हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ अंकुर ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ अंकुर 

छिन्न-भिन्न कर दिया

अस्तित्व तुम्हारा,

फिर भी

तुम्हारी हिम्मत

टूटती क्यों नहीं,

आस मिटती

क्यों नहीं..?

झल्लाकर पूछा

कुटिल स्थितियों ने…,

मैं अपलक निहारता रहा

ध्वस्त कर दी गई

इमारत के मलबे से

फूटते अंकुर को…,

कुटिलता मुरझा गई,

स्थितियाँ खिसिया गईं!

©  संजय भारद्वाज 

4.33 दोपहर,17.11.2020

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य #82 ☆ कविता – शब्द तुम्हारे कुछ ले कर के, घर लौटें तो अच्छा हो ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी की एक विचारणीय एवं सार्थक कविता  ‘शब्द तुम्हारे कुछ ले कर के,  घर लौटें तो अच्छा हो‘। इस सार्थक कविता के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 82 ☆

☆ कविता शब्द तुम्हारे कुछ ले कर के,  घर लौटें तो अच्छा हो ☆

 कवि गोष्ठी से मंथन करते , घर लौटें तो अच्छा हो ।

शब्द तुम्हारे कुछ ले कर के,  घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

कौन किसे कुछ देता यूँ ही,  कौन किसे सुनता है अब,

छंद सुनें और गाते गाते,  घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

शुष्क समय में शून्य हृदय हैं, सब अपनी मस्ती में गुम,

रचनायें सुन हृदय भिगोते, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

अपनी अपनी पीड़ाओं से सब पीड़ित, पर सब हैं चुप

पर पीड़ा सुन, खुद को खोते, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

अपनी अपनी कविताओं पर, आत्ममुग्ध हैं सब के सब,

पर के भाव हृदय में ढोते, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

कविताओं की विषय वस्तु तो , कवि को ही तय करनी है,

शाश्वत भाव सदा सँजोते, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

रचना  पढ़े बिना, समझे बिन, नाम देख दे रहे बधाई

आलोचक से सहमत होते, घर लौटें  तो अच्छा हो ।।

 

कई डायरियां, ढेरों कागज, भर डाले सब लिख लिखकर,

छपा स्वयं का पढ़ते पढ़ते, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

पढ़ते लिखते उम्र गुजारी, वर्षों गुजरे जलसों में,

अब जलसों में श्रोता बनके, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

बड़ा सरल है वोट न देना,  और कोसना शासन को

वोटिंग कर कर्तव्य निभाते, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

पहली बारिश पर मिट्टी की सौंधी खुशबू से तर हो,

खिले खिले कुछ महके महके, घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

बच्चों के सुख दुख  के खातिर  जीवन जिसने होम किया,

उसका हाथ थाम कर बच्चे , घर लौटें तो अच्छा हो ।।

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 42 ☆ जोर लगाकर हईशा… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “जोर लगाकर हईशा…”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 42 – जोर लगाकर हईशा… ☆

एकता और शक्ति कार्यक्रम में शक्ति का प्रदर्शन चल रहा था। सभी से एकता बनाए रखने की अपील की जा रही थी। पर एकता के तो भाव ही नहीं मिलते हैं। एक- एक मिलकर ग्यारह तो हो सकते हैं। एक- एक जल की बूंद से सागर भर सकता है। एक – एक लकड़ी मिलकर बड़ा सा गट्ठर बना सकती है, पर प्रत्येक व्यक्ति के विचारों को एकता के सूत्र में बाँधकर रहना बहुत मुश्किल होता है ।

हर व्यक्ति अपनी ही जीत चाहता है। जिसके लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगाकर गुटबाजी करने से भी नहीं चूकता है। एकता का जाप करते हुए मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा का गीत अवश्य ही उसका नारा होता है। परंतु कथनी और करनी का भेद यहाँ भी टपक पड़ता है। जिस तरह रस्सी खींच प्रतियोगिता में दो गुट बनाकर , दोनों ओर बराबर संख्या में प्रतिभागी होते हैं। वैसा ही किसी भी आयोजन में देखा जाता है। यहाँ लोग पुरानी बातों को एक – एक कर खोलने लगते हैं ताकि सामने वाले का मनोबल कम हो जाए। पर लोगों ने भी कोई कच्ची गोटियाँ नहीं खेली होती हैं। आयोजक ऐसे लोगों को चयनित ही करते हैं। जो आकर्षण के सिद्धांत का पालन करते हुए ही नीतियाँ बनाता और लागू करवाता हो।

जोर लगाकर हईशा…

इस नारे की गूँज से वातावरण गुंजायमान हो गया, सब लोग पूरे दमखम के साथ मैदान पर उतरे हुए थे। बस इंतजार था कि जिस दल की एकता भंग हुई वही चारो खाने चित्त होगा। पर इसकी यही तो खूबी है कि ये सत्ता पक्ष के साथ ही इतराती है। एकता को भी साजो शृंगार की आदत जो ठहरी , ये  वहीं रुकेगी जहाँ स्थायित्व हो। प्रतियोगिता अपने चरम पर थी , दर्शकों की धड़कनें थम गयीं …अब क्या होगा , सभी की निगाहें परिणाम की ओर थीं। दोनों दल पूरे मनोयोग से रस्सी खींच रहे थे। सभी ओर एक से बढ़कर एक नीतिकार योद्धा मौजूद थे। दर्शकों ने भी गुटबाजी में अपनी भलाई समझी ,सो वे भी दो समूहों में बँट कर आंनद लेने लगे। अब तो निर्णायकों को भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। उन्होंने चारों ओर निगाहें दौड़ाई और आँखों ही आँखों में ये तय कर लिया कि यदि समय पूरा हो गया और कोई आशाजनक परिणाम नहीं मिल पाया तो  इस जीत से ज्यादा फायदा जिसके द्वारा हम लोगों को मिल सकता है उसे ही विजेता बना देंगे ।

पर एकता में शक्ति होती है। सो एक समूह जो पहले से ही एकता के सूत्र की मिसाल है वो जीत ही गया क्योंकि एक – एक मोती मिलकर ही सम्पूर्ण माला को बनाते  हैं ।

 

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ आज़ादी… ☆ श्री जयेश वर्मा

श्री जयेश कुमार वर्मा

(श्री जयेश कुमार वर्मा जी का हार्दिक स्वागत है। आप बैंक ऑफ़ बरोडा (देना बैंक) से वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। हम अपने पाठकों से आपकी सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ समय समय पर साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक  अतिसुन्दर भावप्रवण कविता धुँए का दर्द…।)

☆ कविता  ☆ आज़ादी… ☆

आज़ादी ,मिल गयी,

लोंगो ने निकाले, अर्थ, उसके,

कई, अपनी मर्ज़ी के,

खूब, भोगा, उसको,

सरे आम नीलाम किया,

इन गुज़रे, गुज़रते, सालों बाद भी,

बुधुआ, अब भी, वैसा ही,

मज़दूर, किसान, रहा,

इस पीढ़ी के बुधुआ से पूछो,

इन टोपी, झंडों, वालों ने,

इन, नेता, अफसर, दलालों ने

उसे कितना लूटा, बेज़ार किया,

किसान का हक़ मारा,

वो, मौसम से लड़ता,

अपने फ़र्ज़ पे ईमान रहा,

उसके नाम के कई नेता,

बईमानों का बाज़ार रहा,

उसे जो दे इज़्ज़त, रोटी,

लगता नेताओँ को,

मुँह से छिनती बोटी,

जारी है, झूठ को,

सच करने की कोशिश,

अब देखो कब,

इस देश के, बुधुआ, किसान, को,

मिलती है, इनसे, आज़ादी,

मिलती है, इनसे, आज़ादी,

आज़ादी, आज़ादी, आज़ादी,…

 

©  जयेश वर्मा

संपर्क :  94 इंद्रपुरी कॉलोनी, ग्वारीघाट रोड, जबलपुर (मध्यप्रदेश)
वर्तमान में – खराड़ी,  पुणे (महाराष्ट्र)
मो 7746001236

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 49 ☆ स्वास्थ्य पर दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं    “स्वास्थ्य पर दोहे.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 49 ☆

☆ स्वास्थ्य पर दोहे ☆ 

 

स्वस्थ वही है “चक्र” सुन , मन जो रखे  प्रसन्न।

शाकाहारी बन सदा, खा ले भाजी-अन्न ।।

 

श्वास-श्वास तेरी सखा, हरदम रहती पास।

“चक्र”समझ ले स्वयम को, ये ही तेरी खास ।।

 

“चक्र”वही रोगी रहें, जो रहते हैं खिन्न ।

जीवन तो उपहार है, रख तू सदा प्रसन्न।।

 

सत्य मार्ग ही श्रेष्ठ है,  करता है उद्धार ।

तन -मन आनंदित रहे , मिले प्रेम का हार ।।

 

जीवन तो अनमोल है, करें सैर और योग।

पाँच मिनट व्यायाम से, सुखमय रहें निरोग।।

 

योग,परिश्रम नित करूँ,सोचूँ शुभ -शुभ काम।

सभी समर्पित ईश को, मुझे कहाँ  विश्राम।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ विसाव्याचे क्षण ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ विविधा ☆ विसाव्याचे क्षण ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे 

उरात रुतले काटे काही,

शल्य त्याचे टाकून देऊ!

आयुष्याच्या अंतिम अंकी,

रिक्त, मुक्त होऊन जाऊ!

 

जरी अंत हा माहीत नाही,

मरणाचे राही मनात स्मरण!

किती दिवस अन् किती वर्षेही,

मनात मोजी प्रत्येक क्षण क्षण!

 

मानव देह हा दिला प्रभूने,

काही करावे त्याचे सोने!

येता विसाव्याचे क्षण हे,

संपत जाई कणाकणाने!

 

स्मृतीत चिरंतन क्षण वेचावे,

मनीची खळबळ मनी रहावी!

एकांताच्या क्षणी रमावे,

अंतर्यामी  गुंतून जावे!

 

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 55 – हौताम्य पूजन ☆ श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे

श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे 

  1. ☆ रंजना जी यांचे साहित्य # 55 – हौताम्य पूजन  ☆

 

क्रांती कारकांचे, करूनी स्मरण

हौताम्य पूजन,  लवलाही…!

 

भगतसिंगाचे, प्रेम, दिलदार

सुखदेव यार,  राजगुरु….!

 

त्रिकूट मैत्रीचे, स्वातंत्र्याचे दूत

भाग्यवान पूत,  क्रांतीकारी….!

 

भारत मातेचे, पुत्र भाग्यवंत

जाणुनिया खंत, माऊलीची

 

तोडण्या शृंखला, तव चरणाच्या,

सुखे मरणाच्या, दारी जात…..!

 

वंदे मातरम , होता जयघोष,

उडाले ते होश, जल्लादाचे.,….!

 

केले प्राणार्पण, गेलें फासावर

निष्ठा कार्यावर,  सेवाव्रती….!

 

तेवीस मार्चचा, बलिदान  दिन,

आक्रोशले जन, भारतीय …..!

©  रंजना मधुकर लसणे

आखाडा बाळापूर, जिल्हा हिंगोली

9960128105

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ बोध कथा – वचनपूर्ती ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी

☆ जीवनरंग ☆ बोध कथा – वचनपूर्ती ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी ☆ 

||कथासरिता||

(मूळ –‘कथाशतकम्’  संस्कृत कथासंग्रह)

? बोध कथा?

कथा ७. वचनपूर्ती

धारानगरीत एक ब्राह्मण रहात होता. फुले-फळे आणण्यासाठी तो वनात जात असे. हा त्याचा नित्याचाच उपक्रम होता. पण एक दिवस मात्र विपरीत घडले. त्याला वनात साक्षात व्याघ्रराजाचे दर्शन झाले! वाघाच्या रूपाने साक्षात मृत्यूच समोर उभा आहे असे ब्राह्मणाला वाटले. भयभीत होऊन तो पळायला लागला. वाघानेही पाठलाग करून त्याला शेवटी पकडलेच!

तेव्हा मनात काही विचार करून ब्राह्मणाने वाघाला विनंती केली की, “आपण माझ्यावर दया करून मला ठार न मारता तीन दिवसांसाठी सोडले, तर मी घरी जाऊन, माझी महत्त्वाची कामे आटपून, माझ्या नातलगांना भेटून परत येईन”. त्यावर वाघ म्हणाला, “जर तू परत आला नाहीस तर मी काय करावे?” “मी नक्की परत येईन” असे जेव्हा ब्राह्मणाने वचन दिले, तेव्हा वाघाने ब्राह्मणाला सांगितले की, “हे ब्राह्मणा! तू घरी जाऊन तीन दिवसांनी परत ये. मी तुझी इथेच वाट बघतो.”

शोकाकुल अवस्थेत ब्राह्मण घरी परतला. घरी जाऊन तीन दिवसांनी सगळी कामे आटपून, वाघाला वचन दिल्याप्रमाणे तो वाघाच्या समोर येऊन उभा राहिला. ब्राह्मणाला पाहताच, वाघाला त्याच्या सत्यप्रियतेचे खूप कौतुक वाटले. अहो आश्चर्यम्! वाघाने ब्राह्मणाची स्तुती करून त्याला ठार न मारता घरी जाण्यास सांगितले. ब्राह्मणाला वचनपूर्तीचे फळ मिळाले.

तात्पर्य –  खरोखरच सत्यवादी जगात पूज्य ठरतात

अनुवाद – © अरुंधती अजित कुळकर्णी

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ मौत से ही मुहब्बत निभायेंगे हम – क्रमश: भाग 3 ☆ सौ. गौरी सुभाष गाडेकर

सौ. गौरी सुभाष गाडेकर

☆ जीवनरंग ☆ मौत से ही मुहब्बत निभायेंगे हम – क्रमश: भाग 3 ☆ सौ. गौरी सुभाष गाडेकर ☆ 

पण कुठे काय  बिनसलं कोणास ठाऊक !तिकिटं  खपेनातच. एका आठवड्यातच चित्रपट थिएटरवरून काढावा लागणार, अशी चिन्हे दिसायला लागली.

अभिजित तर नवीनभाईंपेक्षाही जास्त अपसेट झाला. इंडस्ट्रीतल्या त्याच्या करियरचं काही खरं नव्हतं.

दिवसभर तो डोकं धरून बसला होता. अचला जेवायला बोलवायला आली, तर”भूक नाही म्हटलं ना?”म्हणून वस्सकन ओरडला तिच्या अंगावर.

तेवढ्यात बाहेर सुजयने टीव्ही ऑन करून चॅनल सर्फिंग सुरु केलं. एकमेकांत मिसळलेले ते कर्कश आवाज कानावर आले मात्र, अभिजित चवताळलाच.

“बंद कर बघू आधी तो टीव्ही. आधीच डोक्यात घण घातल्यासारखं……. ”

सांगितलेलं ऐकेल तो सुजय कसला !त्याने फक्त व्हॉल्युम थोडा कमी केला.

“आय  डोन्ट नो व्हॉट यू से….. ”

हे सूर कानावर आले आणि कुठचंतरी दार किलकिलं झालं.

अभिजितने लगेचच नवीनभाईंची अपॉइंटमेंट घेतली.

पाच मिनिटांच्या आत  तयार होऊन तो बाहेर पडलेला बघून अचलाला धक्काच बसला.

अभिजितची कल्पना ऐकून नवीनभाई उडालेच, “तुमची आयडिया म्हणजे सोना हाय सोना. अरे, आपल्या पिक्चरवर पोरांच्या उड्या पडणार. कॉलेजं ओस पडणार आणि थिएटरवर ब्लॅक चालणार. मी तुमच्या या आयडियावर वर्क करेल. तुम्हाला तुमचं पर्सेंटेज मिळेल. ”

दुसऱ्याच दिवशी सगळ्या वर्तमानपत्रात बातमी झळकली –‘  ‘मौत से…. ‘ या चित्रपटाने प्रेरित होऊन एका प्रेमी युगुलाची आत्महत्या. ‘

बातमी एवढी तपशीलवार लिहिली होती, की ती फक्त आपल्या कल्पनेतूनच जन्माला आली आहे, यावर खुद्द अभिजितचाही विश्वास बसला

नाही. अर्थात खाली तळटीप होती -‘मृतांच्या निकटवर्तीयांच्या विनंतीवरून व त्यांच्या भावनांचा आदर करून मृतांची नावं तसंच त्या गावाचंही नाव बदललं आहे.’

त्या बातमीने खरंच जादूची कांडी फिरवली. चित्रपटाचा धंदा एवढा प्रचंड झाला की……

अभिजितला घसघशीत रकमेचा चेक मिळाला.

नवीनभाईंनी ग्रँड पार्टी दिली.

पार्टीहून घरी परतताना अचलाने धीर करून अभिजितला विचारलं,”अभि, एक विचारू?”

“काय? ”

“ती बातमी खरी होती का रे?”

अभिजित मोठ्याने हसला.

“तुझ्याच सुपीक डोक्यातून निघालेली?”

एरवी अभिजित चिडला असता ; पण आज तो जाम खुशीत होता.

“कशावरून?”

“नवीनभाई ज्या प्रेमाने तुझ्याशी बोलत होते ना, त्यावरून अंदाज केला मी.”

पुन्हा अभिजित हसला.

अचलाला आपल्या नवऱ्याच्या कल्पनाशक्तीचं कौतुक वाटलं.

दुसऱ्या दिवशी अचलाने वर्तमानपत्र उघडलं. तिसऱ्या पानावर वरच्या उजव्या कोपऱ्यात बातमी होती – तशीच.यावेळी फोटोही होता. एकमेकांचे हात घट्ट धरलेल्या दोन निरागस मुलांच्या प्रेताचा. खाली नावं बदलल्याची टीपही नव्हती.अचलाच्या अंगावर काटा आला.

क्रमश: ….

© सौ. गौरी सुभाष गाडेकर

संपर्क –  1/602, कैरव, जी. ई. लिंक्स, राम मंदिर रोड, गोरेगाव (पश्चिम), मुंबई 400104.

फोन नं. 9820206306

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ मनाच्या खोल तळाशी… ☆ श्री अरविंद लिमये

श्री अरविंद लिमये

☆ विविधा ☆ मनाच्या खोल तळाशी… ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

मनाच्या कुपीत..आठवणींच्या सा‌‌ठवणीत पडून असतं बरंचसं. आठवूच नये असं जसं , तसंच आठवत रहावं असंही बरंच कांही. असं असो वा तसं जुनंच सगळं. भूतकाळातलं. आठवत रहावं असं असलं , तरी सारखं तेच आठवत रहाणं म्हणजे भूतकाळातच जगणं. आठवू नये असं तर दामटून बसवलं नाही, तर डोकं वर काढतच रहातं सारखं सारखं लवचटासारखं. आठवणी हव्या-नकोशा कशाही असोत त्या उपटून फेकून नाहीच देता येत. मग करायचं काय? हव्याहव्याशा, चांगल्या आठवणी जपून ठेवायच्या निगुतीनं. आवडती वस्तू सहज कधी हाताळून पहातो ना , तसं अलगद आठवून पहायच्या क्षणकाळ. तेवढाही श्वास पुरुन उरतो वर्तमानात जगण्यासाठी. नकोशा आठवणींकडे करायचं दुर्लक्ष. मुद्दामच. पाहूनही न  पाहिल्यासारखं. हिरमुसल्या होऊन मग रहातात पडून न् जातात विरुनही कधीतरी हळूच खाली मान घालून निघून गेल्यासारख्या. आठवणी कशाही असोत, त्या हव्यातच. पण भल्याबुऱ्याचं भान जागं ठेवण्यापुरत्या. जगायचं कसं आणि कसं नाही हे सांगण्या-सुचवण्यापुरत्या.

आठवणी हव्यातच सोबतीपुरत्या. अंधारल्या वाटेवरच्या इवल्याशा दिव्यासारख्या. मिणमिणताच पण प्रकाश देणाऱ्या. चुकत असेल वाट तर रस्ता दाखवणाऱ्या.

आठवणी म्हणजे अनुभवच तर असतात भूतकाळात जमा झालेले. हवेसे किंवा नकोसेही. मनाच्या खोल तळाशी पडून असतात वाट पहात, हांक आली की झरकन् झेपावण्यासाठी. आठवणी कशाही असोत सारखं कुरवाळत नाही बसायचं आवडती गोळी चघळल्यासारखं, किंवा झिडकारायच्याही नाहीत कडवट कांहीतरी थुंकून टाकल्यासारख्या. न जाणो, त्या कडवट असल्या, तरी उपयोगीही पडत असतात कधीतरी औषधासारख्या..!

औषधासारख्याच तर असतात आठवणी. (मनाच्या) तब्येतीला भानावर आणणाऱ्या. गोड सिरप गोड असतं म्हणून आवंढा न गिळताच तोंडात नसतंच ना धरून ठेवायचं. किंवा असेल गोळी औषधाची कडवट किंवा गोडसरही, पण तीही चघळत नसतीच रहायची तासनतास. गिळून टाकायची पाण्याच्या एका घोटाबरोबर क्षणार्धात. आठवणी लगडलेल्या असतातच विचारांना , येणाऱ्या.. जाणाऱ्या..! जाऊ द्यायच्या आल्या तशाच जाणाऱ्या विचाराबरोबर तशाच अधांतरी तरंगत. जात नाहीतच त्या कायमच्या. जाऊन बसतात आपल्याच मनाच्या तळाशी वेळ येईल, तेव्हा अलगद.. हळूवार सावरायला आपल्याच मनाला…!!

 

© श्री अरविंद लिमये

सांगली

मो ९८२३७३८२८८

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares