हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ अवाक ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ अवाक ☆

 

दर्प से चमकती

आँखों से

बेटा-बेटी

अपने त्याग, तप

और संघर्ष की गाथा

सुनाते रहे..,

झुर्रियों से घिरा

चेहरा लिये

माता-पिता

अवाक होकर

सुनते रहे!

 

©  संजय भारद्वाज 

प्रात: 11:54 बजे, 4.9.20

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 15 ☆ मजदूरों पर बढ़ता बेरोजगारी का संकट ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख  मजदूरों पर बढ़ता बेरोजगारी का संकट)

☆ किसलय की कलम से # 15 ☆

☆ मजदूरों पर बढ़ता बेरोजगारी का संकट 

दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति संपन्न नहीं हो सकता। समय एवं परिस्थितियाँ नौकर-मालिक या राजा-रंक की दशा बदल देती हैं। भले हम कहें कि श्रम व समर्पण सुपरिणाम देते हैं लेकिन कभी-कभी विपरीत परिस्थितियाँ सब उलट-पुलट कर देती हैं। इसीलिए युगों-युगों से मजदूरों का अस्तित्व रहा है और आगे भी निरंतर रहेगा। प्रत्येक मालिक व उद्योगपतियों का उद्देश्य बड़े से और बड़ा होना होता है। मजदूरों का शोषण जानबूझकर तो किया ही जाता है, अनजाने में भी होता है। दुनिया में शोषित व शोषक वर्ग सदैव से रहे हैं। समय साक्षी है कि श्रम का मूल्यांकन तथा आदर हमेशा कम ही हुआ है। हम सभी जानते हैं कि एक मजदूर का हमारा समाज कितना आदर करता है। अपनी गृहस्थी व अपने परिवार हेतु एक मजदूर अपना घर, अपने परिवार के सभी सदस्यों को छोड़कर रोजी-रोटी के लिए दर-ब-दर भटकता है। ये हजारों-हजार किलोमीटर की दूरी केवल इसलिए नाप लेते हैं ताकि उनके परिवार को दो जून की रोटी नसीब हो सके। उनके बच्चे पढ़-लिख सकें, लेकिन ऐसा होता नहीं है। मजदूर जीवन भर अपना शरीर खपाता रहता है और अंत तक मजदूर का मजदूर ही रहता है। उनकी कमजोर आर्थिक परिस्थितियाँ न ही उन्हें संपन्न बना पातीं और न ही उनकी संतानें उच्च शिक्षा ग्रहण कर पातीं।

बदलती तकनीकि व इक्कीसवीं सदी के अंधाधुंध व्यवसायीकरण की प्रक्रिया ने आज जीवन के एक-एक क्षण की आरामदेही हेतु नवीनतम यांत्रिक सुविधायें उपलब्ध करा दी हैं। श्रम, दूरी, यातायात, मनोरंजन, दूरसंचार के साधनों सहित स्वच्छता, जल, हवा, ऊर्जा, ईंधन आदि हरेक जरूरतों की पूर्ति आज चुटकी बजाते ही पूर्ण हो जाती है। पहले सिर पर मटकी से पानी लाना, पैदल या बैलगाड़ी से आवागमन, चूल्हे जलाना, संदेश वाहको से संदेश भेजना, हल और हाथों से कृषि करना आदि सभी में मानवशक्ति का ही अधिक उपयोग होता था। इस तरह सभी के पास रोजगार, उद्योग-धंधे व मजदूरी हुआ करती थी, लेकिन धीरे-धीरे हर कार्य मशीनों द्वारा अच्छा व जल्दी होने लगा। उत्पादों, साधनों एवं सेवाओं में लागत भी कम पड़ने लगी। एक तरह से धीरे-धीरे मजदूरों का कार्य मशीनें करने लगीं। यहाँ तक भी ठीक था लेकिन जब मानवशक्ति का उपयोग आधे से भी कम हुआ, तब इस मजदूर वर्ग की मुसीबतें और बढ़ना शुरू हो गईं। अब मजदूर अपने परम्परागत हुनर को विवशता में त्यागकर अन्य कार्य करने हेतु बाध्य होने लगा। घर से हजारों किलोमीटर दूर जाने हेतु भी तैयार हो गया। कुछ बचे हुए लोगों ने अपने परम्परागत रोजगार-धंधे जैसे हैंडलूम, मिट्टी एवं धातुओं के बर्तन व विभिन्न सामग्री, हस्त निर्मित फर्नीचर आदि बनाकर आगे बढ़ना चाहा लेकिन इन सब में समय व परिश्रम अधिक लगने और लागत बढ़ने के कारण लोगों की अभिरुचि मशीन निर्मित वस्तुओं की ओर ज्यादा बढ़ती गई। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कभी किसी ने यह नहीं सोचा कि इन कारोबारियों, हस्तशिल्पियों व कुशल कारीगरों की अनदेखी एक दिन इन लोगों का अस्तित्व ही समाप्त कर सकती है। सर्वविदित है कि मानवशक्ति का अधिक से अधिक उपयोग हो, इसीलिए हमारे राष्ट्रपिता गांधी जी ने हथकरघा निर्मित खादी के वस्त्रों पर जोर दिया था।

आज हमें बस थोड़ी सी उदारता व संतोष रखकर सहृदयतापूर्वक कुछ ही अधिक मूल्य देकर इनसे सामग्री खरीदना होगी। आपके द्वारा किये गए प्रयास न जाने कितने लोगों को मजदूरी का अवसर दे सकते हैं और इस बहाने हम मजदूरों और कारीगरों की कला का सम्मान भी कर पाएँगे। यही इन लोगों के श्रम का मूल्यांकन भी होगा। आज हम देख रहे हैं कि बड़ी-पापड़ और दोना-पत्तल से लेकर कपड़ों की धुलाई, सिलाई, अनाजों की पिसाई सब कुछ मशीनों से होने लगा है। अब तक इन धंधों में लगे मजदूरों को आखिर अन्य काम तो करने ही होंगे। काम न मिलने पर ये पलायन भी करेंगे। आज ऐसी ही परिस्थितियों के चलते हर शहरों में कुछ स्थान नियत हो गए हैं जहाँ सुबह-सुबह मजदूरों का हुजूम दिखाई देता है। एक अदद मजदूर की तलाश में आए व्यक्ति के चारों ओर काम मिलने की आस में मजदूर झुण्ड के रूप में उस व्यक्ति को घेर लेते हैं। आशय यह है कि अब यह भी निश्चित नहीं है कि यहाँ एकत्र सभी मजदूरों को उस दिन काम मिल ही जाए। सीधी और स्पष्ट बात यह है कि अब मजदूरी के लिए भी पापड़ बेलने पड़ते हैं। बावजूद इसके कभी-कभी बिना मजदूरी और पैसों के खाली हाथ घर वापस भी आना पड़ता है। घर में या तो फाके की स्थिति होती है अथवा बची खुची सामग्री से घरवाली पेट भरने लायक कुछ बना देती है और यदि ऐसा ही कुछ दिन और चला तो भूखे मरने की नौबत भी आ जाती है। आज भी यह सब होता है। हो रहा है। सरकारें चाहे जितने वायदे करें, प्रमाण दें, लेकिन सच्चाई तो यही है कि कल का मजदूर आज भी उतना ही मजबूर और भूखा है।

क्या कभी ऐसे आंकड़े जुटाए गए हैं कि सरकारी सहायता प्राप्त मजदूर की पाँच-दस साल बाद क्या स्थिति है। निःशुल्क आंगनवाड़ी एवं निःशुल्क शिक्षा के बावजूद मजदूरों के कितने प्रतिशत बच्चे स्नातक अथवा उच्च शिक्षित हो पाए हैं। आखिर हमारी योजनाएँ ऐसी अधूरी क्यों है? आखिर इतना सब करने के पश्चात भी हम गरीब या मजदूरों को वे सारी सुख-सुविधाएँ व शिक्षा देने में असफल क्यों हैं। सत्यता व कागजी बातों के अंतर को पाटने हेतु ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए? वैसे भी हमारे देश में इस मजदूर वर्ग की हालत एक बड़ी समस्या से कम नहीं है। अधिकांश मजदूर व उनके परिवार आज भी नारकीय जीवन जीने हेतु बाध्य हैं। अभावग्रस्त मजदूर बस्तियों में आज भी बिजली-सड़क-पानी की संतोषजनक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। बस्तियाँ बजबजाती नालियों से भरी पड़ी रहती हैं। सारे वायदे व घोषणाएँ केवल चुनावी दौर में सुनाई देते हैं। फिर अगले पाँच साल तक सब कुछ वैसे का वैसा ही रहता है।

कुछ समय पूर्व तक ठीक नहीं पर काम चलाऊ तो था परंतु कोविड-19 के बढ़ते कहर ने सारे विश्व को स्तब्ध कर दिया है। किसी को भी कुछ समझ में नहीं आ रहा। यह ऐसी विभीषिका है जो इसके पूर्व कभी देखी नहीं गई। विश्व के द्वितीय सबसे अधिक जनसंख्या वाले हमारे देश में अभी भी कोविड-19 महामारी लगातार बढ़ती ही जा रही है। खौफ इतना बढ़ा कि प्रायः सभी मजदूर अपने परिवार और अपने घर में ही पहुँच कर एक साथ जीना-मरना चाहते हैं। मजदूरों की घर वापसी न मालिक रोक पाए न सरकार। बिना पैसे के, बिना रुके, भूखे-प्यासे मजदूर सैकड़ों-हजारों किलोमीटर दूरी तय कर एनकेन प्रकारेण अपने घरों तक पहुँच गए। घर की जमापूँजी घर चलाने में खर्च होने लगी। अब मजदूरी न के बराबर ही है। वापस आए मजदूर आखिर अपने गाँव अथवा समीप के शहरों में क्या और कितना करेंगे। लोगों के काम-धन्धों पर मंदी की मार पड़ रही है। निर्माण और अन्य ऐसे अन्य काम जिनमें मजदूरों की आवश्यकता होती है, लॉकडाउन के पश्चात रफ्तार नहीं पकड़ पा रहे हैं। हम उपभोग की वस्तुओं की बात करें तो जब माँग ही नहीं होगी तो उत्पादन क्यों किया जाएगा? उत्पादन अथवा काम न होने का तात्पर्य यह है कि मजदूरों के काम की छुट्टी। बिना काम किए जब मजदूरी ही नहीं मिलेगी तो क्या होगा इन बेचारों का। उद्योग, कारखाने एवं धंधे-व्यवसाय वालों ने मंदी के चलते अपने मजदूरों की छटनी शुरू कर दी है।

हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या पहले से ही है और अब कोरोना के कहर से बेरोजगारी का संकट और गहराने लगा है। यदि यही हाल रहा तो आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि बिना जमापूँजी वाले मजदूरों और उनके परिवार की क्या दशा होगी? आज मजदूरों पर बढ़ता बेरोजगारी का संकट इसी कोविड-19 जैसे हालात निर्मित न कर दे, इस पर दीर्घकालीन शासकीय योजनाएँ व नीतियों की अविलम्ब आवश्यकता है। आज मजदूर वर्ग में आक्रोश दिखाई नहीं दे रहा, इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इनमें असंतोष व्याप्त नहीं है। आप मानें या न मानें कल की चिंता हर मजदूर व गरीब तबके को सता रही है। इन्हें शीघ्र अतिशीघ्र रोजगार, व्यवसाय अथवा धंधों में लगाने की महती आवश्यकता है, ताकि ये भविष्य की रोजी-रोटी के प्रति निश्चिंत हो सकें। वर्तमान में यह मजदूर वर्ग इतना टूट चुका है कि वह अपने व अपने परिवार के उदर-पोषण हेतु कुछ भी करने को आमादा हो सकता है। अनैतिक कार्यों व धंधों में संलिप्त हो सकता है। लूटमार, चोरी-डकैती जैसी वारदातें भी बढ़ सकती हैं। ऐसी कठिन व अराजक परिस्थितियाँ आने के पूर्व भविष्य की नजाकत को देखते हुए शासन का आगे आना बहुत जरूरी हो गया है, वहीं समाज के सभी सक्षम व्यक्तियों, धनाढ्य, उद्योगपतियों से भी अपेक्षा है कि वे अपने कर्मचारियों को इस विपदा की घड़ी में जितना बन पड़े अपनापन और आर्थिक सहयोग देने से पीछे न हटें। मजदूर व गरीबों के लिए जन सामान्य, संस्थाएँ व प्रशासन यथोचित मदद हेतु आगे आएँ, ताकि मानवता कलंकित होने से बच सके।

इस कठिन समय में स्वार्थ, कालाबाजारी, जमाखोरी, धर्म एवं संप्रदाय से ऊपर उठकर इन मजदूरों को रोजगार देने का प्रयास करें। इनकी यथायोग्य सहायता करें। इनके रोजगार, व्यवसाय आदि में मदद करें। आपका एक छोटा सा प्रयास, आपकी सलाह, आपका परोपकार एक मजदूर ही नहीं उसके पूरे परिवार की खुशहाली के द्वार खोल सकता है। इस तरह हम सब आज मजदूरों पर बढ़ती बेरोजगारी के संकट का समाधान कुछ हद तक तो कर ही सकते हैं।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 61 ☆ तुम यहीं हो ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं परम आदरणीया माँ स्व डॉ गायत्री तिवारी जी  (27 दिसंबर 1947 – 8 सितम्बर 2015)को सस्नेह समर्पित एक भावप्रवण कविता  “तुम यहीं हो। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 61 – साहित्य निकुंज ☆

☆ तुम यहीं हो ☆

तुम मेरी यादों के

झरोखे में झाँकती

मुझे तुम निहारती

मै अतीत के उन पलों

में पहुंच जाती हूँ ।

 

तुम्हारा रोज मुझसे

बात करना,अपना

मन हल्का करना।

मैं खो जाती हूँ तुम्हारे

आँचल की छाँव में

जहां मिलता था

मुझे सुकून, मुझे चैन।

 

तुम्हारा प्यार, तुम्हारा

ममत्व अक्सर

ख्वाबों में भी आराम

देता है।

नींद में भी तुम्हारे

हाथों का स्पर्श

यकीन दिला जाता है कि

तुम हो मेरे ही आस पास।

 

मन में आज भी एक

प्रश्न चिन्ह उठता है

जिंदगी पूरी जिये

बिना तुम क्यों चली गई

और जाने कितने सवाल

छोड़ गई हम सब के लिए।

जो आज भी अनसुलझे है।

 

तुम गई नहीं हो

तुम हो

तिलिस्म के साए में

ऐसी माया है जिससे वशीभूत

होकर व्यक्ति उसके मोह जाल में

फँस जाता है।

माँ

हो मेरे आसपास

मेरे अस्तित्व को मिलता है अर्थ

नहीं है कुछ भी व्यर्थ।।

तुम मेरी यादों में ……

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 52 ☆ कभी खुद से भी सवाल कर लेना ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  एक भावप्रवण रचना “कभी खुद से भी सवाल कर लेना। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 52☆

☆ कभी खुद से भी सवाल कर लेना  ☆

 

कभी खुद से भी सवाल कर लेना

जरा उसका भी ख्याल कर लेना

 

गैरों पै उँगलियाँ उठाई बहुत

चार तुम्हारी तरफ,मलाल कर लेना

 

हैं दुनिया में परेशानियाँ बहुत

मुश्किलों में दिल खुशहाल कर लेना

 

खुदा के बाद है माँ-बाप का रुतवा

दिल से उनकी संभाल कर लेना

 

माफ कर देना सभी अज़ीज़ों को

फ़राख दिली से कमाल कर लेना

 

बनाया है इंसान वा दुनिया को

कर इबादत उसे निहाल कर लेना

 

लाख दुश्वारियाँ राहों में मगर

“संतोष” का इस्तेमाल कर लेना

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 9300101799

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विशेष – पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) – वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।  आज दिनांक 18 सितम्बर 2020 से पुरुषोत्तम मास (अधिक मास ) प्रारम्भ हो रहा है।  इस सम्बन्ध में प्रस्तुत है इस सन्दर्भ में श्री आशीष कुमार जी द्वारा लिखित विशेष आलेख  “पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) – वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व । )

 ☆ विशेष आलेख ☆ पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) – वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व ☆

इस वर्ष पुरुषोत्तम मास आ रहा है, हरिद्वार समय के अनुसार 18 सितम्बर 2020 को प्रातः 01: 29 से अधिकःमास प्रारंभ हो जायेगा जो कि 16 अक्टूबर कि रात्रि 11: 15 तक रहेग।  पुरुषोत्तम मास के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक  महत्व को समझने का प्रयास करते है।

कहते हैं कि दैत्याराज हिरण्यकश्यप ने अमर होने के लिए तप किया ब्रह्माजी प्रकट होकर वरदान मांगने का कहते हैं तो वह कहता है कि आपके बनाए किसी भी प्राणी से मेरी मृत्यु ना हो, न मनुष्य से और न पशु से। न दैत्य से और न देवताओं से। न भीतर मरूं, न बाहर मरूं। न दिन में न रात में। न आपके बनाए 12 माह में। न अस्त्र से मरूं और न शस्त्र से। न पृथ्‍वी पर न आकाश में। युद्ध में कोई भी मेरा सामना न करे सके। आपके बनाए हुए समस्त प्राणियों का मैं एकक्षत्र सम्राट हूं। तब ब्रह्माजी ने कहा- तथास्थु। फिर जब हिरण्यकश्यप के अत्याचार बढ़ गए और उसने कहा कि विष्णु का कोई भक्त धरती पर नहीं रहना चाहिए तब श्री‍हरि की माया से उसका पुत्र प्रहलाद ही भक्त हुआ और उसकी जान बचाने के लिए प्रभु ने सबसे पहले 12 माह को 13 माह में बदलकर अधिक मास बनाया। इसके बाद उन्होंने नृसिंह अवतार लेकर शाम के समय देहरी पर अपने नाखुनों से उसका वध कर दिया। इसके बाद चूंकि हर चंद्रमास के हर मास के लिए एक देवता निर्धारित हैं परंतु इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई भी देवता तैयार ना हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने उपर लें और इसे भी पवित्र बनाएं तब भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मलमास के साथ पुरुषोत्तम मास भी बन गया। ऐसी भी मान्यता है कि स्वामीविहीन होने के कारण अधिकमास को ‘मलमास’ कहने से उसकी बड़ी निंदा होने लगी। इस बात से दु:खी होकर मलमास श्रीहरि विष्णु के पास गया और उनको अपनी व्यथा-कथा सुनाई। तब श्रीहरि विष्णु उसे लेकर गोलोक पहुचें। गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने मलमास की व्यथा जानकर उसे वरदान दिया- अब से मैं तुम्हारा स्वामी हूं। इससे मेरे सभी दिव्य गुण तुम में समाविष्ट हो जाएंगे। मैं पुरुषोत्तम के नाम से विख्यात हूं और मैं तुम्हें अपना यही नाम दे रहा हूं। आज से तुम मलमास के बजाय पुरुषोत्तम मास के नाम से जाने जाओगे। इसीलिए प्रति तीसरे वर्ष में तुम्हारे आगमन पर जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति के साथ कुछ अच्छे कार्य करेगा, उसे कई गुना पुण्य मिलेगा। इस प्रकार भगवान ने अनुपयोगी हो चुके अधिकमास को धर्म और कर्म के लिए उपयोगी बना दिया। अत: इस दुर्लभ पुरुषोत्तम मास में स्नान, पूजन, अनुष्ठान एवं दान करने वाले को कई पुण्य फल की प्राति होगी।

पुरुषोत्तम मास जिस चंद्र मास में सूर्य संक्राति नहीं होती, वह अधिक मास कहलाता है और जिस चंद्र मास में दो संक्रांतियों का संक्रमण हो रहा हो उसे क्षय मास कहते हैं। इन दोनों ही मासों में माँगलिक कार्य नहीं होते हैं। हालांकि इस दौरान धर्म-कर्म के पुण्य फलदायी होते हैं। इसके लिए मास की गणना शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक की जाती है। सामान्यत: एक अधिक मास से दूसरे अधिक मास की अवधि 28 से 36 माह तक की हो सकती है। कुछ ग्रंथों में यह अवधि 32 माह और 14 दिवस 4 घटी बताई गई है। इस प्रकार यह कह सकते है कि हर तीसरे वर्ष में एक अधिक मास आता ही है। यदि इस अधिक मास की परिकल्पना नहीं की गई तो चांद्र मास की गणित गड़बड़ा सकती हैं। विशेष बात यह है कि अधिक मास चैत्र से अश्विन मास तक ही होते हैं। कार्तिक, मार्गशीर्ष पौष मास में क्षय मास होते हैं तथा माघ फाल्गुन में अधिक या क्षय मास कभी नहीं होते। सौर वर्ष 365.2422 दिन का होता है जबकि चंद्र वर्ष 354.327 दिन का रहता है। दोनों के कैलेंडर वर्ष में 10.87 दिन का अंतर रहता है और तीन वर्ष में यह अंतर 1 माह का हो जाता है। इस असमानता को दूर करने के लिए अधिक मास एवं क्षय मास का नियम बनाया गया है। सूर्य-चन्द्र के भ्रमण से 3 वर्ष के अंतर पर अधिक मास की स्थिति बनती है। जिस किसी मास में सूर्य की संक्रांति नहीं आती है वह अधिक मास पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। यह एक खगोलशास्त्रीय तथ्य है कि सूर्य 30.44 दिन में एक राशि को पार कर लेता है और यही सूर्य का सौर महीना है। ऐसे बारह महीनों का समय जो 365.25 दिन का है, एक सौर वर्ष कहलाता है। चंद्रमा का महीना 29.53 दिनों का होता है जिससे चंद्र वर्ष में 354.36 दिन ही होते हैं। यह अंतर 32.5 माह के बाद एक चंद्र माह के बराबर हो जाता है। इस समय को समायोजित करने के लिए हर तीसरे वर्ष एक अधिक मास होता है। एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच कम से कम एक बार सूर्य की संक्रांति होती है। यह प्राकृतिक नियम है। जब दो अमावस्या के बीच कोई संक्रांति नहीं होती तो वह माह बढ़ा हुआ या अधिक मास होता है। संक्रांति वाला माह शुद्ध माह, संक्रांति रहित माह अधिक माह और दो अमावस्या के बीच दो संक्रांति हो जायें तो क्षय माह होता है। क्षय मास कभी कभी होता है। मलमास में कुछ नित्य कर्म, कुछ नैमित्तिक कर्म और कुछ काम्य कर्मों को निषेध माना गया है। जैसे इस मास में प्रतिष्ठा, विवाह, मुंडन, नव वधु प्रवेश, यज्ञोपवित संस्कार, नए वस्त्रों को धारण करना, नवीन वाहन खरीद, बच्चे का नामकरण संस्कार आदि कार्य नहीं किए जा सकते। इस मास में अष्टका श्राद्ध का संपादन भी वर्जित है। जिस दिन मल मास शुरू हो रहा हो उस दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान सूर्य नारायण को पुष्प, चंदन अक्षत मिश्रित जल अर्पणकर पूजन करना चाहिए। अधिक मास में शुद्ध घी के मालपुए बनाकर प्रतिदिन काँसे के बर्तन में रखकर फल, वस्त्र, दक्षिणा एवं अपने सामर्थ्य के अनुसार दान करें। जो कार्य पूर्व में ही प्रारंभ किए जा चुके हैं, उन्हें इस मास में किया जा सकता है। इस मास में मृत व्यक्ति का प्रथम श्राद्ध किया जा सकता है। रोग आदि की निवृत्ति के लिए महामृत्युंजय, रूद्र जपादि अनुष्ठान भी किए जा सकते हैं। इस मास में दुर्लभ योगों का प्रयोग, संतान जन्म के कृत्य, पितृ श्राद्ध, गर्भाधान, पुंसवन सीमंत संस्कार किए जा सकते हैं। इस मास में पराया अन्न तथा तामसिक भोजन का त्याग करना चाहिए।

पुरुषोत्तम मास की एकादशी का बहुत ज्यादा महत्व है जो कि पुरुषोत्तमपद्मिनी(शुक्लपक्ष)एवं परमा(कृष्णपक्ष) है।

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – मी….! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता  “मी….!” )

☆ विजय साहित्य – मी….! ☆

मी….!

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..

परीचितांना अपरीचित आणि

अपरिचितांना परीचित वाटतोय मी.

अविश्वासात विश्वास आणि

निस्वार्थात स्वार्थ गोवतोय मी

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..!

 

पुस्तकातले कुटुंब, समाज

त्यांच्यातच रमतोय मी.

माणूस माणूस जोडलेला

पुन्हा पुन्हा वाचतोय मी

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..!

 

गणिताची आकडेमोड

आकडेवारीत विस्तारतोय मी

माझ्याच गरजा, नी जबाबदा-या

कार्य कारण भाव निस्तरतोय मी.

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..!

 

चालतोय मी , थांबतोय मी

माझ्यातल्या मीला शोधतोय मी

लिहितोय मी, वाचतोय मी

विस्तारीत जगणे , आवरतोय मी.

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..!

 

कुणाच्या जमेत , कुणाच्या खर्चात

क्षणा क्षणाला साचतोय मी

ऊन्हातला मी, सावलीतला मी

चक्रवाढ व्याजात नाचतोय मी.

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..!

 

चुकतोय मी , मुकतोय मी

संसार नावेत, डुलतोय मी

कधी काट्यात , कधी वाट्यात

जीवन बाजारात , भुलतोय मी.

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..!

 

कधी भूतकाळात तर कधी

वर्तमानात जगतोय मी

अनुभूती वेचताना थकलो तर

तुझ्याच अंतरात वसतोय मी.

हरवतोय मी… की गवसतोय मी..!

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798

 

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेखर साहित्य # 6 – कविता ☆ श्री शेखर किसनराव पालखे

श्री शेखर किसनराव पालखे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेखर साहित्य # 6 ☆

☆ कविता ☆

 

आपण समजतो तेवढी सोपी नसते कविता

भावनांचा उद्रेक होतो तेव्हा जन्म घेते कविता

तुम्ही नाहीयेत तिचे जन्मदाते बाबांनो

उलट तिच्यामुळे तुमचा होतो जन्म  कवी म्हणून मित्रांनो

कविता म्हणजे असतं एखाद्याचं जिवंतपणे जळणं

कविता म्हणजे काळजातला खंजीर स्वतः ओढून मरणं

कविता असते बाणासारखी रुतणारी

छातीत घुसून पाठीतून आरपार निघणारी

कविता म्हणजे पायातला न दिसणारा काटा

कविता म्हणजे भावनांना हजार लाख वाटा

कविता म्हणजे असतो काळजावरचा घाव

कविता म्हणजे असतो एक मोडुन पडलेला डाव

 

© शेखर किसनराव पालखे 

पुणे

17/05/20

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सखी ☆ श्री यशवंत माळी

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ सखी ☆ श्री यशवंत माळी ☆ 

 

सखी

आयुष्यभर आपण

पुरवलेच ना

देहाचे डोहाळे ?

चांगलं -चुंगलं खायला

प्यायला ?

निदान ब-यापैकी.

रंग रंगोटीसाठी

जमेल तेवढी

कॉस्मेटिक्स.

कपडे अन् दागिने.

आता काय?

चेहऱ्यावर वर्दळ

सुरकुत्यांची.

आणि सैल बुरख्यासारखे

लोंबणारे कातडे

……शरीरभर.

काय करायचं या देहाचं?

आग्नीला स्वाहा…..?

…..मूठमाती?

की  देहदान ?

 

©  श्री यशवंत माळी

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ संगत ☆ सौ.प्रियदर्शिनी तगारे

सौ. प्रियदर्शिनी तगारे

अल्प परिचय

रसायनशास्त्र व शिक्षणशास्त्रातील पदवी.  कथा , कविता व ललित लेखन.

मासिके व दिवाळी अंकासाठी नियमित कथालेखन. तीन कथासंग्रह आणि दोन कादंबऱ्या प्रकाशित. कथासंग्रहांना विविध लेखनपुरस्कार.

 ☆ जीवनरंग ☆ संगत ☆ सौ.प्रियदर्शिनी तगारे ☆ 

काकीनं रव्यासमोर काळा कळकट चहा ठेवला.

“त्याला बटर दे की” असं काकानं म्हणताच काकीनं रागानं बघितलं. आणि रव्यासमोर बटर आदळला. खरं तर रव्याच्या पोटात भुकेचा डोंब उसळला होता.पण काकीपुढं बोलणं शक्य नव्हतं.

गडबडीनं चहा पोटात ढकलून तो बाहेर पडला.नऊ वाजायला आले होते. पाच मिनिटं उशीर झाला तरी गॅरेजचा मालक तोंडाचा पट्टा सोडत असे. जीव खाऊन सायकल मारत तो गॅरेजवर गेला.

कोपऱ्यातला झाडणीचा बुरखुंडा उचलून त्यानं अंगण झाडलं. नळावरनं पाणी आणून  शिंपडलं. तेवढ्यात मालक आला. गॅरेजचं कुलूप काढताच आतून डिझेल आणि आॅईलचा घाणेरडा वास नाकात घुसला. रव्याचं डोकं वासानं भणभणलं. दुपारपर्यंत जीव तोडून काम करून तो जेवायला घरी गेला. काकी झोपली होती. चुलीपुढं त्याच्यासाठी  ताट वाढून ठेवलं होतं. ताटात दोन गारढोण भाकरी ,आमटीचं खळगूट आणि चिमटभर भात होता. आईच्या आठवणीनं रव्याच्या घशाशी आवंढा आला. आई दररोज त्याच्यासाठी मसालेदार भाजी , घट्ट डाळ असं चवीचं पोटभर जेवण करायची.

रव्याला ते दिवस आठवले. तो डोक्यानं हुशार होता. वडलांच्या माघारी चार घरी राबून आईनं त्याला वाढवलं होतं.बारावीपर्यंत तो चांगल्या मार्कांनी पास होत असे.आईला समाधान वाटे. आपला मुलगा खूप मोठा झाल्याची स्वप्नं तिला पडू लागली होती.

तो कॉलेजात गेला. त्याची दोस्ती पप्या आणि सागऱ्याशी झाली. मग दररोज कॉलेजच्या कट्ट्यावर बसून त्यांच्या टवाळक्या सुरू झाल्या.तास बुडवणं सुरू झालं. कधीतरी रव्याला आतून टोचणी लागे.तो वर्गात जायला निघाला की दोस्त म्हणायचे ,” अरे ,बस लेका.आलाय मोटा शिकणारा ”

असं होता होता रव्याचं आभ्यासातलं मन उडून गेलं. सलग दोन वर्षं तो नापास झाला.आणि कॉलेज सोडून घरात बसला.

आईनं मग त्याला तिच्या ओळखीनं एका घरी कामाला लावलं.अंगण झाडायचं ,गाड्या पुसायच्या. एवढं काम झालं की तो दोस्तांच्या कंपनीत रमायचा.त्या अड्ड्यावर मुलींच्या  गप्पा निघायच्या.एकदा रव्या बोलला ,” मी काम करतो त्यांची पोरगी बेष्ट आहे. कपडे तर एकदम हिरॉईन सारके घालती रे”

यावर पप्या ओरडला ” अरे ,पटव ना मग तिला. आईशप्पत तुला सांगतो ;या पोरींना आपल्यासारकीच पोरं आवडतात बघ ”

हळूहळू रव्याला तिच्याबद्दल आकर्षण वाटायला लागलं.त्याचं मन चळलं.ती गाडी काढायला आली की तो मुद्दाम तिथं घुटमळायचा. रोज दोस्तांची शिकवणी चालूच होती.

त्यादिवशी ती लाल टी-शर्ट आणि तोकड्या स्कर्टमध्ये भन्नाट दिसत होती. रव्याच्या डोक्यात भडका उडाला. काही कळायच्या आत त्यानं तिला घट्ट मिठी मारली. क्षणार्धात ती ओरडली. घरातून तिचे आईवडील थावत आले.

त्यांनी रव्याला पोलिसच्या हवाली केलं. आईनं हातापाया पडून सोडवलं. पण त्यांनी अट घातली की पुन्हा या गावात हा दिसता कामा नाही. रव्याची रवानगी इथं काकाकडं झाली. काकीचा सासुरवास सुरू झाला. आणि गॅरेजचा कळकट वास कायमचा त्याच्या आयुष्याला चिकटला.

© सौ.प्रियदर्शिनी तगारे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सागरतीरी ☆ श्री राजीव पुरुषोत्तम दिवाण

श्री राजीव पुरुषोत्तम दिवाण

☆ विविधा :  सागरतीरी – श्री राजीव पुरुषोत्तम दिवाण 

“सागरकिनारी”

मी परवा  असाच एकटा समुद्राकाठी बसलो होतो. आजूबाजूला बरेचजणं होते,कोणी खेळत होते, हातात हात घेऊन एकमेकांच्या प्रेमात गुंतून गेले होते, कोणी भेळ खात होते वगैरे वगैरे !!!

जवळच एक जोडपं बसलं होतं,एकमेकांपासून बर्या पैकी अंतरावर…..बहूधा नवविवाहित आणि तेही arranged marriage वालं असावं. तो बोलत असताना तिची मान खाली आणि ती बोलत असताना  त्याचे डोळे तिच्या चेहर्यावर थबकलेले.

थोड्या वेळाने दोघांनी एकमेकांकडे पहात पहात वाळूवर एकमेकांची नावे कोरली आणि पहात राहीले…. तो तिच्या नावाकडे आणि ती त्याच्या…..दोघेही भावी आयुष्यातील स्वप्नात जणू बुडून गेले होते. आजूबाजूला काय घडतंय याची त्यांना जाणीवही नव्हती….. असाच बराच वेळ झाला….आणि दोघेही अचानक भानावर आले………भरतीच्या लाटेनं कधी गाठलं ते कळलंच नाही. त्याच लाटेनं त्या जोडप्यानं कोरलेली नांवेही पुसून टाकली. दोघेही सावकाश उठले. हातात हात गुंफले… ती त्याच्या दंडावर डोकं टेकवून  बिलगली आणि दोघंही चालू लागले.

मी मात्र सुन्न झालो होतो नि संतापलो समुद्राच्या या कृतघ्नपणाला…..खरंतर ते दोघेही माझे कोणीही नव्हते….तरीही मला वाटलं..त्या दोघांच्या नाजूक भावनांशी खेळायचा समुद्राला काय अधिकार???? आणि थेट समुद्रालाच तो सवाल ठोकला……

समुद्राला खळाळून हासू फुटलं….. आणि मला उत्तरला……अरे वेड्या, हे तुझ्या मनाचे खेळ आहेत. तुला काय वाटलं त्यांनी कोरलेली नावं माझ्या लाटेनं पुसून टाकली?? अरे, ते दोघे इथून जाताना पाहीलं नाहीस????

त्याने तीचा हात हाती घेतला….प्रेमानं आणि तीही त्याच्या दंडावर विसावली….विश्वासानं. यालाच संसार म्हणतात,हेच खरं प्रेम असतं,यातंच सार्या आयुष्याचं सुख दडलेलं असतं. तुला वाटत असेल माझी लाट भुसभूशीत वाळूवर रेखाटलेली नावं पुसून टाकते. अरे हट… इथून जाणारं प्रत्येक जोडपं घेऊन जातं असं प्रेम कि जे माझ्यासारखं  अथांग आहे, तितकंच गहीरं आहे……ऊथळ नाही. काही कालानंतर हेच जोडपं पुन्हा इथं येईल, ते आपल्या चिमुकल्याला घेवून. त्यावेळी ते बांधतील वाळूत एक चिमुकलं घर….पुन्हा माझी लाट ते घर माझ्यात सामावून घेईल….पण ते आईबाबा नाराज नाही होणार कारण त्यांनी केलेलं घर विश्वास आणि प्रेमाच्या धाग्यांत घट्ट आहे. कोणतीही लाट ते उध्वस्त नाही करू शकणार……

पायावर आलेल्या लाटेच्या स्पर्शाने मी भानावर आलो…..खूप खूप सुखावलो…..आणि  लक्षात आलं……समुद्र कधीच काहीच उध्वस्त करत नाही……उध्वस्त करतात ती माणसांना न कळलेली एकमेकांची मनं!!!!! आणि इतके दिवस जे मला वाटतं होतं कि  कांहीतरी चुकतंय माझ …..आज अचानक मला जाणवलं….कांही  नावं पुसून टाकण्यांन सुखाच्या लाटा आयुष्यात येत असतात.

हे सागरा…..शतशः धन्यवाद!!!

 

© राजीव पुरुषोत्तम दिवाण

बदलापूर(ठाणे)

फोन:९६१९४२५१५१

वॉट्स ऍप :८२०८५६७०४०

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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