हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०१ ☆ न्यूयॉर्क से ~ कथा कहानी – “स्नो मैन” – ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०१ ☆

?  न्यूयॉर्क से ~ कथा कहानी – स्नो मैन ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(वैश्विक परिदृश्य पर मेरी नई कहानी)

सुबह की धूप फार्म हाउस की लाल ईंटों पर पड़ रही थी , एक कतरा धूप बिना इजाजत , खिड़की पार कर मनोज जी की तख़त तक उन्हें जगाने चली आई थी। उनके चेहरे पर धूप पड़ते ही उनकी आँख खुली। नहीं, अलार्म ने नहीं जगाया। उन्हें आदत थी, सूरज के साथ उठने की, पिछले चालीस साल से।  फर्क इतना था कि पहले उठते ही बच्चों की हँसी सुनाई देती थी, अब खिड़की के बाहर चिड़ियों की आवाज़ आती है।

वह उठे, चाय बनाई। खुद के लिए। केतली में दूध उबलते देखा तो याद आया, एमा को दूध की झाग बहुत पसंद थी। “दादू, देखो, क्लाउड!” कहकर चम्मच से झाग उठाकर हवा में उड़ाती थी। रॉनी कहता था, “एमा, स्टॉप इट!” लेकिन खुद भी हँसता था। वह एमा से तीन वर्ष बड़ा था ।

चाय लेकर वह बरामदे में आए। लॉन में ओस की बूँदें चमक रही थीं। सामने अमलतास के पेड़ पर गौरैया चहचहा रही थी। बगल में कुएँ से पानी खींचने की मोटर चालू हुई। रामस्वरूप ने आज भी समय पर बगीचे में सिंचाई के लिए पानी लगा दिया, केवल पंप का बटन ही तो स्विच आन करना था ।

“नमस्ते, साहब!” रामस्वरूप ने दूर से हाथ जोड़े। बीस साल से वह मनोज के यहाँ माली है।

“रामस्वरूप, गुलाबों की कटाई-छँटाई कर दो आज। इस सर्दी में फूल नहीं आए ठीक से।”

“जी साहब। कल ही सोच रहा था।”

रामस्वरूप कटर  लेकर काम में लग गया। मनोज की नज़र लॉन के बीचो बीच खाली जगह पर ठहर गई। वहाँ कुछ नहीं था। सिर्फ़ सूखी घास। लेकिन मनोज को लगा, वहाँ एक स्नोमैन खड़ा था।

तीन साल पहले। अमेरिका। विस्कॉन्सिन का वह भव्य फार्म हाउस, उनके बेटे राजेश का ।

दिसंबर की सुबह थी। खिड़की के बाहर बर्फ़ गिर रही थी। रॉनी और एमा ने शोर मचा रखा था। “दादू! दादू! इट्स स्नोइंग!” एमा ने उनकी गर्दन में हाथ डाल दिया। रॉनी पाजामा पहने ही बाहर भागने को तैयार। बहू रोजी चिल्लाई, “रॉनी, जैकेट और बूट पहनो पहले!”

नाश्ते के बाद सब बाहर निकले। बर्फ़ सचमुच जादू थी। एमा ने जीभ बाहर निकालकर बर्फ़ के फाहे पकड़ने की कोशिश की। रॉनी  ने स्नोबॉल बनाकर निशाना लगाया – पापा पर। बहू रोजी ने कैमरा निकाल लिया।

फैमिली ग्रुप विथ दादा जी, उसने डेट, प्लेस , टाइमर ऑन करके फोटो क्लिक की थी ।

“चलो, स्नोमैन बनाते हैं!” मनोज ने ऐलान किया।

अगले एक घंटे में दुनिया का सबसे सुंदर स्नोमैन बना। हर बच्चे केवल अपने बनाए स्नो मैन को ही सदा से वर्ल्ड बेस्ट कहते आए हैं।

रॉनी ने बड़ा गोला बनाया, एमा ने बीच वाला, मनोज ने सबसे ऊपर वाला। रोजी ने रसोई से गाजर ला दी। राजेश ने कोयले के दो टुकड़े ढूँढ़े, आँखें बनाने के लिए । एमा ने अपनी क्रिसमस वाली लाल टोपी , स्नोमैन को पहना दी थी। रॉनी ने कहा, “इसे टाई भी चाहिए!”

मनोज ने अपनी पुरानी धारीदार टाई निकाली। वही टाई जो उन्होंने राजेश की ग्रेजुएशन सेरेमनी में पहनी थी। टाई स्नोमैन के गले में लपेट दी। एमा ने तालियाँ बजाईं। “डैडी, लुक! अवर स्नोमैन इज़ सो हैंडसम!”

स्नोमैन का नाम रखा गया – फ्रॉस्टी।

मनोज जी ने बाजू में ही एक मंदिर नुमा आकृति बर्फ से बना दी , और इस तरह मानसरोवर के शिव अमेरिका में प्रतिष्ठित हो गए थे, मनोज के मन ही मन में।

हफ्ते भर से ज्यादा ही फ्रॉस्टी खड़ा रहा। रॉनी हर दिन कई चक्कर उसके पास जाता, “हाउ आर यू, फ्रॉस्टी?” एमा उसे कुकीज़ खिलाने की कोशिश करती। सब उसके चारों ओर खड़े होकर वीडियो और तस्वीरें लेते।

मनोज बताते, “हम भी जब नैनीताल में थे,  तुम्हारे पापा छोटे से थे तब वहां स्नो फाल होता था , पर इस स्नो स्टॉर्म की तरह नहीं।”

तीसरे दिन धूप निकली।

एक तरफ सफेद बर्फ की ठंडी चादर और जस्ट कंट्रास्ट ब्राइट सनी डे , मनोज के लिए भी यह अनुभव नया सा था ।

उन्हें घरों में एंट्री पर डबल डोर , और चौबीस घंटे हीटिंग का महत्व समझ आ रहा था।

रात को आसमान से बर्फ झरती पर परावर्तन के चलते रोशनी ऐसी तेज रहती की जैसे चांद तारे खुद जमीन पर उतर रहे हों।

आसमान बिना पक्षियों के सूना सूना था । पेड़ो की डालियों पर पत्ते नहीं सफेद बर्फ चिपकी  हुई थी।

कभी कुछ भी स्थाई नहीं रहता । प्रकृति इसी लिए चेतन कही जाती है । मौसम ने करवट ली,

पहले फ्रॉस्टी का सिर थोड़ा झुका, फिर टोपी फिसली, फिर नाक ढीली पड़ी। एमा रो पड़ी। “फ्रॉस्टी इज डाइंग!”

मनोज ने उसे गोद में उठाया। “नहीं बेटा, वह नहीं मर रहा। उसने अपने जिम्मे की सारी खुशियां हमें बांट दी है, अब वह लौट रहा है, बादलों में। अगली बर्फ़ में वह फिर आएगा, इसी तरह और खूब सी खुशियां फैलाने।”

एमा ने आँखें पोंछीं। “प्रॉमिस?”

“गाड प्रॉमिस।” मनोज बोले थे।

अगली सुबह स्नो मैन की जगह सिर्फ़ गीली ज़मीन थी, एक लाल टोपी, एक धारीदार टाई , गाजर और कोयले के दो टुकड़े बचे रह गए थे।

मनोज किसी गहरी सोच में खोए हुए थे ।

“साहब, चाय ठंडी हो रही है।”, मनोज चौंके। रामस्वरूप सामने खड़ा था। चाय की प्याली उसके हाथ में थी, चाय ठंडी हो रही थी।

“हाँ, हाँ। रख दो इधर।”

रामस्वरूप ने झाड़ियों की ओर देखा।

“साहब, अमेरिका में भी ऐसे ही बगीचे थे क्या?”

मनोज मुस्कुराए। “वहाँ ऐसे बगीचे तो नहीं थे। वहाँ खेती के मैदान थे। जो बर्फ का बड़ा सा  फुसफुसा टर्फ बन गया था । पैर पड़ते ही सफेदी धंस जाती थी ।

उस पर था खुशियां बांटता एक स्नोमैन खड़ा कर दिया था, बच्चों ने।”

“स्नोमैन?”

“हाँ। बर्फ़ का बना आदमी। इसे बच्चे बनाते हैं। गाजर की नाक, कोयले की आँखें।”

तुम इसे ऐसे समझ जाओगे, जैसे यहां संगम में गीली बारीक रेत से बच्चे घरौंदे और पुतले बनाते हैं, वैसे ही बड़े सफेद बर्फ के पुतले , बनाने वाले की मर्जी के मुताबिक ।

रामस्वरूप को हँसी आ गई। “बर्फ़ का आदमी! और वह पिघलता नहीं?”

उसने कौतूहल व्यक्त किया।

“पिघलता है। पर ठंडे मौसम में हफ्ते दस दिन बना रहता है। धूप आते ही , धीरे धीरे पिघल जाता है। बच्चे रोते हैं। फिर अगली बर्फ़बारी का इंतजार करते हैं।

फिर दूसरा बना लेते हैं।”

रामस्वरूप ने सिर हिलाया। वह काम पर लौट गया। मनोज फिर उस खाली जगह को देखने लगे।

गंगा अंदर से आई। बर्तन साफ़ कर चुकी थी। “साहब, खाना क्या बना दूं आज?”

“जो बनाना है, बना दो गंगा। मुझे क्या पता।”

गंगा चली गई। पिछले छह महीने से वही हाल था। अकेले खाने का स्वाद ही नहीं रहा। पत्नी न हो तो घर घर नहीं लगता। बच्चे न हों तो घर सुनसान हो जाता है। पर सबका जाना ही नियति है , स्नोमैन के पिघलने के समान ।

अब तो मनोज जी अकेले ही रह गए थे पत्नी श्यामली को गए भी चार साल हो गए हैं।

शाम को फोन की घंटी बजी। वीडियो कॉल था।

“हाय, पापा! कैसे हैं?”

“ठीक हूँ।”

“सब ठीक तो है? दवा समय पर ले रहे हैं न, खाना ठीक से खा रहे हैं?” राजेश ने चिंता जताई ।

“हाँ, हाँ। गंगा बना देती है।” मनोज बोले।

बीच में एमा कूद पड़ी। “दादू! दादू! आज स्कूल क्राफ्ट में मैंने स्नोमैन बनाया , पेपर का!”

मनोज के चेहरे पर रौनक आ गई। “वाह! दिखाओ तो!”

एमा ने कागज़ का स्नोमैन दिखाया। गोल-गोल, लाल टोपी, ऑरेंज कलर की नाक। मनोज की आँखें भर आईं।

“बहुत सुंदर बनाया, बेटा। बिल्कुल अपने फ्रॉस्टी जैसा।”

“दादू, आप कब आ रहे हैं यहाँ? फिर स्नोमैन बनाएँगे साथ में!”

मनोज चुप रहे। कैसे बताएँ कि अब वहाँ नहीं जा सकते। वहाँ की ज़मीन उन्हें अच्छी नहीं लगती। वहाँ वह खुद को बर्फ़ के उस स्नोमैन की तरह महसूस करते हैं जो धूप में पिघल रहा हो। यहाँ कम से कम धूप तो अपनी है। मिट्टी तो अपनी है।

“जल्दी आऊँगा, बेटा।”

फोन रखते ही सन्नाटा और गहरा गया।

अमलतास पर चिड़ियाँ सो चुकी थीं। रामस्वरूप जा चुका था। गंगा भी चली गई। फार्म हाउस में सिर्फ़ मनोज थे और उनकी परछाइयाँ।

रात के खाने में उन्होंने रोटी नहीं खाई। बस दूध पिया और बरामदे में आ बैठे। ठंड बढ़ गई थी। सर्दियों की रातों में यहाँ शहर से बाहर फार्म हाउस में मौसम अमेरिका जैसा ही ठंडा हो जाता है। बस बर्फ़ नहीं गिरती। बस कमरों में वैसी ऊष्मा बनाए रखने वाले हीटर नहीं होते।

उन्होंने ऊनी मफलर लपेटा। वही जो रोजी ने पिछले साल भेजा था। उनकी नज़र फिर लॉन के बीचोबीच गई। वहाँ अब भी कुछ नहीं था। लेकिन  उन्हें वहाँ एक पहचानी सी धुँधली आकृति दिख रही थी ।

स्नोमैन!

बर्फ़ का नहीं, यादों का। उसके गले में धारीदार टाई थी, सिर पर लाल टोपी, गाजर की नाक, कोयले की आँखें। वह मुस्कुरा रहा था। मनोज को लगा, वह स्नोमैन उन्हें देख रहा है।

दो अकेले प्राणी। एक ठंडी रात में। एक यहाँ, एक वहाँ। दोनों पिघलने के इंतज़ार में।

मनोज ने धीरे से कहा, “हैलो, फ्रॉस्टी।”

हवा में सनसनाहट हुई। जैसे कोई जवाब दे रहा हो।

“तुम भी यहाँ? मैंने सोचा तुम अमेरिका में ही रह गए।”

एक पत्ता हवा में उड़कर लॉन के बीचोबीच गिरा। मनोज ने देखा, वह पत्ता स्नोमैन के पैरों के पास गिरा था। उन्हें यकीन हो गया, वह वहाँ है। सच में है।

“पता है, फ्रॉस्टी, मैं भी तुम्हारी तरह हूँ। बच्चों ने बनाया, बच्चों ने सजाया, बच्चों ने प्यार किया। फिर समय की धूप आई और मैं पिघलने लगा हूं।  फर्क इतना है कि तुम पूरी तरह पिघल गए, मैं आधा-अधूरा रह गया हूँ।”

आँखों से आँसू ढुलक पड़े। उन्होंने पोंछे नहीं।

“लेकिन तुम्हें पता है, फ्रॉस्टी, मुझे कोई गिला नहीं। बच्चों ने मुझसे जितनी खुशियाँ लीं, उतनी ही तो मैंने भी लीं। रॉनी की हँसी, एमा की बातें,राजेश की चिंता, रोजी का ध्यान। श्यामली के बाद यही सब तो मेरे पास है। यादों में।

तुम्हारी तरह, मैं भी हर बर्फ़ में लौटूँगा या नहीं, मुझे पता नहीं ।

रात और गहरी हुई। ठंड और बढ़ी। मनोज की पलकें झुकने लगीं। वह कुर्सी पर ही सिमट गए। मफलर लपेटे। स्नोमैन अब भी वहाँ खड़ा था। दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। दो स्नोमैन। एक बर्फ की यादों का, एक मनोज खुद। दोनों पिघल रहे थे।

बाहर अमलतास पर एक रंगीन चिड़िया बैठी थी। लाल टोपी जैसी।

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – क्षितिज ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – क्षितिज ? ?

छोटेे-छोटे कैनवास हैं

मेरी कविताओं के

आलोचक कहते हैं,

और वह बावरी

सोचती है

मैं ढालता हूँ

उसे ही अपनी

कविताओं में,

काश!

उसे लिख पाता

तो मेरी कविताओं का

कैनवास

क्षितिज हो जाता!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७९ ☆ पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७९ ☆ पलाश : फागुन की अग्नि और प्रकृति का आध्यात्मिक स्पर्श

भारतीय ऋतुचक्र में वसंत केवल मौसम का परिवर्तन नहीं, बल्कि प्रकृति के अंतर्मन में जागते उत्सव का समय है। इसी ऋतु में वन-वन दहक उठता है पलाश (Butea monosperma) के केसरिया फूलों से। पत्तों से लगभग रिक्त शाखाओं पर जब ये अग्नि-सी आभा लिए पुष्प खिलते हैं, तब दूर से पूरा वन मानो दीपशिखाओं से आलोकित दिखाई देता है। इसीलिए पलाश को ‘वनाग्नि’ या ‘जंगल की ज्वाला’ भी कहा गया है।

भारतीय परंपरा में पलाश केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि पवित्रता और ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों में इसकी लकड़ी और पत्तों का उपयोग होता रहा है। कहीं इसे यज्ञ की पवित्र अग्नि का प्रतीक माना गया, तो कहीं यह आस्था और तप की आभा से जुड़ गया। लोकविश्वास यह भी कहता है कि इसके केसरिया फूलों में तप, त्याग और उत्सव — तीनों का संगम दिखाई देता है।

फागुन के दिनों में जब कई वृक्षों से पत्ते झर जाते हैं और वन का स्वर कुछ विरल-सा लगने लगता है, तभी पलाश अपनी दहकती छटा से उस सूनेपन को भर देता है। उसकी शाखाएँ जैसे घोषणा करती हैं कि जीवन की अग्नि कभी बुझती नहीं, वह समय-समय पर नए रंगों में प्रकट होती रहती है। यही अनुभूति कवि के मन में दोहों के रूप में प्रस्फुटित होती है—

*

वन में खिले पलाश जब, धधके जैसे धाम।

प्रकृति रचाए अग्नि सा, रंगों वाला ग्राम॥

*

पात झरे सब वृक्ष के, सूना लगे समाज।

खिलते हुए पलाश से, वन में बना सुराज॥

*

टेसू की ये आग सी, डाली-डाली झूम।

धरती में जैसे मचे, फागुन वाली धूम॥

*

रंग केसरी फूल का, जिससे जगे उजास।

सूखे मन में भी हुआ, आशा का विश्वास॥

*

वन में टेसू बोलता, सुनते सारे लोग।

धरा सजाए दिव्यता, भक्ति भाव संजोग॥

*

दरअसल पलाश का खिलना केवल प्रकृति का दृश्य नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म आध्यात्मिक संकेत भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि जैसे सूखी शाखाओं पर भी अग्नि-सी आभा वाले फूल खिल उठते हैं, वैसे ही जीवन के निर्जन क्षणों में भी आशा और प्रकाश का उदय संभव है। शायद यही कारण है कि फागुन की हवा में झूमता पलाश हमें प्रकृति के साथ-साथ ईश्वर की सृजनात्मक लीला का भी आभास कराता है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ “मेरे अपने” – स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ “मेरे अपने” – स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

☆ स्व. डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल की  कृति – “मेरे अपने” – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार डा. प्रार्थना राजेंद्र अर्गल का विगत दिनों स्वर्गवास हो गया।  वे एक चर्चित रचनाकार थीं । गद्य और पद्य दोनों ही में उन्होंने प्रभावी और पठनीय सृजन किया। पूर्व में लिखी गई उनकी कृति मेरे अपने पर पुस्तक समीक्षा सादर स्मरण विनम्र श्रद्धांजली सहित अवलोकनार्थ प्रस्तुत है।)

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साहित्यिक क्षेत्र में पिछले दिनों  सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती प्रार्थना अर्गल जी  की साहित्यिक रचनाओं की एक ऐसी कृति सामने आई है जिसमें गद्य और पद्य की उनकी उत्कृष्ट और सराहनीय रचनाओं का समावेश है। ऐसी कृतियों की एक विशेषता यह होती है कि गद्य और पद्य के प्रशंसक पाठकों को अपनी पसंद की  रचनाएँ पढने की सुविधा रहती है।

सुपरिचित साहित्यकार डा प्रार्थना राजेन्द्र अर्गल लखनवी की यह साहित्यिक कृति 134 रचनाओं का एक खूबसूरत गुलदस्ता है जिसमें पठनीय कविताएँ, कहानियाँ, लघु कथायें, संस्मरण और चिंतन आलेख शामिल हैं।

इस कृति की शुरुआत एक कविता से की गई है जो कि मेरे बाबूजी के शीर्षक से लिखी गई पिता को विनम्र  श्रद्धांजलि है। अन्य रचनाएँ विभिन्न विधाओं पर आधारित हैं। इन कविताओं में मां नर्मदे  को लेकर रक्षाबंधन, बसंती मौसम, अंजनि पुत्र, बगीचा  , तिरंगा, प्रकृति, मोबाईल, नये वर्ष का स्वागत, प्यार का इज़हार, चांद, नारी, आशीर्वाद  सुख दुःख, लेखनी, राजा रानी, मधुर स्मृतियाँ, माँ जैसे शीर्षक से अनेक प्रभावी और भावनात्मक कविताएँ सम्मिलित हैं।

इस महत्वपूर्ण पुस्तक में सामाजिक स्थितियों पर केन्द्रित अनेक लघु कथायें भी पाठकों को पढ़ने को मिल सकती हैं। अतिथि, क्या वो दिन थे, आशीर्वाद, जहर, पन्ना, दानवीर जैसी लघु कथायें भी पाठक वर्ग उत्सुकता और रोचकता के साथ पढ़ेगा। कृति में बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम, शांति धाम, व्यवस्था जैसे शीर्षक के साथ अनेक चिंतन परक  सारगर्भित लेख हैं जिसे पढ़ कर पाठक जरूर कुछ नया सोचने को बाध्य होगा।

कृति में नल जैसे विषय पर संस्मरण भी पठनीय है। अतिथि संतुष्ट हो जायेगा जैसे विषय पर लोगों को पढ़ने के लिए रोचक कहानी भी शामिल है।

आदरणीया प्रार्थना जी ने इस कृति में समाज और साहित्य के प्रेरक व्यक्तित्व को भी सस्नेह सम्मिलित किया है। गीत पराग की प्रधान संपादक डा गीता गीत पर केन्द्रित उनकी कविता भी सराहनीय है।

कृति के प्रारंभ में आदरणीया श्रीमती साधना उपाध्याय, श्रीमती अर्चना मलैया, श्रीमती निर्मला तिवारी, श्रीमती अलका मधुसूदन पटैल और श्री विजय नेमा अनुज जैसे उत्कृष्ट साहित्य साधकों ने अपनी मंगलकामनायें व्यक्त करते हुए प्रार्थना जी की कृति को साहित्यिक क्षेत्र की एक प्रभावी, पठनीय और प्रेरणा दायी  कृति निरूपित किया है।

इस कृति के प्रारंभ में ही आदरणीया डा प्रार्थना राजेन्द्र अर्गल लखनवी ने कृति के शीर्षक मेरेे अपने के औचित्य और उसके सार्थकता पर  प्रकाश डालते हुए उनके सभी मेरे अपनों के प्रति आभार और आदर व्यक्त किया है जिन्होंने उन्हें इस कृति के प्रकाशन के लिए प्रोत्साहित और प्ररित किया है।

मुझे भी विश्वास है कि साहित्यिक क्षेत्र में भी यह कृति पठनीय और लोकप्रिय सिध्द होगी।

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© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८३ – व्यंग्य – जहाँ नेहियाँ बोलता है और गोपाल दुबे सुनते हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाक्टरेट ऑन डिस्काउंट)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८३ – व्यंग्य  – जहाँ नेहियाँ बोलता है और गोपाल दुबे सुनते हैं ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

गाँव नेहियाँ का भूगोल भले सरकारी कागज़ों में छोटा दर्ज हो, पर उसका सामाजिक ब्रह्मांड इतना फैला हुआ है कि हर आदमी खुद को उसका ध्रुवतारा समझता है। इसी ब्रह्मांड के केंद्र में, ठीक वहाँ जहाँ सड़क वर्षों से विकास की कहानी सुनाती हुई सीधी और चमकदार खड़ी है, मेरे जीजा गोपाल दुबे की पान की दुकान मौजूद है—मानो लोकतंत्र का असली दफ्तर यहीं चलता हो। सुबह होते ही दुकान पर ऐसी भीड़ लगती है जैसे पंचायत, संसद और गली-मोहल्ले की अदालत एक साथ बैठ गई हो। कोई पान लेने आता है, कोई ताज़ा खबर सुनाने, और कुछ लोग तो सिर्फ अपनी राय थूकने आते हैं। जीजा हर ग्राहक का स्वागत ऐसी स्थिर मुस्कान से करते हैं जैसे उन्हें जन्म से ही सार्वजनिक सहनशीलता का ठेका मिला हो। लोग खेती से लेकर राजनीति और पड़ोसी की बकरी तक पर फैसला सुना देते हैं, और जीजा कत्था लगाते हुए सिर हिलाते रहते हैं। नेहियाँ में आम धारणा है कि अगर धैर्य को बोतल में बंद किया जाए, तो उस पर जीजा की दुकान का लेबल लगेगा।

दिन के उजाले में यह दुकान शिष्टाचार की प्रदर्शनी लगती है। लोग आते हैं, पान लेते हैं, दाम चुकाते हैं और जाते समय “राम-राम” कहकर अपनी सभ्यता की रसीद जमा कर देते हैं। लेकिन सूरज ढलते ही नेहियाँ का सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो जाता है। कुछ ग्राहक ऐसे प्रवेश करते हैं जिनकी चाल से लगता है कि धरती से उनका समझौता अस्थायी है। वे आते ही भाषा को इस तरह मरोड़ते हैं कि शब्द भी किनारे खड़े होकर सोचें—हमने ऐसा क्या अपराध किया। जीजा इस भाषाई उथल-पुथल के बीच वैसे ही शांत रहते हैं जैसे ध्यानस्थ साधु; फर्क बस इतना कि यहाँ धूप-दीप की जगह कत्थे और तंबाकू की खुशबू है। सामने खड़ा व्यक्ति आवाज़ ऊँची करके अपनी वीरता साबित कर रहा होता है और जीजा उसी नाप-तौल से पान लगाते हैं, मानो कह रहे हों—बोल लो भाई, आखिर में सब चबाया ही जाएगा।

रात के ये ग्राहक संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन करते हैं। हर वाक्य ऐसा फेंकते हैं जैसे अखाड़े में दांव चला रहे हों। जीजा चाहें तो दो तमाचे रखकर भाषाई सुधार अभियान चला दें, पर कानून का खयाल उनके कंधे पर बैठे समझदार सलाहकार की तरह हमेशा मौजूद रहता है। वे मन ही मन हिसाब लगाते हैं—गुस्सा अभी, झंझट बाद में क्यों मोल लें। इस गणित ने उन्हें ऐसा संत बना दिया है कि तपस्या करने वाले भी उनसे प्रशिक्षण लेना चाहें। ग्राहक गरजते हैं, मेज थपथपाते हैं, और जीजा बस इतना पूछते हैं—“मीठा रखूँ?” यह सवाल ऐसा जादू करता है कि आधी बहादुरी कत्थे में घुल जाती है। नेहियाँ के लोग कहते हैं कि अगर संयम की दौड़ हो, तो जीजा बिना दौड़े जीत जाएँ।

गाँव वालों ने इस दुकान को अनौपचारिक मनोरंजन केंद्र घोषित कर रखा है। लोग थोड़ा दूर खड़े होकर तमाशा देखते हैं—आज कौन क्या बोलेगा, जीजा कितना सहेंगे। बुजुर्ग इसे धैर्य प्रशिक्षण शिविर कहते हैं और दावा करते हैं कि जो आदमी यहाँ एक हफ्ता टिक जाए, उसे जीवन में कोई नहीं हिला सकता। रात के ग्राहक जब आवाज़ ऊँची करते हैं, तो दर्शक ऐसे आनंद लेते हैं जैसे मुफ्त का नाटक चल रहा हो। कोई मुस्कुराता है, कोई कानाफूसी करता है, पर जीजा अपनी लय में पान बनाते रहते हैं। उनका हाथ मशीन की तरह चलता है, चेहरा शांत रहता है, और वातावरण में हास्य की महीन परत फैल जाती है—ऐसी कि तनाव भी हँसते-हँसते हल्का हो जाए।

जीजा की दुकान नेहियाँ का असली लोकतंत्र है जहाँ कत्था, चूना और सुपारी सबको बराबरी का दर्जा देते हैं। दिन में जो लोग एक-दूसरे से दूरी बनाकर चलते हैं, रात को एक ही कतार में खड़े पान का इंतज़ार करते मिलते हैं। नशे की हालत में कुछ ग्राहक खुद को भाषण विशेषज्ञ समझ लेते हैं और जीजा से ऐसे उलझते हैं जैसे किसी बहस का अंतिम दौर चल रहा हो। जीजा हर तर्क का जवाब पान से देते हैं। उनका सिद्धांत सरल है—बहस जितनी लंबी होगी, पान उतना मीठा होना चाहिए। धीरे-धीरे ग्राहक बोलते-बोलते चबाने लगते हैं और उनका जोश सुपारी के साथ ठंडा पड़ जाता है।

नेहियाँ की सड़कें अपने आप में विकास का प्रमाणपत्र हैं—सीधी, चमकदार और इतनी समझदार कि बाहर से आने वाला आदमी प्रभावित हुए बिना न रहे। पर यही सड़क शाम ढलते ही गाँव के असली चरित्र की परेड देखने लगती है। गंजेड़ी ऐसे टहलते हैं मानो हवा की गुणवत्ता की निजी जाँच कर रहे हों। नशेड़ी अपने कदमों से नई ज्यामिति रचते हैं—सीधी सड़क पर तिरछा चलने की कला का जीवंत प्रदर्शन। पियक्कड़ हर खंभे को पुराना दोस्त समझकर उससे संवाद करते मिल जाते हैं। और गालीबाज भाषा को ऐसे उछालते हैं जैसे शब्द कोई खिलौना हों। सड़क चुपचाप यह सब सहती रहती है—ऊपर से विकास, नीचे से मानवीय विविधता। यह दृश्य ऐसा है जहाँ चमकती डामर और लड़खड़ाते कदम मिलकर नेहियाँ का सबसे सच्चा व्यंग्य रचते हैं।

रात गहराती है तो यही सड़क सामाजिक रंगमंच बन जाती है। दिन में जिस पर बच्चे साइकिल चलाते हैं, रात में वही मंच बनकर मानवीय आदतों का खुला प्रदर्शन करती है। गंजेड़ी दार्शनिक मुद्रा में खड़े होकर जीवन के ऐसे निष्कर्ष सुनाते हैं जिन्हें सुनकर दीवारें भी सोच में पड़ जाएँ। नशेड़ी संतुलन की अपनी निजी परिभाषा गढ़ते हुए चलते हैं, और पियक्कड़ ऊँची आवाज़ में दुनिया सुधारने का संकल्प लेते हैं। गालीबाज भाषा की ऐसी कसरत करते हैं कि शब्द खुद विश्राम माँग लें। मज़े की बात यह है कि सड़क हर रात यह सब देखकर सुबह फिर वैसी ही मासूम दिखती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। नेहियाँ के लोग हँसकर कहते हैं—हमारी सड़क तो शरीफ है, बस उस पर चलने वाले चरित्रवान होने का अभ्यास कर रहे हैं।

नेहियाँ के बच्चे यह सब देखकर बड़े हो रहे हैं। वे सीख रहे हैं कि असली ताकत हाथ उठाने में नहीं, हाथ रोक लेने में है, और हँसकर टाल देने में भी एक किस्म की जीत छिपी होती है। जीजा का धैर्य अब लोककथा बन चुका है। लोग कहते हैं कि अगर सहनशीलता का मंदिर बने, तो पुजारी वही होंगे। रात की आवाज़ें चाहे जितनी ऊँची हों, जीजा की शांति पुरानी घड़ी की टिक-टिक जैसी स्थिर रहती है। ग्राहक आते हैं, अपनी भड़ास निकालते हैं, और पान के साथ उसे निगल भी जाते हैं। यह रोज़ का अभ्यास नेहियाँ को सिखा रहा है कि हास्य और संयम मिलकर सबसे बड़ी आग को भी धुआँ बना सकते हैं।

एक रात एक महाशय ऐसे जोश में आए कि शब्दों की रेलगाड़ी बिना ब्रेक दौड़ा दी। भीड़ जमा हो गई, मानो कोई ऐतिहासिक क्षण घटने वाला हो। जीजा ने शांत स्वर में कहा—“पहले पान खा लीजिए, बाकी दुनिया बाद में सुधार लीजिए।” इतना सुनना था कि आसपास खड़े लोग हँसी से दोहरे हो गए। महाशय भी पान मुँह में दबाकर शांत हो गए, जैसे कत्थे ने उनके जोश पर हल्का विराम लगा दिया हो। उस क्षण नेहियाँ ने समझ लिया कि हास्य सबसे असरदार जवाब है—बिना टकराव, बिना हंगामे। जीजा ने फिर उसी सहजता से अगला पान लगाना शुरू कर दिया, मानो जीवन अपनी पटरी पर लौट आया हो।

आज नेहियाँ में जीजा की दुकान सिर्फ पान बेचने की जगह नहीं, सामाजिक प्रयोगशाला है जहाँ रोज साबित होता है कि धैर्य, हास्य और समझदारी मिल जाएँ तो हर तूफान तमाशा बन जाता है। जीजा हर रात शब्दों की आँधी झेलते हैं और सुबह फिर उसी मुस्कान के साथ दुकान खोल देते हैं। गाँव वाले मानते हैं कि असली ताकत वही है जो हाथ नहीं उठाती, बल्कि माहौल को हल्का कर देती है। उनकी दुकान पर हँसी इतनी खुलकर बहती है कि कभी-कभी लगता है—अगर हँसी का वजन किया जाए, तो नेहियाँ की धरती थोड़ा झुककर सलाम कर दे।

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२८ ⇒ ताऊ उपनिषद् ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “ताऊ उपनिषद् ।)

?अभी अभी # ९२८ ⇒ आलेख – ताऊ उपनिषद् ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लाओत्से एक चीनी दार्शनिक हुए हैं! लाओ-सू एक सम्मान जताने वाली उपाधि है। लाओ का अर्थ आदरणीय वृद्ध और सू का अर्थ गुरु है। उनका ताओ उपनिषद् एक दार्शनिक ग्रंथ है, जिस पर ओशो पर्याप्त प्रकाश डाल चुके हैं।

हम यहां हरियाणा के वृद्ध और सम्मानजनक व्यक्तित्व ताऊ पर अपने विचार केन्द्रित करेंगे। इसका महत उद्देश्य भी यही है कि भविष्य में एक उपनिषद् ताऊ पर भी रचा जाए। ओशो नहीं तो कोई और सही। ऐसो मतो हमारो।।

वैसे ताऊ संबोधन पर हरियाणा का एकाधिकार नहीं है। हम ताऊ को अधिक सम्मान देकर उनके आगे जी लगाते हैं। पिताजी से छोटे अगर चाचाजी हुए तो पिताजी से बड़े ताऊ जी।

रिश्ता संबोधन का भूखा नहीं! कुछ लोग पिताजी को बाबू जी कहते हैं तो कुछ पापा और कुछ डैडू। दादा जी भी आजकल आधुनिक होते होते दादू हो गए हैं, और नाना नानू।

जब ताऊ की बात होगी, तो दाऊ का भी जिक्र जरूर होगा! कृष्ण के बड़े भाई थे दाऊ। मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो। फिर ताऊ तो पिताजी के बड़े भाई हुए। यह भी संयोग ही है कि ताऊ और दाऊ का संबंध भी कुरुक्षेत्र ही से है। कल दाऊ थे, आज ताऊ हैं।।

हम जात-पांत को नहीं मानते! लेकिन धरम पाजी जाट हैं, यह तो वे खुद भी मानते हैं। केवल हरियाणा में ही नहीं, राजस्थान और पंजाब में भी जाट बहुतायत से हैं। सेना में एक जाट रेजिमेंट भी है और उनकी देशभक्ति पर शंका नहीं की जा सकती। ढाई किलो का हाथ आखिर किसका है? फिल्म शहीद का वह गीत याद कीजिए! पगड़ी संभाल जट्टा, तेरा लुट गया माल।।

ताऊ बिना पगड़ी के नहीं होते! खाट, लाठी और हुक्का ही इनकी पहचान होती है।

हरियाणा में कोई ताऊ यूं ही नहीं बन जाता! पहले उसे लाल बनना पड़ता है। आपातकाल के बंसीलाल को कौन भूल सकता है। ताऊ शब्द की गरिमा को अगर किसी ने हरियाणा में निभाया है, तो वे हैं एकमात्र देवीलाल। बाद में तो एक भजनलाल भी हुए हैं, जो भजन करते करते पूरी पार्टी सहित ही दलबदल कर बैठे।

लाली तेरी लाल की

जित देखूं तित लाल

लाली देखन मैं चली

मैं भी हो गई लाल

अगर हरियाणा के इन तीनों लालों के राष्ट्रीय योगदान पर प्रकाश डाला जाए तो एक नहीं तीन उपनिषद् की रचना हो सकती है। इनमें सबसे वरिष्ठ देवीलाल जिन्हें देश सम्मान से ताऊ कहता था, ने अगर देश के उप-प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया, वहीं दूसरे लाल भजनलाल तीन बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे।।

पूत के पांव पालने में! देवीलाल के लाल ओमप्रकाश चौटाला ने पांच बार हरियाणा के मुख्यमंत्री का पद संभाला। लालू की तरह हरियाणा के, ये लाल भी आज जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं।।

भारत माता के 135 करोड़ लाल हैं, कोई मोती है, कोई जवाहर है, तो कोई लाल बहादुर है। लाल जब छोटे होते हैं, तब उन्हें लल्ला भी कहते हैं! बड़े होने पर इनमें से कुछ लाला भी निकल जाते हैं। कोई पंजाब केसरी लाला लाजपतराय कहलाता है, तो कोई लाला अमरनाथ। कितने लोगों ने Hints for Self Culture, के लेखक, स्वतंत्रता सेनानी लाला हरदयाल का नाम सुना है। ईश्वर किसी को फिल्म उपकार के किरदार कन्हैयालाल वाला लाला न बनाए। भले ही एम डी एच के मसाले वाला साफा धारी लाला धर्मपाल गुलाटी ही क्यूं न बना दे।

जो जाट है, उसके ठाठ हैं! हमारे मुख्य चरित्र ताऊ को सम्मान के साथ चौधरी भी कहते हैं। वे सिर्फ देवीलाल नहीं चौधरी देवीलाल थे। कुछ चौधरी, लाल नहीं, सिंह भी होते हैं। चौधरी चरणसिंह कभी देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। नाम की महिमा देखिए, किसी चौधरी के चरण, जब सिंहासन तक पहुंचते हैं, तो वे सिंह नहीं चरणसिंह हो जाते हैं।।

जो ताऊ है, वही चौधरी है, और वही देश का सच्चा लाल भी है। देवी जिसका नाम है, हरियाणा का वह लाल है। ऐसे सभी

ताऊ चौधरियों को बारम्बार प्रणाम है।।

( सभी ताऊ-ओं को सादर समर्पित )

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४१ – लघुकथा – कारण – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी लघुकथा – कारण।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४१

☆ लघुकथा – कारण ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

” लाइए मैडम ! और क्या करना है ?” सीमा ने ऑनलाइन पढ़ाई का शिक्षा रजिस्टर पूरा करते हुए पूछा तो अनीता ने कहा, ” अब घर चलते हैं । आज का काम हो गया है।”

 इस पर सीमा मुँह बना कर बोली, ” घर !  वहाँ  चल कर क्या करेंगे? यही स्कूल में बैठते हैं दो-तीन घंटे।”

” मगर, कोरोना की वजह से स्कूल बंद  है !” अनीता ने कहा, ”  यहां बैठ कर भी क्या करेंगे ?”

” दुखसुख की बातें करेंगे । और क्या ?”  सीमा बोली, ” बच्चों को कुछ सिखाना होगा तो वह सिखाएंगे । मोबाइल पर कुछ देखेंगे ।”

” मगर मुझे तो घर पर बहुत काम है, ”  अनीता ने कहा, ”  वैसे भी ‘हमारा घर हमारा विद्यालय’ का आज का सारा काम हो चुका है।  मगर सीमा तैयार नहीं हुई, ” नहीं यार। मैं पांच बजे तक ही यही रुकुँगी।”

अनीता को गाड़ी चलाना नहीं आता था। मजबूरी में उसे गांव के स्कूल में रुकना पड़ा। तब उसने कुरेदकुरेद कर सीमा से पूछा, ” तुम्हें घर जाने की इच्छा क्यों नहीं होती?  जब कि तुम बहुत अच्छा काम करती हो ?” अनीता ने कहा।

उस की प्यार भरी बातें सुनकर सीमा की आंख से आंसू निकल गए, ” घर जा कर सास की जलीकटी बातें सुनने से अच्छा है यहां शकुन  के दोचार घंटे बिता लिए जाए,” कह कर सीमा ने प्रसन्नता की लम्बी साँस खिंची और मोबाइल देखने लगी।

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

22-08-2020  

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २८७ ☆ बाल गीत – हो अपना मधुर व्यवहार… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २८७ ☆ 

☆ बाल गीत – हो अपना मधुर व्यवहार ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

सहज, सरल जीवन बने

मानव कर उपकार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

बिगड़े अपने काम बनेंगे

जीवन को हम महकाएँ ।

सत्यनिष्ठ, आचरण सुगंधित

फूलों – सा हम मुस्काएँ।

 *

मन पावन हो आचरण

बाँटें जग में प्यार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

 *

द्वेष, कपट सब मिट जाते हैं

मन निर्मल हो जाता है ।

सोच  – समझकर मीठा बोलें

जटिल प्रश्न हल हो जाता है।।

 *

सदाचार का पाठ ही

है जीवन का सार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

 *

जो भी मधु – सा मीठा बोलें

अपना ही उपकार करें।

गन्ने का रस मीठा बनकर

तन – मन में संस्कार भरें।

 *

भोजन शाकाहार का

करें प्रचार – प्रसार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

 *

कोमल मन पहचान बनाए

मधुर नेह को उपजाता।

शौर्य पराक्रम स्वयं मिलेगा

मानव अंबर छू पाता।

 *

सदभावों, गुणप्रेम से

खुद का हो उपकार।

मूल मंत्र मधुविद्या का

करें मधुर व्यवहार।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ शोक वार्ता – स्मृतिशेष कै. श्रीमती कुंदा कुलकर्णी आणि कै. सुहास सोहोनी — विनम्र श्रद्धांजलि ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ शोक वार्ता – स्मृतिशेष कै. श्रीमती कुंदा कुलकर्णी आणि कै. सुहास सोहोनी — विनम्र श्रद्धांजलि ☆

कळविण्यास अत्यंत दु:ख होते की आपल्या ‘ ई अभिव्यक्ती मराठी ‘ समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती कुंदा कुलकर्णी आणि ज्येष्ठ साहित्यिक श्री.सुहास सोहोनी यांचे नुकतेच निधन झाले .

ईश्वर त्यांच्या आत्म्यास सद्गती देवो ही प्रार्थना 🙏

श्रीमती कुलकर्णी व श्री.सोहोनी यांच्या कुटुंबीयांच्या दु:खात आम्ही सर्व सहभागी आहोत.या दु:खद प्रसंगाला त्यांनी धीराने सामोरे जावे .🙏

संपादक मंडळ .

****

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ आयुष्य: एक प्रवास ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

श्रीमती उज्ज्वला केळकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ आयुष्य: एक प्रवास… ☆ श्रीमती उज्ज्वला केळकर ☆

आयुष्य: एक प्रवास

करायचा बिनधास्त

वाटचाल करायची कुठून?

राजरस्त्यावरून की पायवाटेवरून?

नियती ठरवेल तिथून

त्या प्रवासात

काय असेल पायाखाली

हिरवळीची मऊ मखमल

की काट्या-कुटयांचे बन

हिरवळ असेल, तर

डोळे निवतील, पाय सुखावतील

पण लागलेच वाटेत काटे-कुटे तर,

करायची नाही कुरकुर.

मग पायच करावे टणक, दणकट

की कटयांनीच कुरकुर करावी.

मान खाली घालावी.

देवाजीने, हात, पाय, डोळे, मन

करावे समर्थ

मग येईना का आम्हा

रात्रंदिन युद्धाचा प्रसंग

© सौ. उज्ज्वला केळकर

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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