हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार – # 13 – लघुकथा – एक पुरस्कार समारोह ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

 

(आपसे यह  साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  e-abhivyakti के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं । अब हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे।  आज प्रस्तुत है  उनकी  लघुकथा  “एक पुरस्कार समारोह”।  ईमानदारी वास्तव में  नीयत से जुड़ी  है। समाज में व्याप्त ईमानदारी के स्तर को डॉ परिहार जी ने बेहद खूबसूरत अंदाज में प्रस्तुत किया है। हम आप तक ऐसा ही  उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 13 ☆

 

☆ लघुकथा – एक पुरस्कार समारोह  ☆

कलेक्टरेट के चपरासी दुखीलाल को दस हजार रुपये से भरा बटुआ एक बेंच के पास पड़ा मिला। उसने उसे खोलकर देखा और सीधे जाकर उसे कलेक्टर साहब की टेबिल पर रखकर छाती तानकर सलाम ठोका। कलेक्टर साहब ने दुखीलाल की बड़ी तारीफ की।

दुखीलाल की ईमानदारी की खबर पूरे कलेक्टरेट में फैल गयी। जिस तरफ भी वह जाता, लोग शाबाशी देते। कुछ लोग उसकी तरफ इशारा करके दूसरों को बताते, ‘यही दुखी लाल है, दस हजार का पर्स लौटाने वाला।’ दुखी लाल का सीना एक दिन में तीन इंच बढ़ गया।

सिर्फ उसके साथी झगड़ू ने उसके आत्मगौरव के गुब्बारे में सुई टोंचने की कोशिश की। झगड़ू बोला, ‘वाह रे बुद्धूलाल! हाथ में आये दस हजार सटक जाने दिये। तुमसे नईं संभलते थे तो हमें दे देते, हम संभालकर रख लेते।’ दुखी लाल ने उसे डपटा, ‘चुप बेईमान!’ और झगड़ू ताली पीटकर हँसा, ‘जाओ जुधिष्ठिर, जाओ।’

उसी दिन नगर के प्रसिद्ध समाज सेवक चतुर लाल जी पर्स पर अपना दावा पेश करके, प्रमाण देकर रुपया ले गये। दूसरे दिन नगर की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था ‘फुरसत’ की ओर से दुखी लाल का अभिनंदन किया गया। चतुर लाल भी उसमें हाज़िर हुए।

समारोह में दुखी लाल की ईमानदारी की खूब प्रशंसा हुई। उसे माला पहनायी गयी और अभिनंदन-पत्र दिया गया। चतुर लाल भी बोले। उन्होंने कहा, ‘दुखी लाल के काम से साबित होता है कि हमारे देश में अभी भी ईमानदार और सही रास्ते पर चलने वाले लोग हैं। दुखी लाल का काम लाखों को ईमानदारी की प्रेरणा देगा। भाई दुखी लाल ने मुझे बड़े नुकसान से बचाया है, इसलिए मैं उन्हें एक हजार रुपये की राशि की तुच्छ सी भेंट देना चाहता हूँ। मेरा अनुरोध है कि वे इसे स्वीकार करें।’

उन्होंने राशि निकालने के लिए जेब में हाथ डाला कि इतने में दरवाज़े पर खाकी वर्दी दिखायी पड़ी और एकाएक चतुर लाल सब छोड़छाड़ कर अपनी धोती की लाँग संभालते हुए दूसरे दरवाज़े से भाग खड़े हुए। समारोह में अव्यवस्था फैल गयी।

दरवाज़े में से खुद पुलिस अधीक्षक हॉल में आये। उन्होंने कमरे में नज़र दौड़ायी और पूछा, ‘कहाँ गया वह समाज सेवक का बच्चा? बदमाश ने झूठा दावा पेश करके दूसरे का रुपया ले लिया।’

दुखीलाल मुँह फाड़े सब देख रहा था।

 

©  डॉ. कुन्दन सिंह परिहार , जबलपुर (म. प्र. )

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ संजय उवाच – #10 – # No Abusing ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की  नौवीं कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 10 ☆

 

☆ # No Abusing ☆

रात चढ़ रही है, पास के मकान में हमेशा की तरह घनघोर कलह जारी है। सास-बहू के ऊँचे कर्कश स्वर गूँज रहे हैं, साथ ही किसी जंगली पशु की तरह पुरुष स्वर की गुर्राहट कान के पर्दे से बार-बार टकरा रही है। उनका स्कूल जानेवाला लड़का जन्म से यह सब देख, सुन रहा है। उसका कोई स्वर नहीं है। अनुमान लगाता हूँ कि वह घर के किसी कोने में सुन्न खड़ा होगा। छोटी नादान बिटिया जोर-जोर से रो रही है। बच्चों की मनोदशा और उनके मन पर अंकित होते प्रभाव को नज़रअंदाज़ कर असभ्यता का तांडव जारी है।

‘थिअरी ऑफ इवोल्युशन’ या ‘क्रमिक विकास का सिद्धांत’ आदमी के सभ्य और सुसंस्कृत होने की यात्रा को परिभाषित करता है। यह केवल एक कोशिकीय से बहु कोशिकीय होने की यात्रा भर नहीं है। संरचना के संदर्भ में विज्ञान की दृष्टि से यह सरल से जटिल की यात्रा भी है। ज्ञान या अनुभूति की दृष्टि से देखें तो संवेदना के स्तर पर यह सरलता से जटिलता की यात्रा है। विकास गलत सिद्ध हुआ है या उसे पुनर्परिभाषित करना है, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

लेकिन यहाँ चीखने-चिल्लाने के अस्पष्ट शब्दों में सबसे ज़्यादा स्पष्ट हैं पुरुष द्वारा बेतहाशा दी जा रही वीभत्स गालियाँ। माँ, पत्नी, बेटी की उपस्थिति में गालियों की बरसात। दुर्भाग्य की बात यह है कि यह बरसात निम्न से लेकर उच्चवर्ग तक अधिकांश घरों में परंपरा बन चुकी है।

क्रोध के पारावार में दी जा रही गाली के अर्थ पर गाली देनेवाले के स्तर पर विचार न किया जाए, यह तो समझा जा सकता है। उससे अधिक यह समझने की आवश्यकता है कि घट चुकने के बाद भी उसी घटना की बार-बार, अनेक बार पुनरावृत्ति करनेवाले का बौद्धिक स्तर इतना होता ही नहीं कि वह विचार के उस स्तर तक पहुँचे।

वस्तुतः क्रोध में पगलाते, बौराते लोग मुझे कभी क्रोध नहीं दिलाते। ये सब मुझे मनोरोगी लगते हैं, दया के पात्र। बीमार, जिनका खुद पर नियंत्रण नहीं होता।

अलबत्ता गाली को परंपरा बनानेवालों के खिलाफ ‘मी टू’ की तरह एक अभियान चलाने की आवश्यकता है। स्त्रियाँ (और पुरुष भी) सामने आएँ और कहें कि फलां रिश्तेदार ने, पति ने, अपवादस्वरूप बेटे ने भी गाली दी थी।  अपने सार्वजनिक अपमान से इन गालीबाज पुरुषों को वही तिलमिलाहट हो सकती है जो अकेले में ही सही गाली की शिकार किसी महिला की होती होगी।

गाली शाब्दिक अश्लीलता है, गाली वाचा द्वारा किया गया यौन अत्याचार और लैंगिक अपमान है। सरकार ने जैसे ‘नो स्मोकिंग जोन’ कर दिये हैं, उसी तरह गालियों को घरों से बाहर करने, बाहर से भी सीमापार करने के लिए एक मुहिम की आवश्यकता है।

आइए, ‘नो एब्यूसिंग’ की शपथ लें। गाली न दें, गाली न सुनें। गाली का सम्पूर्ण निषेध करें।

मित्रो, मैं आज से # No Abusing शुरू कर रहा हूँ। इसमें मेरा साथ दें, शामिल हों।

# No Abusing

(इस पोस्ट का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार करने का आप सबसे निवेदन है। इसे विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कर जन-आंदोलन बनाने का भी अनुरोध है। )
Read my thoughts on YourQuote app at: Sanjay Bhardwaj

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

 

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गंतव्य की ओर ☆ – सुश्री पल्लवी भारती

सुश्री पल्लवी भारती 

 

(प्रकृति अपने प्रत्येक रूप के रंगो- छंदों से केवल एक ही इशारा करती है, कि “आओ, अपने गंतव्य की ओर चलो”… इसी विषय पर आधारित है  सुश्री पल्लवी भारती जी की यह कविता- “गंतव्य की ओर”।) 

 

? गंतव्य की ओर ?

 

प्रात: रश्मि की किरण से,

और सांध्य के सघन से;

रक्त-वर्णित अंबुधि में,

अरूण के आश्रय-सुधि में;

सप्ताश्र्व-रथ पे आरूढ़,

सदैव से निश्चयी दृढ़।

दीप्त भाल विशाल ज्यों क्षितिज के उस छोर।

चलें गंतव्य की ओर॥

 

खग- गणों के कलरवों में,

मौन हुए गीतों के स्वर में;

एक चिंतन भोज्य-कण,

और तिनकों का संरक्षण।

अस्थिर गगन और धूलिमय नभ;

ध्येय अपना पीछे हुआ कब?

शीघ्रतम दिन व्यतीत ज्यों अब हुआ है भोर।

चलें गंतव्य की ओर॥

 

पुष्प तरूवर वाटिका,

चाहे लतिका वन-कंटिका;

तृण-शिशु और पल्लवित पर,

सहला रहे हैं मारूत्य-कर।

फल फूल मुखरित कंठ से,

सेवा आगाध आकंठ से।

नव-शाख पुलकित हरिताभ पट-धर और पुष्पित डोर।

चलें गंतव्य की ओर॥

 

उन्माद गिरि का निर्झर है,

उल्लास नदी का प्रखर है;

संसृति कूल-किनारें सिंचित,

नानाविधि जीवन संरक्षित।

पथ दुर्गमों को कर पार,

लहरें हैं नाची बारंबार।

जीवन प्रदत्त अस्थिर चपलता द्रुत गति अघोर।

चलें गंतव्य की ओर॥

 

दिन-रैन संग में सन्निहित,

काल-भाल पट्टिका पर उद्धृत।

हो बाल रवि या नव निशा,

हो तुच्छ प्राणी या वसुन्धरा;

वायु पतझड़ कोकिला स्वर,

द्वंद्व संगम लीन कर।

फिर कहाँ कैसी प्रतीक्षा प्रलाप का है शोर!

चलें गंतव्य की ओर॥.

 

पल्लवी भारती ✍

संपर्क –  बेलपाड़ा, मधुपुर (जिला –  देवघर) पिन –815353  झारखंड मो- 8808520987,  ई-मेल– pallavibharti73@gmail. com

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ? मी_माझी – #17 – पाचोळा… ? – सुश्री आरूशी दाते

सुश्री आरूशी दाते

 

(प्रस्तुत है  सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की   सत्रहवीं कड़ी  पाचोळा…।  सुश्री आरूशी जी  के आलेख मानवीय रिश्तों  को भावनात्मक रूप से जोड़ते  हैं।  सुश्री आरुशी के आलेख पढ़ते-पढ़ते उनके पात्रों को  हम अनायास ही अपने जीवन से जुड़ी घटनाओं से जोड़ने लगते हैं और उनमें खो जाते हैं। एक पान  के पत्ते से  नवजीवन की परिकल्पना को जोड़ना एवं अंत में दी हुई कविता दोनों ही अद्भुत हैं। सुश्रीआरुशी जी के  संक्षिप्त एवं सार्थकआलेखों  तथा काव्याभिव्यक्ति का कोई सानी नहीं।  उनकी लेखनी को नमन। इस शृंखला की कड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़  सकेंगे।) 

 

? साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #17 ?

 

☆ पाचोळा… ☆

 

पाचोळा, पानांचा… पानगळ… निष्पर्ण… एका सुरुवातीचा शेवट?
कदाचित शेवट… म्हणून भकास?

कदाचित?

की नव्याची सुरुवात?

अनेक विचार आपल्यालाच डाचत राहतात… पण पाचोळा कोणालाच नको असतो हे नक्की… पायदळी तुडवले जाण्याची शक्यताच जास्त असते… दुर्लक्षित होणे, ह्या सारखी भावना सुखावह नक्कीच नाही… पण मग अजून एक विचार मनात येतो… पाचोळा ही पूर्णत्वाची स्थिती तर नाही? समर्पणाची तयारी तर नाही? आयुष्यावर मात करत असताना झेललेल्या अनेक घावांचे व्रण नाहीसे करण्यासाठी ही धडपड नसावी ना? का सर्व जबाबदऱ्यांमधून बाहेर पडून हलक्या झालेल्या जीवनाचा वाऱ्याच्या झुळकी बरोबर सुरू झालेला प्रवास तर नाही? ह्या पानगळीबरोबर अनेक अयोग्य गोष्टीचा ऱ्हास होत असेल,  नाही का !

ह्याची उत्तरं प्रत्येकासाठी नक्कीच वेगळी असणार, ह्यात नवल नाही… पण उत्तरं शोधायचा प्रयत्न प्रगल्भतेच्या मार्गातील मैलाचा दगड ठरू शकतो… कारण ज्याची सुरुवात व्हावी वाटत असते, त्यासाठी कशाचातरी शेवट होणे ह्याला पर्याय नाही, हा निसर्गाचा नियम विसरून चालणार नाही…

कोंब होतो मी अवखळ,
पानापानातील सळसळ,
श्रुंगारलो सजलो देही,
जाणवे झाडाची कळकळ…

ऋतूंच्या बहरण्या साजे,
अनोखे चित्र सकळ,
खोडाखोडात अवतरे,
जगण्यासाठी पाठबळ…

वसंताच्या आगमनाने,
मिळाली माया सोज्वळ,
ग्रीष्माची उष्ण झळ,
नक्कीच होईल पानगळ,

जगरहाटी ठरलेली,
बाणवली जन्मभर,
निर्मिती, स्थिती, लय,
घडले सारे भरभर…

म्हणूनच म्हणतो,

आज पाचोळा जरी,
अनुभवले कोवळे क्षण,
पुलकित होत होतो,
पिऊन नाविन्याचे कण…

तुडवू नको पायदळी,
गळलो जरी अवकाळी,
सृष्टीचा एक भाग होतो,
आयुष्याच्या सकाळी…

 

© आरुशी दाते, पुणे 

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हिन्दी साहित्य- कथा-कहानी – लघुकथा – ☆ वाह! क्या दृश्य है? ☆ – डॉ . प्रदीप शशांक

डॉ . प्रदीप शशांक 

 

(डॉ प्रदीप शशांक जी द्वारा प्रस्तुत यह सामयिक लघुकथा  “वाह! क्या दृश्य है?“अत्यंत हृदयस्पर्शी है ।  वर्तमान में देश के विभिन्न राज्यों में भारी बारिश की वजह से बाढ़ की स्थिति बनी हुई है । यह लघुकथा उन्होने लगभग 12 वर्ष पूर्व बाढ़ की विभीषिका पर लिखी थी।)

 

? वाह! क्या दृश्य है ? ?

 

रमुआ पीपल के पेड़ की सबसे ऊंची डाल पर बैठा अपने चारों ओर दूर-दूर तक फैली अथाह जल राशि को देख रहा था ।

गांव के नजदीक बने बांध के भारी वर्षा से टूट जाने के कारण अचानक आई बाढ़ से पूरे गाँव में पानी भर जाने से कच्चे मकान ढह गये थे और गाँव के लोगों के साथ ही ढोर जानवर भी बहने  लगे थे । बाढ़ के पानी में बहते हुए उसके हाथों  में पीपल की डाल आ गई थी, जिसे उसने मजबूती से पकड़ उस पर चढ़कर अपने आप को किसी तरह बहने से बचा लिया था ।

पेड़ पर बैठे हुए आधा दिन एवं पूरी रात बीत गई थी । भूख प्यास के मारे उसका बुरा हाल था । बाद का पानी उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था, कहीं से कोई सहायता मिलती नजर नहीं आ रही थी। उस पर रह-रह कर बेहोशी छा रही थी । तभी उसे दूर आसमान पर हेलिकॉप्टर के आने की आवाज सुनाई दी । हेलिकॉप्टर उसी ओर आ रहा था । एक पल के लिये उसके मुर्दा हो रहे शरीर में जान आ गयी  । हेलिकॉप्टर के नजदीक आने पर उसने पूरी ताकत से मदद के लिये आवाज लगाई, किंतु हेलिकॉप्टर की गड़गड़ाहट में उसकी आवाज दबकर रह गई । नजदीक से निकलते हेलिकॉप्टर में उसने एक सफेद खद्दरधारी को प्रसन्नचित्त मुद्रा में दुरबीन आंखों से लगाये देखा । उस खद्दरधारी के चेहरे के भाव से उसे महसूस हुआ जैसे वह कह रहे हों – वाह! क्या दृश्य है ।

हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट दूर होती जा रही थी और रमुआ अपने आपको पूरे होश में रखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह सफल न हो सका । अंततः वह चेतनाशून्य होकर बाढ़ के पानी में बह गया ।

© डॉ . प्रदीप शशांक 
37/9 श्रीकृष्णपुरम इको सिटी, श्री राम इंजीनियरिंग कॉलेज के पास, कटंगी रोड, माढ़ोताल, जबलपुर ,मध्य प्रदेश – 482002

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – पंचम अध्याय (13) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

पंचम अध्याय

(सांख्ययोग और कर्मयोग का निर्णय)

 (ज्ञानयोग का विषय)

 

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।

नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌।।13।।

 

सदा संयमी पुरूष रख मन में कर्म सन्यास

नौ द्वारों की पुरी में करता सुख से वास।।13।।

 

भावार्थ :  अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।।13।।

 

Mentally renouncing all actions and self-controlled, the embodied one rests happily in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act. ।।13।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य – अटल स्मृति – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि –  ‘अ’ से अटल ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

? संजय दृष्टि  – ‘अ’ से अटल ?

(अटल जी की प्रथम पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि। गतवर्ष उनके महाप्रयाण पर उद्भूत भावनाएँ साझा कर रहा हूँ।)

 

अंततः अटल जी महाप्रयाण पर निकल गये। अटल व्यक्तित्व, अमोघ वाणी, कलम और कर्म से मिला अमरत्व!

लगभग 15 वर्षों से सार्वजनिक जीवन से दूर, अनेक वर्षों से वाणी की अवरुद्धता, 93 वर्ष की आयु में देहावसान और  तब भी अंतिम दर्शन के लिए जुटा विशेषकर युवा जनसागर। ऋषि व्यक्तित्व का प्रभाव पीढ़ियों की सीमाओं से परे होता है।

हमारी पीढ़ी गांधीजी को देखने से वंचित रही पर हमें अटल जी का विराट व्यक्तित्व  अनुभव करने  का सौभाग्य मिला। इस विराटता के कुछ निजी अनुभव मस्तिष्क में घुमड़ रहे हैं।

संभवतः 1983 या 84 की बात है। पुणे में अटल जी की सभा थी। राष्ट्रीय परिदृश्य में रुचि के चलते इससे पूर्व विपक्ष के तत्कालीन नेताओं की एक संयुक्त सभा सुन चुका था पर उसमें अटल जी नहीं आए थे।

अटल जी को सुनने पहुँचा तो सभा का वातावरण देखकर आश्चर्यचकित रह गया। पिछली सभा में आया वर्ग और आज का वर्ग बिल्कुल अलग था। पिछली सभा में उपस्थित जनसमूह में मेरी याद में एक भी स्त्री नहीं थी। आज लोग अटल जी को सुनने सपरिवार आए थे। हर परिवार ज़मीन पर दरी बिछाकर बैठा था। अधिकांश परिवारों में माता,पिता, युवा बच्चे और बुजुर्ग माँ-बाप को मिलाकर दो पीढ़ियाँ  अपने प्रिय वक्ता  को सुनने आई थीं। हर दरी के बीच थोड़ी दूरी थी। उन दिनों पानी की बोतलों का प्रचलन नहीं था। अतः जार या स्टील की टीप में लोग पानी भी भरकर लाए थे। कुल जमा दृश्य ऐसा था मानो परिवार बगीचे में सैर करने आया हो। विशेष बात यह कि भीड़, पिछली सभा के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक थी। कुछ देर में मैदान खचाखच भर चुका था। सुखद विरोधाभास यह भी  कि पिछली सभा में भाषण देने वाले नेताओं की लंबी सूची थी जबकि आज केवल अटल जी का मुख्य वक्तव्य था। अटल जी के विचार और वाणी से आम आदमी पर होने वाले सम्मोहन का यह मेरा पहला प्रत्यक्ष अनुभव था।

उनकी उदारता और अनुशासन का दूसरा अनुभव जल्दी ही मिला। महाविद्यालयीन जीवन के जोश में किसी विषय पर उन्हें एक पत्र लिखा। लिफाफे में भेजे गये पत्र का उत्तर पोस्टकार्ड पर उनके निजी सहायक से मिला। उत्तर में लिखा गया था कि पत्र अटल जी ने पढ़ा है। आपकी भावनाओं का संज्ञान लिया गया है। मेरे लिए पत्र का उत्तर पाना ही अचरज की बात थी। यह अचरज समय के साथ गहरी श्रद्धा में बदलता गया।

तीसरा प्रसंग उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद का है। बस से की गई उनकी पाकिस्तान यात्रा के बाद वहाँ की एक लेखिका अतिया शमशाद  ने प्रचार पाने की दृष्टि से कश्मीर की ऐवज़ में उनसे विवाह का एक भौंडा प्रस्ताव किया था। उपरोक्त घटना के संदर्भ में तब एक कविता लिखी थी। अटल जी के अटल  व्यक्तित्व के संदर्भ में उसकी कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं-

मोहतरमा!

इस शख्सियत को समझी नहीं

चकरा गई हैं आप,

कौवों की राजनीति में

राजहंस से टकरा गई हैं आप..।

कविता का समापन कुछ इस तरह था-

वाजपेयी जी!

सौगंध है आपको

हमें छोड़ मत जाना,

अगर आप चले जायेंगे

तो वेश्या-सी राजनीति

गिद्धों से राजनेताओं

और अमावस सी व्यवस्था में

दीप जलाने

दूसरा अटल कहाँ से लाएँगे..!

राजनीति के राजहंस, अंधेरी व्यवस्था में दीप के समान प्रज्ज्वलित रहे भारतरत्न अटलबिहारी वाजपेयी जी अजर रहेंगे, अमर रहेंगे! 

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – अटल स्मृति – कविता -☆ श्रद्धांजलि ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

 

(आज प्रस्तुत है श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा  पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी की प्रथम पुण्यतिथिपर श्रद्धांजलि अर्पित करती हुई कविता  “श्रद्धांजलि”।)

 

☆ अटल स्मृति – श्रद्धांजलि ☆

 

हे राजनीति के भीष्म पितामह!

हे कवि हृदय, हे कवि अटल!

हे  शांति मसीहा प्रेम पुजारी!

जन महानायक अविकल।

हे राष्ट्र धर्म की मर्यादा,

हे चरित महा उज्जवल।

नया लक्ष्य ले दृढ़प्रतिज्ञ,

आगे बढ़े चले अटल।

हे अजातशत्रु जन नायक ॥1॥

 

आई थी अपार बाधाएं,

मुठ्ठी खोले बाहे फैलाये।

चाहे सम्मुख तूफान खड़ा हो,

चाहे  प्रलयंकर घिरे घटाएँ।

राह तुम्हारी रोक सकें ना ,

चाहे अग्नि अंबर बरसाएँ।

स्पृहा रहित निष्काम भाव,

जो डटा रहे वो अटल।

हे अजातशत्रु जन नायक ॥2॥

 

थी राह कठिन पर रुके न तुम,

सह ली पीड़ा पर झुके न तुम,

ईमान से अपने डिगे न तुम,

परवाह किसी की किए न तुम,

धूमकेतु बन अम्बर में

एक बार चमके  थे तुम।

फिर आऊंगा कह कर के,

करने से कूच न डरे थे तुम।

हे अजातशत्रु जन नायक ॥3॥

 

काल के कपाल पर,

खुद लिखा खुद ही मिटाया।

बनकर प्रतीक शौर्य का,

हर बार गीत नया गाया।

लिख दिया अध्याय नूतन,

ना कोई अपना पराया ।

सत्कर्म से अपने सभी के,

आंख के तारे बने।

पर काल के आगे विवश हो,

छोड़कर हमको चले।

हम सभी दुख से है कातर

श्रद्धा सुमन अर्पित किये।

सबके हृदय छाप अपनी

आप ही अंकित किये ॥4॥

 

 

-सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 3 ☆ अरबी के पत्तों का  पानी ☆ – सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य  विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं ।  वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है सौ. सुजाता काळे जी की  ऐसी ही एक संवेदनात्मक भावप्रवण कविता  ‘नजरें पार कर’।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 3 ☆

☆ अरबी के पत्तों का  पानी

 

प्रिये,

तुम नक्षत्रों से चमकती हो,
मैं अदना सा टिमटिमाता हुआ तारा हूँ ।

 

तुम बवंड़र सी चलती आँधी हो,
मैं पुरवाई की मंद बहती हवा हूँ ।

 

तुम कोहरे से लिपटी हुई सुबह हो
मैं दूब पर रहती की ओस की बूँद हूँ ।

 

तुम शंख में रहनेवाला मोती हो
मैं अरबी के पत्तों का चमकता पानी हूँ ।

 

© सुजाता काळे ✍

पंचगनी, महाराष्ट्र।

9975577684

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 5 – शक्ति का मद ☆ – श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

 

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है   “शक्ति का मद।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य – # 5 ☆

 

☆ शक्ति का मद 

 

राम, नाम अग्नि बीज मंत्र (रा) और अमृत बीज मंत्र (मा) के साथ संयुक्त है, अग्नि बीज आत्मा, मन और शरीर को ऊर्जा देता है एवं अमृत बीज पूरे शरीर में प्राण शक्ति (जीवन शक्ति) को पुन: उत्पन्न करता है । राम दुनिया का सबसे सरल, और अभी तक का सबसे शक्तिशाली नाम है । भगवान राम कोसला साम्राज्य (अब उत्तर प्रदेश में) के शासक दशरथ और कौशल्या के यहाँ सबसे बड़े पुत्र के रूप में पैदा हुए, भगवान राम को हिंदू धर्म के ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘पूर्ण पुरुष’ या ‘स्व-नियंत्रण भगवान’ या ‘पुण्य के भगवान’ । उनकी पत्नी देवी सीता को पृथ्वी पर अवतारित एक महान स्त्री माना जाता हैं जो वास्तव में किसी के लिए भी आदर्श की परिभाषा है उन्हें हिंदु देवी लक्ष्मी का अवतार मानते हैं ।

भगवान राम अपने पिता दशरथ द्वारा अपनी सौतेली माँ कैकेयी (अर्थ : भाग्य, स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता की चरम सीमा) को दिए वचनों के पालन हेतु 14 सालोंतक के लिए वन  में रहने आये थे ।

दशरथ – दश का अर्थ नंबर दस तक की गिनती है और रथ का अर्थ युद्ध में प्रयोग करने वाला वहान, इसलिए दशरथ का शाब्दिक अर्थ है दस रथ। दशरथ को यह नाम मिला क्योंकि उनके पास दस दिशाओं में रथ चलाने की अनूठी क्षमता थी। परंपरागत रूप से हम केवल आठ दिशाओं को जानते हैं- उत्तर (उत्तर), दक्षिणी (दक्षिण), पूरव (पूर्व), पश्चिम (पश्चिम), ईशान (उत्तर पूर्व), आग्नेय (दक्षिण पूर्व), नैऋत्य (दक्षिण पश्चिम), वायव्य (उत्तर पश्चिम), और इन पारंपरिक आठ दिशाओं के अतिरिक्त, दशरथ ऊर्ध्व (आकाश की ओर ऊपर को) और अदास्था(पाताल की ओर नीचे को) में रथ चला सकते थे ।

भगवान राम अपनी पत्नी देवी सीताऔर छोटे भाई लक्ष्मण (अर्थ : भाग्यशाली अंग, अन्य अर्थ ‘लक्ष’ का अर्थ है लक्ष्य और ‘मन’ का अर्थ ‘मन’ है, इसलिए लक्ष्मणअर्थात जिसका मस्तिष्क हमेशा लक्ष्य पर रहता है) के साथ वन में रह रहे थे ।

सीता – जनकपुर के राजा जनक ( अर्थ : निर्माता) और उनकी पत्नी रानी सुनैना (अर्थ : सुंदर आँखें) की पुत्री, एवं उर्मिला (अर्थ : मोहिनी) और चचेरी बहन मंडवी (अर्थ : पारदर्शी ह्रदय वाली) और श्रुतकीर्ति (अर्थ : चरम प्रसिद्धि) की बड़ी बहन थीं। वह देवी लक्ष्मी (भगवान विष्णु की आदिशक्ति), धन की देवी और विष्णु की पत्नी का अवतार थीं। उन्हें सभी हिंदू स्त्रियों के लिए पारिवारिक और स्त्री गुणों के एक आदर्श स्त्री माना जाता है ।

 

© आशीष कुमार  

 

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