हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ विजयादशमी पर्व विशेष ☆ रावण दहन ☆ श्री सदानंद आंबेकर

श्री सदानंद आंबेकर 

(श्री सदानंद आंबेकर जी की हिन्दी एवं मराठी साहित्य लेखन में विशेष अभिरुचि है। गायत्री तीर्थ  शांतिकुंज, हरिद्वार के निर्मल गंगा जन अभियान के अंतर्गत गंगा स्वच्छता जन-जागरण हेतु गंगा तट पर 2013 से  निरंतर प्रवास। आज प्रस्तुत है श्री सदानंद जी  का विजयादशमी पर्व पर एक विशेष लघुकथा  ” रावण दहन “। इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्री सदानंद जी की लेखनी को नमन । 

विजयादशमी पर्व विशेष ☆ रावण दहन ☆

दशहरे के दूसरे दिन सुबह चाय की चुस्कियों के साथ रामनाथ जी ने अखबार खोल कर पढना आरंभ किया। दूसरे ही पृष्ठ  पर एक बडे शहर में कुछ व्यक्तियों के द्वारा एक अवयस्क लडकी के  सामूहिक शीलहरण का समाचार बडे से शीर्षक  के साथ दिखाई दिया। पूरा पढने के बाद उनका मन जाने कैसा हो आया। दृष्टि  हटाकर आगे के पृष्ठ  पलटे तो एक  पृष्ठ पर समाचार छपा दिखा – नन्हीं नातिन के साथ नाना ने धर्म की शिक्षा देने के बहाने शारीरिक हमला किया, गुस्से के मारे वह पृष्ठ बदला ही था कि चौथे पन्ने पर बाॅक्स में समाचार छपा था – एक बडे नेता को लडकियों की तस्करी के आरोप में पुलिस ने दबोचा। वाह रे भारतवर्ष !! कहते हुये वे अगले पृष्ठ को पढ रहे थे कि रंगीन फोटो सहित समाचार सामने पड़ गया – मुंबई पुलिस ने छापा मार कर फिल्म जगत की बडी हस्तियों को गहरे नशे  की हालत में अशालीन अवस्था में गिरफ्तार किया- हे राम, हे राम कहकर आगे नजर दौडाई कि स्थानीय जिले का समाचार दिखाई दिया, नगर में एक बूढे दंपति को पैसों के लिये नौकर ने मार दिया और नगदी लेकर भाग गया। यह पढकर वे कुछ देर डरे रहे फिर लंबी सांस भर कर अखबार में नजर गड़ा दी। सातवें पृष्ठ का समाचार पढ कर उन्हें अपने युवा पोते का स्मरण हो आया, लिखा था- राजधानी में चंद पैसों और मौज-मस्ती के लिये युवा छात्र चेन झपटने, और मोटरसायकिल चोरी के आरोप में पुलिस द्वारा पकडे गये । इन युवाओं के आतंक की गतिविधियों में जुडे होने का संदेह भी व्यक्त किया गया था।

अंतिम पृष्ठ पर दशहरे पर रावण दहन की अनेक तस्वीरें छपी थीं जिन्हें देखकर रामनाथ सोचने लगे कि कल हमने किसे जलाया ????

©  सदानंद आंबेकर

शान्ति कुञ्ज, हरिद्वार (उत्तराखंड)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विजयादशमी पर्व विशेष ☆ त्यौहार दशहरा ☆ श्री विजय कुमार, सह सम्पादक (शुभ तारिका)

श्री विजय कुमार

(आज  विजयादशमी पर्व पर प्रस्तुत है श्री विजय कुमार जी, सह-संपादक शुभ तारिका  का आलेख  “बुराई पर अच्छाई का प्रतीक दशहरा महोत्सव ”)

☆ विजयादशमी पर्व विशेष –  बुराई पर अच्छाई का प्रतीक दशहरा महोत्सव ☆ 

हरियाणा में जलता है सबसे ऊंचा रावण

विश्व के सबसे ऊंचे रावण के पुतले के निर्माण के लिए पूरे विश्व में हरियाणा के अम्बाला जिला का बराड़ा कस्बा चर्चित रहा है। विश्व के सबसे ऊंचे रावण का पुतला दहन का प्रसारण वैसे तो राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा प्रत्येक वर्ष किया जाता है। इस अवसर पर कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण करने हेतु कई टेलीविजन चैनल्स की ओ बी वैन भी आयोजन स्थल पर आती हैं।

श्री रामलीला क्लब, बराड़ा (जिला अम्बाला) के संस्थापक अध्यक्ष श्री राणा तेजिन्द्र सिंह चैहान द्वारा विश्व का सबसे ऊंचा रावण बनाने का निरंतर कीर्तिमान स्थापित किया जा रहा है। इस उपलब्धि का सम्मान करते हुए भारत की एकमात्र सर्वप्रतिष्ठित कीर्तिमान संकलन पुस्तक ‘लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड’ के (2011 से 2017 तक) छह वार्षिक संकलनों में बराड़ा (हरियाणा) में निर्मित होने वाले विश्व के सबसे ऊंचे रावण के पुतले को सम्मानपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। भारत के इतिहास में निर्मित होने वाला अब तक का यह सबसे पहला व अद्भुत रावण का पुतला है जिसने किसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर की कीर्तिमान पुस्तक में छह बार अपने नाम का उल्लेख कराया हो। बराड़ा के सबसे ऊंचे रावण के पुतले को छह बार लिम्का बुक आॅफ रिकार्ड में स्थान प्राप्त होना वास्तव हरियाणावासियों के लिए गर्व का विषय है। इस उपलब्धि का श्रेय क्लब के सभी सदस्यों को, खासतौर पर क्लब के संस्थापक अध्यक्ष श्री राणा तेजिंद्र सिंह चैहान एवं उनके निर्देशन में काम करने वाले लगभग सौ मेहनतकश सदस्यों को जाता है।

श्री चैहान ने बताया कि उनके सहयोगी और वे हर वर्ष अपै्रल-मई माह से ही रावण बनाने का कार्य आरंभ कर देते हैं। अथक परिश्रम के बाद इसे दशहरे से दो-तीन दिन पूर्व दशहरा ग्राउंड में दर्शकों के देखने के लिये खड़ा कर दिया जाता है।

राणा तेजिन्द्र सिंह चैहान के अनुसार विश्व कीर्तिमान स्थापित करने वाले इस रावण के निर्माण का मकसद समाज में फैली सभी बुराइयों को अहंकारी रावण रूपी पुतले में समाहित करना है। पुतले की 210 फुट की ऊंचाई सामाजिक बुराइयों एवं कुरीतियों जैसे अहंकार, आतंकवाद, कन्या भू्रण हत्या, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, बढ़ती जनसंख्या, दहेजप्रथा तथा जातिवाद आदि का प्रतीक है। रावण दहन के समय आतिशबाजी का भी एक उच्चस्तरीय आयोजन किया जाता है।

विजयदशमी के दिन दशहरा ग्राउंड में प्रत्येक वर्ष लाखों लोगों की उपस्थिति में रिमोट कंट्रोल का बटन दबाकर विश्व कीर्तिमान स्थापित करने वाले इस विश्व के सबसे ऊंचे रावण के पुतले को अग्नि को समर्पित किया जाता रहा है।

श्रीरामलीला क्लब, बराड़ा विश्वस्तरीय ख्याति अर्जित कर चुका है। सामाजिक बुराइयों के प्रतीक विश्व के सबसे ऊंचे रावण के पुतले का निर्माण किए जाने का कीर्तिमान इस क्लब ने स्थापित किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सहयोगियों व शुभचिंतकों के समर्थन व सहयोग के बिना किसी भी संस्था का शोहरत की बुलंदी पर पहुंचना संभव नहीं होता।

रावण को प्रकांड पंडित वरदानी राक्षस कहा जाता था। लेकिन कैसे वो, जिसके बल से त्रिलोक थर-थर कांपते थे, एक स्त्री के कारण समूल मारा गया? वो भी वानरों की सेना लिये एक मनुष्य से। इन बातों पर गौर करें तो ये मानना तर्क से परे होगा। लेकिन रावण के जीवन के कुछ ऐसे रहस्य हैं, जिनसे कम ही लोग परिचित होंगे। पुराणों के अनुसार  –

कैसे हुआ रावण का जन्म?

रावण एक ऐसा योग है जिसके बल से सारा ब्रह्माण्ड कांपता था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वो रावण जिसे राक्षसों का राजा कहा जाता था वो किस कुल की संतान था। रावण के जन्म के पीछे के क्या रहस्य हैं? इस तथ्य को शायद बहुत कम लोग जानते होंगे। रावण के पिता विश्वेश्रवा महान ज्ञानी ऋषि पुलस्त्य के पुत्र थे। विश्वेश्रवा भी महान ज्ञानी सन्त थे। ये उस समय की बात है जब देवासुर संग्राम में पराजित होने के बाद सुमाली माल्यवान जैसे राक्षस भगवान विष्णु के भय से रसातल में जा छुपे थे। वर्षों बीत गये लेकिन राक्षसों को देवताओं से जीतने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। एक दिन सुमाली अपनी पुत्री कैकसी के साथ रसातल से बाहर आया, तभी उसने विश्वेश्रवा के पुत्र कुबेर को अपने पिता के पास जाते देखा। सुमाली कुबेर के भय से वापस रसातल में चला आया, लेकिन अब उसे रसातल से बाहर आने का मार्ग मिल चुका था। सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी से कहा कि पुत्री वह उसके लिए सुयोग्य वर की तलाश नहीं कर सकता इसलिये उसे स्वयं ऋषि विश्वेश्रवा के पास जाना होगा और उनसे विवाह का प्रस्ताव रखना होगा। पिता की आज्ञा के अनुसार कैकसी ऋषि विश्वेश्रवा के आश्रम में पहुंच गई। ऋषि उस समय अपनी संध्या वंदन में लीन थे। आंखें खोलते ही दृष्टि ने अपने सामने उस सुंदर युवती को देखकर कहा कि वे जानते हैं कि उसके आने का क्या प्रयोजन है? लेकिन वो जिस समय उनके पास आई है वो बेहद दारुण वेला है जिसके कारण ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने के बाद भी उनका पुत्र राक्षसी प्रवृत्ति का होगा। इसके अलावा वे कुछ नहीं कर सकते। कुछ समय पश्चात् कैकसी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसके दस सिर थे। ऋषि ने दस शीश होने के कारण इस पुत्र का नाम दसग्रीव रखा। इसके बाद कुंभकर्ण का जन्म हुआ जिसका शरीर इतना विशाल था कि संसार में कोई भी उसके समकक्ष नहीं था। कुंभकर्ण के बाद पुत्री सूर्पणखा और फिर विभीषण का जन्म हुआ। इस तरह दसग्रीव और उसके दोनों भाई और बहन का जन्म हुआ।

रावण ने क्यों की ब्रह्मा की तपस्या?

ऋषि विश्वेश्रवा ने रावण को धर्म और पांडित्य की शिक्षा दी। दसग्रीव इतना ज्ञानी बना कि उसके ज्ञान का पूरे ब्रह्माण्ड में कोई सानी नहीं था। लेकिन दसग्रीव और कुंभकर्ण जैसे जैसे बड़े हुए उनके अत्याचार बढ़ने लगे। एक दिन कुबेर अपने पिता ऋषि विश्वेश्रवा से मिलने आश्रम पहुंचे तब कैकसी ने कुबेर के वैभव को देखकर अपने पुत्रों से कहा कि तुम्हें भी अपने भाई के समान वैभवशाली बनना चाहिए। इसके लिए तुम भगवान ब्रह्मा की तपस्या करो। माता की आज्ञा मान तीनों पुत्र भगवान ब्रह्मा के तप के लिए निकल गए। विभीषण पहले से ही धर्मात्मा थे। उन्होंने पांच हजार वर्ष एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप करके देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद पांच हजार वर्ष अपना मस्तक और हाथ ऊपर रखकर तप किया जिससे भगवान ब्रह्मा प्रसन्न हुए और विभीषण ने भगवान से असीम भक्ति का वर मांगा।

क्यों सोता रहा कुंभकर्ण?

कुंभकर्ण ने अपनी इंद्रियों को वश में रखकर दस हजार वर्षों तक कठोर तप किया। उसके कठोर तप से भयभीत होकर देवताओं ने देवी सरस्वती से प्रार्थना की। तब भगवान से वर मांगते समय देवी सरस्वती कुंभकर्ण की जिह्ना पर विराजमान हो गईं और कुंभकर्ण ने इंद्रासन की जगह निंद्रासन मांग लिया।

रावण ने किससे छीनी लंका?

दसग्रीव अपने भाइयों से भी अधिक कठोर तप में लीन था। वो प्रत्येक हजारवें वर्ष में अपना एक शीश भगवान के चरणों में समर्पित कर देता। इस तरह उसने भी दस हजार साल में अपने दसों शीश भगवान को समर्पित कर दिये। उसके तप से प्रसन्न हो भगवान ने उसे वर मांगने को कहा तब दसग्रीव ने कहा कि देव दानव गंधर्व किन्नर कोई भी उसका वध न कर सकें। वो मनुष्यों और जानवरों को कीड़ों की भांति तुच्छ समझता था। इसलिये वरदान में उसने इनको छोड़ दिया। यही कारण था कि भगवान विष्णु को उसके वध के लिए मनुष्य अवतार में आना पड़ा। दसग्रीव स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने लगा था। रसातल में छिपे राक्षस भी बाहर आ गये। राक्षसों का आतंक बढ़ गया। राक्षसों के कहने पर लंका के राजा कुबेर से लंका और पुष्पक विमान छीनकर स्वयं बन गया लंका का राजा।

कैसे हुआ रावण का वध?

मां दुर्गा के प्रथम रूप शैलपुत्री की पूजा के साथ नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के साथ ही साथ भगवान राम का भी ध्यान पूजन किया जाता है। क्योंकि इन्हीं नौ दिनों में भगवान राम ने रावण के साथ युद्ध करके दशहरे के दिन रावण का वध किया था जिसे ‘अधर्म पर धर्म की विजय’ के रूप में जाना जाता है।

भगवान राम का जन्म लेना और रावण का वध करना यह कोई सामान्य घटना नहीं है। इसके पीछे कई कारण थे जिसकी वजह से विष्णु को राम अवतार लेना पड़ा।

अपनी मौत का कारण सीता को जानता हुआ भी रावण सीता का हरण कर लंका ले गया। असल में यह सब एक अभिशाप के कारण हुआ था।

यह अभिशाप रावण को भगवान राम के एक पूर्वज ने दिया था। इस संदर्भ में एक कथा है कि बल के अहंकार में रावण अनेक राजा-महाराजाओं को पराजित करता हुआ इक्ष्वाकु वंश के राजा अनरण्य के पास पहुंचा। राजा अनरण्य और रावण के बीच भीषण युद्ध हुआ। ब्रह्मा जी के वरदान के कारण अनरण्य रावण के हाथों पराजित हुआ। रावण राजा अनरण्य का अपमान करने लगा।

अपने अपमान से क्रोधित होकर राजा अनरण्य ने रावण को अभिशाप दिया कि तूने महात्मा इक्ष्वाकु के वंशजों का अपमान किया है इसलिए मेरा शाप है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा दशरथ के पुत्र राम के हाथों तुम्हारा वध होगा।

ईश्वर विधान के अनुसार भगवान विष्णु ने राम रूप में अवतार लेकर इस अभिशाप को फलीभूत किया और रावण राम के हाथों मारा गया।

 

©  श्री विजय कुमार

सह-संपादक ‘शुभ तारिका’ (मासिक पत्रिका)

संपर्क – 103-सी, अशोक नगर, अम्बाला छावनी-133001, मो.: 9813130512

ई मेल- urmi.klm@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विजयादशमी पर्व विशेष ☆ त्यौहार दशहरा ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’विजयादशमी पर्व पर आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता  “त्यौहार दशहरा.)

☆ विजयादशमी पर्व विशेष –  त्यौहार दशहरा ☆ 

राम चरित की शक्ति  है

त्योहार दशहरा

धर्म विजय की अमरबेल

त्योहार दशहरा।।

 

दुष्टों के संहार हेतु ही

शस्त्र उठाने पड़ते हैं

हर युग में ही राम

शत्रु से लड़ते हैं।।

 

पुण्य पावनी धरती पर

सत्य सदा ही जीतेगा

युगों-युगों से काल चक्र

इस तरह सदा ही बीतेगा।।

 

सन्देश सदा ये देता आया

शत्रु स्वयं के पहचानो

अहम, क्रोध,लोभ, घृणा को

जितना हो जल्दी जानो।।

 

सबको ही सत प्रेम बाँटकर

हर अच्छाई को ठानो

मन पापों से मुक्त रहेगा

राम-कृष्ण को ही मानो।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 26 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 26 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 26) ☆ 

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 26☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

मेरी ना सही, तो ना सही

तो आपकी  होनी चाहिए,

तमन्ना किसी एक की तो

जरूर पूरी होनी चाहिए…

 

No problem, if not mine, then

Your wish should be met,

But  the  desire  of atleast

One of us  must  be fulfilled…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

किसी ने मुझसे पूछा कि

दर्द  की  कीमत क्या है?

मैंने कहा, मुझे नहीं पता…

मुझे तो मुफ्त में ही मिला

बस कुछ लोगों पर हद से

ज्यादा  यकीन  किया था!

 

Someone  asked  me…

what is the cost of pain

I  said, I  don’t  know

since I  got  it  for free

I only believed in  some

people to  the extreme!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

ये  भी कैसा अजब नशा है

किस  गजब ख़ुमार  में हूँ,

तू आ के जा भी चुका है

और मैं तेरे इंतज़ार में हूँ…

 

What type of strange

intoxication  is  this

What  an  amazing

hangover  I  am  in…

 

You have come

and  gone  also

And,  I  am  still      

waiting for you…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेरू का मकबरा भाग-2 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  कशी निवासी लेखक श्री सूबेदार पाण्डेय जी द्वारा लिखित कहानी  “शेरू का मकबरा भाग-1”. इस कृति को अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य प्रतियोगिता, पुष्पगंधा प्रकाशन,  कवर्धा छत्तीसगढ़ द्वारा जनवरी 2020मे स्व0 संतोष गुप्त स्मृति सम्मान पत्र से सम्मानित किया गया है। इसके लिए श्री सूबेदार पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – शेरू का मकबरा भाग-2 – 

शेरू का प्यार—–
आपने पढ़ा कि शेरू मेरे परिवार में ही पल कर जवान हुआ घर के सदस्य ‌की तरह ही परिवार में घुल मिल गया था।अब पढ़ें——-

बच्चे जब उसका नाम लें बुलाते वह कहीं होता दौड़ लगाता चला आता और वहीं कहीं बैठ कर अगले पंजों के बीच सिर सटाये टुकुर टुकुर निहारा करता। बीतते समयांतराल के बाद शेरू नौजवान हो गया, उसके मांसल शरीर पर चिकने भूरे बालों वाली त्वचा, पतली कमर, चौड़ा सीना‌ ऐठी पूंछ लंबे पांव उसके ताकत तथा वफादारी की कहानीं बयां करते। उसका चाल-ढाल रूप-रंग देख लगता जैसे कोई फिल्मी पोस्टर फाड़ कोई बाहुबली हीरो निकल पड़ा हो। उसे दिन के समय जंजीर में बांध कर रखा जानें लगा था, क्यों कि वह अपरिचितों को देख आक्रामक‌ हो जाता और जब  मुझ से मिलने वाले कभी‌ हंसी मजाक में भी‌ मुझसे हाथापाई करते तो वह मरने मारने पर उतारू हो जाता तथा अपनी स्वामी भक्ति का अनोखा उदाहरण ‌प्रस्तुत करता। जब कभी ‌मैं शाम को नौकरी से छूट घर आता तो शेरू और मेरे पोते में होड़ लग जाती ‌पहले गोद में चढ़ने की।

वे दोनों ही मुझे कपड़े भी उतारने तक का अवसर देना नहीं चाहते थे। अगर कभी पहले पोते को गोद उठा लेता तो शेरू मेरी गोद में अगले पांव उठाते चढ़ने का असफल प्रयास करता। अगर पहले शेरू को गोद ले लेता तो पोता रूठ कर एड़ियां रगड़ता लेट कर रोने लगता। वे दोनों मेरे प्रेम पर अपना एकाधिकार ‌समझते। कोई भी सीमा का अतिक्रमण बर्दास्त करने के लिए तैयार नहीं।

इन परिस्थितियों में मैं कुर्सी‌ पर बैठ जाता। एक हाथ में पोता तथा दूसरा हाथ शेरू बाबा के सिर पर होता तभी शेरू मेरा पांव चाट अपना प्रेम प्रदर्शित करता। उन परिस्थितियों में मैं उन दोनों का प्यार पा निहाल हो जाता । मेरी खुशियां दुगुनी हो जाती, मेरा दिन भर का तनाव थकान सारी पीड़ा उन दोनों के प्यार में खो जाती। और मै उन मासूमों के साथ खेलता अपने बचपने की यादों में खो जाता,।

अब शेरू जवानी की दहलीज लांघ चुका था वह मुझसे इतना घुल मिल गया था कि मेरी परछाई बन मेरे साथ रहने लगा था। जब मैं पाही पर खेत में होता तो वह मेरे साथ खेतों की रखवाली करता,वह जब नीलगायों के झुण्ड, तथा नँदी परिवारों अथवा अन्य किसी‌ जानवर को देखता तो उसे दौड़ा लेता उन्हे भगा कर ही शांत होता। मुझे आज भी ‌याद है वो दिन जब मैं फिसल कर गिर गया था मेरे दांयें पांव की हड्डी टूट गई थी।  मैं हास्पीटल जा रहा था ईलाज करानें। उस समय शेरू भी चला था मेरे पीछे अपनी स्वामीभक्ति निभाने, लेकिन अपने गांव की सीमा से आगे बढ़ ही नहीं पाया। बल्कि गांव सीमा पर ही अपने बंधु-बांधवों द्वारा घेर लिया गया और अपने बांधवों के झांव झांव कांव कांव से अजिज हताश एवम् उदास मन से वापस हो गया था।

उसे देखनें वालों को ऐसा लगा जैसे उसे अपने कर्त्तव्य विमुख होने का बड़ा क्षोभ हुआ था और उसी व्यथा में उसने  खाना पीना भी छोड़ दिया था। वह उदास उदास घर के किसी कोने में अंधेरे में पड़ा रहता।  उसकी सारी खुशियां कपूर बन कर उड़ गई थी। उस दिन शेरू की उदासी घर वालों को काफी खल रही थी। उसकी स्वामिभक्ति पर मेरी पत्नी की आंखें नम हो आईं थीं।

मेरे घर में शेरू का मान और बढ़ गया था। महीनों बाद मैं शहर से लौटा था। मेरे पांवों पर सफेद प्लास्टर चढ़ा देख शेरू मेरे पास आया मेरे पांवों को सूंघा और मेरी विवशता का एहसास कर वापस उल्टे पांव लौट पड़ा और थोड़ी दूर जा बैठ गया तथा उदास मन से मुझे एक टक निहार रहा था।
उस घड़ी मुझे एहसास हुआ जैसे वह मेरे शीघ्र स्वस्थ्य होने की विधाता से मौन प्रार्थना कर रहा हो। उसकी सारी चंचलता कहीं खो गई थी। ऐसा मे जब मैं सो रहा होता तो वह मेरे सिरहाने बैठा होता। जब किसी चीज के लिए प्रयासरत होता  तो वह चिल्ला चिल्ला आसमान सर पे उठा लेता और लोगों को घर से बाहर आने पर मजबूर कर देता।

आज भी मुझे याद है वह दिन जिस दिन मेरा प्लास्टर कटा था,उस दिन शेरू बड़ा खुश था ऐसा। लगा जैसे सारे ज़माने की खुशियां शेरू को एक साथ मिली हो। वह आकर अपनी पूंछ हिलाता मेरे पैरों से लिपट गया था। जब मैं ने पर्याय से उसका सिर थपथपाया तो उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े थे और मैं एक जानवर का पर्याय पा उसकी संवेदनशीलता पर रो पड़ा था ।

—– क्रमशः भाग 3

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 26 ☆ नमन मीनाक्षी सुवाचा…. ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आचार्य जी  की एक रचना  नमन मीनाक्षी सुवाचा….। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 26 ☆ 

नमन मीनाक्षी सुवाचा….☆ 

अरुण अर्णव लाल-नीला

अहम् तज मन रहे ढीला

स्वार्थ करता लाल-पीला

छंद लिखता नयन गीला

संतुलन चाबी, न ताला

बिना पेंदी का पतीला

 

नमन मीनाक्षी सुवाचा

गगन में अरविंद साँचा

मुकुल मन ने कथ्य बाँचा

कर रहा जग तीन-पाँचा

मंजरी सज्जित भुआला

 

पुनीता है शक्ति वर ले

विनीता मति भक्ति वर ले

युक्तिपूर्वक जिंदगी जी

मुक्ति कर कुछ कर्म वर ले

काल का सब जग निवाला

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

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≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजयादशमी पर्व विशेष ☆ दस-याच्या दिनी .. . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं।आज विजयादशमी पर्व पर प्रस्तुत है एक कविता  “दस-याच्या दिनी .. . ! )

☆ विजयादशमी पर्व विशेष ☆ दस-याच्या दिनी .. . !  

दस-याच्या दिनी

पाहू नको मागे

पंख प्रयत्नांचे

जाणिवांचे धागे. …!

 

दस-याच्या दिनी

दुष्कर्माचा नाश

सीमोलंघनाचे

निरभ्र आकाश….!

 

दस-याच्या दिनी

आपट्याचे पान

ऐकुयात सारे

ह्रदयाचे गान…..!

 

दस-याच्या दिनी

बीज विचारांचे

प्रतिभेचे विश्व

रोप जीवनाचे. ….!

 

दस-याच्या दिनी

हाक अंतराची

झेपावली भाषा

ओढ काळजाची. …!

 

दस-याच्या दिनी

ग्रंथ पुजा करू

माता शारदेचे

रूप ध्यानीं धरू…!

 

दस-याच्या दिनी

संस्कारांचा पाया

यश कर्तृत्वाने

उजळावी काया. ….!

 

दस-याच्या दिनी

काव्या रूप यावे

लेकीसवे बापा

जगी ओळखावे. …!

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ देवीचे नवरंगी नवरात्र ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ कवितेचा उत्सव ☆ देवीचे नवरंगी नवरात्र ☆ सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆ 

पहिल्या माळेला रंग करडा,

देवीला देऊ या मानाचा विडा!

दुसरी माळ सजे केशरी रंगाने,

सजवी देवीला झेंडूच्या हाराने!

पांढऱ्या रंगाची माळ तिसरी,

पावित्र्य घेऊन आली साजरी!

लाल रंग घेऊन चौथी माळ आली

जास्वंदीची लाली देवीच्या गाली!

पाचव्या माळेला निळे आभाळ,

कुंकुमार्चनाने खुले देवीचे भाळ!

शेवंतीची फुले वाहू सहाव्या माळेला,

पिवळ्या रंगाचा शालू शोभे देवीला!

सातव्या माळेला हिरव्या ची किमया,

देवीला भरू या बांगड्या हिरव्या!

आठवी माळ करी जांभळ्याची उधळण!

देवीला खेळाया मंदिराचे प्रांगण!

नववी माळ सजे गुलाबी रंगाने,

देवी सौख्य देई गुलबक्षी साजाने!

नवरंगाची पखरण होई नऊ दिवस,

दसर्यास सज्ज होई देवी सीमोल्लंघनास !

 

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ न्यूज पाहून सुचले सारे ☆ श्री अमोल अनंत केळकर

श्री अमोल अनंत केळकर

☆ कवितेचा उत्सव ☆ न्यूज पाहून सुचले सारे ☆ श्री अमोल अनंत केळकर ☆ 

(हरघडी ‘ब्रेकींग न्यूज’ पाहून तत्काल ‘टुकार’ विडंबनाच्या जिलबया पाडणार्‍या सर्व ‘सुमार’ कवींना समर्पित. मूल गाणे – शब्दावाचून कळले सारे, शब्दांच्या पलिकडले)

 

न्यूज पाहून सुचले सारे, ‘टुकार’च्या पलिकडले

प्रथम कडवे रचले आणिक लिहू नये ते लिहिले.

अर्थ नवा काव्यास मिळाला’

बूट जुना पण गाल सुजला

त्या दिवशी का प्रथमच माझे ‘विडंबन’ अडखळले.

जुळवितो यमकांना रात्री

लक्ष विचार सुचतील खात्री

‘विसंगती’त या विश्वाच्या, रहस्य मज उलगडले।

न्यूज पाहून सुचले सारे, ‘टुकार’च्या पलिकडले

प्रथम कडवे रचले आणिक लिहू नये ते लिहिले.

 

©  श्री अमोल अनंत केळकर

नवी मुंबई, मो ९८१९८३०७७९

मैफिल ग्रुप सदस्य

poetrymazi.blogspot.in, kelkaramol.blogspot.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सहभोजन….. ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे

☆ विविधा ☆ सहभोजन….. ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे 

सहभोजने: वनातली, शेतातली आणि मनातली!!

कुणीतरी म्हटलेय ना!  निसर्गाच्या सानिध्यात एकत्र जेवा. मग पहा!  मनातली सगळी किल्मिष निघून जातील आणि स्वच्छ मनात नव्या नात्यांचे आणि नव्या मैत्रीचे गोफ विणले जातील. याचे कारण म्हणजे या जेवणानंतर होणारे उपस्थितांचे विविध गुणदर्शनाचे कार्यक्रम,  आणि त्यामधून व्यक्त होणारी त्यांची अंतरे!!!

कोजागिरी पौर्णिमा, शाळेतले हदगा विसर्जन, केळवणे,  डोहाळजेवणे, ट्रेकिंगच्या वेळचे कॅम्प फायर… कितीतरी… माझ्या नशिबाने मी अशी सहभोजने खूप आणि वेगवेगळ्या लोकांबरोबर आणि वेगवेगळ्या ठिकाणी अनुभवलेली आहेत.

त्या सहभोजनांच्या वेळी खाण्याच्या पदार्थांची चव तर खुलतेच पण त्यासाठी आलेली माणसेही खुलतात आणि मनापासून उलगडतात. तेव्हा आपल्याला अजिबात अज्ञात असलेले त्यांच्यातले कला गुणही कळतात.

अशाच एका प्रसंगाच्या वेळी..एरवी सतत सर्वांवर करवादत असलेल्या माझ्या एका आत्याला केशवसुतांच्या कितीतरी कविता आणि गडकरींच्या नाटकातले उतारे पाठ आहेत हे कळल्यावर तिच्याकडे पहायचा दृष्टिकोनच बदलला.

अनेकदा आम्ही त्यावेळी ‘जस्ट ए मिनिट’  हा खेळ खेळत असू. यामध्ये आपल्या शेजारी बसलेल्या व्यक्तीने आपल्याला एखादा विषय द्यायचा आणि त्या विषयावर आपण मिनिटभर विचार करून बोलायचे.  यावेळी लोकांची खरी ओळख व्हायची.  त्यांच्याबद्दलचा आदरही दूणावायचा.

माझ्या त्या सहभोजनविशिष्ट आठवणींच्या पोतडीतल्या काही खास आठवणी आज मी इथे पेश करते आहे.

नवरात्र दिवाळी संपली की आमचे हिंगणघाटचे आजोबा,  ‘अंगणातल्या स्वैपाकाचा म्हणजे पानगे वरणाचा बेत जाहीर करत.  सर्वांनाच मोठा उल्हास येई. खरे तर पानगे वरण हा स्वैपाक घरातली पुरुष मंडळी करत.  पण त्याची तयारी मात्र अर्थातच बायकांना करावी लागे.

अंगणात काट्या कुटक्या गोळा होत. तुराट्या आणल्या जात.  पळसाची आणि वडाची पाने जमवली जात. आजी मिरच्याचा ठेचा,  जवस आणि तीळाच्या चटण्या करून ठेवी. गव्हाची जाडसर कणिक दळून आणे.

बहुधा सुट्टीच्या दिवसात हा बेत जमवत असल्यामुळे शेजारी पाजारी आणि जवळपासची नातेवाईक मंडळी या सर्वांना त्याचे निमंत्रण जाई.

भल्या सकाळी अंगणातली चूल सारवून घेत आणि त्यावर तूरीच्या वरणाचे मोठ्ठे पातेले चढे.  पुरूष मंडळी धोतर खोचून भरपूर तूप घालून मोठ्या परातीत कणिक भिजवत.  त्याचे गोळे पळसाच्या पानात बांधत आणि ते निखा-यांवर भाजायला ठेवत. पान जळले की आतले पानगे शिजत. जळलेल्या पानासकट पानगे वाढले जात.  ती पाने काढणे कौशल्याचे असे. मग ते गरम गरम पानगे मधोमध फोडायचे आणि मग त्यात ते वाढणारे तूप ओतायचे. हे पानगे द्रोणात वाढलेल्या तूरीच्या गोड वरणात  भरपूर तूप घालून  खाल्ले जात.

दुसर्‍या बाजूच्या निखा-यावर विशेषतः तरूण मंडळी भरपूर तेल घालून कणिक भिजवत आणि तर्री मसाला घालून तिखटजाळ फोडणीचे वरण करत.

हे सगळं होत असताना बायका पत्रावळ्या आणि द्रोण लावत आणि अखंड बडबड करत. मुले इकडून तिकडे पळापळी करत.

यावेळी पहिली पंगत बायका आणि मुलांची बसे… आग्रह करकरून पुरुष मंडळी वाढत. जेवण झाल्यावर विविध गुणदर्शन…  स्त्रिया आणि पुरूष अशा गाण्याच्या, कधी स्वरचित गाण्याच्या भेंड्या होत.   एकमेकांना कोपरखळ्या मारत.  बरोबर नेम बसायचा.

कधी कधी घरात केलेले जेवणाचे पदार्थ आणि लोणचं घेऊन एखाद्या बागेत जायची पध्दत होती.  शेजारच्या चार पाच घरांमध्ये बेत ठरायचा आणि रोजचे नेहमीचेच जेवण खूप रूचकर बनायचे.

सगळ्यात मजा यायची ती आवळीभोजनाला, हे बहुधा आळीतल्या किंवा भिशीतल्या बायका ठरवत.  प्रत्येक जण जेवणातले वेगवेगळे पदार्थ घेऊन येण्याची जबाबदारी वाटून घेई . सांज्याच्या पोळ्या, साध्या पोळ्या,  पु-या, बटाट्याची भाजी, घट्ट पिठले, दहीभात, चटण्या आणि लोणची,  आवळ्याचे लोणचे असावेच लागे.   असे पदार्थ असत.  शिवाय पेरू आणि बोरेपण आणत.

यावेळीही गाण्याच्या भेंड्या, उखाणे, बैठे खेळ रंगायचे. चारच्या सुमाराला सगळ्या बायका मिळून कच्चा चिवडा करत. एरवी घरात अगदी हळू आवाजात बोलणा-या  आणि पदर तोंडावर ठेवून हसणा-या बायका तिथे मोठमोठ्यांदा बोलत आणि हसत.

त्यामुळेच की काय कोण जाणे दिवस उतरायला आला की  घरी परतताना पावले जड होत.

माझ्या वर्धेच्या काकांनाही  पाहुणे आले की गावाबाहेर पेरूच्या मळ्यात, झाडाखाली जेवायला जायला अतिशय आवडे.  काकू पालक परोठे,  लोणचे, शेंगदाण्याची चटणी करून बरोबर घेत.  बाहेरच्या मोकळ्या हवेत चार घास जास्त जात.  आपसातली भांडणे विरून जात.

या सगळ्यांवरची कडी म्हणजे… हुर्डा पार्टी,  आजीच्या माहेरी वैद्यांची हुर्डापार्टी आणि तळेगावकर देशपांड्यांची हुर्डा पार्टी दोन्हीही खासच असत.  पण देशपांड्यांकडे हुर्डा पार्टीच्या वेळी काका मोठ्या आकाराचे गोड साखरेचे पेढेही कधीतरी आणत.  कोवळी ज्वारीची कणसे निखा-यावर भाजून त्यातले कोवळे दाणे पत्रावळीवर देत.

त्याबरोबर निखा-यावर वांगे,  टोमॅटो, कांदे आणि मिरच्या भाजून केलेले भरीत असे.  प्रत्येकाला द्रोण भरभरून दही साखर आग्रह करकरून खायला घालत. शेतातले कच्चे मूळे,  गाजर कांदे,  टोमॅटो, पेरू चिरून देत. कोवळ्या तूरीच्या शेंगा आणि बोरे खाऊन पोट गच्च भरायचे.  मनसोक्त शेतात हुंदडून झाले की घरी परतताना प्रत्येकाला भाजलेला हुरडा आणि शेतातली भाजी द्यायची पध्दत वैद्यांकडे होती. यावेळीही हास्यविनोदाचे फवारे उडत.

कधीतरी घरात कोणत्यातरी निमित्ताने पाहुणे जमले की एखाद्या शेतात,  देवळाजवळ स्वैपाक करायची टूम निघे.  अशावेळी घरातून फक्त पोळ्या करून घेत.  तिथे चूल मांडून  एका मोठ्या हांड्यात पाणी उकळत . त्या पाण्यात डाळ,  टोमॅटो, मिरच्या, वांगे,  मूळे,  भोपळ्याच्या फोडी,  बोरे भुईमुगाच्या शेंगा अशा असतील त्या भाज्या घालत. उपलब्ध असतील ते मसाले घालत आणि अक्षरशः  भाज्या आणि डाळीचे असे काही चवदार मिश्रण तयार होई की त्याची सर घरात बनवलेल्या कोणत्याही भाजीला येत नसे.  कधी कधी मात्र तिखट चमचमीत वांग्याची भाजी किंवा विदर्भ स्पेशल मसाले भरून अख्ख्या भोपळ्याचे गाकर बने…

कोल्हापूरला राजारामपुरीत मुडशिंगीकरांच्या वाड्यात रहात असताना त्यांच्या गच्चीवर आपापली ताटे घेऊनही कितीदा एकत्र जेवत असू किंवा मुडशिंगीच्या त्यांच्या शेतात किंवा त्यांच्या गु-हाळावर सगळे बि-हाडकरू एकत्र जेवायला जात असू. अशा वेळी जून्या आठवणी निघत. अनुभवांचे खजिने रिते होत. कितीतरी माहितीची देवाणघेवाण होई.

या सहभोजनांच्या आणि विशेषतः त्यानंतरच्या गप्पांच्या स्मृती माझ्या रसनेने आणि अर्थातच मनातही जपलेल्या आहेत.

त्या अधून मधून बाहेर पडतात.  मग मी या लाॅकडाऊनच्या काळात… आमच्या कोल्हापूरच्या घरातही दुपारच्या चहाच्या वेळी कच्चा चिवडा नाहीतर दडपे पोहे करते आणि कर्दळीच्या पानात घेऊन …आंब्याच्या झाडाखाली बसून एकटीच खाते. त्यावेळी संगतीला सोबत माणसे नसली तरी असतात त्या आठवणी आणि पाखरांची गाणी!

©  डॉ. मंजुषा देशपांडे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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