हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१६ ☆ भावना के दोहे – मन मोहन  ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मन मोहन )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मन मोहन  ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

 

करते तेरी वंदना, हम तो आठों याम।

मन मोहन से पूछती, कब आओगे श्याम।।

 *

अंतस् की पीड़ा बढ़ी, कहाँ छुपी मुस्कान।

अभिनय तुम करना नहीं, उससे तुम अंजान।।

 *

मीत हमारी प्रीत का, तुझे नहीं है भान।

अब तो मुझको समझ लो, तुझमें बसती जान।।

 *

शर्त नहीं हमने रखी, प्रेम किया आगाध।

दोष नहीं तुमको दिया, बस मेरा अपराध।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९८ ☆ कविता – यह कैसी तकरार लड़ाई… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आपकी  एक कविता – यह कैसी तकरार लड़ाई आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९८ ☆

कविता – यह कैसी तकरार लड़ाई☆ श्री संतोष नेमा ☆

यह कैसी तकरार लड़ाई

बात किसी को समझ न आई ।।

दादागीरी की ज़िद देखो ।

अमरीका ने आग लगाई ।।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

यह कैसा कानून कायदा ।

देखें अपना सिर्फ फायदा ।।

यूएन ओ धृतराष्ट्र बना है।

दिखे ना उसको कहीं आपदा ।।

आज समय लेता अंगड़ाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

यूक्रेन को धमकाता रसिया ।

यूएसए की चालें घटिया ।।

रखते बड़ी नाक मतवाले ।

कातिल चाल चलें नटखटिया ।।

केवल अपनी दिखे भलाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

पाक बड़ा नालायक लगता ।

जिसका खाता उसको ठगता ।।

हमला करता अफगानों पर ।

बारूदों से स्वयं सुलगता ।।

बढ़ा रहा आतंक कसाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

किम जोंगुन की बात निराली ।

करे नित्य आघात मवाली ।।

सनक मिजाजी उसकी शातिर।

निंदनीय है न्याय प्रणाली ।।

मिसाइलें उसने चलवाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

भले देश छोट इजरायल ।

है अमेरिका उसका कायल ।

कैसी जंग छिड़ी है भाई ।

कदम कदम मानवता घायल ।।

समझ गई दुनिया कुटिलाई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

खेल तेल का हर दिन चलता ।

मन में खोट इरादा पलता ।।

दबा रहे दीगर देशों को ।

यह संतोष खेल अब खलता ।।

जगजाहिर इनकी चतुराई ।

यह कैसी तकरार लड़ाई ।

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६१ ⇒ हल्दी और मेंहदी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हल्दी और मेंहदी।)

?अभी अभी # ९६१ ⇒ आलेख – हल्दी और मेंहदी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हल्दी और मेंहदी दो ऐसी दी हैं, जो अपने ही रंग में रंगी हुई हैं, और जिसके हाथ लग जाती हैं, उन्हें भी हाथों हाथ रंग जाती हैं।

जहां भी रस्म है, रिवाज है, उत्सव है, तीज त्योहार है, खुशी का मौका है, शादी ब्याह है, दोनों दीदियां सज धजकर तैयार हैं।

हल्दी अगर एक गांठ है तो मेंहदी एक हरा भरा कांटेदार पौधा। हल्दी इतनी हेल्दी है कि खाई भी जाती है और लगाई भी जाती है। जब कि मेंहदी सिर्फ लगाई जाती है। कुदरत ने इन दोनों को इतना तबीयत से रंगा है कि जो भी इन्हें पीसता है, अथवा घोलता है, खुद इनके रंग में सराबोर हो जाता है।।

मेंहदी लगी मेरे हाथ! सिर्फ हाथ ही क्यों ? सर से पांव तक आजकल मेंहदी का सम्राज्य फैला हुआ है। कहीं कहीं तो यह आलम है कि रविवार की छुट्टी का दिन मेंहदी दिवस ही बन जाता है। मेंहदी आजकल सिर्फ श्रृंगार नहीं, फटते पांवों के लिए राहत है, किसी के लिए शौक है तो किसी के लिए रोजगार। चारों ओर फल फूल रहा मेंहदी का कारोबार।

गोरे गोरे हाथों में मेंहदी लगा के

नैनों में कजरा डाल के।

चली दुल्हनिया पिया से मिलने

छोटा सा घूंघट निकाल के।।

एक नहीं ऐसे कई लोकगीत ढोलक की थाप पर महिलाओं द्वारा गाये जाते हैं जब मेंहदी और हल्दी की रस्म होती है।

मेंहदी तो खैर महिलाओं की जीवन संगिनी है लेकिन हल्दी रस्म बड़ी खास होती है। एंटी बैक्टिरियल और एंटीसेप्टिक गुण तो होते ही हैं हल्दी में, रंग में निखार तो आता ही है, एक तरह का उबटन ही तो है हल्दी। हल्दी लगाई नहीं जाती, लगवाई जाती है। दूल्हा हो अथवा दुल्हन, गालों पर कितनी उंगलियां हल्दी लगाती हैं, कोई हिसाब नहीं।।

मेंहदी जहां जहां भी रच जाती है, बस प्रेम और रंग बरसाती है। जब कि हल्दी दूध में भी घुल जाती है, हड्डियों को मजबूत ही नहीं करती, खून भी बढ़ाती है। हल्दी का नाम लेकर हल्दीराम भले ही मशहूर हो गया हो, हमारे घर में एक बार नमक नहीं हो, चलेगा, हल्दी नहीं हो, नहीं चलेगा। कच्ची हल्दी भी बड़ी गुणकारी होती है। इसका अचार भी बनता है और सब्जी भी।

कैसी कहावत है यह, हींग लगे ना फिटकरी….? जब कि ना हींग में कोई रंग है और ना ही फिटकरी में। माना कि हींग में ही हिना के समान ही खुशबू है और फिटकरी पानी साफ करती है लेकिन जब भी चोखे रंग की बात होगी, खुशबू और महक की रात होगी, वहां हल्दी और मेंहदी हमेशा साथ होंगी। देखिए मेंहदी का रंग ;

बन्नी के गोरे गोरे हाथ

मेंहदी लगाओ रे।

इस पे बन्ने का लिख दो

नाम ..!!!

और अब हल्दी का रंग ;

सोने के कटोरवा में पिसल

हरदी अम्मा लहे लहे

हरदी लगावे ;

चटकार अम्मा लहे लहे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शिक्षा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  शिक्षा।)

? कविता – शिक्षा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(चौपाई छंद)

?

शिक्षा नूतन पथ दिखलाती

शिक्षा ही तो मान दिलाती l

सत्य राह चलना सिखलाती

संस्कृति से परिचय करवाती ll

*

शिक्षा का हम अलख जगाएं

जीवन का तम दूर भगाएं l

शिक्षा बिन नर पशु है जानो

शिक्षा का मतलब पहचानो ll

*

सारे जग का है यह नारा

फैले शिक्षा का उजियारा l

करना कारज कोई न्यारा

बहे देश में शिक्षा धारा ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १८ – कविता – खुशियों का पैगाम… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘खुशियों का पैगाम।)

☆ शशि साहित्य # १८ ☆

? कविता – खुशियों का पैगाम…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

छा गई रुत खुशियों की,

किस बात का संदेशा ले आई …

मतवाला बन घुमड़ रहा है जी,

 इस तपिश में बरसने,

जो बात मन को भायी…

खुशियां खिल रही वृक्षों पर,

कालियां भी मुस्कायी…

फूल रहे हैं बौर भी,

खिलखिला रही अमराई…

नदिया भी बल खा कर,

आंचल सा लहराई…

खुशबू संग लिए अपने,

गुनगुना रही है पुरवाई…

चांद जमीं पर उतर आया,

देख बहारों की तरुणाई…

तारों की बारात सजी है,

रस घोल रही है शहनाई…

हरषुं खुशियां दमक रही है,

गुम हो गई है तन्हाई…

छा गई रुत खुशियों की,

मनचाहा संदेशा ले आई…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “चांदण्याची फुलं…” ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “चांदण्याची फुलं” ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

उजेडाच्या झाडाला गं चांदण्यांची पुलं

मनाच्या आंगणी तुझ्या यशाचीच फुलं

थकतील हात तरी येवढंच काम

उचलून हुंगायची आंगणात फुलं

 *

आनंदाची बाग, बागडावं मनसोक्त

रात्रीतून वेचायची चांदण्यांची फुल

 *

चांदणी ती तुझी, छोटुलीला मी दाखवी

तिनेच ना पाठवली चांदण्यांची फुलं?

मनाच्या त्या गाभा-यात असेल का जागा?

वहायला माझ्यासाठी चांदण्यांची फुलं

सांग तुझ्या छोटुलीला म्हाता-याची गोष्ट

आणि सांग वहायला चांदण्यांची फुलं.

© श्री सुनील देशपांडे

मो – 9657709640

email : sunil68deshpande@outlook.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८८ – नवे उखाणे…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८८ – विजय साहित्य ?

☆ नवे उखाणे…!

(पंधराक्षरी..!)

दिवसाकाठी, जमेल तैसे, भांडून घ्यावे

वेळ काढूनी, हिशोब सारे,

मांडून घ्यावे. १

 

कधी वायदे, कधी कायदे, प्रेमभराने

कुरापतीचे, अक्षर काळे,

मांडून घ्यावे.२

 

काय बोलला, कसे वागला,

नका आठवू

गजरा साडी, स्वप्न बोलके,

मांडून घ्यावे.३

 

नको कुणाचे, फुका टोमणे,‌ सांजसकाळी

ताट भोजनी, तिच्या‌ हातचे

मांडून घ्यावे. ४

 

प्रेम पाहण्या, हवा कशाला

तुला आरसा

चार कोन‌ते,‌दिठि‌ मिठीशी,

मांडून घ्यावे. ५

 

फिरावयाला, नको‌ बहाणे,

जावे सोबत,

घर खर्चाचे, जुने आकडे,

मांडून घ्यावे. ६

 

तिला पाहिजे,तशीच द्यावी, तिला पैठणी,

मोर नाचरे, सुख दुःखाचे,

मांडून घ्यावे.७

 

सेमच आहे, प्रेम तरीही,

वागू हटके

ताळेबंद हे, शिलकीतले,

मांडून घ्यावे.८

 

हवा दुरावा, प्रेमांतरीचा,

रजे‌ मजेचा

ओठांवरती,नवे उखाणे,

मांडून घ्यावे.९

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # आता कोठे धावे मन… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # आता कोठे धावे मन… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

#… आता कोठे धावे मन… तुझे चरण चूकलेची आज… #

मघा पर्यंत आम्ही साथ दिली तू विकत घेतलेल्या त्या दोन वर्षापासून… किती झिजलो दिवसरात्री झाली कातड्याची कि रे चाळण… परी तुझ्या चरणांची झीज नाही होऊ दिली… आजवरी अखंडीत केला कि रे त्यांचा सांभाळ… मग आज अचानक काय झाले तुझे वदन ते हिरमुसले… नाही पटली का आमची तुला ही चरणसेवा… अश्या एकांत जागी तू आम्हाला असा तोडूनी सोडून जावा… का नाही पाहशी मागे वळूनी एकवार प्रेमाने… ती तुझी दृष्टीची आस मनी आमच्या खुळ्या आशेने अंकुरते… कोण येईल नि कधी, कसा येईल या निर्जन ठिकाणी आणि आम्हाला असे बेवारस पडलेले पाहून द्रवेल का त्याच्या अंतकरणी आपुलकीचे पाणी… अहाहा अहाहा किती सुंदर छान मुलायम कातडी जोडे.. हे या आडवाटेला कसे बरे येऊन पडले… का त्या चरणांना यांचा विसरच पडला आणि या जोड्यांना त्याचा कायमचा विरहच घडला… पाहूया येतात का मम चरणांना… बसले ठिकठाक तर नेऊ सोबत नाही तर ठेवू इथेच जसे होते तैसेच…

ते बिचारे जोडे आजही बरेच दिवस झाले आहेत त्यांच्या साईजचा चरणद्वयाच्या प्रतिक्षेत बसले आहेत… ते पाय इकडे येतील नि आपला हा वनवास संपेल… पण हळूहळू ती आशा आता मावळत गेलीय… निरर्थक आशेकडे डोळे लावून बसले खरे त्या जोड्यांना आता काळवंडलेपणाने चांगलेच घेरलेय… धुळ मातीची पुटं चढून कातडं आता निबर झालयं.. सुरकुत्यांच्या रेघाने कातड्याला भेगा पडल्यात… तळव्याला भोकं पडलीत… कसरीने भूगा पाडून देहपतन होत गेलाय… नवलाई तर कधीच उडून गेली..

आठवतात कधी तरी त्या जुन्या मोजक्या आठवणी… मालकाने दुकानातून आपल्याला खरेदी केलेला तो क्षण.. सुंदर नक्षी, मऊ मुलायम कातड्याचा आरामदायी चरणांना होणारा स्पर्श पाहून मालक वेडावून गेला आणि त्या आनंदाच्या भरात त्याने आपल्याला विकत घेऊन घराकडे गेला… एका समारंभाला जाण्यासाठी त्याने हा नवा घेतलेला जोड्यांत पाय सरकवले पण पण तो जोडा त्या पायांच्या नंबराचा नव्हताच मुळी… आंधळ्या प्रेमाची किंमत मात्र त्याला मोजावी लागली… तरीही दाबून त्याने पायात ते जोडे घालण्याचा अट्टाहास केला.. पाय आकसला नि कातड्याने पायाला चावा घेतला… दुकानी बदलून घेण्यासाठी त्याने प्रयत्न केला पण मुळच्या हवा तश्या डिझाइन मध्ये पुढचे नंबरचे जोडे नव्हते… आणि एकदा विकलेला माल कुठल्याही सबबीवर परत घेतला जाणार नाही अथवा बदलून दिला जाणार नाही या सुचनेच्या फलकाकडे दुकानदाराने बोट काय दाखवले मालकाचे बोलणेच खुंटले.. करतो काय बिच्चारा घेऊन जावे लागले त्याला ह्या जोड्याला मग ते घरी घेऊन आला… मालकाच्या डोक्यात सुपिक आयडिया निघाली आणि अनायसे नवा जोडा बदलून मिळतात अश्या सार्वजनिक ठिकाणी जिथे जोडे बाहेर काढावे लागतात अश्या ठिकाणी मालकाने मला कैक वेळा सोडून बदल्यात दुसरे जोडे न्यायचा प्रयत्नही करून पाहीला.. पण प्रत्येक खेपेला तो डाव अयशस्वी झाला… मालकाला खूप राग आला स्वता बरोबर माझाही… पण उकिरड्यावर टाकणे त्याला जीवावर येत होते… आणि आज अचानक त्याने या निर्जन ठिकाणी सोडून आपण अनवाणीपणे जाणे पसंत केले… एकवेळ तू चरणसेवा नाही दिलीस तरी चालेल पण तूझा हा चरणचावा मात्र आधी थांबव… असं सारखं सांगून सांगून मालक थकून तो गेला पण माझ्यात काही बदल न झाला… रागाच्या भरात तडकाफडकी निर्णय त्याने घेतला आणि आता तुम्ही पाहतायना हे असं निर्जनस्थळी एकांती आम्हासी सोडून गेला…

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १४ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १४ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

परमेश्वराशी तादात्म्यता-१

मागील भागात स्वतः तुकाराम महाराज निःसंग होऊन लोकांनाही भवभया पासून मुक्त होण्यासाठी कसे सावध करीत होते हे आपण पाहिले. एकदा जीवनात निःसंगता आली की द्वैतभाव नष्ट होऊन परमेश्वराशी तादात्म्यता कशी येते याविषयी गाथेतील काही अभंग घेऊन आपण या भागात विवेचन करूया.

शरणागत भक्तांना तुकाराम महाराज काय सांगत आहेत?

ब्रह्मादीक जया लाभासी ठेंगणे/

बाळीये आम्ही भले शरणागत//१//

ते भक्तांविषयी आणि स्वतः विषयी बोलत आहेत. ब्रह्मादीकांना सुद्धा जो लाभ होऊ शकत नाही, ते त्यासाठी ठेंगणे, तोकडे पडतात तो लाभ देवाला शरण आलेल्या आम्हा भक्तांना अगदी सहज होतो. त्याचे कारण काय? तर

 कामनेच्या त्यागे भजनाचा लाभ/

 झाला पद्मनाभ सेवाऋणी//२//

आम्ही कामना, वासनांचा त्याग केल्यामुळे आम्हाला भजनाचा लाभ झाला आहे आणि आमच्याकडून होणाऱ्या या सेवेसाठी प्रत्यक्ष विष्णू सुद्धा आमचा ऋणी झाला आहे.

परमेश्वराला प्रसन्न करण्याचे भजन हे फार प्रभावी साधन आहे.

 कामधेनुच्या क्षीरा पार नाही/

 इच्छितचिये वाही वरुसावे//३//

या ठिकाणी महाराजांनी कामधेनूचे रूपक वापरले आहे. कामधेनूचे दूध कधीही न आट णारे असते. या सर्व संत मंडळींची हरी म्हणजे कामधेनू आहे. जेवढ्या आमच्या हरिभक्तीचा जोर मोठा तेवढा या धेनूचा पान्हा सकस आणि सरस!

 हरी नाही आम्हा विष्णुदासा जगी/

 नारायण अंगी विसावला//४//

आम्हाला बसल्या जागी परिपूर्णत्व आले आहे. आता आमच्या ठिकाणी ध्याता, ध्यान, आणि ध्येय असा भेद राहिला नाही. नारायण आमच्या अंगी विसावला आहे अर्थात आम्ही अद्वितीय ब्रह्मरूप झालो आहोत.

 शेवटी याच अभंगात महाराज सांगतात,

 तुका करी जागा/ नको वासपू वाउगा/

 आहेस तू अंगा/ अंगी डोळे उघडी//५//

प्रत्यक्ष भगवंत हृदयात स्थिर झाल्यामुळे, नारायणमय झाल्यामुळे आम्ही भक्तजन अत्या- नंदाच्या भोजनाचा आस्वाद घेत आहोत. वासनाक्षयामुळे आम्हाला पुनर्जन्म नाही. नारायण स्वरूपाशी तादात्म्यभाव हे या अवस्थेचे रूप आहे.

निजरूप विसरून तुकाराम महाराज झोपी गेलेल्याला जागे करतात. त्याला सांगतात की तू भिऊ नकोस. अद्वैतरूपी हरी तुला सापडेल कारण तू स्वतःच अंगाने तो आहेस, परमात्मा रूप आहेस. जेव्हा तू तुझी आत्मिकदृष्टी उघडून पाहशील तेव्हा तुला त्याचे ज्ञान होईल.

एकात्मतेचे दुसरे उदाहरण या अभंगातून पहा.

 माया तेची ब्रह्म ब्रह्मतेची माया/

 अंग आणि छाया जया परी//

आपले शरीर आणि सावली ही जशी वेगळी नसतात, त्याचप्रमाणे माया आणि ब्रह्म या दोन वेगळ्या गोष्टी नाहीत. जरी या दोन वेगळ्या गोष्टी भासल्या तरी तत्वतः त्या एकच आहेत. छाया कोणत्याही शस्त्राने तुटत नाही. हाताने तिला दूर सारता येत नाही. जमिनीवर लोटांगण घातले तरी ती वेगळी न होता आपल्या अंगाखाली दिसेनाशी होते. आपण उंच झालो तर ती उंच होते, वाकलो तर ती आपल्याबरोबर लवते.

*

आता केशी राजा हेची विनवणी/

 मस्तक चरणी ठेवीतसे//१//

*

देह असो माझा भलतीये ठाई/

 चित्त तुझ्या पायी असो द्यावे//२//

*

काळाचे खंडण घडावे चिंतन/

 तन मन धन विन्मुखता//३//

*

कफ वात पित्त देह अवसाने

 ठेवावी वारुनी दुहिते ही//४//

*

सावध तो माझी इंद्रिय सकळ/

 दिली एक वेळ हाक आधी//५//

*

तुका म्हणे तू या सकळाचा जनिता/

 येथे ऐक्यता सकळांसी//६//

*

इथे परमेश्वराला उद्देशून महाराज म्हणतात,

“हे केशवा, तुझ्या पायांवर मस्तक ठेवून मी तुला विनंती करतो की, माझा देह कुठेही असो, पण चित्त मात्र तुझ्या ठिकाणीच असावे. देह, मन, द्रव्य याचा मोह नष्ट होऊन अखंड तुझ्याच चिंतनात माझा सर्व वेळ खर्च व्हावा. कफ, वात, पित्त या त्रिदोषांचे माझ्या अंतकाळी निवारण व्हावे. जोपर्यंत माझी सर्व इंद्रिये सावध आहेत तोपर्यंत मी तुम्हाला साद घालून वर्तमान परिस्थिती निवेदन करीत आहे. “

सामान्य जन मूढ आहेत, त्यांना परब्रम्ह स्वरूपात द्वैतभावना नाही हेच मुळी समजत नाही. त्यांना तारण्यासाठी भक्तीचे महात्म्य पटवून देणे आवश्यक आहे. तुकाराम महाराज त्यांच्या मनातील हे विचार खालील अभंगात सांगत आहेत.

 याजसाठी भक्ती/ जशी रुढवावया ख्याती/

 नाही तरी कोठे दुजे/ आहे बोलावया सहजे/

 गौरवावयासाठी/ स्वामी सेवेची कसोटी/

 तुका म्हणे अळंकारा/ देवभक्त लोकी खरा//

लोकांमध्ये भक्तीचा गौरव होण्यासाठी स्वामी, सेवक आणि सेवेची कसोटी या गोष्टी येतात. लोकांमध्ये देव आणि भक्त यांचे वरवरचे द्वैत हे भूषण आहे, अलंकाराप्रमाणे आहे. या सगूण भावातूनच हळुहळू जनसामान्यात एकरूपता येते.

ईश्वराशी महाराजांची संपूर्ण तादात्म्य पावलेली अवस्था या अभंगात ते वर्णितात.

 काहीच मी नव्हे कोणीये गावीचा/

मी कोणीच नाही. मला ना नाव ना गाव. जागच्या जागी असणारे जे एकमेव ब्रह्म आहे तेच मी आहे.

*नाही जात कोठे येत फिरोनिया/ मी कोठे जात नाही की मी परत येत नाही.

 नाही मज कोणी आपले दुसरे/

 कोणाचा मी खरे काही नव्हे//

 मी कोणाचा नाही, माझे कोणी नाही, माझ्यात आप-परभाव नाही.

 नाही आम्हा जावे मरावे लागतं/

 अहो अखंडित जैसे तैसे//

आम्ही जगत नाही की मरत नाही, कायम जसेच्या तसे राहतो.

 तुका म्हणे नामरूप नाही आम्हा/

 वेगळा या कर्मा-अकर्मासी//

आम्हाला रूप नाही, नाव नाही, कर्म-अकर्म यापासून आम्ही वेगळे आहोत.

 परमेश्वराशी एकरुपता म्हणजे काय हे आपल्याला तुकारामांच्या या अवस्थेतून स्पष्ट होते.

क्रमशः… १४ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ‘आयेचा फोटु…’ ☆ शांभवी मंगेश जोशी ☆

सुश्री शांभवी मंगेश जोशी

?जीवनरंग ?

☆ ‘आयेचा फोटु…’ ☆ शांभवी मंगेश जोशी 

सकाळी झाडू मारायला गेली, तेव्हा 705 मधल्या मॅडमनी इडल्या दिल्या होत्या. रखमानी त्या तेलावर परतून त्यावर तिखट-मीठ भुरभुरून सदाला दिल्या. सदा खूष झाला. नाष्ट्याचं काम झालं.

दोन-तीन दिवसांपासून त्याचं सारखं चालू होतं ‘मोबाईल पायजे’. माजा समदा अभ्यास त्याच्यावरच असतुया. रखमाला काही कळंना. पैसे कुठून आणावं त्या मोबाईलसाठी. पर अभ्यास त्यावर असतो म्हणतुया. रखमानं परोपरानं त्याला समजावलं. दिवाळी पत्तुर दम धर. दिवाळी मिळंल त्यातनं बघते.

पण त्याला काही पटत नव्हतं. त्याची आदळ-आपट अन् अबोला, यामुळं रखमा मनातून कष्टी होती. रोज कुणी काही शिळं पाकं द्यायचं त्यावरच दोघांचं भागायचं. आज दुपारी त्याला ताजी भाकर करून द्यावी, लेकराला जरा बरं वाटंल असं ठरवून रखमा पुढच्या कामाला गेली. सारी सोसायटी झाडायची म्हणजे तिला बराच वेळ व्हायचा. पण आज रविवार. शाळेची सुट्टी. त्यामुळे आज तिनं भाजी-भाकरीचा बेत ठरवला होता.

कामावरून येतांना भाजीला पाच रुपयांचा पाला घेऊन आली. भराभरा पाला फोडणीला घातला. भाकरी थापली न् सदाला हाक मारली. ‘‘ये रं पोरा. ज्यवायला ये. ताजी भाकर केलिया तुझ्यासाठी. माझ्या सोताच्या हातानं. आपल्या घरात. ये माझ्या राजा. ’’

सदानं हू, की चू केलं नाही. जेवायलाही आला नाही. रखमानं उठून पाहिलं, तर फुरगंटून बसला होता. तिच्याकडं बघायलाही तयार नव्हता. रखमानं लाख मिनतवार्‍या केल्या, पण तो काही बधला नाही. शेवटी तणतणत पाय आपटत खोपटातनं निघून गेला.

रखमाच्या काळजाचं पाणी-पाणी झालं. कधी नव्हं ते घरला ताजी भाकरी केली. लेकरासाठी. पण त्यां ती शिळीच केली. शिळी करून बी खायचं नाव नाही. रखमानं डोळ्याला पदर लावला. तिच्या तरी घशाखाली घास कसा उतरणार? त्या दिवशी दोघंही उपाशीच झोपले. रखमाला त्या भाकरीकडं पाहून राहून राहून दुःखाचे कढ येत होते. पोरासाठी जीव तुटत होता. त्याचा बाप गेल्यापासून रखमानं तळहाताच्या फोडासारखा जपला होता पण पैश्याची सोंगं ती कुठून आणणार? पोरगं हट्टापायी जिवाला त्रास करून घेतंय म्हणून तिला वाईट वाटायचं. आज तर अबोलाच धरून बसला होता.

दुसर्‍या दिवशी शाळेत गेला तोही उपाशीच. आला तो ओरडतच. ‘‘आये, मपले शाळेचे कपडे धून ठीव. उद्याच्याला कारेक्रम हाय शाळत. ’’

‘‘कसला रं? ’’

‘‘मला न्हाय म्हाइत. पर गांधीबाबाचं काय तरी हाय! ’’ पर कापडं चमकून ठीव झाक. दोन ऑक्टोबरचं स्वच्छता अभियान होतं शाळेत. बरं बरं म्हणून रखमा उठलीच. कालचा राग सोडून पोरगं दोन शब्द बोललं म्हणून रखमा हुरळून गेली. तिनं डाळ-भात शिजवला. त्यानंही मुकाट्यानं खाल्ला. रखमाचा जीव भांड्यात पडला.

दुसर्‍या दिवशी दुपारी चार वाजता रखमा समोरची सोसायटी झाडून आली तर सदा धावत आला. ‘‘चल शाळेत चल. लौकर चल’’ असं म्हणून ओढतच तिला शाळेत घेऊन गेला. अंगावरच्या मळक्या पातळातच तिला ओढून शाळेत घेऊन गेला.

शाळेत सगळी पोरं पटांगण साफ करत होते. मास्तर लोकही पोरांना सांगून साफसफाई करून घेत होते. पाहुणे, पुढारी आलेले होते.

सदानी आईला मास्तरांसमोर उभं केलं. रखमाचा जीव लाजेनं कांडकोंडा झाला. मास्तरांनाही कळंना. कोण आहे ही? कशाला आली आहे?

त्यांनी सदाला विचारलं, ‘‘काय रे सदा, कोण आहेत ह्या? कशाला आणलंस त्यांना? ’’

‘‘मास्तर, मपली आय हाय ती. ’’

‘‘कशाला आणलंस शाळेत आईला? आज पालकांना नाही बोलावलेलं. ’’

‘‘मास्तर का न्हाय बोलावलं मपल्या आयेला आज? आज तिचा खरा मान हाये. म्हून म्या आणलंय तिला फोटू काढाया. ’’

‘‘काय? कसला मान? कसला फोटू? ’’

‘‘आज शाळेत स्वच्छता… (अभियान) चालू हाय ना? त्यासाठी आणलंय आयला. त्या फोटुग्राफरला सांगा आयेचा फोटो काढाया लावा त्येंना. ’’

लाज-शरमेनं रखमाचा जीव पाणी पाणी झाला. ‘‘हत् येड्या. मपला कसला फोटु? येडा का खुळा? सोड मला. जाऊं दे घरला. अजून सारी सोसायची झाडायची हाय मागली. ’’

न्हाय-न्हाय, मी तुला जाऊन देणार न्हाय. रोज सारा जनमभर झाडत असतीया. मंग तुझाच फोटु काढाय पायजे. हे सगळे काय रोज झाडतात का कधी? तुझ्यावाणी? नुसता हातात झाडू घेऊन फोटु काढत्याती अन् पेपरात देतात.

सूज्ञ प्रेस फोटोग्राफरला इथं काही तरी बातमी दिसली. त्यानी लगेच रखमाच्या हातात झाडू दिला अन् तिचा फोटो काढला.

दुसर्‍याच दिवशी झाडझूड करताना आमदार साहेबांच्या फोटोशेजारी रखमाचाही फोटो छापला होता. ‘विशेष’ मधे. खाली लिहिलं होतं- ‘‘सत्कार्यासाठी फोटो – अन् फोटो हेच सत्कार्य’’

शाळेतही नोटीस बोर्डवर तो पेपर लावला होता. सदानं धारिष्ट्यानं सरांना तो पेपर मागितला. सरांनी शाळा सुटल्यावर सदाला तो पेपर दिला. सार्‍या वस्तीत तो पेपर दाखवत सदा धावत सुटला. ‘‘मपल्या आयेचा फोटु पेपरात. बघा-बघा आयेचा फोटु. मपल्या आयेचा फोटु. ’’

हसता-हसता डोळे पुसून रखमाचा पदर ओला झाला.

© शांभवी मंगेश जोशी

संपर्क – सुमन फेज 4, धर्माधिकारी मळा, एस्सार पेट्रोल पंपामागे, सावेडी, अहमदनगर 414003

फोन नं. 9673268040, shambhavijoshi76@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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