हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ कहानी ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆  लघुकथा – कहानी

‘यह दुनिया की सबसे लम्बी कहानी है। इसे गिनीज बुक में दर्ज़ किया गया है,.’ जानकारी दी जा रही थी।

वह सोचने लगा कि पहली श्वास से पूर्णविराम की श्वास तक हर मनुष्य का जीवन एक अखंड कहानी है। असंख्य जीव, अनंत कहानियाँ..। हर कहानी की लम्बाई इतनी अधिक कि नापने के लिए पैमाना ही छोटा पड़ जाए।…फिर भला कोई कहानी दुनिया की सबसे लम्बी कहानी कैसे हो सकती है..?

इस कहानीकार का हर कहानीकार को नमस्कार।

 

# दो गज की दूरी, है बहुत ही ज़रूरी।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(प्रातः 6:30 बजे, 26.5.2019)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 2 ☆ इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण : आज सक्षम लोगों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। आज से आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सकारात्मक आलेख  ‘इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण : आज सक्षम लोगों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना’।)

☆ किसलय की कलम से # 2 ☆

☆ इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण : आज सक्षम लोगों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना ☆

गरीब, जरूरतमंद, भिखारी अथवा कृपाकांक्षी होना अक्सर किसी का स्वभाव या प्रवृत्ति नहीं होती, अपितु यह किसी सामान्य इंसान का अंतिम रास्ता या परिस्थिति होती है। समाज भी इसे सम्मानजनक नहीं मानता। विश्व में कर्म को प्रधानता प्राप्त है, तब अकर्मण्यता आखिर क्यों सम्मानित होगी? भले ही वह विषम परिस्थितियों अथवा विवशता में अपनाई जाए, घर की दो सूखी रोटियाँ भली इसीलिए कहीं गई हैं। एक साधारण  बात है जो चीज मेहनत, बल, बुद्धि और समय खपाकर प्राप्त की जाती है, उसे यूँ ही खैरात में बाँटने का साहस एक सामान्य मानव नहीं कर पाता या जब वह किसी अकर्मण्य को किसी दूसरे के पसीने की कमाई लुटाते या उपभोग करते देखता है तो उसके हृदय में न चाहते हुए भी कसक होती ही है।

दरवाजे पर आए भिखारियों और राह चलते माँगने वालों को हम सभी ने दुत्कारते और मना करते देखा है। आखिर इस मानसिकता के पृष्ठभाग में क्या छुपा है? इसमें सच्चाई यही है कि अधिकतर ये भिखारी या जरूरत का आडंबर ओढ़े लोग अपनी दिन भर की कमाई को उदरपोषण और बचत करने के बजाय दारुखोरी, जुए और अन्य व्यसनों में ज्यादा उड़ा देते हैं। इनमें ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें वास्तव में दान या सहयोग का सुपात्र कहा जाये। एक और सच्चाई है कि यह जानते हुए कि याचक हमारी दया का पात्र है फिर भी हम अपनी मेहनत की कमाई देने का मन नहीं बना पाते। दान, परोपकार व सहयोग की भावना तब बलवती होती है, जब सामने वाली की मुसीबतें, लाचारी, असलियत और अवस्था प्रदाता की अंतरात्मा को द्रवित करती है। इस भावना के वशीभूत होकर जब इंसान परपीड़ा, परोपकार, दान या सहयोग करता है तब ही वह परमानंद पाता है जो आत्मसंतुष्टि तो देता ही है, अतुलनीय भी होता है। मानव को प्राप्त हुए इस परमानंद के लिए याचक और दानदाता दोनों के मन साफ होना आवश्यक है। याचक की लालची प्रवृत्ति के पता चलने पर दाता जहाँ ठगे जाने का अनुभव करता है, वहीं सुपात्र याचक भी कभी-कभी दाता द्वारा अनिच्छा पूर्वक दिए दान से दुखी भी होते हैं। आदिकाल के हरिश्चंद्र, मोरध्वज या दानवीर कर्ण की दानवीरता से कौन परिचित नहीं है। परमार्थ हमारे संस्कारों तथा भारतीयता के मूल में है। सभी चाहते हैं कि उनकी संतान संस्कारवान बने और सुकृति हो, पर आज के बदलते परिवेश और एकल पारिवारिक जीवनशैली ने हमारी परंपराओं, रिश्तों और सद्भावना की दुर्गति बना दी है। कहते हैं कि आग राख  के अंदर विद्यमान रहती है। हमारे संस्कार बाह्याडंबर और चकाचौंध में भले ही सिमट जाएँ लेकिन अनुकूल वातावरण में वे पुनर्जीवित हो जाते हैं।

हम आज का ही उदाहरण लें, कोविड-19 महामारी से सारा विश्व ग्रसित और भयाक्रांत है, हर आदमी घर में ही दुबके रहना चाहता है, लेकिन हमारा मन घर तक सीमित भला कैसे रहेगा? मन तो घर-परिवार से आगे देश-दुनिया के बारे में भी सोचता रहता है। हम ठीक हैं, क्या और सभी ठीक हैं? पड़ोसी कैसा है? रिश्तेदार कैसे हैं? आसपास की आँखों देखी, रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट मीडिया, अंतरजाल आदि पर पढ़ी-लिखी-सुनी बातों पर ये मन चिंतन तो करेगा ही।

इन दिनों प्रायः सभी ने यह देखा है कि एक बहुत बड़ा ऐसा तबका है जो दिहाड़ी पर निर्भर है या किसी कारणवश उसके पास खाद्यान्न का अभाव है। अनेक माध्यमों से बहुतायत में हम तक ये खबरें पहुँच रही हैं कि मुसीबत के इन क्षणों में इस तबके के लोगों को भूखे सोने तक की नौबत आ गई है। आज पत्थर दिल इंसान का भी दिल पिघल रहा है। उद्योगपति, धनाढ्य, उच्चवर्ग, मध्यमवर्ग, यहाँ तक कि उदारमना निम्नवर्ग भी इन दिनों “किसी को भूखा नहीं सोने देंगे” वाक्य को चरितार्थ करने में यथायोग्य सहायक बन रहा है। सरकार के सकारात्मक कार्यों की सराहना आज हर कोई कर रहा है लेकिन उससे कहीं अधिक जनसामान्य और निजी तौर पर किए जा रहे प्रयास भी प्रणम्य हैं। एक बड़े अंतराल के बाद ये परोपकारिता के दुर्लभ दृश्य दिखाई पड़ रहे हैं। आज मोहल्ला, गाँवों, कस्बों और शहरों के कोने-कोने में व्यक्तिगत रूप से, समूहों व संस्थाओं के माध्यम से जरूरतमंदों को दिल खोलकर भोजन व खाद्य सामग्री पहुँचाई जा रही है। व्यक्तिगत, समूहों व संस्थाओं के सदस्य अपनी जान जोखिम में डालकर चौबीसों घंटे मदद हेतु तत्पर हैं। उनका सेवाभाव देखते ही बनता है। इसी तरह सहयोगकर्ताओं की अंतहीन सहायता युगों बाद दिखाई दे रही है। इन सहयोगियों, दानदाताओं और इस पुण्य कार्य में कर्त्तव्यस्थ व्यक्तियों के लिए कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु शब्द कम पड़ रहे हैं। मेरा मानना है कि इन लोगों को देखकर जहाँ अन्य लोग भी प्रेरित हो रहे हैं, वहीं अनजाने में ही सही ये परहित के संस्कार हम अपनी संतानों में डाल रहे हैं। शायद अगली पीढ़ी और आने वाला समय ज्यादा सहृदय और सदाचारी हो।

आज हमें जरूरतमंदों के प्रति जो सेवाभाव देखने मिल रहा है। आवारा जानवरों, बंदरों, कुत्ते-बिल्लियों को तक लोग भोजन दे रहे हैं, ऐसा पूर्व में कभी नहीं दिखा। कोविड-19 महामारी का सबसे बड़ा खतरा है ही, बावजूद इसके आज सक्षम और परोपकारियों द्वारा जरूरतमंदों की सहायता करना इंसानियत का दुर्लभ उदाहरण भी बन रहा है। लगभग 500 वर्ष पूर्व तुलसीदास जी द्वारा लिखा सूत्र-

परहित सरिस धरम नहिं भाई

परपीड़ा सम नहिं अधमाई

आज वास्तव में हमारे समाज के लोगों ने इसे चरितार्थ किया है। ऐसे वृहद स्तर व लंबी अवधि तक जरूरतमंदों को भोजन व खाद्यान्न आपूर्ति का ऐसा दृश्य मानवता की मिसाल ही कहा जाएगा। वक्त निकल जाएगा, महामारी चली जाएगी, पर काफी लंबे समय तक ये क्षण, ये बातें, ये परोपकार की कहानियाँ बार-बार दोहराई जाती रहेंगी।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 48 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं प्रदत्त शब्दों पर   “भावना के दोहे। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 48 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

 

दस्यु

कोरोना ने ले लिया, क्रूर दस्यु का रुप।

दहशत पूरे विश्व में, फैली काल- स्व्रूप।

 

भूकंप

उस भीषण भूकंप से, सहमा है गुजरात।

भयाक्रांत है आज भी, जब चलती है बात।।

 

कुटिया

सब कुटिया में बंद हैं, नहीं चैन- आराम।

रोजी-रोटी छिन गई, हर पल-छिन संग्राम।

 

चौपाल

गाँवों की चौपाल का, रहा अनूठा रंग।

हिलमिल गाते झूमते, जन-गण-मन रसरंग।।

 

नवतपा

आग उगलता नवतपा,  लू ने लिया लपेट।

कोरोना को अब यही, देगा मृत्यु-चपेट।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 39 ☆ वापिस अपने घर चले…. ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  श्री संतोष नेमा जी  का  एक भावप्रवण रचना “वापिस अपने घर चले…. ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 39 ☆

☆ वापिस अपने घर चले .... ☆

मजदूरों पर दे रहे, नेता रोज बयान

सुनते सुनते पक गए, मजदूरों के कान

 

पाँवों में छाले पड़े, गया हाथ से काम

वापिस अपने घर चले, लेकर दर्द तमाम

 

रोटी छूटी हाथ से, छूटा सकल जहान

भूख गरीबी चीख कर, चल दी देकर जान

 

मजदूरों की आत्मा, करती आज सवाल

किया किसी ने कुछ नहीं, उनके जीवन काल

 

कहते आह गरीब की, छोड़े बहुत प्रभाव

संभव हो तो कीजिये, उनका दूर अभाव

 

खाने के लाले पड़े, जीना हुआ मुहाल

रोजी रोटी भी गई, हुए तंग बदहाल

 

संकट नहीं दरिद्र सा, नहीं दरिद्र सी पीर

आखिर कोई कहाँ तक, मन में रक्खे धीर

 

श्रमजीवी लाचार हैं,  बेबस  हैं मजदूर

उनके हित कुछ कीजिये, साहिब आज जरूर

 

देखे अब जाते नहीं, इनके यह हालात

करना गर कुछ कीजिये, छोड़ हवाई बात

 

ऐसीं  नीति बनाइये, मिले  हाथ को काम

सब के हिय “संतोष”हो, कहीं न हों बे-काम

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य – हळवे कुटुंब. . . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता  “हळवे कुटुंब. . . ! ,

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य ☆

☆ हळवे कुटुंब. . . ! ☆  

 

वासे घराचे सांगती

धर संस्काराची कास.

सुख, दुःख , राग लोभ

चार भिंती, चातुर्मास.. . !   1

 

चार कोपरे घराचे

माया ममतेची आस

जन्म दाते मायबाप

कुटुंबाचा दैवी श्वास.. . !  2

 

गेलो माणूस वाचत

आला घराला  आकार

मित्र आणि गुरूजन

झाले कुटुंब साकार .. . !  3

 

बंधू भगिनी प्रेमात

कुटुंबाचे बालपण

जसा जाई काळ तसे

घरा येई घरपण. . . !  4

 

आज्जी आजोबांची साथ

जणू कुटुंब  आरोग्य

नात्या नात्यातून होते

त्याची देखभाल योग्य .. . ! 5

 

आप्त स्वकियांची ये जा

होई कुटुंब संवादी

दिली  वास्तू पुरूषाने

त्यांची  गुणदोष यादी. . . . ! 6

 

अन्नपूर्णा गृहिणीचा

आहे  कुटुंब आरसा

आई,  पत्नी,  आणि मुले

माझा जीवन वारसा.. . ! 7

 

कुटंबाने दिले बळ

पावसाला झेलायला

संकटांनी शिकविले

जीवनास तोलायला.. . ! 8

 

कुटुंबाने वेळोवेळी

दिला मदतीचा हात

उजेडाच्या गावी नेले

केली सौख्य बरसात. . . . ! 9

 

किती किती  आठवणी

चारभिंती पोपड्यात

सुख दुःख समारंभ

कुटुंबाच्या काळजात.. . ! 10

 

कुलदैवताची कृपा

शब्द सुता करी वास

अशा सृजन  विश्वात

नको दुःखाचा  आभास. . . . ! 11

 

असे हळवे कुटुंब

यशश्रीने सालंकृत

यशवंत भाग्यश्रीची

कृपा छाया  आलंकृत.. . .! 12

 

(श्री विजय यशवंत सातपुते जी के फेसबुक से साभार)

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य- आलेख ☆ इंसानियत शर्मसार ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल

(डॉ कुंवर प्रेमिल जी  जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम नागरिकों ने उम्र के इस पड़ाव पर आने तक कई महामारियों से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है। आज प्रस्तुत है उनका  एक समसामयिक एवं सकारात्मक आलेख  “इंसानियत शर्मसार” जिसमें  उनके व्यक्तिगत विचार उनकी मनोभावनाओं के रूप में प्रदर्शित हो रहे हैं। )

☆ आलेख – इंसानियत शर्मसार ☆  

जब से दुनिया बनी लगभग तभी से आदमी बना. तभी से  बीमारियां भी बनी होंगी. यह अलग बात है कि तब प्रदूषण कम रहा होगा. बीमारियां भी कम रही होंगी.

रोग ग्रस्त होने पर आदमी ने पेड़ों के पत्ते, जड़े,  मिट्टी का  लेप लगाकर रोगों से छुटकारा पा लिया होगा. उनमें से कोई  विशेष योग्यता पाकर वैद्य और वैद्य शिरोमणि तक जा पहुंचा होगा. खुद का  बचाव करते हुए समाज,   परिवारों की भी बीमारियां दूर करने लगा होगा, धनवंतरी व सुखेन वैद्य संभवतः इन्हीं वैद्य शिरोमणि में होंगे.

राम रावण एवं महाभारत के युद्धों में बड़ी संख्या में लड़ाके घायल हुए थे. वैदयों द्वारा ऐसे-ऐसे लेप एवं औषधियां दी गई जिससे वे दूसरे दिन फिर तरोताजा होकर लड़ाई के मैदान में जा पहुंचते. वर्तमान में हमारे पास कई-कई पैथियां  है जिससे कोई बीमारी बचकर निकल ही नहीं सकती.  भारत के विभिन्न शोध संस्थानों में इस पर कार्य भी चल रहा है। एक दिन हमारा देश ही कोरोना वायरस की दवा/टीका ईजाद करेगा- ऐसा मेरा विश्वास है.

एकाएक समय बदला. परिस्थितियां बदल गई.  हम आशा करते हैं कि यह नकारात्मक एवं मानवता के विरुद्ध अतिमहत्वाकांक्षी शक्तियों का कार्य नहीं होगा. यदि ऐसा नहीं है और यह प्रकृति का प्रकोप है तो निश्चित ही इसके लिए हम ही ज़िम्मेवार होंगे और यह प्रकृति के विरूद्ध जाने का दुष्परिणाम होगा. इस समय पूरे विश्व में आपाधापी का मंजर है. सारी इंसानियत इसकी कीमत चुका रही है. हमारी पीढ़ी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर चिंतित है.

आखिर हमने या किसी ने तो इंसानियत के अमन चैन में सेंध लगाने की कोशिश की है जिसके लिए इंसानियत शर्मसार होती रहेगी.

 

© डॉ कुँवर प्रेमिल
एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  The Science of Happiness#3 -Happiness Activity – The Five Tibetans ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity – The Five Tibetans ☆ 

Five Dynamic Exercises from the Himalayas for Health, Happiness and Well-being.

Physical exercise is good for health. Everyone knows that. Positive psychologists have discovered that physical exercise increases your happiness and well-being too.

Physical activity is one of the scientifically proven methods for taking care of your body.

In this video, we are sharing with you one of the most effective and profound techniques of physical exercise, known as the Five Tibetans.

People from all age groups can learn it, do it, easily. And most important, it can be practiced daily without any difficulty.

HAPPINESS ACTIVITY: PHYSICAL ACTIVITY

TAKING CARE OF YOUR BODY

THE FIVE TIBETANS

The Five Rites of Rejuvenation, or simply The Five Tibetans, are five yogic exercises practiced by the Tibetan Lamas in the Himalayas.

These five dynamic exercises enhance health, energy, and vitality.

The five yogic exercises are reputed to strengthen the body, regenerate the mind, and stem the aging process.

Regular practice of these postures, tunes and energizes the chakras, and leads to deep relaxation and well-being.

They take only a minimum of daily time and effort, but dramatically increase flexibility of the body as well as mental sharpness.

In the beginning, start out with five repetitions of each exercise. Build your practice at your own pace. It takes nearly every beginner a month or longer to work up to the full twenty-one repetitions.

According to Chris Kilham, “The Five Tibetans are ideally practiced twenty-one times each.”

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (12) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

 

ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।

अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ।।12।।

ज्ञेय जो है परब्रम्ह वह, सत औ” असत से दूर

यह सब हो तो व्यक्ति में, अमृत सुख भरपूर ।।12।।

 

भावार्थ :  जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत्‌ ही कहा जाता है, न असत्‌ ही।।12।।

 

I will declare that which has to be known, knowing which one attains to immortality, the beginning-less supreme Brahman, called neither being nor non-being.।।12।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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English Literature – Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 39 – Providence…. ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem Providence…. .  This poem  is from her book “The Frozen Evenings”.)

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 39

☆ Providence…. ☆

You are just a straw

Floating with the gush of wind,

Going wherever destiny takes you.

 

Your finiteness

In the vastness of infiniteness

Is just an illusion

Making you falsely fantasise your worth.

 

Your knowledge, wisdom or health

May only give you inner strength

To dree the inevitable,

Your faith, commitment and character

May make you prudent

To face the inexorable;

But your path still remains undefined,

You still remain weightless

In the entirety of the universe.

 

The flow of life,

Depends not upon the straw,

But the wind that carries it.

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 32 ☆ लघुकथा – दूरदर्शिता ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक  “ बोधपरक लघुकथा – दूरदर्शिता ”। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस प्रेरणास्पद लघुकथा को सहजता से रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 32☆

☆  बोधपरक लघुकथा – दूरदर्शिता 

पानी से लबालब भरे एक तालाब में दो मछलियां रहती  थीं – दूरदर्शी और नुक्ताचीनी  , दोनों अच्छी दोस्त थीं पर स्वभाव में एक दूसरे के विपरीत. दूरदर्शी गंभीर स्वभाव की थी और हर काम सोच- समझकर किया करती थी. नुक्ताचीनी आलसी थी और हर बात को हँसकर हवा में उडा देती थी. उसका कहना था जो होगा देखा जाएगा. दूरदर्शी बहुत कोशिश करती थी उसे समझाने की, सही रास्ते पर लाने की लेकिन वह तो अपनी मर्जी की मालिक थी.

एक दिन दूरदर्शी तालाब की दीवार से सटी आराम कर रही थी तभी उसने दो मनुष्यों को आपस में बात करते सुना —‘ इस तालाब में बहुत मछलियां होंगी कल सबेरे आकर जाल डालेंगे, खूब कमाई होगी ‘. दूरदर्शी ने जल्दी से जाकर अन्य  मछलियों को सारी बात बताई और बोली हम सबको दूसरे तालाब में चले जाना चाहिए, नहीं तो जाल में फँस जाएंगे. यह सुनकर नुक्ताचीनी हँसकर बोली – अरे ये तो ऐसे ही डराती रहती है, जरूरी नहीं है कि कल वो आदमी जाल लेकर आ ही जाएं,कल की कल देखेंगे और यह कहकर वह तेजी से  गहरे पानी में चली गई.  दूरदर्शी क्या करती,वह चुप रही और सुबह होने का इंतजार करने लगी.

सुबह तालाब में ऊपर आकर उसने नजर दौडाई, देखा,  दो आदमी जाल लिए चले आ रहे थे. वे तालाब में जाल डालने की तैयारी करने लगे.वह  तेजी से अपनी सखियों से बोली – जल्दी से सब निकल चलो यहाँ से,  मछुआरे आ गए हैं. नुक्ताचीनी ने अब भी उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया. मछुआरों ने जाल डाला और नुक्ताचीनी उसमें फँस गई. वह बेबस निगाहों से अपनी सखियों की ओर देख रही थी पर अब पछताए होत क्या जब चिडिया चुग गई खेत ?

दूरदर्शी  मछली अपनी दूरदर्शिता से दूसरे  तालाब  में अन्य सखियों के साथ जीवन का आनंद उठा रही थी. सच ही है दूरदर्शिता जीवन में बहुत से संकटों से हमें बचा लेती है.

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

 

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