हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७६ – “वे अव्यक्त हुये जाते हैं …” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

दिखते पिता इस तरह

बैठे अगले कमरे में ।

कभी किसी के लहजे में

तो घर के चेहरे में ॥

 

टँगी गंध है रही खूँटियों

पर वो  जिस्मानी ।

उनके कपड़ो से आती जो

जानी पहचानी ।

 

वहीं हृदय के घाव रहे

बेशक बिन मरहम के –

विवश पड़ा हो ज्यों कोई

चौपाया  कचरे में ॥

 

धुँधली हुई निगाह

पाँव में आ बैठा कम्पन ।

जिससे पता चला करता

बाकी है स्पन्दन ।

 

कभी बोलते तो ऐसा

सब लोग सुना करते –

कोई शख्स कुयें से बोले

काफी गहरे में ॥

 

छड़ी, पास की बुझी बुझी सी

दिखती कोने में ।

वे अव्यक्त हुये जाते हैं

जीवित होने में ।

 

पर कराहना उनका

जैसे बतला जाता है –

कोई कंकड़ कहीं

गिरा हो पानी ठहरे में ॥

 

रहते थे चुपचाप घरेलू

सब सम्बंधों पर ।

चले गये चुपचाप चार

लोगों के कन्धों पर ।

 

समझ न पाये उन्हें कभी

जाने अनजाने ही –

उलझे रहे निदान खोजते

भ्रम के पहरे में ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

09-03-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – गंदगी ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – गंदगी ? ?

गंदे फुटपाथ पर

रोज रात सोते हैं

कम उम्र के मर्दनुमा कुछ लड़के,

साथ ही उनींदी रहती हैं

इसी उम्र की कुछ औरतें

क्योंकि

लड़कियाँं किसी भी उम्र की हों

औरतनुमा नहीं होती

बल्कि

केवल औरत होती हैं,

वे परदे में हों, न हों

बेपर्दा आँखें

उन्हें बेलिबास घूरती हैं,

पेवमेंट ब्लॉक से लदे

बगैर पेड़ के ट्री गार्ड से भरे

साफ-सुथरे लम्बे-चौड़े फुटपाथ

अपने एसी बेडरूम में

उठा लाते हैं

रात को गंदे फुटपाथ, 

सारे परदे खींचकर

कई तरीकों से

कई बार

मसली-कुचली

जाती है गंदगियाँ,

भोर अंधेरे उसी

सड़ांध भरे फुटपाथ पर

फेंक दी जाती है गंदगियाँ,

सर्दी, धूप, बारिश में

दिन भर गंदगियाँ

यहाँ-वहाँ असहाय

छितरी पड़ी होती हैं,

ताज़ा अखबारों की

बासी खबरों में

अतिक्रमण के बोझ से दबे

फुटपाथ पर चिंता जताते

एसी बेडरूमों की तस्वीरें

भरी पड़ी होती हैं।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ लाक्षापथ… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ लघुकथा ☆ लाक्षापथ… ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

ताजा ताजा पिघले कोलतार से सड़क बनी है। सड़क यानी सुविधा।सड़क यानी विकास। जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक गवाही दे रहा है। पर नन्हा चुरुंगुन( चिड़िया का बच्चा) कुछ नहीं जानता ।मनुष्य की बनाई दुनिया के नियमों से अनजान।हर सड़क, हर तरह के लोगों के लिए नहीं होती।चुरुंगुन- पगडंडी, सड़क और राजपथ के बीच फर्क नहीं समझता।

वह जैसे ही सड़क पर आकर बैठा, पिघले हुए कोलतार में उसका पाँव फंस गया।उसने निकालने की खूब चेष्टा की, पंख फड़फड़ाए  , शरीर झटका पर  पाँव न निकला। वह नन्ही सी चोंच खोले जोर -जोर से च्यूंक-च्यूंक करने लगा ।उसकी दशा देखकर एक युवक का मन करुणा से भर गया।

वह झुका और उसने धीरे-धीरे कोलतार में फँसा हुआ उसका पांव निकाला ।चुरुंगुन पलक झपकते ही उड़ गया। वह जाने कहाँ चला गया। 

युवक ने राहत की साँस ली ।काली सड़क थी, भूरा चुरुंगुन इसलिए झट से नज़र आ गया वर्ना किसी गाड़ी के नीचे या किसी के पाँव तले कुचला जाता ।

युवक  सड़क को देखते हुये मन ही मन सोच रहा था– लाक्षापथ की जानकारी सभी को नहीं होती न । 

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Weekly Column ☆ Heart-Touching Story # 67 – The Door is Open… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his HeartTouching StoryThe Door is Open 

☆ Heart-Touching Story # 67 ☆

The Door is Open… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

At the very edge of the city, where the “concrete jungle” begins to fade, stood a house called ‘Shanti Villa.’ Perhaps it was named ‘Shanti’ (Peace) because the silence there was deeper than a graveyard. The massive iron gate was covered in layers of rust, looking as if time itself had forgotten to touch it.

Aniruddha brushed off his expensive leather jacket. After six years in the glittering world of Australia, he had returned to this dusty silence. As the taxi driver unloaded the luggage, he looked at the house with a strange expression.

“Sir, does anyone actually live here? There is a very heavy smell coming from inside.”

Aniruddha wrinkled his nose. “My mother lives here. She is old; perhaps she hasn’t been able to get the place cleaned. Take your fare and go.”

As soon as he pushed the door, it swung open without a sound. It wasn’t locked. He expected to hear his mother’s voice— “Oh Anu! You’re back?”—but instead, a thick, heavy darkness crept out. It was a darkness that had been brewing within the walls of the villa for six months.

The dust on the drawing-room floor captured his footprints so clearly it felt like a stain on something sacred. He pressed the light switch, but the electricity had been cut off, likely due to unpaid bills. Aniruddha turned on his iPhone’s flashlight. The beam of light fell upon a figure lying on the sofa.

“Ma? Are you sleeping? Look, I’ve come straight from Sydney. I’m exhausted—please make me a cup of tea.”

For the first time in a long while, a voice echoed in the room. But the figure on the sofa was no longer “Mother.” It was a skeleton draped in the remains of brown skin. Nature had done its work—insects had taken their share, leaving only remains behind. Aniruddha’s scream died in his throat. He wanted to believe it was a prank, but that smell? That smell wasn’t a joke; it was the final, bitter truth.

On the table lay a piece of paper. Buried under layers of dust, it wasn’t a will or a list of jewelry. On it, a single sentence was written thousands of times, like a haunting chant: “Son, the door is open. Just come home.”

Aniruddha’s hand began to shake. He shone the light on the bottom of the paper. There were dark, dried stains of blood and tears. It read: “I am not dying, Anu. I am just sleeping so that when you arrive, you can wake me up. It gets very cold in Australia, doesn’t it? I’ve heard people there forget their own family, but you are my son. Wear a sweater; you catch colds easily.”

Then, Aniruddha noticed the skeleton’s tightly clenched fist. He gathered his courage and pried open those cold, stone-like fingers. Inside was a small, blue woolen sweater. It was half-finished. A knitting needle was still stuck in the ball of yarn. This sweater was for Aniruddha’s son—the one whose picture he had sent on WhatsApp three years ago.

“Ma…” a sob escaped Aniruddha’s throat.

The ‘Shanti Villa’ now felt like a courtroom. He remembered Mother’s last phone call six months ago. He had snapped at her— “Mummy, I have a project deadline! Don’t keep harping on the same ‘when are you coming’ tune every day.”

Perhaps that was the night Mother left the door open. Perhaps that was the night she decided she wouldn’t wake up anymore, because waiting while awake was too painful. She had given death the name of “sleep” so her son wouldn’t feel the guilt of her end.

The cold moonlight from the window filled the empty sockets of the skeleton’s eyes. In those hollow spaces, a terrifying wait still seemed to linger—a wait that hadn’t ended even after crossing the border of death. Aniruddha pressed the half-knitted sweater to his face. The wool was no longer soft; it pricked him like thorns.

In that massive villa, surrounded by millions in property, Aniruddha stood alone. He had Australian PR, a huge bank balance, and a bright future. But he did not have the “sleep” that his mother had been wearing for six months.

Sobbing, he held the skeletal hand and whispered softly, “Ma, wake up… look, I’ve come. Close the door now; I won’t go anywhere.”

But Mother did not wake up. She had kept her promise. She had gone to sleep so her son could wake her. But the son had arrived so late that there was no body to wake—only a lifetime of regret.

A gust of wind blew the paper onto the floor. The final line was now clearly visible: “The door is open, because even if you became a stranger, my love is still waiting for you.”

Aniruddha sat down on the cold floor. Outside, the city lights were sparkling, but in that corner of ‘Shanti Villa,’ a darkness had settled—a darkness that no sun in the world could ever chase away.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “गुल्लक की याद में…” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – गुल्लक की याद में… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

एक गुल्लक थी मेरे पास

घर के किसी कोने में

जिसमें मैं

यारी-दोस्ती, संबंध, सौहार्द

स्नेह और छोटी-छोटी खुशियों को

बचा कर, जमा कर और छुपा कर

रखा करता था

दुश्मन ज़माने की नज़र

लग गयी एक दिन

फ़िक्र और तनाव था

कि कैसे बचाऊँ इस पूंजी को

चलती तहज़ीब की गर्म हवाओं ने

एक दिन उस गुल्लक को

न सिर्फ़ गिरा कर तोड़ा और बिखेरा

बल्कि उसे पिघला कर

मेरे सामने ही उसे नेस्तनाबूद किया

मैं अपने आंगन में उस गुल्लक के अवशेषों का

एक मज़ार ही बना सका, अंततः..!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ – हास्य-व्यंग्य – “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य रचना हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

 मैं सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था तभी दरवाजा थपथपाते हुए पड़ोसी वर्मा जी ने आवाज लगाई – भाई साहब।

दरवाजा खोलते हुए मैंने कहा – आइए वर्माजी। आज क्या खबर लाए हैं ? वे सोफा संभालते हुए बोले – भाई साहब ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है ? मैंने वर्मा जी के लिए चाय लाने पत्नी को आवाज लगाई और फिर अखबार पढ़ने लगा। कुछ देर की चुप्पी के बाद बेचैन वर्माजी ने पुनः प्रश्न किया – भाई साहब, ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है? मैंने नाक की नोंक पर रखे चश्मे के ऊपर से वर्मा जी पर तरछी नजर फेंकते हुए कहा – भाई जी लफड़ा ही लफड़ा है। इतालवी कलाकार लियोनार्डो दा विंची ने सोलहवीं शताब्दी में मोनालिसा की सुन्दर पेंटिंग बनाई थी। जानकारी के अनुसार मोनालिसा का असली नाम लीसा था जो फ्लोरेंस के एक कपड़ा व्यापारी फ्रांसेस्को डेल की पत्नी थी। मैं वर्मा जी को मोनालिसा के बारे में बता रहा था और वे लगातार भाई साहब, , , भाई साहब कहते हुए मुझे टोक रहे थे। मैंने कहा भाई जी, यदि मोनालिसा के बारे मैं सुनना है तो टोका टाकी मत करो। वे मेरी ओर झुकते हुए बोले – मैं इस मोनालिसा की बात नहीं कर रहा मैं तो उस बड़ी बड़ी शराबी आंखों वाली सांवली सलोनी मोनालिसा की बात कर रहा हूं जो टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से कुंभ के मेले में माला बेचते बेचते मिस इंडिया जैसी फेमस होकर युवा दिलों की धड़कन बन गई। अनेक युवा तो कुंभ नहाने के बहाने उसे देखने, उससे मिलने के लिए ही इलाहाबाद गए। उसकी झील सी गहरी आंखों में डूब कर दस गुने ज्यादा दाम देकर उससे मालाएं खरीदीं।

मैंने मुस्कुराकर चुटकी लेते हुए कहा भाई जी कुंभ मेला तो आप भी गए थे, नहाया की सिर्फ मोनालिसा से मिलकर आ गए ? वर्मा जी शर्माते हुए बोले भाई साहब अब आपको क्या बताऊं ! उसे देखकर तो मुझे फिल्म आरजू का वह गाना याद आ गया जो राजेंद्र कुमार ने साधना की आंखें देखकर गया था –

छलके तेरी आंखों से शराब और ज्यादा

खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज्यादा

मैंने कहा भाई जी फिर तो “आंखों ही आंखों में इशारा और बैठे बैठे जीने का सहारा” हो गया होगा। मेरी बात सुनकर वर्मा जी उदास हो गए बोले – भाई साहब क्या बताऊं, वहां सौ बीमार होते तब भी मैं बाज़ी मार लेता लेकिन वहां तो एक अनार के लाख बीमार वाली स्थिति थी। आखिर उसे फिल्म में हीरोइन बनाकर मुनाफा कमाने एक निर्माता निर्देशक ले उड़ा। गंगाघाट पर खिल उठे लाखों दिल चकनाचूर हो गये। भाई साहब बचे खुचे युवा दिलों पर उस समय नश्तर चल गया जब मोनालिसा ने बड़ी उमर के एक दाढ़ी वाले से शादी कर ली। भाई साहब बताइए मोना ने ऐसा क्यों किया ? मैंने कहा वर्मा जी आपने वह गाना सुना है –

“पसंद आ गई है एक काफिर हसीना,

दाढ़ी वाले को भी वह पसंद आ गई होगी, उसकी मेहनत सफल हुई। मेरी बात सुनकर वर्मा जी के आंसू निकल आए, वे बोले – भाई साहब दाढ़ीवाले ने ऐसा क्यों किया ? मैंने वर्मा जी को सांत्वना देते हुए कहा – प्यारे भाई दुनिया के सब मर्द फिल्म “आई मिलन की बेला” के राजेंद्र कुमार जैसे नहीं हैं जो प्रेम निवेदन कर रही कम उम्र की लड़की से साफ – साफ कह दें –

अभी कमसिन हो, नाजुक हो, नादां हो, भोली हो…

सोचता हूं मैं कि तुम्हें प्यार न करूं…

वर्मा जी के चेहरे को देखकर लग रहा था कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया है। मैंने कहा भाई जी मैं आपके दुख में आपके साथ खड़ा हूं। “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” कहते हुए वे बाहर निकल गए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆ # “कविता का साया…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता कविता का साया…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆

☆ # “कविता का साया…” # ☆

मैं सुबह-सुबह घर से घूमने निकलता हूं

धीरे-धीरे नपे तुले कदमों से चलता हूं

तब वह भी मेरे साथ साथ चलती है

 

गार्डन में घूमते हुए

प्रकृति के नजारों को आंखों से चूमते हुए

सूर्य की कोमल किरणों से लिपटकर

कलियों को धीरे-धीरे उमलते हुए

मैं देखता हूं

कुछ देर बेंच पर बैठता हूं

वह भी बैठती हैं

जब मैं उठकर चलता हूं

वह भी मेरे साथ-साथ चलती है

 

जब वॉकिंग से घर आता हूं

फ्रेश होकर अखबार पढ़ता हूं

चाय की चुस्कियों के संग

समाचार की सुर्ख़ियों को पढ़कर

अपने विचार अपनी सोच गढ़ता हूं

अपनी दुनिया में पहुंच जाता हूं

तब भी वह मेरे साथ-साथ वहां भी चलती है

 

दिनभर कुछ ना कुछ करते रहता हूं

कभी पढ़ते रहता हूं

कभी लिखते रहता हूं

कभी घर के कामों में व्यस्त रहता हूं

और जब मैं आराम करता हूं

तब वह भी मेरे साथ-साथ आराम करती है

 

शाम को मित्रों के साथ

टी” पॉइंट पर

बैठकर गप्प मारते हुए

चाय पीते हुए

संसार की समस्याओं पर

आपसी विचार विमर्श

डिबेट करते हुए

शाम रात में ढलती है

तब मैं घर जाने को निकलता हूं

तब भी वह मेरे साथ साथ चलती है

 

रात में बिस्तर पर सोते हुए

जो बातें मन में उतरती है

आंखों के आगे आती है

दिल को झकझोरती है

तब भी वह मेरे साथ साथ होती है

 

फिर मैं अचानक उठकर

टेबल लैंप की रोशनी में

कुछ सोच कर

कलम उठाकर

लिखने बैठता हूं

तब वह मेरे कलम के

शब्दों के साथ-साथ चलती है

कागज पर उतरती है

नई रचना बनती है

वह मेरा साया नहीं

वह मेरी प्रिय कविता होती है

वह मेरी प्रिय कविता होती है /

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०० – यही प्रेम है, प्रियवर! ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता यही प्रेम है, प्रियवर!।)

☆ अभिव्यक्ति # १०० ☆ यही प्रेम है, प्रियवर! ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

आज सवेरे उठ कर मैने,

इंद्रधनुष जब देखा,

सात रंग चमकीले थे, पर,

रंग प्यार का ना था,

 

सोचा शायद देर हो गई,

मुझको सोते सोते,

रंग प्यार का सिमट गया है,

इंद्रधनुष के पीछे,

 

जब प्रकृति दुल्हन बनकर,

स्नेह सुधा बरसाए,

हरियाली की चादर ओढ़े,

धरती भी शरमाए

 

तब धरती पर रंगों से, रंग,

निखर कर आए,

प्रेम रंग हो सबसे निखरा,

प्रेम सदा बरसाए,

 

बदली की ओट से चंदा,

अवनी को है, झांके,

पृथ्वी पर व्याकुल चकोर,

चंदा को है ताके,

 

कांच के टुकड़े, मुट्ठी में हों,

लहू गिरे रिस कर,

पर मुस्काए, दुख में भी,

यही प्रेम है, प्रियवर!

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

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 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५१ ⇒ खरी खरी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खरी खरी।)

?अभी अभी # ९५१  ⇒ आलेख – खरी खरी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो व्यक्ति खरे होते हैं, वे हमेशा खरी बात ही करते हैं। खरा, निखालिस शुद्ध को कहते हैं। खरा केवल सोना ही नहीं होता, खरे सोने जैसी बहू भी होती है, जिसमें कोई खोट नहीं होता। ऐसी बहू लाखों में एक होती है।

जब ऐसी बहू की तारीफ़ में कसीदे कढ़े जाते हैं, तो सास से बर्दाश्त नहीं होता, और वह कह उठती है, हमारा लड़का भी हीरा है हीरा।

जब सोने के आभूषण बनते हैं, तब उसमें थोड़ा खोट मिलाना पड़ता है, वह पीतल, चाँदी, तांबे का भी हो सकता है। शुद्ध सोने को टंच कहते हैं, इसके केवल बिस्किट बनते हैं, जो खाये नहीं जाते, केवल स्मगलिंग के काम आते हैं। खरे, खोटे, लोगों के नाम भी हो सकते हैं। शुभा खोटे और दुर्गा खोटे दोनों अच्छी मंजी हुई कलाकार थी, लेकिन उनमें कोई खोट नहीं था।।

जो लोग स्पष्टवक्ता होते हैं, वे ज़्यादा लाग-लपेट में विश्वास नहीं करते। चाहे किसी को बुरा लगे या भला, खरी-खरी सुना देते हैं। खरी खरी सुनने वाले को इतनी खरी तो नहीं लगती, लेकिन सुनाने वाले के चेहरे पर एक विजयी भाव अवश्य देखा जा सकता है।

जब मन में बहुत-कुछ उबल रहा होता है, और बाहर आने को आमादा होता है, तब खरी-खरी ही नहीं, खरी-खोटी भी सुनाई जाती है। खरी-खोटी सुनाना पराक्रम है, और सुनना पराजय। खरी-खरी में जहाँ हल्का सा समझाइश का पुट होता है वहीं खरी-खोटी में अच्छा-गलत, भला- बुरा, अपमानजनक और शालीन भाषा में अपशब्दों का प्रयोग होता है। खरी खरी, और खरी खोटी कभी शालीनता की मर्यादा नहीं लांघते। जब पानी सर से ऊपर चला जाता है तब गाली-गुप्ता की नौबत आती है। खरे गाली नहीं बकते। सभी खोटे गुप्ता नहीं होते।।

खरी खरी और खरी खोटी अक्सर सुनाई जाती है। इनके अलावा एक अवस्था और होती है, जिसमें कुछ कहा-सुनी नहीं होती, केवल भूरि भूरि प्रशंसा होती है। यह न तो चापलूसी की श्रेणी में आती है, और न ही कटाक्ष की। आप इसे जमकर तारीफ करना भी कह सकते हैं, लेकिन तारीफ भी वहीं की जाती है, जहाँ कुछ निहित स्वार्थ होता है।

आजकल भूरि भूरि प्रशंसा नहीं होती। यह प्रशंसा निःस्वार्थ होती है, और व्यक्ति के गुणों के आधार पर की जाती है। मुझे खुशी है कि इस प्रशंसा का अभी तक राजनीतिक प्रयोग नहीं हुआ है। तब शायद इसका रंग भूरा न रहे, मटमैला या बदरंग हो जाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ छंद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ छंद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

आठवणींच्या चांदणराती चंद्र चांदणी बोलत होती

खुल्या दिलाने अनुभवलेली एक कहाणी रंगत होती

*

सूर्य जरासा थकला तेव्हा विश्रांतीला निघून गेला

रात साजणी देत हुंदके विरहामध्ये जागत होती

*

रात्रीची पण त्या सूर्याशी ओळखपाळख कधीच नव्हती

भलती आशा मनी बाळगत रात अशी का वागत होती

*

दरवळणारा गंध सुगंधी वारा घेऊन पळून गेला

बागेमधली कुजबुजणारी फुले फुलांना सांगत होती

*

अधीर वेडे प्रेम पाखरू विसावण्यला झाड शोधते

नजरचत्याची बनून वेडी एकचजागा शोधत होती

*

प्रेमासाठी पतंग सुद्धा ज्योती वरती जळूनमरतो

कधी पासूनी जगात सा-या हीच बातमी गाजत होती

*

फरावलंबी नको जगाया सन्मानाने जगता यावे

म्हणून सारी तरणी पोरे काम सारखे मागत होती

*

जगणे केवळ जगणे नसते असते सुंदर जीवन गाणे

जुनी पिढी हे नव्या पिढीला रियाजातुनी शिकवत होती

*

भविष्यातले स्वप्न पहाणे हा सगळ्यांचा छंदच असतो

कर्तृत्वाने छंद जिंकणे पिढी पिढीतीला घडवत होती

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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