हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५७ ☆ लघुकथा – चुस्कियाँ… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “चुस्कियाँ“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५७ ☆

✍ लघुकथा – चुस्कियाँ… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

सतीश और भीम लंबे अरसे के बाद मिले। दोनों ठेकेदार थे। पानी की लाइन डालना, सड़क बनाना और भी सरकार के निर्माण कार्य दोनों ही करते थे। संबंध मधुर थे पर व्यवसाय में कड़ा मुकाबला और गोपनीयता थी। कई बार सुरेश के ऊंची दर वाले टेंडर को अनुभव या किसी अन्य तकनीकी कारणों से स्वीकार नहीं किया जाता और कम दर होने पर भीम का टेंडर स्वीकार हो जाता।

लेकिन दोनों में से किसी ने कभी यह जिक्र नहीं किया कि ऐसा कैसे हो जाता है।  सतीश को अखरता तो टेंडर पास होते समय भीम की आंखें झुक जाती थी। हृदय में जो कुछ हो उसे आंखों से कोई समझले तो समझले पर शब्दों में नहीं आ पाता।

अब दोनों ही वृद्ध हो गए हैं और ठेकेदारी भी छोड़ चुके हैं।  दोनों चाय की चुस्कियाँ ले रहे हैं। न सतीश के चेहरे पर अखराव के भाव हैं और न ही भीम की आंखें झुकी हुई हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०६ – कर्तव्य… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कर्तव्य।)

☆ लघुकथा # १०६ – कर्तव्य श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

आशा जी अपने एक बैग में किताबें भरकर जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ाते हुए ऑटो रिक्शा में बैठकर सिटी के  बीच स्थित हिंदी लाइब्रेरी में पहुंच जाती हैं। जैसे ही वे गेट के अंदर जाती है, पक्षियों की चहचहाहट का मनोरम संगीत माहौल को खुशनुमा बना रहा था।

बाहर एक टेबल पर  अखबार और तरह-तरह की मैगजीन रखी थी।

नगर के सभी वरिष्ठ नागरिक यहाँ पर आकर अखबार पढ़ते हैं और वे अपने बच्चों के अच्छे कपड़े,  किताब, कॉपी, जैकेट एवं जूते सब यहाँ एक कोने में अलमारी में रख देते हैं  जरूरतमंद अपने घर ले जाते हैं।

यह देखकर आशा जी को बहुत अच्छा लगा मन में एक प्रसन्नता हुई उन्होंने  बाहर बैठे व्यक्ति से पूछा कि – “मैं भी कुछ दान करना चाहती हूँ, कहाँ रख सकती हूँ? पास बैठे व्यक्ति ने कहा कि “आप अंदर जाइए वहां पर एक बुजुर्ग दंपति बैठे हैं वह आपको सब बता देंगे।”

उसे सामने रिसेप्शन में बैठे सीनियर सिटीजन नजर आए ।

देखकर आशा ने कहा- “मैं कुछ किताबें यहाँ पर दान करने के लिए लाई हूँ लेकिन मैं क्या कुछ सामान भी लाकर यहाँ रख सकती हूँ?”

बुजुर्ग दंपति ने कहा- “बिल्कुल बहन आप यहाँ पर आकर पढ़ सकती हैं और सामान को दान दे सकते हैं।”

आशा जी ने कहा- “यहाँ पर मैं बैठकर अपने लेखन कार्य को अच्छे से कर सकती हूँ।”

आज मैंने एक बात समझी -“आप रचनाकारों को लिखने के लिए प्रेरित करने  का नेक कार्य भी कर सकती हैं।”

वृद्ध महिला ने कहा- “महिलाऍं बहुत संघर्ष से लेखन कार्य करती है इसलिए हम उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। हमारे लाइब्रेरी में कोई भी आ सकता है।”

आशा जी ने कहा – “अधिकार की बात सब करते हैं किन्तु, आपने एक मिसाल कायम  की है। अपने कर्तव्य का समाज के प्रति निर्वाह किया है।”

बुजुर्ग दंपति और आशा जी दोनों मुस्कुराने लगते हैं आशा जी की ऑंखों में एक नई ऊर्जा और चमक आ जाती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०६ ☆ कळेना… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०६ ?

☆ कळेना… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

आता तुझ्याविना मी वागू कशी कळेना

होतास तू सुकाणू सांगू कशी कळेना

*

नौकेस जीवनाच्या नव्हता कधी किनारा

आधार वादळाचा मागू कशी कळेना

*

मी एक मुग्ध-वेडी जग हे असे विखारी

अंधार – रात्र येता जागू कशी कळेना

*

तू कोणत्या दिशेला गेलास या अवेळी

मी या कुडीस आता त्यागू कशी कळेना

*

 होतेच चांगले की जाळून टाकलेले

 दुःखास त्या पुराण्या टांगू कशी कळेना

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४१ – बुन्देली कविता – ”चार दिना की ज्वानी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – चार दिना की ज्वानी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४१ – बुन्देली कविता – चार दिना की ज्वानी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

चार दिना की ज्वानी है

काहे की अभमानी है

*

एक दिना सब खें जाने

छोटी सी जिनगानी है

*

मढ़िया की सिढ़ियाँ चढ़बे

याद आत अब नानी है

*

गर्मी में दरसन देउत

बो बाबा बरफानी है

*

देखे बिना न चैन परै

ऐंसो दुश्मन जानी है

*

बाँदकपुर बारो भोला

जागेसुर बरदानी है

*

नाकों दम कर दव ऊ ने

भगवत’ बा भैरानी है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०४ ☆ बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०४ ☆

?  आलेख – बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का  रूपक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ब्रिटेन की धरती पर प्राकृतिक रूप से कभी शेरों का बसेरा नहीं रहा लेकिन वहां के इतिहास और संस्कृति की रगों में शेर किसी स्वदेशी जीव से कहीं अधिक गहराई तक समाया हुआ है। यह एक अद्भुत विरोधाभास है कि जिस देश के जंगलों में भेड़-बकरियां और लोमड़ियां घूमती थीं वहां की राजमुद्रा पर बबर शेर की दहाड़ अंकित है। वास्तव में शेर का ब्रिटिश साम्राज्य में आगमन सैन्य वीरता और शाही गौरव की चाहत का परिणाम था।

मध्यकाल के दौरान इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द लायनहार्ट ने अपनी अदम्य वीरता के कारण शेर को अपने ढाल पर स्थान दिया और वहीं से यह जीव ब्रिटेन की पहचान बन गया। तब शेर केवल एक पशु नहीं बल्कि एक ‘मेटाफर’ यानी रूपक था ,  संदेश था कि ब्रिटिश साम्राज्य शेर की तरह शक्तिशाली और निडर है। आज भी शाही प्रतीक चिन्ह में सुनहरी आभा लिए खड़ा शेर ब्रिटेन के आत्मविश्वास का परिचय देता है।

अनेक भव्य भवनों के प्रवेश द्वार पर प्राचीन दो  शेरों  की मूर्तियां नजर आती हैं।

ब्रिटेन के अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों की बात करें तो वहां की विविधता और भी रोचक हो जाती है। जहां इंग्लैंड का प्रतीक शेर है वहीं स्कॉटलैंड ने एक काल्पनिक जीव ‘यूनिकॉर्न’ को अपना राष्ट्रीय पशु चुना है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार यूनिकॉर्न ही वह एकमात्र जीव है जो शेर को टक्कर दे सकता था। इसी प्रकार वेल्स का राष्ट्रीय पशु ‘ड्रैगन’ है जो वहां की लोककथाओं और संघर्ष की कहानियों का नायक रहा है। पक्षियों में ‘रॉबिन’ को वहां का राष्ट्रीय पक्षी माना जाता है जो अपनी सुरीली आवाज और लाल छाती के कारण सर्दियों के मौसम में भी जीवंतता का संचार करता है।

शेर का बाल कहानियों में नायक बनना भी इसी सांस्कृतिक सोच का रोचक विस्तार है। असल दुनिया में भले ही वह एक हिंसक शिकारी पशु हो लेकिन कहानियों में उसे एक न्यायप्रिय जंगल के राजा और नैतिकता के रक्षक के रूप में ढाला गया है। ब्रिटिश लेखकों ने शेर को शक्ति के ऐसे स्वरूप में पेश किया जो अन्यायी नहीं बल्कि अनुशासित है। यही कारण है कि लंदन के ट्रैफल्गर स्क्वायर पर बनी शेरों की विशाल मूर्तियां हों या बच्चों की कहानियों के पात्र यह जीव अब विदेशी नहीं बल्कि पूरी तरह ब्रिटिश मानस का हिस्सा बन चुका है। शायद शेर का ऐसा महत्वपूर्ण वर्णन वहां के शासकों को अलिखित शिक्षा देने की प्रेरणा भी सदियों से बना हुआ है।

लायंस क्लब की स्थापना में बबर शेर का नाम सिंह के राजसी सेवा भाव को प्रतिबिंबित करता है।

यह गौरवमयी यात्रा बताती है कि कोई जीव किसी देश का प्रतीक बनने के लिए वहां के भूगोल में मौजूद हो यह अनिवार्य नहीं है बल्कि वह वहां के लोगों के आदर्शों में जीवित होना चाहिए। ब्रिटेन ने शेर की हिंसक छवि के बजाय उसके राजसी गौरव को अपनाकर उसे अमर बना दिया है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अर्थतंत्र की रीढ़ को। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१४ – अर्थतंत्र की रीढ़ को… ☆

राजनीति में लग गया, नेताओं को रोग।

अर्थतंत्र की रीढ़ को, तोड़ रहे ये लोग।।

*

ऋण देकर उपकृत करें, बाँट रहें खैरात।

फिर उसको माफी करें, यह कैसी सौगात।।

*

जनता देती टैक्स है, सुविधाओं की आस।

सत्ताधारी कर रहे, उनको सदा निरास।।

*

बाढ़ अकाल आगजनी,तोड़ फोड़ के नाम।

करें सुरक्षा कुछ नहीं, भुगतें सब अंजाम।।

*

जात धर्म के नाम पर, तुष्टिकरण का रोग।

इनके अंदर है भरा, भंडारे का भोग।।

*

दान वीर ऐसे बने, जैसे मिली हो छूट।

अपने वोट सहेजने, कोषालय की लूट।।

*

अपराधों को रोकने, असफल हैं ये लोग।

क्षतिपूर्ति के नाम पर, पाल रखा है रोग।।

*

अर्थतंत्र कमजोर कर, हर्षित होते आज।

पैर कुल्हाड़ी मारते, सबके सिर पर गाज।।

*

अर्थ तंत्र है देश की, वह मजबूत गठान।

इससे ही बढ़ती सदा, हर मुल्कों की शान।।

*

नैतिकता पर जोर दें, तजें अनैतिक राह।

चारित्रिक पथ पर चलें, चहुँ दिश होती वाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ – करुण पुकार ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा करुण पुकार”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५९ ☆

🌻लघु कथा🌻 🛕 करुण पुकार🛕

मंदिर के पास घर निवास होने से सभी प्रकार के आराधना प्रार्थना की आवाज आती रहती है। कभी बच्चे होने का बधावा, कभी मुंडन में रोती किलकारी, कभी कन्या भोज, कभी देवी पूजन, कभी बेटी की बारात में माता पूजन, कभी बहू के आने के बाद मंदिर में चढ़ावा, और कभी किसी के अपने से बिछड़ जाने पर शांत मन से बैठ सीढियों पर बातें करना।

घंटी और साज बाजे की आवाज बदल जाती है। कभी शहनाई, कभी ढोल, कभी मृदंग, कभी मंजीरे की झनक और कभी सिसकती आँहे, सिर्फ घंटी की पुकार, परंतु ईश्वर को पाने या उनसे मन्नत करने का तरीका अलग-अलग परंतु ठिकाना सबका एक।

आज सुबह आरती वंदन के बाद घंटी की आवाज थोड़ी धीमी सी आ रही थी, परंतु शोर शराबा कुछ बाँटने का हो रहा था। मंदिर प्रांगण भीड़भाड़ से भरा था। नीचे – ऊपर, आती- जाती, सीढ़ी पर बैठी अम्मा का गीत आज ऊंचे स्वर पर कुछ प्रसन्नता पूर्वक आ रही थी – – – जो अक्सर बैठकर करुण पुकार करती रहती थी।

धीरे से सविता ने पूछा अम्मा क्या बात है। आज करुण पुकार की जगह मीठे- मीठे गीत गा रही हो। बिटिया— आज बरसों बाद मेरा बेटा अपना बेटा लेकर आ रहा है। उसने मुझे बताया है कि मंदिर में आ जाना देख लेना। बस उसी का इंतजार कर रही हूँ।

सविता आश्चर्य से देखती रही क्या?? तुम्हें ले जाएगा।

अरे कहाँ। मैंने उसे अपना बनाया था। अनाथ को लालन-पालन कर पढ़ा लिखा बड़ा किया।

बिटिया उसने मुझे अपना थोड़े ही माना था। मेरी संतान नहीं है वह।

सविता तो बस सुनकर हृदय से गमगीन हो गई। जिस बच्चे के लिए वह तड़प रही है। वह तो सिर्फ उसे एक नौकरानी (आया) समझ रहा था।

इससे तो अच्छा था वह स्वयं ही अनाथ रहती किसी अनाथ को सनाथ बनाते। उसकी करुण पुकार बाजे शहनाइयों के बीच दब गई।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७० – देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७० ☆ देश-परदेश – Returnable Bottles ☆ श्री राकेश कुमार ☆

गर्मी का सीज़न इस बार भी निर्धारित समय से पूर्व ही आ गया है। दूसरी और पश्चिम एशिया का युद्ध भीषणतम हो कर गर्मी बढ़ाने में वैसा ही कर रहा है, जैसे कि जलती आग में घी करता है।

हमारे घर में विगत कुछ वर्षों से तथाकथित “शीतल पेय” का सेवन व्हाट्स ऐप महाविद्यालय से मिले ज्ञान से बंद हो चुका है। खाना बनाने वाली गैस की कमी के चलते घर में चाय के सेवन पर प्रतिबंध की चर्चा परवान चढ़ चुकी है। इसी क्रम में शीतल पेय की यादें ताज़ा हो गई हैं।

साठ के दश्क में कोका कोला, ऑरेंज (फेंटा नहीं) और सोडा कांच की बोतलों में उपलब्ध रहता था। सोडा दो आने और अन्य चार आने में बिक्री होती थी। दुकानदार कांच की बोतल के नाम से सिक्योरिटी डिपोजिट जमा करवा लेता था। बोतल की सही सलामती पर उस राशि की वापसी संभव हुआ करती थी। बोतल के ढक्कन हटाने पर ज़रा सा भी कांच टूटने  से राशि काट कर बोतल ग्राहक को थमा दी जाती थी। कुछ अमीर विवाह आदि कार्यक्रमों से खाली बोतल घर ले आते थे। जब कभी बाजार से शीतल पेय खरीदते तो घर रखी खाली बोतल घर से साथ ही ले जाते थे, और सिक्योरिटी जमा करने से बच जाते थे। इन कांच की बोतलों को खोलने वाले छोटे से यंत्र को ओपनर कहा जाता था। हमारे जैसे किशोर तो मुंह में लगे हुए दांतों की दाढ़ के सहारे ही बोतल खोल लेते थे। पड़ोस के लोग भी हमारी सेवाएं ले कर उसकी एवज में थोड़ा सा पेय दे दिया करते थे।

मोहल्ले के परिचित दुकानदार भी किसी अन्य व्यक्ति की गारंटी देने पर सिक्योरिटी जमा करने की झंझट से मुक्त रहते थे।

अब तो प्लास्टिक युग में शीतल पेय भी विगत कुछ दशकों से प्लास्टिक की बोतलों में विक्रय किया जाता है, हालांकि बोतल खोलते ही इनकी गैस निकल जाती है, वो मज़ा नहीं आता है, जो कांच की बोतलों में हुआ करता था।

इस लेख के माध्यम से अपने मित्रों को संदेश देना चाहता हूं, कि हम जब भी उनके घर पर आएं, तो वो खाने वाली गैस की कमी के नाम पर चाय के स्थान पर शीतल पेय परोस सकते हैं। हमें कोई गुरेज नहीं है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२० ☆ दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२० ?

दिव्यत्वाची शक्ती… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

मी दगड कोरला देवा तू त्यात भेटला होता

अन् छन्नी हातोड्याचा आघात सोसला होता

*

देवा तू सोबत होता मी म्हणून चुकलो नाही

तू माझ्या ह्या हाताचा सन्मान राखला होता

*

मूर्तीची प्राणप्रतिष्ठा झालेली डोळ्यांदेखत

डोळ्यांचे सोने झाले मी श्वास रोखला होता

*

मज बहाल केली देवा तू दिव्यत्वाची शक्ती

पाषाण म्हणूनच मी तो नेमका जोखला होता

*

असुरांची टोळी होती मूर्तीला दगड म्हणाली

थडग्यांना पुजणारांनी तो डाव फेकला होता

*

मातेची आज्ञा झाली तू वनात गेला तेव्हा

वनवास पाच शतकांचा कलियुगी भोगला होता

*

ह्या आयोध्या नगरीचे प्रारब्ध उजळले आता

त्या जुलमी सत्तेनंतर तू उभा ठाकला होता

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७६ – कुछ दिनों से – १ ✍

(काव्य संग्रहउजास ही उजास से )

कुछ दिनों से

अजब घटनाएँ घट रही हैं।

परिचितों के पाँवों में

बिमाइयाँ फट रही हैं

लोग

बड़ी आतुरता से / बड़े गौर से

देखते हैं मेरा चेहरा / मेरा मुख

शायद कोशिश करते हैं

मन की इबारत को पढ़ने की

जिसे कहते हैं दुख।

मुख और में दुख

कोई तालमेल नहीं

किसी के मुख को पढ़ लेना

दुख को हर लेना

हँसी खेल नहीं।

ज्यादा हुआ/ तो

हँसा जा सकता है

किसी विपत्ति में फँसे पर,

तिनके की जगह

फेंका जा सकता है पत्थर

धार में धँसे पर

बड़ी अलग सी बातें हैं

दुख में रहना

दुख को सहना

और

चुप रहना!

क्रमशः…

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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