डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४८ ☆
☆ व्यंग्य ☆ बेमिसाल यूनिवर्सिटी के छात्र-हितकारी पाठ्यक्रम ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
देश के मशहूरो-मारूफ़ शिक्षा संस्थान बेमिसाल यूनिवर्सिटी ने 20 जून को एक विज्ञप्ति निकाली जिसमें घोषणा की गयी कि यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए दो नये रोज़गारोन्मुख पाठ्यक्रम आरंभ करने जा रही है जिनका उद्घाटन राज्य के माननीय राज्यपाल के कर कमलों द्वारा शीघ्र होगा।
विज्ञप्ति में कहा गया कि पिछले साल यूनिवर्सिटी छात्रों के लिए पन्द्रह दिन का अति उपयोगी ‘उपला मेकिंग‘ कोर्स चला चुकी है जो बहुत लोकप्रिय हुआ और जिसमें छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। विशेषकर छात्राओं का मत था कि यह कोर्स साधारण पढ़ाई की तुलना में बहुत दिलचस्प और उपयोगी साबित हुआ।
यूनिवर्सिटी ने अब निम्नलिखित दो उपयोगी पाठ्यक्रमों के आरंभ होने की घोषणा की है जिनकी अवधि एक वर्ष होगी और जिनमें सफल छात्रों को डिप्लोमा प्रदान किया जाएगा। विज्ञप्ति में यह विश्वास दिलाया गया कि ये पाठ्यक्रम छात्रों को नौकरी या व्यवसाय करने में बहुत सहायक सिद्ध होंगे।
- एडवांस्ड कोर्स इन सायकोफ़ैंसी :-
इस पाठ्यक्रम को हिन्दी में ‘चाटुकारी का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जाएगा। यूनिवर्सिटी में बहुत समय से यह शिद्दत से महसूस किया जा रहा था कि- कोरी शिक्षा और डिग्री से जीवन में सफलता और तरक्की हासिल करना मुश्किल है। पढ़-लिख कर आदमी नौकरी तो पा सकता है, लेकिन प्रोमोशन के लिए कुछ और गुण आवश्यक महसूस होते हैं, वर्ना काबिल लोग पांव पीटते रह जाते हैं और चतुर गधे बुलन्दी पर पहुंच जाते हैं। इसी तरह बिज़नेस में ऊंचाई हासिल करने के लिए सत्ता के रसूखदारों को साधना ज़रूरी होता है, जिसके लिए चाटुकारी अत्यावश्यक होती है। इसलिए शैक्षणिक योग्यता में ठकुरसुहाती या ब्याजस्तुति की गोटा-किनारी लगाना ज़रूरी है। राजाओं के ज़माने में यह काम भाटों और चारणों के द्वारा किया जाता था।
इस पाठ्यक्रम के सफल संचालन के लिए यूनिवर्सिटी देश के शीर्षास्थ चाटुकारों को ‘विज़िटिंग प्रोफेसर’ के रूप में आमंत्रित करेगी। सौभाग्य की बात है कि देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है। अनेक जन-प्रतिनिधि इस कला में सिद्ध हैं। नेता के मुख से कोई प्रस्ताव निकलते ही तुरंत समर्थन में हाथ उठाते हैं। सोचने-समझने की ज़रूरत नहीं। इन्हें देखकर एक फिल्मी गीत याद आता है— ‘जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे, तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे।’ हमारे बॉलीवुड में इस कला में सिद्ध अनेक कलाकार बैठे हैं। एक बुज़ुर्ग कलाकार सार्वजनिक रूप से गर्व के साथ अपने को एक बड़े नेता का ‘चमचा’ घोषित कर चुके हैं। समझदार फिल्म निर्माता ऐसी फिल्में बना रहे हैं जिनसे सरकार खुश हो और टैक्स में छूट मिले, भले ही समाज में ज़हर फैले। इस गुण से संपन्न अनेक मीडिया चैनल भी हैं जिन्हें ‘गोदी मीडिया’ नाम से विभूषित किया गया है।
कुछ लोगों में चाटुकारी की नैसर्गिक प्रतिभा होती है। वे हवा का रुख देखते ही अपने व्यवहार में पलटी मारते हैं। बनारस विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर साहब ने गोबर के उपले बनाने का प्रशिक्षण दिया, और इस तरह छात्रों के दिमाग़ में भरपूर गोबर भरा। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज की प्रिंसिपल महोदया ने अंतरात्मा की पुकार पर छात्रों के क्लासरूम की दीवारों को गोबर से पुतवा दिया। परिणामत: छात्रों ने वही सलूक प्रिंसिपल महोदया के ऑफिस के साथ किया।
एक महंत जी हैं जो प्रभु के निर्देश पर एक राजनीतिक पार्टी में प्रवेश कर गये। फिर प्रभु के निर्देश पर दूसरी पार्टी में चले गये। फिलहाल वे अपनी नयी पार्टी के नेता में बुद्ध, महावीर और गांधी की छवि देख रहे हैं।
विज्ञप्ति में कहा गया कि भगवान भी अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करते हैं। अजामिल की कथा इसका प्रमाण है। इसीलिए चतुर लोग मन में भक्ति न होते हुए भी मुंह से नारायण का जाप करते रहते हैं ताकि उन्हें भी धोखे से स्वर्ग में ‘एंट्री’ मिल जाए।
यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में निष्कर्ष स्वरूप कहा गया कि संसार की बड़ी बाधाओं को चाटुकारी के अमोघ अस्त्र से जीता जा सकता है, और अन्त में रामायण की चौपाई उद्धृत की— ‘सकल पदारथ हैं जग माहीं, करमहीन नर पावत नाहीं।’ मतलब यह कि जो जन चाटुकारी नहीं कर पाते, उन्हें संसार में कुछ नहीं मिलता। वे मुट्ठी बांधे आते हैं और हाथ पसारे संसार से विदा हो जाते हैं।
- एडवांस्ड कोर्स इन डिस्सिम्युलेशन :-
इस कोर्स को ‘वाक्छल का उन्नत पाठ्यक्रम‘ कहा जा सकता है। यह भी बहुत उपयोगी और ज़रूरी पाठ्यक्रम है, ख़ासकर राजनीतिज्ञों और अफसरों के लिए। राजनीति में जनता को छलने और उनका वोट लेने के लिए बड़े-बड़े वादे करने पड़ते हैं। फिर वादे पूरे न होने पर जब जनता जवाब मांगती है तो वाक्छल की कला जान छुड़ाने के लिए बहुत काम आती है। जब जनता देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल पूछने लगती है तो मंत्री जी फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की बात करने लगते हैं। एक जन- प्रतिनिधि को देखा जो अपने चुनाव-क्षेत्र गये थे। जब जनता उनके सामने अपनी शिकायतें रखने लगी तो नेताजी मुट्ठी उठाकर ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम’ के नारे लगाने लगे। इसके बाद वे कार में बैठकर वहां से फुर्र हो गये।
जनसेवा के जज़्बे से भरे नेताओं को कई बार दुखी मन से दल बदलना पड़ता है। तब जनता का सामना होने पर वाक्छल की कला बहुत काम आती है।
वाक्छल का उत्तम नमूना महाभारत में युधिष्ठिर का वक्तव्य था जिसमें वे गुरु द्रोण को अश्वत्थामा की मृत्यु का झूठा समाचार देते समय ‘अश्वत्थामा हत:‘ के पीछे ‘नरो वा कुंजरो वा’ जोड़ देते हैं।
अफसरों को भी जनता की शिकायतों का सामना करते समय अपना और अपने आकाओं का बचाव करना पड़ता है। इसके लिए जनता को नाना प्रकार से बहलाना और बहकाना पड़ता है। जब जनता के तर्कों का जवाब नहीं सूझता तो अफसर अंग्रेजी और कथा वाचक संस्कृत बोलने लगते हैं। पंडितों के मंत्रों के बारे में एक लेख में परसाई जी लिखते हैं— ‘जिन मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, वे अगर संस्कृत से हिन्दी में कर दिये जाएं तो प्राइमरी स्कूल की किताब के लायक हैं।’
यूनिवर्सिटी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि हमारे देश में वाक्छल में माहिर लोग बड़ी संख्या में हैं। देश में ज़्यादातर लोगों के अल्पशिक्षित होने के कारण इस कला में माहिर लोगों की जनता को बहलाने में सफलता निश्चित रहती है। यूनिवर्सिटी ने लिखा कि वह इस कला में उच्च योग्यता प्राप्त विद्वज्जन को आमंत्रित कर छात्रों को इस कला में दीक्षित करेगी।
विज्ञप्ति के अन्त में लिखा गया कि यूनिवर्सिटी आगे भी इसी प्रकार छात्रोपयोगी पाठ्यक्रमों का अन्वेषण कर छात्रों का हित करने के उपक्रम में सन्नद्ध रहेगी।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




