हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 43 ☆ लघुकथा – माँ  आज भी गाती है ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी स्त्री  विमर्श  पर आधारित लघुकथा माँ  आज भी गाती है।  स्त्री जीवन के  कटु सत्य को बेहद संजीदगी से डॉ ऋचा जी ने शब्दों में उतार दिया है। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी  को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 43 ☆

☆  लघुकथा – माँ  आज भी गाती है  

माँ बहुत अच्छा गाती है, अपने समय की रेडियो कलाकार भी रही है।  | पुरानी फिल्मों के गाने तो  उसे बहुत पसंद हैं | भावुक होने के कारण हर गाने को इतना दिल से गाती कि कई बार गाते-गाते गला भर आता और आवाज भर्राने लगती। तब आँसुओं और लाल हुई नाक को धोती के पल्लू से पोंछकर हँसती हुई कहती- अब नहीं गाया जाएगा बेटा ! दिल को छू जाते हैं गाने के कुछ बोल !

‘तुझे सूरज कहूँ या चंदा, तुझे दीप कहूँ या तारा’, ‘ऐ मेरे प्यारे वतन, ए मेरे उजड़े चमन’ जैसे गाने माँ हमेशा गुनगुनाती रहती थी। वह ब्रजप्रदेश की है इसलिए वहाँ के लोकगीत तो बहुत ही मीठे और जोशीले स्वर में गाती है। लंगुरिया, होरी और गाली(गीत) गाते समय उसका चेहरा देखने लायक होता था। माँ गोरी है और सुंदर भी , गाते समय चेहरा लाल हो जाता। लोकगीतों के साथ-साथ थोड़ी हँसी-ठिठोली तो ब्रजप्रदेश की पहचान है, वह भला उसे कैसे छोड़ती? जैसा लोकगीत हो, वैसे भाव उसके चेहरे पर दिखाई देने लगते।

हम अपने समधी को गारी न दैबे,

हमरे समधी का  मुखड़ा छोटा,

मिर्जापुर का जैसा लोटा….

लोटा कहते-कहते तो माँ हँस- हँसकर लोटपोट हो जाती। ढ़ोलक की थाप इस गारी (गीत) में और रस भर देती थी।

उम्र के साथ माँ धीरे-धीरे कमजोर होने लगी है। कुछ कम दिखाई देने लगा है, थोड़ा भूलने लगी है लेकिन अब भी गाने का उतना ही शौक और आवाज में उतनी ही मिठास। हाँ पहले जैसा जोश अब नहीं दिखता। अक्सर माँ फोन पर मुझसे कहती – ‘बेटा ! संगीत मन को बडी तसल्ली देता है। कभी-कभार अपने को बहलाने के लिए भी गाना चाहिए। जीना तो है ही, तो  खुश रहकर क्यों ना जिया जाए। इस जिंदादिल माँ की आवाज में उदासी मुझे फोन पर अब महसूस होने लगी थी

वह अपने दोनों बेटों के पास है। बहुएँ भी आ गयी हैं , अपने-अपने स्वभाव की। पिता जब तक जिंदा थे माँ अपना सुख-दुख उनसे बाँट लेती थी। उनकी मृत्यु के बाद वह बिल्कुल अकेली पड़ गयी। ‘नाम करेगा रौशन जग में मेरा राज-दुलारा’ गा-गाकर जिन बेटों को पाल-पोसकर बड़ा किया, उनकी बुराई करे भी तो कैसे ? पर वह यह समझने लगी कि अब बेटों को उसकी जरूरत नहीं रही।

माँ उदास होती है तो छत पर बैठकर पुराने गाने गाती है। एक दिन माँ छत पर अकेली बैठी बड़ी तन्मयता से गा रही थी- ‘भगवान ! दो घड़ी जरा इन्सान बन के देख, धरती पर चार दिन मेरा मेहमान बन के देख तुझको नहीं पता कोई कितना……..’

‘निराश शब्द आँसुओं में डूब गया। गीत के बोल टूटकर बिखर रहे थे या माँ का दिल, पता नहीं।

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature – Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 50 – Pandu’s sons ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem Pandu’s sons. )

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 50

☆ Pandu’s sons ☆

  

Cursed by Rishi Kindima

Into the realms of forest Pandu retired

The news of pregnant Gandhari

In him, the desire to have a son fired.

 

Seeing him desolate and murky

His dutiful wife, Kunti consoled

“For his wife to bear another man’s child,”

She said, “The law of Dharma allowed”.

 

“Let me call a Rishi,” said Pandu

“Let us call a Deva,” Kunti stated

Blessed by Rishi Durvasa, she had a boon;

The knowledge made Pandu elated.

 

Pleased by Kunti’s solution

First to be invoked was Lord Yama

She gave birth to Yudhishtra

Who would be the upholder of Dharma

 

Next to be summoned was the God of wind

Of all Gods, most powerful and mightiest

And thus was born courageous Bhima

Who, one day, would be the strongest

 

And then, blessings were sought

From Indra, King of all Devas, who ruled the sky

Arjuna, the valiant archer was born

He became Kunti’s favourite by and by

 

And then, Kunti could invoke no more

Four were the maximum allowed

Pandu thought for a few days and then

For Madri, his second wife, implored

 

The Ashwini twins were invoked for Madri

The Lord of morning and evening stars

Nakula, the handsomest man was born

Along with his twin, with knowledge of near and far

 

Pandu, thus had five sons

Together, they came to be as Pandavas known

Had wisdom of ‘King perfect’ collectively

Honesty, strength, skill, beauty and wisdom they honed

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

Pune, Maharashtra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ चुप्पी-17 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ चुप्पी-17

‘चुपचाप रहो’

दो शब्दों का मेल,

कहने वाले,

सुनने वाले के भीतर

मचा देता है

विचारों का

दोतरफा कोलाहल!

 

©  संजय भारद्वाज 

8:36 बजे, 2.9.2018

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन# 62 – हाइबन – अफीम ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक हाइबन   “अफीम । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन  # 62 ☆

☆ अफीम ☆

अफीम को काला सोना भी कहते हैं । भारत में राजस्थान और मध्यप्रदेश के सीमावर्ती जिले चित्तौड़गढ़ व  नीमच में इसकी भरपूर पैदावार होती है। समस्त प्रकार की दवाएं इसी से बनती है । इसे ड्रग का मूल स्रोत भी कह सकते हैं । इस के फल पर चीरा लगाकर इसे निकाला जाता है। जिसे अफीम लूना कहते हैं । इस फल से पोस्तादाना मिलता हैं । फल का खोल नशे में उपयोग लिया जाता हैं ।

एक फल डोड़े में 4 से 5 चीरे लगाए जाते हैं। एक बार के चीरे में 4 से 5 चीरे लगते हैं। दूसरे दिन सुबह इसी अफीम के दूध को एक विशेष प्रकार के चम्मच से एकत्रित किया जाता है।

अफीम के खेत में सामान्य व्यक्ति आधे घंटे से ज्यादा खड़ा नहीं हो सकता है। अफीम के द्रव की सुगंध से उसे चक्कर आने लगते हैं और वह बेहोश होकर गिर जाता है। मगर इस कार्य में संलग्न व्यक्ति आराम से बिना थकावट के कार्य करते रहते हैं।

अधिकांश बड़े स्मगलर इसी की तस्करी करते हैं । यह सरकारी लाइसेंस के तहत  ₹1500 से लेकर ₹2500 किलो में खरीद कर संग्रहित की जाती है, जबकि तस्कर इसी मात्रा के एक से डेढ़ लाख रुपए तक देते हैं।

खेत में डोड़ें~

अफीम लू रही हैं

दक्ष बालिका ।

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 32 ☆ मख्खी नहीं मधुमख्खी बने ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु‘

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “मख्खी नहीं मधुमख्खी बने”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 32 – मख्खी नहीं मधुमख्खी बने ☆

जन्मोत्सव की पार्टी चल रही थी, पर उनकी निगाहें किसी विशेष को ढूंढ रहीं थीं,  कि तभी वहाँ  एक  पत्रिका के संपादक आये और  उनके चरण स्पर्श कर कहने लगे  – चाचा जी जन्मदिवस की शुभकामनाएँ …..

“ओजरी भर विभा, वर्ष भर हर्ष मन,

शांति,सुख, कल्पना,आस्था, आचमन।

जन्मदिन की पुनः असीम शुभकामनाएँ…

उन्होंने कहा, “अब अच्छा लगा,  कितनी भी खुशी मिले, उपहार मिलें सब  अधूरे  लगते  हैं,  जब तक बच्चों  द्वारा खुशी न मिले।

बहुत बढ़िया पंक्तियाँ……   चाचा जी ने सिर पर हाथ रखते हुए शुभाशीष दिया।

इसी पार्टी में प्रमोशन सबंधी विवाद की चर्चा भी चल रही थी। जहाँ दो गुट आपस में भिड़े हुए थे।

चर्चा को आगे बढ़ाते हुए  उन्होंने कहा,  जिस तरह माह में दो पक्ष होते हैं, सिक्के में  दो पहलू होते हैं, विचारों में दो विचार होते हैं,मतों में दो मत होते हैं, ठीक  वैसे ही जब कोई शुभ आयोजन अच्छे से निपटता हुआ दिखे तो अवश्य ही कहीं न कहीं से अशुभ रूपी विघ्न आ धमकता है। पर  हम तो ठहरे मोटिवेशनल लेखक सो ये तय है कि बस सकारात्मक पहलू ही देखना है, चाहे  स्थिति कुछ भी हो।

तभी उनके संपादक भतीजे ने चुटकी लेते हुए कहा –

यहाँ एक बात और याद आती है कि  अक्सर  विवाद के बाद  ही फ़िल्म रिकार्ड तोड़ कमाई करती है, अब ये  उत्सव भी करेगा, बस सही योजना बने, जिससे नियमित कार्य शुरू हो और इस जन्मोत्सव के प्रायोजक का खर्चा – पानी भी निकल सके।

प्रायोजक महोदय ने गहरी साँस भरते हुए, गंभीर स्वर में कहा ” समयाभाव के कारण जितना कार्य किया है, वही रूप रेखा बना दी है,  अब आप लोग सुझाएँ। आप तो गुरुदेव हैं, सबसे ज्यादा समझदार होना चाहिए आपको।”

उनका एक सहयोगी कहने लगा “चरणों तक पहुँच गया हूँ, माफी माँगने,अब क्या करूँ ?”

एक सदस्य रोनी सी सूरत लिए कहने लगा ” बेटा बन जाइये, बेटे की हर ग़लती माफ़ रहती है।”

पागलपन की हद हो गई मक्खी नहीं मधुमक्खी बनिए,अभी भी समय है सुधर जाएँ संपादक महोदय ने कहा।

तभी  उन्होंने ने  ज्ञान बाँट  दिया समस्याओं से लड़ना चाहिए, शिखर पर पहुँचने में बहुत ठोकरें लगेंगी पर हार नहीं मानना चाहिए, संपादक को तो बिल्कुल नहीं  पत्रिका सही थी, है और रहेगी। शुरुआत में तो सबको आलोचना सहनी  पड़ती है  बाद में प्रतिष्ठित होते ही जो लिखो वही सत्य बन जाता है, बस उस मुकाम तक  पहुँचने की देर होती है।

वहाँ उपस्थित एक अधिकारी ने  कहा “प्रभु आप तो साक्षात परमहंस की श्रेणी में आ गये, आप अवतारी हैं, कोई साधारण मानव  नहीं ,अब कोई दुविधा नहीं जैसा  चाहें वैसा  निर्णय  लें मैं  तो सदैव  अनुगामी हूँ।

चलो भाई इस  निरर्थक वार्तालाप को विराम दें अब लंच का समय हो गया है, जन्मोत्सव का आनन्द उठाते हुए जम के  रसगुल्ले और केक खाते हैं, पनीर टिक्का का नाम सुनते ही पानी आ जाता है, सभी हहहहहहह……. करते हुए  खाने की टेबल की ओर चल दिए।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 70 ☆ साहित्य की चोरी और  पुरस्कार की भूख ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक विचारणीय आलेख साहित्य की चोरी और  पुरस्कार की भूख।  आलेख का शीर्षक ही साहित्यिक समाज में एक अक्षम्य अपराध / रोग को उजागर करता है। ऐसे विषय पर बेबाक रे रखने के लिए श्री विवेक रंजन जी का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 70 ☆

☆ साहित्य की चोरी और  पुरस्कार की भूख ☆

जो सो रहा हो उसे जगाया जा सकता है, पर जो सोने का नाटक कर रहा हो उसे नहीं ।

अनेक लोगो को मैंने देखा सुना है जो बहुचर्चित रचनाओं विशेष रूप से कविता, शेर, गजलों को बेधड़क बिना मूल रचनाकार का उल्लेख किये उद्धृत करते हैं, कई दफा ऐसे जैसे वह उनकी रचना हो।

विलोम में कुछ लोग अपने कथन का प्रभाव जमाने के लिए सुप्रसिद्ध रचनाकार के नाम से उसे पोस्ट करते हैं। व्हाट्सएप, कम्प्यूटर ने यह बीमारी बधाई है, क्योंकि कट, कॉपी, पेस्ट और फारवर्ड की सुविधाएं हैं।

अनेक शातिराना लोगों को जो स्वयं अपने, अपनी पत्नी बच्चों के नाम से धड़ाधड़ लिखते दिखाई देते हैं उनके पास मौलिक चिंतन का वैचारिक अभाव होता है।  वे आगामी जयन्ती, पुण्यतिथि के कैलेंडर के अनुसार 4 दिनों पहले ही चुराये गये उधार के विचारों को,शब्द योजना बदलकर सम्प्रेषित करते हैं।  अखबार को भी सामयिक सामग्री चाहिए ही, सो वे छप भी जाते हैं, मांग कर, जुगाड़ से  पुरस्कार भी पा ही जाते हैं, ऐसे लोगो को  सुधारना मुश्किल है। कई दफा जल्दबाजी में ये सीधी चोरी कर लेते हैं व पकड़े जाते हैं। यह साहित्य के लिए दुखद है।

साफ सुथरा पुरस्कार सम्मान रचनाकार को आंतरिक ऊर्जा देता है। यह उसे साहित्य जगत में स्वीकार्यता देता है।

किंतु आदर्श स्थिति में ध्येय पुरस्कार नही लेखन होना चाहिए, पर आज समाज मे हर तरफ नैतिक पतन है, साहित्य में भी यह स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। ऐसे लोगो को  सुधारना मुश्किल काम है।

यू मैं तो यह मानता हूं कि ऐसी हरकतें सोशल मिडीया के इस समय मे छिपती नही है, और जब सब उजागर होता है तब सम्मानित व्यक्ति के प्रति श्रद्धा की जगह दया हास्य व वितृष्णा का भाव पनपने में देर नही लगती, अतः सही रस्ता ही पकड़ने की जरूरत है, सम्मान पाठकों के दिल मे लेखन की गुणवत्ता से ही बनता है।

सद विचार पंछी हैं उनका जितना विस्तार हो अच्छा है।

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 39 ☆ नवगीत – भीगिए, गाइए आज गाना ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक नवगीत  “भीगिए, गाइए आज गाना.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 39 ☆

☆ नवगीत – भीगिए, गाइए आज गाना ☆ 

 

फिर हुआ

आज मौसम सुहाना

आ गया बारिशों का जमाना

भीगिए

गाइए आज गाना

 

गा रही हैं फुहारें

छतों पर

दर्द लिख दीजिए

सब खतों पर

 

बचपने में चले जाइएगा

बूँदों से है

रिश्ता पुराना

 

युग-यगों से

प्रतीक्षा रही है

मीत!अब आस

पूरी हुई है

 

प्रेयसी आ गई

आज मिलने

बात मन की

उसे अब बताना

 

जागिए

अब निकलिए घरों से

उड़ चलें आज

मन के परों से

 

छेड़ दी रागिनी

पंछियों ने

देखिए

पंख का फड़फड़ाना

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆  पाहुनी ही एकता ☆ सौ.अश्विनी कुलकर्णी

☆ कवितेचा उत्सव ☆ पाहुनी ही एकता ☆ सौ.अश्विनी कुलकर्णी

 

उगवू दे नी उजळूदे,  साऱ्या मनांचे सूर्य आता ।

अंधाराला भय वाटू दे, पाहुनी ही एकता ।।धृ।।

 

मनसूर्याचा जन्म व्हावा, घेऊनी किरण माणुसकीचे  ।

करुणेचा स्रोत पाझरावा, दर्शन व्ह्यावे प्रीतीचे ।

मानवतेचा जय व्हावा, यावी निववळ नीरामयता ।

अंधाराला भय वाटावे, पाहुनी ही एकता ।।1।।

 

पेटलेली आग हृदयी, नव सार्थकी लागावी ।

धार जिभेच्या तलवारीची, घाव घालण्या नसावी  ।

भेद सारे आता मिटावे, जाणता नि अजाणता ।

अंधाराला भय वाटावे, पाहुनी ही एकता ।।2।।

 

© सौ अश्विनी कुलकर्णी

सांगली  (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆  बंद दरवाजा ☆ डाॅ.मेधा फणसळकर

डाॅ. मेधा फणसळकर

संक्षिप्त परिचय 

माणगाव, सिंधुदुर्ग येथे वास्तव्य आणि वैद्यकीय व्यवसाय.

लेखन व वाचनाची आवड. अनेक नियतकालिके, मासिके, दिवाळीअंक यामधून वेगवेगळ्या विषयांवर लेखन! ललीतलेखन हा अधिक आवडता लेखनप्रकार! विनोदी लेखनाची आवड! काही कविता, कथा आणि व्यक्तीचित्रणे वेगवेगळ्या अंकातून, इ- अंकातून प्रसिद्ध झाल्या आहेत.

☆ विविधा ☆  बंद दरवाजा ☆ डाॅ. मेधा फणसळकर ☆

दोन दिवस या माझ्या स्मार्ट भ्रमणध्वनीने हैराण केले बाई !मी आपली सारखी उचलून उचलून त्याला अंजारुन गोंजारुन इंटरनेटशी सख्य करायला सांगत होते, तो बिचारा माझा सोनूला पण  दहा दहा वेळा विनवणी करुन त्याला आपल्या कवेत घ्यायला विनवत होता.पण आज भारत संचार निगमच्या नेटमहाराजानी संप पुकारला होता.बाकीचे नेटकर पण जरा तोऱ्यात असल्याने आखडून दाखवत होते. त्यामुळे माझे कायप्पा (WAP) आणि मुखपुस्तक (fb) पण बिचारे हवालदिल झाले होते. त्यांचे सर्वच दरवाजे बंद झाले होते. त्यामुळे दोन दिवसांपासून मैत्रिणींबरोबर चिवचिवाट, हळूच एकमेकींना private मेसेज टाकून दुसऱ्या एखादीबद्दल गॉसिप करायला न मिळाल्याने आणि सख्यांच्या उखाळ्या पाखाळ्या काढायला न मिळाल्याने माझ्या जीवाची नुसती घालमेल होत होती. रोज सकाळी पुन्हा पुन्हा मी त्या भारत संचार ची विनवणी करत होते, पण पठ्ठ्या काही दाद देत नव्हता. शेवटी मनावर दगड ठेवून त्या माझ्या भ्रमणसोन्याला हातातून बाजूला ठेवले आणि ‛आलीया भोगासी’ असे म्हणून कणिक तिंबायला घेतली. सगळा राग तिच्यावर असा काढला की प्रत्येक पोळी तव्यावर टम्म फुगली. त्यावर मुलांचे बाबा म्हणतात कसे, “ चला रे मुलांनो, पट्कन जेवायला बसा. आज आपल्यावर कायप्पा आणि मुखपुस्तकाने कृपा केलीय. गरगरीत पोळी आणि झणझणीत रस्सा खाऊन टाका बरे! परत कधी नशिबात असेल सांगता येणार नाही. ”मला जरा रागच आला. त्याच रागात दणादणा भांडी घासली, खसाखसा ओटा पुसला आणि लख्ख केला. ती टमटमीत पोळी आणि झणझणीत रस्सा रागारागाने गिळला. मग बराच वेळ एकट्या पडलेल्या त्या माझ्या भ्रमणसोन्याला पुन्हा प्रेमाने हातात घेतले. चांगले अंजारले-गोंजारले आणि नेटमहाराजांची आराधना करायला सुरुवात केली .

श्वास रोखून बघत राहिले तर काय आश्चर्य? चक्क नेटमहाराज प्रसन्न झाले आणि  सर्व बंद दरवाजे उघडले गेले आणि कायप्पा धबधब्यासारखा कोसळू लागला. मुखपुस्तकाच्या संदेशानी इनबॉक्स भरुन गेला आणि त्या वर्षावात मी चिंबचिंब भिजून गेले.

 

©  डाॅ. मेधा फणसळकर

9423019961

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆  गारवा ☆ सौ. अंजली गोखले

☆ विविधा ☆  गारवा ☆ सौ. अंजली गोखले ☆

रण रण त ऊन! मे महिन्याचा रखरखीत उन्हाळा! धरती तप्त ! उन्हामध्ये आंबा घाटामध्ये, एक पांढरी शुभ्र आली शान गाडी थांबली. गाडी मधून सहा सात बहिण भाऊ उतरले अन् त्यांची मनं जणू काही फुलपाखरं बनली . घाटामधल्या वृक्षांनी आपली सळसळ करून त्यांचं स्वागत केलं . हिरवी काळी टपोरी करवंदं म्हणाली,” या रेया ‘ बाळांनो, आम्ही तुमचीच वाट पहात होतो . तुमच्याच साठी आम्ही या उन्हातही आमच्या तला गोड रस टिकवून ठेवलाय”.

बऱ्याच वर्षांनी एकत्र आलेल्या या बहिण – भावंडांना खूप आनंद झाला होता . आंबा घाटातला हिरवागार निसर्गही त्यांच्याच साठी फुलला होता . सगळीकडे रखरखत ऊन असलं, तरी झाडाच्या मुळांनी खोलवर जाऊन आपल्या खोडासाठी, पानां साठी, पाणी आणलं होतं . पानाचा रसरशीतपणा, तजेलदार पणा टिकवून ठेवला होता . मध्येच एखाद्या झाडाला, नाजूक नाजूक पांढऱ्या शुभ्र फुलांचे झुबके लागले होते . वाऱ्या बरोबर डोलत डोलत, ते झुबके यांचे स्वागत करत होते . अंतरा अंतरावर लाल चुटुक गुलमोहोर बहरला होता .

अशा या रम्य आणि अवखळ निसर्गाच्या सानिध्यात ही भावंडं आपली वय विसरली, आपल्या कामाचा ताण विसरली, ऑफीस मधल्या कामाचे डोंगर विसरली, पैशाचे व्यवहार विसरली आणि आपल्या मुलांच्या वयाएवढी पुनः एकदा लहान झाली . आपल्या बालपणात रमली.

अधून मधून एखाद्याचा मोबाईल वास्तवा मध्ये आणण्याचा प्रयत्न करत होता पण आज मोबाईल वरुनही मस्ती तच उत्तर जात होते . उन्हामध्ये सगळ्यांच्या मनामध्ये आनंदाचं चांदणं बरसत होतं . आपल्या नाजूक, रंगबेरंगी फुलपाखरी पंखांनी हे सगळे घाटातमध्ये इकडून तिकडे, तिकडून इकडे छानपैकी फिरत होते मधूनच एखादा क्षण कॅमेऱ्यात टिपला जात होता .

आज कुणाला कुणाकडून का S ही नको होत . निखळ आनंदाचा पाऊसच जणूकाही बरसत होता.

आंबा घाटाचा हा अविस्मरणीय दौरा, पन्हाळ्यावर झेललेलं गार गार वारं, हेच यांना उरलेले वर्षातले दिवस मजेत घालवायला पुरणार होतं . आनंदाचा हा ठेवा, सगळ्यांनी भरभरून मनातल्या कुपीमध्ये जपून ठेवला.

खरच, भाऊ बहिणीचं प्रेम किती निखळ, निरागस आणि पवित्र असतं. साठीनंतर भेटले तरी सगळे बालपणात रमतात. त्या गोड आठवणींच्या हिंदोळ्यावर झुलतात.” तुझ्या गळा माझ्या गळा, गुंफू मोत्यांच्या माळा” म्हणत डुलतात . त्यांच्याकडे आठवणींच्या रेशमाच्या मऊमऊ लडी असतात, शिंपल्यातल्या मोत्यांप्रमाणे दुर्मिळ प्रेमाचे क्षण असतात , रमणीय सुखांचे तुषार असतात आणि धो धो पावसा प्रमाणे धोधो प्रसंग असतात. कधीतरी अशी मैफल जमली की आनंदाचा शिडकावा होत असतो, हास्यांची बहार फुलत असते . या स्मृतिगंधाच्या फुलांमुळेच बहिण भावाचे नाते पक्के विणले जाते आणि किती जरी एकमेकांपासून दूर गेले तरी या रेशिम गाठी घट्ट च रहातात . त्याचमुळे उन्हाळ्यातही त्या सर्वाना प्रेमाचा गारवा अनुभवता येतो आणि आपुलकीची ऊब ही मिळते.

 

© सौ. अंजली गोखले

मो ८४८२९३९०११

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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