हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ विचारणीय ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆  विचारणीय

मैं हूँ

मेरा चित्र है;

थोड़ी प्रशंसाएँ हैं

परोक्ष, प्रत्यक्ष

भरपूर आलोचनाएँ हैं,

मैं नहीं हूँ

मेरा चित्र है;

सीमित आशंकाएँ

समुचित संभावनाएँ हैं,

मन के भावों में

अंतर कौन पैदा करता है-

मनुष्य का होना या

मनुष्य का चित्र हो जाना…?

प्रश्न विचारणीय

तो है मित्रो!

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(शुक्रवार, 11 मई 2018, रात्रि 11:52 बजे)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 51 ☆ व्यंग्य – मानहानि का मुकदमा यानी फेसवाश ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  मानहानि के मुकदमों के अंजाम पर आधारित एक अतिसुन्दरव्यंग्य  “मानहानि का मुकदमा यानी फेसवाश ।   श्री विवेक जी ने उस मानहानि का भी जिक्र किया है जो पारिवारिक होती हैं और कदाचित वैसे ही रफा दफा हो जाती हैं जैसी ….. .  श्री विवेक जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर व्यंग्य के लिए नमन । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 51 ☆ 

☆ व्यंग्य – मानहानि का मुकदमा यानी फेसवाश 

 व्यंग के हर पंच पर किसी न किसी की मानहानि ही की जाती है, ये और बात है कि सामने वाला उसका नोटिस लेता है या नही, और व्यंगकार को मानहानि का नोटिस भेजता है या नही. व्यंगकार अपनी बात का सार्वजनिककरण इनडायरेक्ट टेंस में कुछ इस तरह करता है कि सामने वाला टेंशन में तो होता है पर मुस्करा कर टालने के सिवाय उसके पास दूसरा चारा नहीं होता.लेकिन जब बात सीधी टक्ककर की ही हो जाये तो मानहानि का मुकदमा बड़े काम आता है. सार्वजनिक जीवन में स्वयं को बहुचर्चित व अति लोकप्रिय होने का भ्रम पाले हुये किसी शख्सियत को जब कोई सीधे ही मुंह पर कालिख मल जाये तो तुरंत डैमेज कंट्रोल में, बतौर फेसवाश  मानहानि का मुकदमा किया जाता है. जब  समय के साथ मुकदमें की पेशी दर पेशी, मुंह की कालिख कुछ कम हो जाये, लोग मामला भूल जायें तो आउट आफ कोर्ट माफी वगैरह के साथ मामला सैट राइट हो ही जाता है. लेकिन यह तय है कि रातो रात शोहरत पाने के रामबाण नुस्खों में से एक है मानहानि के मुकदमें में किसी पक्ष का हिस्सा बन सकना.  मैं भी बड़े दिनो से लगा हुआ हूं कि कोई तो मुझे मानहानि का नोटिस भेजे और अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर छपते व्यंगो में बतौर लेखक मेरा नाम  अंदर के पन्ने से उठकर कवर पेज पर बाक्स न्यूज में  पढ़ा जाये. पर  मेरी तमाम कोशिशो के बाद भी मेरी पत्नी के सिवाय कोई अब तक मुझसे खफा ही नही हुआ. और पत्नी से तो मैं सारे मुकदमें पहले ही हारा हुआ हूं. पुराने समय में साले सालियो की तमाम सावधानियो के बाद भी जीजा और फूफा  वगैरह की मानहानि हर वैवाहिक आयोजन का एक अनिवार्य हिस्सा होता था. मामला घरेलू होने के कारण मानहानि के मुकदमें के बदले रूठने, और मनाने का सिलसिला चलता था. किसकी शादी में कौन से जीजा कैसे रूठे और कैसे माने थे यह चर्चा का विषय रहता था.

लोक जीवन में देख लेने की धमकी,धौंस जमाकर निकल लेना आदि  मानहानि के मुकदमें से बचने के सरल उपाय हैं. सामान्यतः जब यह लगभग तय हो कि मानहानि के मुकदमें में सामने वाला कोर्ट ही नही आयेगा तो उसे देख लेने की धमकी देकर छोड़ दिया जाता है. देख लेने की धमकी से बेवजह उलझ रहे दोनो पक्ष अपनी अपनी इज्जत समेट कर पतली गली से निकल लेने का एक रास्ता पा जाते हैं.  देख लेने की धमकी कुछ कुछ लोक अदालत के समझौते सा व्यवहार करती है. इसी तरह जब खुद की औकात ही किसी अपने की औकात पर टिकी हो जैसे आपका कोई नातेदार थानेदार हो, बड़ा अफसर हो या मंत्री वंत्री हो, विपक्ष का कद्दावर नेता हो तो भले ही आपका स्वयं  का  कुछ मान न हो पर आप अपना सम्मान अपने  उस  महान रिश्तेदार के मान से जोड़ सकते हैं और सड़क पर गलत ड्राइविंग या गलत पार्किंग करते पाये जाने पर, बिना रिजर्वेशन आक्यूपाइड अनआथराइज्ड बर्थ पर लेटे लेटे, किसी शो रूम में मोलभाव करते हुये  बेझिझक अपनी रिलेशन शिप को जताते हुये, धौंस जमाने के यत्न कर सकते हैं. धौंस जम गई और आपका काम निकल गया तो बढ़िया. वरना आप जो हैं वह तो हैं ही.  तुलसी बाबा बहुत पहले चित्रकूट के घाट पर गहन चिंतन मनन के बाद लिख गये हैं ” लाभ हानि जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ “. तुलसी की एक एक चौपाई की व्याख्या में, बड़े बड़े शोध ग्रंथ लिखे जा चुके हैं. कथित विद्वानो ने  डाक्टरेट की उपाधियां लेकर  यश अर्जित किया है, और इस लायक हुये हैं कि उनकी मानहानि हो सके, वरना तो देश के करोड़ो लोगो का मान है ही कहाँ कि उनकी मानहानि हो . तो जब आपकी भी धौंस न चले, देख लेने की धमकी काम न आवे तो बेशक आप विधाता को अपने मान के अपमान के लिये दोषी ठहरा कर स्वयं खुश रह सकते हैं.  तुलसी की चौपाई का स्पष्ट अर्थ है कि यश और अपयश विधि के हाथो में है, फिर भी जाने क्यो लोग मान अपमान की गांठें बाधें अपने जीवन को कठिन बना लेते हैं. देश की अदालत में वैसे ही बहुत सारे केस हैं सुनवाई को. ए सी लगे कमरो के बाद भी कोर्ट को गर्मी की छुट्टियां भी मनानी पड़ती है,  इसलिये हमारी विनम्र गुजारिश है कि कम से कम मान हानि के मुकदमें दर्ज करने पर रोक लगा दी जाये अध्ययन किया जाये कि क्या इसकी जगह अपनी ऐंठ में जी रहे नेता धमकी, धौंस, बयान वगैरह से काम चला सकते हैं ?

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 20 ☆ स्पेसवासी ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय एवं प्रेरणास्पद रचना “स्पेसवासी।  इस आलेख के माध्यम से श्रीमती छाया सक्सेना जी ने सिद्ध कर दिया कि शब्दों के खेल से कुछ भी रचा जा सकता है और यह आलेख शब्दों के खेल का ही कमाल है। इस शब्दशिल्प के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 20 ☆

☆ स्पेसवासी

अरे भई  किस स्पेस की बात कर रहे हैं, आजकल तो स्पेस ही स्पेस है,  दयाशंकर जी ने कहा।

सो तो है,  राघव जी ने कहा।

दोनों बचपन के दोस्त हमेशा ही व्यंग्य के माध्यम से ज्वलन्त मुद्दों पर बातचीत करते- रहते थे।

0पहले स्पेस में जाकर बसने की प्लानिंग थी, पर  एक ही झटके में धरती पर सबको पर्सनल स्पेस मिल गया, राघव जी ने कहा ।

हाँ भाई, अब तो स्पेस के बिना कोई कार्य ही नहीं होता। मास्क लगा कर, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए इसे मेंटेन कीजिए, दयाशंकर जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

सो तो है, बहुत  दिनों से युवा पीढ़ी इसी स्पेस को लेकर जद्दोजहद कर रही थी, ऐसा मालुम होता है कि ईश्वर ने इनकी सुन ली, अब तो घर में रहकर चैन से इसके मजे लूटते रहो, बाहर निकलने पर खातिरदारी होती है, राघव जी ने कहा।

हँसते हुए दयाशंकर जी ने कहा  आखिरकार किसी न किसी तरह चीनी कृपा से हम स्पेशवासी हो ही गये।

बिल्कुल जब पूरे घर, यहाँ तक कि सारे त्योहारों पर चीनी सामान का राज था; तो ऐसे दिन तो देखने ही पड़ेंगे, राघव जी ने कहा।

हाँ भई, जब विदेशी मदद से स्पेस में पहुँचने की चाह हो तो ऐसा ही होता है। इसे कहते हैं लेना एक न  देना दो ।

अब तो इसी के साथ जीना सीखना होगा,दयाशंकर जी ने कहा।

एक दूसरे ही ओर देखकर, फीकी मुस्कान बिखेरते हुए दोनों अपनी – अपनी राह पर चल दिए।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 50 – काँच की दीवार ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “काँच की दीवार । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 50 ☆

☆ लघुकथा –  काँच की दीवार  ☆

 

“लड़कियों को छूट देना, मन चाही जगह जाने देना, ज्यादा रोका टोकी नहीं करना, अच्छे कालेज में पढ़ाना, मनचाहा मोबाइल देना – इन्ही सब वजह से लड़कियां बिगड़ जाती है. मैंने तुझे कहा था की मोना को ज्यादा लाड़ प्यार मत कर. बिगड़ जाएगी. यह उसी का नतीजा है कि तेरी लड़की ने भाग कर दूसरी जाति के लड़के से शादी कर ली. एक मेरी लड़की टीना को देख….,” मोहन अपने छोटे भाई के जले पर नमक छिटक रहे थे.

तभी मोहन जी के लडके ने आ कर कहा, “पापाजी ! मामाजी का फोन है. कह रहे है कि टीना ने ही मोना की शादी का बंदोबस्त किया था.”

मोहन जी को लगा कि अभी-अभी वे जिन शब्दों से अपने स्वाभिमान रूपी कांच की दीवार खड़ी कर रहे थे उसे उन की लड़की मोना के व्यवहार रूपी पत्थर से चकनाचूर हो गई.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

०४/०८/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 29 ☆ चक्र के दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  “चक्र के दोहे.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 29 ☆

☆ चक्र के दोहे  ☆

 

कोरोना के चक्र में, फँसा सकल संसार।

मानव के दुष्कृत्य से, विपदा अपरंपार।।

 

हर कोई भयभीत है, मान रहा अब हार।

कार कोठियां रह गईं, धन सारा बेकार।

 

चमत्कार विज्ञान के, हुए सभी निर्मूल।

जान बूझकर ये मनुज, करता जाए भूल।।

 

बड़े-बड़े योद्धा डरे, कोरोना को देख।

पर मानव सुधरे नहीं, लिखे प्रलय का लेख।।

 

धन-दौलत की चाह में, करे प्रकृति को क्रुद्ध।

दोहन अतिशय ये करें, करता नियम विरुद्ध।।

 

मुश्किल में अब जान है ,घर में ही सब कैद।

बलशाली भी डर गए,डरे चिकित्सक वैद।।

 

अभी समय है चेत जा, तज दे तू अज्ञान।

काँधा देने के लिए, मिलें नहीं इंसान।।

 

भौतिक सुख सुविधा नहीं, अपने भव की सोच।

फास्टफूड ही कर रहा , लगी सोच में मोच।।

 

शाकाहारी भोज में , मिलता है आनन्द।

चाइनीज भोजन करे, सबकी मति है मन्द।।

 

योग, सैर अपनाइये, तन-मन रहे निरोग।

संस्कृति अपनी ही भली, कहते आए लोग।।

 

श्रम करने से ही सदा , तन का अच्छा हाल।

आलस मोटा कर रहा, बने स्वयं  का काल।।

 

व्यसनों में है आदमी, झूठा चाहे चैन।

मन भी बस में है नहीं, भाग रहा दिन रैन।।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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मराठी साहित्य – कविता ☆ सुन  सुनबाई  ☆ सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। कई पुरस्कारों/अलंकारों से पुरस्कृत/अलंकृत सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी का जीवन परिचय उनके ही शब्दों में – “नियतकालिके, मासिके यामध्ये कथा, ललित, कविता, बालसाहित्य  प्रकाशित. आकाशवाणीमध्ये कथाकथन, नभोनाट्ये , बालनाट्ये सादर. मराठी प्रकाशित साहित्य – कथा संग्रह — ५, ललित — ७, कादंबरी – २. बालसाहित्य – कथा संग्रह – १६,  नाटिका – २, कादंबरी – ३, कविता संग्रह – २, अनुवाद- हिंदी चार पुस्तकांचे मराठी अनुवाद. पुरस्कार/सन्मान – राज्यपुरस्कारासह एकूण अकरा पुरस्कार.)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता सुन  सुनबाई । हम भविष्य में भी आपकी सुन्दर रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।

☆ सुन  सुनबाई ☆

 

नको,  नको    सुनबाई,

दावू   असला    हा   तोरा.

असे    माझाच  अंकुर

आज    आला   ग  बहरा   ।।

 

राजबिंडा   राजा    माझा

चालण्याची   त्याची    ऐट

ह्याच    हातानी    रेखिली

होती    गालावर    तीट।।

 

करतेस   लगबग

बूट   दारात वाजता

माझ्या   आधारे   चालला

बाळ    रांगता   रांगता ।।

 

त्याचे    परब्रम्ह   होते

माझ्या मध्ये   साठलेले

म्रुदू   मायेचे    ग   धागे

एक मेका   गुंतलेले ।।

 

सूनबाई     नको    म्हणू

मला    परकी    वेगळी

सुखी   तुम्हा    पहाण्याची

माझी    माझी   माया   वेडी खुळी ।।

 

© मीनाक्षी सरदेसाई

‘अनुबंध’, कृष्णा हास्पिटलजवळ, पत्रकार नगर, सांगली.४१६४१६.

मोबाईल  नंबर   9561582372

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुजित साहित्य # 47 –ओल. . . . ! ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “ओल. . . . !”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #47 ☆ 

☆ पत्रलेखन  – ओल. . . . !☆ 

 

प्रेम गुलाबाचे फूल

तुझ्या गाली फुललेले

एका  एका पाकळीत

आठवांनी नाहलेले. . . !

 

प्रेम कवितेचे घर

सुख दुःखाचे माहेर

कधी आसू,  कधी हासू

देई ओठांनी  आहेर. . . . !

 

प्रेम सागराची गाज

त्याला किनारी  आसरा

नको नदी  आसवांची

हवा चेहरा हासरा . . . . !

 

प्रेम गुलाबाचा काटा

काढी काट्यानेच काटा

तुझ्या डोळ्यात फुलल्या

जीवनाच्या ओल्या वाटा. . . . !

 

दव बिंदू पुरे एक

घेतो टिपूनीया प्रेम

ओल काळजाची माझ्या

माझ्या शब्दात सप्रेम. . . . . !

 

© सुजित शिवाजी कदम

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

7/2/2019.

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  The Science of Happiness#2 -Happiness Activity – Laughter Yoga ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity – Laughter Yoga ☆ 

Video Link >>>>

Happiness Activity: Laughter Yoga

Acting like a Happy Person: Taking care of your body

One of the happiness activities described by the positive psychologists for taking care of your body is acting like a happy person.

Laughter Yoga suits best in this category. It is voluntary laughter, for no reason, to create instant joy. It’s scientifically proven, easy to learn and a lot of fun.

It’s based on the principle: motion creates emotion. You act happy and you start feeling happy.

We demonstrate three laughter exercises – milk shake laughter, mobile laughter and hearty laughter – in this video. You can practice these any time and feel happier.

“Pretending that you are happy – smiling, engaged, mimicking energy and enthusiasm – not only can you earn some of the benefits of happiness (returned smiles, strengthened friendships, successes at work and school) but can actually make you happier.

“So go for it. Smile, laugh, stand tall, act lively and give hugs. Act as if you were confident, optimistic, and outgoing. You’ll manage adversity, rise to the occasion, create instant connections, make friends, influence people, and become a happier person.”

SONJA LYUBOMIRSKY/ THE HOW OF HAPPINESS

 

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (11) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

 

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ ।

एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ।।11।।

नियमित हो अध्यात्म रूचि, तत्व ज्ञान की खोज

यही वास्तविक ज्ञान है, शेष है ज्ञान विरोध ।।11।।

 

भावार्थ :  अध्यात्म ज्ञान में (जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम ‘अध्यात्म ज्ञान’ है) नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से ‘ज्ञान’ नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से ‘अज्ञान’ नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।।11।।

 

Constancy in Self-knowledge, perception of the end of true knowledge-this is declared to be knowledge, and what is opposed to it is ignorance.

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 49 – फिर नदी निर्मल बहेगी……☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना फिर नदी निर्मल बहेगी……। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 49 ☆

☆ फिर नदी निर्मल बहेगी…… ☆  

 

बाढ़ है ये

फिर नदी निर्मल बहेगी

बोझ आखिर क्यों

कहाँ तक ये सहेगी।

 

सिर उठाते ठूंठ,

हलचल है शवों में

अट्टहासी गूंज

प्रकुपित कलरवों में

मुंह छिपाए तट

विलोपित हो गए हैं

त्रस्त है मौसम

विषम इन अनुभवों में,

 

है उजागर

उम्र यूँ ढलती रहेगी।

बाढ़ है ये

फिर नदी निर्मल बहेगी।।

 

जीव जलचर

जो निराश्रित हो रहे हैं

घर, ठिकाने

स्वयं के सब खो रहे हैं

विकल बेसुध,

भोगते कलिमल किसी का

कौन सी भावी फसल

हम बो रहे है,

 

ये असीम करूण कथा

सदियां कहेगी।।

बाढ़ है ये

फिर नदी निर्मल बहेगी।।

 

क्या पता,

संग्रहित कब से जो पड़ा था

राह रोके

सलिल-लहरों के अड़ा था

वह कलुष कल्मष

समेटे बढ़ रही है

संग बरखा के,

इरादा सिर चढ़ा था,

 

लक्ष्य को पाने

सतत चलती रहेगी।

बाढ़ है ये

फिर नदी निर्मल बहेगी।।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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