हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिलालेख ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  – शिलालेख ☆

 

वे खिंचवाते रहे फोटो

जुगाड़ते रहे पुरस्कार

साधते रहे साझा स्वार्थ

लेखक कहलाने के लिए..,

वह नादान लिखता रहा निरंतर

अपने आप से मुक्ति पाने के लिए..,

कालांतर में शेष सभी शेष हुए

केवल शब्द शिलालेख हुए!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

प्रात: 8.03 बजे, 10.12.19

 

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिंदी साहित्य – कविता / Poetry – ☆ मरीचिका मृत  हुई…  / The mirage died ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं। हम आदरणीय  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी के  ह्रदय से आभारी हैं। कैप्टन प्रवीण रघुवंशी न केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रवीण हैं, बल्कि उर्दू और संस्कृत में भी अच्छा-खासा दखल रखते हैं. उन्होंने हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए अपनी अतिसुन्दर मौलिक रचना “मरीचिका मृत  हुई…” और इसी कविता का अंग्रेजी अनुवाद ” The mirage died” उपलब्ध कराया है जिसे आप इसी पृष्ठ  पर मूल रचना के अंत में  पढ़ सकते हैं।)

☆ मरीचिका मृत  हुई… 

अन्ततः

मरीचिका मृत  हुई

अंनत काल-चक्रव्यूह

एक और पुनर्जन्म

एक और शरीर

घोषित हुए परिणाम

‘माया मिली ना राम…!’

 

The mirage died

Finally,

The ‘Marichika’ –the mirage died

Infinite life-cycle maze

Another rebirth

Yet another body

But, the declared results:

‘Maya Mili Na Ram …!’*

 

*NB*:

**Maya mili na Ram…*

By obsessively chasing the materialistic affairs and also involving in spiritual pursuits, one could neither get the worldly euphoric fantasies nor the supreme God…

 

–  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, पुणे

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य – # 24 ☆ व्यंग्य – वाटर स्पोर्ट्स ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा  रचनाओं को “विवेक साहित्य ”  शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “वाटर स्पोर्ट्स”.  श्री विवेक रंजन जी का यह  व्यंग्यआत्मावलोकनात्मक व्यंग्य के बहाने पाठक को भी वाटरस्पोर्ट्स में भाग लेने के लिए मजबूर कर  देता है।  अब किसकी आँखों का पानी बचा है सभी दूसरों की आँखों के पानी से वाटर स्पोर्ट्स में भाग लेने का मौका ढूंढते रहते हैं। इस व्यंग्य को पढ़कर कमेंट बॉक्स में बताइयेगा ज़रूर। श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेहतरीन व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 24 ☆ 

☆ वाटर स्पोर्टस ☆

 

विवेक रंजन जी कालेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर, इंजीनियर बन चुके थे. उन्हें इंजीनियर का सहायक बनने के लिये मतलब, “सहायक इंजीनियर” की नौकरी के लिये इंटरव्यू देना पड़ा.  इंटरव्यू का पैनल एक्सपर्ट्स का था, उसने इंजीनियरिंग से संबंधित कोई सवाल ही नही किया, जरूर उन्हें कालेज से मिली मार्कशीट से भरोसा हो गया होगा कि विवेक रंजन मेधावी इंजीनियर हैं. अलबत्ता एक एक्सपर्ट ने पूछा आपने कभी कोई वाटर स्पोर्टस किया है ? विवेक जी को यह बिल्कुल समझ नही आया कि वाटर स्पोर्टस में योग्यता का इंजीनियरिंग की नौकरी में भला क्या काम ? पर उनका विवेक जागा, उन्होनें बताया कि नन्हें विवेक बाथ टब में ही पानी छप छप किया करते थे, शायद इसीलिये वे बचपन से ही लगातार अखबारो में छपा करते हैं. जैसे ही कुछ बड़े हुये अपनी बहनो के साथ “गोल गोल रानी इत्ता इत्ता पानी ” का प्रतीकात्मक वाटर स्पोर्टस भी उन्होने खेला है, उसके बाद अपनी स्लेट को गीले स्पंज से पोंछने के बाद ” नदी का पानी नदी में जा, कुंए का पानी कुंए में जा, मेरी स्लेट सूख जा ” वाला सुरमयी गान भी उन्होने गाया है, यद्यपि इसे वाटर स्पोर्ट्स माना जावे या नही यह पैनल पर निर्भर करता है. रही तैराकी, नौकायन की बात तो बंदा मण्डला में नर्मदा तट पर  पैदा हुआ है, ब्रेस्ट स्ट्रोक से लेकर बटरफ्लाई और फ्रीस्टाईल तक हर कुछ जानता है. इंटरव्यू बोर्ड हंस पड़ा. हंसा सो फंसा, विवेक रंजन जी सहायक इंजीनियर की नौकरी पर रख लिये गये. तब से अब तक बस रखे ही रखे हैं. असली काम की जगहो पर पोस्टिंग कभी नही हुई, शायद उसके लिये पानी पी पी कर मख्खन लगा सकने वाले स्पोर्ट्स में वे कमजोर हैं. यानी सहायक इंजीनियर से चीफ इंजीनियर बनने के इस बेदाग सफर में महाशय  सब कुछ हुये पर “इंजीनियर” कभी न हो पाये.

बात वाटर स्पोर्ट्स की हो रही है, तो याद आया  हमारे नये एम डी साहब को स्वीमिंग में रुचि थी, उनका कहना था कि तैराकी सबसे अच्छा व्यायाम है, जिससे सारे बदन की वर्जिश हो जाती है. तन मन में स्फूर्ति बनी रहती है, सारे दिन आदमी तरोताजा और चैतन्य रहा आता है. एम डी साहब की अभिरुचि के अनुरूप स्वाभाविक था कि अचानक सारे डिपार्टमेंट में स्वीमिंग के प्रति सोया हुआ अनुराग पुनर्जागृत हो गया. हर अधिकारी पूल में वही स्लाट लेने को लालायित रहने लगा जिसमें एम डी साहब सपरिवार पूल जाते थे. नई नई स्वीमिंग कास्ट्यूम खरीद कर लोग तैरने के लिये जुटने लगे. जिन्हें तैराकी नही आती थी वे गूगल पर स्विंमिंग सर्च कर उसकी बारीकियां और रिकार्ड्स पढ़ने लगे, जिससे चाय पर चुस्कियो के साथ वार्तालाप के लिये कुछ मसाला मिल सके. एन्युअल इंटर रीजन स्विंमिंग कम्पटीशन आयोजित किया गया. फ्री स्टाईल रेस में खुद एम डी साहब का बेटा हिस्सेदारी कर रहा था,रेफरी से लेकर दर्शको तक सबकी विशेष अभिरुचि इस  इवेंट में  जाग गई थी.  पता नही यह रेफरी की स्टाप वाच की गलती थी या रेफरी ने अज्ञानता वश यह कारनामा कर दिखाया था, दरअसल जब परिणाम घोषित किया गया तो एम डी साहब के बेटे की टाइमिंग नेशनल रिकार्ड से भी कम थी, मैं मन ही मन मुस्कराकर चुप रह गया. एम डी साहब का होनहार तैराक बेटा फर्स्ट प्राइज की शील्ड लेकर प्रसन्नता पूर्वक फोटो के लिये पोज दे रहा था, हम तालियां पीटकर खुशियां बांट रहे थे.

एक और तरह के वाटर स्पोर्ट्स से भी मैं परिचित हूं. जिस वाटर स्पोर्टस् में भारतीय बेटियां बहुत निपुण होती हैं. अपने हर दर्द को आंसू में बहा देने की कला, और उन आंसुंओ को बेवजह मुंह धोकर अपना दुख छिपा जाने,  मुस्कराने की योग्यता, अंयत्र दुर्लभ है. वाटर स्पोर्टस् के लिये सबसे जरूरी होता है पानी,  रहीम बहुत पहले लिख गये हैं, “रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून ” सो इल्तिजा यही है कि आंखो का पानी कभी भी सूखने न दीजीयेगा.

 

लेखक पुरस्कृत व्यंग्यकार हैं, व्यंग्य की ५ पुस्तकें प्रकाशित हैं. संप्रति मुख्य अभियंता म. प्र विद्युत मण्डल जबलपुर

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 25 – जगायला शिकू… ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

 

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है!  आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर कविता जगायला शिकू… )

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #25☆ 

 

☆  जगायला शिकू… ☆ 

 

श्वास घेऊनीच आलो

श्वास होऊनीच जाऊ

आयुष्यात सुख दुःख

थोडं देऊ थोडं घेऊ. . . . !

 

कुणी असा कुणी तसा

प्रश्न रोजचाच आहे

माझ्या त्यांच्या मनामध्ये

राग लपलेला आहे…!

 

सूत्र जीवनाचे साधे

नाही कळले कोणाला

जन्म गेला माणसात

माणसाला शोधण्याला . . . . !

 

मातीमध्ये उगवलो

आस आभाळाची ठेऊ

ऊन, पाऊसा सारखे

जरा जगायला शिकू…!

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #27 ☆ गणना ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  एक सार्थक लघुकथा  “गणना ”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #27 ☆

☆ गणना ☆

 

अनीता बहुत परेशान थी.  250 बच्चों की गणना करना, फिर उन्हें जातिवार बांटना, लड़का- लड़की में छांटना – यह वह अकेली कर नहीं पा रही थी . आखिर थक हर कर अपने एक शिक्षक साथी से कहा , “आप मेरी गणना करवा दीजिए.”

साथी मुंहफट था “मैं आप  का काम करवा देता हूँ, बदले मुझे क्या मिलेगा ?”

“जो आप चाहे,” कहने को अनीता कह गई, मगर बाद में उस ने बहुत सोचा और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि घर से दूर रह कर यह गठबंधन करने में ही उसे ज्यादा फायदा है. अन्यथा वह यहाँ अकेली नौकरी नहीं कर पाएगी. इसलिए चुपचाप साथी के साथ गणना करने चल दी.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (17) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( भक्ति योग का विषय )

 

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।

रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ।।17।।

 

अहोरात्र विद बताते,ब्रम्ह देव का लेख

युग सहस्त्र की रात्रि औ” उतने का ही दिन एक।।17।।

 

भावार्थ :  ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला जो पुरुष तत्व से जानते हैं, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले हैं।।17।।

 

Those who know the day of Brahma, which is of a duration of a thousand Yugas (ages), and the night, which is also of a thousand Yugas’ duration, they know day and night.।।17।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in`

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 27 – मी ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी एक कविता  “मी.  सुश्री प्रभा जी  ने  ‘मी ‘ अर्थात ‘ मैं ‘  शीर्षक से  अपने बारे में जो बेबाक विचार लिखे, हैं वे अकल्पनीय है। वास्तव में स्वयं के बारे में  लिखना अथवा आत्मावलोकन कर लिपिबद्ध करना अत्यंत कठिन है। किन्तु, उन्होंने इतने कठिन तथ्य को अत्यंत सहज तरीके से कलमबद्ध कर दिया है कि कोई भी बिना उनसे मिले या बिना उनके बारे में जाने भी उनके व्यक्तित्व को  जान सकता है।  स्वाभिमान एवं सम्मानपूर्वक मौलिक व्यक्तित्व एवं मौलिक रचनाओं की सृष्टा, एक सामान्य इंसान की तरह, बिना किसी बंधन में बंधी  एकदम सरल मुक्तछंद कविता की तरह। मैं यह लिखना नहीं भूलता कि  सुश्री प्रभा जी की कवितायें इतनी हृदयस्पर्शी होती हैं कि- कलम उनकी सम्माननीय रचनाओं पर या तो लिखे बिना बढ़ नहीं पाती अथवा निःशब्द हो जाती हैं। सुश्री प्रभा जी की कलम को पुनः नमन।

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 27 ☆

☆ मी ☆ 

 

मी नाही देवी अथवा

समई देवघरातली!

मला म्हणू ही नका

कुणी तसले काही बाही !

 

कुणा प्रख्यात कवयित्री सारखी

असेलही माझी केशरचना,

किंवा धारण केले असेल मी

एखाद्या ख्यातनाम कवयित्री चे नाव

पण हे केवळ योगायोगानेच !

मला नाही बनायचे

कुणाची प्रतिमा किंवा प्रतिकृती,

मी माझीच, माझ्याच सारखी!

 

एखाद्या हिंदी गाण्यात

असेलही माझी झलक,

किंवा इंग्रजी कवितेतली

असेन मी “लेझी मेरी” !

 

माझ्या पसारेदार घरात

राहातही असेन मी

बेशिस्तपणे,

किंवा माझ्या मर्जीप्रमाणे

मी करतही असेन,

झाडू पोछा, धुणीभांडी,

किंवा पडू ही देत असेन

अस्ताव्यस्त  !

कधी करतही असेन,

नेटकेपणाने पूजाअर्चा,

रेखितही असेन

दारात रांगोळी!

 

माझ्या संपूर्ण जगण्यावर

असते मोहर

माझ्याच नावाची !

मी नाही करत कधी कुणाची नक्कल

किंवा देत ही नाही

कधी कुणाच्या चुकांचे दाखले,

कारण

‘चुकणे हे मानवी आहे’

हे अंतिम सत्य मला मान्य!

म्हणूनच कुणी केली कुटाळी,

दिल्या शिव्या चार,

मी करतही नाही

त्याचा फार विचार!

 

कुणी म्हणावे मला

बेजबाबदार, बेशिस्त,

माझी नाही कुणावर भिस्त!

मी माणूसपण  जपणारी बाई

मी मानवजातीची,

मनुष्य वंशाची!

मला म्हणू नका देवी अथवा

समई देवघरातली!

मी नाही कुणाची यशोमय गाथा

मी एक मनस्वी,

मुक्तछंदातली कविता!

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – संभावनाएं ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  –  संभावनाएं

बारिश मूसलाधार है। हो सकता है कि इलाके की बिजली गुल हो जाए। हो सकता है कि सुबह तक हर रास्ते पर पानी लबालब भर जाए। हो सकता है कि कल की परीक्षा रद्द हो जाए।

अगली सुबह आकाश निरभ्र था और वातावरण सुहाना। प्रश्नपत्र देखने के बाद आशंकाओं पर काम करने वालों की निब सूख चली थी पर संभावनाओं को जीने वालों की कलम बारफ़्तार दौड़ रही थी।

आज का दिन संभावनाओं से भरा हो।

 

संजय भारद्वाज

writersanjay@gmail.com

प्रात: 8:18, 7.12.2019

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 25 – किससे कहें, सुनें अब मन की—- ☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  एक  विचारोत्तेजक कविता   “किससे कहें, सुनें अब मन की—–। )

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 24 ☆

 

☆ किससे कहें, सुनें अब मन की—– ☆  

 

किससे कहें, सुनें

अब मन की।

 

नित नूतन आडंबर लादे

घूम रहे,  राजा के प्यादे

गुटर-गुटर गूँ  करे कबूतर

गिद्ध, अभय के करते वादे,

बात शहर में

जंगल, वन की।

किससे कहें……..

 

सपनों में, रेशम सी बातें

स्वर्ण-कटारी, करती घातें

रोटी  है  बेचैन, – कराहे

वे खा-खा कर नहीं अघाते,

बातें भूले

अपनेपन की।

किससे कहें……….

 

अब गुलाब में, केवल कांटे

फूल, परस्पर  खुद  में बांटे

गेंदा, जूही, मोगरा- चंपा

इनको है, मौसम के चांटे,

रौनक नहीं, रही

उपवन की ।

किससे कहें……….

 

है अपनों के बीच दीवारें

सद्भावों के, नकली नारे

कानों में, मिश्री रस घोले

मिले स्वाद,किन्तु बस खारे

कब्रों से हुँकार

गगन की ।

किससे कहें ………

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 989326601

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हिन्दी साहित्य – ☆ ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 3 ☆ गीत ☆ पर्यावरण को चोट ☆ – श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है पर्यावरण संरक्षण पर एक गीत  “पर्यावरण को चोट”।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य  # 3 ☆

☆ कविता/ गीत  – पर्यावरण को चोट ☆

ना काटो,ना काटो, ना काटो सारे
धरती की पीर सुनो ओ काटन हारे.
– एक –
पेड़ पौधे  दवाइयों के तुमने काटे,
पीपल, अश्वगंधा  और बरगद सारे.
नीम ,चंदन,तुलसी के पेड़ काट डारे.
धरती की पीर सुनो,ओ काटन हारे.
– दो –
सुन्दर फूलों की बगिया उजारी
चम्पा, गुलाब, गेंदा, और चमेली
जारुल ,पलास और कमल भी उजारे.
धरती की पीर सुनो,ओ काटन हारे.
– तीन –
बांस, बबूल, शीशम, इमली निबुआ,
अमरुद, आम, केला, तरबूज तेन्दुआ,
 पानी न दे पाये, सब मिट गये सारे
धरती की पीर सुनो ओ काटन हारे.
– चार –
काट सारे पेड़ दिये, हवा पानी रोक लिये
कहाँ रूके बदरा कहाँ पानी बरसे
उड़ उड़ निकर के विखर गये सारे
धरती की पीर सुनो ओ काटन हारे.
– पाँच –
धरती की बोली समझ लो सारे
पेड़ और पौधे फिर से लगाओ रे
छोटे बड़े सभी लग जाओ सारे.
धरती की पीर सुनो ओ काटन हारे.

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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