हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२९ ☆ ज़रूरतें व ख्वाहिशें… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़रूरतें व ख्वाहिशें। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया है दो दिनों का मेला/ स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२९ ☆

☆ ज़रूरतें व ख्वाहिशें… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘ज़रूरत के मुताबिक ज़िंदगी जीओ; ख्वाहिशों के मुताबिक नहीं, क्योंकि ज़रूरतें तो फ़कीरों की भी पूरी हो जाती हैं, मगर ख्वाहिशें बादशाहों की भी अधूरी रह जाती हैं।’ इच्छाएं सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं, जिनका अंत संभव नहीं होता। उनका आकाश बहुत विस्तृत है, अनंत है, असीम है और एक इच्छा के पश्चात् दूसरी इच्छा तुरंत जन्म ले लेती है, परंतु इन पर अंकुश लगाने में ही मानव का हित है। ख्वाहिशें एक ओर तो जीने का मक़सद हैं, कर्मशीलता का संदेश देती हैं, जिनके आधार पर हम निरंतर बढ़ते रहते हैं और हमारे अंतर्मन में कुछ करने का जुनून बना रहता है। दूसरी ओर संतोष व ठहराव हमारी ज़िंदगी में पूर्ण विराम लगा देता है और जीवन में करने को कुछ विशेष नहीं रह जाता।

ख्वाहिशें हमें प्रेरित करती हैं; एक गाइड की भांति दिशा निर्देश देती हैं, जिनका अनुसरण करते हुए हम उस मुक़ाम को प्राप्त कर लेते हैं, जो हमने निर्धारित किया है। इनके अभाव में ज़िंदगी थम जाती है। इंसान की मौलिक आवश्यकताएं रोटी, कपड़ा और मकान हैं। जहाँ तक ज़रूरतों का संबंध है, वे आसानी से पूरी हो जाती हैं। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है और अंत में उन में ही समा जाता है। वैसे भी यह सब हमें प्रचुर मात्रा में प्रकृति प्रदत्त है, परंतु मानव की लालसा ने इन्हें सुलभ-प्राप्य नहीं रहने दिया। जल तो पहले से ही बंद बोतलों में बिकने लगा है। अब तो वायु भी सिलेंडरों में बिकने लगी है।

कोरोना काल में हम वायु की महत्ता जान चुके हैं। लाखों रुपए में एक सिलेंडर भी उपलब्ध नहीं था। उस स्थिति में हमें आभास होता है कि हम कितनी वायु प्रतिदिन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़कर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। परंतु प्रभुकृपा से वायु हमें मुफ्त में मिलती है, परंतु प्रदूषण के कारण आजकल इसका अभाव होने लगा है। प्रदूषण के लिए दोषी हम स्वयं हैं। जंगलों को काटकर कंक्रीट के घर बनाना, कारखानों की प्रदूषित वायु व जल हमारी श्वास-क्रिया को प्रदूषित करते हैं। गंदा जल नदियों के जल को प्रदूषित कर रहा है, जिसके कारण हमें शुद्ध जल की प्राप्ति नहीं हो पाती।

सो! ज़रूरतें तो फ़कीरों की भी पूरी हो जाती है, परंतु ख़्वाहिशें राजाओं की भी पूरी नहीं हो पाती, जिसका उदाहरण हिटलर है। उसने सारी सृष्टि पर आधिपत्य प्राप्त करना चाहा, परंतु जीवन की अंतिम वेला में उसे ज्ञात हुआ कि अंतकाल में इस जहान से व्यक्ति खाली हाथ जाता है। इसलिए आजीवन राज्य विस्तार के निमित्त आक्रमणकारी नीति को अपनाना ग़लत है, निष्प्रयोजन है। सम्राट अशोक इसके जीवित प्रमाण हैं। उसने सम्राट के रूप में सारी दुनिया पर शासन कायम करना चाहा और निरंतर युद्ध करता रहा। अंत में उसे ज्ञात हुआ कि यह जीवन का मक़सद अर्थात् प्रयोजन नहीं है। सो! उसने  सब कुछ छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना लिया।

‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यहाँ हर इंसान मुसाफ़िर है। वह खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है। इसलिए संचय की प्रवृत्ति क्यों? ‘यह दुनिया है दो दिन का मेला/ हर शख़्स यहाँ है अकेला/ तन्हाई संग जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ स्वरचित गीतों की पंक्तियाँ इन भावों को पल्लवित करती हैं कि वैसे तो यह जन्म से पूर्व निश्चित हो जाता है कि वह कितनी साँसें लेगा? इसलिए मानव को अभिमान नहीं करना चाहिए तथा सृष्टि के कण-कण में परमात्मा की सत्ता अनुभव करनी चाहिए, जो उसे प्रभु सिमरन की ओर प्रवृत्त करती है।

सो! मानव को स्वयं को इच्छाओं का गुलाम नहीं बनाना चाहिए। यह बलवती इच्छाएं मानव को ग़लत कार्य करने को विवश करती हैं। उस स्थिति में वह उचित-अनुचित के भेद को नहीं स्वीकारता और नरक में गिरता चला जाता है। अंतत: वह चौरासी के चक्कर से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता। इससे मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय है प्रभु सिमरन। जो व्यक्ति शरणागत हो जाता है, वह निर्भय होकर जीता है आगत- अनागत से बेखबर…उसे भविष्य की चिंता नहीं होती। जो गुज़र गया है, वह उसका स्मरण नहीं करता, बल्कि वह वर्तमान में जीता है और प्रभु का नाम स्मरण करता है और गीता का संदेश ‘जो हुआ, अच्छा हुआ/ जो होगा, अच्छा ही होगा ‘ वह इसे जीने का मूलमंत्र स्वीकारता है। प्रभु अपने भक्तों की कदम-कदम पर सहायता करता है।

अक्सर ज़्यादा पाने की चाहत में हमारे पास जितना उपलब्ध है, उसका आनंद लेना भूल जाते हैं। इसलिए संतोष को सर्वश्रेष्ठ धन स्वीकारा गया है। इसलिए कहा जाता है कि ‘श्रेय मिले ना मिले, अपना श्रेष्ठ देना बंद ना करें। आशा चाहे कितनी कम हो, निराशा से बेहतर होती है।’ इसलिए दूसरों से उम्मीद ना रखें और सत्कर्म करते रहें, क्योंकि यह ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल व ग़लती है, जो हमें पथ-विचलित करती है। इंसान का मन भी एक अथाह समुद्र है। किसी को क्या मालूम कि कितनी भावनाएं, संवेदनाएं, सुख-दु:ख, हादसे, स्मृतियाँ आदि उसमें समाई हैं। इसलिए वह मुखौटा धारण किए रखता है और दूसरों पर सत्य उजागर नहीं होने देता। परंतु इंसान कितना भी अमीर क्यों ना बन जाए, तकलीफ़ बेच नहीं सकता और सुक़ून खरीद नहीं सकता। वह नियति के हाथों का खिलौना है; विवश है, क्योंकि वह अपने निर्णय नहीं ले सकता।

‘जो तकलीफ़ तुम ख़ुद बर्दाश्त नहीं कर सकते, वो किसी दूसरे को भी मत दो।’ महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत कारग़र है। इसलिए वे दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करने का संदेश देते हैं, जिसकी अपेक्षा आप दूसरों से नहीं करते हैं। संसार में जो भी आप किसी को देते हैं, वह लौट कर आपके पास आता है। इसलिए दूसरों की ज़रूरतों की पूर्ति का माध्यम बनिए ताकि आपकी ख़्वाहिशें पूरी हो सकें। इसके साथ ही अपनी इच्छाओं आकाँक्षाओं, तमन्नाओं व लालसाओं पर अंकुश लगाइए, यही जीवन जीने की कला है।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हे राम धरा पर आ जाओ…।

? रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

हे राम धरा पर आ जाओ,

प्रभु फिरती अकुलाई।

खोई है मानवता जग ने,

कली-कली मुरझाई।।

‌*

दानवता प्रभु खूब बढ़ी है,

रक्षक बनकर आओ।

संस्कारों को भूल गए सब,

आकर नाथ सिखाओ।।

समरसता का पाठ पढ़ा दो,

दूर करो कठिनाई।

*

भ्रष्टाचारी पनप रहे हैं,

भ्रष्टाचार मिटादो।

भय से हीन जगत् हो सारा,

अत्याचार हटादो।।

अंत करो मन के रावण का,

हर उसकी परछाई।

*

राह प्रगति की खोलो सारी,

हो संस्कृति संस्थापक।

पोषित कर दो धर्म सनातन,

प्रभु हो शांति उपासक।।

राम राज्य फिर से आ जाए,

सुरभित हो अँगनाई।

*

रघुकुल रीति निभाने वाले,

प्रभु हो अन्तर्यामी।

तकती राह अहल्या फिर से,

दे दो दर्शन स्वामी।।

कलियुग के सब कलुष दूर हों,

मुक्तिधाम रघुराई ।

*

विनती करते रघुकुल भूषण,

शरणागत आते हैं।

वंदन अभिनंदन हैं प्रभुजी,

रामचरित गाते हैं।।

करुणानिधि सुख के सागर हो,

समय बड़ा दुखदाई।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२९ ☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – संवाद।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२९ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – संवाद ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

पूछा हमने प्यार से, तेरी हाँ थी जान।

अब मैं तो पछता रहा, नहीं किया हैं मान।।

 *

घड़ी मिलन की देखता, आओगी अब पास।

अन्तस में तुम! ही बसी, बस चाहत की आस।।

 *

तेरे इस व्यवहार से, छूटे मेरे प्राण।

उमड़ा मन में ज्वार था, मगर दूर अरमान।।

 *

नहीं कहा मैंने गलत, जलता मैं दिन-रात।

उमड़ा सागर भाव का, सुन मेरी यह बात।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३११ ☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय मुक्तक – प्यार और ऐतवार… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३११ ☆

☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

आजकल लड़कियों पर  ऐतवार  कौन करे

बदलते  हालात  में सच्चा  प्यार  कौन करे

जिस कदर करतीं हैं विश्वास घात लडकियाँ

साथ  इनके  अब  सद  व्यबहार कौन करे

*

प्यार  में  इतने  जुनूनी  हो  गए

चाह में प्रेमी की मगनूनी हो गए

प्रेम में  अंधे  हुए वो  इस  कदर

हत्या  कर के  खुद खूनी हो गए

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १६ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # १६ ☆

? आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

आज मैं आपको ले चलती हूँ भारत के एक ऐसे जिले के किस्से सुनाने जो असीम विषमताओं को समेटे, सिंधुघाटी संस्कृति या हड़प्पा सभ्यता या सिंधु-सरस्वती सभ्यता से लेकर अत्याधुनिक बंदरगाह और ट्रेड के लिये जाना जाता हैl यहाँ की प्रजा खुमारी में जीती हैl यहाँ हड़प्पन वर्ल्ड संस्कृति का चौथा शहर धोलावीरा हैl वो धोलावीरा जो उस समय का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र थाl यहाँ ओमान, अरब, इराक के व्यापारी समुद्र मार्ग से आकर व्यापार करते थेl इस बात की पुष्टि के लिये व्यापार के अवशेष यहाँ देखने को मिलते हैंl यह इतिहास का वह काल था जब मनुष्य ने टिन और ताम्बे के औजार और हथियार बनाने शुरू किये थेl यूनेस्को ने धोलावीरा को विश्व धरोहर में स्थान दिया है और भारत सरकार ने इसे गुजरात राज्य के चौथे विश्व धरोहर का नाम दे दियाl

पढ़ने में आता है कि जलवायु परिवर्तन एवं नदियों के सूखने के कारण वहाँ बहुत भयंकर सूखा पडा जिसके चलते लोगो को शहर छोड़ देना पड़ा और आज ये धोलावीरा खंडहर बन गयाl

 ऐसा जिला जिसने अपने आप को विनाशकारी, दर्दनाक भूकंप से धराशाई होने पर भी पुनः संगठित कियाl ऐसा जिला जिसकी भूमि जो आज भी 23 प्रकार के खनिज सम्पदा अपने में समेटे हैl ऐसा जिला जहाँ दो बंदरगाह, चार हवाई अड्डे, दो ट्रेन टर्मिनस, पहाड़, रेगिस्तान और समुद्र सभी एक ही जगह पर दिखते हैंl

यह जिला हिंदूस्तान में क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है, जिसकी ब्रिटिश सरकार के समय अपनी स्वयं कि मुद्राएँ होती थींl

हाँ जी आप में से बहुत लोगों ने इसे पहचान ही लिया होगाl यह जिला हमारे देश भारत के उत्तर पश्चिम का, समुद्र में तैरते हुए कछुए जैसा दिखने वाला कच्छ हैl इसकी धरती शांत और रहस्यमयी जरूर है परन्तु यह धरती प्राकृतिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से अति संवेदनशील भी हैl हमारी सीमा सुरक्षा बल की सुरक्षा के कारण इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का अभेद्य प्रहरी भी कहा जाता हैl

इस जिले की पूर्वी सीमा राजस्थान को एक छोटे रण द्वारा छूती हैl पश्चिमी सीमा पर विशाल अरब सागर रेत के धोरों और लहरों का एक अद्वितीय संगम हैl उत्तर में पाकिस्तान और कच्छ का महान रण हैl साथ ही दक्षिण में कच्छ की खाड़ी हैl

  – क्रमशः

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०४१ ⇒ पतिव्रता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पतिव्रता…“।)

?अभी अभी # १०४१ ⇒ आलेख – पतिव्रता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

००० पतिव्रता ०००

जो पत्नी अपने पति के लिए व्रत-उपवास रखे, वह पतिव्रता कहलाती है। ये पतिव्रताएं भारतवर्ष में बहुतायत से पाई जाती हैं। पति, देव भी है, और परमेश्वर भी। पत्नी केवल धर्म-पत्नी है। धर्म-पिता, धर्म-भाई और धर्म-बहन तो होते हैं, लेकिन धर्म-पति नहीं होते।

पति चूँकि परमेश्वर होते हैं, इसलिए वे व्रत-उपवास नहीं रखते! हड़ताली तीज और करवा चौथ की तरह पत्नी के लिए कोई भी व्रत-उपवास के बंधनों से वे मुक्त रहते हैं। विवाह के वक्त सात फेरों में ही सात जन्मों का एडवांस बुकिंग हो जाता है। बहु-पत्नी होने पर सात जन्मों तक इन पत्नियों को बहुतायत से झेलना भी पड़ सकता है।।  

अक्सर पतिव्रताएं, अगले जनम मोहे यही पति दीजो, के लिए और पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, लेकिन अपने पति को भूखा नहीं रखती। पतिव्रता का यही त्याग रिज़र्व बैंक के गवर्नर की तरह अगले जन्म में उसी पति के लिए वचन-बद्ध होता है, लेकिन नोटबन्दी की तरह इस वचन में शिथिलता भी लाई जा सकती है।

आदतन सभी पतिव्रताएं धार्मिक ही होती हैं। लेकिन उनके पुण्य एक अलिखित विधान के तहत 50 प्रतिशत पतिदेव को ट्रांसफर हो जाते हैं। पति तो एक धार्मिक, सुशील पत्नी पाकर ही धन्य हो जाता है, जब कि एक पतिव्रता, जैसा भी है, मेरा पति देवता है, मानकर अपने जीवन को धन्य मान लेती है।।  

पत्नी को अन्नपूर्णा भी कहा गया है और गृह-लक्ष्मी भी! लेकिन यह अन्नपूर्णा अपने पति के भोजन करने के बाद ही अन्न ग्रहण करती है। दहेज में लक्ष्मी लाने के कारण ही वह लक्ष्मी कहलाती है और पति लक्ष्मी-पति होता है, स्वामी होता है, घर वाला होता है। पड़ोसियों की दृष्टि में ज़रूर वह उसकी घर-वाली होती है।

जब देश डिजिटल हो रहा है, तो पुरानी मान्यताएँ भी बदल रही हैं। पतिदेव भी आजकल धर्म-पत्नी के लिए व्रत-उपवास रखने लगे हैं। चाँद सी महबूबा के होते हुए वे क्यूँ पति-व्रताओं की देखादेखी करवा-चौथ के दिन चलनी की आड़ में चाँद को देख अपना व्रत तोड़ें।।  

21 वीं सदी साथ-साथ चलने की है। महिला सशक्तिकरण ने पति-व्रताओं के दायरे बढ़ा दिए हैं।

अब वह पति के चरणों की दासी नहीं, पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली सह-धर्मिणी हो गई है। अपनी मर्यादा में रहते हुए वह सभी कर्त्तव्यों का पालन भी कर लेती है और घर-गृहस्थी सुचारू रूप से चलाते हुए, तीज-व्रत-उपवासों का भी मनोयोग से पालन करते हुए, अपने जीवन को धन्य करती है।

यूँ ही नहीं कहा गया है!

तुमसे ही घर, घर कहलाया।।  

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३० – कविता – बारिश की बूंदे… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बारिश की बूंदे…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३० ☆

? कविता – बारिश की बूंदे…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

छम छम करके बरसें बूंदे,

नाचे जैसे संग सितार…

मन नाच रहा संग में,

सुनकर राग मल्हार…

 

सर से अपने हटा के छतरी,

सुन लो मेघों की प्रेम पुकार…

भीग जाने दो तन को,

मन को हो जाने दो तर,

लंबा रास्ता तय कर आई बरखा,

तुमसे मिलने, धर बूंदों का आकार…

 

बहुत समय तक तरसे नैना,

तब जाकर हुआ दीदार…

साकार होते देख लो,

अब अपना यह इंतजार…

कुछ अपनी कहो, कुछ उनकी सुनो…

मन की बातें करो हज़ार…

 

बसा के माटी की भीनी खुशबू…

सांस महक, हो जाए खुशगवार…

छमक कर लाई, प्रीत संदेशा,

जैसे हरसू बरसे,

खुशियों का उपहार…

हटा के छतरी, गले लगा लो,

स्वीकार करो यह अमोल बौछार…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०१ – निघाली पालखी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # ३०१ – विजय साहित्य ?

☆ निघाली पालखी…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

(संत तुकाराम महाराज पालखी सोहळा)

( सहाक्षरी रचना )

☆

इनाम दाराचा

सोडूनीया वाडा

निघाली पालखी

सवे गावगाडा ..! १

*

आकुर्डी गावच्या

विठू मंदीरात

तुकोबा पालखी

थांबे गजरात ..! २

*

पुण्य नगरीत

स्वागत सन्मान

जागोजागी चाले

अन्न वस्त्र दान ..! ३

*

पालखी विठोबा

पुण्यनगरीत

निवडुंग्या विठू

रमे पालखीत..! ४

*

लोणी काळभोर

रंगलासे मेळा

सोलापूर मार्गी

हरीनाम वेळा..! ५

*

तुकोबा पालखी

यवत मुक्काम

दिंड्या पताकांत

निनादते धाम ..! ६

*

वरवंड गावी

पालखी निवास

आषाढी वारीचा

 सुखद प्रवास ..! ७

*

आनंदाचा कंद

गवळ्याचे नाव

रंगले वारीत

उंटवडी गाव…! ८

*

मंगल पवित्र

क्षेत्र बारामती

कैवल्याची वारी

सुखाच्या संगती …! ९

*

सणसर गावी

विठ्ठल जपात

रंगली पालखी

हरी कीर्तनात…! १०

*

आंथुर्णे गावात

घेताच विसावा

माय माऊलीत

विठ्ठल दिसावा…! ११

*

गोल रिंगणाचा

बेळवंडी थाट

निमगावी क्षेत्री

केतकीची वाट..! १२

*

इंदापुर येता

गण गवळण 

रिंगणाचे वेध

अभंगात मन…! १३

*

सुमनांची वृष्टी

सराटी गावात

अमृताची गोडी

विठ्ठल नामात..! १४

*

गोल रिंगणाचे

अकलूज गांव

मनामधे जागा

विठू भक्तीभाव…! १५

*

येता बोरगाव

दिंडी नाचतसे

काया वाचा मनी

विठू राहतसे…! १६

*

पिराची कुरोली

शिगेला गजर

पाहण्या पंढरी

पोचली नजर..! १७

*

वाखरी गावात

मिलनाची वेळा

रमला वारीत

वैष्णवांचा मेळा..! १८

*

कळस दर्शंनी

पाऊले अधीर

काया वाचा मनी

धरवेना धीर..! १९

*

दोहो पालख्यांचा

वाखरीत मेळ

विठू दर्शनाची

यथोचित वेळ…! २०

*

वैष्णवांची वारी

हरीनाम घोष

वारीचा सोहळा

परम संतोष…! २१

*

पोचल्या पालख्या

पंढरपुरात

आनंदला विठू

भक्तीच्या सुरात..! २२

*

निघाली पालखी

कैवल्य भरारी

विठूच्या सेवेत

पंढरीची वारी…! २३

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… पंढरीचे वर्णन – भाग – २८ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… पंढरीचे वर्णन – भाग – २८ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

पंढरीचे वर्णन

भूतलावरील वैकुंठ, पंढरपूर या श्रीक्षेत्राचे वर्णन आणि महात्म्य सांगणाऱ्या गाथेतील अभंगांचे आपले विवेचन चालू आहे. आज आणखी काही अभंग पाहूया.

पंढरपूर कसे आहे, तेथे काय काय चालते याचे वर्णन करणारा हा एक फार सुंदर अभंग पहा.

जववरी नाही देखिली पंढरी/

वर्णीशील थोऱी वैकुंठीची//

मोक्ष सिद्धी तेथे हिंडे दारोदारी/

होऊनी कामारी दीनरूप//

वृंदावन सडे चौक रंगमाळा/

अभिनव सोहळा घरोघरी//

नामघोष कथा पुराण कीर्तनी/

ओवीया कांडणी पांडुरंग//

सर्व सुख असे तेथे सर्वकाळ/

ब्रह्म ते केवळ नांदतसे//

तुका म्हणे जे न साधे सायासे/

प्रत्यक्ष ते दिसे विटेवरी//

तुकाराम महाराज भक्ताला सांगतात, ” जोपर्यंत तू पंढरपूर पाहिले नाहीस, तोपर्यंत तू वैकुंठाची थोरवी वर्णन करशील. या पंढरपुरात सिद्धी आणि मोक्ष सांगकामे(कामारी) होऊन दारोदार दीनपणे हिंडत असतात. अर्थात ज्याचे पाय पंढरपुरास लागतात, त्याला मोक्षप्राप्ती नक्की होते. इथे घरोघरी तुळशी वृंदावने आहेत, रस्ते झाडून जागोजागी सडासंमार्जन आणि रांगोळ्या घातलेल्या दिसतात. घरोघरी अभिनव सोहळे चालू आहेत. कथा, पुराणे, कीर्तने, नामघोष होत आहेत. दळण- कांडण करताना स्त्रिया पांडुरंगाला आळवून ओव्या गात आहेत. या इथे सर्वकाळ सर्व सुखे असून मूर्तीमंत ब्रह्माचा वास आहे. मोठ्या कष्टाने जे प्राप्त होऊ शकत नाही, ते ब्रह्म या ठिकाणी प्रत्यक्ष विटेवर उभे आहे.

होय होय वारकरी/ पाहे पाहे रे पंढरी//

काय करावी साधने/ फळ अवघेची येणे//

अभिमान नुरे/ कोड अवघेची पुरे//

तुका म्हणे डोळा/ विठोबा बैसला सावळा//

पुढे महाराज भक्तांना सांगतात की, वारकऱ्यांनो पंढरीचे दर्शन घ्या. बाकीच्या साधनांची काही जरुरी नाही. सर्व फळ या पंढरपुरातच मिळते. अभिमान राहत नाही.

(या ठिकाणी अभिमानाचा अर्थ देहाभिमान असा आहे) सर्व मनोकामना पूर्ण होतात. डोळ्यामध्ये सावळ्या विठ्ठलाचे रूप भरून राहते, त्यामुळे सर्वत्र त्याचाच प्रत्यय येतो.

पंढरीसी जाये/ तो विसरे बाप माय//

अवघा होय पांडुरंग/ राहे धरुनिया अंग//

नलगे धन मान/ देह भावे उदासीन//

तुका म्हणे मळ/ नाशी तात्काळ ते स्थळ//

यासाठी वारकऱ्यांनो पंढरपुरी जा, तेथील पांडुरंगाचे दर्शन घेतल्यावर तुम्ही तुमचे मायबाप विसराल. याचाच अर्थ असा तुम्हाला प्रापंचिक आसक्ती राहणार नाही. तुम्ही स्वतःच पांडुरंग रुपी व्हाल आणि त्याच स्थितीत राहाल. कसलाच अभिमान न राहता तुमच्या सर्व इच्छा पूर्ण होतील. धनद्रव्य, मानसन्मान याची इच्छा तुमच्या ठिकाणी राहणार नाही, कारण देहाविषयी तुम्ही उदास व्हाल. पंढरपूर हे क्षेत्र त्रिगुणरूपी मळाचा विनाश करणारे आहे.

पंढरीचा महिमा कसा अगाध आहे, याचे वर्णन तुकाराम महाराज या खालील अभंगात करतात.

पंढरीस दुःख न मिळे ओखदा/

प्रेम सुख सदा सर्वकाळ//

पंढरपुरात निरंतर पांडुरंगाचे प्रेम सुख असल्यामुळे दुःख औषधालाही (ओखदा) मिळत नाही.

पुंडलिके हाट भरियेली पेठ/

अवघे वैकुंठ आणियेले//

पंढरपुरीची पेठ भक्त पुंडलिकाने वसविली असल्यामुळे त्याने तेथे संपूर्ण वैकुंठ आणले आहे.

उदीमासी तुटी नाही कोणा हाणी/

घेउनिया धणी लाभ घेती//

या ठिकाणी व्यापार-उदीमात खोट कधीच येत नाही. नुकसान जराही नसून फायदाच फायदा आहे.

पुरले देशाशी भरले सिगेसी/

अवघी पंचक्रोशी दुमदुमित//

या पेठेत विठ्ठल हाच माल आहे. देशाला पुरेल एवढा माल शिगोशीग भरला आहे. पंढरीची पंचक्रोशी अशी या मालाने दुमदुमून गेली आहे.

तुका म्हणे संता लागलीसे धणी/

बैसले राहोनी पंढरीस//

सर्व संतांना येथे फार तृप्ती, समाधान लाभले आहे. कारण विठू माऊली त्यांना भेटली आहे, म्हणून ते पंढरीतच वास करून राहिले आहेत.

सुरवर येती तीर्थे नित्य काळ/

पेठ त्या निर्मळ चंद्रभागा//

साक्षभूत नव्हे सांगितली मात/

महिमा अत्यद्भूत वर्णवेना//

पंचक्रोशीमाजि रीघ नाही दोषा/

जळती आपैसा अघोर ते//

निर्विषय नर चतुर्भुज नारी/

अवघा घरोघरी ब्रह्मानंदू//

तुका म्हणे ज्यापे नाही पुण्यलेश/

जारे पंढरीस घेई कोटी//

चंद्रभागारुपी ही पेठ अतिशय शुद्ध आहे म्हणून इथे देवही येतात आणि सारी तीर्थेही येतात. ही गोष्ट नुसती ऐकीव नाही किंवा सांगोवांगी नाही तर प्रत्यक्ष अनुभवलेली आहे असे तुकाराम सांगत आहेत. या पेठेचा अद्भुत महिमा वर्णन करण्यास शब्द नाहीत.

या पंचक्रोशी मध्ये कोणत्याही दोषांना प्रवेश नाही. संचितात जे काही मोठे दोष असतील ते येथे आपोआप गळून जातात. या ठिकाणी स्त्रिया- पुरुष चतुर्भुज निर्विषय देवाप्रमाणे विषयहीन आहेत. त्यांच्या काम- वासना जळून गेल्या आहेत. घरोघरी ब्रह्मानंद आहे. ज्यांच्यापाशी पुण्याचा लवलेश नाही, त्यांनी पंढरीस जाऊन लागेल तेवढे पुण्य प्राप्त करून घ्यावे.

या अभंगात तुकाराम महाराज काय सांगतात?

अवघीच तीर्थे घडली एक वेळा/

चंद्रभागा डोळा देखिलिया//

अवघीच पापे गेली दिगंतरी/

वैकुंठ पंढरी देखिलिया//

अवघिया संता एक वेळा भेटी/

पुंडलिक दृष्टी देखिलिया//

तुका म्हणे जन्मा आल्याचे सार्थक/

विठ्ठलची एक देखिलिया//

ज्याने चंद्रभागेचे दर्शन घेतले, त्याला सकल तीर्थांचे स्नान घडले. एवढे हे दर्शन पुण्यकारक आहे. भूतलीचे हे वैकुंठ, पंढरपूर पाहिले असता सर्व पातके नाहीशी होतात, दिगंतरात जातात. एका पुंडलिकाचे दर्शन घेतले की सर्व संतांच्या दर्शनाचा लाभ होतो आणि एका विठ्ठलाचे दर्शन घेतल्याने आपण जन्माला आल्याचे सार्थक होते.

असा आहे हा पंढरीचा महिमा. चला तर मग पंढरीसी जाऊ /विठू माऊलीला/

डोळा भरू पाहू//

क्रमशः… २८

© अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ॥ गंगालहरी॥ ☆ भाग – ५ – कवी : श्री जगन्नाथ पंडित ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ ॥ गंगालहरी॥ ☆ भाग – ५ – कवी : श्री जगन्नाथ पंडित ☆ मराठी भावानुवाद – डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

☆ ☆ ☆ ☆

श्लोक ४१ ते ५३

☆

प्रपद्यन्ते लोकाः कति न भवतीमत्रभवती-

मुपाधिस्तत्रायं स्फुरति यदभीष्टं वितरसि ।

शपे तुभ्यं मातर्मम तु पुनरात्मा सुरधुनि

स्वभावादेव त्वय्यमितमनुरागं विधृतवान् ॥ ४१॥

*

ललाटे या लोकैरिह खलु सलीलं तिलकिता

तमो हन्तुं धत्ते तरुणतरमार्तण्डतुलनाम् ।

विलुम्पन्ती सद्यो विधिलिखितदुर्वर्णसरणिं

त्वदीया सा मृत्स्ना मम हरतु कृत्स्नामपि शुचम् ॥ ४२॥

*

नरान् मूढांस्तत्तज्जनपदसमासक्तमनसो

हसन्तः सोल्लासं विकचकुसुमव्रातमिषतः ।

पुनानाः सौरभ्यैः सततमलिनो नित्यमलिनान्

सखायो नः सन्तु त्रिदशतटिनीतीरतरवः ॥ ४३॥

*

यजन्त्येके देवान् कठिनतरसेवांस्तदपरे

वितानव्यासक्ता यमनियमरक्ताः कतिपये ।

अहं तु त्वन्नामस्मरणकृतकामस्त्रिपथगे

जगज्जालं जाने जननि तृणजालेन सदृशम् ॥ ४४॥

*

अविश्रान्तं जन्मावधि सुकृतजन्मार्जनकृतां

सतां श्रेयः कर्तुं कति न कृतिनः सन्ति विबुधाः ।

निरस्तालम्बानामकृतसुकृतानां तु भवतीं

विनाऽमुष्मिंल्लोके न परमवलोके हितकरम् ॥ ४५॥

*

पयः पीत्वा मातस्तव सपदि यातः सहचरै-

र्विमूढैः संरन्तुं क्वचिदपि न विश्रान्तिमगमम् ।

इदानीमुत्सङ्गे मृदुपवनसञ्चारशिशिरे

चिरादुन्निद्रं मां सदयहृदये शायय चिरम् ॥ ४६॥

*

बधान द्रागेव द्रढिमरमणीयं परिकरं

किरीटे बालेन्दुं नियमय पुनः पन्नगगणैः ।

न कुर्यास्त्वं हेलामितरजनसाधारणतया

जगन्नाथस्यायं सुरधुनि समुद्धारसमयः ॥ ४७॥

*

शरच्चन्द्रश्वेतां शशिशकलश्वेतालमुकुटां

करैः कुम्भाम्भोजे वरभयनिरासौ च दधतीम् ।

सुधाधाराकाराभरणवसनां शुभ्रमकर-

स्थितां त्वां ये ध्यायन्त्युदयति न तेषां परिभवः ॥ ४८॥

*

दरस्मितसमुल्लसद्वदनकान्तिपूरामृतै-

र्भवज्वलनभर्जिताननिशमूर्जयन्ती नरान् ।

चिदेकमयचन्द्रिकाचयचमत्कृतिं तन्वती

तनोतु मम शन्तनोः सपदि शन्तनोरङ्गना ॥ ४९॥

*

मन्त्रैर्मीलितमौषधैर्मुकुलितं त्रस्तं सुराणां गणैः

स्रस्तं सान्द्रसुधारसैर्विदलितं गारुत्मतैर्ग्रावभिः ।

वीचिक्षालितकालियाहितपदे स्वर्लोककल्लोलिनि

त्वं तापं तिरयाधुना मम भवज्वालावलीढात्मनः ॥ ५०॥

*

द्यूते नागेन्द्रकृत्तिप्रमथगणमणिश्रेणिनन्दीन्दुमुख्यं

सर्वस्वं हारयित्वा स्वमथ पुरभिदि द्राक् पणीकर्तुकामे ।

साकूतं हैमवत्या मृदुलहसितया वीक्षितायास्तवाम्ब

व्यालोलोल्लासिवल्गल्लहरिनटघटीताण्डवं नः पुनातु ॥ ५१॥

*

विभूषितानङ्गरिपूत्तमाङ्गा सद्यःकृतानेकजनार्तिभङ्गा ।

मनोहरोत्तुङ्गचलत्तरङ्गा गङ्गा ममाङ्गान्यमलीकरोतु ॥ ५२॥

*

इमां पीयूषलहरीं जगन्नाथेन निर्मिताम् ।

यः पठेत्तस्य सर्वत्र जायन्ते सुखसम्पदः ॥ ५३॥

☆

मराठी भावानुवाद – –

गङ्गेमाते जन अपरिमित येत तुला शरण

इच्छित फलदायी तू असशी धरिती तव चरण

प्रेम अमित माझे तुजठायी आण घेउनी कथन

तव हृदयी मजला घे माझ्या भक्तीसी जाण॥४१॥

*

मृत्तिका तुझी भाळि लाविता पाप तमाचे हरण

माध्यान्हीच्या सूर्यासम तिज करिता धारण

विधीलिखित दुःखांच्या पंक्ती टाकिते पुसून

मृदा तुझी ही सदैव करुदे माझे शोकहरण ॥४२॥

*

भागिरथीचा वास न तेथे मूढ लोभी वसती

मळकट तरिही पुष्पसाथिने सुगंधीत होती

मळलेल्या त्या सर्व जनांचे सखे म्हणून असावे

पादप तुझिया तटावरिल मम शाश्वत मित्र व्हावे ॥४३॥

*

दुरापास्त अर्चना पूजिती भक्त देवतांचे

काही करिती सदा आचरण यज्ञाचे यागाचे

अन्य कर्मीं आसक्तीपोटी मार्ग यमनियमांचे

कामपूर्ती त्रिपथगे जपतो भासे जाल भवाचे ॥४४॥

*

जन्मापासुन अखंड अविरत पुण्यकर्म करिती

कल्याणास्तव देवता तयांचे समर्थ असती

पुण्य न पदरी निराधार जे जगासिया भार

उद्धरण्याला अशा जिवांना तूच एक आधार ॥४५॥

*

उदक प्राशुनी तुझे मूढ मी गेलो मित्रांसवे

मिळाला न मज काही विसावा शांत कसे व्हावे

मृदु वाऱ्याने शीतल तुझिया जलअंकावर घेई

अखेरची चिरनिद्रा मजसी तव सान्निध्ये देई ॥४६॥

*

बद्धपरीकर होवोनीया होई सिद्ध गङ्गे

किरिट सजवुनी बालचंद्रे होई सज्ज गङ्गे

उपेक्षा नको करू ग माझी सामान्यासम गङ्गे

जगन्नाथाच्या उद्धाराचा समय पातला गङ्गे ॥४७॥

*

शरद्ऋतूतिल शुभ्र पांढरी चंद्राची कोर

धारण करुनी कुम्भ कमळ अन् अभयमुद्रा कर

शुभ्र मकर स्थित अमृतभूषण धवल वसन लेवुन

अजीत शाश्वत असती करता मनोमनी तव ध्यान ॥४८॥

*

स्मितहास्याने वदनावरती सुधाकांति विलसत

भवाग्नीदग्ध जनास पामर करिसी तू शांत

चमत्कारीक चिदानंदरूपी चंद्रकांती

माते शंतनुकांते प्रसन्न होई मजवरती ॥४९॥

*

मंत्रौषधांनी झाकियलेला भवताप व्यस्त

वैनतेय पाषाणे भग्न देवगणांनी त्रस्त

सुधारसाने चरण कालियामर्दक क्षालन

उद्धर मजला आत्मताप मम शाश्वत दूर करून ॥५०॥

*

उमा जिंकली द्यूतामध्ये महादेव सर्वस्व

गण मणि श्रेणी नंदी इंद्र माळ चंद्र गजचर्म

स्मितकटाक्ष तुजवरी उमेचा देह पणे लाविता

पावन करी मज गङ्गे तांडव शिवशंकर नाचता ॥५१॥

*

भूषविते देहास देखण्या रतीकान्त अरीचा

विनाविलंब भंग करते समग्र जनपीडांचा

मनोहारी उत्तुंग चंचल मोहक लहरींनी

निर्मल करी गे देहा माझा माये प्रक्षालुनी ॥५२॥

*

पियूषलहरी पठण करी जो जगन्नाथ निर्मित

सुखसमृद्धी सदासर्वदा तयासि होई प्राप्त ॥५३॥

– क्रमशः भाग पाचवा (समाप्त)

☆ ☆ ☆ ☆

कवी : श्री जगन्नाथ पंडित 

मराठी भावानुवाद  © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम.डी., डी.जी.ओ.

मो ९८९०११७७५४ ईमेल nishikants@gmail. com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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