हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पियाँ – 10 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆  चुप्पियाँ – 10

…….पूर्ण से

पूर्ण चले जाने पर भी

पूर्ण ही शेष रहता है,

चैनलों पर सुनता हूँ

प्रायोजित प्रवचन

चुप हो जाता हूँ..,

सारी चुप्पियाँ

समाप्त होने के बाद भी

बची रहती है चुप्पी,

पूर्णमिदं……

……..पूर्णमेवावशिष्यते!

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(प्रातः 7:49 बजे, 2.9.18)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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English Literature – Poetry (भावानुवाद) ☆ एक शमां हरदम जलती है/A flame remains lit forever…. – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

Captain Pravin Raghuvanshi ji  is not only proficient in Hindi and English, but also has a strong presence in Urdu and Sanskrit.   We present an English Version of Ms. Neelam Saxena Chandra’s  Classical Poetry एक शमां हरदम जलती है with title  “A flame remains lit continuously….” .  We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation.)

आपसे अनुरोध है कि आप इस रचना को हिंदी और अंग्रेज़ी में आत्मसात करें। इस कविता को अपने प्रबुद्ध मित्र पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें और उनकी प्रतिक्रिया से  इस कविता की मूल लेखिका सुश्री नीलम सक्सेना चंद्र जी एवं अनुवादक कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को अवश्य अवगत कराएँ.

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा  

☆ एक शमां हरदम जलती है  ☆

जब कोई डर सताए,

जब कोई दिल दुखाये,

जब बहाव थम सा जाए,

जब पाँव के नीचे शूल ही शूल चुभ रहे हों,

जब लगे कि ख्वाब पूरी तरह टूट गए हों,

और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा हो,

जब हर साथी साथ छोड़ दे-

तब याद रखना

कि तुम्हारी खुद की रूह के भीतर भी

एक शमां है

जो हरदम जलती रहती है!

 

आँखें बंद कर

दो क्षण को बैठ जाना

और ध्यान देना कुछ लम्हों के लिए

उस शमां पर…

 

उसे देखना सुलगते हुए,

सुनना उसकी बातें

जो तुमको आगे बढ़ने की

प्रेरणा दे रही होंगी,

महसूस करना

उसकी उष्णता

जो तुममें नई स्फूर्ति भर रही होगी…

 

सुनो,

अकेलापन एक मिथ्या है-

तुम अकेले कभी नहीं होते!

अपनी रूह की सुनोगे

तो मुस्कुराते हुए हरदम बढ़ते ही रहोगे!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

पुणे

❃❃❃❃❃❃❃❃❃❃

 ☆ A flame remains lit continuously…. ☆

When something scares you,

When someone hurts you,

When the flow is stopped,

When thorns after thorn

prick your feet persistently,

When you feel the dreams

have shattered completely,

When all doors are closed

There seems to be noway out,

When everyone deserts you…

 

Then you must remember-

That even within your own soul

There’s always  a flame

Which keeps on burning incessantly!

 

Close your eyes

Just sit for a while

And, concentrate on that

flame for few moments

Keep gazing it smoldering,

Listen to its words

Which you shall find

Inspiring you

To get up and rise

and  move forward…

You shall feel

Its warmth energizing you…

 

Listen,

Loneliness is utter falsehood

You are never alone!

If you listen to your conscience

You’ll always march forward with tenacity, smilingly!

 

© Captain (IN) Pravin Raghuanshi, NM (Retd),

Pune

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 52 – आमचं कुटुंब ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  एक  अत्यंत भावप्रवण  एवं समसामयिक कविता  “आमचं कुटुंब। आज कमोबेश सामान्य मध्यम एवं उच्च वर्ग के परिवारों की यही स्थिति है और सभी अनिश्चय के दौर से गुजर रहे हैं ।  इस वैश्विक महामारी काल में भविष्य के प्रति सभी चिंतित हैं और यह स्वाभाविक भी है। सुश्री प्रभा जी ने कुटुंब पर रचित कविता के माध्यम से प्रत्येक परिवार की पीड़ा साझा कर दी है।  कभी कभी मुझे लगता है संयुक्त परिवारों की परिभाषा बदल गयी है। आज संयुक्त परिवार वास्तव में वर्च्युअल संयुक्त परिवार हो गए हैं । वे संयुक्त भी हैं और स्वतंत्र भी। सुश्री प्रभा जी की एक माँ  के रूप में रचित संवेदनशील रचना के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन ।  

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 52 ☆

☆ आमचं कुटुंब ☆ 

 

आले दिवस असे की

जाता जाईना आळस

त्यात कोरोना विषाणू

त्याने केलाय कळस

 

पुत्र आहे दूरदेशी

त्याचे विस्तारे क्षितीज

स्नुषा, नातू आले घरा

केली सारी तजवीज

 

आहे  कुटुंबात माझ्या

प्रत्येकालाच स्वातंत्र्य

स्पेस दिली ज्याला त्याला

नको कोणा पारतंत्र्य

 

आम्ही  पेठांमधे आणि

“आयटी” च्या ते गावात

आणिबाणीच्या या क्षणी

आलो एकाच घरात

 

सून सुगरण माझी,

नातू अमृताची  खाण

रोज सोनियाचा दिनु

नसे कशाचीच वाण !

 

नित्य  प्रार्थिते देवाला

देई अभयाचे दान

जागतिक संकटाचे

आहे आम्हालाही भान !

 

माझ्या कुटुंबात नांदो

सदा सौख्य, शांती, प्रेम

सर्व जगातील जन

असो जिथे तिथे क्षेम !

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 30 – बापू के संस्मरण-4 प्रतिज्ञा वापस नहीं ली जाती ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – प्रतिज्ञा वापस नहीं ली जाती”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 29 – बापू के संस्मरण – 4- प्रतिज्ञा वापस नहीं ली जाती ☆ 

एक बार कस्तूरबा गांधी बहुत बीमार हो गईं । जल-चिकित्सा से उन्हें कोई लाभ नहीं हुआ दूसरे उपचार किये गये उनमें भी सफलता नहीं मिली । अंत में गांधीजी ने उन्हें नमक और दाल छोड़ने की सलाह दी परन्तु इसके लिए बा तैयार नहीं हुईं । गांधीजी ने बहुत समझाया, पोथियों से प्रमाण पढ़कर सुनाये, लेकर सब व्यर्थ ।

बा बोलीं, “कोई आपसे कहे कि दाल और नमक छोड़ दो तो आप भी नहीं छोड़ेंगे” । गांधीजी ने तुरन्त प्रसन्न होकर कहा,”तुम गलत समझ रही हो मुझे कोई रोग हो और वैद्य किसी वस्तु को छोड़ने के लिये कहें तो तुरन्त छोड़ दूंगा और तुम कहती हो तो मैं अभी एक साल के लिए दाल और नमक दोनों छोड़ता हूं, तुम छोड़ो या न छोडो, ये अलग बात है” ।

यह सुनकर बा बहुत दुखी हुईं बोलीं, “आपका स्वभाव जानते हुए भी मेरे मुंह से यह बात निकल गई अब मैं दाल और नमक नहीं खांऊगी आप प्रतिज्ञा वापस ले लें” गांधीजी ने कहा, “तुम दाल और नमक छोड़ दोगी, यह बहुत अच्छा होगा उससे तुम्हें लाभ ही होगा, लेकिन की हुई प्रतिज्ञा वापिस नहीं ली जाती । किसी भी निमित्त से संयम पालन करने पर लाभ ही होता है मुझे भी लाभ ही होगा इसलिए तुम मेरी चिन्ता मत करो” । गांधीजी अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहे ।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 50 ☆ व्यंग्य – आत्मनिर्भरता यानी सेल्फी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  ऑनलाइन बहस पर आधारित  एक अतिसुन्दर सेल्फी पर आधारित व्यंग्य  “ऑनलाइन बहस का मौसम।   श्री विवेक जी  की लेखनी को इस अतिसुन्दर व्यंग्य के लिए नमन । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 51 ☆ 

☆ व्यंग्य – ऑनलाइन बहस का मौसम

 लाकडाउन ने और कुछ दिया हो या न दिया हो पर घड़ी की सुई के साथ, नम्बरो और भौतिकता के इर्द गिर्द रुपयों के लिये भागमभाग करती जिंदगी को मजबूरी में ही सही पर खुद से मिलने के मौके जरूर दिये हैं. खुली जेल की नजरबंदी के मजे लेने की सोच जिसके पास है, उसने सारी परेशानियों के साथ, बिना कामवाली बाई के भी, काम करते हुये मेरी तरह जिंदगी के मजे भी लिये हैं. लोग सुबह तब काम पर निकल जाते थे जब बच्चे सो रहे होते थे, और तब थके हारे लौटते थे जब बच्चे सो चुके होते थे, मतलब वे बच्चो को लेटे हुये ही बढ़ता देख रहे थे. ऐसे सभी लोगों को भी अपनी जमीन, अपना गांव याद आ गया. लाकडाउन से परिवार के साथ समय बिताने का, खुद से खुद को मिलने का मौका मिला.

इस कोरोना काल का साहित्यकारो ने भरपूर रचनात्मक उपयोग किया. सोशल मीडिया की ताकत का अंदाजा कर लोगो ने नये यूट्यूब चैनल्स बनाये, इंस्टाग्राम और फेसबुक एकाउन्ट बनाये. युवाओ ने टिकटाक बनाये.  जो पहले से फेसबुक पर थे उन्होनें फेसबुक की मित्र मण्डली की छटनी कर डाली. इतना सब तो पहले लाकडाउन तक ही कर डाला गया. पर कहा जाता है न कि मनुष्य का दिमाग ऐसा सुपर कम्प्यूटर है जिसकी पूरी क्षमता का दोहन ही हम कभी नही कर पाते. जब सरकार को कोरोना से बचने का और कोई उपाय नही सूझा तो लाकडाउन दो लागू कर दिया गया. बुद्धिजीवी लोगो की बुद्धि बिना गोष्ठियों के अखल बखल होने लगी. जब तक गर्मागरम बहस न हो, देश के लोगों का खाना अच्छी तरह नही पचता. यही कारण है कि शाम होते ही सारे खबरिया चैनल अपने पर्दे पर बे सिर पैर की बहसों के आयोजन करते हैं. कथित विशेषज्ञ बातो के लात जूतो से एक दूसरे की लानत मलानत पर उतर आते हैं. भले ही बहस का कोई परिणाम नही निकलता पर सारे देश को भरोसा हो जाता है कि हमारा लोकतंत्र जिंदा है और हमारी अभिव्यक्ति की संवैधानिक आजादी पूरी तरह बरकरार है.

जिन लोगों को किसी व्यस्तता के चलते टीवी पर यह बहस सुलभ नही हो पाती उनके लिये देश में चाय और पान के टपरे हैं. जहां लोकल दैनिक से लेकर साप्ताहिक अखबार और सांध्य समाचार के पन्ने उपलब्ध होते हैं. यहां अपनी अपनी रुचि के अनुरूप लोग पसंदीदा खबर पर किसी भी जाने अनजाने उपस्थित अन्य चाय पीते व्यक्ति से टाइमपास बहस शुरू कर सकता है. इस तरह बहस से सारे देश का हाजमा हमेशा दुरुस्त बना रहता है. बुद्धिजीवियो को ऐसी प्रायोजित बहसो में मजा नही आता, उन्हें अपना खाना पचाने के लिये मौलिक बहसों की जरूरत होती है. इस वजह से वे काफी हाउस में एकत्रित होकर मुद्दे तलाशते हुये फिल्टर काफी पीते हैं. लगे हाथ चुगली, चाटुकारिता आदि भी हो जाती है, और अकादमी पुरस्कारो की साठ गांठ भी चलती रहती है.

एक और वर्ग होता है जिसे खाना पचाऊ बहस के लिये रात का समय ही मिल पाता है, यह वर्ग चखना के साथ स्वादानुसार पैग तैयार कर मित्र मण्डली से बहस करता है और लोकतंत्र को अपना समर्थन देते हुये मदहोश सुखद स्वप्न संसार में खो जाता है.

लाकडाउन ने चाय पान की गुमटियां गुम कर रखी थी,काफी हाउस और बार बन्द थे, इसलिये स्वाभाविक रूप से बिना बहस लोग अखल बखल थे. लोगों का हाजमा खराब हो रहा था. ऐसे समय में काम आये मोबाईल के वे मीटिंग एप जिनके जरिये हम ग्रुप्स में जुड़ सकते हैं, सामाजिक सांस्कृतिक साहित्यिक संस्थाओ ने प्लेटफार्म दिये, ग्रुप एडमिन्स ने आनलाईन बहस के मुद्दे ढ़ूंढ़ लिये और लोग नियत समय पर आनलाईन कविता पाठ, व्यंग्यपाठ, देश की एकता, लाकडाउन हो या न हो, यदि मोदी की जगह कोरोना काल में राहुल प्रधानमंत्री होते तो, जैसे अनेकानेक विषयो पर आनलाईन बहस में जुटे हुये हैं. सबका हाजमा ठीक हो रहा है.अपनी बस यही गुजारिश है कि सरकार खाने के लिये आटा और उसे पचाने के लिये आनलाईन डाटा देती रहे, फिर कोई चिंता नही है, लाकडाउन तीन, चार, पांच चलता रहे जनता धीरे धीरे कोरोना के साथ जीना सीख ही लेगी.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी ☆ कलयुग का कल्पतरु ☆ श्री सूरज कुमार सिंह

श्री सूरज कुमार सिंह 

(युवा साहित्यकार श्री सूरज कुमार सिंह जी  ने साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न प्रयोग किये हैं।  वृद्धावस्था में अकेलेपन को लेकर रचित यह लघुकथा भी ऐसे ही प्रयोग का परिणाम है।  अतिसुन्दर शब्दशिल्प में रचित इस लघुकथा कलयुग का कल्पतरु की सकारात्मकता अन्तर्निहित है। ) 

☆ कलयुग का कल्पतरु ☆

कल्पतरु वृक्ष से जुड़ी एक अनोखी मान्यता है। ऐसा माना जाता है कि यह वृक्ष समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए थे और यह भी कि ये लोगों की इच्छाएं पूरी करते हैं। इसके पत्ते भी सदाबहार रहते हैं। भारत मे ऐसे सिर्फ नौ वृक्ष हैं।  इनमे से दो, जवाहर मिश्र जी उर्फ़ पंडित जी के रांची स्थित आवास के समीप हैं।

हर प्रातः काल भ्रमण के दौरान वे कल्पतरु के पास से गुज़रते थे। उन्हे दोनो वृक्षों और अपने बीच एक समानता की अनुभूति होती और अंतर्मन मे एक सहानुभूति भी। यह एक सत्य है की वह स्वयं भी प्रिय जनो की इच्छाएं पूरी करने वाले बनकर रह गए थे।  पर वह  कल्पतरु की तरह सदाबहार नही थे। उम्र निरंतर ढल रही थी। हां, पर फिर भी एक और समानता अवश्य थी! जिस तरह मनोकामना की पूर्ति होते ही लोग कल्पतरु वृक्ष को भूलकर उससे दूर चले जाते, पंडित जी के प्रिय जनों ने भी उनके साथ ठीक यही किया था।

पर पंडित जी इतने कमज़ोर दिल वाले भी नही थे। पत्नी के गुज़र जाने के बाद अपने जीवन की राह सुनिश्चित की और उस पर तब तक चलते रहे जब तक कदम खुद-ब-खुद रुके। वह भले  ही ज़्यादा समय हमारे बीच नही रहे पर जब तक जिये विराट कल्पतरु के समान, पूरे आत्मसम्मान से जिये।

 

© श्री सूरज कुमार सिंह

रांची, झारखंड   

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 28☆ माँ शारदे ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  वीणावादिनी माँ सरस्वती वंदना की काव्याभिव्यक्ति  माँ शारदे। 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 28 ☆

☆ माँ शारदे ☆

विनती  माँ तुमसे मैं करती

सबकी पीड़ा पल में हरती

 

श्वेत वस्त्र धारिणी माँ शारदे

कमल के आसन  विराजती

 

बुध्दि, शुध्दि  विकार त्यागी

एकाग्रता को तुम ही संवारती

 

ज्योति प़काश दे तम को विखेरती

माँ वीणावादिनी स्वर को संवारती

 

तेरी शरण माँ निखार शब्द उर के

अभ्यास ज्ञान  लय को निखारती

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  The Science of Happiness#1 -Happiness Mantra ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ The Science of Happiness – Happiness Mantra ☆ 

Video Link >>>>

Happiness Mantra

We are sharing three happiness mantras for creating instant joy.

If you feel low at any time, you may chant and enact these mantras and feel instant cheer.

Chant the mantras with children, seniors or peers at home, workplace or in your community to share happiness and joy.

Happiness Mantra #1:

Very Good, Very Good, Yay!

Happiness Mantra #2:

I am good, very good, yay!

Happiness Mantra #3:

hoho haha..

Mantra #1 in other languages:

Japanese: Yatta yatta yay!

Russian: Harasho harasho yay!

Italian: Molto bene molto bene yay!

Spanish: Mui bien mui bien yay!

Hindi: Bahut achche bahut achche yay!

Mantra #2, other versions:

I am healthy, very healthy, yay!

I am strong, very strong, yay!

I am good, very good, yay!

I am smart, very smart, yay!

 

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (10) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।

विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥

एक निरंतर भाव हो, गहन भक्ति में चाव

नियत देश में वास हो, भीड़ के प्रति न दिखाव ।।10।।

 

भावार्थ :  मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना ‘अव्यभिचारिणी’ भक्ति है) तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना॥10॥

 

Unswerving devotion unto Me by the Yoga of non-separation, resort to solitary places, distaste for the society of men,

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 37 ☆ एक शमां हरदम जलती है ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “एक शमां हरदम जलती है ”।  यह कविता आपकी पुस्तक एक शमां हरदम जलती है  से उद्धृत है। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 37 ☆

☆ एक शमां हरदम जलती है  ☆

 

जब कोई डर सताए,

जब कोई दिल दुखाये,

जब बहाव थम सा जाए,

जब पाँव के नीचे शूल ही शूल चुभ रहे हों,

जब लगे कि ख्वाब पूरी तरह टूट गए हों,

और कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा हो,

जब हर साथी साथ छोड़ दे-

तब याद रखना

कि तुम्हारी खुद की रूह के भीतर भी

एक शमां है

जो हरदम जलती रहती है!

 

आँखें बंद कर

दो क्षण को बैठ जाना

और ध्यान देना कुछ लम्हों के लिए

उस शमां पर…

 

उसे देखना सुलगते हुए,

सुनना उसकी बातें

जो तुमको आगे बढ़ने की

प्रेरणा दे रही होंगी,

महसूस करना

उसकी उष्णता

जो तुममें नई स्फूर्ति भर रही होगी…

 

सुनो,

अकेलापन एक मिथ्या है-

तुम अकेले कभी नहीं होते!

अपनी रूह की सुनोगे

तो मुस्कुराते हुए हरदम बढ़ते ही रहोगे!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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