(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष— सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “यूँ ही, होली के बहाने, मोबाइल के अफसाने…” ।)
☆ तन्मय साहित्य # ३१४☆
☆ यूँ ही, होली के बहाने, मोबाइल के अफसाने… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “जाएँ तो कहाँ?”।)
जय प्रकाश के नवगीत # १३५ ☆ जाएँ तो कहाँ? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४० ☆
मतलब की रेत पे रखी बुनियाद प्यार की… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ख़ला की जानिब चल पडती है …।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “इस्तेमाल… “।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना।)
☆ लघुकथा # १०३ – आधुनिक ए आई तकनीक और मानवीय संवेदना☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆
कमला अपनी कहानी के रजिस्टर को लेकर पास के साइबर कैफे में गई ।
साइबर कैफे का मालिक उसके बेटे उज्जवल का परम मित्र था।
उज्जवल तो विदेश में नौकरी करने चला गया। अपनी वृद्ध माँ को अकेला छोड़कर।
कमला जी विदेश जाना भी नहीं चाहती थी?
अकेले घर में खाली बैठे हुए बागवानी करती थी और कहानी लिखती थी, अपने जीवन के उतार-चढ़ाव की।
मन में एक विचार आया कि चलो अमन से बात करते हैं।
कमल जी तैयार होकर तुरंत अमर के कैफे में पहुंची।
कमल जी को देखकर अमन ने कहा- “नमस्ते आंटी आप थोड़ी देर बैठ जाइए मैं कुछ फोटो को एडिट कर रहा हूं। बस थोड़ी देर में ही काम खत्म हो जाएगा, फिर आपकी बात सुनता हूँ।”
वे किनारे रखी कुर्सी में बैठ गई उनके बगल में एक 15 साल की लड़की नेट पर कुछ मैटर सर्च करवा रही उन्होंने देखा प्रसिद्ध हिंदी के रचनाकारों की पिक्चर थी, इसलिए उनकी जिज्ञासा बढ़ी। उन्होंने पूछा बिटिया “हिंदी के इन कलम के सिपाहियों के बारे में क्या जानती हो?”
“नहीं आंटी पर मैं इनके बारे में नहीं जाना चाहती स्कूल में मुझे फेमस राइटर के बारे में प्रोजेक्ट बनाने को दिया है।”
कमल जी ने कहा -“बेटा यदि तुम जानना चाहो तो मेरे पास किताबें हैं तुम लेकर प्रोजेक्ट बना सकती हो।”
“हम इंटरनेट यूजर हैं, हमें दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं है।”
आंटी मेरा नाम खुशी है आप मुझे बिटिया न कहें, मैडम ने कहा है, प्रोजेक्ट बनाना है अंकल सभी की फोटो निकालकर बढ़िया सा एक प्रोजेक्ट मुझे बनाकर 1 घंटे में दे देंगे।
इधर-उधर भटकने की और मेहनत करने की मुझे क्या जरूरत है?
कमल जी की ओर देखकर उस लड़की ने बोला -“जाने कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं सलाह देने के लिए?”
कमल जी को बहुत दु:ख हुआ क्योंकि वे सब उनके पसंदीदा लेखक थे वे क्या करती इसीलिए चुप हो गई।
लड़की खुशी ने कहा- अमन अंकल मेरी फोटो तो आपने सब एडिट कर दिए अब एक लेख के साथ अच्छा सा प्रोजेक्ट बना दीजिएगा, वीडियो भी बना दीजिएगा बिल्कुल ऐसा लगे मैं ही बोल रही हूँ। 2 घंटे बाद में आकर ले जाऊंगी एक पेन ड्राइव में सब कर दीजिएगा, पैसे आपको पूरे मिल जाएंगे।
अमन ने कहा -“चार हजार में बढ़िया बन जाएगा।”
उस लड़की ने कहा – ठीक है और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई।
कमल जी ने कहा – “अमन बेटा आजकल बच्चे पढ़ाई-लिखाई कुछ नहीं करते तुम्हारे पास आते रहते हैं इसीलिए इतनी भीड़ है।”
अमन बोल – “हां आंटी आजकल सभी बच्चों के हाथ में मोबाइल है, इंटरनेट भी है सारे सवालों के जवाब पूछते हैं।”
कमल जी ने कहा- ” बेटा फिर इन बच्चों का दिमाग कैसे चलेगा जब किताब पढ़ कर प्रोजेक्ट नहीं करेंगे तो?”
अमन ने कहा – “अरे! आंटी आजकल सारे बच्चे बदल गए हैं, छोटे-छोटे बच्चे भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक का उपयोग करते हैं।”
“ठीक कह रहे हो अमन” – कमल जी ने गंभीर स्वर में कहा।
कमला जी की आंखों में आंसू आ गए रोते हुए उन्होंने कहा-
“आजकल किसी के अंदर कोई भावना और इमोशन नहीं है, रिश्ते भी बदल गए हैं।”
“हाथ में एक छोटा सा जादू पकड़ लिया है मोबाइल नामक राक्षस।”
सारा कुछ इसी में देखते हैं, आजकल लोग एकाकी हो गए हैं, इसी के जरिए लोगों को उल्लू बनाकर पैसे भी मांगते हैं, कुछ दिन पहले बेटा डिजिटल क्राइम के विषय में सुना था।
क्या कोई इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इलाज नहीं करता?
अमन ने कहा -“आंटी अभी तो दुनिया इसी पर चल रही है, जाने कितने युवाओं की नौकरी भी जा रही है भविष्य में देखते हैं क्या होगा?”
कमला जी ने कहा – “बेटा अमन तुम तकनीकी के काम करते हो और हम बुजुर्गों की बात तो सुन लेते हो। भगवान इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जादू से हम सबको बचाए मैं ऐसी प्रार्थना करूंगी।”
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १२ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
रवींद्रनाथांचा जन्म उच्चवर्णीय, गर्भश्रीमंत, जमीनदार व उच्चशिक्षित घराण्यातला. त्यांच्या व्यापक विचारांना जाती धर्माची, वर्ण पंथांची, देश वा राज्याच्या सीमांची बंधनं मान्य नव्हती. ते अखिल मानव जातीच्या भल्याचा विचार करीत. कदाचित् त्यामुळेच समकालीन विचारवंतांच्या मनात त्याच्या विषयी नेहमीच संशयाचे धुके असत असे. परंतु त्यांचं आपल्या देशावर, या वसुंधरेवर निरतिशय प्रेम होतं. त्यांचे विचार प्रगल्भ होते. बुद्धिमत्ता अलौकिक होती. आरशासारखं स्वच्छ मन होतं.
त्यांच्या मते प्रत्येकाला शिक्षणातून स्वतःचा उत्कर्ष घडवण्याचं स्वातंत्र्य मिळायला हवं. ज्ञान प्राप्त करण्याचा अधिकार व समान संधी मिळायला हवी. त्यासाठी देश, प्रांत अशा सीमारेषा नसाव्यात. त्या काळातही ते जागतिकीकरणाचे ध्येय बाळगून होते.
गीतांजलीतील आपल्या ३५ व्या कवितेत त्यांनी अत्यंत सकारात्मक असे हे विचार मांडले आहेत. जेथे जात, पंथ, वर्ण, रूढी, भाषा अशा कोणत्याही भेदभावाच्या भिंती नाहीत, समानता आहे, परस्परांबद्दल आदर आहे, नैतिकता, विवेक, सत्यवचन यांचा अंगिकार करणारं मन आहे अशा विश्वाची, मानवजातीची आस त्यांनी इथे व्यक्त केली आहे.
समाजात भयमुक्त, संघर्ष मुक्त वातावरण असावे. दडपशाहीच्या निंदनीय वास्तवातून बाहेर पडले पाहिजे अन्यथा वाळवंटातील रेती मध्ये रुतल्याप्रमाणे बसावे लागेल. ते ओलांडून गेलो तरच प्रगतीशील भविष्याचा, राष्ट्रीय एकात्मतेचा स्वच्छ प्रवाह निर्माण होईल, जो कधीच थांबणार नाही. एकसंध, निष्पक्ष असा परिपूर्ण भारत, परिपूर्ण जग निर्माण केले पाहिजे.
ते ह्या काव्यातून प्रत्येक मानवासाठी नैतिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक स्वातंत्र्याची मागणी करतात. तसेच वसाहतवादी मानसिकतेविरुद्ध भाष्य करतात. वैयक्तिक, राष्ट्रीय, आंतरराष्ट्रीय, सर्व बंधनांना तोडून जे स्वातंत्र्य लाभेल ते स्वर्गासम असेल. त्या स्वातंत्र्याच्या स्वर्गात माझ्या देशाला जागे कर, अशी ते विधात्याकडे प्रार्थना करतात.
त्यांचे हे काव्य म्हणजे जणू सगळ्या मानवतेला आवाहन आहे. विचारही इतके दूरदर्शी, सार्वकालिक आणि व्यापक आहेत की आजही ते सर्वांना मार्गदर्शक ठरतील. या कवितेने स्वातंत्र्यलढ्याला एक वेगळीच मिती प्राप्त करून दिली. स्वातंत्र्य म्हणजे फक्त सत्ता बदल नाही. तर भयमुक्त समाज निर्माण करणे जेथे परस्परांबद्दल आदरभाव असेल, समानता असेल.
हे काव्य संपूर्ण विश्वात गाजले कारण यातील विचार वैश्विक आहे. यात सामूहिक प्रबोधनाचे आवाहन आहे. न्याय्य, खुल्या भयमुक्त मानवी जगाच्या निर्मितीचं आवाहन आहे. ही कविता फक्त भारतातच नाही तर बांगलादेशातही पाठ्यपुस्तकातून शिकवली जाते.
सन १९१७ च्या कलकत्ता येथे झालेल्या इंडियन नॅशनल काँग्रेसच्या अधिवेशनात स्वतः रविंद्रनाथांनी ही कविता ‘इंडियन प्रेअर’ म्हणून प्रस्तुत केली होती. तिचं सिंहीली भाषेतही भाषांतर झालं आहे. सन १९१० च्या आधी त्यांनी ही कविता बंगाली भाषेत लिहिली होती. नंतर त्यांच्या ‘नैवेद्यम्’ या कवितासंग्रहातून ‘प्रार्थना’ या शीर्षकाखाली ती प्रसिद्ध झाली. ही मूळ कविता क्रांतिकारी वळणाची व अधिक आवेशपूर्ण होती. तिचे इंग्लिश मध्ये भाषांतर करताना टागोरांनी त्यात
काही बदल करून ती बरीच
सौम्य केली आहे.
—–
☆ गीत ३४ ☆
LET only that little be left of me whereby I may name thee my all.
Let only that little be left of my will whereby I may feel thee on every side, and come to
thee in everything and offer to thee my love every moment.
Let only that little be left of me whereby I may never hide thee.
Let only that little of my fetters be left whereby I am bound with thy will, and thy purpose
is carried out in my life ⎯ and that is the fetter of thy love.
WHERE the mind is without fear and the head is held high;
Where knowledge is free; Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls; Where words come out from the depth of truth; Where tireless striving stretches its arms towards perfection;
Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit; Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action ⎯
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “नौके बेइ वकील भये हैं“।)