हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विश्व कविता दिवस विशेष – शिलालेख ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विश्व कविता दिवस विशेष – शिलालेख ??

आज वैश्विक कविता दिवस है। यह बात अलग है कि स्वतः संभूत का कोई समय ही निश्चित नहीं होता तो दिन कैसे होगा? तब भी तथ्य है कि आज यूनेस्को द्वारा मान्य अधिकृत विश्व कविता दिवस है।

बीते कल गौरैया दिवस था, आते कल जल दिवस होगा। लुप्त होते आकाशी और घटते जीवनदानी के बीच टिकी कविता की सनातन बानी। जीवन का सत्य है कि पंछी कितना ही ऊँचा उड़ ले, पानी पीने के लिए उसे धरती पर उतरना ही पड़ता है। आदमी तकनीक, विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में कितना ही आगे चला जाए, मनुष्यता बचाये रखने के लिए उसे लौटना पड़ता है बार-बार कविता की शरण में।

इसी संदर्भ में कविता की शाश्वत यात्रा का एक चित्र प्रस्तुत है।

कविता नहीं मांगती समय

न शिल्प विशेष

न ही कोई साँचा

जिसमें ढालकर

36-24-36

या ज़ीरो फिगर गढ़ी जा सके,

कविता मांग नहीं रखती

लम्बे चौड़े वक्तव्य

या भारी-भरकम थीसिस की,

कविता तो दौड़ी चली आती है

नन्ही परी-सी रुनझुन करती

आँखों में आविष्कारी कुतूहल

चेहरे पर अबोध सर्वज्ञता के भाव,

एक हाथ में ज़रा-सी मिट्टी

और दूसरे में कल्पवृक्ष के बीज लिये,

कविता के ये क्षण

धुंधला जाएँ तो

विस्मृति हो जाते हैं,

मानसपटल पर उकेर लिये जाएँ तो

शिलालेख कहलाते हैं..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ विश्व कविता दिवस विशेष – मैं मंच का नहीं, मन का कवि हूँ! ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  विश्व कविता दिवस विशेष – मैं मंच का नहीं, मन का कवि हूँ! ☆

जी हाँ!

मैं स्वांतः सुखाय ही लिखता हूँ।

 

जब अन्तर्मन में कुछ शब्द बिखरते हैं

जब हृदय में कुछ उद्गार बिलखते हैं

 

तब जैसे

शान्त जल-सतह को

कंकड़ तरंगित करते हैं।

तब वैसे  

शब्द अन्तर्मन को स्पंदित करते हैं।

 

बस

कोई घटना ही काफी है।

बच्चे का जन्म

बच्चे की किलकारी

फूलों की फुलवारी

राष्ट्रीय संवाद

व्यर्थ का विवाद

यौवन का उन्माद

गूढ़ चिंतन सा अपवाद। 

इन सबके उपरान्त

किसी अपने का

किसी वृद्ध का देहान्त 

हो सकता है एक कारण

कुछ भी हो सकता है कारण

तब हो जाता है कठिन

रोक पाना मन उद्विग्न।

 

तब जैसे

मन से बहने लगते हैं शब्द

व्याकुल होती हैं उँगलियाँ

ढूँढने लगती हैं कलम

और फिर

बहने लगती है शब्द सरिता

रचने लगती है रचना

कथा, कहानी या कविता।

शायद इसीलिए

कभी भी नहीं रच पाता हूँ

मन के विपरीत

शायरी, गजल या गीत।

नहीं बांध पाता हूँ शब्दों को

काफिये मिलाने से

मात्राओं के बंधों से

दोहे चौपाइयों और छंदों से।

 

शायद वो प्रतिभा भी

जन्मजात होती होगी। 

जिसकी लिखी प्रत्येक पंक्तियाँ

कालजयी होती होंगी

आत्मसात होती होंगी।

 

मैं तो बस

निर्बंध लिखता हूँ

स्वछंद लिखता हूँ

मन का पर्याय लिखता हूँ

स्वांतः सुखाय लिखता हूँ। 

 

जी हाँ!

मैं स्वांतः सुखाय ही लिखता हूँ।

 

किन्तु, 

मन को आपसे साझा जो करना है

शायद इसीलिये

मैं मंच का नहीं मन का कवि हूँ।

 

©  हेमन्त बावनकर  

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ “ईद-उल-फितर : मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम ” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख ईद-उल-फितर : मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम पर चर्चा।

☆ आलेख ☆ ईद-उल-फितर : मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैग़ाम ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

ईद-उल-फितर इंसानियत, मोहब्बत और भाईचारे का वह पाक त्योहार है जो रमज़ान के मुकद्दस महीने के बाद आता है और दिलों में रहमत, बरकत और सुकून की रोशनी भर देता है। यह सिर्फ एक मजहबी त्योहार नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बात का ऐसा इज़हार है जिसमें प्यार, हमदर्दी, माफी और अपनापन अपने पूरे जलवे के साथ सामने आता है। जब चांद रात को आसमान में हिलाल नजर आता है, तो हर दिल में खुशी की एक लहर दौड़ जाती है। यह लम्हा सिर्फ एक नए महीने की शुरुआत नहीं, बल्कि एक नई सोच, नई उम्मीद और नई मोहब्बत का पैग़ाम लेकर आता है।

रमज़ान का महीना सब्र, इबादत और तजुर्बे का महीना होता है। इस दौरान रोज़ेदार सुबह से शाम तक भूख-प्यास सहकर अल्लाह की इबादत में मशगूल रहते हैं। यह अमल सिर्फ भूखा रहने का नहीं, बल्कि अपने नफ्स पर काबू पाने, अपने दिल को साफ करने और दूसरों के दर्द को महसूस करने का तरीका है। जब इंसान खुद भूख की तकलीफ को महसूस करता है, तो उसके दिल में गरीबों और जरूरतमंदों के लिए रहम और हमदर्दी पैदा होती है। यही एहसास आगे चलकर ईद के दिन मोहब्बत और खैरात के रूप में सामने आता है।

ईद-उल-फितर का असली मकसद इंसान को इंसान से जोड़ना है। इस दिन हर कोई अपने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को गले लगाता है और “ईद मुबारक” कहकर मोहब्बत का इज़हार करता है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि जिंदगी में नफरत, अदावत और तफरका की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। अगर दिल में कोई शिकवा या रंजिश है, तो उसे खत्म कर देना ही असली ईद है। जब दो लोग गले मिलते हैं, तो उनके दिलों की दूरियां मिट जाती हैं और एक नई शुरुआत होती है।

ईद के दिन नमाज़-ए-ईद अदा करना एक अहम रस्म है। मस्जिदों और ईदगाहों में जब हजारों लोग एक साथ खड़े होकर सज्दा करते हैं, तो वहां का मंज़र इंसानी बराबरी और एकता की बेहतरीन मिसाल बन जाता है। अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा, हर कोई एक ही सफ में खड़ा होता है। यह हमें यह पैग़ाम देता है कि अल्लाह के सामने सभी इंसान बराबर हैं और असली इज़्ज़त इंसानियत और नेक नियत में होती है।

ईद का एक अहम पहलू ज़कात-उल-फितर या फितरा है, जिसे ईद की नमाज़ से पहले अदा किया जाता है। इसका मकसद यह है कि समाज का कोई भी गरीब या जरूरतमंद इस खुशी से महरूम न रहे। जब हर इंसान अपनी कमाई का एक हिस्सा दूसरों के लिए निकालता है, तो समाज में बराबरी और इंसाफ का माहौल बनता है। यह अमल हमें सिखाता है कि असली खुशी सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के साथ बांटने में है।

ईद के मौके पर घरों में तरह-तरह के लज़ीज़ पकवान बनाए जाते हैं। सेवइयां, शीरखुरमा और कई किस्म के पकवान मेहमाननवाजी का हिस्सा होते हैं। लोग अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के घर जाते हैं और उन्हें दावत देते हैं। यह मेल-जोल मोहब्बत को और मजबूत करता है। खास बात यह है कि ईद सिर्फ मुसलमानों का त्योहार नहीं रह जाता, बल्कि इसमें हर मजहब के लोग शामिल होकर एक-दूसरे की खुशी में शरीक होते हैं। यही गंगा-जमुनी तहज़ीब की खूबसूरती है, जो भारत जैसे मुल्क की पहचान है।

ईद-उल-फितर हमें माफी और दरगुज़र का सबक भी देती है। अगर किसी से कोई गलती हो गई हो, तो उसे माफ कर देना और दिल साफ कर लेना ही असली ईद की रूह है। इस दिन लोग अपने बड़ों से दुआ लेते हैं और छोटों को ईदी देकर खुश करते हैं। यह रिवाज रिश्तों में मिठास और अपनापन भरता है। ईदी सिर्फ पैसों का लेन-देन नहीं, बल्कि प्यार और दुआओं का इज़हार होता है।

आज के दौर में जब दुनिया नफरत, तफरका और खुदगर्जी की आग में जल रही है, तब ईद-उल-फितर का पैग़ाम और भी अहम हो जाता है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि इंसानियत सबसे बड़ा मजहब है और मोहब्बत सबसे बड़ी ताकत। अगर हम ईद के इस पैग़ाम को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल कर लें, तो समाज में अमन, सुकून और खुशहाली कायम हो सकती है। 

ईद हमें यह भी सिखाती है कि असली कामयाबी सिर्फ दुनियावी चीजों में नहीं, बल्कि अच्छे किरदार और नेक अमल में है। जब इंसान दूसरों की मदद करता है, उनके साथ मोहब्बत से पेश आता है और अपने दिल को साफ रखता है, तभी वह असल मायनों में कामयाब होता है। ईद का त्योहार हमें यही याद दिलाता है कि हमें अपने अंदर की बुराइयों को खत्म कर अच्छाइयों को अपनाना चाहिए।

इस त्योहार का एक और खूबसूरत पहलू यह है कि यह हमें शुक्रगुजार बनना सिखाता है। रमज़ान के महीने में इबादत और सब्र के बाद जब ईद आती है, तो इंसान अपने रब का शुक्र अदा करता है कि उसने उसे इतनी ताकत दी कि वह इस महीने के फर्ज को पूरा कर सका। यह शुक्रगुजारी इंसान को और भी विनम्र और बेहतर बनाती है।

ईद-उल-फितर का पैग़ाम सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे पूरे साल अपने दिल और अमल में जिंदा रखना चाहिए। अगर हम हर दिन को ईद की तरह मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत के साथ जीएं, तो दुनिया एक बेहतर जगह बन सकती है। नफरत की जगह मोहब्बत, तकरार की जगह बातचीत और दूरी की जगह अपनापन अगर हमारी सोच का हिस्सा बन जाए, तो हर दिन ईद जैसा महसूस होगा।

अंत में यही कहा जा सकता है कि ईद-उल-फितर सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानियत का जश्न है। यह हमें सिखाता है कि जिंदगी की असली खूबसूरती मोहब्बत, खैरात और भाईचारे में है। जब हम दूसरों की खुशी में अपनी खुशी तलाश करते हैं और अपने दिल को नफरत से दूर रखते हैं, तभी हम ईद के असली मायने को समझ पाते हैं। ईद का यह पैग़ाम हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहना चाहिए, ताकि हम एक ऐसी दुनिया बना सकें जहां अमन, मोहब्बत और इंसानियत का राज हो।

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अचानक डूबता सूरज उग आया – उपन्यासकार : श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’  समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी ☆

? पुस्तक चर्चा –  अचानक डूबता सूरज उग आया – उपन्यासकार : श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ? समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी ?

उपन्यास का नाम: अचानक डूबता सूरज उग आया

उपन्यासकार: राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

समीक्षक: डॉ जयप्रकाश तिवारी

प्रकाशक: कोहबर प्रकाशन लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

प्रकाशन वर्ष: 2025

कुल पृष्ठ: 152

मूल्य: ₹299

☆ “अचानक डूबता डूबता सूरज उग आया” :  मानव कर्तव्य की सफलता है ☆ डॉ जयप्रकाश तिवारी

इस उपन्यास में चिंतन के अनेक, विविध उत्कृष्ट रोचक और संवेदनशील आयाम हैं जो हमे मानव होने, मानव कर्त्तव्य का बोध करते हैं।

1 – इसका उपन्यास का नायक लखनऊ निवासी राजीव रस्तोगी है जो धनाढ्य परिवार से होते हुए भी सादगी और सनातन का जीता जागता प्रतिमूर्ति है। विश्वबन्धुत्व का व्यवहार उसके चरित्र से झलक रहा है। उसकी मित्र मंडली में सहृदय युवक/युवतियों की भरमार है। वहां जाति भेद, वर्गभेद, संप्रदाय भेद नहीं है। उसके मित्र मंडली में जहां अनेक हिन्दू युवक है, वही मुस्लिम सोहेल, एजाज, वाहिबा है तो अफ्रीकी मूल की ग्रेसी भी और एंग्लो इंडियन नायिका रूबी भी है, जिससे उसका विवाह संपन्न होता है। सभी मानवता और प्रगति के पुजारी हैं। उसमें धीरता के साथ साथ एक और गुण भी है, उसे गुण नदी; सद्गुण कहना चाहिए – गुह्यं च निगूहति गुणानि प्रकटी करोति की। यह संस्कृत और हमारी संस्कृति की देन है।

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

2 – इस उपन्यास के नायक का दिल यदि अपने संस्कार और प्रेम के लिए धड़कता है तो मस्तिष्कत कर कर्म दायित्व और नशा पीड़ित समाज के उन्मूलन के लिए।

3 इस उपन्यास में दिल और मस्तिष्क में अद्भुत समन्वय है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में राजीव का यह संतुलन हमे बहुत कुछ सिखाता है।

4 – यदि पाठक या समीक्षक से प्रश्न किया जाय कि राजेश हृदय की ओर उन्मुख है या मस्तिष्क, कर्तव्य की ओर? तो पाठक और समीक्षक उसे किसी एक वर्ग में नहीं रख पाएगा। उसे दोनों ही संवर्गों का श्रेष्ठ उदाहरण घोषित करना पड़ेगा। यह किसी के भी व्यक्तित्व का धनात्मक और चमत्कारी प्रभाव छोड़ने वाला चरित्र है।

5 –  ऐसा संतुलन वह अपने जीवन में कैसे रख पाया? या स्वयं को साध पाया तो इसका एकमात्र उत्तर है उसका सनातनी शिक्षा, मर्यादा और सिद्धांतों में अटूट विश्वास। वह लंदन में रिश्तेदार यहां उपेक्षित होने बावजूद अपने मां बाप को नहीं बताता कि पिता और मित्र में दरार आ जाएगी। वह पूछने पर प्रशंसा ही करता है। इस प्रकार इस उपन्यास ने सनातन संस्कृति और लखनऊ की तहजीब दोनों को निखारा है। यह जन्मभूमि और कर्मभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक है। यही समर्पण मन में – “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का भाव जागृत करती है।

6 – संचरित बीमारियों की व्यापकता, उनके समाज और उनकी विभीषिका, टूटते परिवार का वर्णन तो है ही; टूटते परिवारों को कैसे जोड़ा जाय? यह उपाय भी है। नृपेंद्र और आरती के टूटते दाम्पत्य का जुड़ना, उनके दाम्पत्य जीवन के तिमिर से दाम्पत्य की किरण फूटना ही “अचानक डूबता सूरज उग आया” शीर्षक रूप में प्रकट हुआ है। इसका बिंब चित्र देखिए – “आरती और नृपेंद्र की नजरें एक दूसरे से मिली तो वे देर तक अपने को रोक नहीं सके। … दोनों ने अतीत की बीती हुई बात को एक दुःस्वप्न मानकर उसे हमेशा – हमेशा के लिए भुला देने का संकल्प लिया। उन्हें एक दूसरे से कुछ कहने के लिए अब शेष नहीं था क्योंकि आरती ने राजीव के पीछे के कमरे में बैठकर राजीव और नृपेंद्र के बीच हुई पूरी बात को सुन लिया था। अब सारा का सारा माहौल बदल चुका था। क्योंकि अब डूबता सूरज उग आया था”।

कुल मिलाकर यह उपन्यास एक जागृति उपन्यास है जो एक ओर मानवीय संबंधों को जागृत करता है और दूसरी ओर नशा उन्मूलन की गूढ़ व्याख्या कर जन जागृति करता है। मानवीय दृष्टि और जनजागरण तथा नशा उन्मूलन की दृष्टि से यह अनुपम उपन्यास है। बीमारियों को केंद्र में रखकर प्रेम, सौहार्द्र और समर्पण का ऐसा तना बना बना गया है कि पाठक का मन कभी भी उबाऊपन, थकान, नीरसता का अनुभव नहीं करता; अपितु अपने को बुराइयों के निर्मूलन का एक अंग मन लेता है। इस यात्रा में सहयात्री बन जाता है। यही उपन्यासकार की सफलता है। यह यात्रा कैसे प्रारम्भ होती है? कैसे अपने लक्ष्य का संधान कर उसे पूर्णता तक पहुंचाती है, इसे पाठक स्वयं उपन्यास क्रय करके पढ़े तो उसे अधिक आनंद आएगा। हां, इतना अवश्य आश्वस्त करना चाहूंगा कि उपन्यास क्रय करने का उसे अफसोस या निराशा नहीं होगा, उसे धन व्यय की सार्थकता की अनुभूति होगी।

एक उपन्यासकार, कवि, समीक्षक और संगठनकर्ता के रूप में श्री राजेश सिंह श्रेयस का व्यक्तित्व अत्यंत ऊर्जस्वी है। उनके लेखन को नमन और साधुवाद। उनकी लेखनी अविरल, आबाद चलती रहे, उनको बहुत – बहुत बधाई और साधुवाद।

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© डॉ जयप्रकाश तिवारी

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग-२७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ज़िम कार्बेट-नैनीताल

जिम ने कुछ समय छोटी हल्द्वानी में भी बिताया, जिसे उन्होंने गोद लिया था और जिसे कॉर्बेट्स विलेज के नाम से जाना जाने लगा। जंगली जानवरों को परिसर से बाहर रखने के लिए कॉर्बेट और ग्रामीणों ने 1925 में गांव के चारों ओर एक दीवार का निर्माण किया। 2018 तक दीवार अभी भी खड़ी है, और ग्रामीणों के अनुसार इसे बनाने के बाद से दीवार ने ग्रामीणों पर जंगली जानवरों के हमलों को रोका जा सका था। उनकी यादों को मोती हाउस के रूप में बरकरार रखा गया था, जिसे कॉर्बेट ने अपने दोस्त मोती सिंह के लिए बनवाया था, और कॉर्बेट वॉल, एक लंबी दीवार (लगभग 7.2 किमी) गाँव के चारों ओर फसलों की जंगली जानवर से रक्षा के लिए बनाई गई थी। उन्होंने जंगली बिल्लियों और अन्य वन्यजीवों की घटती संख्या के बारे में लिखना और चेतावनी देना जारी रखा।

1947 के बाद, कॉर्बेट और उनकी बहन मैगी न्येरी, केन्या चले गए थे, जहां वे होटल आउटस्पैन के मैदान में ‘पक्सटू’ कॉटेज में रहते थे, जो मूल रूप से उनके दोस्त लॉर्ड बैडेन-पॉवेल के लिए बनाया गया था। जिम कॉर्बेट अपनी बहन मैगी कॉर्बेट के साथ गुर्नी हाउस में रहते थे। नवंबर 1947 में केन्या जाने से पहले उन्होंने श्रीमती कलावती वर्मा को घर बेच दिया। घर को एक संग्रहालय में बदल दिया गया है और इसे जिम कॉर्बेट संग्रहालय के रूप में जाना जाता है। आज हम कालाढुंगी के उसी संग्रहालय के प्रांगण में उन्हें याद करके आदरांजलि अर्पित कर रहे हैं।

केन्या भी कभी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहा था। रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय केन्या गई थीं। तब उनके लिए ट्रीटॉप हट बनाई है थी जिसमें कॉर्बेट 5-6 फरवरी 1952 को राजकुमारी एलिजाबेथ के अंगरक्षक के रूप में ट्रीटॉप्स पर (एक विशाल फ़िकस के पेड़ की शाखाओं पर बनी एक झोपड़ी) साथ रहे। उस रात राजकुमारी के पिता, किंग जॉर्ज VI की मृत्यु हो गई, और एलिजाबेथ रानी बन गई। दुनिया के इतिहास में पहली बार एक युवा राजकुमारी के रूप में पेड़ पर चढ़ी और अपने सबसे रोमांचक अनुभव के रूप में वर्णित करने के बाद वह अगले दिन पेड़ से इंग्लैंड की रानी बनकर नीचे उतरी। अपनी छठी पुस्तक, ट्री टॉप्स को समाप्त करने के कुछ दिनों बाद दिल का दौरा पड़ने से कार्बेट की मृत्यु हो गई, और उन्हें न्येरी में सेंट पीटर्स एंग्लिकन चर्च में दफनाया गया।  कॉर्बेट और उनकी बहन की लंबे समय से उपेक्षित कब्रों की मरम्मत और जीर्णोद्धार जिम कॉर्बेट फाउंडेशन के संस्थापक और निदेशक जैरी ए. जलील द्वारा 1994 और 2002 में किया गया।

जिम कॉर्बेट की कुल सात किताबें भारत में प्रकाशित हुई हैं। जिनके हिंदी संस्करण भी  आ चुके हैं। वन्य जीवन में रूचि रखने वालों के लिए उनका साहित्य अद्भुत ख़ज़ाना से कम नहीं है। 

1.जंगल की कहानियां। 1935 में निजी तौर पर प्रकाशित (केवल 100 प्रतियां)

सामग्री: गांव में वन्य जीवन: एक अपील, पीपल पानी टाइगर, मेरे सपनों की मछली, एक खोया स्वर्ग, आतंक जो रात में चलता है, पूर्णा लड़की और इसकी रहस्यमय रोशनी, चौगढ़ टाइगर्स।

2.कुमाऊं के आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, बॉम्बे 1944

सामग्री: लेखक का नोट (आदमखोर होने के कारण), चंपावत मानेटर, रॉबिन, चौगढ़ टाइगर्स, द बैचलर ऑफ पोवलगढ़, द मोहन मानेटर, फिश ऑफ माय ड्रीम्स, द कांडा मैनेटर, द पीपल पानी टाइगर, द ठक मैन-ईटर, जस्ट टाइगर्स।

3.रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1947

सामग्री: द पिलग्रिम रोड, द मैन-ईटर, आतंक, आगमन, जांच, पहली हत्या, तेंदुए का पता लगाना, दूसरा किल, तैयारी, जादू, ए नियर एस्केप, द जिन ट्रैप, द हंटर्स हंटेड, रिट्रीट, फिशिंग इंटरल्यूड, एक बकरी की मौत, साइनाइड जहर स्पर्श, सावधानी में एक सबक, एक जंगली सूअर का शिकार, एक देवदार के पेड़ पर सतर्कता, आतंक की मेरी रात, तेंदुए से लड़ता है तेंदुए, अंधेरे में एक शॉट, उपसंहार।

4.मेरा भारत। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1952

सामग्री: समर्पण और परिचय, गांव की रानी, ​​कुंवर सिंह, मोती, पूर्व लाल टेप दिन, जंगल का कानून, ब्रदर्स, सुल्ताना: भारत का रॉबिन हुड, वफादारी, बुद्धू, लालाजी, चमारी, मोकामा घाट पर जीवन।

5.जंगल विद्या। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1953

सामग्री: मार्टिन बूथ, डैनसे, लर्निंग टू शूट, मागोग, लुकिंग बैक, जंगल एनकाउंटर, कैटेगरी, जंगल विद्या, जंगल की पुकार, स्कूल के दिन / कैडेट, जंगल की आग और बीट्स, गेम ट्रैक्स, जंगल संवेदनशीलता परिचय।

6.कुमाऊं का टेंपल टाइगर और अन्य आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1954

सामग्री: द टेंपल टाइगर, द मुक्तेसर मैन-ईटर, द पनार मैन-ईटर, द चुका मैन-ईटर, द तल्ला देस मैन-ईटर, उपसंहार।

7.माई कुमाऊं: अनकलेक्टेड राइटिंग्स। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012

सामग्री: प्रकाशक का नोट; समयरेखा; प्रस्तावना: ‘मैं कैसे लिखने आया’; ए लाइफ वेल लिव्ड: एन इंट्रोडक्शन टू जिम कॉर्बेट बाय लॉर्ड हैली; खंड एक: अप्रकाशित कॉर्बेट—रात जार का अंडा; ‘हम में से एक’; माई जंगल कैंप से; रुद्रप्रयाग पत्र; रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर कॉर्बेट; द मेकिंग ऑफ कॉर्बेट्स माई इंडिया: कॉरेस्पोंडेंस विद हिज एडिटर्स; ‘शूटिंग’ टाइगर्स: कॉर्बेट एंड द कैमरा; गांव में वन्यजीव: एक पर्यावरण अपील; भारत में एक अंग्रेज; केन्या में जीवन; खंड दो: कॉर्बेट एंड हिज़ ऑडियंस-‘द आर्टलेसनेस ऑफ़ हिज़ आर्ट’; द मैन रिवील्ड: कॉर्बेट इन हिज़ राइटिंग्स; जिम कॉर्बेट की सार्वभौमिक अपील: पत्र और समीक्षाएं; रुद्रप्रयाग के लिए उद्धार: कॉर्बेट द्वारा आदमखोर तेंदुए की हत्या पर प्रतिक्रिया; कॉर्बेट का प्रभाव: कुमाऊं के आदमखोर और छिंदवाड़ा कोर्ट केस; सूक्ति

उनकी किताब  मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं (कुमाऊं के आदमखोर) भारत, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक बड़ी सफलता थी, अमेरिकन बुक-ऑफ-द-मंथ क्लब का पहला संस्करण 250,000 प्रतियां था। बाद में इसका 27 भाषाओं में अनुवाद किया गया। कॉर्बेट की चौथी पुस्तक, जंगल लोर, उनकी आत्मकथा है। 1948 में, कुमाऊं की सफलता के आदमखोरों के मद्देनजर, एक हॉलीवुड फिल्म, मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं, बायरन हास्किन द्वारा निर्देशित और साबू, वेंडेल कोरी और जो पेज अभिनीत, बनाई गई थी। फिल्म ने कॉर्बेट की किसी भी कहानी का अनुसरण नहीं किया; एक नई कहानी का आविष्कार किया गया था। फिल्म फ्लॉप रही, हालांकि बाघ के कुछ दिलचस्प फुटेज फिल्माए गए। कॉर्बेट ने कहा है कि “सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बाघ था” ‘कॉर्बेट लिगेसी’ का निर्माण उत्तराखंड वन विभाग द्वारा किया गया था और बेदी ब्रदर्स द्वारा निर्देशित किया गया था, जिसमें कॉर्बेट द्वारा शूट की गई मूल फुटेज थी। 1986 में, बीबीसी ने जिम कॉर्बेट की भूमिका में फ्रेडरिक ट्रेव्स के साथ मैन-ईटर्स ऑफ़ इंडिया नामक एक डॉक्यूड्रामा का निर्माण किया।

कॉर्बेट की किताबों पर आधारित एक आईमैक्स फिल्म इंडिया: किंगडम ऑफ द टाइगर, 2002 में क्रिस्टोफर हेअरडाहल द्वारा कॉर्बेट के रूप में अभिनीत थी। 2005 में जेसन फ्लेमिंग अभिनीत रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर आधारित एक टीवी फिल्म बनाई गई थी। पूरी शाम प्रिय शिकारी और वाइल्ड लाइफ़ पर रोचक व रोमांचक किताबें देने वाले बेहतरीन इंसान की यादों में गुज़ारी। उनकी सभी किताबें और उनके हिंदी अनुवाद सब आसानी से आमेजोन पर उपलब्ध हैं। जिम कार्बेट के संग्रहालय में गुज़ारी। उनके द्वारा उपयोग की है सामग्रियों को निहारा। उनके फ़ोटोग्राफ़ कुर्सियाँ मेज़ कटलरी सब कुछ देखा। रात आठ बजे के आसपास नैनीताल पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २५ – कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २५ ?

? कविता – सार… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

-1-

ये तथ्य हैं उनींदे, जगाओ झिंझोड़कर

रखा गया है जिनको, गर्दनें मरोड़ कर

-2-

ये तो मुँह तलक़ हैं, लबालब भरे हुए

ज़ोख़िम ले कौन ऐसे चिकने घड़े फोड़कर

-3-

भूमिका पढ़ी न, उपसंहार ही पढ़ा

रख दी क़िताब उसने, एक पृष्ठ मोड़कर

-4-

न दी ज़मीन जिसने, सुई की नोंक बराबर

एक दिन चला गया वो साम्राज्य छोड़कर

-5-

मांग सजाने की थी जो, मांग तुम्हारी

लाया हूँ आसमाँ से, चाँद-तारे तोड़कर

-6-

सरकार बना डाली, गुणा-भाग जोड़कर

खा रहे हैं माल आप, कथरी ओढ़कर

-7-

चिंतन की धूप बिन लगे, ज़ेहन में फफूँदी

‘राजेश’ ने लाया है, सार यह निचोड़कर

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆ मुक्तक – ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९८ ☆

☆ मुक्तक ।। हे माँ दुर्गा पापनाशनी, तेरा वंदन बारम्बार है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

सुबह शाम की  आरती और माता का जयकारा।

सप्ताह का हर दिन बन गया शक्ति का भंडारा।।

केसर चुनरी चूड़ी रोली हे माँ करें तेरा सब श्रृंगार।

सिंह पर सवार माँ दुर्गा आयी बन भक्तों का सहारा।।

=2=

तेरे नौं रूपों में समायी शक्ति बहुत असीम है।

तेरी भक्ति से बन जाता व्यक्ति संस्कारी प्रवीण है।।

हे वरदायनी पपनाशनी  चंडी रूपा कल्याणी तू।

लेकर तेरे नाम मात्र से हो जाता व्यक्ति दुखविहीन है।।

=3=

नौं दिन की  नवरात्रि मानो कि ऊर्जा का संचार है।

भक्ति में लीन तेरे  भजनों  की नौ दिन भरमार है।।

कलश सकोरा जौ और  पानी आस्था के  प्रतीक।

हे जगत पालिनी माँ दुर्गा  तेरा वंदन बारम्बार है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६१ ☆ कविता – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६१ 

☆ जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !! स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो

मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो

मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है

नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला

हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है

जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

 *

तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं

जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!

जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४९ ⇒ चरण-पादुका ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चरण-पादुका ।)

?अभी अभी # ९४९  ⇒ आलेख – चरण-पादुका ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिसे हम कलजुग में जूता कहते हैं, उसे रामराज्य में चरण-पादुका कहा जाता था। भगवान रामचंद्र को जब वनवास हुआ था, तब वे लछमन-जानकी सहित, चौदह वर्ष के लिए, नंगे पाँव, अर्थात bare-foot जंगल प्रस्थित हो गए थे, और उनके भ्राता भरत ने उनकी चरण-पादुकाओं को सिंहासन पर विराजमान कर, अजोध्या का राजपाट संभाला था।

चरण-पादुका शब्द से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई ऐसी भी पादुका रही होगी, जिसे हाथों में पहना जाता होगा, और उसे शायद हस्त-पादुका कहा जाता होगा। लेकिन रामायण में ऐसी किसी हस्त-पादुका का जिक्र नहीं है, हाँ एक मुद्रिका का वर्णन ज़रूर आता है, जिसे हनुमानजी अशोक वाटिका में सीता जी को भेंट करते हैं, और जिसे आज अंगूठी कहा जाता है, लेकिन जिसे अंगूठे के बजाय अनामिका में धारण किया जाता है।।

पादुका उतनी ही पवित्र मानी जाती है, जितने संत-महात्माओं के चरण। मांगी नाव न केवट आना, प्रसंग में केवट पहले रामचंद्रजी के चरण धोता है और फिर उन्हें अपनी नाव में प्रवेश देता है। सज्जनों! बड़ा मार्मिक प्रसंग है। जिनके चरण-रज से पत्थर की मूरत, अहिल्या बन गई, अगर वे ही चरण केवट की नाव पर पड़ गए, तो उसकी रोजी-रोटी का क्या होगा? और हज़ारों वर्षों बाद प्रयागराज में उल्टी गंगा बहने लगी जब कोई प्रधान-सेवक, नमामि गंगे के स्वच्छता-सेवकों के चरण धोता है, तो कलेजा मुँह को आ जाता है। धन्य है भारत भूमि, और यहाँ के महान अवतारी पुरुष।

महान विभूतियों का केवल पाद-प्रक्षालन ही नहीं होता, उनकी पादुकाओं का विधिवत पूजन भी होता है, जिसे सद्गुरु-पादुका-पूजन कहते हैं। गुरु-पूर्णिमा के पर्व पर सद्गुरु एवं उनकी पादुका-पूजन का विशेष महत्व होता है। यह आस्था का विषय है, जिसके लिए तुलसी और राम भक्त हनुमान की तरह श्रीराम को हृदय में विराजमान करना पड़ता है।।

ये कहाँ आ गए हम! आइए, वर्तमान में प्रवेश करते हैं। चरण अब सामान्य पाँव हो गए हैं, जिनकी साँप-बिच्छू, धूल-मिट्टी, काँटे और कंकड़-पत्थर से सुरक्षा के लिए पाँवों में जूता धारण किया जाता है। ऐसा नहीं है कि केवल मर्द ही पाँवों में जूता पहन सकते हैं, लेकिन महिलाओं को चप्पल पहनने में आसानी होती है, और साड़ी के साथ न जाने क्यों, जूते को कुछ शर्म सी महसूस होती है।

दूसरी बात! कुछ मजनुओं की पूजा के लिए, पाँव से चप्पल निकालकर पूजा करने में बड़ी आसानी होती है। अभी-अभी एक सांसद ने पाँव से जूता निकालकर एक विधायक की पूजा कर दी। जहाँ चाह है, वहाँ राह है, और आवश्यकता, आविष्कार की जननी है। किसे पता था, जिस पादुका की श्रद्धा और समर्पण से पूजा होती है, वही पादुका, जूते का विकराल रूप धारण कर, समय आने पर, किसी के सर की पूजा के काम आएगी।।

उपनयन संस्कार की ही तरह घरों में एक और संस्कार होता था, जिसे कोई विधिवत नाम तो नहीं दिया जाता था, लेकिन जब भी बच्चों की अकल ठिकाने लगाना होती थी, उनकी बाबूजी द्वारा जूतों से पूजा की जाती थी। कालांतर में किसी की भी अकल ठिकाने लगाने के लिए, इस विधि का उपयोग किया जाने लगा। राग दरबारी में इस विधि को जुतियाना कहा गया है। सुधिजन इसे पढ़कर लाभान्वित हों, और यह ज्ञान उन्हें वक्त ज़रूरत काम आवे।।

वैसे समय बड़ा बलवान है और आदमी महान है ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ ऋतूंची फुलमाला… ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

☆ ऋतूंची फुलमाला ☆ सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

वसंत येईल राजा बनुनी,

चैतन्याने भरली अवनी!

नवसृजनाचे दालन उघडूनी,

नवल उमटले माझिया मनी! .. १

*

ग्रीष्म झळा त्या घेता भुवनी,

तगमग होई सजीव जीवनी!

शोधित जाई गारवाही मनी,

चाहूल घेई वर्षेची आंतुनी! .. २

*

वर्षे चा पहिला शिडकावा,

चराचराला देई गारवा!

वाट पाहतो ऋतू हिरवा,

दिसेल तेव्हा बदल नवा! .. ३

*

शरदाचे दिसताच चांदणे,

आनंदाला काय उणे!

चंद्र चकोरी नभात बघणे,

धरतीवर स्वप्नात रंगणे! .. ४

*

हेमंताची लागताच चाहूल,

पडे थंडीचे घरात पाऊल!

दाट धुक्याची घेऊन शाल,

निद्रिस्त राही निसर्ग विशाल! . ५

*

शिशिराची ती थंडी बोचरी,

पान फुलांना निद्रिस्त करी!

जोजवते आपल्या अंकावरी,

शांत मनोरम सृष्टी साजरी! .. ६

*

सहा ऋतूंची ही फुलमाला,

निसर्ग वेढीतो ती सृष्टीला!

प्रत्येक ऋतू बहरून आला,

अस्तित्वाने मनात फुलला! .. ७

© सुश्री उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

वारजे 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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