हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # १९८ ☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ. संजीव कुमार जी द्वारा लिखित  व्यंग्य का मनोविज्ञानपर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# १९८ ☆

☆ “व्यंग्य का मनोविज्ञान…” – लेखक – डॉ. संजीव कुमार ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक चर्चा 

पुस्तक – “व्यंग्य का मनोविज्ञान”

लेखक – डॉ संजीव कुमार

प्रकाशक – इंडिया नेटबुक्स, नोएडा

एक सर्वथा नए अनछुए विषय पर और विश्वसनीय कृति के रूप में डा संजीव कुमार की नई किताब “व्यंग्य का मनोविज्ञान”लिखी गई है।  व्यंग्य को मात्र साहित्यिक विधा न मानकर उसे मनुष्य और समाज के अंतर्मन से जोड़कर देखती यह पुस्तक व्यंग्य को हँसी का साधन नहीं बल्कि सामाजिक आत्मावलोकन और मनोवैज्ञानिक फीडबैक मैकेनिज्म के रूप में स्थापित करती है ।

पुस्तक की संरचना पहचानने योग्य अकादमिक अनुशासन के साथ रची गई है। भूमिका के बाद आरम्भिक अध्यायों में लेखक ने व्यंग्य का स्वरूप उसकी परिभाषा और उसके मूल तत्त्वों जैसे विडंबना अतिशयोक्ति प्रतीक न्यूनोक्ति उपहास और व्यंग्यात्मक भाषा का विस्तार से विवेचन किया है।

व्यंग्य को वह ऐसी साहित्यिक अभिव्यक्ति मानते हैं जो किसी व्यक्ति विचार संस्था या समूचे समाज पर प्रहार करती हुई भी मूलतः सामाजिक सुधार की दिशा में उकसाने का काम करती है।

इस दृष्टि से व्यंग्य उनके लिए सामाजिक चेतना का सक्रिय माध्यम बन जाता है जो मनोरंजन के परदे के पीछे छिपे असुविधाजनक सत्य को पाठक के सामने लाता है।

ग्रंथ का दूसरा बड़ा आयाम व्यंग्यकार के मनोविश्लेषण से जुड़ा है। डॉ संजीव कुमार व्यंग्यकार की एक मानसिक संरचना की रूपरेखा खींचते हैं जिसमें समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता भीतर जमा असंतोष नैतिक आग्रह विद्रोही वृत्ति हास्यबुद्धि और न्याय बोध ये सभी तत्व सम्मिलित हैं। यही कारण है कि अपनी अनुभूति के अनुरूप हर व्यंग्यकार एक ही विषय पर अलग अलग तरह से व्यंग्य लिखता है।

व्यंग्यकार  केवल चुटकुला रचयिता नहीं बल्कि एक सजग और विश्लेषक व्यक्तित्व है जो सत्ता संरचनाओं रूढ़ मान्यताओं और ढोंग के साथ स्वयं अपनी कमजोरियों तक को व्यंग्य के दायरे में रखता है।

व्यंग्यकार की इस आत्म समावेशी दृष्टि को लेखक व्यंग्य का एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक गुण मानते हैं जो उसकी विश्वसनीयता को बढ़ाता है।

एक अलग खण्ड में संजीव जी व्यंग्य और पाठक के मनोविज्ञान के संबंध पर विस्तार से चर्चा करते हैं। उनके अनुसार व्यंग्य पाठक या दर्शक में एक साथ तीन तरह की प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है पहली हँसी और मनोरंजन जो भावनात्मक तनाव को ढीला करते हैं दूसरी अपराध बोध और आत्म चिंतन जो व्यक्ति को अपनी भूमिका पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करते हैं और तीसरी परिवर्तन की आकांक्षा जो समाज के स्तर पर प्रतिरोध प्रश्नाकुलता और सुधार की इच्छा को जन्म देती है।

इस त्रिस्तरीय प्रभाव के कारण व्यंग्य उनकी दृष्टि में बड़ी ताकत से अपनी भूमिका निभाता है।

पुस्तक की एक विशेष शक्ति यह है कि व्यंग्य को वह अलग थलग साहित्यिक कोष्ठक में नहीं रखते बल्कि उसे सामाजिक सांस्कृतिक संरचनाओं के बीच रखकर पढ़ते हैं। धर्म परम्परा जाति वर्ग आर्थिक असमानताएँ और पितृसत्ता इन सबके साथ व्यंग्य का जटिल संबंध लेखक की निगाह से छूटा नहीं है।वे दिखाते हैं कि कैसे संस्कार रीति रिवाज पारिवारिक ढाँचे लैंगिक भूमिकाएँ और भाषिक परिस्थितियाँ व्यंग्य की दिशा और लक्ष्य तय करती हैं और इसके उलट व्यंग्य इन संरचनाओं की कमजोर कड़ियों पर चोट करके नए प्रश्न और नई दृष्टि  निर्मित करता है।

इस द्वंद्वात्मक पाठ के कारण पुस्तक केवल थ्योरी ऑफ सैटायर नहीं रह जाती बल्कि सोशल साइकोलॉजी ऑफ सैटायर का रूप ले लेती है।

समकालीन परिप्रेक्ष्य में लेखक विशेष रूप से डिजिटल युग के व्यंग्य पर लिखते हैं। सोशल मीडिया मीम संस्कृति स्टैंड अप कॉमेडी और ऑनलाइन कार्टूनों की तेज़ी से बदलती दुनिया के बीच व्यंग्य का स्वर गति और पहुँच किस प्रकार बदल गई है यह पुस्तक का एक रोचक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है। लेखक मानते हैं कि इन माध्यमों ने व्यंग्य को जनतांत्रिक और त्वरित जरूर बनाया है लेकिन साथ साथ इसने सतहीपन ट्रोलिंग समूह घृणा और नैतिक असंवेदनशीलता जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ाई हैं।

वे जिम्मेदार व्यंग्य के पक्ष में खड़े होकर यह ज़रूरत रेखांकित करते हैं कि हास्य और आलोचना दोनों के प्रयोग में मानवीय गरिमा संवेदनशीलता और निष्पक्षता के मूल्यों को न छोड़ा जाए।

पुस्तक का एक पूरा खण्ड व्यंग्य और नैतिकता के बीच नाज़ुक संतुलन पर केंद्रित है। यहाँ लेखक व्यंग्यकार के नैतिक दायित्वों की सूची तैयार करते हुए उसे सत्यनिष्ठ संवेदनशील निष्पक्ष और सुधारोन्मुख रहने की सलाह देते हैं। व्यंग्य के प्रहार का लक्ष्य व्यक्ति की गरिमा नहीं उसके असंगत आचरण और शोषक भूमिका हो यह पुस्तक बार बार स्पष्ट करती है।व्यंग्यकार को वे आक्रामक मनोरंजनकर्ता नहीं बल्कि उत्तरदायी सामाजिक हस्तक्षेपकर्ता के रूप में देखने का आग्रह करते हैं जो हास्य का सहारा लेकर भी अंततः न्याय समानता और मानवीयता की तरफ खड़ा होता है।

लेखन शैली की दृष्टि से पुस्तक मानक हिन्दी में लिखी गई है जिसमें अकादमिक अनुशासन के साथ साथ उदाहरणों और उपमानों का संयमित प्रयोग है। भाषा प्रभावी और स्पष्ट है ।  यह ग्रंथ सामान्य मनोरंजक पाठ से अधिक शोधार्थियों अध्यापकों तथा गंभीर लेखकों पाठकों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। विषय सूची से लेकर अंतिम अध्याय तक एक क्रमबद्धता बनी रहती है पहले व्यंग्य की परिभाषा और स्वरूप फिर व्यंग्यकार की मानसिकता उसके बाद पाठक समाज पर प्रभाव और अंत में डिजिटल युग नैतिकता तथा भविष्य की चुनौतियाँ यह क्रमिक विन्यास अध्ययन को सुगठित बनाता है।

पुस्तक में कुछ संभावित सीमाएँ भी संकेतित की जा सकती हैं। विश्लेषण का जोर लगभग पूरा सैद्धांतिक विमर्श पर है यदि समकालीन हिन्दी व्यंग्य कृतियों के अधिक विशिष्ट और विस्तृत पाठ विश्लेषण उदाहरण और उद्धरण यहाँ जोड़े जाते तो यह पुस्तक पाठ्य स्तर पर और भी प्रभावी हो सकती थी।

इसी तरह लेखक मनोविज्ञान की अवधारणाओं का व्याख्यात्मक उपयोग  करते हैं । प्रयोगात्मक या क्षेत्रीय अध्ययन पाठक सर्वे या केस स्टडी जैसी अनुसंधान विधियाँ जोड़ी जा सकती हैं । अभी यह मनोविज्ञान की व्याख्यात्मक शाखा पर ही अधिक आश्रित किताब बन गई है।

व्यंग्य का मनोविज्ञान हिन्दी व्यंग्य चिंतन में एक महत्त्वपूर्ण और आवश्यक ग्रंथ की तरह अपनी तरह की पहली किताब है। यह व्यंग्य को हँसी आलोचना मनोविज्ञान समाजशास्त्र और नैतिक दर्शन के संगम बिन्दु पर रखकर प्रस्तुत करती है । 

व्यंग्य लिखने वाले रचनाकारों के लिए यह पुस्तक अपने शिल्प और अपनी जिम्मेदारी को समझने का मार्गदर्शक बन सकती है आलोचकों और शोधार्थियों के लिए यह एक ठोस सैद्धांतिक आधार और गंभीर पाठकों के लिए व्यंग्य पठन के नए कोण खोलने वाला पाठ है।

यह कृति केवल व्यंग्य का मनोविज्ञान नहीं बल्कि व्यंग्य की समग्र मानसिक सामाजिक और नैतिक संरचना का सुविचारित मानचित्र प्रस्तुत करती है ।  हिन्दी साहित्य में दीर्घकालीन संदर्भ ग्रंथ बनने की क्षमता रखती है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नारी तेरी अजब कहानी। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २११ – नारी तेरी अजब कहानी ☆

नारी तेरी अजब कहानी,

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

बचपन में तो उछल कूदती,

घर आँगन में दौड़ लगाती।

देहरी के बाहर जाते ही-

अविरल आँसू रोज बहाती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अगनी में जब चाहे जलती,

तेजाबों से रोज नहाती।

सदियों से तू भोग रही है,

प्रतिक्षण हिंसक नई कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

अग्नि परीक्षा देते देते,

सदियाँ बीत गयी हैं तुझको।

अंगारों पर फिर भी चलती,

अपने मुख से उफ् न करती।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

हर समाज है शोषण करता,

अधिकारों से वंचित रखता।

कर्तव्यों का पाठ बताकर,

तोते सा पिंजड़े में रखता।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

धर्म के आगे तू हलाल है,

मानवता भी शर्मसार है।

आजादी अभिव्यक्ति नाम पर,

अब भी बुर्कों में जकड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

कुछ बोला तो तीन शब्द में,

जब चाहे बनवास घड़ी है।

परिवर्तन की हर आँधी से

कब से कोसों दूर खड़ी है।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

चीर हरण अब भी होते हैं,

भीष्म द्रोण दुबके बैठे हैं।

भोग्या बनकर भोग रही है,

आदम युग से वही कहानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

 *

आँचल से तो दूध पिलाती,

पर आँखों से बहता पानी।

नारी तेरी अजब कहानी…

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ – ख्वाहिशों की होली ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “ख्वाहिशों की होली”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५६ ☆

🌻लघु कथा🌻 ख्वाहिशों की होली🌻

शहर के बीचो-बीच जहाँ से चारों तरफ रास्ते मोड निकलते हुए चले जाते हैं रह जाती है बस ख्वाहिशें।

कुछ यादें और एक सफर जो कभी यहाँ से वहाँ, कभी वहाँ से यहाँ, आज सृष्टि के पास फिर वही बात थी— बेतहाशा प्यार करने वाला पति, भरा पूरा परिवार, खुलकर जी लेने की चाहत और मन में न जाने कितने सपने उमंगों को लेकर वह चल पड़ी थी, पिया के घर अनजाने ही सही जिस डोर से वह बँधने जा रही थी, शायद उसे वह भी नहीं जान सकी थी– उसे बसंत, फाग और होली का रंग चढ़ने लगा था।

वह और भी उतावली होकर उस पल का इंतजार कर रही थी कि जिस पल वह अपने पिया के रंग में रंग, सारी दुनिया को अबीर की चमक और सतरंगी धनुष सी सरपट भागती, शायद बादलों की ओट में छिपती हुई ख्वाहिशें सपनों के साथ बुन चली।

अनजाने में वह कुछ भी न जान सकी। जिसे उसे जानने का अधिकार था। जान सकी तो बस वह इतना ही कि उसका पति अपना नहीं किसी और का है। होली के मस्ती प्यार का रंग, ढोल नगाडे के बजाने की आवाज और खुलकर जी लेने की चाहत, आज इन सब ख्वाहिशों को वह फिर से उसी चौराहे पर होलिका में जला देना चाह रही थी।

जहाँ से वह आरंभ हुआ था। इसी अनजाने मोड़ पर वह समीर से मिली थी। पल-पल मिलन और मिलन के बाद ख्वाहिशों को आजाद परिंदों की तरह उड़ने का सपना दिखा वह छोड़ चला इस मोड़ पर जहाँ पर होलीका जल रही थी।

सृष्टि अपने साथ हुए जख्मों को नहीं भर सक रही थी—- कि किस कदर वह परिवार के बड़े बुजुर्गों के मना करने के बाद भी समीर के साथ घर बसाने की सोच रही थी, परंतु समीर तो एक हवा का झोंका था न जाने कब आया जिंदगी में और जब गया तो फिर कब आएगा।

वह सोच- सोच कुछ सामानों को जो सहेज कर रखी थी। पेपर के पन्नों के साथ लपेट ले चली होलिका में जलाने। अपने ख्वाहिशों की होली का जलन, शायद यही उसकी होली थी।

गाना बजने लगा–होलिया में उड़े रे गुलाल – – –

ख्वाहिशों का रंग गुलाबी क्यों नहीं होता। क्यों मनचाहे रंग भरने लगते हैं????

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६७ – देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६७ ☆ देश-परदेश – चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆

डोकरी की चाय हो या डोकरे की चाय, इस को बेचने वाले फुटकर दुकानों ने भी नए से नए नाम रख लिए हैं। गुलाबी नगर जयपुर में एक चाय की दुकान “आर ए एस चाय वाला” लिखा हुआ था, हमने उसके मालिक से पूछा इस का क्या तात्पर्य होता है ?

वो तुनक कर बोला “आई ए एस” चाय वाले  से जाकर पूछो ? उसकी दुकान पर अपनी मित्र मंडली के साथ चाय पीने का कार्यक्रम था। दुकानदार ने एक और बाण छोड़ दिया। कि ये “एम बी ए” चाय वाला ब्रांड अपनी फ्रेंचाइजी पूरे देश में खोल रहा हैं, हमारे नाम पर प्रश्न क्यों ?

चाय की छोटी छोटी दुकानों को भी अब नाम की क्यों आन पड़ी ? समय ही ऐसा चल पड़ा है, खाद्य वस्तुएं जैसे आटा, बेसन, चावल, सत्तू इत्यादि भी अब ब्रांड के टैग से विक्रय किए जा रहें हैं।

दिल्ली से जयपुर सड़क मार्ग पर एक दशक पूर्व तक अनेक चाय की गुमटियां हुआ करती थी, अब सब बंद हो चुकी हैं। एक कप चाय के लिए भी किसी बड़े ढाबे जो अब विशाल रूप लेकर बड़े बड़े होटलों को मात दे रहें है, से ही आपकी च्यास (चाय की तलब) पूरी हो सकती हैं।

स्पष्ट है, साधारण खाद्य वस्तुएं भी बड़े और कॉरपोरेट सेक्टर की झोली में जा चुकी हैं। इसी चक्कर में हमारी दो रुपए की चाय दस रुपए से पंद्रह की हो जाएगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३१८ ☆ शब्द कळ्यांचा गजरा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३१८ ?

☆ शब्द कळ्यांचा गजरा… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

शब्द कळ्यांचा गजरा, ठेवलाय कागदात

कागदातील सुगंध, डोळ्यातुन मस्तकात

*

मेघ भरुनिया आले, गगनाच्या अंगणात

प्रीत येणार धावत, चल खेळू पावसात

*

पूर नदीस छेडतो, आणि वादळात नाव

अडकले मीही आज, प्रीतभऱ्या भोवऱ्यात

*

चंद्र दिसणार आहे, प्रश्न सुटणार आहे

चार दिसाची आवस, चंद्र पुन्हा हा भरात

*

भिती दावते रजनी, नको घाबरुन जाऊ

तुळशीचे रोप तिथे, ज्योत लाव अंगणात

*

पाने पिवळी पडली, शिशिरात होती जरी

त्यांचा नम्रपणा बघ, पायाशीच रमतात

*

आहे तरणा निसर्ग, जगामध्ये युगे युगे

चिरंजीवी वरदान, नसे मरणाची बात

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… भाग – – ७८ – जोहार मायबाप जोहार ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… भाग – – ७८ – जोहार मायबाप जोहार ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

“माझी जडणघडण” ही मालिका मी जवळजवळ गेली दीड वर्षे लिहीत आहे. सुरुवातीला हे एक आव्हान म्हणून स्वीकारताना मी खूप साशंक होते. मूळातच मी, ” हे का लिहावं? ” हा प्रश्न माझ्या मनात होता. कारण स्वतःविषयी काही लिहावं आणि ते वाचकांकडून वाचलं जावं इतकी मी कुणी प्रसिद्ध अथवा वलयांकित व्यक्ती नाही. चार चौघींसारखंच माझं जीवन. पण आयुष्यातील अनुभवांविषयी, जीवन जगताना जे जे जाणवले ते लिहावं असं वाटलं आणि मी तसा प्रयत्न करायचं ठरवलं.. ”

मग अक्षरशः मी माझा भूतकाळ, वर्तमान काळ आणि भविष्यकाळही जवळ घेऊन बसले. अदृश्यपणे माझ्याच आयुष्याचं गाठोड सोडवलं आणि मग त्या प्रवाहात लिहिता लिहिता स्वतःला खरोखरच झोकून दिलं.

– – वास्तविक “माझी जडणघडण” ही ७७ भागांची मालिका म्हणजे माझे आत्मवृत्त आहे असे मी मुळीच म्हणणार नाही. आयुष्याच्या निरनिराळ्या टप्प्यांवर आलेल्या कडू, गोड, आंबट, तुरट अनुभवांचं भेटलेल्या अनेक व्यक्तींचं माझ्या जडणघडणीत काय योगदान ठरलं याचं मी बारकाईने निरीक्षण केलं, काहीसं चिंतनही केलं आणि माझ्या दृष्टीने मला जे वाटलं ते तुम्हा वाचकांसमोर अगदी प्रांजळपणे ठेवलं.

ही मालिका लिहिताना आणि विशेषतः भूतकाळात शिरताना मला सुद्धा नक्कीच खूप आनंद मिळाला. तेव्हा न जाणवलेलं लिहिताना जाणवलं. हरवलेलं कितीतरी, दडून बसलेलं काहीतरी गवसत गेलं आणि जीवन पुन्हा नव्याने कळत गेलं. प्रत्येक लेख लिहिताना मला हे वाटायचं की, ” यात तसं विशेष काय आहे? ” पण ज्या ज्या वेळेला वाचकांचे उत्स्फूर्त प्रतिसाद मिळायचे त्यावेळी मी मनोमन हरखून जायचे. वाचकांचा या मालिकेला खरोखरच उदंड प्रतिसाद मिळाला. कुठेतरी वाचकही माझ्या या लेखनाशी रिलेट व्हायचे. त्यांच्या जीवनातलेही संदर्भ ते या लेखनात पडताळून बघायचे. अभिप्रायासोबत तेही त्यांच्या आयुष्यात आलेले अशाच प्रकारचे अनुभव मला सांगायचे. कित्येकांचे फोनही यायचे. काहीजण वैयक्तिक मेसेजेसमधून त्यांच्या भावना व्यक्त करायचे आणि हे सगळंच माझ्यासारख्या सामान्य लेखिकेसाठी खूपच भारी होतं. माझ्या अनुभवात त्यांचेही अनुभव मिसळत माझ्या जडणघडणीचा आणखी एक नवाच प्रवास त्यामुळे सुरू व्हायचा.

“पुढील भागाची प्रतिक्षा करत आहोत. ”हे वाचकांचं वाक्य माझ्यासाठी खूप प्रेरणादायी असायचं.

या लेखनानिमित्ताने अनोळखी ओळखींमधून त्यांच्या हृदयीचे खरेखुरे बोल वाचून, ऐकून मीही प्रत्येक वेळी खरं म्हणजे अधिक समृद्ध होत गेले. अनेक नवी दालनेत जणू काही माझ्यासाठी उघडली गेली. त्यामुळे माझ्या या वाचक वर्गाची मी खूप ऋणी आहे. माझ्या लेखनातून मी त्यांना काय दिलं यापेक्षा त्यांच्या प्रांजळ मनापासून लिहिलेल्या प्रतिक्रियेतून मला मात्र खूप आनंद मिळाला. सुरुवातीला जे वाटत होतं की “मी हे का लिहावं? ” ही भावनाच गळून गेली. या लेखनाच्या माध्यमातून मला खूप मोठा मित्रपरिवार लाभला आणि मी अक्षरशः त्यांच्याशी मनमोकळ्या गप्पा केल्या. माझ्या मनातल्या अनेक प्रश्नचिन्हांनाही मी वाट मोकळी करून दिली. हा साराच आनंद खरोखरच अवर्णनीय होता.

खरं सांगू का? तसा हा जडणघडणीचा प्रवास न संपणाराच आहे. याचं शेवटचं स्थानक म्हणजे आपला शेवटचा श्वास. आज मागे वळून पाहताना ज्यांनी माझं बोट धरून जीवनरूपी आकाशातले तारे मला पाहायला शिकवलं ते हात लुप्त झालेले जाणवत असले तरी आयुष्याची उरलेली वाट नव्या पिढीच्या हाताला धरून चालतानाही पुन्हा एकदा जडणघडणीचाच प्रवास सुरू असल्याची भावना मनात प्रबळ होते. जगत असताना संस्कार म्हणून सहजपणे ज्यांना मी माझ्यातलं दिलं त्यांच्याच सोबतीने पुन्हा माझ्यावरच संस्कार होत असल्याचं अनुभवते तेव्हाही हेच वाटतं की हे संस्काराचं पात्र केवढं मोठं आहे! अनंत आहे, न संपणारं आहे म्हणूनच म्हणते ही जडणघडणीची मालिका न संपणारी आहे. सांगायचं असं काहीतरी खूप बाकी आहे आणि पुढेही ते बाकीच राहणार आहे. काल घडलं, आजही काही घडणार आहेच आणि पुढेही घडेल.. म्हणून आता इथेच थांबायचं मी ठरवलंय. तुमचा प्रेमळ निरोप घेत आहे. या संपूर्ण मालिकेच्या प्रवासात वाचकहो! तुम्ही दिलेली साथ माझ्यासाठी केवळ अनमोल आहे. धन्यवाद तरी कसे देऊ? तुमच्या कायम ऋणातच मी राहीन. हेच नम्रपणे म्हणावसं वाटतं..

।।जोहार मायबाप जोहार

तुमच्या महाराचा मी महार

बहु भुकेला झालो

तुमच्या उष्ट्यासाठी आलो।।

तेव्हा मित्रहो! आता निरोप घेते. चूक भूल द्यावी घ्यावी. सदैव एकमेकांच्या स्मरणात मात्र नक्कीच राहू.

बाsssय!

– समाप्त –

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७३ – पहचान ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – पहचान।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७३ – पहचान ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

मुझे भी आता है जोर से बोलना

मैं भी दे सकता हूँ

चुभता हुआ जवाब,

मुझे भी याद हैं गालियाँ

मैं भी तोड़ सकता हूँ

किसी के हाथ-पाँव

मैं भी सन्ना सकता हूँ पत्थर ।

मगर मैं

यह सब नहीं करता

करूँगा भी नहीं,

बात सिर्फ इतनी सी है

कि मैं

अपनी पहचान नहीं खोना चाहता।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७२ – “ऋतु का संसार…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत ऋतु का संसार...”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७२ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ऋतु का संसार...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

(पैंतीस वर्ष पहले का नवगीत)

यह शीतल –

फरवरी ।

 

काँटों से घर –

आँगन झार ।

टाँक रही

ऋतु का संसार ।

 

फिर –

संगेमरमरी ॥

 

भीगी साँसों

का अहसास ।

पढ़ता हो जैसे

मधुमास –

 

आईने –

अकबरी ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16-02-2026 

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५९ ☆ व्यंग्य – “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए…” ।)

☆ शेष कुशल # ५९ ☆

☆ व्यंग्य – “इंद्रलोक से कल्पना का पूर्वलोक निहारते हुए – शांतिलाल जैन 

विक्रम सम्वत् 2103, भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी, दिनांक 18 अगस्त, 2047, रविवार. इंद्रलोक में आज साप्ताहिक अवकाश है. सभा में अप्सराएँ नृत्य करने नहीं आएँगी. देव छोटे छोटे समूह बनाकर अनौपचारिक विमर्श में लीन थे. एक छोटे से समूह में देव अपने पूर्वलोक में सर्वत्र बिखरे विकास का आलोक निहार रहे हैं.

विकसित जंबूद्वीप. जितना दृश्य उनके नेत्रों में समा पाता है सड़कें ही सड़कें दिखाई पड़तीं हैं. नश्वर संसार में अविनाशी राजमार्गों का चमचमाता विशाल जाल देखकर मन पुलकित हो उठा है. नीली छतरी के पार से जिस तरफ दृष्टि जितनी दूर तक जा पाती है पिछड़ेपन की कोई निशानी दिखाई नहीं पड़ती, न वन और न वन्य जीव, न चौपाए, न पक्षी, न खेत, न नदी, न तालाब, न झरने, न पहाड़, न हरे-भरे खेत, न लहराती फ़सलें, न हरीतिमा के विस्तार, न छोटे गाँव, न मिट्टी के घर. इन सब को एक संग्रहालय में समेट दिया गया जिसे आप वर्किग-डे में 11 से 5 के बीच टिकट खरीदकर देख सकते हैं. बहरहाल, देव देख पा रहे हैं तो बस तेज़ रफ्तार मोटरें, हैचबैक,  सेडान,  प्रीमियम सेडान, टेस्ला, बीवाईडी,  लिमोजिन,  फ्लाईओवर, टोल प्लाज़ा, लेन-ही-लेन, सड़कें-ही-सड़कें. कहीं कहीं खुली जगह के टापू जो दीख रहे हैं उन पर भी धड़ल्ले से सड़क निर्माण का कार्य चल रहा है. खुली जगह एक इंच बचेगी नहीं. लेन के दोनों ओर चमचमाते रिसोर्ट, ढ़ाबे और रिट्रीट दृष्टिगोचर हो रहे हैं. हर लेन में वाहनों की लम्बी कतारें, कतारों में दौड़ता विकास, तेज़ी से घूमते टायरों से घरघराती आवाज़ निकालता विकास, ओजोन परत में छेद करता विकास, कार्बन से धरती को तप्त करता विकास. कुछेक वर्ष पूर्व तक कितना पिछड़ा हुआ था उनका अपना पूर्वलोक!! युगों युगों से जम्बूद्वीप की राजसत्ता पर्यावरण बचाने के फेर में विकास की उपेक्षा करती रही, अब सब ठीक हो गया लगता है.

एक अन्य देव ने कहा – ‘वह पर्वत भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जिसकी कंदराओं में बैठकर हमने घोर तपश्चर्या की थी.’

‘हाँ देव, वह उस ओर था. अब उसे समतल कर सड़क बना दी गई है. राष्ट्रीय राजमार्ग. एनएच-92947. राजमार्गों ने शतकों का शतक पूरा कर लिया है. राजमार्ग भी कितने चौड़े, बाप-रे-बाप!! उस ओर दृष्टि डालिए देव, आपके नेत्र खुले-के-खुले रह जाएँगे. दिल्ली मुंबई राजमार्ग. चार सौ बत्तीस लेन का. दो सौ सोलह लेन पर जानेवाली गाड़ियाँ, दो सौ सोलह लेन पर आनेवाली गाड़ियाँ. इसे कहते हैं विकास!’

‘वह आश्रम भी दृष्टिगोचर नहीं हो रहा जहाँ इंद्र हमारी तपस्या में विघ्न उत्पन्न करने के हेतु से ऋषि कन्याएँ डेपुट किया करते थे. वह अरण्य भी दिखाई नहीं दे रहा जहाँ हम वानप्रस्थ के लिए निकले थे और नश्वर देह का विसर्जन किया था.’

‘हाँ देव, पहले वहाँ रिसोर्ट बना, अब एक चमचमाता मॉल बन गया है. जंबूद्वीप इतना विकसित तब हो गया होता तो हम वानप्रस्थ में जाते ही क्यों. फ़ाईवस्टार ओल्ड एज होम में जीवन का अंतिम समय गुजार लेते.’

विमर्श के दौरान देवों को अपने पूर्वलोक में चौड़ी होती जाती सड़क की निरंतर बहती धाराओं को अवलोकित कर गर्व की अनुभूति हो रही थी. मगर तभी, एक देव का कमल सदृश मुख मुरझाने लगा. वे बोले – ‘सब कुछ अच्छा है मगर पर्यावरण लील लिए जाने का दुःख लग रहा है!!’

‘आपका भाग्य अच्छा है देव, आप यहाँ बैठकर पर्यावरण पर रंज प्रकट कर रहे हैं. जंबूद्वीप में करते तो टूलकिट उपयोग करने के आरोप में कारागार में डाल दिए जाते. बरसों नागरिकों ने चार फुटिया सड़क का अभिशाप झेला है, अब वे चार सौ बत्तीस लेन की सड़क आनंद उठा रहे हैं, और आप हैं कि पर्यावरण का रोना लेकर बैठ गए हैं.’

‘तो क्या देव जंबूद्वीप के सभी नागरिकों ने ऐसा ही राष्ट्र चाहा था ?’

‘नहीं देव. एक्टिविस्ट का छोटा सा समूह था वहाँ, अर्बन नक्सली कहाता था. वो उन दीन-हीन मनुष्यों की पक्षधरता में खड़ा रहता जिनका जल, जंगल, जमीन सब छिनता चला जा रहा था. वो कभी जैव-विविधता की बात करता, कभी अल-नीनो की. विकास उसे सुहाता नहीं था. आंदोलनजीवी कहाता. वो घर और भूमि से बेदख़ल किए जाने वाले नागरिकों के लिए आंदोलन करता. धरती बचाने की पहल करते करते राजसत्ता से भिड़ जाता. लेकिन राज्य व्यवस्था के कर्ण पर कभी जूँ नाम का प्राणी रेंगा भी नहीं. विकास थमा नहीं देव, और थमेगा भी नहीं. चार हज़ार बत्तीस लेन की सड़क की डीपीआर रेडी है. जनसामान्य का मानस बना दिया गया है कि वे सड़क-निर्माण को ही विकास का पर्याय मान लें. जंबूद्वीप में वे ही नागरिक बचे रह पाएँगे जो विकास के संग-संग दौड़ लगा पाने के सक्षम हों, शेष तो बस…..’

अर्बन नक्सली टाईप के देव को छोड़कर शेष सभी ने जंबूद्वीप के अतिविकसित हो जाने पर गहरा संतोष व्यक्त किया और विमर्श को विराम देते हुए अपने अपने वैमनिकों में प्रस्थान कर गए.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता चुप रहने की सजा पाई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆

☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆

हमने चुप रहने की सजा पाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

 

जब भी चाहा कि कुछ बोलें

जब भी चाहा कि मुंह खोलें

देखकर हवाओं का मंजर

चूभो  रही है जैसे खंजर

भावनाएं हो गई है बंजर

कशमकश है अंदर ही अंदर

जिव्हा में ताला लग गया है

मन में अंजाना सा डर जग गया है

आंखों के आगे धुंध छाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

चिड़ियों ने चहचहाना छोड़ दिया

कलियों ने भंवरों का दिल तोड़ दिया

फूल भी बेरंग हो गए अब

बगीचे बेढ़ंग हो गए अब

पतझड़ श्रृंगार को लुट गया

बहार का मौसम रूठ गया

चमन पर वीरानी छाई है

यह कैसी रुत आई है

हर तरफ बस तबाही तबाही है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

भूख और प्यास की कहानी है

बड़ी बेरहम यह जिंदगानी है

भरी जवानी में हाथ कट गए

बेरोजगारी से हम पट गए

आंखों में बहता हुआ पानी है

डिग्रीयां  अब तो बस बेमानी है

उम्मीदें ना उम्मीदगी में ढल गई

इच्छाएं आकांक्षाएं देखते देखते जल गई

जिंदगी किस मुकाम पर लाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई हैं

 

क्या समय के साथ व्यवस्था बदलेगी ?

क्या कटरता की बर्फ पिघलेगी ?

हमारा दुख दर्द कोई समझ पाएगा ?

हमारे लिए कोई आवाज उठाएगा ?

क्या वाटिका में रंग-बिरंगे फूल खिलेंगे ?

लोक कटुता भूलकर एक दूसरे के गले मिलेंगे ?

क्या  नई किरण खुशियों का संदेश लाएगी ?

क्या चुप्पी तोड़ जिव्हा कुछ कह पाएगी ?

नई सुबह ने हर दिल में उम्मीद की ज्योत जलाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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