हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ निरीह जीव की पिटाई… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

(हाफ लाइनर)

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आखिर पीटा भी तो किसे, निरीह जीव कवि को और वो भी कहाँ डबरा में।

खबर पढ़ते ही लतीफा याद आ गया। मकान मालिक ने किराएदार को इसलिए निकाल दिया कि जब वो रात में लिखता है तो उसकी पेन किर्र किर्र करती है। इसलिए मालिक की नींद में खलल पड़ता है।

 लेखक / कवि होना जैसे गुनाह हो गया। माँ बाप की नज़र में नकारा और लोग— लोगों का काम है कहना— जो कुछ नहीं बन सकता वह नेता या तो कवि बन जाता है।

प्रमाण बिखरे पड़े हैं। पुरातत्वविदों को तलब करने की जरूरत नहीं है।

अब कोई दीदे होकर भी न दिखने का ढोंग करे उसका तो परमात्मा भी कुछ नहीं कर सकता।

 एक कविता ही तो सुनाई बेचारे ने। इतनी सी बात पर उसके कपड़े फाड़ डाले। दयनीय दशा में पहुँचाया यहां तक तो ठीक है फिर फोटो भी खींच ली(उसने कब कहा था– खींच्च मेरी फोटो—)

फोटो खींची यहां तक भी ठीक है फिर उसे अखबार में छपवा भी दिया। घोर बेइज्जती।

अखबार की बात समझ में आती है, सोशल मीडिया पर भी डाल दिया। इतना जघन्य अपमान। कवि को चाहिए वह एक करोड़ की मानहानि का दावा करे। इससे कम का तो कतई नहीं। समूची कवि बिरादरी की इज्जत का सवाल है।

या फिर सारे कवि मिलकर इस घनघोर अपमान के विरोध में मीम बनाएं, स्लोगन लिखें, जेन जी की तरह विरोधात्मक नृत्य करें या पैरोडी गाएं।

कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा। अत्याचार सहने की भी सीमा होती है।

मारनेवाले जितना मार खानेवाला भी अपराधी है।

काश कवियों को इतनी सी बात समझ में आ जाती।

हर घटना के दो पहलू होते हैं। दूसरा पहलू न पूछिए— जो भी पढ़ रहा है, मंद मंद मुस्कुरा रहा है। इतना आनंद तो शायद ही कभी नसीब हो। इतना बेचैन है देश पर इस दशा में भी गदगदायमान हो रहा है।

ऐसे तो कारण अकारण कई पीटते /पिटते/ पिटवाते हैं। किसी किसी के भाग्य में ही होता है स्वयं दुःख सहकर दूसरों को आनंद प्रदान करना। कवि के सामाजिक सरोकारों पर गौर फरमाने की जरूरत है।

उस कवि पर तरस खाने की बजाय उसके लिये पुरस्कार की व्यवस्था करनी चाहिए। इस नेक काम के लिये चंदा आसानी से मिल जाएगा।

अगर आयोजक चंदा चुराएगा तो भी कितना।

दो सौ करोड़ तो नहीं ना।

ऐसे तो बेवजह बेसबब सत्कार के कारनामे नित्य होते हैं। यहां तो कवि की बेइज्जती का सवाल है। कोई गा के कविता पढ़ता है कोई दहाड़कर। कोई अभिनय के साथ। उसे तो याद भी रखना पड़ता है। इतने कमसिन जीव को कोई टेलीप्राॅम्प्टर तो देगा नहीं। न पुष्पवर्षा करेगा।

चिंघाड़ना कवि का संवैधानिक अधिकार है। इसे चुनौती देना ठीक नहीं।

परिसर में रहनेवालों को नींद नहीं आती। कवि की दहाड़ से नींद उड़ जाती है। हैरानी है जो गहरी नींद में सोये हैं उनपर किसी कवि के गरजने बरसने का असर होने से रहा। होता ही नहीं।

भविष्य में कवि जैसे हानिरहित प्राणी (प्राणधारक) को हानि न पहुँचाई जाए अन्यथा ——-सौ करोड़ याद रखना। ।

☆

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४५ ☆ व्यंग्य – पेपर लीकेज का जिन्न ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘पेपर लीकेज का जिन्न‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ पेपर लीकेज का जिन्न ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

पेपर लीकेज के मसले ने सरकारों की नींद आराम कर दी है। पूरे देश में हंगामा बरपा है। सरकारों को लगता है ये आंदोलनकारी जेन-ज़ी नहीं, बोतल से निकले जिन्न जी हैं। अभी तक ये कहां छिपे बैठे थे? समझ में नहीं आता कि इन्हें वापस बोतल में कैसे बन्द किया जाए। ये चुपचाप पुलिस की लाठियां खाकर भागने वाले, किताबों में डूबे रहने वाले संस्कारी छात्र अचानक जिम्मेदार लोगों से आंख में आंख डालकर सवाल कैसे करने लगे? घोर कलियुग! उस पर तुर्रा यह कि इनके साथ जेन-अल्फ़ा भी कुसंस्कार सीख रहा है, यानी बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुबहान अल्लाह।

देश के बहुत से सयाने लोग लड़कों के नारों और उनके द्वारा प्रदर्शित प्लेकार्डों से दुखी हैं। ‘हाय,हाय, ये नेताओं के लिए कितनी गन्दी भाषा लिख और बोल रहे हैं। इनके संस्कार कहां गये?क्या इनके मां-बाप ने इन्हें यही सिखाया था? न किसी की शर्म, न लिहाज। राम, राम।’

कुछ दूसरे सयाने जवाब देते हैं— ‘हमारी पीढ़ी ने नयी पीढ़ी को कौन से संस्कार सिखाये हैं? संसद में सांसद दूसरे दलों के सांसदों के लिए कैसी भाषा का उपयोग करते हैं? सभी बड़े मंदिरों में रोज़ चोरी की खबरें आती हैं, परीक्षाओं के पेपर लीकेज से छात्रों का भविष्य चौपट हो रहा है, पार्टियों को खुले आम तोड़कर सरकारें बनायी जाती हैं, बड़े-बड़े सन्त जेल की हवा खा रहे हैं, सिद्ध भ्रष्ट बड़ी कुर्सियों पर बैठे हैं, चतुर लोग बैंकों का हज़ारों करोड़ हज़म करके विदेश में मौज कर रहे हैं, हजारों करोड़ से बने पुल उद्घाटन से पहले गिर रहे हैं, नयी बनी एक्सप्रेस-वे चटक रही हैं, नये बने एयरपोर्ट पहली बरसात में चौधार आंसू टपका रहे हैं, महापुरुषों और ऋषि-मुनियों की नयी बनी मूर्तियां हवा के झोंके से गिर रही हैं। यह सब नयी पीढ़ी देख रही है और समझ रही है, इसलिए उस पर हमारे नैतिकता के भाषणों से कोई असर नहीं होने वाला। ये कोई दूध-पीते बच्चे नहीं हैं। इस पीढ़ी के पास हमसे ज़्यादा समझ है। वह हमारी पीढ़ी के पाखंड को खूब समझ रही है।’

सुन कर संस्कारों की दुहाई देने वाले सयाने मौन साध लेते हैं।

सरकारों में भगदड़ मची है। इस लीकेज को कैसे बन्द किया जाए। कमेटियां बन रही हैं। कुछ पकड़-धकड़ भी हुई है। कमेटियों से सुझाव आता है कि  लीकेज के दोषियों के लिए सख़्त सज़ा का प्रावधान हो। दस साल की सज़ा और दस करोड़ जुर्माने पर सहमति बनती है।

एक मसखरा सवाल करता है, ‘अपराधी के पास दस करोड़ की संपत्ति नहीं हुई तो वसूली कैसे होगी?’

छात्र इन सुझावों पर आपत्ति करते हैं, कहते हैं, ‘ये सब लीकेज के बाद के उपाय हैं। इनसे छात्रों का नुकसान कैसे पूरा होगा? अंग्रेज़ी की कहावत के अनुसार घोड़े के भाग जाने के बाद अस्तबल का दरवाज़ा बन्द किया जाएगा। सरकार यह बताये कि लीकेज रोकने के लिए क्या किया गया है।’

सरकारें फिर परेशान हैं। फिर कमेटियां बैठती हैं। फिर मगजमारी होती है। लीकेज रोकने के सुझाव मांगे जाते हैं। छात्रों की तरफ से सुझाव आता है कि परीक्षाओं का पूरा काम सौ प्रतिशत ईमानदार और कठोर निर्णय लेने वाले अधिकारियों को सौंपा जाए। अब सौ प्रतिशत ईमानदार अधिकारियों की खोज में दौड़भाग शुरू होती है। तुरन्त ‘ऑनेस्टी टेस्टिंग मीटर’ तैयार करवाए जाते हैं और सौ से ज़्यादा अधिकारी इन मीटरों से लैस होकर देश के कोने-कोने में निकल पड़ते हैं। उच्च अधिकारी सारे वक्त उनसे रिपोर्ट लेते हैं।

ज़्यादातर मामलों मैं रिपोर्ट मिलती है कि  ईमानदार तो बहुत मिल रहे हैं लेकिन अब तक सौ प्रतिशत वाला बन्दा नहीं मिला है। उच्च अधिकारी माथे का पसीना पोंछते हैं, कहते हैं, ‘कोई बात नहीं। लगे रहो। कामयाबी ज़रूर मिलेगी।’

तो भाइयो, सौ प्रतिशत ईमानदार खोजने की कोशिश अभी ज़ारी है। हम भी दुआ करते हैं कि अधिकारियों को इस काम में जल्दी सफलता मिले। वैसे यह गांधी और बुद्ध का देश है। यहां सौ प्रतिशत ईमानदार आदमी नहीं मिला तो बड़ी नककटई हो जाएगी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२७ – निमंत्रण पत्र का वज़न – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – निमंत्रण पत्र का वज़न।)  

☆  चुभते तीर # १२७ – व्यंग्य  – निमंत्रण पत्र का वज़न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

दुबे जी का मानना था कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो शादी में खाना खाने जाते हैं, और दूसरे वो जो खाना खाने के बाद पनीर के टुकड़ों का नाप लेकर शादी का बजट तय करते हैं। दुबे जी दूसरी श्रेणी के सिरमौर थे। उनके लिए मोहल्ले में आने वाला हर शादी का कार्ड सिर्फ एक निमंत्रण नहीं, बल्कि एक वित्तीय चुनौती होता था।

इस बार उनके हाथ में लाल और सुनहरे रंग का एक बहुत ही भारी लिफ़ाफ़ा आया था। यह कार्ड मोहल्ले के सबसे अमीर व्यापारी सेठ धनीराम के बेटे की शादी का था। लिफ़ाफ़ा इतना भारी था कि दुबे जी ने उसे हाथ में तौलते हुए अपनी पत्नी से कहा, “सुनती हो, कार्ड का वज़न कम से कम आधा किलो है। इसमें ज़रूर कोई काजू की बर्फी या सूखे मेवे का डिब्बा छिपा होगा।”

पत्नी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “ज्यादा उम्मीद मत लगाइए, आजकल लोग बाहर से बहुत चमक-धमक दिखाते हैं और अंदर सिर्फ एक पन्ना निकलता है।”

लेकिन दुबे जी का दिल मानने को तैयार नहीं था। उन्होंने लिफ़ाफ़े पर लगी सुनहरी सील को ऐसे खोलना शुरू किया जैसे कोई पुरातत्वविद किसी प्राचीन खजाने का ताला खोल रहा हो। लिफ़ाफ़ा खुला, तो अंदर से रेशमी कपड़े में लिपटा एक बहुत ही सुंदर डिब्बा निकला। दुबे जी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने डिब्बे का ढक्कन हटाया। अंदर एक बड़ा सा पत्थर का टुकड़ा रखा हुआ था, जिस पर सोने के अक्षरों में शादी की तारीख और न्यौते का संदेश तराशा गया था।

दुबे जी का मुंह खुला का खुला रह गया। “पत्थर? कार्ड की जगह पत्थर?” वे लगभग चिल्लाए।

अगले तीन दिनों तक पूरे मोहल्ले में इस पत्थर वाले कार्ड की ही चर्चा थी। कोई इसे सेठ जी की रईसी कह रहा था, तो कोई इसे पैसों की बर्बादी। दुबे जी की ईगो को चोट पहुंची थी। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पत्थर के बदले शादी में शगुन का लिफ़ाफ़ा कितने का दिया जाए। अगर पचास रुपये दो, तो पत्थर का अपमान था, और अगर पाँच सौ दो, तो दुबे जी के बजट का कत्ल था।

शादी की रात दुबे जी सज-धजकर पहुंचे। वे सीधे गिफ्ट काउंटर पर गए जहाँ सेठ जी खुद खड़े होकर मेहमानों का स्वागत कर रहे थे। दुबे जी ने बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में अपना शगुन का लिफ़ाफ़ा निकाला और सेठ जी को थमा दिया।

सेठ जी ने लिफ़ाफ़ा पकड़ा, लेकिन उसकी ढीली बनावट देखकर मुस्कुराए और चुटकी लेते हुए बोले, “दुबे जी, हमारा कार्ड तो बहुत भारी था, पर आपका लिफ़ाफ़ा हवा में उड़ता हुआ महसूस हो रहा है!”

दुबे जी ने एक पल का विराम लिया, अपनी मूंछों पर ताव दिया और बोले, “सेठ जी, आपने जो पत्थर भेजा था, वो कार्ड नहीं बल्कि हमारे जैसे पड़ोसियों के लिए एक सबक था। आपने उस पर तारीख लिखकर हमें याद दिलाया कि रिश्ते पत्थर की लकीर होते हैं। इसलिए लिफ़ाफ़े में पैसे नहीं, बल्कि आपके नाम हमारी उस पुश्तैनी ज़मीन का अनापत्ति पत्र (NOC) है जिसका केस हमारे बीच तीन साल से कोर्ट में चल रहा था। आज से वो ज़मीन आपकी!”

सेठ जी की आंखें छलक आईं। उन्होंने दुबे जी को गले लगा लिया। वहां मौजूद सभी मेहमान और रिश्तेदार इस अनोखे उपहार पर ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाने लगे। दुबे जी ने मुस्कुराकर प्लेट उठाई और सबसे महंगे काउंटर की तरफ बढ़ गए, मन ही मन सोचते हुए कि कोर्ट की फीस से तो यह सौदा कहीं सस्ता पड़ा!

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२५ – लिफाफे का राज – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – लिफाफे का राज।)  

☆  चुभते तीर # १२५ – व्यंग्य – लिफाफे का राज ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

शर्मा जी के लिए अपने पड़ोसी वर्मा जी की बेटी की शादी में जाना किसी युद्ध क्षेत्र में जाने जैसा था। वजह दुश्मनी नहीं, बल्कि लिफाफा थी। समाज का एक अनलिखा नियम है कि शादी का खाना कितना भी स्वादिष्‍ट हो, लिफाफे के अंदर रखा नोट तय करता है कि आपकी इज्जत प्लेट में कितनी परोसी जाएगी। शर्मा जी ने बहुत सोच-समझकर एक लाल रंग के लिफाफे में पाँच सौ रुपये का नया नोट डाला और जेब में रख लिया।

शादी के मंडप में रोशनी ऐसी चमक रही थी जैसे आसमान के सारे तारे ज़मीन पर मुफ़्त का खाना खाने उतर आए हों। शर्मा जी सीधे स्टेज की तरफ बढ़े। वर-वधू को आशीर्वाद दिया और जेब से लिफाफा निकालने लगे। तभी उनके हाथ में एक नहीं, बल्कि दो बिल्कुल एक जैसे लाल लिफाफे आ गए। शर्मा जी के माथे पर अचानक ठंडी हवा में भी पसीने की बूंदें तैरने लगीं।

बात यह थी कि घर से निकलते वक्त शर्मा जी की पत्नी ने उन्हें एक दूसरा लाल लिफाफा भी दिया था, जिसमें दर्जी को देने के लिए तीन सौ रुपये का पुराना घिसा हुआ नोट और एक मुड़ा हुआ राशन का परचा था। दोनों लिफाफों का रंग, रूप और वज़न बिल्कुल एक जैसा था। अब शर्मा जी के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट यह था कि दुल्हन के हाथ में कौन सा लिफाफा थमाया जाए। अगर गलती से दर्जी वाला लिफाफा चला गया, तो अगले दिन पूरे मोहल्ले में उनकी इज्जत का हलवा बन जाएगा।

स्टेज पर कैमरामैन चीख रहा था, “अंकल जी, थोड़ा मुस्कुराइए! फोटो खींचनी है।” शर्मा जी की मुस्कान ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने जबरदस्ती करेले का जूस पिला दिया हो। दुल्हन की नज़रें शर्मा जी के हाथ पर टिकी थीं। लिफाफा तो देना ही था। समय हाथ से फिसलता जा रहा था। शर्मा जी ने अपनी किस्मत का सिक्का हवा में उछाला और एक लिफाफा दुल्हन के हाथ में थमा दिया।

स्टेज से नीचे उतरते ही उनके पैर कांप रहे थे। दिल की धड़कन किसी पुराने ढोल की तरह बज रही थी। उन्होंने डरते-डरते अपनी जेब में हाथ डाला और बचा हुआ लिफाफा निकाला। लिफाफा खोला तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। जेब में दर्जी वाला लिफाफा बचा हुआ था। यानी दुल्हन को सही लिफाफा ही मिला था।

शर्मा जी ने चैन की सांस ली और राहत का एक लंबा सांस खींचा। वे प्लेट उठाकर शाही पनीर की तरफ बढ़े ही थे कि पीछे से लाउडस्पीकर पर आवाज़ गूंजी, “शर्मा जी, कृपया स्टेज पर आएं। आपका लिफाफा खाली निकला है, उसमें सिर्फ एक राशन की पर्ची है।”

पूरा पंडाल सन्नाटे में डूब गया। शर्मा जी ने चौंककर जेब वाला लिफाफा फिर से देखा। वो असल में तीन सौ रुपये का नोट ही था, परची तो दुल्हन वाले लिफाफे में जा चुकी थी। शर्मा जी ने माइक्रोफोन हाथ में लिया, गहरा सांस लिया और बोले, “यह पर्ची मेरी तरफ से कन्यादान है। इस पर लिखे राशन का पूरा खर्च अगले एक साल तक मेरे घर से जाएगा।”

पूरे शादी के मंडप में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। लोग शर्मा जी की दरियादिली के कायल हो गए, जबकि शर्मा जी मन ही मन सोच रहे थे कि दर्जी के तीन सौ रुपये बचाने के चक्कर में एक साल का राशन दांव पर लग गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२४ – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल।)  

☆  चुभते तीर # १२४ – व्यंग्य  – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के दफ़्तर की मेज़ पर एक फाइल पिछले तीन महीनों से इस तरह सोई हुई थी, जैसे इतवार की सुबह कोई अलार्म बजने के बाद तकिया ओढ़कर सोता है। उस फाइल का नाम था ‘जनहित याचिका 402’। गुप्ता जी चाय के बड़े शौकीन थे। उनके लिए चाय सिर्फ़ एक पेय पदार्थ नहीं थी, बल्कि काम टालने का सबसे पवित्र औजार थी। जब भी कोई फाइल उनके सामने आती, वे चाय का कुल्हड़ उठाते, एक लंबी सांस खींचते और कहते, “मामला गंभीर है, थोड़ा पकाने की जरूरत है।”

दफ़्तर के सभी लोगों को लगता था कि गुप्ता जी बड़े ईमानदार और फुर्तीले अफ़सर हैं, जो हर कागज़ की बारीकी में उतरते हैं। लेकिन सच्चाई यह थी कि गुप्ता जी को उस फाइल का ताला खोलने की चाबी, यानी फाइल के अंदर छिपा मुख्य पन्ना कभी मिला ही नहीं था। वह पन्ना गायब था। अगर यह बात बाहर आ जाती, तो गुप्ता जी की नौकरी की मलाई में मक्खी गिर जाती। इसलिए वे हर रोज़ फाइल पर एक नया नोट लिखकर उसे अलमारी के सबसे गहरे कोने में सरका देते थे।

एक दिन अचानक बड़े साहब का बुलावा आया। बड़े साहब का गुस्सा ऐसा था जैसे बिना अदरक वाली उबली हुई चाय, जो गले से नीचे उतरते ही मूड खराब कर दे। साहब ने मेज़ पर मुक्का मारा और कहा, “गुप्ता, जनहित याचिका 402 का फैसला आज शाम चार बजे तक मेरी मेज़ पर होना चाहिए। मंत्री जी खुद इस पर नज़र बनाए हुए हैं।”

गुप्ता जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके माथे पर पसीने की बूंदें ऐसे चमकने लगीं जैसे बारिश के बाद पत्तों पर ओस। फाइल खोली गई, लेकिन गायब पन्ना अब भी गायब था। दोपहर के तीन बज चुके थे। दफ़्तर की घड़ी की सुइयां गुप्ता जी की धड़कनों से शर्त लगा रही थीं। उन्होंने तुरंत अपने चपरासी रामदीन को आवाज़ लगाई, “रामदीन, एक कड़क चाय बनाओ। आज ज़िंदगी और मौत का सवाल है।”

रामदीन चाय का कुल्हड़ लेकर आया। गुप्ता जी ने कांपते हाथों से कुल्हड़ उठाया। जैसे ही उन्होंने पहला घूंट लिया, उन्हें चाय के नीचे कागज़ का एक छोटा सा टुकड़ा चिपका हुआ दिखाई दिया। वह टुकड़ा वही गायब पन्ना था, जिसे रामदीन ने महीनों पहले चाय के कुल्हड़ को मेज़ पर टिकाने के लिए फाइल के बीच से निकालकर ‘कोस्टर’ की तरह इस्तेमाल कर लिया था।

गुप्ता जी ने राहत की सांस ली और फाइल पूरी करके साहब की मेज़ पर रख दी। साहब ने फाइल देखी, मुस्कुराए और बोले, “मान गए गुप्ता जी, आपकी पारखी नज़र से कोई सच छिप नहीं सकता।”

पूरा दफ़्तर ताली बजाने लगा। गुप्ता जी ने मुस्कुराकर चाय का आखिरी घूंट पिया और मन ही मन कहा कि इस देश में फाइलें काम से नहीं, सही समय पर मिली चाय की पत्ती से आगे बढ़ती हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ – हास्य-व्यंग्य – “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

झब्बूलाल ने पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ाया और हमेशा की तरह मेरे सामने एक लंबा प्रश्न पटक दिया। भाई साहब, देवभूमि भारत में कदम-कदम पर देवालय हैं, जहां प्रति दिन शंख और घंटों की ध्वनि के बीच दिन भर ईश्वर की आराधना होती है, साधु-संतों, महंतों, जगत गुरुओं के प्रवचन होते हैं, देवी-देवताओं की शोभा यात्राएं निकलती हैं। लाउडस्पीकर लगा कर अखंड रामायण, भागवत पाठ, नर्मदा, शिव, विष्णु एवं गरुड़ पुराण होते हैं, भंडारे होते हैं, उस भारत भूमि वासियों से देवराज इंद्र के सम्मान में क्या गुस्ताख़ी हो गई जो इस वर्ष वे कहीं तो सिर्फ छिड़काव कर रहे हैं और कहीं बेहिसाब पानी उड़ेल रहे हैं ?

मैंने कहा, झब्बू भाई, मैं ऑफिस जाने के लिए घर से निकला हूं मुझे प्रश्नों के जाल में मत उलझाओ। वह बोला, भैया मैं कल से इस बारे में कई लोगों से पूंछ चुका हूं, किसी ने संतोषजनक समाधान नहीं किया। आप पत्रकार हैं कुछ तो बताएं। जब तक मैं आपके ऑफिस के लिए पानों की पुड़िया बनाता हूं। मैंने कहा, झब्बू भाई मैं पृथ्वी लोक का पत्रकार हूं। ट्रंप, पुतिन, मोदी, योगी, राहुल की प्रसन्नता, दुख  और नाराजी की वजह बता सकता हूं देवलोक वासी इंद्र की नाराजी अथवा उनके मूड के बारे में जानने के लिए तो तुम्हें देवलोक के पत्रकार नारद जी से संपर्क करना होगा। यदि लोगों को ऐसा लग रहा है कि देवराज रुष्ठ हैं इसलिए वर्षा को प्रभावित कर रहे हैं तो उन्हें खुश करने का प्रयत्न करें।

झब्बू बोला, भाई साहब अखबारों में छप रहा है कि अच्छी वर्षा के लिए लोग जगह-जगह पूजा-पाठ, यज्ञ करवा रहे हैं। टोना टोटके भी हो रहे हैं, कहीं गधों को गुलाबजामुन खिलाए जा रहे हैं, कहीं मेंढक-मेंढकी के विवाह कराए जा रहे हैं, जमीन में उल्टे घड़े गड़ाए जा रहे हैं फिर भी इंद्र देव खुश नहीं हो रहे!

पान लगाते हुए झब्बू ने मेरी ओर नजर फेंकी और पुनः कहा, भाई साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि दुश्मन देशों ने हमारे देश के खिलाफ इंद्र के कान भर दिए हों? मैंने कहा यह भी हो सकता भाई जी क्योंकि हमारे देश के कुछ नेता भारत को विश्व गुरु बनाने पर तुले हैं जबकि अनेक देश हमें गुरु नहीं मानना चाहते।

झब्बू बोला – भाई साहब, इंद्र देव की नाराजी के और क्या कारण हो सकते हैं ? मैंने झब्बू से पान की पुड़िया ली और कहा प्यारे भाई, जाने के पहले मुझसे इंद्र देव की नाराजी का सबसे बड़ा कारण सुन लो। झब्बू मेरी ओर झुका, मैंने धीरे से कहा – तुमने सुना होगा कि जब-जब भारत भूमि पर कोई धर्मनिष्ठ, तपस्वी, लोकप्रिय राजा हुआ है तब-तब इंद्रासन डोला है। इंद्र के मन में आशंका पैदा हुई है कि भारत का वह धर्मनिष्ठ राजा कहीं उनसे उनका सिंहासन न छीन ले, तो भाई शायद यही आशंका इस समय भी इंद्र के मन में समा गई है और संभवतः इंद्र देव इस कारण ही कुपित होकर वर्षा को अस्त्र बना कर भारत भूमि के शासक को अशक्त करके उससे अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं। मेरी बात सुनकर झब्बूलाल की आँखें खुली रह गईं। मैंने उसे हतप्रभ छोड़ कर अपने स्कूटर में किक मारा और आगे बढ़ गया।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४४ ☆ व्यंग्य – शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘शीतल भाई और शान्ति  की खोज’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

शीतल भाई रिटायर हुए तो पानी से निकली मछली हो गये। लगा जैसे पांव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। समझना मुश्किल हो गया कि क्या करें और कहां जाएं। पहले सवेरे आठ बजे उठकर दफ्तर की तैयारी में लग जाते थे। टहलने- घूमने, पूजा-पाठ में कभी रुचि नहीं रही। ‘जेही विधि राखे राम, तेही विधि रहिए’ की नीति पर चलते रहे। शरीर को ज़्यादा कष्ट देने के कभी पक्षधर नहीं रहे।

अब रिटायर हुए तो नौ बजे तक पलंग पर ही लुढ़कते-पुढ़कते रहते। जब पत्नी उलाहना देती, ‘क्या अहदी बने पड़े हो, दिन कितना चढ़ गया, उठो’, तब उठते।

आदत के मारे कभी-कभी अपने पुराने दफ्तर में पहुंच जाते। कुर्सी लेकर किसी कर्मचारी के बगल में गपियाने को बैठ जाते। लेकिन कुछ दिन बाद वे प्रबंधकों की नज़र में खटकने लगे। आदेश निकल गया कि कर्मचारी किसी भी बाहरी आदमी को बगल में बैठने न दें।

दफ्तर में कार्यरत साथी भी अब उनसे कटने लगे थे। रिटायर्ड आदमी से क्या बात की जाए? शीतल भाई किसी कर्मचारी को फोन लगाते तो वह थोड़ी देर बाद ही बात बन्द करने के बहाने ढूंढ़ने लगता।

अब शीतल भाई को गांव की याद आने लगी। सोच लिया कुछ दिन गांव में रहेंगे तो मन बहलेगा। ताज़ा हवा मिलेगी, शान्ति मिलेगी। वहां अभी रिश्तेदार थे, पुराना पैतृक मकान था। पिता-माता के जीवन काल में साल दो साल में चक्कर लगाते थे, लेकिन वहां मन नहीं लगता था। शहर और दफ्तर बुलाता रहता था। एक-दो दिन में ही ऊब कर भाग खड़े होते। लेकिन अब दफ्तर का दबाव नहीं है। जाएंगे और जब तक मन लगेगा, रहेंगे।

पत्नी से पूछा तो उन्होंने अपनी गठिया का हवाला देकर जाने से मना कर दिया। शीतल भाई अकेले ही निकल पड़े। गांव पहुंचे तो भाइयों, भतीजों ने स्वागत किया। हाल-चाल का लेनदेन हुआ। पुरानी पोथियों के पन्ने पलटे गये।

रात को शीतल भाई आंगन में लेटे तो तारों से भरा आकाश दिखा। शीतल भाई चौंके। ऐसा आकाश अभी तक कहां था? शहर में तो यह कभी दिखा नहीं।

सवेरे गांव में निकले तो पाया कि गांव बदल गया है। अब उन्हें पहचानने वाला कोई नज़र नहीं आता। ढूंढ़ते हुए दो-तीन परिचितों के घर पहुंचे तो लोग उन्हें परिचय देने के बाद ही पहचान पाये। जो ठीक से पहचान पाये वे काफी बूढ़े हो चुके थे।

शीतल भाई को लगा कि यहां आकर ज़िन्दगी जैसे ठहर गयी है। सब कुछ मंथर गति से चलता है, कहीं कोई जल्दबाज़ी नहीं।

शाम को डेढ़ दो किलोमीटर टहलने निकल गये। सड़क के दोनों तरफ खेत दिखते थे। दूर जाकर नदी के पुल पर बैठ गये। बगल में पुराना मन्दिर था। सब तरफ सन्नाटा था। दो चार लोग मन्दिर में आते जाते दिखते थे। थोड़ी देर बैठकर शीतल भाई ऊब कर उठ आये।

शीतल भाई के घर से थोड़ी दूर एक सेठ की किराने की दुकान और मकान था। दूसरी रात को वहां से किसी के गुस्से से बकने- झकने की आवाज़ें आने लगीं। पूछने पर पता चला कि गांव के एक बिगड़े रईस अक्सर शराब पीकर सेठ को गालियां सुनाते हैं और सेठ जी शांत चित्त से सुनते हैं। कारण यह बताया गया कि सवेरे यही सज्जन सेठ के पास हाथ जोड़ते हुए आते थे और घर  की चीज़ें उनके पास गिरवी रख जाते थे। इस क्रम में सेठ जी उनकी खेती की ज़मीन और घर की बहुत सी चीजों के मालिक हो गये थे। इसीलिए वह गालियां सुनकर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते थे।

तीन-चार दिन में ही शीतल भाई गांव से उकताने लगे। यहां का सन्नाटा और जीवन की सुस्त रफ़्तार उन पर भारी पड़ रही थी। शहर में थे तो दिन भर गाड़ियों का आना-जाना, ट्रेनों का हूटर, पास-पड़ोस की खटर-पटर कानों में आती रहती थी। चौराहे पर खड़े आदमी को भी शहर अपनी रफ़्तार में लपेट लेता था। ज़िन्दगी उसी रफ़्तार की आदी हो गयी थी, इसलिए सुस्त गति वाली ज़िन्दगी में ‘एडजस्ट’ होना मुश्किल लग रहा था।

शीतल भाई को याद आया कई साल पहले वे मुंबई गये थे। वहां स्टेशन पर एक आदमी ने उनसे उनके शहर का नाम पूछा और फिर बताया कि एक बार वह तीन-चार घंटे के लिए उनके शहर में गया था और वहां की ज़िन्दगी उसे इतनी सुस्त लगी कि उसका जी घबराने लगा। उसकी बात याद करके शीतल भाई को लगा कि हर जगह की ज़िन्दगी की अपनी रफ़्तार होती है और एक रफ़्तार वाली जगह के आदी आदमी को दूसरी जगह समायोजित होना आसान नहीं होता।

एक हफ्ते बाद ही शीतल भाई वापस शहर पहुंच गये। पत्नी बोलीं, ‘बड़ी जल्दी वापस आ गये ? कुछ दिन और शान्ति से रह लेते।’

शीतल भाई ने जवाब दिया, ‘वहां शान्ति कुछ ज़्यादा ही है। हम शहर वालों को ज़्यादा शान्ति की आदत नहीं रही। ज़्यादा शान्ति हो तो मन घबराने लगता है। जैसा भी है हमारे लिए शहर ही ठीक है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२३ – वीआईपी संस्कृति और आम आदमी – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – वीआईपी संस्कृति और आम आदमी।)  

☆  चुभते तीर # १२३ – व्यंग्य  – वीआईपी संस्कृति और आम आदमी ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

हमारे देश में वीआईपी होना एक दैवीय अधिकार है। जब किसी मंत्री का काफिला निकलता है, तो एम्बुलेंस को भी किनारे लगा दिया जाता है क्योंकि मंत्री जी का समय देश के किसी भी बीमार नागरिक की जान से ज़्यादा कीमती है। हूटर की आवाज़ सुनते ही आम आदमी इस तरह सहम जाता है मानो कोई आदमखोर शेर आ रहा हो। इन वीआईपी लोगों को लाइन में लगना अपनी तौहीन लगता है। सुरक्षा के नाम पर इनके आगे-पीछे कमांडो इस तरह चलते हैं जैसे वे किसी जंग के मैदान में हों। आम आदमी टैक्स भरता है ताकि इन वीआईपी लोगों की गाड़ियों का पेट्रोल मुफ्त मिल सके। सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि ये सभी खुद को ‘जनता का सेवक’ कहते हैं, और सेवक की सेवा में पूरी जनता दिन-रात लगी रहती है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६५ ☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ।)

☆ शेष कुशल # ६५ ☆.☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” – शांतिलाल जैन ☆

उधर सात समंदर पार निज़ाम-ए-अमेरिका अपनी कामकाज की मेज़ पर लिखवा कर रखते हैं – ‘बक स्टॉप्स हियर’.  इधर आर्यावर्त में ‘बक स्टॉप्स नो व्हेयर’. अंग्रेजी का बक श्रीमान्, आला हाकिम से लेकर अदने से मुलाज़िम तक कोई उसे अपनी डेस्क पर ठहरने नहीं देता. पास देने में सब प्रवीण. हॉकी फुटबाल में होते तो खूबसूरत पास दे रहे होते. बहरहाल, मैंने बक को जबरन रोककर पूछा – यार ये परीक्षाओं के पेपर बार बार लीक हो रहे हैं –  तुम किसी की डेस्क पर जाकर तो रुकोगे?

उसने कहा – ठहरेंगे तो मारे जाएँगे शांतिबाबू. हमें जहाँ ठहरना चाहिए वहाँ शिकारी बैठे होते हैं. समय आने पर जो आदमखोर हो जाने का भी दम रखते हैं. मुझ निरीह गरीब प्राणी को क्या ही छोड़ेंगे?  आदम जो कभी किसान के रूप में मरता है कभी छात्र के तौर पर,  कभी महिला पहलवानों के तौर पर तो कभी रिटायर्ड सैनिक के तौर पर. हमें ठहरना तो वहीं चाहिए जिनके कारण वे मरते हैं. मगर, क्या मजाल है कि हाकिम की नाक पर मक्खी और कामकाज की डेस्क पर कोई बक ठहर जाए. ठहरने का तो इन दिनों हमने सोचना ही बंद कर दिया है.

‘कभी, कहीं तो ठहरे होगे तुम?’  –  मैंने पूछा.

‘लाल बहादुर शास्त्री के समय ठहरे थे हम. ट्रेन अरियालुर में दुर्घटनाग्रस्त हुई और हम  दिल्ली में रेलमंत्री की डेस्क पर जा कर ठहर गए. अब हम कहीं नहीं ठहरते. आर्यावर्त के  ओहदेदार ‘पास द बक’ में निपुण जो हो गए हैं. जो जितना बड़ा ओहदेदार पास देने की कला में वो उतना ही माहिर.’

आर्यावर्त का मामला श्रीमान्,  मैं भी क्या ही कहता उसे. उसी ने कहना जारी रखा – ‘यहाँ हर संकट के साथ तीन चीज़ें तत्काल पहुँचती हैं — कैमरा,  बयान और उच्च स्तरीय जांच समिति. समिति जवाबदेही तय करेगी. रियाया उम्मीदें पाल लेती है,  समिति के निष्कर्ष आएँगे,  जिम्मेदार लोग दोषी ठहराए जाएँगे, समिति कहेगी मुझसे बक, यू स्टॉप हियर.  मगर ऐसा होता नहीं. वो क्या है कि समिति उच्च स्तरीय होती है. रियाया निच्च. उच्च भी इतनी कि सीढ़ी आप चढ़ नहीं पाएँगे और लिफ्ट आपको कोई देगा नहीं.  गर्दन दुखने लगती है तो जनता उच्च स्तर पर देखना ही बंद कर देती है. समिति उच्च स्तर पर जाँच करती है, निष्कर्ष हैं कि नीचे तक आ नहीं पाते.’

पिछले दिनों एक पुल टूट गया, सैकड़ों की संख्या में लोग मर गए. मैंने बक से कहा – ‘सेतु निगम के अधकारियों से लेकर लोक निर्माण विभाग के वज़ीर तक किसी की डेस्क पर तो तुम्हें रुकना ही पड़ेगा?’

उसने कहा – ‘बहुत भोले हैं आप शांतिबाबू,  बल्कि बेवकूफ़ हैं. गिरनेवाला यह पहला पुल नहीं है. न ओहदेदार नए हैं, न मेरे जैसा बक ही नया है. कुछ क्लासिक पास देखिएगा – निर्माण एजेंसी दोषी है. एजेंसी कहेगी तकनीकी स्वीकृति प्रशासन ने दी थी. प्रशासन कहेगा बजट सीमित था. वित्त विभाग कहेगा वैश्विक परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं. पुल कमज़ोर था, चेतावनी लिखी थी फिर भी बड़ी संख्या में लोग पुल पर आ गए.’  कुछ हुआ कि मरहूम मासूमों को याद करते करते गला भर आया बक का. बोला – ‘कभी किसी रसूखदार को टूटते पुल पर मरते हुए देखा है ? वे पुलों को न पैदल पार करते हैं, न टूटने से मरते हैं.’

बोला – ‘इस तरह पास दिए जाने से बेहतर है हाराकिरी कर ली जाए. यूँ भी सफलता के सौ बाप होते हैं,  विफलता अनाथ. सड़क समय पर बन जाए तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. सड़क बरसात में बह जाए तो यह अप्रत्याशित वर्षा का परिणाम है. महँगाई घटे तो नीति सफल है,  बढ़े तो अंतरराष्ट्रीय कारण हैं. परीक्षा अच्छे से हो जाए तो प्रशासन दक्ष है,  प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो कुछ शरारती तत्व सक्रिय थे. निज़ाम का फण्डा क्लियर है,  काम अच्छा हुआ तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. खराब हुआ तो यह मौसम के कारण हुआ. ईरान युद्ध के कारण हुआ. तकनीकी खामी के चलते हुआ. स्थानीय प्रशासन दोषी है. विपक्ष के समय भी हुआ. आला हाकिम का कोई कसूर नहीं.’

‘आपके आर्यावर्त की रियाया शांतिबाबू, एकदम उदारमना!! हर बार भरोसा कर लेती है बक कभी तो किसी विभाग में किसी की डेस्क पर जा कर ठहरेगा. उधर निज़ाम भी उतने ही मुतमइन हैं – अगली घटना घटने तक रियाया पिछली घटना भूल जाएगी. जब कोई नहीं मिलेगा तो नेहरू है ना! बक स्टॉप्स देयर.’ – उसने धीमे से कान में कहा –  ‘बौने कद के ओहदेदार और कामकाज की ऊँची मेज़ें,  तो कैसे लिखवाईएगा – ‘बक स्टॉप्स हियर’. फिर वह चला गया.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२२ – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे।)  

☆  चुभते तीर # १२२ – व्यंग्य  – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

चुनाव आते ही देश के नेता इतने विनम्र हो जाते हैं कि सड़क पर चलते कुत्ते को भी नमस्ते कर लें। उनके वादों की लिस्ट इतनी लंबी होती है कि अगर आधी भी पूरी हो जाए तो देश मंगल ग्रह पर अपनी कॉलोनी बना ले। वे हर गरीब के खाते में पैसे, हर हाथ को काम और हर घर को मुफ्त बिजली देने का दावा करते हैं। मंच पर खड़े होकर वे इस तरह दहाड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याएं बस अगले रविवार तक खत्म होने वाली हैं। जनता भी इस तमाशे को ताली बजाकर स्वीकार करती है, क्योंकि उसे पता है कि जीतने के बाद यही नेता पाँच साल तक केवल वीआईपी सुरक्षा के घेरे में दिखाई देंगे। वादे तो वैसे भी टूटने के लिए ही बनते हैं, और नेताओं के वादे तो बिना गारंटी वाले चीनी सामान जैसे होते हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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