(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी।
इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Petrichor…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
~ Petrichor… ~
It was the first rain of the season…the heavenly petrichor –the proverbial Mitti ki Sugandh, enveloped the environment… Here’s a little tribute to this celestial occurrence…
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “ईरान की संस्कृति” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०५ ☆
आलेख – ईरान की संस्कृति श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
ईरान की संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। इसे ‘फारसी संस्कृति’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसने न केवल मध्य पूर्व बल्कि मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के साहित्य, कला और दर्शन पर भी गहरा प्रभाव डाला है।
ईरानी संस्कृति की आत्मा उसकी कविता में बसती है। फारसी साहित्य दुनिया के गौरवशाली साहित्य में गिना जाता है।
महान कवि: फिरदौसी, हाफ़िज़, रूमी और सादी जैसे कवियों की रचनाएँ आज भी विश्वभर में पढ़ी जाती हैं।
शाहनामा: फिरदौसी द्वारा रचित ‘शाहनामा’ ईरान का राष्ट्रीय महाकाव्य है, जो प्राचीन फारस के इतिहास और मिथकों को संजोए हुए है।
कला और वास्तुकला
ईरानी वास्तुकला अपनी भव्यता, ज्यामितीय सटीकता और नीले रंग की टाइलों के काम के लिए प्रसिद्ध है।
इस्फहान की मस्जिदें: इस्फहान शहर को ‘निसफ-ए-जहाँ’ (आधी दुनिया) कहा जाता है, जहाँ की ‘मस्जिद-ए-शाह’ और ‘शेख लुतफुल्ला मस्जिद’ वास्तुकला के बेजोड़ नमूने हैं।
कालीन : ईरानी कालीन दुनिया भर में अपनी बुनाई, रंगों और जटिल डिजाइनों के लिए मशहूर हैं। यह ईरान की एक प्राचीन हस्तकला है।
त्यौहार और परंपराएँ
ईरानी संस्कृति में कई ऐसे त्यौहार हैं जो इस्लाम के आगमन से पहले के हैं और आज भी उतनी ही धूमधाम से मनाए जाते हैं।
नौरोज़ : यह फारसी नव वर्ष है, जो वसंत ऋतु के आगमन पर मनाया जाता है। यह प्रकृति के पुनर्जन्म का प्रतीक है।
शब-ए-यल्द: साल की सबसे लंबी रात को परिवार के साथ मिलकर फल (विशेषकर अनार और तरबूज) खाकर और कविताएँ पढ़कर मनाया जाता है।
खान-पान
ईरानी भोजन अपने संतुलित स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाता है। इसमें केसर, सूखे मेवे, गुलाब जल और अनार का भरपूर उपयोग होता है।
चेलो कबाब: यह ईरान का राष्ट्रीय व्यंजन है, जिसमें सुगंधित चावल (बेरेंज) के साथ ग्रिल्ड कबाब परोसा जाता है।
सब्जी खोरेश: विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियों और मांस से बना स्टू भी यहाँ काफी लोकप्रिय है।
शिष्टाचार: ‘तारोफ़’
ईरानी संस्कृति में ‘तारोफ़’ एक अनूठी सामाजिक शिष्टाचार पद्धति है। यह अत्यधिक विनम्रता और सम्मान दिखाने की कला है, जिसमें अक्सर दुकानदार या मेजबान पहली बार में पैसे लेने से मना कर देते हैं या मेहमान को अत्यधिक सम्मान देते हैं। यह आपसी रिश्तों में कोमलता और सम्मान बनाए रखने का एक तरीका है।
ईरान की संस्कृति प्राचीन परंपराओं और आधुनिकता का एक अनूठा संगम है, जो मनुष्य को सौंदर्य, प्रेम और दर्शन की ओर प्रेरित करती है।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८६ – व्यंग्य – हवालात-ए-हुस्न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी पर ऐसे विराजमान थे जैसे किसी सल्तनत के आखिरी वारिस हों और मैं उनकी प्रजा का सबसे फर्जी फरियादी। मैंने जैसे ही हांफते हुए कहा कि “सर, लूट हो गई,” उन्होंने अपनी मूंछों को कड़क चाय के भाप से सहलाया और बोले, “अबे ओ केस डायरी के फटे हुए पन्ने, ये जो तू सांसें उखाड़कर ‘मुलजिम’ जैसी शक्ल बना रहा है, इसके लिए कोई अलग से ‘धारा’ लगवाऊं या सीधे ‘रोजनामचा’ में तेरी किस्मत का एनकाउंटर कर दूँ?” मैंने दलील दी कि सर चार नामालूम बदमाशों ने मेरा रास्ता रोका, तो उन्होंने बगल में खड़े सिपाही को इशारा किया, “देख हवलदार, प्रार्थी को वारदात से ज्यादा अपनी स्टोरी की चिंता है। लिखो इसमें—मजकूर शख्स अपनी लापरवाही की नुमाइश कर रहा था और बदमाशों ने इसे सरकारी माल समझकर कुर्क कर लिया।” उनके चेहरे पर वो दफा-302 वाली गंभीरता थी, जिससे लग रहा था कि एफआईआर दर्ज होने से पहले मेरा ‘पंचनामा’ पक्का है।
मुंशी जी ने अपना वो खानदानी रजिस्टर ऐसे निकाला जैसे वो किसी मुजरिम की हिस्ट्रीशीट हो। दरोगा जी ने पेन की निब से मेज पर दस्तक देते हुए कहा, “बेटा, ये जो तूने बैग छिनने की दास्तान सुनाई है, इसमें ‘सबूत’ कम और ‘सिनेमा’ ज्यादा है। बैग में क्या था? कोई ‘खुफिया दस्तावेज’ या बस तेरी ‘बेरोजगारी’ का कच्चा चिट्ठा?” मैंने जैसे ही लैपटॉप और गैजेट्स की लिस्ट गिनानी शुरू की, उन्होंने हाथ उठाकर मुझे बरामदगी के पहले ही खामोश कर दिया। बोले, “इतना तामझाम लेकर तू इस गली में ‘गश्त’ कर रहा था जैसे तू इस इलाके का ‘बीट ऑफिसर’ हो? ये तो वही बात हुई कि ‘माल-ए-मुफ्त, दिल-ए-बेरहम’। चोरों ने तो तुझ पर एहसान किया है कि तुझे बोझ से आजाद कर दिया, वरना तू तो ताजीरात-ए-हिंद की किताब बनकर ही घूमता रहता।” वहां मौजूद स्टाफ ऐसे ठहाके लगा रहा था जैसे थाना न होकर कॉमेडी सर्कस का रिमांड रूम हो। मुंशी जी ने चुटकी ली, “साहब, लिख दो कि बैग को जमानत मिल गई है, इसलिए वो प्रार्थी के पास से फरार हो गया।”
जब मेरी आंखों से आंसू मुलजिम की तरह टपकने ही वाले थे, तभी दरोगा जी ने एक जोर का ठहाका लगाया और मेज के नीचे से वही बैग निकाल कर मेरे सामने पटक दिया। मेरी तो जैसे शिनाख्त ही खो गई! वो मुस्कुराकर बोले, “अबे ओ ‘चश्मदीद गवाह’, ये बैग बाहर बेंच पर लावारिस पड़ा था। हम तो बस ये देख रहे थे कि अगर सच में तेरी ‘कुर्की’ हो जाए, तो तू थाने में बयान दर्ज कराएगा या सीधा सुसाइड नोट लिखेगा? ये जो अभी तूने सस्पेंस ड्रामा झेला है, ये तेरी सुरक्षा का चालान था।” मैंने कांपते हाथों से बैग उठाया, तो उन्होंने पीछे से आवाज दी, “अरे सुन, जाते-जाते इस मुठभेड़ की मिठाई तो खिलाता जा, वरना अगली बार हम तेरी एफआईआर में ‘क्लाइमेक्स’ ऐसा डालेंगे कि तू खुद को ही मुजरिम घोषित कर देगा!” मैं बैग लेकर ऐसे नौ-दो-ग्यारह हुआ जैसे कोई सजायाफ्ता कैदी जेल तोड़कर भागा हो, और पीछे से पूरा थाना ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के बजाय ‘हाहाकार जिंदाबाद’ के नारों से गूँज रहा था।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुढापे की लाठी…“।)
अभी अभी # ९४७ ⇒ आलेख – बुढापे की लाठी श्री प्रदीप शर्मा
(Walking stick)
गिरधर कविराय ने लाठी में जितने गुण बताए हैं, उसमें उन्होंने न तो बुढ़ापे का जिक्र किया है और न ही किसी दृष्टिहीन व्यक्ति का।
यानी कविवर शायद लठैत किस्म के व्यक्ति रहे हों, अधिकतर प्रवास पर रहे हों और उन्हें कुत्तों से अधिक डर लगता हो। बैलगाड़ी के जमाने में कवियों की दृष्टि भी नदी नालों के आगे नहीं जा पाती थी। लाठी उनके लिए कभी एक हथियार था तो कभी मात्र एक सहारा।
भले ही युग बदल जाए, लेकिन इंसान कुत्ते के पीछे लठ लेकर दौड़ना नहीं छोड़ेगा।
आजकल लाठी का नहीं, छड़ी का युग है। बुढापे की लाठी का उपयोग अब उम्र के हर पड़ाव पर होने लग गया है। लाठी को अगर सहारा कहें तो मन को अधिक सुकून मिलता है। बूढ़े आजकल सीनियर सिटीजन कहलाते हैं और अंधे को तो आप दृष्टिहीन भी नहीं कह सकते, क्योंकि आजकल वे भी दिव्यांग परिवार के सदस्य हो गए हैं। अब इस दुनिया में कोई असहाय, वृद्ध, अपाहिज, मूक बधिर, अथवा सूरदास नहीं।।
कोई व्यक्ति नहीं चाहता, उसे कभी लाठी का सहारा लेना पड़े। पहले घर परिवार ही इतने बड़े होते थे कि बच्चे ही बुढ़ापे की लाठी हुआ करते थे। यह एक ब्रह्म सत्य है, जब बच्चे छोटे होते हैं, तो बड़े ही उनका सहारा होते हैं। बड़ों की उंगली पकड़कर ही तो पहले चलना सीखते हैं और बाद में अपने पांवों पर खड़े हो जाते हैं।
जिस तरह बचपन के बाद जवानी आती है, जवानी के बाद तो बुढ़ापा ही आना है। उंगली वही रहती है, लेकिन कंधे और कमर अब वैसी नहीं रहती। अगर किसी इंसान का सहारा नहीं, तो छड़ी मुबारक। हमें तो लाठी उठाए बरसों बीत गए।
राजनीति में कल जिसके पास सिर्फ लाठी थी, उसने आज भैंस भी पाल ली है।।
जिस तरह दिन और हालात बदलते हैं, उसी तरह बुढ़ापे और लाठी की परिभाषा भी बदल चुकी है। आखिर लाठी क्या है, आलंबन, विकल्प अथवा सहारा ही न! और बुढ़ापा क्या है, बाल सफेद होना, दांत गिरना, कमर झुकना और आंखों – कानों से कम दिखाई देना। मुझे कम दिखाई देता है तो मैं लाठी नहीं ढूंढता, अपना चश्मा ढूंढता हूं। मेरा चश्मा ही मेरे लिए लाठी है।
बस इसी तरह सफ़ेद बाल की मुझे चिंता नहीं, रोज डाय करता हूं, बत्तीसी बाहर हुई नहीं कि, डेंचर मौजूद है। पेंशन क्या किसी लाठी से कम है। ये सब ही तो मेरे बुढ़ापे की असली लाठी हैं। जिसका पांव नहीं, वहां जयपुर फुट ही बुढ़ापे की लाठी का काम करता है। नाच मयूरी।।
लेकिन इतना सब होने के बावजूद मेरी असली बुढ़ापे की लाठी तो आज भी मेरी धर्मपत्नी ही है। वह कभी मेरा सहारा है तो कभी मैं उसका आलंबन।
कहीं कोई बेटा अपनी मां की लाठी है तो कहीं कोई पोता अपने दादा जी की लाठी।
जीवन के किस मोड़ पर हमें किस लाठी की आवश्यकता पड़ जाए, कुछ कहा नहीं जाता। सहारा लें, तो किसी को सहारा दें भी। लाठी में कर्ता भाव नहीं होता सिर्फ सेवा भाव होता है। लाठी ही सहारा है, सहारा ही ईश्वर है। एक सहारा तेरा।।
☆ जहाँ गिरता है पसीना, वहाँ चाँद उगता ही है ! – मुकुटबिहारी “सरोज” ☆
☆ म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती आयोजित ☆
सतपुड़ा की उपत्यका में फैले नीलाभ अंधेरे, महुआ, आम, नीम, बाँस और पलाश के दहकते फूलों की सुंदरता तथा उष्मा से अनुप्राणित अगर कोई कार्यक्रम हो, वह भी काव्यांजलि का तो उसके मोहक स्वरूप की कल्पना सहजतः की जा सकती है।
मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल एवं छिंदवाड़ा ईकाई के संयुक्त तत्वावधान में जनकवि मुकुटबिहारी सरोज की जन्मशती का भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया।
सुख्यात बुन्देलखण्डी कवि महेश कटारे सुगम की अध्यक्षता में संपन्न इस सारस्वत आयोजन का शुभारंभ मानवीय समाज रचना के संकल्प से हुआ। प्रथम वक्ता हेमेन्द्र राय ने सरोज जी की पंक्ति से आह्वान किया—“इन हवाओं पर कभी विश्वास कर लेना न तुम”
“तब तलक मत लिख, जब तलक आँख पानी से न भर जाए”–कवि की इन पंक्तियों के साथ प्रसिद्ध गीतकार कवयित्री डाॅ मालिनी गौतम ने कहा–समय की धड़कनों को गहराई से सुनती हैं उनकी रचनाएं। जागरण के आग्रह की कविता है उनकी।
सरोज जी का काव्यपाठ का अनूठा अंदाज़ श्रोताओं को बाँधे रखता था। पिता श्री से जुड़े संस्मरणों को श्रोताओं से साझा करते हुये पुत्री मान्यता सरोज ने कहा कि उन्होंने आपातकाल का विरोध किया तो डी डी और रेडियों से ब्लैकलिस्ट कर दिये गए।
वे जैसा जीते थे वैसा लिखते थे। वे एक डेमोक्रेटिक पिता थे। अपने बच्चों पर पिता होने का भार नहीं ढोया।
डॉ मनीषा जैन ने उनके दो काव्य-संग्रह किनारे के पेड़ और पानी के बीज के हवाले से उनके विद्रोही व्यक्तित्व को रेखांकित किया–“जहां गिरता है पसीना। वहाँ चाँद उगता ही है। “सरोज की कविता जीवन का आसव है। “जिसमें मानव मन की पीड़ा है, आक्रोश है और कश्मकश है।
प्रो लक्ष्मीकांत ने उन्हें पूर्ण कवि निरूपित किया। उन्होंने कम लिखा पर पूरी ईमानदारी से जनमन तक पहुँच जाए ऐसी भाषा में लिखा। “जिसने सहा नहीं उसने कहा नहीं। “उनके कृतित्व पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध हो रहे हैं।
अध्यक्ष महेश कटारे सुगम की दृष्टि में वे किसान कवि थे। सर्वथा एवं सर्वदा अनुकरणीय।
मुख्य अतिथि इन्दिरा किसलय ने कहा कि समय के विशाल अंतराल के बावजूद उनकी कविताएं उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कभी थीं। जिनमें दहक और महक दोनों हैं। यही उनके सृजन को कालजयी बनाती है। उनमें संघर्ष का शंखनाद तो है पर आशावाद भी उतना ही प्रबल है। व्यवस्थागत दिद्रूपताओं ने उनकी कविता को उर्वरक प्रदान किया– ” सृजन कभी मंजूर नहीं करता पहरे तलवार के”। “वे निष्कपट अभिव्यक्ति के बादशाह हैं। “
इस अवसर पर “यादों में सरोज” इस जन्मशती विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया।
द्वितीय सत्र में सर्व श्री महेश कटारे सुगम, इन्दिरा किसलय, मालिनी गौतम, अभिषेक वर्मा, लक्ष्मणप्रसाद डेहरिया, ओमप्रकाश नयन, हेमेंद्र राय, विनयप्रकाश जैन, अंजुमन आरजू, श्रृति कुशवाहा, महेश दुबे, प्रभात कटारे, अवधेश तिवारी, आशीष मोहन, तथा राकेश राज ने बेहतरीन कविताएं प्रस्तुत कीं। नन्ही बच्ची आन्या ठाकुर ने सरोज जी की कविताओं की धारासार प्रस्तुति दी।
चित्रकार कवि रोहित रूसिया ने सरोज जी के गीतों का सस्वर सरस पाठ किया। कार्यक्रम का प्रारंभ ही ओशिन धारे की सांगीतिक प्रस्तुति से हुआ जिसने वातावरण को सुरों की बारिश में भिगो दिया।
चित्रकार ध्रुव के, सरोज के काव्यांशों पर आधारित पोस्टरों की धूम रही।
सचिव शेफाली शर्मा का सधा हुआ सहज संचालन मंत्रमुग्ध कर गया।
बीना, भोपाल, छिंदवाड़ा आदि स्थानों से पधारे कवियों ने भावपूर्ण कविताएं पेश कीं।
प्रबुद्ध गंभीर एवं जिन्दादिल साहित्यजीवी मान्यवरों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को ऊँचाई एवं अपूर्व गरिमा प्रदान की। सर्व श्री– गोवर्द्धन यादव, पवन शर्मा, रणजीतसिंह परिहार, डाॅ उर्मिला खरपुसे, डॉ अमर सिंह, अशोक जैन, शैलेन्द्र तिवारी, मोहिता जगदेव, हेमंत झा, राजकुमार चौहान, पद्मा जैन, दीप विश्वकर्मा, शरद मिश्रा, अंकुर वाल्मीकि, रामलाल सराठे, रश्मि, राजेन्द्र यादव, अनुराग श्रीवास्तव, अभिनव श्रीवास्तव, संजय औरंगाबादकर आदि प्रबुद्ध जनों की उपस्थिति ने आयोजन को प्रकाम्य ऊँचाई प्रदान की।
“मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन” के अध्यक्ष एवं देशबंधु पत्र समूह के संपादक आदरणीय “पलाश सुरजन सर” इस महनीय आयोजन के श्रेयार्थी रहे।
दिनेश भट्ट के आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।
साभार – सुश्री इंदिरा किसलय
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की कार्यशाला संपन्न ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
बच्चों के संवेगात्मक विकास में कहानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं – ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
भोपाल।बाल साहित्य शोध सृजन पीठ, साहित्य अकादमी, मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् द्वारा आयोजित बाल साहित्य लेखन कार्यशाला बड़ी सफलता के साथ संपन्न हुई। इस एक दिवसीय कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और अभिभावकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बच्चों के लिए रोचक, मनोरंजक, उपदेशात्मक और ज्ञानवर्धक साहित्य सृजन को प्रोत्साहित करना था।
मुख्य अतिथि शासकीय कन्या महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. मंगलेश्वरी नेशी ने अपने उद्बोधन में कहा कि बच्चों का साहित्य रोचकता से भरपूर, मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक होना चाहिए, ताकि बच्चे स्वाभाविक रूप से पढ़ने और सीखने की ओर आकर्षित हों।
बीज वक्तव्य देते हुए बाल साहित्य शोध सृजन पीठ की निदेशक डॉ. मीनू पांडे ‘नयन’ ने कहा कि बाल साहित्य में कहानी, कविता, लोरी, पहेलियाँ, गीत आदि सभी विधाएँ शामिल हैं। इसमें बच्चों की बाल-सुलभ जिज्ञासाओं, कल्पनाओं और अभिव्यक्ति का स्थान होना चाहिए। यह रोचक और मनोरंजक होने के साथ-साथ उनके संवेगात्मक विकास में सहायक होना चाहिए।
प्रथम सत्र कहानी लेखन कार्यशाला पर केंद्रित रहा है। वरिष्ठ बाल साहित्यकार ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ने कहा कि कहानी बच्चों के संवेगात्मक विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने रोचक ढंग से दो-तीन कहानियाँ सुनाकर समझाया कि कहानी कैसे लिखी जाती है। बाल मन की कहानियों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बच्चों से विविध विषयों पर कहानी लेखन करवाया। बच्चों ने मंच पर आकर अपनी रचनाएँ पढ़ीं। उनकी प्रेरणा से हिंदी की वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. अर्चना भट्ट ने भी एक बाल कहानी सुनाकर सभी को चकित कर दिया।
द्वितीय सत्र कविता और बाल गीतों पर आधारित था। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेक्षा सक्सेना ने बाल गीतों पर दिशा-निर्देश दिए और क्षेत्रीय बोलियों के गीतों के माध्यम से बच्चों से सीधा संवाद किया। बच्चों ने विविध विषयों पर कविताएँ लिखकर मंच पर उत्साह से पाठ किया।
कार्यक्रम के संचालनकर्ता डॉ. शोभना तिवारी ने कहा कि बच्चों का साहित्य ज्ञानवर्धक होने के साथ उपदेशात्मक भी होना चाहिए, जिससे जीवन की नींव मजबूत हो और संस्कारों की अभिवृद्धि हो। रहीम और कबीर के दोहे इसके सशक्त उदाहरण हैं, जो प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक जीवन की संचित निधि बने रहते हैं।
वैदेही कोठारी ने पर्यावरणीय चेतना और प्रकृति संरक्षण पर जोर देते हुए प्रकृति-परक रचनाओं के लेखन को रेखांकित किया। श्वेता नागर ने पढ़ने की अभिरुचि बढ़ाने के लिए पुस्तकालय सृजन उत्सव आयोजित करने और डायरी लेखन के दिशा-निर्देश दिए। रश्मि पंडित ने मुहावरे और लोकोक्तियों की कार्यशाला चलाई तथा कहा कि ये शिक्षाप्रद, रोचक, ज्ञानवर्धक और मनोरंजक होते हैं।
कार्यशाला में शहर के विभिन्न विद्यालयों और महाविद्यालयों के 55 से अधिक छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहभागिता की। सभी प्रतिभागियों का स्वागत हिंदी पंचांग से समन्वित पॉकेट डायरी और कलम भेंट करके किया गया। प्रमाण-पत्र भी वितरित किए गए। अर्थ दशोत्तर प्रतिष्ठा तिवारी और हार्दिक अग्रवाल ने डॉ. मीनू पांडे को शाल, स्मृति चिन्ह और साहित्य भेंट कर स्वागत किया। सरस्वती वंदना प्रिया उपाध्याय ने प्रस्तुत की।
विभिन्न विद्यालयों के पचपन से अधिक छात्र-छात्राएं, उनके अभिभावक, माता -पिता, शिक्षक-शिक्षिकाएँ, महाविद्यालय के प्राध्यापक आदि सौ से भी अधिक सहभागी उपस्थित रहे। आभार ज्ञापन डॉ. मीनू पांडे ने किया। यह कार्यशाला बाल साहित्य सृजन में नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाली सिद्ध हुई।
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈