हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १३२ ☆ नदी नहाने जाती है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नदी नहाने जाती है ” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १३२ ☆ नदी नहाने जाती है ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

उल्टा चलन सिखाती है

नदी नहाने जाती है ।

 *

राह मील के पत्थर पर

बैठ ज़रा सुस्ताती है ।

 *

दुख का बोझ उठाने पर

ख़ुशी होंठ पर आती है ।

 *

सपने रखकर सिरहाने

रात नींद में गाती है ।

 *

जुर्म अदालत सुनती है

सज़ा नहीं दे पाती है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १३७ ☆ समझ जाता छुपा है कोई मतलब… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “क्यों करें हम…?“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १३७ ☆

✍ क्यों करें हम…? ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

किसी के साथ धोका क्यों करें हम

किये वादे को खोटा क्यों करें हम

 *

जो दिखता है हमेशा सच न होता

यकीं आँखों पे पूरा क्यों करें हम

 *

अगर हो बात कड़वी मौन रहते

किसी का दिल दुखाया क्यों करें हम

 *

नहीं मालूम कुछ भी अगले पल का

मिलेंगे फिर ये वादा क्यों करें हम

 *

मुहब्बत दो दिलों का मामला है

जहां भर से ये साँझा क्यों करें हम

 *

सुधरने का उसे दो एक मौका

गिराकर घर सताया क्यों करें हम

 *

किराएदार हैं सब चार दिन के

जहां में तेरा मेरा क्यों करें हम

 *

रुलाती हैं हमेशा जब भी आतीं

तेरी यादों का पीछा क्यों करें हम

 *

सितम की इंतहा ख़ातून पर ये

कभी सोचें हलाला क्यों करें हम

 *

जो दे खैरात उसकी बढ़ती दौलत

है सच फिर भी खसारा क्यों करें हम

 *

ठिकाना है नहीं इसके अलावा

तो फिर दुनिया से तौबा क्यों करें हम

 *

पड़ोसी धर्म जो नादान भूला

सितम उसके गवारा क्यों करें हम

न सीधा पूछ सा कुत्ते की हो वो

बता मेहनत को जाया क्यों करें हम

 *

जुदा हो लें नहीं जब ख्याल मिलते

मियां बीबी का ड्रामा क्यों करें हम

 *

चमन विरसे की अपनी मिल्कियत है

तबाह अपना ठिकाना क्यों करें हम

 *

यहाँ जब काम भोले पन से चलता

अरुण खुद को सियाना क्यों करें हम

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ४३ – ग़मज़दा बशर देखे तो मैं… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ग़मज़दा बशर देखे तो मैं।)

✍ ग़मज़दा बशर देखे तो मैं… ☆ श्री हेमंत तारे  

जिसे चाहा उस फ़न का मैं माहिर बना

जुनूँ था कि,  क़ादिर बनू,  क़ादिर बना

चाहिता तो,  मुर्शिद भी बन सकता था 

ग़मज़दा बशर देखे तो मैं काफ़िर बना

 *

गाड़ी बंगला कोठी ये, सुकूं के सामां नही

सुकूं उसको मिला, जो कोई तारिक बना

 *

उस करिश्माई दरवेश के मैं सदके जाउं

जिस संग को छुआ उसने वो नादिर बना

 *

रब की ईबादत का सिला सबको मिला

कोई मुलाजिम बना तो कोई ताजिर बना

 *

वाइज़ की सोहबत, सबको कहां हांसिल

मुझ कमज़र्फ को मिली और मैं आरिफ़ बना

मुश्किल घडी में सब बचकर निकल गये

‘हेमंत’ वो तेरा दोस्त था जो जाँनिसार बना

क़ादिर = शक्तिमान, मुर्शिद = धर्मगुरु, ग़मज़दा बशर = दु:खी मनुष्य, काफ़िर = नास्तिक, तारिक = त्यागी, संग = पत्थर, नादिर = अमूल्य, ताजिर = सौदागर, वाइज़ = धर्मोपदेशक, आरिफ़ = ज्ञाता, जाँनिसार = प्राण रक्षक

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆ लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “आत्ममुग्ध“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५१ ☆

✍ लघुकथा – आत्ममुग्ध… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

संतोष जी को अपने अलावा किसी के अस्तित्व की जानकारी ही नहीं थी, ऐसा लगता था। तारीफ करते तो अपनी या अपनी संतान की जैसे किसी और की तो औलाद होती ही नहीं। उनकी नज़र में कोई कुछ नहीं जानता है सिवाय उनके। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं कि सुनने वाले पर क्या असर पड़ता है। बस अपनी बात कहने और सामने वाला कुछ कहने को उद्यत हो तो उसे रोक देते। फिर अपनी बात पूरी करके सामने वाले से तपाक् से हाथ मिला कर चल देते। साथ ही चलते चलते  एक सप्ताह का अपना कार्यक्रम बताते जाते कि किस किस बड़े आदमी के साथ किस दिन क्या कार्यक्रम है,  क्योंकि प्रसिद्ध व्यक्तियों से उनकी गहरी मित्रता रहती है।

सामने वाले सज्जन अवाक् रह गए।  न कुछ कहते बना और न कुछ सोचते । ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी मंच पर विराजमान थे। उसी कार्यक्रम में उनके एक सहयोगी शशिकांत भी उपस्थित थे जो उन्हीं की रैंक से रिटायर हुए थे परंतु नौकरी की शुरुआत में वे संतोष जी से जूनियर साथी रहे थे। कार्यक्रम के मध्याह्न में  शशिकांत जी अपने एक मित्र के साथ वॉशरूम जा रहे थे तो संतोष जी मिल गए और मित्र का संतोष जी से अच्छा परिचय था तो उन्होंने शशिकांत जी का परिचय कराना चाहा तो संतोष जी तपाक् से बोले , “हाँ हाँ मैं शशिकांत को जानता हूँ, ही वाज़ माय जूनियर” और वाशरूम में घुस गए। शशिकांत जी ने महसूस किया कि संतोष जी को अपना सीनियरपन याद है पर उनकी प्रोन्नति नहीं, पद भी नहीं। नहीं याद है तो कहने की क्या आवश्यकता थी।

ऐसे ही एक कार्यक्रम में संतोष जी को कुछ कहने का अवसर मिला तो अपनी  बात के समर्थन में किसी ग्रंथ, किसी विद्वान को उद्धृत न कर अपनी ही कविता या अपनी किसी उपलब्धि की कहानी उद्धृत करते रहे।  उनकी आत्ममुग्धता पर उपस्थित जन कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते हुए मुग्ध होते रहे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०० – नई ऊर्जा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – नई ऊर्जा।)

☆ लघुकथा # १०० – नई ऊर्जा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सीता जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ा रही थी मंदिर की ओर तभी उसके मन में ख्याल आता है कि एक बार अपनी पूजा की थाली को देख लूं सब सामान बराबर रखी हूँ।

अरे! भगवान मुझसे गलती हो गई फूल रखना भूल गई?

वह सोचने लगती है। भगवान को जल चढ़ाऊंगी अक्षत चढ़ाऊंगी टीका लगाऊंगी आरती भी करूंगी पर फूल नहीं, तो अच्छा नहीं लगेगा तभी अचानक उसे सामने एक फूल वाला बैठे दिखता है।

“भैया फूल ₹5 के दे दो?”

“मेरा नाम मोहन है, मैं कोई भैया दूध वाला नहीं हूं?”

सीता ने गुस्से में कहा- “ओ मोहन ₹5 के फूल दे दो?”

मोहन ने कहा- “₹5 के फूल नहीं मिलेंगे?”

सीता ने कहा- “अरे! मुझे दो-चार फूल ही चाहिए है? कोई बात नहीं ₹10 के दे दो?”

मोहन सभी फूलों को एक कागज में रखता है।

सीता ने कहा- “ये लाल गुड़हल के २ फूल दो न? गौरी माता को जोड़ा फूल चढ़ाने की मन में इच्छा है।”

मोहन ने कहा – “मैडम यह फूल तो ₹5 का एक मिलता है एक फूल आपको दे रहा हूँ।”

सीता ने कहा – “फूल बेचने बैठे हो या सोना बेच रहे हो। अच्छा सुबह-सुबह मेरा दिमाग मत खराब करो,मुझे पूजा करना है।”

सीता मंदिर में प्रवेश करती है और भगवान शिव की पूजा करती है उन्हें फूल चढ़ाती  है और सामने जब माँ गौरी के चरणों में जल चढ़ाती है और सिंदूर चढ़ाने के बाद जब वह फूल चढ़ाने लगती है तो देखी है कि उसके हाथ में दो फूल आ जाते हैं उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता और वह मां को श्रद्धापूर्वक नमन करती है और आरती पूजा करती है।

 मंदिर में भगवान के सामने बैठकर वह सोचती है, भगवान से जो मांगो वह मिलता है माता तुम तो सब जानती हो जिस तरह दो फूल दिए हैं। इस तरह मेरी गोद भी भर देना।

दुनिया के तानों से अब मेरा मन भर गया है और सीता के मन में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०० ☆ कविता… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०० ?

☆ कविता… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

ही कोण सखी ,

सारखी माझ्या मागे मागे येते….

हलकेच करांगुली धरूनी,

मज त्या वाटेवर नेते,

*

त्या वाटेवरले काटे,

पावलांवर काढती नक्षी,

घोटाळती अवती भवती,

शब्दांचे मंजुळ पक्षी,

*

मी एकटीच असते तेव्हा,

ही असते माझ्या संगे,

मैफलीत वा एकांती

संवाद तिच्याशी रंगे

*

मी टाळाया बघते पण,

ती सोडत मजला नाही

ही अवखळ,हट्टी पोर

लावते जीवाला घोर,

*

प्रतिबिंब माझे तिच्यात,

डोळ्यातील बाहुली माझ्या,

सोडून दूर ना जाई

तिजवीण सुचेना काही…

*

अंधा-या  रातीलाही

करते जी माझी सोबत,

ती  सावलीच माझी

प्रतिभेच्या गावामधली !!!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ९ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

डॉ. शोभना आगाशे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – ९ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर  

जगभरातील अनेक विद्यापीठात गेल्या एक शतकाहून अधिक काळ सातत्याने निरनिराळ्या राष्ट्रीयत्वाचे, धर्माचे, जातीचे, पंथाचे विद्यार्थी गीतांजलीचा अभ्यास करत आहेत. यावरून हे सहजच सिद्ध होतं की, गीतांजलीतील तत्वज्ञान जरी हिंदू धर्मातील हजारो वर्षे जुन्या उपनिषदीय संकल्पनांवर आधारित असलं, तरीही ते कालातीत व सर्वस्पर्शी आहे. ते माणसाच्या काळजाला भिडणारं आहे.

उदाहरणादाखल कांही विद्यापीठांचा उल्लेख करावासा वाटतो.

  1. विश्वभारती विद्यापीठ, कोलकता
  2. कलकत्ता विद्यापीठ, कोलकता
  3. जाधवपूर विद्यापीठ, कोलकता
  4. ऑक्सफर्ड विद्यापीठ, यू के
  5. University of Illinois Urbana – Champaign, USA.
  6. The Scottish center for Tagore studies, UK
  7. HongKong Baptist University, HongKong
  8. Trinity College, Dublin, Ireland
  9. ‘Geetanjali and beyond’ is a peer reviewed, open access, academic and creative international journal of UK promoting creative writing and research on Rabindranath Tagore’s work and life, his circle and his impact.

—–

गीत : २५

IN the night of weariness let me give myself up to sleep without struggle, resting my trust upon thee.

Let me not force my flagging spirit into a poor preparation for thy worship.

Its is thou who drawest the veil of night upon the tired eyes of the day to renew its sight in a fresher gladness of awake

—–

मराठी भावानुवाद : गीत २५

*

कंटाळुनि ही रात्र झोपली

सहजचि जावे मी ही झोपुनि

सर्व भार या आयुष्याचा

अस्तित्वावर तुझ्या टाकुनि॥

*
गत गोष्टींचा हिशोब करता

हताश झालो, थकलो दमुनि

माझ्या हातून चुका न होवो

मात्र त्यामुळे तुझिया पूजनी॥

*
थकला दिनमणी, येई चरणी

पांघरिसी त्या निशा, थोपटुनि

दमल्या नयना त्वरे शांतवुनि

पुनरपि पसरे, आनंद उगवुनि

*

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—–

गीत २६

HE came and sat by my side but I woke not. What a cursed sleep it was, O miserable me!

He came when the night was still; he had his harp in his hands, and my dream became resonant with its melodies.

Alas, why are my nights all thus lost? Ah, why do I ever miss his sight whose breath touches my sleep?

—–

मराठी भावानुवाद : गीत २६

*

प्रत्यक्ष तो आला

माझ्याजवळ बसला

पण मी झोपलेला

शापित ही झोप कसली!

माझी मला कीव वाटली

रात्र निःस्तब्ध झाली

त्याच्या ओठात होती मुरली

त्याचे मंजुळ स्वर

माझ्या स्वप्नात निनादतात

पण अशा रात्री कां

माझ्या हातातून निसटतात?

त्याचे ऊष्ण श्वास

माझ्या स्वप्नांना स्पर्शतात

त्याच्या दर्शनापासून कां

माझ्या नेत्रांना वंचित ठेवतात?

 

भावानुवाद © शोभना आगाशे 

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—–

गीत २७

LIGHT, oh where is the light? Kindle it with the burning fire of desire!

There is the lamp but never a flicker of a flame, ⎯ is such thy fate, my heart Ah, death were better by far for thee!

Misery knocks at thy door, and her message is that thy lord is wakeful, and he calls thee to thy love-tryst through the darkness of night.

The sky is overcast with clouds and the rain is ceaseless. I know not what this is that stirs in me, ⎯ I know not its meaning.

A moment’s flash of lightning drags down a deeper gloom on my sight, and my heart gropes for the path to where the music of the night calls me.

Light, oh where is the light! Kindle it with the burning fire of desire! It thunders and the wind rushes screaming through the void. The night is black as a black stone. Let not the hours pass by in the dark. Kindle the lamp of love with thy life.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत २७

*

दीप असे परी ज्योती नसे

प्रकाश तर ना कुठेच दिसे

मृत्यू बरा, दुर्भाग्य नकोसे॥

*

दुःखाची दारी थाप असे

आठव प्रियाचा त्यात असे

संकेत भेटीची वेळ असे॥ 

*

मेघव्याप्त हे गगन असे

धारांनी तनमन चिंब असे

अंर्तमन पण अस्वस्थ असे॥

*

चपला दिपवी नेत्र जेधवा

सुरेल बासुरी ऐकू ये तेधवा

मार्ग शोधी अन् भेटी केशवा॥

*

प्रेमदीप तू देई उजळुनि

आशेचा स्फुल्लिंग चेतवुनि

जीवनज्योती अपुली अर्पुनि॥

*

– क्रमशः भाग नववा

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © शोभना आगाशे

सांगली 

दूरभाष क्र. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १३५ – याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

इस सप्ताह प्रस्तुत हैं आपकी रचना “याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं।) 

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १३५ – याद के जुगनू, मेरे हमदर्द हैं ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

हैं यहाँ क़ातिल बहुत इंसान के

घोंटिये मत, खुद गले अरमान के
*
तिश्नगी को क्यों हवाले कर दिया

क्रूर संरक्षण में रेगिस्तान के
*
याद के जुगनू मेरे हमदर्द हैं

इनमें अंगारे नहीं अभिमान के
*
बेवफा अब बंद कर हमदर्दियाँ

बोझ ढो न पाऊंगा अहसान के
*
खैरख्वाहों की अधूरी लिस्ट है

और हैं दुश्मन अभी इस जान के
*
बन्द दिल की खिड़कियाँ करना नहीं

हैं नहीं अभ्यस्त हम सुनसान के
*
चिलमनों से यूँ न दिखलाओ शबाब

हुस्न मैं पीता नहीं हूँ छान के

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

३ दिसंबर २०१२

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २०८ – जीवन में आलस्य का… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन में आलस्य का। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २०८ – जीवन में आलस्य का… ☆

जीवन में आलस्य का, बढ़ता जाता रोग।

व्यर्थ समय है बीतता, घटे लाभ का योग।।

*

कार्य पूर्ण होते नहीं, बढ़ता जाता भार।

जनता पिसती है सदा,पड़ती भारी मार।।

*

गलत राह पर ये चलें, करें देश बदनाम।

जब चाहे हड़ताल से, करते चक्का जाम।।

*

घर में ही बैठे रहें, करें जतन दिन रात।

अधिकारों की आड़ ले, देते रहते मात।।

*

नेतागीरी में लगे, खूब मचाते शोर।

कामकाज करते नहीं, निज स्वारथ पर जोर।।

*

सरकारी हर तंत्र में, ऐसों की भरमार।

कभी मुक्ति इनसे मिले,तब होगा उपकार।।

*

यही हाल हर घर सखे, मचता बड़ा बवाल।

मूर्तवान आलस्य ही, घर में करें धमाल।।

*

बैठ घरों में कर रहे, फेमस अपना नाम।

मोबाइल में खो रहे, रोज सुबह औ शाम।।

*

लाइक औ शेयर करें, मेसेज सुबह शाम।

व्हाटसएप व फेस बुक, चेटिंग में बदनाम।।

*

खाने में आगे रहें, मुख से छीनें भोग।

काम चोर मस्ती करें, मेहनत करते लोग।।

*

कर्तव्यों से विमुख हैं, धरे हाथ पर हाथ।

समय बीतने पर यही, सदा पीटते माथ।।

*

जीवन दर्शन अब यही, छाया है चहुँ ओर।

अगर ग्राफ बढ़ता गया, कैसी होगी भोर।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ – ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५३ ☆

🌻लघु कथा🌻ईमेज (व्यक्तित्व) वाला निमंत्रण कार्ड 🌻

सभी कहते हैं सोशल मीडिया ने रिश्ता तो खतम ही कर दिया अब तो भगवान भी दिन भर छाये रहते हैं।

पोस्टर बना बना भेज दिये। अब डिलीट करने वाला मोबाइल को सिर माथे लगा रट सपाट सभी ऊँगलियाँ चला डिलीट करते चलते हैं।

भला हो उस मेसेज का अभी कुछ दिनों से बंद है – – 👉 ये मेसेज दस लोगों को भेजों नहीं तो अनर्थ हो जायेगा।

बात करते हैं शादी ब्याह के सुंदर- सुंदर कार्डों का। किटी आयोजन में भरपूर उपयोगिता 😊

अपने दादा जी के साथ चाचा का कार्ड बाँटते बच्चा बड़ा खुश हो रहा था। घर आते ही कहने लगा इसमें मेरा नाम लिखा है आंटी पढिये।

यहाँ से वहाँ तक पूरा कार्ड अंग्रेजी के अक्षरों से भरा। हमें तो अंग्रेजी आती नहीं है।

भोले पन से बच्चे ने हिन्दी पर लिखें अक्षरों को दिखाते कहा – – ये है न हिन्दी आप पढ़ लिजियेगा।

और धीरे से कान के पास आकर बोला–गणपति बप्पा को भी अंग्रेजी कहाँ आती है। इसलिये उनका नाम बस हिन्दी में लिखा गया है।

सौ टके की बात कहते मासूम से बच्चे की मासूमियत पर ह्रदय सोचने पर मजबूर हो गया।

पूरे कार्ड में गणपति वंदन हिन्दी में लिख कर बाकी पढ़ने वाले भी उसी दो लाईन को पढते है बाकी तो इधर की जुबानी कुछ उधर की जुबानी।

हाँ कार्ड मिल गया।

ढेरों बधाईयाँ 💐💐

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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