(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ संस्मरण – “बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
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प्रसिद्ध कथाकार व पहल पत्रिका के यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन का जाना, हिंदी साहित्य के लिए बड़ी क्षति है। संयोग देखिये कि व्यावसायिक पत्रिकाओं को पहल ने कड़ी टक्कर दी और जनपक्षीय रचनाओं को प्रमुख तौर पर स्थान दिया। मात्र पैंतीस कहानियां लिखकर कथा का नया स्वरूप सामने ला दिया।
नैनीताल के जिस अशोका होटल नयी नवेली शादी पर भाग कर पहुंचे, वह होटल मालिक राजीव लोचन साह थे और नैनीताल में उनसे मिलने पर इंटरव्यू की उसी होटल में, तब यह बात सामने आई थी। अंतिम दिनों में एक इंटरव्यू में लेकर बहुत चर्चा में भी रहे।
बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना और पहल जैसी आंदोलित करने वाली पत्रिका निकाल पाना। एक बार तो ज्ञानरंजन को पूरा पढ़ने की कोशिश की, इलाहाबाद के अमरूदों की मिठास जैसी, बहुत कुछ नयी दुनिया खोल तीस कहानियां पढ़कर बहुत कुछ सीखा। ज्ञानरंजन नहीं रहे पर कहानियों में, पहल के अंकों में मिलते रहेंगे।
ज्ञानरंजन को सुनने का मौका शिमला में मिला था जब उन्होंने दूर की बात कही कि जल्दी ही कलम का स्थान कम्प्यूटर का माउस लेने वाला है। यह थी दूरदर्शिता ज्ञानरंजन की। आज सबसे ज्यादा उनकी कहानी पिता के साथ साथ उनकी प्रेमकथा को याद करते नमन् करता हूं।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग- २९ ☆ श्री सुरेश पटवा
6.सतपुड़ा वन भ्रमण- जल जंगल ज़मीन का स्वर्ग
जब हमने घर वालों को जनवरी के ठंडे महीने में वन विभाग द्वारा बाघों की गिनती करने वाली मुहिम से जुड़ने की बात बताई तो घर में हंगामा बरपा हो गया। सब बोले सत्तर साल की उम्र में घने जंगलों में बाघों के बीच जाने की क्या ज़रूरत है। सामने बाघ आ गया तो क्या करोगे?
हमने कहा- हमें क्या करना है, जो करना है वह बाघ ही करेगा।
घर वाले बोले- आपको कुछ हो गया तो?
हमने कहा, पहले तो कुछ होगा नहीं और यदि हो भी गया तो ठीक है। आज से कुछ सालों बाद तुम लोग हमारे मुँह में एक-एक बूँद गंगाजल डाल कर मौत को एक-एक इंच हमारे नज़दीक आता देखोगे। उससे तो यह ठीक ही है कि एक बाघ से लड़ते हुए उसकी भूख मिटाएँ। हालाँकि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है।
आज वर्ष 2022 के जनवरी महीने की चार तारीख़ है। हम मित्र श्रीकृष्ण श्रीवास्तव के साथ सतपुड़ा बाघ अभयारण्य के कोर-ज़ोन चूरना के वन्य भ्रमण पर जाने को सुबह सात बजे रानी कमलापति रेल स्टेशन से कामायनी एक्सप्रेस में सवार होकर इटारसी के लिए रवाना हुए। रेल में आड़िट विभाग के एक तिवारी जी मिले, जिनसे सरकारी आड़िट और वन भ्रमण के दो बिल्कुल अलग विषयों पर बात करते-करते पता ही नहीं चला कि कब होशंगाबाद आ गया। उन्होंने आड़िट विभाग की अंदरूनी बातें बताईं और हमने जंगल की जंगली रिवायत से उन्हें परिचित कराया। वे उतर कर चले गये। हमने घर से लाई लौंकी की सब्ज़ी और रोटियों का नाश्ता किया। इतने में इटारसी स्टेशन आ गया। हम श्रीकृष्ण के साथ बचपन से जानी पहचानी नीलम होटल में चाय पीने घुसे। वहाँ एक घंटा इटारसी में लड़ी कुश्तियों और खेले गए हाँकी मेचों के साथ बनखेड़ी, पिपरिया, इटारसी और सिवनी मालवा में कुश्ती दंगल परम्परा पर बातें होती रहीं।
बातचीत के दौरान हरदा के एक खालिक पहलवान का ज़िक्र निकल आया। हम जब 1972 सागर विश्वविद्यालय की कुश्ती प्रतियोगिता में कुश्ती लड़ने गए थे, तब खालिक भी हरदा कालेज से आया था। वह ऊँचा सुंदर कसरती देह का मालिक और मज़बूत इरादों वाला पहलवान था। श्री कृष्ण ने बताया कि वह बम्बई चला गया था। वहाँ से दाऊद की गैंग में भर्ती होकर बम्बई बम कांड के बाद दुबई-शारजाह चला गया। वहीं बस गया।
पिपरिया से गोपाल गांगुड़ा का फ़ोन आया कि वे पिपरिया से अपनी कार में निकल गए हैं। आधा घंटे में इटारसी पहुँच जाएँगे और हिदायत दी कि तब तक सिग्नेचर की तीन बोतल ख़रीद लें। दुकान थोड़ी ही दूर थी। दुकानदार ने एक बोतल की क़ीमत 1500.00 रुपए बताई। भाव-ताव के बाद 1000.00 की दर से तीन हज़ार की तीन बोतलें ख़रीद लीं। गोपाल गांगुड़ा के पहुँचते ही हम वन विभाग के भौंरा कार्यालय के लिए निकले। जिनकी चार पहिया गाड़ी से हम वन विभाग भौंरा पहुँचे। वहाँ हमारा प्रशिक्षण होना था।
आशंका के अनुकूल सरकारी महकमा सुस्त चाल से चलता रहा। तवा और चूरना के वालंटियर्स बीच में उठकर इधर-उधर चल दिए। उन्हें जंगली महकमा के दस्तूर के अनुसार हाँका लगाकर समेटा गया। फिर एप को संचालित करने की विधि बताई गई। ख़ुशक़िस्मती से आई-फ़ोन के लिए एप नहीं बना था इसलिए हम बेकार की बेगारी से बच गए। औपचारिक परिचय के बाद प्रशिक्षण में कोर और बफ़र एरिया का अंतर बताया। फिर यह चेतावनी दी गई कि किसी भी हालत में जंगल में अकेले न जाएँ। हमेशा जूते पहन कर ही निकलें। यहाँ कोबरा साँप निकलते हैं। बहुत सावधानी से नीचे देखकर बाहर निकलें। बाघों की गणना का एक एप डाउनलोड करके बाघों की गणना की प्रक्रिया समझाई गई। सभी लोग एप समझने की प्रक्रिया में उलझ गए और हम यात्रा के संस्मरण लिखने में व्यस्त हो गये। “सुरम्य-सतपुड़ा” पुस्तक लिखने हेतु रिज़र्व फ़ॉरेस्ट के बारे में जानकारी जुटाने में एक कर्मचारी को पटा कर अंदरूनी जानकारियाँ निकलवाने में समय का सदुपयोग किया। आख़िर में बताया गया कि हमें, श्रीकृष्ण और गोपाल को मनचाहा चूरना रेंज आबँटन हुआ। लंच के समय तक कुछ सुगमुगाहट होने लगी। वन विभाग के एक अदना कर्मचारी से पता चला कि वन विभाग की तरफ़ से लंच का इंतज़ाम किया गया है। थोड़ी देर में एक पत्तल में पूड़ी-आलू मटर की सब्ज़ी, दाल, चावल का भोजन किया। चूरना के जंगल कहाँ है। पहले इसकी जानकारी लेना आवश्यक है।
भारत का प्रथम संरक्षित वनक्षेत्र क्रांतिकारी भभूत सिंह की मालगुजारी के अंतर्गत आने वाले बोरी के जंगलों को जब्त कर बनाया गया था। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का ज्यादातर हिस्सा भभूत सिंह की मालगुजारी में आता था। राष्ट्रीय पुर्नजागरण की बेला में अपनी जड़ों को पहचानने का समय है। भभूत सिंह के स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान से लोग अनभिज्ञ हैं। आइए, थोड़ा इतिहास की गलियों में तफ़री कर आयें।
पचमढ़ी का पठारी-पहाड़ी क्षेत्र, जो होशंगाबाद, पिपरिया, छिन्दवाड़ा और बैतूल शहरों के बीच स्थित है, गोंडों-कोरकुओं का रहवास हुआ करता था। भूमि के इस टुकड़े का भूवैज्ञानिक इतिहास मेसोलिथिक युग (9,000-4,000 ईसा पूर्व) तक पीछे जाता है। इतिहासकारों द्वारा इसका नाम गोंडवाना रखा गया। इस घने वन क्षेत्र में रहने वालों को आदिवासियों के रूप में नामित किया गया था। 12वीं-18वीं सदी के बीच इस क्षेत्र पर गोंडों का शासन था। उन्होंने इस क्षेत्र में कई महलों, तालाबों और किलों का निर्माण भी किया। देवगढ़ के शाह ने 1702 में नागपुर शहर बसाया, लेकिन 1710 के दशक के मध्य तक मराठों ने गोंड राज्य पर अधिकार कर लिया, और फिर 1818 में, अंग्रेजों ने मराठों को हरा कर इस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया।
गोंड धीरे-धीरे जंगलों और पहाड़ियों में चले गए। एक जनजातीय के रूप में गुरिल्ला युद्ध में सिद्धहस्थ गोंड और कोरकू पहाड़ों पर विरल आबादी वाले साधारण लोग थे। 1819 में पचमढ़ी ने अंग्रेजों का ध्यान आकर्षित किया जब नर्मदा घाटी में मराठा प्रमुख अप्पा साहिब भोंसले को अंग्रेजों ने उनके क्षेत्र विस्तार की होड़ में बर्डी के युद्ध में हराया था। अप्पा साहिब शरण लेने के लिए महादेव हिल्स भाग गए। अपने आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेज इस क्षेत्र के सभी छोटे नेताओं, लुटेरों और छोटे मालगुज़ारों को बाहर निकालने में सक्षम थे। अप्पा साहिब नागपुर ले जाए गए। अंग्रेजों के अधीन नाम मात्र के शासक रहे। उनकी मृत्यु पर विधिक उत्तराधिकारी न होने के कारण अंग्रेजों ने उनके राज्य कर क़ब्ज़ा कर लिया।
कैप्टन जेम्स फोर्सिथ के आगमन से 25 साल पहले, होशंगाबाद में सहायक एजेंट कैप्टन ओसेली ने 1832 में पहली बार पचमढ़ी का दौरा किया। उन्होंने इस क्षेत्र से भूवैज्ञानिक और वनस्पति के नमूने एकत्र किए। पचमढ़ी में किसी विदेशी की यह पहली यात्रा थी। बाद में 1852 में, डॉ जेर्डन नामक एक सर्जन ने स्वदेशी जड़ी-बूटियों पर शोध करने के लिए पठार का दौरा किया। 1857 में अंग्रेजों ने पचमढ़ी पर अधिकारिक रूप से कब्जा कर लिया। 1857 के विद्रोह के दौरान तांत्या टोपे कोरकू प्रमुख भभूत सिंह से मदद लेने के लिए पचमढ़ी भाग गए। हालांकि विद्रोह जल्दी दबा दिया गया और तांत्या टोपे को शिवपुरी के नज़दीक पकड़ कर 18 अप्रेल 1959 को शिवपुरी कलेक्टर चौराहे पर फाँसी चढ़ा दिया गया। भभूत सिंह के लोग नीचे के मैदानों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह और छापे करते रहे। इसी कारण विद्रोहियों को खदेड़ने के नाम पर अंग्रेजों को जंगलों पर आक्रमण करने का अवसर दिया। अंग्रेजों ने एक वर्ष में उनके विद्रोह को दबाकर भभूत सिंह के क्षेत्र को जब्त कर लिया। 1860-61 से इस क्षेत्र को फ़ौजी छावनी बनाने का काम शुरू हुआ। यह क्षेत्र एक तरफ तो सैनिक अड्डे हेतु सुरक्षित था और दूसरा यहाँ से बुंदेलखंड, मालवा, महाकौशल, निमाण, खानदेश और ब्रार के इलाक़ों को फ़ौजी मदद जल्दी भेजी जा सकती थी।
कुछ ही महीनों में कैप्टन जेम्स फोर्सिथ को पचमढ़ी भेजा गया, जहाँ उस समय 30 विषम कोरकू झोपड़ियाँ थीं। 1862 में वनवासियों को वैज्ञानिक संरक्षण के नाम पर हटा कर बोरी के पास के एक तिहाई क्षेत्र को जैव विविधता अभयारण्य के रूप में स्थापित कर दिया गया था। 1864 में, अंग्रेजों ने पचमढ़ी की जमीन स्थानीय सरदार ठाकुर घरब सिंह से 1.70 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से खरीदी। 14,580 एकड़ जमीन के लिए 23,916 रुपये का पूरा मुआवजा दिया गया। अंग्रेजों के पास अब एक रणनीतिक ऊंचाई पर भूमि का एक बड़ा टुकड़ा था जिसका उपयोग छावनी बनाने के लिए किया। आज भी पचमढ़ी का नागरिक प्रशासन छावनी बोर्ड के अधीन है। पचमढ़ी का शाब्दिक अर्थ पांच गुफाएँ है। एक लोकोक्ति के अनुसार पांडवों ने वन में अपने वनवास के वर्षों के दौरान इन गुफाओं में आश्रय लिया था। हालांकि, पुरातत्वविद इस सिद्धांत को खारिज करते हैं। उनके अनुसार गुफाओं का निर्माण बौद्ध भिक्षुओं ने गुप्त काल के दौरान किया था। इतिहास के बाद थोड़ी जानकारी भूगोल की भी लेते चलें।
बायोस्फीयर रिजर्व के कुल क्षेत्रफल 4,926.28 वर्ग किलोमीटर में हज़ारों झरनों से दो बड़ी नदियाँ आकार लेती हैं- देनवा और तवा। उनके बहाव का वर्णन यात्रा संस्मरण का जायज़ा बढ़ाएगा। श्री गोपाल और श्री कृष्ण ने इन सभी इलाक़ों का पैदल भ्रमण किया है।
श्री गोपाल बोले- भौगोलिक रूप से होशंगाबाद जिला दो भागों में बंटा है। एक देनवा घाटी की जंगल पट्टी, और दूसरा मिश्रित आबादी वाला मैदानी भाग सतपुड़ा पर्वत के ऊँचे-नीचे पहाड़ों की तलहटी से नर्मदा कछार तक बीस किलोमीटर फैला है। यहां तवा नहर से सिंचित खेती गुलज़ार है। पहाड़ी जंगल पट्टी में आदिवासी गावों में गोंड-कोरकू आदिवासी निवास करते हैं। खेती-बाड़ी अधिकांशतः मानसूनी बारिश पर निर्भर है। सतपुडा की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ (पचमढ़ी) से देनवा उद्गमित हुई है। वहीं से एक बड़ी नदी सोनभद्रा का उद्गम स्थल भी है।
देनवा नदी पचमढ़ी के चौरागढ़ क्षेत्र से शुरू होकर झिरपा, मटकुली, मढ़ई के रास्ते तवा में जाकर मिल जाती है। तवा बाँध से निकली नहरों के पानी से सिंचाई के कारण होशंगाबाद और हरदा ज़िलों के खेतों में गेहूँ, चना, धान, तुअर, की भरपूर फसल होती है। यह देनवा नदी का ही जल है जो तवा बाँध को समृद्ध करता है। स्थानीय गोंडों के एक देवता का नाम देवा है। देवा से ही इस नदी का नाम देनवा पड़ा है। देनवा याने देने वाली। देनवा नदी सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र से होकर गुजरती है। यह पेयजल का बड़ा स्रोत है। काफी गर्मी के बाद भी देनवा नदी सूखती नहीं और हर हाल में वन्य प्राणियों के लिए पानी उपलब्ध कराती है। हालांकि जंगल में और भी नदी नाले हैं जो जानवरों को पानी देते हैं, लेकिन देनवा की उपयोगिता बिलकुल अलग है।
वन विभाग के एक अन्य अधिकारी बताते हैं, कि देनवा पचमढ़ी के चौरागढ़ पहाड़ के पीछे से निकलकर दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर अठखेलियां करते हुए झिरपा, मटकुली के पास जवान हो मढ़ई होते हुए तवा बाँध में समा जाती है। यह जितनी खूबसूरत है उतनी ही खतरनाक भी है। देनवा जब शांत रहती है तब इसकी गोद में आकर बच्चे भी खेलते हैं पर पहाड़ों पर बारिश होते ही इसका मिजाज बदल जाता है। इन दिनों देनवा से जरा सा भी खिलवाड़ जानलेवा साबित हो सकता है। वह हहराती, उफनती और भंवर बनाती रौद्र रूप में रहती है। इसकी खूबसूरती बेमिसाल है। ऊंची पहाड़ी चट्टानों के बीच बनी गहरी खाई में यह तेजी से बहती है। इसे किसी भी जगह से देखिए, हमेशा खूबसूरत नजर आती है।
प्रकृति प्रेमी पिपरिया के श्री गोपाल गांगुड़ा ने आगे बताया- मैं अक्सर इन जंगलों में जाता हूँ और जब भी जाता हूं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि देनवा को ना देखा हो। इसे गर्मी, सर्दी और बारिश किसी भी मौसम में देखा जाए, इसकी ख़ूबसूरती कभी भी कम नहीं होती।
हमने जानना चाहा- तीन लोग अलग-अलग बातें बताते हैं कि देनवा नदी धूपगढ़, चौरागढ़ और महादेव पर्वत से निकलती है। तीनों पर्वतों से एकसाथ कैसे निकल सकती है। तीनों पहाड़ तीन दिशाओं में ऊँचे खड़े हैं।
श्री गोपाल ने खुलासा किया- लेकिन वास्तविकता यही है। इन तीन गगनचुंबी पर्वत शिखरों की शिराओं से बारिश का जल असंख्य पहाड़ी झरनो से बह एकसार हो मटकुली के पहले सहस्त्रधार पर एक बड़ी नदी बन जाता है। देनवा नदी चाँवरपाठा से पूर्वी दिशा पकड़ कर सहस्त्रधार पहुँचती है वहाँ से दक्षिण मुड़ जाती है। सहस्त्रधार से मटकुली और परसापानी होती हुई मढ़ई से गुजर कर तवा बांध में समा जाती है।
श्रीकृष्ण- सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला की प्रसिद्ध धूपगढ़, चौरागढ़ और महादेव की पहाड़ियों से उद्गमित देनवा से कई बार साक्षात्कार होता है। कभी मटकुली के पुल पर, कभी देनवा दर्शन में, कभी थोड़ा नीचे जंगल के रास्तों पर और कभी मढ़ई में उसकी छाती पर सरपट दौड़ती मोटर बोटों की शक्ल में। लेकिन सतधारा में देनवा का सौंदर्य देखते ही बनता है। एक छोर से दूसरे छोर तक हल्के काले रंग की चट्टानों पर अलग-अलग सात धाराओं में उछलती-कूदती गेंद की तरह टप्पा खाती और नाचती-गाती देनवा को घंटों निहारते रहो, तब भी मन नहीं भरता। यहां देनवा के किनारे दोंनों ओर हरा-भरा जंगल है। सरसराती हवा और चिड़ियों के सुंदर गान से आनंद दायक वातावरण रहता है। सतधारा में जब हम पहुंचे तब हमें ज्यादा अंदाजा नहीं था कि यहां देनवा दर्शन और प्राकृतिक सानिध्य पाने के लिए इतने लोग आते हैं। कुछ ही घंटों में दर्जन भर गाड़ियां आ गईं और उसमें बैठे लोग ऊंचाई से उतर कर नदी में स्नान करने चले गए। कुछ लोग अपने साथ भोजन वगैरह लाए थे, वे भोजन करने लगे। बच्चे नदी की रेत में खेलने-कूदने लगे। इन सबसे बेख़बर पशु-पक्षी कीट-पतंगे, पेड़-पौधे निर्विकार रमण कर रहे थे।
हमने कहा- नर्मदा की तरह देनवा का भी धार्मिक महत्व है जो हमें भी देखने को मिला। जिस दिन हम वहां पर गए थे, कुछ ग्रामीण स्त्री पुरूष देनवा की पूजा करने आए थे। भूरा-भगत पर तो मेला भी लगता है। पचमढ़ी आते-जाते समय मटकुली पुल पर रुककर लोग इसकी पूजा करते हैं। पचमढ़ी के रास्ते में देनवा दर्शन एक पर्यटन स्थल बन गया है। जहां खड़े होकर लोग देनवा का अनोखा रूप आँख से देखते और कान से सुनते रहते हैं।
नदियों से जीवन है यह किताबी परिभाषा नहीं, हकीकत है। देनवा के किनारे फैली रेत में बरौआ समुदाय के लोग तरबूज-खरबूज की खेती करते है। गर्मियों में यहां की ककड़ी और खरबूजों की मांग बढ़ जाती है। स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिलता है। गर्मियों के मौसम में मटकुली में यहां की ककड़ी बिकती हैं। महिलाएँ छोटी टोकनियों में ककड़ियां बेचती हैं। लेकिन कई बार बारिश तरबूज-खरबूज बहाकर ले जाती है। यदि बरौआ बिना खेती के रह गए, मगर रोहू, कतला, बाम, सामन मछलियों की फसल उनसे कौन छीन सकता है। मछुआरे जाल लेकर देनवा में डेरा डाले रहते हैं क्योंकि जैसे ही देनवा में थोड़ा ज्यादा पानी हुआ, तवा बांध की मछलियां हवाई जहाज की तरह ऊपर चढ़ आती हैं। लेकिन पिछले सालों से मछलियां कम मिलती हैं, नदी में मगर मच्छ खूब हो गए हैं। देनवा का पानी स्वच्छ, निर्मल और जड़ी-बूटी व खनिजों से युक्त यानी सही मायने में मिनरल वॉटर है। जो पानी बोतलों में मिनरल के नाम से बिकता है, उनमें मिलावट के किस्से आते रहे हैं। लेकिन देनवा का पानी निर्मल मीठा और पीने योग्य है। जब गर्मियों में मटकुली जैसे कस्बों में पानी की कमी होती है, तब इससे ही पूर्ति होती है।
श्री गोपाल बोले- देनवा पहाड़ी नदी होने के कारण खतरनाक मिजाज रखती है, थोड़ी देर की बारिश से इसमें उफान आ जाता है। और जल्दी ही नीचे भी उतर जाती है। मटकुली निवासी भूरा पाल ने बताया पहले नदी का जो पुराना पुल था उस पर बारिश में नदी के आ जाने से रास्ता बंद हो जाता था। एक बार 6 लोग उफनती नदी को पार करने में डूब कर मर गए थे। वे सभी टूरिस्ट थे। इनके अलावा और भी कई दुर्घटनाएं हुई हैं जिनकी याद दिल को दहला देती है। मटकुली निवासी पप्पू खान ने बताया देनवा की पहाड़ी खाईयां प्रकृति प्रमियों को ही नहीं अपराधियों को भी आकर्षित करती हैं। लगभग 10 साल पहले एक दौर चला था जब देनवा दर्शन प्वाइंट के आसपास शव बरामद होना शुरू हुए थे। खान ने बताया इन शवों का पता कभी नहीं चलता अगर हत्यारे खुद ना बताते कि उन्होंने शव देनवा की घाटी में फेंक दिए हैं। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की कई आपराधिक घटनाओं में देनवा का जिक्र आता है।
कुल मिलाकर, देनवा जैसी छोटी नदियों का बहुत महत्व है। सतपुड़ा से निकलने वाली ज्यादातर नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। दुधी, पलकमती, मछवासा, शक्कर आदि कई नदियां जो पहले सदानीरा थीं, अब बरसाती नाला बन कर रह गई हैं। देनवा में अभी पानी है, अपूर्व सौंदर्य भी है, जंगल भी है। लेकिन यह कब तक बचा रहेगा, यह कहा नहीं जा सकता। इसका पानी भी धीरे-धीरे कम होने लगा है। ऐसी छोटी नदियों को बचाने की जरूरत है। जंगल बचाने की जरूरत है। छोटे स्टापडेम बनाकर बारिश की बूंद-बूंद सहेजने की जरूरत है।
बारिश में मटकुली के पुल पर बाढ़ आ जाती है और जब तक बाढ़ नहीं उतर जाती पिपरिया-पचमढ़ी का रास्ता बंद हो जाता है। इस पुल को बनाने की मांग लंबे अरसे से की जा रही है। जब यातायात बंद रहता है, पचमढ़ी जाने वाले सैलानियों को बहुत परेशानी होती है। मटकुली में ही भभूतसिंह कुंड है, जो आदिवासियों की अंग्रेजों से लड़ाई की याद दिलाता है। यह नदी उस लड़ाई की गवाह है जो हर्राकोट के कोरकू भभूतसिंह ने अपने अधिकार व इज्जत के लिए अंग्रेजों से लड़ी थी। इसी देनवा नदी के किनारे पानी पी पीकर उन्होंने एक दूसरे को पानी पिलाया था, जबरदस्त लड़ाई हुई थी। इस क्षेत्र की दूसरी बड़ी नदी तवा नदी है।
हमने कहा- तवा नदी का बड़ा प्रताप है। यह सारणी के ऊपर पहाड़ों से निकल बांध के रूप में बंधी तवा सी पसरी है। नादिया नामक स्थान पर तवा नदी का पाठ सात किलोमीटर चौड़ा है। धूपगढ़ के नीचे से निकली सुपला और मालिनी नदी, केसला नदी और कई झरनों का पानी लेकर कई पहाड़ों के बीच पाँच से आठ किलोमीटर का चौड़ा पाठ बनाती हुई तवा बांध में स्थिर हो जाती है, जैसे कोई तपस्वी ध्यानमग्न धूनी रमाए हो। पूर्व से सुपला में मालिनी, पश्चिम से तवा में सुखतवा और दक्षिण से केसला नदियाँ आकर साकोट में मिलती हैं।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “प्रबोधन…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – श्रमिक…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६३ ☆
☆ श्रमिक… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २३ आणि २४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. २३ – – –
न बोले मना राघवेवीण काही ।
जनी वाऊगे बोलता सुख नाही ।
घडीने घडी काळ आयुष्य नेतो ।
देहांती तुला कोण सोडू पाहतो ।।२३।।
अर्थ : हे मना, एका राघवाशिवाय म्हणजेच भगवंताच्या नामाशिवाय दुसरे काही बोलू नकोस. तू इतर व्यर्थ बडबड केलीस तर तुला जे पारमार्थिक सुख अपेक्षित आहे ते मिळणार नाही. काळ क्षणाक्षणाला आपले आयुष्य कमी करीत असतो. जर या काळात परमेश्वराचे नामस्मरण करणे राहून गेले, तर अंतकाळी तुला कोणीही वाचवू शकणार नाही.
विवेचन : मागील श्लोकात समर्थांनी आपल्या हितासाठी श्रीरामाचे नाव चित्तामध्ये दृढ धारण करावे असा उपदेश केला. या श्लोकात त्याच विचाराचा विस्तार करत ते आपल्या मनाला बजावतात की हे मना, एका रामाशिवाय तू दुसरे काही बोलू नकोस. कारण इतर गोष्टी बोलण्यात खरे सुख नाही. काळ कोणासाठीही थांबत नाही. तो कोणाचाही अपवाद करत नाही. क्षणाक्षणाला तो आपले आयुष्य कमी करीत असतो आणि एक दिवस असा येतो की अंतिम क्षणी तो आपल्यालाही सोडत नाही.
समर्थांना आपल्या कल्याणाची किती तळमळ आहे हे या श्लोकातून जाणवते. आपले जीवन म्हणजे परमेश्वराकडून मिळालेली एक अमूल्य भेट आहे. पण या जीवनामध्ये ज्याने आपल्याला ही सुंदर देणगी दिली त्या परमेश्वरालाच आपण विसरतो आणि निरर्थक बोलण्यात आपले आयुष्य वाया घालवतो.
बोलण्यात आपली मोठी शक्ती खर्च होत असते. अनेकदा बोलण्यामुळे जेवढा शीण येतो, तेवढा एखादे श्रमाचे काम केल्यामुळेही येत नाही. एखादा वक्ता जर दोन-तीन तास सतत बोलत राहिला तर त्याला किती थकवा येतो हे त्यालाच ठाऊक असते. शाळा-महाविद्यालयांमध्ये शिकवणाऱ्या शिक्षकांना आणि प्राध्यापकांनाही हा अनुभव वारंवार येत असतो.
परंतु समाजात आपण पाहतो की बरीच मंडळी व्यर्थ बोलण्यात वेळ घालवतात. चौकात उभे राहून गप्पा मारणारी तरुणांची टोळकी, कट्ट्यावर बसणारे लोक, कार्यक्रमांच्या निमित्ताने एकत्र जमलेली मंडळी या सगळ्यांच्या चर्चांना कोणताही विषय चालतो. एकदा बोलायला सुरुवात झाली की कोणत्याही विषयावर अखंड बोलत राहणे ही सवय बनते. यात वेळेचा आणि शक्तीचाही अपव्यय होतो.
अति बोलण्याची सवय वृद्धापकाळात त्रासदायक ठरू शकते. अशा वेळी घरातील लोकांनाही ती माणसे नकोशी वाटू लागतात. बोलायला कोणी नसते आणि त्यामुळे मनात निरर्थक दुःख साचत जाते. म्हणून वेळीच सावध होणे आवश्यक आहे. आजच्या काळात टीव्हीवरील चर्चा, भडक बातम्या किंवा निरर्थक वादविवाद यांकडे लक्ष देण्यातही आपला बराच वेळ खर्च होतो. परंतु साधकाच्या दृष्टीने त्यातून फारसे काही निष्पन्न होत नाही.
आपले खरे हीत साधायचे असेल तर भगवंताच्या नामाशिवाय दुसरा मार्ग नाही. त्या नामाला विसरून आपण कितीही इतर गोष्टी बोलत राहिलो, तरी ती व्यर्थ बडबडच ठरते. त्यामुळे खरे सुख मिळत नाही. येथे सुख म्हणजे परमेश्वर प्राप्तीच्या किंवा आत्मसाक्षात्काराच्या दृष्टीने होणारी आपली वाटचाल असे म्हणता येईल.
नाम घेण्याची सवय जर आयुष्यभर अंगवळणी पडली नाही, तर अंतकाळी ते सहजपणे आपल्या मुखात येणार नाही. संतांना माणसाचे कल्याण व्हावे याची प्रचंड तळमळ असते. म्हणूनच संत गोंदवलेकर महाराज देखील आपल्या प्रवचनांमध्ये वारंवार सांगतात की तुम्ही रामनाम घ्या.
समर्थ रामदासांचाही कळकळीचा हाच संदेश आहे. जीवनाचा एकही क्षण व्यर्थ घालवू नका; भगवंताचे नामस्मरण करा.
स्वसंवाद ::
वेळ, शक्ती आणि आयुष्य वाया घालवणाऱ्या व्यर्थ चर्चांपासून मी स्वतःला दूर ठेवू शकतो का?
माझ्या दैनंदिन जीवनात भगवंताचे नामस्मरण कितपत आहे?
आयुष्याचा प्रत्येक क्षण अमूल्य आहे याची जाणीव ठेवून मी तो अधिक अर्थपूर्ण बनवण्याचा प्रयत्न करतो का?
– – – –
श्लोक क्र. २४ – –
रघूनायकावीण वाया शिणावे ।
जनासारिखे व्यर्थ का वोसणावे ॥
सदा सर्वदा नाम वाचे वसो दे ।
अहंता मनी पापिणी ते नसो दे |२४|
अर्थ:हे मना, एका रामाला सोडून केलेली सगळी कामे व्यर्थ आहेत. भगवंताला विन्मुख झालेल्या सामान्य माणसांप्रमाणे व्यर्थ बडबड (वोसणावे) करू नये. त्या बाष्कळ बडबडी ऐवजी भगवंताचे नाव मुखात असू दे. अहंकार हा अध्यात्मामध्ये फार मोठा शत्रू आहे. त्याला मनात थारा देऊ नकोस.
विवेचन: समर्थांना मानव जातीच्या कल्याणासाठी वाटणारी तळमळ ही एखाद्या मातेसारखी आहे. आपल्या मुलाचे कल्याण व्हावे म्हणून ती त्याला जरी आवडत नसले तरी एखादी गोष्ट पुन्हा पुन्हा सांगत असते. त्याचप्रमाणे समर्थ मागील श्लोकातीलच गोष्ट या ठिकाणी पुढे विस्तारून सांगतात. आधीच्या श्लोकात मनाला राघवाशिवाय काही बोलू नकोस कारण व्यर्थ बोलण्यामध्ये सुख नाही असे त्यांनी सांगितले आहे. या श्लोकात हीच गोष्ट ते वेगळ्या शब्दात आपल्याला सांगतात.
भगवंताच्या नामामध्ये अपार सामर्थ्य आहे. शिणलेल्या मनाला शक्ती देण्याचे, उभारी देण्याचे सामर्थ्य त्यात आहे. आपण जर खऱ्या सुखाचा शोध घेत असू तर भगवंताच्या नामाइतके सुख कशातच नाही. अन्य सुखे तात्पुरती आहेत आणि अंतिमतः दुःख देणारीच आहेत हेच समर्थ या श्लोकातून आपल्याला सांगण्याचा प्रयत्न करतात. म्हणून आपल्या जिभेवर नेहमी भगवंताचे नाम असावे असे त्यांचे सांगणे आहे.
शब्द किंवा भाषा बोलणे हे माणसाचे वैशिष्ट्य आहे. भाषेच्या माध्यमातून आपण आपले विचार व्यक्त करतो. शब्दांमध्ये किंवा भाषेमध्ये केवढी शक्ती असते हे जेव्हा आपण अधिकारी व्यक्तींच्या साहित्याचे वाचन करतो किंवा त्यांचे बोल ऐकतो तेव्हा लक्षात येते. बोलण्याला वाचाशक्ती असेही आपण म्हणतो. हे सरस्वतीचे वरदान आहे. पण सर्वसामान्य लोक बऱ्याच वेळा वायफळ बोलण्यात ही शक्ती व्यर्थ घालवत असतात.
पण ज्यांना साधना मार्गावर वाटचाल करायची आहे, भगवंत जोडायचा आहे, त्यांना अशी बाष्कळ बडबड करून चालणार नाही. आपल्या वाचेने त्यांनी भगवंताचे नाम घ्यायला हवे तशी सवय करायला हवी. उठत बसता, कार्य करता, सदा घेता देता… भगवंताचे नाम मुखात यायला हवे. मी जर साधक आहे आणि भगवंत प्राप्ती हे माझे ध्येय आहे असे जर आपण मनाशी ठरविले असेल तर जनांमध्ये मिसळताना सामान्य माणसांसारखी बडबड करून मला भागणार नाही. तसे केले तर मी माझ्या वाचेची शक्ती व्यर्थ घालवली असा त्याचा अर्थ होईल.
सुरुवातीला लोक मला नावे ठेवतील. माझी चेष्टा किंवा टिंगलटवाळी करतील पण मला भगवंत प्राप्तीसाठी ती सुद्धा सोसता आली पाहिजे. काही दिवसांनी लोकांना हे लक्षात येईल की ही व्यक्ती आपल्यासारखी नाही. ती साधक आहे. मग ते तुमच्याशी आदराने व्यवहार करतील. समर्थ या सगळ्या परिस्थितीतून गेले आहेत. ही परिस्थिती त्यांनी अनुभवली आहे आणि त्यातूनच त्यांचे हे अनुभवाचे बोल आले आहेत.
समाजात मिसळताना आपल्याला लोकांनी नावे ठेवू नये किंवा आपण कुठे कमी पडू नये म्हणून आपण त्यांच्यासारखे वागण्याचा प्रयत्न करतो. बरेचदा आपण जसे नसतो तसे दाखवण्याचा प्रयत्न करतो. मी विद्वान आहे, ज्ञानी आहे मला फार कळते अशा प्रकारचे मुखवटे धारण करतो. हा मुखवटा लोकांना दाखवण्यासाठी जरी असला तरी त्यातूनच अहंकार जन्म पावतो. अहंकार हे पापाचे मूळ आहे. रावणाला स्वतःच्या शक्तीचा, सामर्थ्याचा केवढा अहंकार झाला होता! जगामध्ये माझ्यासारखा कोणी नाही, मला कोणी हरवू शकत नाही हा त्याचा अहंकार त्याचे विनाशाला कारणीभूत ठरला. अहंकारातून अनेक नको असलेल्या गोष्टी घडतात. म्हणून समर्थ अहंतेला पापिणी असे म्हणतात.
म्हणून, हे मना, वाणीमध्ये भगवंताचे नाम ठेव आणि मनातून अहंकार दूर ठेव. यातच तुझे खरे कल्याण आहे.
स्वसंवाद ::
माझ्या बोलण्यात भगवंताचे नाम कितपत आहे आणि व्यर्थ बडबड किती आहे?
भगवंताचे नाम घेण्याची सवय मी स्वतःला लावतो आहे का?
माझ्या मनात अहंकाराची छटा आहे का? ती ओळखून मी कमी करण्याचा प्रयत्न करतो आहे का?
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख गुण और ग़ुनाह। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३१७ ☆
☆ गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘आदमी के गुण और ग़ुनाह दोनों की कीमत होती है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि गुण की कीमत मिलती है और ग़ुनाह की उसे चुकानी पड़ती है।’ हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गुणों की एवज़ में हमें उनकी कीमत मिलती है; भले वह पग़ार के रूप में हो या मान-सम्मान व पद-प्रतिष्ठा के रूप में हो। इतना ही नहीं,आप श्रद्धेय व वंदनीय भी बन सकते हैं। श्रद्धा मानव के दिव्य गुणों को देखकर उसके प्रति उत्पन्न होती है। यदि हमारे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा के साथ प्रेम भाव भी जाग्रत होता है तो वह भक्ति का रूप धारण कर लेती है। शुक्ल जी भी श्रद्धा व प्रेम के योग को भक्ति स्वीकारते हैं। सो! आदमी को गुणों की कीमत प्राप्त होती है और जहां तक ग़ुनाह का संबंध है,हमें ग़ुनाहों की कीमत चुकानी पड़ती है; जो शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना रूप में हो सकती है। इतना ही नहीं,उस स्थिति में मानव की सामाजिक प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग सकती है और वह सबकी नज़रों में गिर जाता है। परिवार व समाज की दृष्टि में वह त्याज्य स्वीकारा जाता है। वह न घर का रहता है; न घाट का। उसे सब ओर से प्रताड़ना सहनी पड़ती है और उसका जीवन नरक बन कर रह जाता है।
मानव ग़लतियों का पुतला है। ग़लती हर इंसान से होती है और यदि वह उसके परिणाम को देख स्वयं की स्थिति में परिवर्तन ले आता है तो उसके ग़ुनाह क्षम्य हो जाते हैं। इसलिए मानव को प्रतिशोध नहीं; प्रायश्चित करने की सीख दी जाती है। परंतु प्रायश्चित मन से होना चाहिए और व्यक्ति को उस कार्य को दोबारा नहीं करना चाहिए। बाल्मीकि जी डाकू थे और प्रायश्चित के पश्चात् उन्होंने रामायण जैसे महान् ग्रंथ की रचना की। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली के प्रति बहुत आसक्त थे और उसकी दो पंक्तियों ने उसे महान् लोकनायक कवि बना दिया और वे प्रभु भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना की, जो हमारी संस्कृति की धरोहर है। कालिदास महान् मूर्ख थे, क्योंकि वे जिस डाल पर बैठे थे; उसी को काट रहे थे। उनकी पत्नी विद्योतमा की लताड़ ने उन्हें महान् साहित्यकार बना दिया। सो! ग़ुनाह करना बुरा नहीं है,परंतु उसे बार-बार दोहराना और उसके चंगुल में फंसकर रह जाना अति- निंदनीय है। उसे इस स्थिति से उबारने में जहां गुरुजन, माता-पिता व प्रियजन सहायक सिद्ध होते हैं; वहीं मानव की प्रबल इच्छा-शक्ति,आत्मविश्वास व दृढ़-निश्चय उसके जीवन की दिशा को बदलने में नींव की ईंट का काम करते हैं।
इस संदर्भ में, मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगी कि यदि ग़ुनाह किसी सद्भावना से किया जाता है तो वह निंदनीय नहीं है। इसलिए धर्मवीर भारती ने ग़ुनाहों का देवता उपन्यास का सृजन किया,क्योंकि उसके पीछे मानव का प्रयोजन द्रष्टव्य है। यदि मानव में दैवीय गुण निहित हैं; उसकी सोच सकारात्मक है तो वह ग़लत काम कर ही नहीं सकता और उसके कदम ग़लत दिशा की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। हाँ! उसके हृदय में प्रेम,स्नेह,सौहार्द,करुणा, सहनशीलता,सहानुभूति,त्याग आदि भाव संचित होने चाहिए। ऐसा व्यक्ति सबकी नज़रों में श्रद्धेय,उपास्य,प्रमण्य व वंदनीय होता है। ‘जाकी रही भावना जैसी,प्रभु तिन मूरत देखी तैसी’ अर्थात् मानव की जैसी सोच,भावना व दृष्टिकोण होता है; उसे वही सब दिखाई देता है और वह उसमें वही तलाशता है। इसलिए सकारात्मक सोच व सत्संगति पर बल दिया जाता है। जैसे चंदन को हाथ में लेने से उसकी महक लंबे समय तक हाथों में बनी रहती है और उसके बदले में मानव को कोई भी मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। इसके विपरीत यदि आप कोयला हाथ में लेते हो तो आपके हाथ काले अवश्य हो जाते हैं और आप पर कुसंगति का दोष अवश्य लगता है। कबीरदास जी का यह दोहा तो आपने सुना होगा, ‘कोयला होय न ऊजरा,सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन लाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान बन सकता है। इसलिए मानव को निराश नहीं होना चाहिए और अपने सत् प्रयास अवश्य जारी रखने चाहिए। यह कथन कोटिश: सत्य है कि यदि व्यक्ति ग़लत संगति में पड़ जाता है तो उसको लिवा लाना अत्यंत कठिन होता है,क्योंकि ग़लत वस्तुएं अपनी चकाचौंध से उसे आकर्षित करती हैं–जैसे माया रूपी महाठगिनी अपनी हाट सजाए सबका ध्यान आकर्षित करने में प्रयासरत रहती है।
शेक्सपीयर भी यही कहते हैं कि जो दिखाई देता है; वह सदैव सत्य नहीं होता और हमें छलता है। सो! सुंदर चेहरे पर विश्वास करना स्वयं को छलना व धोखा देना है। इक्कीसवीं सदी में सब धोखा है, छलना है,क्योंकि मानव की कथनी- करनी में बहुत अंतर होता है। लोग अक्सर मुखौटा धारण कर जीते हैं। इसलिए रिश्ते भी विश्वास के क़ाबिल नहीं रहे। रिश्ते खून के हों या अन्य भौतिक संबंध–भरोसा करने योग्य नहीं हैं। संसार में हर इंसान एक-दूसरे को छल रहा है। इसलिए रिश्तों की अहमियत रही नहीं; जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चियों को भुगतना पड़ रहा है। अक्सर आसपास के लोग व निकट के संबंधी उनकी अस्मत से खिलवाड़ करते पाए जाते हैं। उनकी स्थिति बगल में छुरी ओर मुंह में राम-राम जैसी होती है। वे एक भी अवसर नहीं चूकते और दुष्कर्म कर डालते हैं,क्योंकि उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती। वास्तव में उनकी आत्मा मर चुकी होती है,परंतु सत्य भले ही देरी से उजागर हो; होता अवश्य है। वैसे भी भगवान के यहां सबका बही-खाता है और उनकी दृष्टि से कोई भी नहीं बच सकता। यह अकाट्य सत्य है कि जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का फल मानव को किसी भी जन्म में भोगना अवश्य पड़ता है।
आइए! आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर दृष्टिपात करें, जो ‘खाओ पीयो,मौज उड़ाओ’ में विश्वास कर ग़ुनाह पर ग़ुनाह करती चली जाती है निश्चिंत होकर और भूल जाती है ‘यह किराये का मकाँ है/ कौन कब तक ठहर पायेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यही संसार का नियम है कि इंसान कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। परंतु वह आजीवन अधिकाधिक धन-संपत्ति व सुख- सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है। काश! मानव इस सत्य को समझ पाता और देने में विश्वास रखता तथा परहितार्थ कार्य करता तो उसके ग़ुनाहों की फेहरिस्त इतनी लंबी नहीं होती। अंतकाल में केवल कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है और कृत-कर्मों के परिणामों से बचना सर्वथा असंभव है।
मानव के सबसे बड़े शत्रु है अहं और मिथ्याभिमान; जो उसे डुबा डालते हैं। अहंनिष्ठ व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हेय मानता है। इसलिए वह कभी दयावान् नहीं हो सकता। वह दूसरों पर ज़ुल्म ढाने में विश्वास कर सुक़ून पाता है और जब तक व्यक्ति स्वयं को उस तराजू में रखकर नहीं तोलता; वह प्रतिपक्ष के साथ न्याय नहीं कर पाता। सो! कर भला, हो भला अर्थात् अच्छे का परिणाम अच्छा व बुरे का परिणाम सदैव बुरा होता है। शायद! इसीलिए शुभ कर्मण से कबहुं न टरौं’ का संदेश प्रेषित है। गुणों की कीमत हमें आजीवन मिलती है और ग़ुनाहों का परिणाम भी अवश्य भुगतना पड़ता है; उससे बच पाना असंभव है। यह संसार क्षणभंगुर है,देह नश्वर है और मानव शरीर पृथ्वी,जल,वायु, अग्नि व आकाश तत्वों से बना है। अंत में इस नश्वर देह को पंचतत्वों में विलीन हो जाना है; यही जीवन का कटु सत्य है। इसलिए मानव को ग़ुनाह करने से पूर्व उसके परिणामों पर चिन्तन-मनन अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने के पश्चात् ही आप ग़ुनाह न करके दूसरों के हृदय में स्थान पाने का साहस जुटा पाएंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – नवनिर्माण…।
रचना संसार # ८९ – गीत – नवनिर्माण… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’