हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२६ – ये वसुंधरा हरी-भरी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “ये वसुंधरा हरी-भरी…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२६ ☆

☆  ये वसुंधरा हरी-भरी…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

ये वसुंधरा हरी-भरी, कितनी हसीन है।

यह जन्म भूमि है मेरी, पावन जमीन है।।

*

देवों की जन्म भूमि यह,शत्-शत्  करें नमन।

माँ भारती की स्तुति पर, हमको यकीन है।।

*

शुभ संस्कार सभ्यता है, यह संस्कृति महान।

राम-कृष्ण-बुद्ध की धरा, भारत कुलीन है।।

*

हिमालय हमारा रक्षक,शिव-शक्ति की कृपा।*

माँ के चरण पखारता, सागर प्रवीन है।

*

मौसम बिखेरे रँग यहाँ, नाचे मन मलंग।

उमंगें हरेक पर्व में, हर भक्त लीन है।।

*

है देश यह सपेरों का, किसी ने यह कहा।

बदला है देखिए अभी, कितना नवीन है।।

*

निर्माण का संकल्प ले, बढ़ते कदम रहे।

प्रगतिशील है हरेक पथ, उन्नत मशीन है।।

*

दुश्मन पड़ोसी में बसे, हैं हर समय लड़े।

आतंकी पाक को अभी, लड़ाता चीन है।।

*

ब्रम्होस को हमने चला, जग को दिखा दिया।

हिन्दुस्ताँ बदल चुका है, शत्रु-दहन-सीन है।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

23/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८३ – देश-परदेश – सांप निकलने पर लकीर पीटना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८३ ☆ देश-परदेश – सांप निकलने पर लकीर पीटना ☆ श्री राकेश कुमार ☆

उपरोक्त कहावत का चलन सबसे अधिक हमारे देश में ही होता है। अंग्रेज़ी की कहावत “Prevention is better than Cure” का सदुपयोग पश्चिम के देशों में ही होता है।

देश के किसी भी भाग में कोई आपदा आने से पूर्व कभी कोई तैयारी नहीं होती है। दुर्घटना हो जाने के बाद मात्र कुछ घंटों/ दिनों के लिए हम लोग विश्व के किसी भी देश से अधिक सक्रिय हो जाते हैं। इस सक्रियता का दसवां हिस्सा भी हम आपदा पूर्व तैयारी में खर्च कर देवें,  तो देश दुर्घटना रहित हो सकता है।

गर्मी के मौसम में आग लगना आम बात होती है। व्यवस्था को दोष मढ़ कर हमारा कार्य पूर्ण हो जाता है। अभी लखनऊ आग की लपटों में ताप बाकी है, मुंबई की पहली वर्षा ने ही समस्याओं का विकराल रूप सामने खड़ा कर दिया है।

किसी भी व्यवस्था के नियमों का पालन ना करने की हमारी आदत, घर से ही आरंभ हो जाती है। सोने के नियत स्थान पर भोजन ग्रहण करना हो या रोज मर्रा के तय नियमों की अनदेखी करना।

पहली बार जब आप कोई भी नियम का उल्लंघन करते हैं, उस दिन के बाद से ही आपके स्वभाव और आदतों में “अनुशासनहीनता” जन्म ले लेती है।

हम स्वयं भी बहुत सारे नियम तोड़ कर जीवन के कष्ट भोग रहें हैं। कॉलेज में मित्र के कहने पर जीवन में जब मदिरा का पहला प्याला ये कहकर उठाया था, कि बस आज पहली और आखिरी बार है। तब स्वयं ली गई प्रतिज्ञा टूट गई थी, उसके बाद हम उसके आसरे से ही, जी पा रहें है। स्वास्थ्य पर इसके विपरीत प्रभाव के हम सब अच्छे खासे जानकार हैं।

होटल में जब कभी छोटे समूह में जाते हैं, तो उस होटल के टेबल कुर्सी आदि को हम अपनी संख्या से लगवा लेते हैं। इससे वहां अव्यवस्था होती है, लेकिन हमको उससे क्या लेना देना?

जब तक हम स्वयं तय शुदा नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं करते हैं, तब प्रशासन, काम काज आदि के क्षेत्र में अनुशासन की उम्मीद करना बेमानी होगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९१ – सूरज नहीं दिया…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  सूरज नहीं दिया…२ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २१० ☆

☆ –  सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

मेरे बच्चो !

इस जमाने में

खुशहाली का रास्ता

बहुत तंग है.

आम आदमी के लिये बंद है,

सिफारिश के बिना योग्यता अपंग है।

यकीन करो,

मैं तुम्हारे लिये

सब सुख मुहैया करना चाहता हूँ,

एक सही आदमी की तरह जीकर

मरना चाहता हूँ।

काश!

शेष वर्षों में ऐसा हो पाए,

हर आदमी

जरूरत की चीजें पाए।

बहरहाल

मैं अपने पास

नहीं फटकने दूँगा हताशा, निराशा,

नहीं चाहिये सोने के कटोरे में दूधभात,

हड्डियों को चन्दन सा घिसकर

जुटा ही लूँगा बताशा ।

और जब

उम्मीद का बताशा चुकेगा

यानी जिन्दगी का बताशा घुलेगा

तब मेरे पौरुष का

आखिरी पृष्ठ खुलेगा,

जब सुलग रही होगी चिता

तब तुम कह सकोगे कि हमारा पिता

दूसरों के लिये भी जिया था

वो सूरज नहीं दिया था।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८८ – “भूल चुके लोगों की स्मृति में…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत भूल चुके लोगों की स्मृति में...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “भूल चुके लोगों की स्मृति में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जीवन भर कर्मठता के

पर्याय रहे पापा ।

एक अबूझा किन्तु सार्थक

न्याय रहे पापा ॥

 

किसी एक स्थिर पड़ाव

पर ठहर नहीं पाये ।

सदा खोज में लगे रहे

हम समझ नहीं पाये ।

 

उनका हर गतिशील कदम

था चौपाई जैसा –

लोगों की नजरो में पर

असहाय रहे पापा ॥

 

सुबह किसी नदिया के तट से

लगभग आर्द्र दिखें ।

जन जन के विस्तृत ललाट पर

बस सौहार्द लिखें ।

 

जीवन के व्यापार जगत के

थे सदस्य जैसे –

लोगों को सुख देने का

व्यवसाय रहे पापा ॥

 

किसी भी जगह भरी भीड़ में

पहचाने जाते ।

भूल चुके लोगों की स्मृति में

फिर फिर आते ।

 

कर्मों की मोटी किताब जो

पढ़नी है सबको –

उसी ग्रंथ के छोटे से अध्याय

रहे पापा ॥

         

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

27-06-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४२ – कंफर्ट ज़ोन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३४२ कंफर्ट ज़ोन… ? 

प्रकाशन के अपने व्यवसाय के संदर्भ में काग़ज़ के थोक विक्रेताओं के बाज़ार में हूँ। यह मुख्य शहर की एक संकरी गली है। इमारतों के पुनर्विकास के बाद ऊपरी मंज़िलों पर फ्लैट बने हुए हैं और नीचे दुकानें हैं। अपना काम समाप्त कर निकलने ही वाला हूँ कि सड़क पर कुत्तों के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने के स्वर गूँजने लगे हैं।

देखता हूँ कि किसी फ्लैट में रहने वाली एक महिला अपने पालतू कुत्ते को घुमाने निकली हैं। कुत्ते के गले में बंधे पट्टे से लगी साँकल का एक सिरा महिला के हाथ में है। उसके दूसरे हाथ में डंडा है। इसी कुत्ते को देखकर और महिला के हाथ के डंडे के चलते गली के कुत्ते उनसे कुछ दूरी रखकर ही भौंक रहे हैं। गली के कुत्तों को आवारा या स्वतंत्र कहने का विकल्प पाठक अपने-अपने वैचारिक अधिष्ठान के अनुसार चुन सकते हैं।

तथापि इस आलेख का विषय आवारा या स्वतंत्र कुत्तों का भौंकना नहीं है। विषय है पालतू कुत्ते का उनकी ओर दृष्टि उठाकर भी न देखना। वह अपनी मालकिन के आश्रय में साँकल की परिधि में यहाँ- वहाँ कुछ सूँघता, कहीं-कहीं मुँह मारता चला जा रहा है। मेरी विचार-प्रक्रिया के केंद्र में इस घटना के संदर्भ में पालतू कुत्ते का व्यवहार है। क्रिया की प्रतिक्रिया, प्रकृति का नियम है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन ने इसे थर्ड लॉ ऑफ़ मोशन के द्वारा सिद्ध भी किया है। यह नियम कहता है कि किसी भी क्रिया के लिए हमेशा एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

इस घटना में पालतू कुत्ता, गली के कुत्तों के भौंकने की प्रतिक्रिया में भौंक नहीं रहा है। सोचता हूँ, पराधीनता से मिलता लाभ भी शनै:-शनै: सुविधा के गणित में बदल जाता है। यदि इस पालतू के स्थान पर गली का कुत्ता होता तो प्रतिरक्षा में भौंकता, उस गली में अपना स्थान बनाने के लिए लड़ता या अपने को निर्बल पाकर भाग खड़ा होता, जो भी करता, कोई न कोई प्रतिक्रिया अवश्य देता। यद्यपि हम उपेक्षा को भी प्रतिक्रिया कह सकते हैं पर प्राणी के बौद्धिक स्तर को देखते हुए यह तर्कसंगत नहीं लगता। यहाँ तो साँकल के संरक्षण में भौंकने की प्रक्रिया विस्मृत हो जाना अधिक तार्किक जान पड़ता है। 

परजीविता के इस उदाहरण में अपने स्वामी से प्राप्त भोजन, पोषण, सुविधा ने कुत्ते के लिए एक कंफर्ट ज़ोन तैयार कर दिया है। कंफर्ट ज़ोन भीतर ही भीतर मानसिक ग़ुलामी के लिए तैयार कर देता है।

मानसिक गुलामी की भयावता पर लगभग दो दशक पूर्व लिखी अपनी कविता स्मरण हो आई। ‘मन के हारे’ शीर्षक की यह कविता कहती है,

समय ने ली करवट / पिंजरा अब खुला है,

कैसा मोह है / पंछी अब भी उसी में पड़ा है,

आयु बीती स्वतंत्र होने की प्रतीक्षा में,

आकाश मापने की मनीषा में,

पर-जैसे-जैसे / समय बीतता है,

तन के साथ / मन भी ग़ुलाम हो जाता है,

पंछी हो या मनुष्य / मानसिक ग़ुलामी भयावह है ! 

यूँ भी आसानी से अपना कंफर्ट ज़ोन बिरले ही छोड़ पाते हैं। जबकि तथ्य यह है कि धरती की कक्षा में बने रहने का मोह हो तो अंतरिक्ष में प्रवेश नहीं किया जा सकता। यात्रा लंबी करनी हो, सोद्देश्य करनी हो तो कंफर्ट ज़ोन छोड़ने का साहस करना ही होगा। अपनी प्रकृतिगत विशेषताओं, अपने सिद्धांतों और तदनुकूल आचरण के साथ ‘कदापि समझौता नहीं’ के तत्व को अपनाना ही होगा।

सार है कि अपने मूल के साथ अपने अस्तित्व के अभिन्न संबंध को अनुभव करो और गंतव्य की ओर बढ़ो। यदि ऐसा कर सके तो जीवन रीतने का दुख नहीं अपितु सार्थक बीतने का संतोष होगा। अस्तु!

 

© संजय भारद्वाज 

(प्रात: 6:01 बजे, 27 जून 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३० – हास्य-व्यंग्य – “झुमकों का जादू और उनके दुश्मन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम  हास्य व्यंग्य  झुमकों का जादू और उनके दुश्मन

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३०

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “झुमकों का जादू और उनके दुश्मन” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

जब झुमकों का जिक्र होता है तो महिलाओं के सौंदर्य में चार चांद लगाते उनके कानों में लटकते-झूलते, मचलते झुमकों के साथ-साथ न जाने कितनी झुमकाधारी महिलाओं के चेहरे आँखों के सामने आ जाते हैं, झुमकों पर बने गीत और उन पर इठलाती हीरोइनें स्मृति में उभर आती हैं। वह गाना तो आपको याद ही होगा – “ढूंढो ढूंढो रे बलमा, ढूंढो रे सजना मेरे कान का बाला”। बाला गुम जाने से कितनी परेशान थी फिल्म गंगा जमुना की हीरोइन। …और वह गाना “कान में झुमका, चाल में ठुमका”। मैं समझता हूं कि कान में झुमका पहनने के बाद चाल में ठुमका शायद इसलिए लगाना पड़ता है कि ठुमके के कारण झुमका हिले और देखने – चाहने वालों के दिलों की धड़कने बढ़े। यों तो अब सभी जगह अच्छे झुमके मिलने लगे हैं किन्तु पहले बरेली के झुमके बहुत प्रसिद्ध थे – “झुमका बरेली वाला कानों में ऐसा डाला झुमके ने ले ली मेरी जान, हाय रे मैं तेरे कुर्बान।

यहां झुमके की ताकत समझिये और अपनी प्रिये को झुमके की सरप्राइज गिफ्ट देने की योजना बनाइये, निःसंदेह आपको मनचाहा फल मिलेगा। अभी हाल ही में इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने भी भारतीय परम्परा वाले झुमके पहिन कर पूरी दुनिया में झुमकों का हल्ला बोल दिया है। मुझे नहीं मालूम कि मेलोनी जी को झुमके पहनने के लिए किसने प्रेरित किया अथवा उन्हें ये झुमके किसने भेंट किये? आप चाहें तो भेंटकर्ता का अनुमान लगा सकते हैं, हो सकता है कि आपका अनुमान सही हो। बरेली शहर में बना झुमका चौराहा और वहाँ स्थापित विशाल झुमका इस बात का प्रमाण है कि हमारे देश में झुमके और झुमके पहनने वालियों का कितना सम्मान है। मैंने तो जब से इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी की झुमके वाली फोटो देखी है तब से उनके प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ गई है, वे मुझे जरा ज्यादा ही अपनी सी लगने लगी हैं। मेलोनी जी से मेरा आग्रह है कि वे जब भी भारत आएं झुमके पहिन कर ही आएं और बरेली का झुमका चौराहा घूमने अवश्य जाएं, किंतु सतर्क रहें न जाने कौन सा श्राप है कि बरेली के बाजार में महिलाओं के झुमके गिर जाया करते हैं। उल्लेखनीय है कि भारत का साहित्य झुमकों से भरा पड़ा है। झुमकों पर शायरों ने खुलकर लिखा है –

मुसीबत है ये तेरा झुमका जो तेरे गालों पर झूल गया,

कहने आया था मैं दिल की

बात और मैं भूल गया।

*

तेरे कानों का झुमका देख दिल जलता है,

मुझसे बेहतर तेरा झुमका है जो गालों को चूम जाता है।

*

इश्क की महाभारत में

झुमका किसी ब्रम्हास्त्र से कम नहीं ..।

*

जुल्फें सिर्फ बाईं तरफ न रखो,

दायां झुमका खुद को महफूज नहीं समझता।

भाइयो अब तो आप महिलाओं से झुमकों का रिश्ता समझ ही गए होंगे। दुख की बात है कि पुलिस की सतर्कता के बाद भी टुच्चे लुटेरों द्वारा सड़क पर महिलाओं के गले से चेन खींच कर भागने की घटनाओं में तो कोई कमी नहीं आई, हां अब मोटर साइकल सवार लुटेरे महिलाओं के झुमके भी खींच कर भागने लगे हैं। इससे महिलाओं का आर्थिक नुकसान तो हो ही रहा है, कान फटने से वे लहूलुहान भी हो रही हैं। कहीं ऐसा न हो कि लूट के डर से भयभीत महिलाएं झुमके पहनना ही छोड़ दें। इससे नारी के सौंदर्य की हानि के साथ साथ झुमका साहित्य की समृद्धि भी प्रभावित होगी। लुटेरों से आग्रह है कि झुमकों पर हाथ न डालें।

 

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७० ☆ # “यह बरसात का मौसम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “यह बरसात का मौसम…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७० ☆

☆ # “यह बरसात का मौसम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं 

 

तपता हुआ कण-कण है

व्याकुल तन मन है

दीवानें मेंघों को

धरती बुला रही है हर क्षण है

दीवानेपन की तड़प किसको बताएं

 

कागज की कश्ती में

खोया हुआ बचपन है

फुवारों की मस्ती में

डूबा हुआ यौवन है

अंतिम प्रहर में

यह यादें कितना रुलाएं 

 

यह पानी की बूंदे

सब है आंखें मूंदे

भीगती तरुणाई

अपने प्रीतम को ढूंढें

प्रीतम की दूरी

अब उसको कितना सताएं

 

यह मेघों की आंख  मिचोली

धरती से ठिठौली

कहीं भीषण गर्मी

तो कहीं वर्षा की होली

वर्षा है जीवन

अब कैसे समझाएं

 

यहां तो मर गया है

लोगों के आंखों का पानी

हर तरफ देखो

बस यही है कहानी

हर शख्स दूसरे को

कदम कदम पर आजमाएं

 

यह बरसात का मौसम

यह ठंडी हवाएं

यह तपती हुई धरती

घटाओं को बुलाएं/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -११३ – मुस्कुराओ कि… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मुस्कुराओ कि।)

☆ अभिव्यक्ति # ११३ ☆

☆ मुस्कुराओ कि☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

मुस्कुराओ कि जिंदगी लौटे,

रेत की तह पर नमी लौटे,

लबों पर जम गए हैं सन्नाटे,

कुछ किया जाए कि हंसी लौटे,

हमारी जिंदगी में इतनी कटुता कहां से आ गई, बचपन में तो नहीं थी, किसी के बारे में कभी नहीं सोचा कि उन्नति ना करें, कभी नहीं सोचा कि सुखी ना हो, हमारी संस्कृति में भी, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया… की बात की है. पर अब क्या हो गया अगर हम त्यौहार भी मनाते हैं तो कटुता से भरे रहते हैं. हम क्यों नहीं उसके घर जाकर उनकी खुशियों में शरीक होते हैं, क्यों नहीं, हम, खुशी को साझा करते हैं, दर्द भी साझा करें, खुशी भी साझा करें.

लेकिन क्या हो गया हम अपने आप में ही सिमट गए, दूसरे की खुशियां हम नहीं बांट सकते, हम दूसरों की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, हम अपने परिवार की खुशियों में शरीक नहीं होना चाहते, अकेलापन आप चाहते नहीं हो, तो आप चाहते क्या हो, प्रकृति आपके हिसाब से नहीं चलती, प्रकृति अपनी गति से गतिमान होती है, आपको ही सामंजस्य बिठाना पड़ता है.

प्रकृति के साथ, बारिश में भीगना छोड़ दिया, छत पर सुबह की धूप लेनी छोड़ दी, जब आप प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हैं, तब आप खुश होना सीख जाते हैं, खुशियां बांटनी चाहिए, दूसरों के गम में शरीक होना चाहिए, और जब आप खुशियां बांटना शुरू कर देते हैं दूसरों के गमों में शरीक होना शुरू कर देते हैं यकीन मानिए आपको भी कहीं ना कहीं अपार खुशी मिलती है.

कोशिश करके देखिए, जीवन जीने का रवैया बदल जाएगा, हंसिए, हंसाईये दूसरों की हंसी का कारण बनिए ऐसा कोई कार्य न करें, जो आप अपने लिए नहीं चाहते, मुस्कराये और दूसरों की मुस्कराहट का कारण बनिए, बस खुशियों से भरा जीवन जीना सीख लीजिए.

एक पुराने गाने की पंक्तियां याद आ गई,

आईये बहार को हम बांट लें,

जिंदगी के प्यार को हम बांट लें,

मिलकर रोयें, मिलकर मुस्कुराए हम,

आंसुओं की धार को हम बांट लें.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (29 जून से 5 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (29 जून से 5 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। कुछ लोग कहते हैं कि मुंह में राम बगल में छुरी परंतु हम श्री हनुमान जी के भक्त कहते हैं अगर मुख में राम हैं तो बगल में हनुमान हैं। श्री हनुमान जी के भक्त श्री हनुमान चालीसा को अपना आधार मानते हैं। हमारा विश्वास है कि श्री हनुमान चालीसा की चौपाइयां हमारे सभी कष्टों को दूर कर सकती है। आज कि श्री हनुमान चालीसा की चौपाई है –

संकट तें हनुमान छुड़ावै | मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ||

 इस चौपाई का संपुट पाठ करने से जातक को सभी प्रकार के संकटों से मुक्त रहता है।

“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 29 जून से 5 जुलाई 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य मिथुन राशि में, मंगल वृष राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

प्रारंभ में बुध कर्क राशि में मार्गी रहेगा परंतु 30 जून के 12:30 दिन से वह कर्क राशि में ही वक्री गति से भ्रमण करेगा। इसी प्रकार शुक्र प्रारंभ में कर्क राशि में रहेगा और 4 तारीख के 3:53 दिन से सिंह राशि में प्रवेश करेगा।

आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाई बहनों से संबंध सामान्य रहेंगे। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी परंतु प्रतिष्ठा मैं वृद्धि के लिए आपको विशेष प्रयास भी करना पड़ेगा। कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सावधान रहने का है। उनको कोई भी कार्य सावधानी पूर्वक करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख की दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें तथा शुक्रवार को मंदिर में जाकर विशेष रूप से सफेद वस्त्रो का या चावल का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। धन प्राप्त के लिए प्रयास भी करना पड़ेगा। भाई बहनों के साथ नरम संबंध रहेंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को अपने वाणी पर नियंत्रण करना चाहिए। आपके स्वास्थ्य में थोड़ी परेशानी आ सकती है। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। जनप्रतिनिधियों के प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से कभी-कभी मदद मिल जाएगी। परंतु भाग्य पर बहुत ज्यादा विश्वास ना करें। कर्म पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपके लिए चार और पांच जुलाई परिणाम दायक हैं। 29, 30 और 1 तारीख को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। धन आने का योग है। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगी। भाग्य के सहारे बिल्कुल ना बैठे। अपने कर्मों पर विश्वास करें और कुछ भी प्राप्त करने के लिए अपने कर्म का सहारा लें। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय अनुकूल है। 1 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

यह वर्ष कर्क राशि वालों के लिए उत्तम है। उनके लग्न में उच्च के गुरु विराजमान है जो की सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करने में सक्षम है। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आ सकते हैं। कचहरी के कार्यों में अगर आप सावधानी बरतेंगे तो विजय मिल सकती है। भाग्य से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख के दोपहर के से लेकर दो और तीन तारीख विभिन्न रूप से परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अद्भुत योग है। आपके थोड़े प्रयास से ही आपके पास अधिक धन आ सकता है। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। आप किसी अच्छे काम जैसे विवाह, शादी, जमीन खरीदना आदि कार्यों में धन व्यय कर सकते हैं। दुर्घटनाओं से थोड़ा सावधान रहने का प्रयास करें। वाहन चलाने में किसी प्रकार का रिस्क ना लें। अधिकारी और कर्मचारियों को अपने कार्यालय में सतर्कतापूर्वक कार्यौ को करना चाहिए। प्रतिष्ठा में वृद्धि का योग है। इस सप्ताह आपके लिए चार और 5 जुलाई प्रतिष्ठा दायक है। 1 तारीख के दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। धन आने का भी योग है। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनको अपने क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिलेगी। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे, परंतु समाप्त नहीं होंगे। भाई बहनों के साथ नरम संबंध रहेंगे। इस सप्ताह आपको अपने संतान से विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय फलदायक है। चार और पांच तारीख को आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका सामान्य रूप से साथ देगा। भाग्य से आपके कई कार्य निपट सकते हैं। परंतु फिर भी भाग्य पर बहुत ज्यादा भरोसा ना करें। अपने कर्म पर भरोसा करें। अधिकारी एवं कर्मचारियों को अपने कार्यालय में सतर्कता पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। छात्रों की पढ़ाई में परेशानी आ सकती है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख की दोपहर के बाद से लेकर दो और तीन तारीख परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपके आत्मविश्वास मैं वृद्धि होगी। कार्यालय में आपकी प्रतिष्ठा ठीक-ठाक रहेगी। भाग्य से थोड़ी बहुत मदद मिलेगी। धन आने का भी योग है। आपके माताजी या पिताजी को कष्ट हो सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके संतान से आपको मामूली सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए चार और पांच जुलाई उत्तम है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। । भाग्य से आपको मदद मिल सकती है। अगर आप विशेष प्रयास करेंगे तो आप अपने शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं। परंतु इस सप्ताह आपको शत्रुओं से सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। सामाजिक प्रतिष्ठा सामान्य रहेगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी के दिन भी ठीक-ठाक हैं। अपने कार्यों को सफल बनाने के लिए इस सप्ताह का भरपूर उपयोग करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। विवाह के नए प्रस्ताव सकते हैं। प्रेम संबंधों में वृद्धि संभव है। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। इस सप्ताह आप अपने संतान के प्रति थोड़ा सतर्क रहें। उनको कुछ कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। धन आने की थोड़ी सी उम्मीद की जा सकती है। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 1 तारीख की दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख आत्मविश्वास से भरपूर रहेंगे। इस दिन आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। इन तिथियां का पूरा उपयोग करें। 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय जागरूक और सचेत रहने का है। कोई भी कार्य बगैर सोचे समझे ना करें। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए सप्ताह अच्छा रहेगा। उनके कामों के प्रशंसा होगी। आपको अपने संतान से भी अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्र पढ़ाई में सफल रहेंगे। इस सप्ताह आपको अपने शत्रुओं से सावधान रहना चाहिए। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। आपके या आपके जीवनसाथी के स्वास्थ्य में थोड़ी समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए चार और पांच तारीख आपके लिए विभिन्न प्रकार से प्रभावशाली है। अच्छे कामों में इन तारीखों का उपयोग करें। 1 तारीख के दोपहर से लेकर दो और तीन तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। आपको अपने संतान से मदद प्राप्त हो सकती है। भाग्य भी आपका साथ दे सकता है परंतु कर्म पर ज्यादा विश्वास करें। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। उनके कामों को प्रशंसा मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 29, 30 और 1 तारीख की दोपहर तक का समय परिणाम दायक है। चार और पांच तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें।

 

जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक श्लोक ६५ आणि ६६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ६५ आणि ६६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ६५ – – 

नको दैन्यवाणे जिणे भक्तिऊणे ।

अती मूर्ख त्या सर्वदा दुःख दूणे ।

धरी रे मना आदरे प्रीती रामी । 

नको वासना हेमधामी विरामी ।६५।

अर्थ :: भक्तीविना जीवन म्हणजे दीनवाणे जगणे. ज्या मुर्खांना हे कळत नाही, त्यांचे दुःख वाढतच जाते. म्हणून हे मना, आदरपूर्वक रामावर प्रेम करायला शीक. सोन्याचे घर जरी असले पण त्यात रामाचा निवास नसला तर त्याची कामना काही उपयोगाची नाही.

(भक्तिऊणे – भक्तीशिवाय, जिणे – जगणे, दूणे – दुप्पट, हेमधामी – सोन्याचे घर, विरामी – ज्यात राम नाही असे)

विवेचन :: आधीच्या श्लोकात समर्थांनी अति काम किंवा अति लोभामुळे काय होते ते सांगितले. या श्लोकामध्ये ते आपल्याला भक्ती विना जीवन म्हणजे काय हे सांगत आहेत. ज्याप्रमाणे अति काम आणि क्रोध यांच्यामुळे व्यक्तीचे जगणे लाचारीचे होते, त्याप्रमाणेच भक्तीशिवाय जीवन म्हणजे दैन्यवाणे जगणे. भक्ती म्हणजे शक्ती! ती दिसत नाही पण जो ती मनापासून करतो, त्याला ती जाणवते. सुदामा हा श्रीकृष्णाचा मित्र जरी असला तरी प्रामुख्याने तो त्याचा भक्त होता. जवळ पैसा, वैभव नव्हते पण भक्तीचे तेज होते, शक्ती होती. अनेक संतांना विपरीत परिस्थितीत दिवस कंठावे लागले. त्यांच्याजवळ सत्ता, संपत्ती, वैभव यांचा अभाव होता. पण भक्तीची दौलत अपार होती. या भक्तीचे तेज त्यांच्या मुखावर विलसत होते. कोणत्याही परिस्थितीत आनंदी आणि समाधानी राहण्याची त्यांची वृत्ती होती.

पण ज्यांची भगवंतावर श्रद्धा नाही, असे लोक भक्तीविना जगतात. अशा लोकांचा कोणीही सहज बुद्धिभेद करू शकतो. देव कुठे आहे? उगाचच त्यावर श्रद्धा ठेवून कशाला जगायचे? जीवन आहे तोपर्यंत मौजमजा करून घ्या. असे सांगणारे लोक भेटतात. आपल्याला अशा गोष्टी लवकर पटतात. त्यामुळे भगवंतावरील श्रद्धा विसर्जित करून आपण ऐहिक जीवनाचा आनंद घेण्याचा प्रयत्न करतो. पण ऐहिक जीवनात जेव्हा पदोपदी अपयशाचे, अपमानाचे प्रसंग येतात, संकटे येतात तेव्हा माणूस खचतो. कारण कुठेही श्रद्धा नसते. कुठलाही आधार नसतो. ‘ Faith can move mountains ‘ अशी एक इंग्रजी म्हण आहे. श्रद्धेचे सामर्थ्य अपार असते. श्रद्धा तारक आहे. प्रल्हादाची भगवंतावर श्रद्धा होती. या श्रद्धेनेच त्याला सर्व प्रसंगातून तारून नेले. परंतु श्रद्धाहीन माणसाच्या जीवनात दुःखाचा गुणाकार होतो. म्हणूनच समर्थ तळमळीने आपल्याला आदरपूर्वक रामावर श्रद्धा ठेवायला, प्रेम करायला सांगतात.

हेमधामी आणि विरामी ही दोन विशेषणे समर्थांनी फार सुंदर योजली आहेत. हेमधामी म्हणजे सोन्याचं घर, राजवाडा. विरामी म्हणजे रामाशिवाय. हल्ली काही घरांमध्ये ‘ हे घर श्री महाराजांचे आहे ‘ अशी पाटी लावलेली आढळते. म्हणजे राहणाऱ्यांची अशी श्रद्धा असते की या घरात महाराज किंवा भगवंत राहतो. हे त्याच्याच मालकीचे आहे. म्हणजे भगवंताच्या छत्रछायेत आपण राहत असतो. आणि इथे भगवंत आहे ही भावनाच किती सुंदर! असे घर म्हणजे मंदिरच! हीच कल्पना थोडी आणखी विस्तारली तर आपला देह म्हणजे सुद्धा भगवंताचे निवासस्थान असेही आपल्याला म्हणता येते. त्याच्या श्रद्धेविना असलेला देह म्हणजे फक्त हाडामांसाचे शरीर!

घर सोन्याचे असले तरी घरात राहणाऱ्यांची जर भगवंतावर श्रद्धा नसेल, तर असे घर म्हणजे चार भिंतींचा एक तुरुंग! सोन्याचे घर म्हणजे राजवाडा, वैभव! पण जिथे राम नाही त्या घराची किंमत शून्य. ज्या दगडांवर रामनाम लिहिले जाते, ते दगड सुद्धा तरतात. रामावर म्हणजे भगवंतावर श्रद्धा नसलेली व्यक्ती म्हणजे मूढ पाषाणच! या संसार सागरात ती बुडणारच हे ठरलेले आहे! महाभारत युद्धाच्या प्रसंगी अर्जुन आणि दुर्योधन श्रीकृष्णाकडे मदत मागण्यासाठी जातात. भगवंत म्हणतात, ” एका बाजूला निःशस्त्र असलेला मी आहे आणि दुसऱ्या बाजूला माझी नारायणी सेना. त्यातून ज्याला जे हवे ते त्याने मागून घ्यावे. ” या प्रसंगी दुर्योधन नारायणी सेना मागून घेतो आणि अर्जुन भगवंताला. ही कथा आपल्या सगळ्यांना माहिती आहे. पण अर्जुनाची भगवंतावर दृढ श्रद्धा होती. म्हणून मला भगवंतच हवा असे त्याला ज्या तीव्रतेने वाटले तसे दुर्योधनास वाटणे शक्यच नव्हते. नारायणाशिवाय नारायणी सेना काय कामाची? म्हणून अर्जुनाला जसे तीव्रतेने वाटले की मला भगवंतच हवा तसे आपल्यालाही वाटले पाहिजे. तेव्हा हे मना, आदरपूर्वक रामरायावर प्रेम करायला शीक हेच समर्थांचे सांगणे आहे.

स्वसंवाद :: 

१) माझ्या जीवनात श्रद्धेचा आधार किती आहे? संकटाच्या वेळी मी खचतो की स्थिर राहतो?

२) मी ‘नारायणी सेना’ (संपत्ती, साधने) निवडतो की ‘नारायणाची ‘ निवड करतो?

३) माझे घर ‘हेमधामी’ आहे की ‘रामधामी’?

४) माझ्या आनंदाचा स्रोत बाह्य गोष्टींमध्ये आहे की अंतर्मनातील भक्तीत?

– – – – 

श्लोक क्र. ६६ – – 

नव्हे सार संसार हा घोर आहे ।

मना सज्जना सत्य शोधूनि पाहे ।

जनीं वीष खाता पुढे सूख कैचें?

करी रे मना ध्यान या राघवाचे ।६६।

अर्थ :: हे मना, हा संसार अनित्य आणि असार आहे. घोर म्हणजे भयंकर आहे. तूच याचा जरा विचार करून सत्य शोधून काढ. एखाद्याने विष भक्षण केले तर ते वाईट परिणाम केल्यावाचून कसे राहील? तेव्हा तू भगवंताची भक्ती कर.

विवेचन :: 

या श्लोकामध्ये संसाराचा फोलपणा समर्थ आपल्याला पटवून देत आहेत. हा संसार असार आहे. विनाशी आहे. संसारात सुखी झाला आणि सुखदुःखे भोगावी लागली नाही असा मनुष्य आढळणे कठीण! त्यातून संसार घोर म्हणजे भयंकर आहे. संत या सगळ्यातून गेले आहेत. संत तुकारामांना भयंकर असा दुष्काळाचा सामना करावा लागला. त्यात मुलेबाळे, पत्नी यांची आहुती गेली. पण संसाराचा फोलपणा त्यांच्या लक्षात आला होता. त्यामुळेच त्यातून बाहेर काढणारी एकच गोष्ट त्यांना माहित होती. ती सारभूत गोष्ट म्हणजे विठ्ठल. त्याचाच ध्यास त्यांनी घेतला होता. सर्वच संतांनी संसाराचा हा फोलपणा लक्षात घेऊन जनसामान्यांना ईश्वरभक्तीचा उपदेश केला. आम्हाला संतांचे सांगणे समजत नाही असे नाही. पण त्यातील फोलपणा ध्यानी घेऊनही आम्ही या विषाचा अनुभव घ्यायला तयारच असतो. विष खाल्ले की ते त्याचे परिणाम दाखवणारच! विष खाल्ले आणि चांगला अनुभव आला असे कधी होऊच शकत नाही. ते त्याचा प्रभाव दाखवणारच. इथे विष म्हणजे विषयासक्ती असाही अर्थ घेता येईल.

म्हणून समर्थ या श्लोकात म्हणतात, ” हे मना, दुसऱ्यांचे सांगणे तुला पटत नसेल तर तू स्वतः अनुभव घेऊन बघ. तू स्वतः त्यातील सत्य शोधून काढ. कधी कधी माणसे दुसऱ्याच्या अनुभवाने शहाणे होत नाहीत. म्हणून स्वतःला जो अनुभव येतो, त्यावर सारासार विचार करून त्यातून तरी योग्य निष्कर्ष आपल्याला काढता आला पाहिजे. समर्थ आपल्याला संसाराचा त्याग करा असं सांगत नाहीत तर त्यातील फोलपणा ध्यानी घेऊन त्यातील आसक्ती कमी करा असेच त्यांचे सांगणे आहे. संसाराकडे साक्षीभावाने आपल्याला पाहता आले पाहिजे. पाण्यात आणि चिखलात राहूनही जसे कमळ त्यापासून अलिप्त असते तसेच आसक्तिरहित आपल्याला संसारात राहता आले पाहिजे.

एकदा सत्य लक्षात आल्यानंतर मग त्यातून बाहेर पडण्याचा उपाय करता येतो. संसार करताना आपल्या लक्षात येतं की आपल्याला समजायला लागल्यापासून आपण या प्रपंचात किती गुंतत चाललो आहोत. सगळ्यांची मने सांभाळताना आपली किती ओढाताण होते आहे! किती दिवस ही लटकी नाती जपायची? कोणाकोणाचा अहंकार जपायचा? पैसा कमवायचा तरी किती? किती पैसा मिळवला म्हणजे तो पुरे झाला असे होते? ही संपत्ती, हे घरदार मी कोणासाठी कमावतो आहे? हे सगळे तर इथेच ठेऊन जावे लागणार आहे. आपल्यापुढे दोनच पर्याय असतात. एकतर ठेऊन जा, नाहीतर देऊन जा. बरोबर घेऊन जाण्याचा पर्याय आपल्याला परमेश्वराने दिलेला नाही. बरं, ज्यांच्यासाठी हे सर्व करावं, ती पोरंबाळं तरी नंतर आपल्याला विचारतील याची काय खात्री आहे? गेल्यानंतर काही दिवस आपली तसबीर भिंतीवर लागेल. तिची पूजा होईल. काही दिवसांनी तीही निघून जाईल. हे जगच अनित्य आणि मर्त्य आहे. आधीच्या श्लोकांत समर्थांनी सांगितल्यानुसार ‘ मरे एक त्याचा दुजा शोक वाहे, अकस्मात तोही पुढे जात आहे. ‘ अशी परिस्थिती असते. तरी आपल्याला केवढा गर्व असतो, आपल्या पैशाचा, रूपाचा, सत्तेचा!

हा सगळा विचार कदाचित कोणाला निराशावादी वाटण्याची शक्यता आहे. पण वस्तुस्थितीकडे डोळेझाक केली तरी वस्तुस्थिती थोडीच बदलते! उलट वस्तुस्थिती समजली तर त्यातून बाहेर पडण्याचा उपाय करता येतो. यावर एकच उपाय आहे. असार संसाराला बाजूला सारून जे सार म्हणजे रामनाम आहे, तेच जीवी धरावे. धान्य पाखडण्याचे सूप आपल्याला माहिती असेल. धान्य पाखडताना ते त्यातील असार म्हणजे खडे, केरकचरा आदी बाहेर टाकून देते. आणि सार म्हणजे जे धान्य आहे ते धरून ठेवते. आपणही सुपाची भूमिका करावी. असार सर्व सोडून द्यावे आणि सार म्हणजे भगवंत त्यालाच घट्ट धरून ठेवावे. रामरायाचे ध्यान सर्व सुख देणारे आहे. ते ‘ मंगल दर्शन पूर्णविराम ‘ असे आहे. ” म्हणून हे मना, या राघवाचे ध्यान कर “असे समर्थ तळमळीने आपल्याला सांगत आहेत.

स्वसंवाद :: 

१) मी संसार करताना त्यात अडकतो आहे का, की त्याकडे साक्षीभावाने पाहतो आहे?

२) “विष” म्हणून सांगितलेली विषयासक्ती माझ्या जीवनात कोणत्या रूपात आहे?

३) मी इतरांच्या अनुभवातून शिकतो का, की स्वतः धडपडूनच शिकतो?

४) माझ्या आयुष्यात “सार” आणि “असार” यातील फरक मला स्पष्टपणे कळतो का?

५) मी रोजच्या जीवनात भगवंताच्या स्मरणासाठी वेळ काढतो का, की तो पुढे ढकलतो?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ६५ आणि ६६.

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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