मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मोरपंखी आठवण ☆ श्रीमती सुधा भोगले

☆ मनमंजुषेतून ☆ मोरपंखी आठवण ☆ श्रीमती सुधा भोगले ☆ 

घराच्या पल्याड, उसाच्या शेतात, बरीच वर्षे मोर वस्ती करून होते. सकाळी ते मधली भिंत ओलांडून, नारळाच्या बागेत आपल्या कुटुंबकबिल्यासह चारा टिपायला येत. तीनचार लांडोर आणि मोर मात्र एकटाच बापडा! लांडोर,  मोराच्या मागे मागे जात. बराच वेळ त्यांचा मुक्तपणे संचार चाले.

साखर झोपेतून जाग येई ती त्यांच्या केकानीच!पुन्हा:निद्राधीन होताहोता उजाडेच. रोज त्यांच्या हालचाली पाहता पाहता, मनात येई, एकदातरी,  पिसारा फुलवून तुझे ते मोरपंखी सौंदर्य मला दाखवशील का? आणि तो क्षण एकदा येऊन ठाकला. शेजारच्या अपर्णाने दूरध्वनीवर सांगितले,  “अग सुधा, लवकर बाहेर ये!” . मोराने पिसारा फुलवला आहे, आणि मग मागीलदारी जाण्याची धांदल उडाली.  मोरपंखी रंगाचा विलोभनीय सोहळा अनिमिष नेत्रांनी पाहता पाहता मनाला रंगसुख देत होता.  तो पिसारा पाहता मनात आलं, उगाच नाही त्या मोरपंखी पिसाने, श्रीकृष्णाच्या मुकुटावर आढळस्थान मिळवलयं. त्या पिसाऱ्याचा मनोहारी रंग मनाला आनंद देतो. मन जेव्हां आनंदाने फुलून येते, तेंव्हा म्हटले जाते,  “बाई,  बाई,  मनमोराचा कसा पिसारा फुलला,  फुलला!”. काही आठवणी हळूवार मनात डोकावतात, आणि मग त्या अंगावर मोरपीस फिरवल्या सारख्या सुखद वाटतात.

लहानपणी,  त्या मोरपंखी रंगाचा ठेवा, पुस्तकाच्या पानात जपून ठेवताना रंगांची ऊब देते. एखादा फकीर आपल्या हातातील मोरपिसांच्या झुपकेदार पंखा धुपाटण्यावर  फिरवून ऐख्याद्याच्या डोक्यावर हळूवार फिरवत दुवा देतो. आशा असंख्य प्रसंगात, हे मोरपीस आपल्या रंगानी आणि विलोभनीय रूपाने दिमाखात मिरवीत असते. अशा ह्या बहुरंगी पक्ष्याची आपल्या देशाचा पक्षी म्हणून निवड झाली.

एकेदिवशी नारळाच्या बागेत येणारा मोर संध्याकाळच्या वेळेस चक्क नारळाच्या शेंड्यावर जाऊन बसला. ते पाहून मन चिंतेत पडले. अरे बापरे!आता याला खाली कसे आणायचे.  मोर खरंतर पाच फुटाच्यावर उडणारा पक्षी नव्हे. प्राणीमित्राना आता बोलवायला हवे. असे म्हणत सकाळ झाली. मागे उगाचचं मोराच्या काळजीने डोकावले तर हा त्या झाडाच्या शेंड्यावरून गायब!

रोज संध्याकाळी मागे नारळाच्या बागेत डोकावून, निरीक्षणाचा छंदच जडला.  एकेदिवशी, या मोराचे झाडावर चढणे, मी चोराला पकडल्यागत, पाहिलेच,  हा पठ्या आधी भिंतीवर मग भिंतीवरून लहान नारळाची झावळी, त्यावरून वरची,  त्यापुढची

असं करत वरचढून शेंड्याला जात असे, आपले शयनकक्षच  नारळाच्या झाडावर करू लागला. त्याच्यामागे लांडोर असत,  पण त्या कधी झाडावर चढत नसत. असे

कित्येक दिवस तो मोर झाडाचा व आमचाही  सोबती झाला.  केका  हा जीवनाचा रोजचा भाग झाल्या. मनाला सुखवणारे मोराचे हे रंगीत सुख नंतर, २००५च्या पुरात

वाहूनच गेले.  ऊसाची शेतं उजाड झाली. मोरांना बसायला,  आपला कुटुंबकबिला जपायला जागाच गेली. मोराने दुसरी सुरक्षित शेत पाहिले असावे. मोराच्या विरहाने मनाचा विरंगुळा हरवला. नारळाची बाग सुनीसुनी झाली. मनात त्या रंगसोहळ्याची

सुखद स्मृती जपत राहिलो.

 

© श्रीमती सुधा भोगले 

९७६४५३९३४९ / ९३०९८९८९१९

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (29) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

(कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन)

(तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)

 

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु ।

प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥

 

तीन भेद धृति, बुद्धि के होते गुण अनुसार

पृथक ओर संपूर्णतः कहता पार्थ ! मैं सार ।।29।।

 

भावार्थ :  हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन॥29॥

Hear thou the threefold division of the intellect and firmness according to the Gunas, as I declare them fully and distinctly, O Arjuna!

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 21 – विदिशा ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है आपका अभिनव गीत  “विदिशा। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 21– ।। अभिनव गीत ।।

☆ विदिशा

क्यों उदय  गिरि कंदरा में दिप  रहा हो

पुण्यधर्मा संत, विदिशा में अनावृत

खाम बाबा के व्यथित  कवि

 

कहाँ लहराकर  थकी है बेस#

सुलझाती लटों को

कहाँ व्याकुल बेतवा  है देखती

खुुद के तटों  को

 

सैन्य बल के साथ विरमित

थे अशोक

कहाँ ठहरे थे अमित  जय घोष

के द्युतिमान  शतदल

पर्वतों के शिखर पर

तेजस द्रवित रवि

 

कहाँ ध्वनियों ने पवन से

विजयकी सौगात  माँगी

कहाँ अपनी तलहटी से

उर्ध्वगामी थी  लुहाँगी€

 

कहाँ अपनी बाँह पर लेकर

सहज ही

राज्य का अनिवार्य  पौरुष  जो अयाचित

सम्पदा के यज्ञ को देता रहा  हवि

 

शांत शुंगों की वही नीहारिका  यह

तनी है इतिहास के होंठों अकेली

क्षिप्र है पर बहुत                          गहरेतकअनिश्चित

देश की जागृत अतीती यह पहेली

 

हरतरफ स्तब्ध  है वातावरण  तो

सरल मातुल    संघमित्रा के अनोखे

देखते पाषाण में क्या स्वयं  की छवि

 

000

 

#बेस=वेतवा  से संगम करने वाली नदी

€ लुहांगी =विदिशा की एक प्रस्तर  पहाड़ी

 

© राघवेन्द्र तिवारी

30-12-2018

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 67 ☆ आमने-सामने -2 ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है ।

आज से प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ  के अंतर्गत आमने -सामने शीर्षक से  आप सवाल सुप्रसिद्ध व्यंग्यकारों के और जवाब श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के  पढ़ सकेंगे। इस कड़ी में प्रस्तुत है  सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ ललित लालित्य जी के प्रश्नों के उत्तर । ) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 67

☆ आमने-सामने  – 2 ☆

डॉ ललित लालित्य (दिल्ली)

1-  पांडेय जी आप चुपचाप काम करने वाले व्यंग्यकार हैं जबकि आपके जूनियर कहाँ से कहाँ पहुँच गए ।

2- क्या आप मानते है कि व्यंग्यकार को ईमानदार होना चाहिए,चुगलखोर या ईर्ष्यालु नहीं ?

3- क्या जीते जी व्यंग्यकार मंदिर बनवा कर पूजे जाएं यह कहाँ की भलमान्सियत है ?

जय प्रकाश पाण्डेय –

1- सर जी, लेखन में कोई जूनियर, सीनियर या वरिष्ठ, कनिष्ठ या गरिष्ठ नहीं होता, ऐसा हमारा मानना है। ईमानदारी और दिल से जितना कुछ संभव हो, वही संतुष्टि देता है। यदि कोई कहां से कहां पहुंच भी गया तो खुशी की बात है, उसकी प्रतिभा उसका अध्ययन उसे और ऊपर ले जाएगा।

2- ईमानदार और दीन-दुखी जन जन के साथ खड़ा लेखक ही असली व्यंंग्यकार कहलाने का हकदार है, जैसे आप हर दिन आम आदमी की दैनिक जीवन में आने वाली विसंगतियों और पाखंड पर रोज लिखकर आम आदमी के साथ खड़े दिखते हो। समाज की बेहतरी के लिए व्यंंग्यकार की ईमानदार कोशिश होनी चाहिए, ईमानदार प्रयास ही इतिहास में दर्ज होते हैं, फोटो और बोल्ड लेटर के नाम पानी के बुलबुले हैं। भाई,व्यंंग्यकार ही तो है जो जुगलखोरी और ईर्षालुओं के विरोध में लिखकर उनके चरित्र में बदलाव की कोशिश करता है।

3- ऐसे लोगों को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए जो आत्म प्रचार और आत्ममुग्धता के नशे में जीते जी मंदिर बनवाने की कल्पना करते हैं। ऐसे लेखक के अंदर खोट होती है, वे अंदर से अपने प्रति भी ईमानदार नहीं होते, जो लोग ऐसे लोगों के मंदिर बनवाने में सहयोग देते हैं वे भी साहित्य के पापी कहलाने के हकदार हो सकते हैं।

क्रमशः ……..  3

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ अव्यक्त ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ अव्यक्त ☆

अंतहीन विवाद,

भीषण कलह,

एक-दूसरे के लिए आज से

मर चुका होने की घोषणा,

फिर भी जाने क्या था कि

खिड़की के कोने पर खड़ा वह

भाई को तब तक देखता रहा

जब तक सुरक्षित रूप से

पार नहीं कर ली उसने सड़क,

और ओझल नहीं हो गया आँखों से..,

 

आपसी सहमति से हुए

उनके संबंध विच्छेद पर

अब तो अदालती मोहर भी लग चुकी,

फिर भी जाने क्या है कि

हर रोज वह बनाती है अपने साथ

उसके भी नाम की रोटियाँ

और सुबह आँसुओं के नमक से

लगा-लगा कर खाती है

रोजाना उसे कोसते हुए…,

 

संपत्ति बीच में क्या आई

शत्रु हो गई अपनी ही जाई,

एक खुद का,दो बेटों का

और एक बेटी का हिस्सा करके भी

गुज़रने से पहले

माँ अपना हिस्सा भी कर गई

अबोला किए नाराज़ बेटी के नाम…,

 

“लव यू मॉम…”

“मेड फॉर इच अदर” “फारॅएवर…”

“ग्रेटेस्ट ब्रो!’

सेलेब्रेशन, विशिष्ट संबोधन

और फिर पढ़ता हूँ सुर्खियाँ-

भाई का भाई द्वारा खून,

पति निकला पत्नी का हत्यारा,

बूढ़ी माँ को बेटी ने दिया घर निकाला…,

 

सोचता हूँ

जो अभिव्यक्त नहीं होता था

संभवत: अधिक परिपक्व

अधिक सशक्त होता था!

 

©  संजय भारद्वाज 

( 2 जुलाई 2016, प्रात: 6:30 बजे, पुणे से मुंबई की यात्रा में)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #14 ☆ ऐ मेरे दोस्त ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आखिर मैं भी तो वही कर रहा हूँ। आज से हम प्रत्येक सोमवार आपका साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी प्रारम्भ कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “ऐ मेरे दोस्त”) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 14 ☆ 

☆ ऐ मेरे दोस्त ☆ 

ऐ मेरे दोस्त

चल कहीं और चले

जहाँ झूठ, पाखंड से

लोग ना जाते हो छले

जहाँ मनमोहक सुगंध हो

समीर बह रहा मंद मंद हो

भ्रमरों की प्रणय लीला हो

मौसम बड़ा रंगीला हो

हर कली, हर फूल में

जहाँ प्यार पले

ऐ मेरे दोस्त —

जहाँ चाँद तारों की

शीतल छाँव हो

दुधिया चाँदनी में

नहाया गांव हो

ताजमहल सा अनूठा पन हो

दो आत्माओं का

पुनर्मिलन हो

शीतल चांदनी में

प्रेम की दिवानगी में

जहाँ दो जिस्म ढले

ऐ मेरे दोस्त–

जहाँ भूख और प्यास बसती हो

जिंदगी मौत से भी सस्ती हो

दर्द, पीड़ा, बेकारी से त्रस्त हो

फिर भी अपनी

गरीबी में मस्त हो

दिलों में ना हो छल कपट

बस जहाँ  हृदय में

सत्य की ज्योत जले

ऐ मेरे दोस्त–

दोस्त,

तू मुझे भगवान ना बना

इन्सान ही रहने दें

जमाने के दिये घाव

हसके सहने दे

लोग कहते है दीवाना

तो कहने दे

दया, करूणा, प्रेम का झरना

यूँ ही बहने दे

क्या खोया, क्या पाया

मत सोच

जहाँ अब जिंदगी की

है शाम ढले

ऐ मेरे दोस्त–

 

© श्याम खापर्डे 

18/10/2020

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

मो  9425592588

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – और रावण रह गया ☆ श्री राघवेंद्र दुबे

श्री राघवेंद्र दुबे

(ई- अभिव्यक्ति पर श्री राघवेंद्र दुबे जी का हार्दिक स्वागत है।  विजयादशमी पर्व पर आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा  “और रावण रह गया .)

☆ लघुकथा – और रावण रह गया ☆ 

एक बड़े नगर के बड़े भारी दशहरा मैदान में काफी भीड़ थी. लोगों के रेले के रेले चले आ रहे थे. आज रावण दहन होने वाला था. रावण भी काफी विशाल बनाया गया था.

ठीक रावण जलाने के वक्त पुतले में से एक आवाज आयी  ” मुझे वही आदमी जलाये जिस में राम का कम से कम एक गुण अवश्य हो। भीड़ में खलबली मच गई। तरह-तरह की आवाजें उभरने लगी। लेकिन थोड़ी देर बाद वातावरण पूर्ण शांत हो गया। कहीं से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी।

रावण ने आश्चर्य से नजरें झुका कर नीचे देखा तो मैदान में कोई नहीं था।

©  श्री राघवेंद्र दुबे

इंदौर

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सूचना/Information ☆ कथा संग्रह – ‘किती सावारावा तोल’ पुरस्कृत ☆ सुश्री नीलम माणगावे 

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

Kiti Sawarava Tol...

सुश्री नीलम माणगावे

कथा संग्रह – ‘किती सावारावा तोल’  पुरस्कृत

 

निवेदन-

ई- अभिव्यक्तीवर सातत्याने कविता लिहिणार्‍या नीलम माणगावे यांच्या ‘किती सावारावा तोल’ या कथासंग्रहाला, ‘कुंडल कृष्णाई पुरस्कार जाहीर झाला आहे. ई-अभिव्यक्ती तर्फे त्यांचे हार्दिक अभिनंदन.

? ई–अभिव्यक्ती परिवारातर्फे त्यांचे हार्दिक अभिनंदन आणि पुढच्या वाटचालीसाठी शुभेच्छा. ?

 

सम्पादक मंडळ (मराठी) 

श्रीमती उज्ज्वला केळकर 

Email- kelkar1234@gmail.com WhatsApp – 9403310170

श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

Email –  soorpandit@gmail.com) WhatsApp – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 21 ☆ संवाद…. ☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 21 ☆ 

☆ संवाद…. ☆

संवाद मन जिंकणारा असावा

संवाद मन तोडणारा नसावा…

 

संवादातून रम्य सोहळा घडावा

संवादातून प्रलय कधी न यावा…

 

संवाद साधता साधेपणा असावा

संवाद कधीच संधीसाधू नसावा …

 

संवाद मनाची अंतरे जपणारा

संवाद मनाची दुवे जाणणारा…

 

सु-संवाद होता शस्त्र गळून पडते

कु-संवाद होई, तर शस्त्र पाजळते…

 

संवाद सत्कार्यासाठी अवतरतो

या व्यतिरिक्त कट रचल्या जातो…

 

सुसंस्कृत असावे, दुष्कृत्य सोडावे

संवाद साधता, प्रेम द्यावे प्रेम घ्यावे…

 

© कवी म. मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन, वर्धा रोड नागपूर – 440005

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ गिऱ्हाईक ☆ सौ.नीलम माणगावे

सुश्री नीलम माणगावे

☆ कवितेचा उत्सव ☆ गिऱ्हाईक ☆ सुश्री नीलम माणगावे ☆

बस मधून जाता-येता

दिसतात मला त्या

रंगवलेल्या लालचुटुक ओठानी

गिऱ्हाईक हेरणाऱ्या!

काजळ भरल्या काळ्या डोहात

माणूसपण जपणार्‍या!

पोटच्या गोळ्याला

बापाचं नाव शोधणाऱ्या!

माझ्या सारख्याच दिसणाऱ्या….

हात, पाय, नाक, डोळे, कान

आणि मनसुद्धा असणाऱ्या,

माझ्याच जातीच्या

नखरेल पुतळ्या!

बाहेरून नटलेल्या

आतून फाटलेल्या

त्या….

त्या गिऱ्हाईक जपत असतात

टिचभर पोटासाठी

आणि आम्ही…. आम्ही ही एकुलतं का होईना

घरंदाज गिऱ्हाईकच तर जपत नसतो ना?

चिऊ-काऊच्या

घरट्यासाठी?

 

©  सुश्री नीलम माणगावे

जयसिंगपूर, जिल्हा कोल्हापूर

मो  9421200421

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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