हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४० – बुन्देली कविता – ”बे गुस्सा सें हेरत जा रय” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४० – बुन्देली कविता – “बे गुस्सा सें हेरत जा रय“ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

☆

बे गुस्सा सें हेरत जा रय

कैंसी आँख तरेरत जा रय

*

मौंड़ा ऐंसे गर्रेला हैं

बे भग रय, हम टेरत जा रय

*

एक तरफ सें लेने पर हैं

तुम तौ बिही नबेरत जा रय

*

कइयक ढुरवा बिदक जात हैं

येई सें बे घेरत जा रय

*

मैं लड़ाइ खें बरका रव हों

बे उनखें उसकेरत जा रय

*

काम-धाम नइँ करें निठल्ले

बउ-दद्दा खें पेरत जा रय

*

मोरे करे-धरे पे देखौ

‘भगवत’ पानी फेरत जा रय

☆

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१३ – जीवन में सम्मान की ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में सम्मान की”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१३ – जीवन में सम्मान की ☆

☆

जीवन में सम्मान की, सबको रहती चाह।

अगर दाम है जेब में, आसाँ है तब राह।।

*

सम्मानों का है सजा, मनचाहा बाजार।

छोटा बड़ा मझोल है, बोली लगें हजार।।

*

हर आयोजक चाहता, लक्ष्मी का वरदान।

सरस्वती को तब मिले, मन चाहा सम्मान।।

*

संयोजक की चाहना, श्रोता दर्शक मंच।

संसाधन बिन शून्य है, कैसे होगा लंच।।

*

अतिथि मंच पर बैठते, पहले तो नाराज।

करतल ध्वनि जब गूँजती, मन में बजते साज।।

*

मंचों पर जो बैठते, संस्थाओं में ज्येष्ठ।

या वरिष्ठ हों आयु में, तो ही होते श्रेष्ठ।।

*

वक्ता अपने ज्ञान की, घुटी पिलाता घोल।

श्रोता सारे मौन हो, शब्द सुने अनमोल।।

*

ज्ञानवान होते वही, बोलें मधुमय बोल।

श्रोताओं की दाद से, प्रवचन दें दिल खोल।।

*

दर्शक श्रोता सामने, लेते हैं आनंद।

आपस में वे तौकबलते, खट्टा मीठा कंद।।

*

कुछ तो केवल चाहते, अच्छा खासा लंच।

तृप्ति भाव पर ही कहें, अति उत्तम है मंच।।

*

हम तो बस यह चाहते, ऐसा हो सम्मान।

स्वाभिमान सबका बचे, नैतिकता का मान।।

*

गुणवानों की कद्र हो, उनका हो गुणगान।

हम तो नहीं है चाहते, बंद करें सम्मान।।

*

लक्ष्मी माँ कुछ कृपा कर, दे ऐसा वरदान।

राह सुगमता से मिले, सबका हो कल्यान।।

*

ज्ञानी का सम्मान हो, यही रचें संसार।

स्वागत हो जयकार हो, है उत्तम सुविचार।।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६९ – देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६९ ☆ देश-परदेश – दुःखी के घर से अपना चूल्हा जलाना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे समाज में उपरोक्त किंवदंती को बहुत बुरा माना जाता हैं। आज का समय इसके बिल्कुल विपरीत हो गया हैं। अपना उल्लू सीधा करने में कोई भी पीछे नहीं रहता हैं।

पूरा विश्व युद्ध की आग से तप रहा है। हमारा मीडिया इस मौके को खूब भांजने में रात दिन एक कर रहा हैं। जब कभी युद्ध आदि का समय आता है, मीडिया वाले भी भूतपूर्व रक्षा अधिकारियों को अपने पैनल में लेकर दिन भर चर्चा कर अपनी टी आर पी दिन दोगुनी और रात चौगुनी वृद्धि कर लेते हैं।

 स्टूडियो को “वार रूम” का टाइटल मिल जाता हैं। मोहोल को युद्धमय बनाने के लिए समय समय पर सायरन बजा दिया जाता हैं। शरीफ सा दर्शक इनकी फरेबी बातों में बंधा रहकर मूर्ख बनता रहता हैं।

 हमारे एक परिचित मुंबई स्थित बहुत बड़ी विज्ञापन कंपनी में कार्यरत हैं। उन्होंने बातचीत में बताया आज कल फिल्मी सितारों और क्रिकेट के खिलाड़ियों का क्रेज़ कम हो रहा हैं। विज्ञापनों में बहुत शीघ्र इन रक्षा विशेषज्ञों को देखा जा सकेगा। भूतपूर्व योद्धा यदि मान जाएं तो बोर्नविटा, डाबर और मसाले बनाने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत दे सकती हैं। टीवी पर अपनी सेवाएं देने वाले चेहरे को जनता विज्ञापनों में देखकर ही उत्पाद खरीदने का मानस बनाती हैं।

 हमें तो लगता है, आने वाले समय में टीवी एंकर भी विज्ञापनों में भी छा जाएंगे, बशर्ते उनके चैनल इसकी अनुमति दे देवें

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ – आलेख – संस्कारधानी मेरा अपना शहर ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपका एक ज्ञानवर्धक आलेख “संस्कारधानी मेरा अपना शहर ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५८ ☆

🌻आलेख🌻संस्कारधानी मेरा अपना शहर 🌧️

आइये जबलपुर के बारे में कुछ अंश  आपको बता रही हूंँ। ताल तलैया से घिरा हुआ माँ नर्मदा तट पवित्र स्थल जहाँ की संगमरमर की चट्टानें विश्व प्रसिद्ध है।

यहाँ के घाट, गौरी घाट, उमा घाट, तिलवारा घाट, भेड़ाघाट, ऐसे घाटों से सजा जिसमें 52 ताल और 84 छोटी तलैया शामिल है। इस कारण इसे तालों का शहर भी कहा जाता है।

इसका मुख्य नाम जाबालिपुरम था। जो हमारे जाबालि ऋषि के नाम पर पड़ा। इसे त्रिपुरा और गढा नाम से भी जाना जाता है।

मूलतः कलचुरी काल में त्रिपुरा उनकी राजधानी थी और गोड काल में गढ़ा प्रमुख  स्थल था। ऋषि जाबालि की तप स्थली होने के कारण इसे जाबालिपुरम कहा गया जो बाद में रूप बदलते- बदलते जबलपुर हो गया।

जबलपुर को हमारे संत श्रद्धेय विनोबा भावे जी ने संस्कारधानी घोषित किया। उनका दिया हुआ यह उपहार जीवनपर्यंत जबलपुर वासी अपने नाम और पता के साथ संस्कारधानी लिखते हैं।

पौराणिक गाथा है रानी दुर्गावती का साम्राज्य जिन्होंने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। भारत के प्राचीन इतिहास को देखते हुए रानी दुर्गावती का साम्राज्य इसे कहा जाता है और जबलपुर में संस्कार, प्रीत, गीत, जीव, जल और सुंदर से सुंदर मंदिरों का गढ़ भी कहा जाता है। यहाँ पर माँ भगवती की तीन मुँह वाली मूर्ति जो तेवर में भी विराजी है। त्रिपुर सुंदरी के नाम से प्रसिद्ध है।

यहां पर माँ भगवती महाकाली महालक्ष्मी मां सरस्वती के एक ही पत्थर पर तीनों देवियों का मुँह जुड़ा हुआ है। हजारों की संख्या में रोज यहाँ दर्शन करते हैं। सुबह से शाम तक माँ भगवती का प्रसाद भंडारा के रूप में प्राप्त होता है।

चारों तरफ पहाड़ से घिरे होने के कारण इसे जल संग्रहण का मुख्य स्थल माना गया। माँ नर्मदा की असीम कृपा यहाँ पर बहुत सारे ऐसी अनुसंधान और योगशाला भी बनाई गई और जगह-जगह जल संरक्षण को महत्व दिया गया। एक प्रकार से पर्यावरण को बढ़ाया गया।

यहाँ पर भारत में युद्ध में होने वाले ट्रक,  गोला बारुद का निर्माण होता है। और यह निर्माण खमरिया फैक्ट्री जबलपुर में होता है। आज भी जब  सैनिक युद्ध के लिए निकलते हैं तो जबलपुर का ट्रक ट्रैक्टर और बड़ी-बड़ी तोप गाड़ी जबलपुर के ट्रेडमार्क से दिखाई देती है।

मध्य प्रदेश का हृदय स्थल बीच में होने के कारण जबलपुर सारी जगह से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर हमारे महाभारत काल के साम्राज्य को भी शताब्दी कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है।  गौड़ शासको के समय संग्राम शाह का यहाँ पर अधीनस्थ ग्रह मंडल का निर्माण भी बताया गया है जो हमारे समृद्ध और प्राचीन इतिहास को दर्शाते हैं।

रेल मार्ग बस सेवा और वायु सेवा निरंतर चारों दिशा और चारों ओर जाने का मुख्य जंक्शन स्टेशन जबलपुर है। यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण किला मदन महल का किला है जो एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। 11वीं शताब्दी का गोंडवाना साम्राज्य के विरासत को आज भी दर्शाता है। इसका निर्माण गोड़ राजा मदन सिंह ने करवाया था।

यहाँ पर भेड़ाघाट में कई फिल्मों की शूटिंग पहले भी हुई अब भी होती है और लगातार फिल्मी दुनिया को भेड़ाघाट की संगमरमर की दुनिया पसंद आती है। यदा कदा छोटी बड़ी फिल्में यहाँ हमेशा बनती दिखाई देती है।

दुर्गावती का किला और दुर्गावती संग्रहालय जबलपुर की शान को और भी बढ़ता है। यहाँ पर नित्य प्रति मां नर्मदा की आरती इतनी सुंदर होती है कि हजारों की संख्या में यहाँ के श्रद्धालु नियमित शामिल होते हैं और पुण्य के भागीदार होते हैं।

जबलपुर का क्षेत्रफल 5211 वर्ग किलोमीटर है और यह पूर्ण रूप से नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ है। सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक विरासत, जबलपुर को माँ नर्मदा के कारण अत्यंत धरोहर के रूप में मिला है। आज भी यहां पर 64 योगिनी मंदिर अपनी कहानी 11वीं सदी के विरासत को दर्शाता है।

जबलपुर का खानपान रहन-सहन अत्यंत सादगी और रुचिकर है। दूसरे शहरों में आप दिनचर्या में ₹500 में आप दिन भर नहीं बिता सकते यहाँ पर खाने की इतनी अच्छी व्यवस्था है और साधु संतों के डेरो पर तो भोजन प्रसादी मुफ्त में। बस आप माँ नर्मदा की आश्रय में हो जाइए।

विदेशी पर्यटक का विशेष आकर्षण भेड़ाघाट की संगमरमर वादियाँ है। जहाँ सदैव नौका विहार होता है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर चाँदनी रात का नौका विहार प्रसिद्धि और समृद्धि को दर्शाता है।

जबलपुर तीनो जल सेना थल सेना और वायु सेवा की टुकड़ी का केंद्र है। जहाँ पर आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर शानदार परेड और उनकी कलाकारी देखने को मिलती है।

वायुयान सेवा में सुविधाजनक यात्रा कर सकते है। जबलपुर की सबसे ऊंची इमारत कटंगा टीवी टावर के नाम से प्रसिद्ध है। जो 1992 में दूरदर्शन टेलीविजन नेटवर्क के लिए तैयार किया गया था और इसे ही  सैनिक को सलामी देने के लिए विशेष अवसरों पर इसे रोशन किया जाता है।

जबलपुर की रानी दुर्गावती यहाँ की गौड़ साम्राज्ञी थी। उनकी समाधि पर  भी श्रद्धा से गौड़ समाज ही नहीं वरन संपूर्ण जबलपुर वासी नतमस्तक होते हैं।

सदियों से इस शहर पर कई राजवंशों का शासन रहा है। जिसमें गोड़ मराठा और ब्रिटिश भी शामिल है। वास्तु कला खानपान संस्कृत साहित्य और सादगी से परिपूर्ण जबलपुर एक अनूठी छाप छोड़ता है।

जो एक बार आता है यहाँ का होकर ही रह जाता है। राजनीति से संबंधित इसे बीजेपी का गढ़ कहा जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जी चौहान जबलपुर की धरती को जब भी आते हैं चंदन जैसा लगाना कहते हैं। जबलपुर का मौसम बहुत ही सुहाना होता है। जब बारिश होती है तो ताल तलैया नदी नाले सब भरे हुए और उस पर हमारा जबलपुर एक सीप की तरह दिखाई देता है।

भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है कहा जाता है यहाँ के तट से भी आप कंकर पत्थर उठाकर ले जाएं उसे विधिवत पूजा नहीं करना पड़ता उसे स्थापित कर – – – हर कंकर शंकर होता है। माँ नर्मदा जी के तट को भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा है।

नगरी चुनाव उपनगरी चुनाव ग्राम पंचायत सांसद विधायक सभी जबलपुर की शान को और भी बढ़ा देते हैं। लिखने को तो बहुत सारी बातें हैं जबलपुर पर जितना लिखूं काम ही होगा। परसाई महादेवी वर्मा हिंदी के प्रसिद्धता को बढ़ाते हुए हिंदी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य योगदान और अमिट छाप छोड़ गए हैं। जिसके कारण जबलपुर को साहित्यिक धरोहर भी कहा जाता है। घर-घर में तीज त्यौहार उतने ही शौक से मनाया जाता है जितना मंदिर पर भगवान की आरती।

यहां का दशहरा यानी क्वार की नवरात्रि पर माँ भगवती दुर्गा की आराधना जो होती है अतुलनीय अद्भुत और स्मरणीय होती है।

हर बार बृहद और नया। कभी समय मिले या घूमने का मन बन जाए तो जबलपुर जरूर आईयेगा। हमारे जबलपुर की शान भंवर ताल गार्डन शंकर चौरा जहाँ पर भगवान भोलेनाथ की विशाल प्रतिमा बनी हुई है। सप्त ऋषियों का मूर्ति गार्डन पर विराजित हुआ हुआ है।

और मेडिकल कॉलेज से लेकर, अस्पताल रेलवे अस्पताल मिलिट्री अस्पताल और सुख सुविधा पूर्ण सभी प्रकार के वातावरण से संपूर्ण हमारा जबलपुर बहुत ही शानदार जानदार ईमानदार और सबसे बड़ी बात मेहमान बाजी करने पर कभी भी कोई भी प्राणी चुकता नहीं है।

दिल खोलकर सभी को अपना मानते हैं और उसे हृदय पर बसाते हैं।

यह माँ भगवती की आराधना नर्मदा की सेवा दीपदान की सुंदरता और यहां के संस्कार की अमिट कहानी है जो शब्दों से नहीं केवल भाव से समर्पित की जा सकती है।

यहाँ पर खोवे की जलेबी जीवन पर्यन्त स्वाद याद रहता है।

पहाड़ी पर मां शारदा मैहर

त्रिपुर सुंदरी बसी तेवर

नारी को भाये है जेवर

भाभी का लाडला देवर

गुड़ की चाशनी सेवर

सेवा भाव संस्कारी मेयर

मिलता है घी प्योवर

जबलपुर महिमा लिखते मिलूँ

आप सभी को प्रणाम करते

सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जीवन भर, माँ नर्मदे हर

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७५ – सुमित्र के दोहे ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है – सुमित्र के दोहे…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७५ – सुमित्र के दोहे ✍

☆ 

रोई ब्रज की गोपिका, रो रहे नंदलाल।

 चुप्पी साधे राधिका, आंसू करे सवाल।

 *

आंसू का इतिहास है आशु का भूगोल ।

आंसू का विज्ञान अब, रहस्य रहा है खोल।।

 *

आंसू है संवेदना आंसू, मन की पीर।

यशोधरा का रूप है, जसोदा की जंजीर।।

 *

जनक दुलारी चल पड़ी, ओढ़ अश्रु का चीर ।

आंसू डूबी अयोध्या, राम मौन गंभीर ।।

 *

घनानंद का अश्रुधन, अर्पित कृष्ण सुजान।

उसी अश्रु की धार में, डूबे थे रसखान ।।

 *

आंसू डूबी सांस से, रचित ईश्वरी फाग।

रजउ ब्रह्म थी, जीव थी, ऐसा था अनुराग।।

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७४ – “सपनों जैसा घर…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “सपनों जैसा घर...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “सपनों जैसा घर...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

उसके आँचल के खूँटों में

जैसे बँधी व्यथा ।

माँ,  चौके में लिखकर आयी

है प्राचीन कथा ॥

 

भूख, स्वाद, संतुष्टि, पुष्टि के

सारे पात्र जहाँ ।

मिलजुल कर के लिखें तृप्ति की

बारह खड़ी वहाँ ।

 

वहीं कहीं विश्वास, सेंक कर

रखती डिब्बे में –

उसका प्रेम पराँठों के संग

होता नहीं मृथा ॥

 

वह अदभुत करुणा की

अनुपम दाल पकाती है ।

जिसमें संध्या, चाँद कूदकर

बना चपाती है।

 

और इसी क्रम, चावल का

पकना, खुशबू देना –

बस आधारहीन असमंजस

जैसा जथा – तथा ॥

 

सपनों जैसा घर, घरके

सपने , सपने से हैं ।

यहाँ प्रश्न के उत्तर , सब

अपने अपने से हैं ।

 

सभी पाण्डवों का पालन

कुन्ती करती आयी –

जो थी कभी बोझ न,

सहने वाली विनत प्रथा ।

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

07-03-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५५ ☆ # “रंग तो रंग है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रंग तो रंग है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५५ ☆

☆ # “रंग तो रंग है…” # ☆

☆

रंग तो रंग है

हर शै में उमंग है

 

कहीं पीला है कहीं नीला है

कहीं सफेद है कहीं लाल है

कहीं बैंगनी कहीं हरा है

कहीं जामुनी है कहीं काला है

हर कोई मतवाला है

 

सारा जमाना रंगों से सरोबार है

खूब रंगों का कारोबार है

पिचकारियों की धूम है

कहीं रंगों से झूमती टोली है

कहीं फूलों के रंगों की

सादगी पूर्ण होली है

 

कहीं इतराती, बचती बचाती बालाएं है

रंगों ने जिन्हें भिगो डाला है

उनके गले में रंग बिरंगी मालायें है

नये नये रंग लगायें है

नाचती हुई तरुणाई है

सब पर झूमती हुई होली आई है

 

वयस्क टीका लगा रहे हैं

भांग के नशे में युवा फाग गा रहे हैं

चंग और डफ बज रहे हैं

 रंग-बिरंगे परिधानों में सब सज रहे

 

चहु और उल्लास उमंग छाई है

यह होली खुशियां लेकर आई है

 

पर कहीं पर सन्नाटा है

जिनके घर अभी-अभी बुलडोजर से टूटा है

वह आंसुओं की होली मना रहे हैं

भूखे पेट फिर भी फाग गा रहे हैं

आसमान में बिखरे कई रंग है

क्या उनके जीवन में कोई रंग उतर आएगा ?

क्या उनका यह होलिकोत्सव रोते-रोते ही बीत जाएगा ?

 ☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९८ – कृष्ण खेलें होली, राधा के संग… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कृष्ण खेलें होली, राधा के संग…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # ९८ ☆ कृष्ण खेलें होली, राधा के संग… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

रंगों में रंग, होली के रंग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

रंग गुलाबी, प्रेम भरा है,

लाल रंग विश्वास भरा है,

नीला रंग है, श्याम के जैसा,

रहें सदा संग संग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

रंगों की वर्षा, राधा करतीं,

सखियां भी न पीछे हटतीं,

रंग गुलाल की वर्षा होती,

गोकुल की गलियां रंगती,

नर नारी के संग, ,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

संग नहीं खेलना, मुझको ये रंग,

तेरे ही रंग में, अंग जाए रंग,

राधा खो जाए, श्याम में आकर,

जैसे ज्योति दीपक में जाकर,

आपस में एक रंग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२६ ☆ व्यंग्य – मिलावट-प्रधान देश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘मिलावट-प्रधान देश‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ मिलावट-प्रधान देश ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

हमारा देश धर्म-प्रधान होने के साथ-साथ मिलावट-प्रधान भी है। यह कहना मुश्किल है कि वह धर्म-प्रधान ज़्यादा है या मिलावट-प्रधान, क्योंकि यहां करीब-करीब हर चीज़ में मिलावट होती है। मिलावट का हाल यह है कि अब शुद्ध आदमी मिलना मुश्किल हो गया है। मिलावट करने वाले पूरी निष्ठा और समर्पण-भाव से अपने काम में लगे हैं। उनके काम की निपुणता और सफाई देखकर आश्चर्य होता है। मजाल है आदमी असली नकली में भेद कर पाये। मिलावट के मामले में उनके नये-नये प्रयोग देखकर बड़े-बड़े वैज्ञानिक भी हैरान हैं।

यहां मिलावट का आलम यह है कि शुद्ध चीज़ मिलना सौभाग्य की बात मानी जाती है। बाहरी उपयोग की चीज़ें छोड़ दीजिए, जो चीज़ें शरीर के भीतर जाती हैं उन्हें भी बख्शा नहीं जाता। दाल, चावल, मसाला, घी, खोया, मिठाइयां, दवाएं, फल, सब्ज़ियां, ईनो, आटा, बेसन, दूध, मक्खन, पनीर, सरसों, शराब, जीरा, हल्दी, सब में पूरे सेवा- भाव से मिलावट की जा रही है। नकली दवाओं का मतलब समाज के लिए क्या होता है यह समझा जा सकता है। कहीं पढ़ा कि अंडे भी मिलावटी हो रहे हैं, यद्यपि मेरे लिए समझ पाना मुश्किल है कि नकली अंडे कैसे होते होंगे।

चावल में कंकड़, मसाले में बुरादा, हल्दी में पीली मिट्टी मिलना आम है। नकली दवाओं का बाज़ार अरबों का है। अभी नकली कफ़ सीरप पीकर इंदौर में कई बच्चे काल-कवलित हुए। निम्न वर्ग के शराबी हर साल मिलावटी शराब पीकर मरते हैं।

फलों और सब्ज़ियों को कार्बाइड की मदद से जल्दी पकाया और तैयार किया जाता है, लेकिन कार्बाइड मनुष्य-शरीर के लिए बहुत हानिकारक है। चने भी नकली होने की ख़बर पढ़ी। मिट्टी से बनने वाले सीमेंट के बारे में भी पढ़ा।

हाल ही में राज्यसभा में एक सदस्य ने वक्तव्य  दिया कि जांच में दूध के 71% नमूनों में यूरिया और 64% में न्यूट्रलाइज़र पाये गये, जबकि कुल  खाद्य नमूनों में 25% मिलावटी निकले। यह भी बताया गया कि गर्म मसाले में ईंट और लकड़ी का बुरादा, चाय में सिंथेटिक रंग, शहद में शुगर सीरप और मिठाइयों में देसी घी की जगह वनस्पति की मिलावट पायी गयी।

हमारे देश में नकली डिग्री, नकली आधार कार्ड, नकली प्रमाण-पत्र उपलब्ध होना मुश्किल नहीं है, बशर्ते कि आप जोखिम लेने को तैयार हों। कई नेताओं की झूठी डिग्री पर प्रश्न उठते रहे हैं। नकली नोट छापने वालों की सक्रियता के प्रमाण जब-तब मिलते रहते हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’ नकल के धंधे का एक नया रूप है, जिसमें कई लोगों को करोड़ों रुपयों का चूना लग चुका है।

सबसे ताज़ा ख़बर यह पढ़ी कि जूते भी नकली बन रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि नकली जूतों में क्या नकली होगा। शायद ये पहनने के अलावा दूसरे काम के लिए बन रहे होंगे। शायद नकली जूतों के प्रहार से आदमी की इज़्ज़त कम ख़राब होगी।

बाबा रामदेव के गाय के घी के बारे में पढ़ा कि वह दो प्रयोगशालाओं में जांच में खाने योग्य नहीं पाया गया। उनके मिर्च पाउडर की गुणवत्ता का मामला भी संसद में उठाया गया था।

आदमी भी अब खरा नहीं रहा। मुंह पर कुछ बोलता है, मन में कुछ और रचता है।टेक्नोलॉजी के विकास के साथ स्वार्थपरता और संकीर्णता बढ़ रही है, रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं, सुविधाओं का मोह बढ़ रहा है। नतीजतन आदमी अपने आप में सिमटता जा रहा है, टापू होता जा रहा है। इसीलिए शायर निदा फ़ाज़ली ने लिखा— ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।’

मैं यह सोच सोच कर परेशान हूं कि कई नेता और धर्मगुरु धार्मिक एकता की बातें करते हैं, दूसरे धर्म वालों को अपने से कमतर समझते हैं, लेकिन धार्मिक एकता में ये मिलावट के लिए समर्पित हुनरमंद लोग कहां ‘फिट’ होंगे? क्या धार्मिक एकता के लिए ये मिलावटखोर मिलावट करना छोड़ देंगे? क्या इनका हृदय-परिवर्तन हो जाएगा? क्या ये आसानी से मिल रहे बड़े मुनाफे का लालच छोड़ देंगे? फिलहाल तो ये अपने धर्म वालों का ही मुंडन कर रहे हैं।

हम गज़ा में सत्तर हज़ार निर्दोष लोगों की मौत पर सिहरते हैं, दुखी होते हैं, लेकिन हमारे देश में सीधे हत्या के बजाय धीमे ज़हर के द्वारा करोड़ों की ‘स्लो डेथ’ का इंतज़ाम है। हम बाकी मामलों में भले ही विश्वगुरु न बन पायें, मिलावट के मामले में हमारे विश्वगुरु होने में कोई संदेह नहीं हो सकता। अन्य देश आयें और हमसे उपयोगी शिक्षा ग्रहण करें।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९७ – रोग ग्रसित राजा… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– रोग ग्रसित राजा…” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९७ — रोग ग्रसित राजा — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

राजा के तीन रोग थे। उसने अपने रोग स्वयं में छिपाये रखा क्योंकि रोग प्रकट होने से उसका मस्तक झुकता। आश्चर्य, उसके देश के कवि ने उसके तीन रोगों से मिलती जुलती कविता लिख दी। राजा क्रोधित हुआ। उसने कवि की हत्या करवा दी। जहाँ लाश फेंकी गई वहाँ सुन्दर फूल खिले। राजा को ये फूल बहुत पसंद आए। पर उसे जब पता चला ये फूल उसके शत्रु के वक्ष पर उगे हुए हैं बिलखने पर चौथे रोग ने उसे ग्रस लिया।

 © श्री रामदेव धुरंधर

07 – 03 – 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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