचनाकार का पहला दायित्व है। डॉ. मुक्ता ने अपने इस निबंध संग्रह में राष्ट्रव्यापी घटनाओं, मानवीय संवेदनाओं, भावनाओं, पीड़ाओं, नारी-अस्मिता के अतिरिक्त शिक्षाप्रद, प्रेरणादायक एवं साहित्यिक तथा विमर्शगत अथवा चिंतनपरक और सुचिन्तनपरक 75 निबंधों को संगृहीत किया है। 21 वीं सदी अथवा वर्तमान में हिंदी साहित्य को लेकर साहित्यकार डॉ. मुक्ता चिंतातुर है। आज समाज ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, राष्ट्रीयता, सहृदयता तथा कल्याण कारक भावों से दूर होते जा रहा है। मनुष्य परहित के मार्ग से हटकर, स्वहित की ओर उन्मुख हो गया है। वस्तुतः उनका निबन्ध सृजन सद्गुणी एवं सद्मार्गदर्शन से भरपूर सत्य, अहिंसा, प्रेम, दया, करुणा, उदारता, सहनशीलता, संयम एवं त्याग से परिपूर्ण चिंतनशील हैं; यथा- दिशाहीन समाज और घटते जीवन-मूल्यों ने मनुष्य को मानवताहीन बना दिया है, किराये का मकान बनाम घर के अंतर को नजरअंदाज कर युवा पीढ़ी संस्कारहीन हो, नैतिक मूल्यों का ह्रास कर रहें हैं, क्यों? मातृ हंता युवा, ज़िंदगी की शर्त- संधि-पत्र, स्मित-रेखा औ’ संधि, बाल यौन उत्पीड़न समस्या व समाधान, मज़दूरी इनकी मजबूरी आदि जो भी निबंध हैं प्रश्न चिह्न खड़ा करते हैं, चूंकि आज इंसान चलता-फिरता पुतला बन, आरक्षण के सहारे अपने-अपने खेमों में बंटा हुआ गुमशुदगी के रिश्तों के समान सुनता और सहन करता है, अपेक्षा-उपेक्षा से त्रस्त है, साथ ही लेखिका सोचती है कि विभिन्न मंचों पर सुविधा-प्राप्त सम्मान-कितने सार्थक हैं और नारी अस्मिता-प्रश्नों के दायरे में क्यों? यह कैसा राम राज्य है जिसमें कानून, शिक्षा, संस्कार व समाज में ऑनर किलिंग, सेल्फ मैरिज, बढ़ते तलाक, अविश्वास, आधुनिकता व नारी के बदलते तेवर संवेदनहीन हो गए, क्या प्रॉब्लम है? कब थमेगा यह सिलसिला क्या ये काफ़िले चलते रहेंगे, सोचते हैं लोग क्या कहेंगे, पुरुष वर्चस्व, तारीफ़ सुनना, मानसिक प्रदूषण बढ़ गया है, जिंदगी लम्हों की किताब के समान अथवा मौन भी खलता है और लफ़्ज़ों के ज़ायके भी बदल गए हैं, दोस्ती क्या है, सहनशक्ति बनाम दण्ड के मायने बदल गए है, अंतर्मन की शांति भंग हो गई है, खामोशियों की जुबाँ में ज़िन्दगी समझौता बन गई है अब तो लगता है मौन सबसे कारगर दवा है या फिर खामोशी एवं आबरू बचाने का सिलसिला है जहाँ जीवन संभव नहीं, असंभव हो गया, रिश्ते बनाम ग़लतफ़हमी, ज़बर्दस्ती नहीं ज़बर्दस्त, अहं बनाम अहमियत, बदलाव बनाम स्वीकार्यता, चिन्ता बनाम पूजा, समय व जिंदगी, उपलब्धि व आलोचना, जुनून बनाम नफ़रत सब अधूरी ख्वाहिशें हैं, ठीक ही कहा है ‘आईना झूठ नहीं बोलता’ इस बदलते परिप्रेक्ष्य में चाहे साहित्यकार और उसकी शब्द साधना, महाभारत नहीं रामायण, उपहार व सम्मान, मनन व आनंद, कभी दोस्ती और क़ामयाबी को खोजती रहे किंतु ज़िंदगी मैं शब्द, तुम अर्थ, शिकायतें कम, शुक्रिया ज्यादा में कहीं खो गई है, इसी बीच कोरोना काल और जीवन के शाश्वत् सत्य- प्रेम, प्रार्थना और क्षमा, हिम्मत, प्यार व परवाह, उम्मीद, कोशिश अथवा रिश्ते बनाम संवेदनाएं, संतान का सुख: संतान से सुख, चाहे कोरोनाकाल में सम्बंधों की बात हो, सब प्रयास विफल ही रहे अर्थात नाकामयाबी ही हाथ लगी।

जहाँ इनके निबंधों का जटिल-साहित्यिक, बोधगम्य रूप सामने आया है, वहीं दूसरी ओर सरल और अपेक्षाकृत महनीय रूप भी। संपूर्णत: इनकी शब्द-शक्ति लोकमंगल से जुड़ी हुई है तथा निबंधकार डॉ. मुक्ता निबंध के भविष्य पर अपने कालखंड को विभिन्न प्रकारों के दृष्टि-पथ में रखकर विचार करती हुई प्रतीत होती हैं। निबंध पाठक की आत्मा और मस्तिष्क दोनों को प्रभावित करने में निहित हैं जो एक प्रकार से प्रेरक, शिक्षाप्रद, अवलोकन और चिंतन की चेतना का स्वत: प्रस्फुटन हैं। लेखिका ने वर्तमान युग में जीवन और साहित्य में भव्यता, जीवन का ह्रास और क्षुद्रताओं, संकीर्णताओं, विषमताओं तथा विकास से चिंतत होकर जीवन और साहित्य को समीक्षित करने तथा सर्वोत्तम ज्ञान-राशि के प्रचार-प्रसार को कारक रूप में प्रस्तुत करती हैं। भौतिकवादी युग में मानव-मन को संतुलित रखने और विश्रांति प्रदान करने का स्तुत्य प्रयास किया है। मानवीय परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से सामंजस्य स्थापन हुआ है। सामाजिक सरोकारों के अंतर्गत ही व्यक्ति जनरीतियों, रूढ़ियों, नियमों, सिद्धांतों आदि कुशलताओं और आवश्यक आदतों को सीखता है, इस दृष्टि से ये महत्वपूर्ण निबंध समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए उपयोगी सिद्ध होंगे। कुल मिलाकर निबंध विविध विषयक प्रकरणों भौतिक और वैचारिक परिवेश का समन्वय के साथ विवेचन प्रस्तुत करते हैं। अभिव्यक्ति में अनेक ऐसे बिंदु- समाज-राजनीति में परिव्याप्त विसंगतियों, विडंबनाओं, विद्रूपताओं तथा भ्रष्टाचार व कदाचार आदि नानारूपों में मुखरित अथवा उपस्थित हुए हैं, जो विमर्शगत अध्ययन का सटीक क्षेत्र बने हैं। संग्रह के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय बोध पहलू का सन्निवेश लेखिका को लोक-जीवन के अधिक-से-अधिक नजदीक लाता है। वह अपने युगीन परिवेश को संपूर्ण गुण-दोषों के साथ अपने निबंधों में चित्रित करने का प्रयास करती है।

प्रकृत संग्रह में लोकतत्त्वों की व्याप्ति और विचारों की व्यापकता इतनी है कि पाठक उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता, क्योंकि निबंधकार का भाव एवं विचार पक्ष इतना अधिक गहन है कि समस्त सृष्टि के लोकतत्त्वों को समाए हुए हैं।

यह निबंध-संग्रह शिल्प और लोक-रंजन का अनुपम संग्रह है, जो अवसाद से दूर समाज व सृजन के वृहद लोक में ले जाता है। लेखिका का अभीष्ट भी शायद यही है कि उनका रचा अधिसंख्य पाठकों तक पहुँचे और उनकी ज्ञानग्रंथी को कचोटे। निःसंदेह प्रस्तुत निबंध-संग्रह अथवा आलेख संग्रह जीवन, साहित्य, संस्कृति और लोक के विराट सत्य के अन्वेषण का उपक्रम है जो समुद्र मंथन के समान संग्रहणीय है, साथ ही पठनीय, श्लाघनीय तथा सराहनीय बन पड़ा है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि निबंध-संग्रह ‘गहरे पानी पैठ’ समाज के भिन्न-भिन्न अंगों में संतुलन बनाए रखने का सद्प्रयास करते हैं। लेखिका का आग्रह भी शाश्वत है कि साहित्य, नित्य परिवर्तनशील समाज का वास्तविक रूप प्रतिनिधित्व करे तथा समाज के पुनर्गठन के लिए सृजन में नए-नए विचारों को प्रस्फुटित करें। यदि साहित्य को एक रचनात्मक शक्ति के रूप में अपना दायित्व निर्वहन करना है तो साहित्यकार को नवीन विचारों की देन में समाज का नेतृत्व करना होगा, यही राजधर्म, राष्ट्रधर्म, साहित्यधर्म एवं मानव धर्म है। उक्त संदर्भ में डॉ मुक्ता का रचना संसार समग्रतः समसामयिक समाज के अनुरूप सटीक एवं सार्थक रूप में सृजित है। पुस्तक छात्र-छात्राओं, विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के लिए बहुत उपयोगी है। चूंकि जो साहित्य सम्पूर्ण समाज का हित, कल्याण और सुसंस्कारों से सुसज्जित होता है वह सदैव उपयोगी होता है। जहाँ चिंतन और मंथन है वहाँ भाषा गम्भीर और तत्सम प्रधान है, अतः निबंधों की भाषा विषयानुसार है। सहज, सरल प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग निबंधों को बोधगम्य बनाता है।

© डॉ. अशोक कुमार ‘मंगलेश’

साहित्यालोचक एवं अनुवादविद

चरखी दादरी, हरियाणा, मो. 81999-29206

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बाल साहित्य: कल, आज और कल – लेखिका: डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है लेखिका : डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ जी द्वारा लिखित बाल साहित्य: “कल, आज और कलकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २१५ ☆

☆ बाल साहित्य: कल, आज और कल – लेखिका: डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’’

 

पुस्तक समीक्षा: बाल साहित्य: कल, आज और कल

लेखक: डॉ. रामेश्वरी नादान‘ 

प्रकाशक: रावत डिजिटल (बुक पब्लिशिंग हाउस), गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश 

ISBN: 978-81-990525-1-2 

प्रथम संस्करण: 2025 

मूल्य: 150.00 

पृष्ठ संख्या: 66 

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

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डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ की पुस्तक बाल साहित्य: कल, आज और कल बाल साहित्य के क्षेत्र में एक संक्षिप्त किंतु गहन शोध कार्य है। 66 पृष्ठों की यह पुस्तक बाल साहित्य के इतिहास, वर्तमान और भविष्य को समेटती है और इसका आकर्षक, सुंदर व नयनाभिराम कवर पाठकों को तुरंत अपनी ओर खींचता है। यह पुस्तक शिक्षकों, लेखकों, शोधकर्ताओं और बाल साहित्य प्रेमियों के लिए एक उपयोगी संसाधन है।

कथानक और संरचना- पुस्तक का अनुक्रम व्यवस्थित और व्यापक है, जो बाल साहित्य की उत्पत्ति, संरचना, विधाओं और डिजिटल युग में इसके विकास को रेखांकित करता है। लेखिका ने प्रमुख लेखकों और उनके योगदान को शामिल किया है, साथ ही अपनी साहित्यिक यात्रा को भी साझा किया है, जो इसे व्यक्तिगत और प्रेरणादायक बनाता है। पुस्तक में कॉमिक्स, विज्ञान कथाओं और डिजिटल माध्यमों जैसे आधुनिक आयामों पर भी ध्यान दिया गया है।

इस पुस्तक में प्रमुख बाल साहित्यकारों का उल्लेख किया गया हैं। आबिद सुरती: भारतीय कॉमिक्स के क्षेत्र में अग्रणी, जिन्होंने ‘बाहादुर’ जैसे किरदारों से बच्चों को रोमांचक कहानियाँ दीं। अनंत पई: ‘अमर चित्र कथा’ के संस्थापक, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और इतिहास को बच्चों तक पहुँचाया। परशुराम शर्मा: बाल साहित्य में हास्य और मनोरंजन के लिए जाने जाते हैं, उनके कार्य बच्चों को आकर्षित करते हैं। शंकर सुल्तानपुरी: वरिष्ठ साहित्यकार, जिनकी रचनाएँ बच्चों में नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करती हैं। देवेंद्र मेवाड़ी: विज्ञान कथाओं के माध्यम से बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने वाले लेखक। प्रकाश मनु: कविता और कहानियों के जरिए बच्चों के लिए प्रेरणादायक साहित्य रचने वाले साहित्यकार। डॉ. घमंडीलाल अग्रवाल: बाल साहित्य में गहन और विचारोत्तेजक रचनाओं के लिए प्रसिद्ध। दीनदयाल शर्मा: बच्चों के लिए सरल और शिक्षाप्रद कहानियाँ लिखने वाले साहित्यकार। ओमप्रकाश क्षत्रिय: बाल साहित्य में योगदान देने वाले लेखक, जिनकी रचनाएँ प्रेरणादायक और रोचक हैं। शकुंतला कालरा: महिला साहित्यकार, जिन्होंने बच्चों के लिए संवेदनशील और भावनात्मक कहानियाँ लिखीं। बसंती पंवार: बच्चों के लिए प्रेरक और नैतिक कहानियों की रचनाकार, जिनके कार्य सराहनीय हैं। क्षमा शर्मा: बाल साहित्य में महिलाओं की भूमिका को सशक्त करने वाली लेखिका। नीलम राकेश: बच्चों के लिए कविताओं और कहानियों के माध्यम से सृजनात्मकता को बढ़ावा देती हैं। कमलेश चंद्राकर: समकालीन बाल साहित्य में सक्रिय, जिनकी रचनाएँ बच्चों को आकर्षित करती हैं। मुकेश नौटियाल: बच्चों के लिए रोचक और मनोरंजक कहानियाँ लिखने वाले चर्चित लेखक। मनोहर चमोली ‘मनु’: वर्तमान बाल साहित्य में अग्रणी, जिनके कार्य बच्चों में रचनात्मकता जगाते हैं। अर्चना त्यागी: समकालीन लेखिका, जिनकी रचनाएँ बच्चों के लिए प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं। 

विश्लेषण और मूल्यांकन- डॉ. रामेश्वरी ‘नादान’ ने इस पुस्तक में बाल साहित्य के ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों पहलुओं को संतुलित ढंग से प्रस्तुत किया है। लेखन शैली सरल, स्पष्ट और शोधपरक है, जो इसे सामान्य पाठकों और विशेषज्ञों दोनों के लिए उपयोगी बनाती है। पुस्तक का सबसे मजबूत पक्ष इसका व्यापक दृष्टिकोण है, जो आबिद सुरती और अनंत पई जैसे कॉमिक्स लेखकों से लेकर प्रकाश मनु और शकुंतला कालरा जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों तक को समेटता है।

विज्ञान कथाओं में देवेंद्र मेवाड़ी और डिजिटल युग में बाल साहित्य के महत्व पर लेखिका का विश्लेषण समकालीन संदर्भों को रेखांकित करता है। हालाँकि, 66 पृष्ठों की संक्षिप्तता के कारण कुछ विषयों, जैसे कमलेश चंद्राकर और अर्चना त्यागी जैसे लेखकों के कार्यों का विस्तृत विश्लेषण, और गहराई माँगता है। कुछ और उदाहरण या केस स्टडीज से पुस्तक और प्रभावी हो सकती थी। फिर भी, यह अपने उद्देश्य में सफल है।

पुस्तक का कथानक और संदेश- पुस्तक का केंद्रीय संदेश है कि बाल साहित्य बच्चों की कल्पनाशीलता, नैतिकता और रचनात्मकता को आकार देने में महत्वपूर्ण है। शंकर सुल्तानपुरी और बसंती पंवार जैसे लेखकों के नैतिक मूल्यों पर आधारित कार्यों से लेकर मनोहर चमोली ‘मनु’ और मुकेश नौटियाल जैसे समकालीन लेखकों की रचनाओं तक, यह पुस्तक बच्चों के लिए साहित्य की प्रासंगिकता को दर्शाती है। डिजिटल युग में बच्चों के लिए साहित्य को सुलभ और रोचक बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है।

निष्कर्ष और सिफारिश– बाल साहित्य: कल, आज और कल एक विचारोत्तेजक और जानकारीपूर्ण पुस्तक है, जो बाल साहित्य के प्रति उत्साही पाठकों, शिक्षकों, लेखकों और शोधकर्ताओं के लिए उपयुक्त है। यह आबिद सुरती, अनंत पई, शकुंतला कालरा, और अर्चना त्यागी जैसे लेखकों के योगदान को उजागर करती है। मैं इसे 4.5/5 की रेटिंग देता हूँ। इसकी संक्षिप्तता और व्यापक कवरेज इसे मूल्यवान बनाती है। यह पुस्तक विशेष रूप से उन लोगों के लिए अनुशंसित है जो बाल साहित्य के विकास और इसके भविष्य में रुचि रखते हैं।

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

03/07/2025

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # 188 ☆ पुरातात्विक विरासत का संरक्षण:  चुनौतियाँ और समाधान ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है “पुरातात्विक विरासत का संरक्षण:  चुनौतियाँ और समाधानपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# 188 ☆

☆ पुरातात्विक विरासत का संरक्षण:  चुनौतियाँ और समाधान – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

भारत की पुरातात्विक विरासत विश्व के सबसे समृद्ध सांस्कृतिक खजानों में से एक है। मोहनजोदड़ो से लेकर खजुराहो, नालंदा से लेकर हम्पी तक, ये स्थल न केवल हमारे गौरवशाली अतीत के प्रतीक हैं, बल्कि इतिहास, वर्तमान और भविष्य के लिए शिक्षा, पर्यटन और राष्ट्रीय पहचान का आधार भी हैं। इन स्थलों की वर्तमान दशा चिंताजनक है। अतिक्रमण, पर्यावरणीय क्षति, उपेक्षा और अज्ञानता के कारण यह विरासत धीरे-धीरे नष्ट हो रही है। हमारी कितनी ही पुरातात्विक सम्पदा तस्करों द्वारा चोरी की गई तथा दुनियां भर के कई संग्रहालयों तक मंहगी कीमतों में पंहुचाई गई है। सोने के सिक्कों की लालच में कितने ही किलों की दीवारें क्षतिग्रस्त कर दी गई हैं।

भारत में 3, 600 से अधिक पुरातात्विक स्थल हैं, जिनमें से कई यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं। परंतु इनमें से अधिकांश स्थल गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

अतिक्रमण और अवैध निर्माण: दिल्ली के पुराने किले के आसपास की अवैध बस्तियाँ या आगरा में ताजमहल के निकट प्रदूषण इसके उदाहरण हैं।  

प्राकृतिक क्षति: मानसून, भूकंप और वनस्पतियों के बढ़ने से स्थलों की संरचना कमजोर होती है। उदाहरणार्थ, कोणार्क के सूर्य मंदिर का क्षरण।  

पर्यटन का दबाव: ताजमहल जैसे स्थलों पर प्रतिदिन हजारों पर्यटकों के आने से संरचनात्मक दबाव बढ़ता है।  

चोरी और तस्करी: प्राचीन मूर्तियों और कलाकृतियों की अवैध तस्करी एक बड़ी समस्या है। 2021 में, तमिलनाडु से चुराई गई 250 से अधिक मूर्तियाँ विदेशों में बरामद की गईं।

जागरूकता की कमी: स्थानीय समुदायों को इन स्थलों के ऐतिहासिक मूल्य का एहसास नहीं है, जिससे उपेक्षा बढ़ती है। पर्यटक स्वयं का नाम इन महत्वपूर्ण स्थलो की दीवारों पर लिख कर उन्हें क्षति पहुंचाते हैं। इस सब के बावजूद, सुरक्षा और संरक्षण के प्रयास भी सराहनीय हैं।

संरक्षण में युवाओं की भूमिका .. युवा समाज का सबसे गतिशील और प्रौद्योगिकी-साक्षर वर्ग है। उनकी भागीदारी से पुरातत्व संरक्षण को नई दिशा मिल सकती है।

युवा सोशल मीडिया के माध्यम से विरासत के महत्व को प्रचारित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, हैशटैग #SaveOurHeritage जैसे अभियान चलाये जा सकते हैं। स्वयंसेवी समूह बनाकर ‘युवा भारत फॉर हेरिटेज’ जैसे संगठन सक्रिय किये जा सकते हैं जो साइटों की सफाई और डॉक्यूमेंटेशन में मदद करते हैं।  

तकनीकी नवाचार: युवा ड्रोन, 3D मॉडलिंग और AR/VR तकनीक से साइटों का डिजिटल संरक्षण कर सकते हैं। कोविड के दौरान ‘वर्चुअल संग्रहालय’ की लोकप्रियता इसका उदाहरण है।  

शैक्षिक पहल: कॉलेजों में पुरातत्व क्लब बनाकर युवाओं को जोड़ा जा सकता है। एनएसएस और एनसीसी जैसी संस्थाओ के कार्यक्रमों में पुरातात्विक संरक्षण को शामिल किया जाना चाहिए।

सामुदायिक नेतृत्व: युवा स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करके उन्हें संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बना सकते हैं।  उदाहरण के तौर पर, गुजरात के धोलावीरा में युवाओं ने ऐप विकसित करके पर्यटकों को साइट की जानकारी दी, जिससे जागरूकता बढ़ी।

संरक्षण के उपाय.. पुरातात्विक विरासत को बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय कारगर हो सकते हैं: 

– वैज्ञानिक प्रबंधन: पत्थरों और भित्तिचित्रों को संरक्षित करने के लिए रासायनिक उपचार और जल निकासी व्यवस्था आवश्यक है।  

कानूनी सख्ती: ‘प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम, 1958’ को और सशक्त बनाने की आवश्यकता है। अवैध खुदाई और तस्करी पर कठोर दंड होने चाहिए।  

सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय लोगों को पर्यटन से गाइड के रूप में जोड़कर या पर्यटको के लिये उपयोगी किताबों की बिक्री, खान पान की स्थानीय वस्तुओ आदि के विक्रय से उन्हें आर्थिक लाभ पहुँचाना।

निजी-सार्वजनिक भागीदारी: ‘अडॉप्ट ए हेरिटेज’ योजना के तहत कॉर्पोरेट्स को साइटों के रखरखाव की जिम्मेदारी दी जा सकती है।  

जलवायु अनुकूलन: समुद्र तटीय स्थलों जैसे महाबलीपुरम को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाने के लिए विशेष योजनाएँ बनाना।  

सरकार की जवाबदारी ..केंद्र और राज्य सरकारों को उनकी भूमिकाएँ निभानी होंगी: 

पर्याप्त बजट आवंटन: पुरातत्व विभाग को संसाधन मुहैया कराना। वर्तमान में, भारत का पुरातत्व बजट अमेरिका या यूरोप के मुकाबले नगण्य है।  

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: यूनेस्को और इकॉमोस जैसे संगठनों के साथ मिलकर प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता लेना।  

कानूनों का क्रियान्वयन:ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) को अधिक अधिकार देकर अतिक्रमण हटाने में सक्षम बनाना।  

शिक्षा और शोध: पुरातत्व विभागों को आधुनिक उपकरणों से लैस करना और विश्वविद्यालयों में शोध को प्रोत्साहित करना।  

सतत पर्यटन:ई-टिकटिंग, समय-सीमित प्रवेश और पर्यावरण-अनुकूल सुविधाएँ विकसित करना।  

सरकार की ‘राष्ट्रीय विरासत मिशन’ जैसी योजनाएँ सराहनीय हैं, लेकिन इन्हें गति देने की आवश्यकता है।

स्थानीय प्रशासन का कर्तव्य .. स्थानीय निकायों की भूमिका अहम होती है: 

नियमित निगरानी: साइटों के आसपास अवैध निर्माण रोकने के लिए सचेत रहना।  

कचरा प्रबंधन: ताजमहल जैसे स्थलों के निकट प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र घोषित करना।  

आपदा प्रबंधन: बाढ़ या भूकंप जैसी आपात स्थितियों के लिए योजनाएँ तैयार रखना।  

सामुदायिक जुड़ाव: स्थानीय लोगों को साइटों के इतिहास से अवगत कराने के लिए कार्यशालाएँ आयोजित करना।  

सुरक्षा उपाय: CCTV और सेंसर लगाकर चोरी रोकना।  

उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में सांची स्तूप के आसपास स्थानीय प्रशासन ने सौर ऊर्जा से चलने वाली रोशनी की व्यवस्था की है, जिससे रात्रि पर्यटन को बढ़ावा मिला है।

पुरातात्विक विरासत का संरक्षण केवल सरकार या विशेषज्ञों का नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग का दायित्व है। युवाओं की ऊर्जा, सरकार की नीतियाँ, स्थानीय प्रशासन की कार्यवाही और जनता की जागरूकता—इन सभी के समन्वय से ही हम अपने इतिहास को भविष्य के लिए सुरक्षित कर सकते हैं।  हमारी सभ्यता की परीक्षा इस बात में है कि हम अपने इतिहास को कितना सम्मान देते हैं।  

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बुन्देली दिवस विशेष – पर्यावरण महत्व एवं संरोधन ☆ आत्मकथ्य – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ☆

🟢 पुस्तक चर्चा 🟢 पर्यावरण महत्व एवं संरोधन 🟢 आत्मकथ्य – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव 🟢

(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

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(एक सितंबर को बुंदेली दिवस समारोह – जबलपुर। बुंदेली लोक साहित्य के विद्वान, भाषा विज्ञानी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 109वीं जयंती एवं 36वां बुंदेली दिवस समारोह सोमवार 1 सितंबर को संध्या 6.30 बजे से शहीद स्मारक भवन में गुंजन कला सदन एवं नगर की संस्थाओं द्वारा आयोजित है । इस अवसर पर स्मृति शेष डॉ. श्रीवास्तव की पुस्तक “पर्यावरण महत्व एवं संरोधन” के विमोचन के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं विषयों के विद्वानों का अभिनंदन किया जाएगा । बुंदेली गीतों एवं नृत्यों के साथ ही पूर्व में सम्पन्न चित्रकला एवं बुंदेली नृत्य श्री प्रतियोगिता के विजेता भी पुरस्कृत होंगे ।)

आत्मकथ्य –  विकास के साथ विनाश – स्व. डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

कहा जाता है, विकास के साथ विनाश भी चलता है। आज विज्ञान के युग में यह स्पष्टत: देखने को मिल रहा है। युगाधनों पूर्व जंगलों में जीवन बिताने वाले, नग्न फिरने वाले अथवा वल्कल और पत्राच्छादन का उपयोग करने वाले मृगयाचारी मनुष्य ने आज अपने लिये कितनी सुविधायें जुटा ली हैं-यह लिखने-बताने की बात नहीं रह गई। आज का मनुष्य उन्हीं सुविधाओं के बीच जी रहा है। यह एक अलग बात है कि कोई अधिक सुविधायें समेट सका है और कोई उनके लिए विकल है। यह वह स्थिति है जिसे विकास कहा जायेगा, किन्तु क्या यह सत्य नहीं है कि उसी विज्ञान ने हीरोशिमा का सत्यानाश कर दिया था और उसी ढंग से चलते चलने पर क्या संपूर्ण पृथ्वी पर का जीवन समाप्त नहीं हो सकता? हो सकता है क्योंकि मनुष्य वैचारिक-प्रदूषण के लपेटे में भी आ गया है।

पर्यावरणिक स्थितियाँ अत्यधिक चिन्ताजनक हो रही हैं। प्रकृति का संतुलन पूर्णत: डाँवाडोल हो रहा है। ओजोन की परत पतली पड़ रही है अथवा उसमें छिद्र हो गये हैं, कार्बनडायआक्साइड की मात्रा वायुमण्डल में आवश्यकता से अधिक हो रही है परिणामत: पृथ्वी पर ताप बढ़ रहा है। इसके कारण जिन भागों में सदा बर्फ जमा रहता था वे भी उससे प्रभावित होंगे, बर्फ पिघलेगा, समुद्र की सतह ऊँचे उठेगी और अनेक भूखंड जल मग्न हो जायेंगे। कारणों की खोज करने वाले विद्वानों का कहना है कि यह सब इसलिये होगा कि वनों की हरीतिमा आज वैसी नहीं रह गई, जैसी सौ-पचास वर्ष पूर्व तक थी।

प्रकृति के संगठक तत्वों में, जो स्वाभाविक अनुपात होता है, उसे विलोड़ा जा रहा है। इस विलोडऩ को बहुत कुछ सम्हालने की शक्ति वनों में हैं, किन्तु विशेषज्ञों की राय की चिन्ता न कर समाज ऐसे मार्ग पर चल रहा है कि पीछे हटने की दशा की चर्चा करना व्यर्थ है। आगे बढऩा असंभव हो जायगा, यह कहना भी अपर्याप्त है। कहना यह चाहिये कि जहाँ वह है, वहाँ भी नहीं रह सकेगा-उसका जीवन ही नहीं रह जायेगा।

कुछ वर्षों पूर्व की, उन वर्षों के आसपास की बात है जब मालगुजारी समाप्त हो रही थी, मुझे छोटी पहाडिय़ों पर लहकने वाले उन जंगलों को देखने का अवसर मिला जिन्हें मैंने अपने बाल्यकाल में देखा ही नहीं था, बल्कि जिनमें भ्रमण करने का नित्य ही मुझे सुयोग मिलता रहा। उस समय के वनों का मेरे मानस पटल पर अभी भी बिम्ब है। वे जंगल कोई सरकारी जंगल न थे, ऐसे जंगल थे जिनमें सामान्यत: सतकठा के पेड़ थे, बड़े पेड़ थे महुआ, चार, सेझा, बरसज के अच्छे मोटे और प्राय: 15-20 फुट ऊँचे और उन पेड़ों के बीच-बीच करौंदा, मकोय, कत्था, अमलतास, सिहारू आदि के मँझोले कद वाले पेड़ थे, झाडिय़ाँ थीं, पर क्या खूब अपनी गरिमा में। निकटस्थ गाँव जो एक प्रकार से हरी-भरी पहाडिय़ों के करखा में ही बसे थे और दो-तीन सौ घरों से अधिक आबादी वाले नहीं थे। निवासियों में 8-10 घर ब्राह्मणों के, 3-4 कुरमियों के, 2-3 घर कोरियों के, 5-6 घर गड़रियों के, 12-15 घर अहीरों के, 1-2 लुहारों के, 6-7 चर्मकारों के और शेष कोल, भुमियों और गौंड़ों के थे। बहुसंख्यक कोल, भुमिया और गौंड़ ही कहलाये। ब्राह्मण तो खेती-पाती और पुरोहिती करते, लुहार, चमार अपना धंधा करते, कोरी बाजार से सूत खरीदकर खादीनुमा कपड़े बुनते, गड़रिया और अहीर गाडऱ (भेड़) और गाय-भैंस पालते। यों दो-चार जानवर तो कोल-भुमिया और गौंड़ों के पास भी रहते थे पर उनका जीवन पूर्णत: सवर्णों के यहाँ खेती में मजदूरी पर काम करना था। उनकी स्त्रियाँ जंगलों से सूखी लकडिय़ाँ एकत्र कर उनकी लम्बी ‘मोरी’ बनाकर निकट के नगर में बेचने जाती थीं। कुछ लोग चार से चिरौंजी बनाते- बेचते, कुछ शहद एकत्र करते थे इत्यादि। पशु जंगल में चरने जाते थे। मालगुजार की ओर से कोई चरू नहीं लिया जाता था। ग्राम के चतुर्दिक हरियाली का सुंदर परिदृश्य था।

फिर कुछ वर्ष बाद मैंने उन्हीं पहाडिय़ों और जंगलों को देखा। भारतीय अब तक स्वतंत्रता का अर्थ अपने ढंग से लगा कर स्वयं को निर्बंध समझने लगे थे। अपने पहाड़, अपनी घाटियाँ, अपनी नटियाँ, अपनी पटियाँ और अपने महुआ, अपने कहुआ का भाव मर्यादाएँ लाँघने लगा और हर व्यक्ति स्वार्थ पूर्ति की ललक लेकर जंगलों के शोषण पर उतारू हो गया, अंधाधुंध कटाई की गई। उधर प्रकांडरों पर कुल्हाड़ी चली और इधर देखा ये गया कि वह कुल्हाड़ी मनुष्य के ही पैरों पर पड़ रही है तथा उनका वह स्वरुप जिसका चित्र ऊपर दिया गया है, बदलने लगा-गिरावट की ओर जाने लगा। वह स्थिति ही मुझे अच्छी नहीं लगी। पहाडिय़ों पर से हरीतिमा का कवच समाप्त हो रहा था, वे मुंडी हो चली थीं। तब मैंने जबलपुर से निकलने वाले ‘युगारम्भ’ मासिक में एक लेख लिखा था ‘जंगलों में हरियालियाँ लहकना चाहिये। ’ यह आज से कई दशक पहले की बात है किन्तु एक लेख की कौन परवाह करता है, पर स्थिति चित्रण देकर मैंने अपने दुखी मन को रिक्त किया, यह मुझे संतोष रहा। भारतीय पत्र-संसार में कदाचित वह पहला लेख था।

लोग और शासन दोनों यों नहीं मानते। अपने ढंग से चलने लगे हैं। शासन की भी तो ऐसी स्थिति हो गई है कि हम कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते पर फिर भी, हमारे भीतर से कोई बोलता है कि हम अपना धर्म पूरा नहीं कर रहे 29 अगस्त 1989 को कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता पं. कमलापति त्रिपाठी ने एक बयान दिया कि ‘राजनीति में अपराधियों की बढ़ती घुसपैठ हो चली है और पदाधिकारियों के पद बेचे जाते हैं। यह सुनने पर आश्चर्य होता है कि राजनीतिक दलों का पदाधिकारी बनने के लिये दलीय आस्था, दल की नीति एवं कार्यक्रमों के प्रति समर्पण का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। ’ यह शीर्ष पर पहुँचे उन व्यक्तियों से सम्बंधित बात है जो देश के विकास के लिए धर्म निष्ठता पीकर मानसिक विकृतियों में जा फंसे हैं। वनों का विनाश उनके देखते-देखते ही हो रहा है। परिणाम भी वे खुली आँखों से देख रहे हैं।

अभी दो वर्ष पूर्व फिर वही पहाडिय़ाँ देखीं और उन पर की हरियाली भी। कुछ नहीं रह गया। इसका चित्र मैंने इसी पुस्तक के अन्त में दी गई रचना ‘वनचारी पशु पक्षियों द्वारा प्रजातंत्र की माँग’ में किया है।

एक बात मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ऊपर जो कुछ लिखा है वह एक छोटे से क्षेत्र की बात है और उन जंगलों की है जो मालगुजारी थे पहले। पर, जंगल काटने के अपराध का प्रसार पूरे देश में फैला और जनसाधारण उन्हें उजाड़ते यह भूल गया कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे। देश में आज स्थिति विकराल है।

वनों को केन्द्रक मानकर यदि विचार किया जाय तो हमारे सामने अनेकानेक और भी समस्याएँ उनके विनाश से सम्बद्ध हो जाती हैं। वन्य प्राणियों की संख्या में गिरावट-यहाँ तक कि कुछेक वनचारियों की प्रजाति ही समाप्त होने की स्थिति में पाई जा रही है, देश में वर्षा का असंतुलित वितरण पाया जा रहा है, भूगर्भ जल में कमी हो रही है, कहीं बाढ़ आती है, कहीं सूखा पड़ रहा है, औषधि-उपचार के लिए उपलब्ध होने वाली आवश्यक जड़ों, कंदों और वनस्पतियों की विलुप्ति हो रही है।

भारत के विकास हेतु विभिन्न प्रकार की परियोजनाओं के अन्तर्गत बाँधों के निर्माण और उद्योगों संयंत्रों के स्थापन से विभिन्न प्रकार का गैसीय प्रदूषण बढ़ रहा है। नदियों का जल दूषित हो रहा है। यहाँ तक कि समुद्र भी प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं।

और, देश का दुर्भाग्य यह है कि इस समय वैचारिक-प्रदूषण सर्वोच्च स्थिति बनाये हुए है। आध्यात्मिकता के आधार पर जीवन-यापन करने वाले देश में आध्यात्मिकता के सारे सिद्धान्त, सारे सूत्र मिट रहे हैं। एकत्व की भावना का विनाश हो गया है। भ्रष्टाचार- स्वार्थ और तेरी-मेरी बातों में देश के चोटी के नेता भी उलझ रहे हैं। हम यह टिप्पणी नहीं करना चाहते थे परन्तु अपने सीने पर हाथ रखकर यदि कोई सच बोलना चाहेगा तो यही कहेगा। 29 अगस्त 1989 को कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता पं. कमलापति त्रिपाठी ने जो बयान दिया उसका सार तत्व यही है कि मनुष्य कितने वैचारिक प्रदूषण में पगा हुआ है। अन्य सारे प्रदूषण भी बुनियाद रुप में हमारी दृष्टि में मनोविकार है। पर्यावरण के प्रदूषण का इतना हो-हल्ला मचने के बाद भी आखिर क्यों अपेक्षित जन-जागृति नहीं है? और जहाँ है भी वहाँ यह भी देखा जा रहा है कि यदि शासन की ओर से उस दिशा में कुछ किया जाता है तो ऐसा विरोध होता है कि उसमें रचनात्मक दृष्टि, संवेदनशीलता और सहयोग की प्रवृत्ति का अभाव नजर जाता है।

शासकीय स्तर पर पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति पाने के लिए तथा अन्यान्य संलग्न समस्याओं का सामना करने के लिए वन संरक्षण, पशु-पक्षियों की गिरती संख्या के सुधार के लिए अभारण्यों के स्थापन का कार्य हाथ में लिया गया है। इंडियन वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट (1972) इसीलिये बनाया गया है। बहुउद्देशीय परियोजनाएँ भी कार्यशील हैं। इनकी संख्या भी प्रतिवर्ष बढ़ाई जा रही है और पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए तो सारे विश्व द्वारा उपाय खोजे जा रहे हैं, किन्तु एक समस्या सुलझाने में दूसरी समस्या सामने या जाती है, तीसरी आ जाती है और असफलताओं का एक चक्र तैयार हो जाता है।

हमारी दृष्टि से वनों को संरक्षण देने और उनके विकास-विस्तार के कार्यक्रम का क्रियान्वयन समयबद्ध होना चाहिए। जहाँ भी वन लगाये जाएँ स्वाभाविकता का ध्यान रखा जावे। आशय यह है कि केवल पेड़ों को लगा देने से ही जंगल नहीं बन जाता। वन केवल कुछ खास पेड़ों के समूह ही नहीं हुआ करते। वे तो अनेकानेक जड़ी-बूटियों, जनोपयोगी फलों, कन्द-मूल आदि सहित बहुविध झाडिय़ों-लता-गुल्मों के झुरमुटों का निर्माण करते हुए ऐसे होते हैं जिनमें सैकड़ों प्रकार के वन्य प्राणी और पक्षी पलते हैं तथा जो बादलों को आकृष्ट कर जल वृष्टि की दिशा में उपयोगी होते हैं जो भूक्षरण को रोकते हैं, जिनके झरे हुए पत्ते धरती पर बिछकर वर्षाजल को एकदम बह जाने से रोकते हैं और बरसे हुए जल को भूगर्भ में प्रविष्ट करने में सहायक होकर आगे की शुष्क ऋृतु में झरनों की निरन्तरता बनाते हैं तथा जो पर्यावरण को प्रदूषण से विमुक्त रखते हैं।

पुरातन युग में पेड़-पौधों अथवा वनों को बहुआयामी महत्व दिया गया था। मनुष्य उनसे एकमएक होकर स्वयं को संवर्धित करने में उनका सहयोग पाता था तथा उनके प्रति कृतज्ञ होकर किस प्रकार उनकी पूजा भावना से अभिभूत हुआ था इस संबंध में हमने आगे किंचित विस्तार से विचार किया है, उनके बीच रहकर अनेकानेक प्रकार के मानवेतर प्राणियों को उसने किस दृष्टि से देखा है और अपने लिये उनका कितना क्या कैसा मूल्य माना है। इस संबंध में भी हमने जनसाधारण के बीच प्रचलित पूजा-भावना का चित्रण किया है। इससे स्पष्टत: यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिये कि विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों और प्राणियों एवं प्रकृति के अन्य उपादानों के बीच ही मनुष्य की स्थिति है। जीवन का एकाधिकार केवल उसे ही नहीं मिला है। अवश्य ही उसमें बुद्धिचातुरी है। पर इसका यह आशय नहीं कि वह केवल स्व अर्थ ही देखे। आज मनुष्य की आकांक्षायें-लालसायें प्रकृति के साथ अतिवादी, आक्रामक रुख अपनाने के लिये बाध्य कर रही है। कैसी विडम्बना है कि उसकी स्वयं में केन्द्रित भौतिक-कल्याण अथवा सुख सुविधा की भावना उसके ही अकल्याण का मार्ग प्रशस्त करे उसे अधिक सतर्क होकर चलने की आवश्यकता है। अतीत में मानव समाज ने पेड़ पौधों और मनुष्येतर प्राणियों का जो मूल्यांकन किया है, यह उसका कोई पागलपन नहीं था। उनके संरक्षण उनके हित में मनुष्य का कल्याण भी अंगीभूत है। यह समझ उसमें थी पर यह समझ आज हममें नहीं है। समय की इतनी लम्बी यात्रा में इस दिशा में हमने बहुत कुछ खोया है और आज भी खो रहे हैं। अपनी सफलताओं की दिशा में आधुनिक विज्ञान की उपलब्धियों से भरी दम्भोक्तियों में गर्क शायद हम तब तक नहीं चेतेंगे जब तक पूर्णत: नष्ट नहीं हो जाते। जब हम नष्ट हो जायेंगे तब क्या कोई मनु पृथ्वी पर मानव जीवन का प्रसार करने के लिये प्रकट होगा? कैसे मालूम है ?

पर्यावरण प्रदूषण की समस्या इतनी मामूली नहीं है जितनी समझी जाती है। प्रत्येक व्यक्ति के कत्र्तव्य से सम्बद्ध है यह बात कि वह इससे विमुक्त होने के उपायों में हाथ बँटाये। पर्यावरण संबंधी विकृति के संबंध में विचार करते हुये येले विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जे. डोलाई तथा एल. डब्लू डोस कहते हैं कि इसके कारण मनुष्य में आक्रामकता एवं हिंसा की वृद्धि होती है। पर्यावरण के विघटन के कारण अंत:करण का भी विघटन होता है जो कि स्वयं को नष्ट तो करता ही है, बहिर्मुख होकर दूसरों को भी चपेट में ले लेता है। देश-विदेश में होनेवाली हिंसक घटनाओं में वृद्धि का मूल कारण पर्यावरण का विकृति जनित वैचारिक प्रदूषण है।

इक्कीसवी सदी की ओर हम बढ़ आये हैं। पर किन उपलब्धियों के साथ? इस पर लौट-लौटकर विचार करना आवश्यक है। सिंहावलोकन इसी को कहते हैं।

अतीत की कथाओं में अनुस्यूत तब के मानव की सूझ भी हमें ‘हम’ बनाये हुये हैं। पर अब हम किसी की सुनते ही नहीं। आज कल ‘मैं’ को ‘हम’ कहा जाना लगा है।

‘मैं’ और ‘हम’ के ठीक अर्थ को न समझने के कारण ही हम आधि-व्याधि ग्रसित हैं, ठीक अर्थ को समझता था पुरातन युग का मनुष्य, जो बहुत सरल था। सरलता व्यक्तियों में नहीं समाज में थी व्यक्ति स्वयं था भी नहीं कुछ। उसका मूल्य समाज में ही था। समाज से अलग भी वह कुछ है, इसका उसे बोध न था। था भी तो बहुत कम। आज भी यदि हम आदिवासियों के बीच जायें तो हम पायेंगे कि उनमें ‘मैं’ का विचार कम है, ‘हम’ का ख्याल अधिक है। उनकी कुछ भाषायें तो ऐसी हैं जिनमें ‘मैं’ नहीं है, ‘हम’ ही है, आदिवासी कबीलों में समस्यायें ढेर सारी हैं, पर प्राय: सब ‘हम’ वाली हैं। आदिवासी बोलता है, तो बोलता है ‘हम’। वहाँ ‘मैं’ का कान्सेप्ट ही पैदा नहीं हुआ

‘हम’ के कान्सेप्ट वाले क्षेत्र में एक व्यक्ति के तार दूसरे से जुड़े रहते हैं। तभी तो ‘हम’, ‘हम’ हैं, आज के पढ़े-लिखे मनुष्य से ‘हम’ दूर हटता जा रहा है, अत्यंत व्यक्तिवादी होता जा रहा है। तभी तो किसी कार्य को हाथ में लेने पर एक स्वर से ‘हैइया’ नहीं हो पाता और असफलता हाथ लगती है। कहा जाता है, देश को एकता की जरूरत है। पर कैसे हो? बुद्धि तत्व ‘हम’ को पीछे ढकेल रहा है। सब व्यक्ति-वादी होकर स्वार्थ साधन में दूसरों की ओर से आँखें बंद करके चल रहे हैं, किसी भी दिशा में हमारी सामूहिक एकता के दर्शन नहीं होते। जागृत मनुष्य से अच्छी तो निर्बुद्धि भेड़ें हैं जो एक दूसरे के पीछे लमडोर बनाये हुए चलती हैं। उनमें आगे-पीछे रहने-होने का झगड़ा भी नहीं होता। एक जिस ओर चली, दूसरी उसके पीछे चल देती है। भेड़ों को चलते हुये देखें तो लगता है ‘हम’ चल रहा है। एक ही जीवन सरक रहा है। आकाश में बादल आये, बिजली कौंधे-कडक़े, तो वे एक दूसरे पर सिमट जाती हैं, एक ढेर बन जाती हैं।

हम लोग ‘मैं’ को लेकर इस अणुवादी सभ्यता के प्रभाव में कैसे विभाजित, विखंडित हो रहे हैं। यह विखंडन वैचारिक ही है और इसे वैचारिक प्रदूषण समझना चाहिये, जिसकी समाप्ति में ही अनेक प्रकार के प्रदूषण की समाप्ति होगी। वहीं मनुष्य की गरिमा भी उचित शीर्ष पर पहुँचेगी।

जन-मन एक होकर ‘मैं’ से मुक्त होकर ‘हम’ की भावना में तिक्त, सामूहिक दायित्व बोध के साथ यदि प्राकृतिक तत्वों के समुचित संतुलन के लिये प्रयत्न शील हो तो निश्चय ही हम सभी प्रकार के प्रदूषणों के प्रभाव से विमुक्ति पा सकेंगे, अन्यथा हम समाप्त होंगे और अन्य प्राणी तथा वनस्पति जगत भी। कर्मों का विपाक तो होता ही है, परन्तु अनुकूल फल प्राप्ति की दिशा में होना चाहिये। गोपालदास ‘नीरज’ की काव्य पंक्तियाँ हैं-

आग लेकर हाथ में पगले जलाता है किसे,

जब यह बस्ती न रहेगी, तू कहाँ रह जायेगा।

वस्तुत: संसार में अकेला कोई पदार्थ नहीं। यहाँ सबकुछ सुगठित और सुसंबद्ध है। सर्वत्र अन्योन्याश्रय का सिद्धान्त कार्य कर रहा है। जड़-चेतन से विनिर्मित यह सम्पूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड एकता के सुदृढ़ बंधनों में बंधा हुआ है। बंधनों के स्वाभाविक क्रियारत् समानुपातक तालमेल को बिगाडऩा हमारे लिये आत्मघाती है। वास्तव में पारम्परिक बंधन ही सृष्टि की शोभा- सौंदर्य का, उसकी विभिन्न हलचलों का, उत्पादन-विकास एवं परिवर्तन का उद्गम केन्द्र है। इसे समझने के लिये सूक्ष्म पर्यवेक्षण की आवश्यकता है।

निर्वनीकरण, प्राणियों का शिकार, भूगर्भ सम्पदा का अत्यधिक दोहन चरम सीमा पर है। जन्तु एवं वनस्पति पृथ्वी-जल-वायु तथा अन्य जीवनोपयोगी पदार्थ प्रकृति के घटक हैं। आज प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण हमारे सामने कौन सी समस्यायें आ खड़ी हुई हैं, उनके निराकरण की दिशा में शासन द्वारा जो गति ग्रहण की जा रही है उसके संदर्भ में निकट भविष्य में प्रतिफलित होने वाले एवं दूरगामी परिणामों पर हमने इस पुस्तक में विचार किया है। आशा है कि अनुस्यूत विचार जनसाधारण और शासन के लिये उपयोगी होंगे। विकास के नाम पर बड़े-बड़े बाँधों के निर्माण की परियोजनायें हाथ में लेकर इतिहास और भूगोल बदलने के पूर्व एकाग्रचित्त होकर यह सोचना बहुत आवश्यक है कि हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी।

डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बुन्देली दिवस विशेष – पर्यावरण महत्व एवं संरोधन ☆ आचार्य शैलेंद्र पाराशर ☆

🟢 पुस्तक चर्चा 🟢 पर्यावरण महत्व एवं संरोधन 🟢 आचार्य शैलेंद्र पाराशर 🟢

(1 सितम्बर 109वें जन्मोत्सव “बुन्देली दिवस” पर विशेष)

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(एक सितंबर को बुंदेली दिवस समारोह – जबलपुर। बुंदेली लोक साहित्य के विद्वान, भाषा विज्ञानी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की 109वीं जयंती एवं 36वां बुंदेली दिवस समारोह सोमवार 1 सितंबर को संध्या 6.30 बजे से शहीद स्मारक भवन में गुंजन कला सदन एवं नगर की संस्थाओं द्वारा आयोजित है । इस अवसर पर स्मृति शेष डॉ. श्रीवास्तव की पुस्तक “पर्यावरण महत्व एवं संरोधन” के विमोचन के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों एवं विषयों के विद्वानों का अभिनंदन किया जाएगा । बुंदेली गीतों एवं नृत्यों के साथ ही पूर्व में सम्पन्न चित्रकला एवं बुंदेली नृत्य श्री प्रतियोगिता के विजेता भी पुरस्कृत होंगे ।)

लोक संस्कृति के विज्ञानवेत्ता – डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की ‘पर्यावरण महत्व एवं संरोधन’ कालजयी कृति

लोक वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव लोक संस्कृति, सभ्यता, हिन्दी, बुन्देली, भाषा विज्ञान, समाज विज्ञान एवं लोक विज्ञान के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे। उनका बुन्देलखण्ड एवं बुन्देली भाषा के प्रति आजीवन असीम अनुराग रहा है। उनकी लेखनी लोक जीवन के बहुविध विषयों पर साधिकार अनवरत् अविराम चलती रही। उनका सृजन शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है। संस्कृति मनीषी डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व समाज की अमूल्य धरोहर है। डॉ. श्रीवास्तव की इस बौद्धिक विरासत को सहेज कर रखना एवं उनकी भावना के अनुकूल अध्ययन, मनन एवं आचरण से मूर्त रूप देने के लिए कृत संकल्पित होना समाज का नैतिक दायित्व है। उनके शैक्षणिक, सामाजिक, शोध कार्य, पुस्तकें, आलेख, अप्रकाशित रचनाएँ, नवाचारों के खुले द्वार हैं जो आने वाली पीढिय़ों की अमूल्य विरासत हैं। डॉ. श्रीवास्तव की यह पुस्तक इसे स्वयमेव् प्रमाणित करती है।

शब्द ब्रह्म के उपासक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने सृष्टि की रचना के मूल तत्व का गहनता से अध्ययन किया है। पुरुष शाश्वत और चेतन है, वहीं प्रकृति गतिशील एवं भौतिक है। दोनों साथ मिलकर सृष्टि का निर्माण करते हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि की रचना के दो मूल तत्व पुरुष और प्रकृति हैं। ब्रह्मांड की उत्पत्ति प्रकृति और पुरुष के मिलन से हुई है।

ज्ञान की देवी सरस्वती के उपासक डॉ. श्रीवास्तव ने आदिकाल से वर्तमान तक बहुविध पक्षों का सूक्ष्म, गहन एवं शोधात्मक अध्ययन, मनन एवं चिंतन कर समसामयिक सारगर्भित लेखन किया है।

पर्यावरणविद् डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की सद्य: प्रकाशित ‘पर्यावरण महत्व एवं संरोधन’ पुस्तक में पेड़-पौधों, मनुष्यों तथा अन्य प्राणियों की जीवन गाथा से लेकर ‘ पशु-पक्षियों द्वारा प्रजातंत्र की माँग’ सहित इक्कीस शीर्षकों में लेखक ने अत्यंत सूक्ष्मता, अध्ययन, मनन, चिंतन, शोध, नवाचार से, पर्यावरण प्रदूषण एवं फसलों के उत्पादन वृद्धि के लिए उपयोग में आने वाले रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों के दुष्परिणाम सहित अनेक विषयों पर साधिकार लेखनी से सुधी पाठकों का ध्यान आकर्षित कराते हुए समस्याओं के समाधान के तरीके भी बताए हैं। पर्यावरण संरक्षण के पर्यावरण संरोधन, पर्यावरण का संरक्षण, सुरक्षा, दोहन के साथ उसे नष्ट होने से बचाना, सुरक्षित, संतुलन बनाये रखते हुए उसकी रक्षा करना प्राणी मात्र के जीवन, स्वास्थ्य, विकास और संस्कृति का आधार है। वहीं प्रकृति और मनुष्य के नैसर्गिक संतुलन को बनाए रखना सभी का नैतिक दायित्व है। वही मनुष्य का जीवन, स्वास्थ्य, विकास और संस्कृति में निहित जीवन मूल्यों को पोषित करना भी है। डॉ. श्रीवास्तव ने पर्यावरण संयोजन प्रकृति के सभी घटकों, जलवायु, मृदा, वनस्पति, जीव -जंतु, ऊर्जा की प्रकृति को समझते हुए संसाधनों का दुरुपयोग न करने का आह्वान करते हुए भविष्य के लिए उन्हें संरक्षित, एवं सुरक्षित करने का दायित्व निर्वाह करने के लिए उचित मार्गदर्शन दिया है। भारतीय सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों के अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण के संरोधन की मानसिकता बनाते हुए आचरण करने पर विशेष जोर दिया है। पर्यावरण संयोजन वायु, जल, मृदा प्रदूषण का बढऩा मानव को चतुर्दिक रूप से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर बहुत नुकसान पहुँचा रहा है, जिससे प्रति क्षण प्रकृति एवं मनुष्य को अनेक दुष्परिणाम का सामना करना पड़ रहा है।

समाज वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का ‘पर्यावरण संरोधन’ से आशय प्रकृति के सभी घटकों (जल, वायु, मृदा, वनस्पति, जीव-जंतु, ऊर्जा स्रोत) को संरक्षित करना, उनका विवेकपूर्ण उपयोग करना तथा भावी पीढिय़ों के लिए सुरक्षित रखना है।

वर्तमान समय में पर्यावरण संरोधन की सर्वाधिक आवश्यकता है। प्रदूषण नियंत्रण, वायु, जल और मृदा प्रदूषण का बढऩा मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता को हानि पहुँचा रहा है। जैव विविधता की रक्षा करने वाली अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जिससे पारिस्थितिक असंतुलन बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण और जलवायु असंतुलन से मानवता खतरे में है। जल, वन, ऊर्जा और खनिज सीमित हैं। इन्हें अंधाधुंध नष्ट किया जा रहा है जिससे प्रकृति और मनुष्य का भविष्य संकटग्रस्त होता जा रहा है। शुद्ध वातावरण के बिना स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग और संस्कृति आदि सभी नष्ट हो सकते हैं।

पर्यावरण संरोधन के लिए वृक्षारोपण और जंगलों की रक्षा करना आवश्यक है। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन, तालाब व नदियों की शुद्धि और जल का विवेकपूर्ण उपयोग, ऊर्जा संरक्षण हेतु नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन, जलविद्युत) अपशिष्ट प्रबंधन, प्लास्टिक व इलेक्ट्रॉनिक कचरे को पुनर्चक्रण द्वारा कम करना, प्रदूषण नियंत्रण हेतु औद्योगिक धुआँ, वाहनों का धुआँ और रासायनिक अपशिष्ट को नियंत्रित करना आदि जरूरी है। पर्यावरण संरोधन का तात्पर्य है कि प्रकृति का संरक्षण, संसाधनों का संतुलित उपयोग, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता की रक्षा और सतत विकास की दिशा में आगे बढऩा है।

मनुष्य यदि पर्यावरण का संरोधन नहीं करेगा तो जीवन का आधार ही खतरे में पड़ जाएगा, अत: यह मानव का नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है कि वह प्रकृति की रक्षा करे, पर्यावरण ही जीवन का आधार है जो हमें शुद्ध हवा, स्वच्छ जल, उपजाऊ भूमि और जैव विविधता प्रदान करता है, हमारी संस्कृति में नदियाँ, पर्वत, वृक्ष और पशु-पक्षी सदैव पूजनीय रहे हैं। गहन चिंतक डॉ. श्रीवास्तव की पर्यावरण प्रदूषण की इस कृति में अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के प्रति चिंतन उनकी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। आज अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं, जैव विविधता घट रही हैं। यदि हम समय रहते कदम नहीं उठाएँगे तो जीवन असंभव हो जाएगा। वहीं बढ़ते हुए प्रदूषण के खतरों से बचने के लिए पर्यावरण संरोधन की आवश्यकता तेजी से महसूस की जा रही है। पर्यावरण शिक्षा की वर्तमान में बहुत आवश्यकता है। यह अमूल्य ग्रंथ बच्चों व समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

भारतीय संस्कृति में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव हमें सिखाता है कि धरती पर सभी प्राणी हमारे कुटुम्ब का हिस्सा हैं। सतत् समावेशी विकास की नीतियाँ अपनाना, जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन, सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा का प्रयोग, पर्यावरण शिक्षा व जन-जागरूकता, प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन, अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण, वनों की रक्षा करना बहुत जरूरी है। ‘पर्यावरण संरोधन’ केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि विश्व के हर नागरिक का नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक दायित्व एवं कर्तव्य भी है। विश्व भर में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य को सिर्फ शासन, संस्थाओं, पर्यावरणविदों, समाजसेवियों एवं दूसरों से अपेक्षा नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति का प्रकृति एवं जीवन को प्रदूषण से मुक्त रखने का दायित्व है।

संवेदनशील लेखक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव ने पर्यावरण प्रदूषण को समाप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को संकल्प धारण करने का आह्वान किया है कि वे प्रकृति की रक्षा करते हुए पर्यावरण संरोधन के दायित्व का जीवन भर निर्वाह करेंगें। वहीं आने वाली पीढिय़ों के लिए एक सुरक्षित, संरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण विरासत सौंप कर जाएंगे।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना समस्त वैश्विक परिवार का हिस्सा है। इसमें समस्त प्रकृति समाहित है। मनुष्य जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ सदियों से प्रदूषण रहित प्रकृति का अविभाज्य हिस्सा रही हैं। लोक वैज्ञानिक डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव का अथक परिश्रम, चिंतन, लेखन उनकी विद्वता को स्वयमेव् मुखरित करता है। मूलत: यह पुस्तक नहीं, बल्कि शोध ग्रंथ है। इसमें उन्होंने प्राचीन काल से वर्तमान तक अनेक संदर्भ, शोध कार्यो एवं आख्यानों के उदाहरणों को समाहित कर प्रांजल भाषा में सुधी पाठकों के लिए अथक परिश्रम से लिखा है।

वस्तुत, डॉ. पूरनचंद श्रीवास्तव की ज्ञानवर्धक कालजयी कृति पर्यावरण के संरोधन के प्रति समर्पण, संवेदनशीलता एवं साधना की परिचायक है। सादर नमन। 

आचार्य शैलेंद्र पाराशर

सेवानिवृत्त आचार्य, एम. ए., पी एच. डी.

64 नमन विद्यानगर, सांवेर रोड, उज्जैन(म. प्र. ) – 456010 मो. 94250 94144, 83190 65419

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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