☆ श्री राज सागरी जी की – नदिया के ओ पार (काव्य संग्रह) ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
श्री राज सागरी
(जन्म दिवस 1अप्रैल पर मंगल भाव सहित)
आज जब मैं बुंदेली साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार के विषय में कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे सबसे पहले तो इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविद प्रोफेसर श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि की ये प्रतिक्रिया काफी प्रभावित कर रही है कि श्री राज सागरी ने खड़ी बोली, बुंदेली और उर्दू में साधिकार रचनाएं लिखी हैं। अपने चालीस वर्ष के साहित्यिक जीवन में पूरे प्रदेश और देश में हजारों पाठकों के मन में किसी न किसी रूप में अपनी रचनाओं को प्रतिष्ठित किया है और मंचों से काव्य पाठ करके हजारों हजार श्रोताओं को मंत्र मुग्ध किया है। बार बार श्रोता उनकी रचनाओं को सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं। साहित्य के त्रिवेणी संगम -प्रयाग राज सागरी के शीर्षक से श्री राजेन्द्र तिवारी ऋषि लिखते हैं कि वर्तमान में चुटकुले बाज तथाकथित कवियों के बीच राज सागरी जब काव्य पाठ करते हैं तो केवल वही मंच लूटते नज़र आते हैं। उनकी कविताएं न केवल मनोरंजन करती हैं बल्कि प्रेरणा भी देती हैं, ऊर्जा प्रदान करती हैं,नयी दिशा देती हैं। ऋषि के उपरोक्त नजरिए से ये बात तो स्पष्ट होती है की राज सागरी जी ने बुंदेली भाषा में काव्य सृजन करते हुए संस्कारधानी को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है। उन्होंने दोहों और ग़ज़लों के माध्यम से बुंदेली को साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने में जो योगदान दिया है,वह अन्य साहित्यकारों के लिए प्रोत्साहन का विषय हो सकता है। राज सागरी की बुंदेली काव्य कृति नदिया के ओ पार में उनकी जो भी रचनाएं शामिल हैं वे समाज के विभिन्न पाठकों की रुचियों को ध्यान में रखकर सृजित की गई है। पाठकों को ये रचनाएं इसलिए भी पठनीय प्रतीत होती है क्योंकि बुंदेली भाषा में उन्हें ये रचनाएं अपने आसपास की घटनाओं और प्रसंगों पर आधारित महसूस होती हैं और फिर कवि ने भी अपने आसपास जो भी सामाजिक समस्याओं और स्थितियों को देखा परखा उसे पूरी ईमानदारी के साथ कलम के माध्यम से कागज़ पर उतार दिया।
राज सागरी जी की ग़ज़लों और दोहों की एक विशेषता और है कि उन्होंने आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए बड़ी बेबाकी से लिखा है और पाठकों ने इसे बेहद पसंद भी किया है। कवि ने अपने काव्य सृजन को अपना श्रेष्ठ धर्म और कर्म माना है और यही संदेश उनकी रचना में भी दिखता है –
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गीत ग़ज़ल तुम गातई चलयो
जाग में नाम कमातई चलयो
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कवि ने विद्वता के लिए आंखों की भाषा की समझ और सोच को भी अपनी रचना में प्रमुखता दी है और एक जगह लिखा भी है –
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मोरी बातई छोड़ दो, मैं तौ हूं नादान
आंखें तुम जो बांच लो, तौ समजूं विद्वान
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राज सागरी जी राष्ट्रीय एकता के लिए सांप्रदायिक सौहार्द को आवश्यक मानते हैं और यही बात उनकी कविता में भी झलकती है। भारत माता कविता में उन्होंने लिखा भी है कि –
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हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
हम चारों हैं भाई
हिन्दुस्तानी प्यार सिखाते
लड़ते नहीं लड़ाई
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राज सागरी जी का वैचारिक दृष्टिकोण उनकी बुंदेली कविता में भी परिलक्षित होता है। उनका सोचना है कि ग़लत काम करने वाले लोग निडरता से अपना काम करते हैं-
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खा जैहें का जोन डरें हम
काय खों उनके पांव परें हम
प्यार सें बे हैरत लौ नयींया
उनपे बोलो काय मरें हम
ऐसीं बुद्धि दे अब ईसुर
कोई गलत नें काम करें हम
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वैसे तो श्री राज सागरी जी ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में काफी लिखा है लेकिन उन्हें बुंदेली भाषा में सृजन के लिए अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रियता अर्जित हुई है। खड़ी बोली में उनका काव्य संग्रह पल भर की पारो और तारे जमीन के भी चर्चित रहा। बाल साहित्य के अंतर्गत स्कूल चलें हम, उर्दू में कदम कदम और बुंदेली में ग़ज़ल संग्रह चलो अब घर खों चलिए और जाम- ए-गजल का प्रकाशन हो चुका है जो कि पाठकों के बीच अत्यंत पठनीय सिद्ध हुए हैं।
अमन प्रकाशन सागर से प्रकाशित नदिया के ओ पार में श्री राज सागरी जी की काव्य रचनाओं को पाठकों से वैसा ही प्यार मिलेगा जैसा कि पूर्व में प्रकाशित काव्य कृतियों को मिला है और सागरी जी ने भी इसीलिए कृति के प्रारंभ में ही पाठकों के प्रति कृतज्ञता भी व्यक्त की है –
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – भाग्य-सेंसर।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८८ – व्यंग्य – भाग्य-सेंसर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
बेलतारा गांव के सबसे बड़े लफ्फाज ‘फरेब दास’ ने जब इस बार प्रधानी का परचा भरा, तो उन्होंने सड़कों और बिजली जैसे उबाऊ मुद्दों को दरकिनार कर दिया। उनका नया चुनावी शगूफा था—’एंटी-बदकिस्मती कवच और नक्षत्र-सेंसर योजना’। फरेब दास का तर्क था कि गांव की असली समस्या गरीबी नहीं, बल्कि ‘खराब ग्रहों की चाल’ है, जो सड़क पर बिछे रोड़ों से भी ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने घोषणा की कि जीतते ही वे गांव के हर घर की छत पर एक ‘नक्षत्र-फिल्टर’ लगवाएंगे, जो राहु-केतु की कुदृष्टि को सोखकर उसे सकारात्मक ऊर्जा में बदल देगा। गांव के लोग, जो अपनी हर नाकामी का दोष शनिदेव के माथे मढ़कर निश्चिंत हो जाते थे, अचानक इस ‘एस्ट्रो-टेक’ क्रांति के पीछे ऐसे दीवाने हुए कि उन्हें लगने लगा कि अब बिना मेहनत किए ही छप्पर फाड़कर धन बरसेगा।
प्रचार के अंतिम पड़ाव पर फरेब दास ने गांव के चौराहे पर एक ‘किस्मत-स्कैनर’ लगाया। यह वास्तव में एक पुराना कबाड़ हो चुका फोटोकॉपी मशीन का ऊपरी हिस्सा था, जिस पर उन्होंने दीपावली वाली झालरें लपेट दी थीं। उन्होंने गांव वालों को पट्टी पढ़ाई कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने का संकल्प लेकर इस मशीन पर अपनी हथेली रखेगा, उसकी हस्तरेखाएं ‘रिफ्रेश’ होकर सीधे इंद्रलोक के डेटाबेस से जुड़ जाएंगी। विपक्षी उम्मीदवार ‘भोला नाथ’ खाद और सिंचाई की बातें कर रहे थे, लेकिन जनता को तो उस भविष्य की चिंता थी जहाँ उनकी फूटी किस्मत की मरम्मत होने वाली थी। फरेब दास ने एक पुराने रेडियो से विचित्र आवाजें निकालकर उसे ‘ग्रहों का सिग्नल’ बताया और ग्रामीणों को विश्वास दिला दिया कि विधाता ने अब गांव की चाबी उन्हें सौंप दी है। लोग अपनी जमा-पूँजी फरेब दास के चरणों में चढ़ाने लगे ताकि उनके भाग्य का ‘सॉफ्टवेयर’ अपडेट हो सके।
जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और फरेब दास की प्रचंड जीत हुई, पूरा गांव अपना ‘किस्मत-अपग्रेड’ लेने उनके घर पहुँच गया। लोग चाहते थे कि अब उनके घर में नोटों की बारिश हो और दुख-तकलीफें परलोक सिधार जाएं। फरेब दास अपनी नई चमचमाती एसयूवी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक नींबू और लाल मिर्च थमाते हुए बोले— “भाइयों, मशीन का सर्वर डाउन हो गया है क्योंकि गांव में ‘अविश्वास’ का वायरस बहुत ज्यादा है!” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, फिर हमारे भाग्य का क्या?” फरेब दास ने ठहाका लगाया और गरज कर बोले, “मूर्खों! तुम्हारा भाग्य तो उसी दिन फूट गया था जब तुमने एक कबाड़ मशीन के भरोसे अपना वोट मुझे बेच दिया। अब इन नींबू-मिर्च को अपने दरवाजे पर लटकाओ और अगले पांच साल अपनी बेवकूफी का नजर-बट्टू बनो। मैंने तो तुम्हारे वोटों से अपना ‘राजयोग’ सिद्ध कर लिया है!” जनता सन्न खड़ी उस नींबू को देख रही थी और फरेब दास ‘भाग्य-सुधार’ की धूल उड़ाते हुए शहर की ओर निकल पड़े।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कदर जाने ना…“।)
अभी अभी # ९६० ⇒ आलेख – कदर जाने ना श्री प्रदीप शर्मा
हम सभी की भावनाओं का ख्याल रखते हैं, और महिलाओं का सम्मान ही नहीं, कद्र भी करते हैं। साहित्य ने भले ही हमारी कद्र ना की हो, हम संगीत के कद्रदान हैं, और फिल्मी संगीत सुन सुनकर ही आज कानसेन बन बैठे हैं।
हमें ना तो कोई शिकायत जमाने से है और न ही कोई शिकायत अपनी पत्नी से। जिस तरह संगीत ने पिछले सत्तर सालों से हमारा साथ निभाया है, हमारी धर्मपत्नी भी पचास वर्षों से हमारा साथ निभाती चली आ रही है।
चले थे साथ मिलकर, चलेंगे साथ मिलकर। तुम्हें रुकना पड़ेगा, मेरी आवाज सुनकर।।
संगीत की हमारी शिक्षा दीक्षा केवल रेडियो सीलोन सुनने तक ही सीमित रही। आप चाहें तो हमें एक अच्छा श्रोता कह सकते हैं। हुस्न, इश्क, जुल्फ और दामन जैसे शब्द हमने यहीं से सीखे हैं। सहगल का दौर निकल चुका था और अनारकली, बैजू बावरा, मुगले आजम और मेरे महबूब का जमाना था। सुरैया, शमशाद, नूरजहां और खुर्शीद के साथ लता, आशा, रफी, तलत, किशोर और राजकपूर की आवाज मुकेश, के तराने लोग गुनगुनाते रहते थे।
जब जीवन में कोई कद्रदान मिलता है, तो आपकी लाइफ बन जाती है। आप किसी के हसबैंड बन जाते हैं, कोई आपकी वाइफ बन जाती है। आपने, अपना बनाया, मेहरबानी आपकी! हम तो इस काबिल ना थे, है कद्रदानी आपकी।।
मदनमोहन ही तो लाए थे वह खूबसूरत नगमा हमारे लिए!
आपकी नज़रों ने समझा, प्यार के काबिल हमें, और, जी हमें मंजूर है, आपका हर फैसला।
हर नजर कह रही, बंदा परवर शुक्रिया।
गृहस्थी की गाड़ी बस ऐसे ही तो चल निकली थी हमारी भी। सारे तीज, त्योहार और उत्सव कितने उत्साह से संपन्न होते थे। हरताली तीज हो अथवा करवा चौथ! तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा। तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं देवता। हमें अपने आप पर भरोसा नहीं होता था जब ऐसे गीत कानों में पड़ते थे; मैं तो भूल चली बाबुल का देस, पिया का घर प्यारा लगे।।
हमारे गीतकार वर्मा मलिक भी कम नहीं आग में घी डालने में! तेरी दो टकियां दी नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए। हाय हाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी। लेकिन हमारी धर्मपत्नी बहुत समझदार निकली। छोड़ दें सारी दुनिया, किसी के लिए। ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए। प्यार से जरूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए।
लेकिन किसे पता था, उम्र के इस पड़ाव पर आकर हमें भी मदन मोहन का ही यह गीत भी सुनना पड़ेगा ;
कदर जाने ना
मोरा बालम, बेदर्दी
कदर जाने ना …
हम संगीत प्रेमी तरानों और पत्नी के तानों को बराबर का महत्व और सम्मान देते हैं। आखिर इन ५० बरसों में ऐसा क्या बदल गया कि बालम, बेदर्दी हो गए। हमने तो कभी नहीं कहा, सजनवा बैरी हो गए हमार। कुछ तो गड़बड़ है।।
उम्र के साथ अगर महिलाएं धार्मिक होती चली जाती हैं तो पुरुष पॉलिटिकल! जिस टीवी पर कभी पूरा परिवार बैठकर दूरदर्शन देखता था, आजकल धर्मपत्नी में आस्था और सत्संग के संस्कार जाग गए हैं। न्यूज, शेयर मार्केट और कॉमेडी शो के लिए पति को मोबाइल और लैपटॉप का सहारा लेना पड़ता है। घर, घर नहीं, राज्यसभा लोकसभा टी वी हो चला है।
टेबल पर पत्नी चाय रखकर चली गई है, सीहोर वाले लाइव आ रहे हैं। नाश्ता कब का ठंडा हुआ पड़ा है। कानों में कुछ गर्मागर्म शब्द प्रवेश कर रहे हैं। पूरी जिंदगी इनके लिए खपा दी, लेकिन इन्होंने हमारी कभी कद्र ही नहीं की।।
लेकिन शब्द मोम बनकर नहीं पिघल रहे। लता का मधुर स्वर याद आ रहा है ;
लाख जतन करूं
बात न माने जी
बात न माने
मेरा दरद न जाने जी।
कदर जाने ना
हो कदर जाने ना
मोरा बालम बेदर्दी
कदर जाने ना …
सोचता हूं, अगर अभी भी कद्र नहीं जानी, तो बहुत देर हो जाएगी। घर घर की यही कहानी है। जागो बेदर्दी बालमों, अब तो जागो।।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री राजकुमार जैन ‘राजन‘ जी द्वारा संपादित पुस्तक – “वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४४ ☆
☆ पुस्तक समीक्षा – वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य: क आकलन – लेखक/संपादक: राजकुमार जैन ‘राजन‘☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
पुस्तक का नाम: वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन
लेखक/संपादक: राजकुमार जैन ‘राजन‘
विधा: बाल साहित्य समीक्षा
प्रकाशक: ज्ञान मुद्रा पब्लिकेशन, भोपाल
समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश‘
☆ बाल साहित्य की परख और पहचान का नया दस्तावेज़ ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
आज के डिजिटल युग में जब बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल और इंटरनेट के बीच बीतने लगा है, तब अच्छी और संस्कारप्रद पुस्तकों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। किंतु समस्या यह है कि बाजार में उपलब्ध असंख्य पुस्तकों के बीच से बालकों के लिए उपयोगी और गुणवत्तापूर्ण साहित्य का चयन कैसे किया जाए। इसी प्रश्न का सार्थक समाधान प्रस्तुत करती है राजकुमार जैन ‘राजन’ की महत्वपूर्ण कृति वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन। यह पुस्तक न केवल बालसाहित्य की श्रेष्ठ कृतियों का परिचय कराती है, बल्कि पाठकों, अभिभावकों और शिक्षकों को सही पुस्तक चयन की दिशा भी दिखाती है।
श्री राजकुमार जैन राजन
बचपन मानव जीवन का वह स्वर्णिम काल है, जिसमें अर्जित संस्कार जीवनभर साथ रहते हैं। किंतु वैश्वीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण संयुक्त परिवारों का विघटन, माता-पिता की व्यस्तता और तकनीकी उपकरणों का बढ़ता प्रभाव बच्चों के प्राकृतिक बचपन को प्रभावित कर रहा है। माँ की लोरियाँ, नानी-दादी की कहानियाँ और दादाजी की पहेलियाँ अब लुप्त होती हुई धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही हैं। ऐसे समय में बालसाहित्य बच्चों के संस्कार, ज्ञान, मनोरंजन और कल्पनाशीलता के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनकर सामने आता है।
पुस्तकें सार्वकालिक हैं। वास्तव में वे प्रकाश-स्तंभ हैं, जिनकी रोशनी में बच्चे जीवन की समस्याओं का समाधान खोजते हैं और अपने व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इंटरनेट भले ही सूचनाओं का विशाल भंडार हो, किंतु पुस्तक से प्राप्त ज्ञान अधिक स्थायी और गहन होता है। इसलिए बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पुस्तकों का कोई विकल्प नहीं है। पुस्तकें ही बच्चों में तर्कशीलता, चिंतन मनन और कल्पनाशीलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस महत्व को देखते हुए यहां पर बालसाहित्य समीक्षा का महत्व बढ़ जाता है। आज बड़ी संख्या में बालसाहित्य लिखा और प्रकाशित हो रहा है, परंतु उसकी समीक्षा अपेक्षाकृत कम देखने को मिल रही है। इस अभाव को दूर करने का महत्वपूर्ण कार्य राजकुमार जैन ‘राजन’ ने किया है। उनकी यह पुस्तक वर्ष 2021 में प्रकाशित लगभग साठ श्रेष्ठ हिंदी बाल पुस्तकों की समीक्षाओं का संकलन है। यह संकलन बालसाहित्य की विविध विधाओं—कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, विज्ञान साहित्य, हाइकु और एकांकी—को समेटते हुए एक समृद्ध गुलदस्ते का रूप ले रहा है।
इस पुस्तक की विशेषता इसकी संतुलित और सकारात्मक समीक्षा दृष्टि है। लेखक ने कृतियों के छिद्रान्वेषण के बजाय उनके गुणों को रेखांकित करते हुए बालोपयोगिता पर विशेष ध्यान दिया है। उनकी समीक्षा शैली अत्यंत सरल, स्पष्ट और व्यवस्थित है। प्रत्येक समीक्षा में तीन प्रमुख आधार दिखाई देते हैं।
पहला आधार हैं संबंधित विधा का संक्षिप्त परिचय देना। दूसरा, कृतिकार के साहित्यिक व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए उसकी रचनाधार्मिता को सामने लाना है। तीसरा आधार है, कृति का समग्र मूल्यांकन करना। इसी पद्धति के आधार पर इन्होंने पुस्तक का मूल्यांकन किया है। इस पद्धति के कारण पाठकों को न केवल पुस्तक के विषय-वस्तु की जानकारी मिलती है, बल्कि उस साहित्यिक परंपरा और रचनाकार की दृष्टि को भी समझने का अवसर मिलता है।
पुस्तक में अनेक उल्लेखनीय कृतियों की समीक्षाएँ सम्मिलित हैं। जैसे “बिल्ली पढ़े किताब”, “अटकूँ-मटकूँ”, “मछुवारा का बेटा”, “जंगल का रहस्य”, “अंतरिक्ष में डायनासोर”, “इंद्र धनुष” तथा “विटामिनों से मुलाकात” आदि की समीक्षाएं सम्मिलित है। इन कृतियों के माध्यम से बच्चों के लिए मनोरंजन, ज्ञान, विज्ञान, नैतिक मूल्यों और कल्पनाशीलता का सुंदर समन्वय सामने आया है।
उसकी भूमिका लिखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. उषा यादव और डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’ ने भी इस कृति को अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी बताया है। उनका मत है कि यह पुस्तक भविष्य में हिंदी बालसाहित्य के इतिहास लेखन में भी सहायक सिद्ध होगी। वास्तव में यह कृति अभिभावकों, शिक्षकों, शोधार्थियों, संपादकों और बालसाहित्य प्रेमियों आदि सभी के लिए उपयोगी होकर उनके लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। ऐसी आशा की जा सकती है।
निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि राजकुमार जैन ‘राजन’ की यह पुस्तक हिंदी बालसाहित्य की गुणवत्ता और व्यापकता को सिद्ध करती है। यह कृति बताती है कि हिंदी में आज भी उत्कृष्ट बालसाहित्य लिखा जा रहा है, आवश्यकता केवल उसे पहचानने और पाठकों तक पहुँचाने की है। अपने समर्पण, परिश्रम और निष्पक्ष दृष्टि के माध्यम से लेखक ने बालसाहित्य समीक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। साथ ही इस पुस्तक में अलका जैन आराधना की भी पुस्तकों की समीक्षाएं सम्मिलित की गई है। उनका योगदान भी उल्लेखनीय है।
यह पुस्तक न केवल जानकारी प्रदान करती है, बल्कि बालसाहित्य के प्रति नई जागरूकता भी उत्पन्न करती है। निश्चित ही वर्ष 2021 का हिंदी बाल साहित्य : एक आकलन हिंदी बालसाहित्य की परख और पहचान का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ सिद्ध होगी। इसके लिए लेखक को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
(पूर्वसूत्र- माझी स्वेच्छानिवृत्ती आणि त्याचे मंजुरीपत्र हे विषय माझ्यापुरते मी पुसूनच टाकले होते. पण ते खोटं ठरवणारं, मला अचंबित करणारं वास्तव वखरेसाहेबांच्या केबिनमधे माझी वाट पहातेय याची मला पुसटशीही कल्पना नव्हती.
आज इतक्या वर्षांनंतरही त्यातला थरार मी विसरू शकलेलो नाहीय.
मी त्यांच्या केबिनमधे जाताच वखरेसाहेबांनी माझं हसतमुखानं स्वागत केलं होतं.
“यु आर व्हेरी लकी मिस्टर लिमये. गेम वॉज व्हेरी टफ. बट यू हॅव वन इट.” ते म्हणाले होते.)
आज दिवसभर काय घडत होतं ते त्यांच्याकडून ऐकताना माझा माझ्या कानांवर विश्वासच बसेना. ‘अतर्क्य’ म्हणजे काय याचा प्रत्यय मला प्रत्येक क्षणी येत होता. सहजासहजी घडूच न शकणारं बरंच कांही दिवसभरात घडून गेलं होतं !!
माझ्या कथासंग्रहाचा प्रकाशन समारंभ, त्यात व्यत्यय आणण्यासाठीच अचानक ठरली असावी अशी आमच्या जी.एम्. मॅडमची ती व्हिजीट, त्यादरम्यान मॅडमनी सूतोवाच केलेली नव्याने येऊ घातलेली ‘स्वेच्छानिवृत्ती’ची गोल्डन शेकहॅंड स्कीम आणि त्याच अनुषंगाने माझ्या आयुष्यांत येऊ पहाणारी अनोखी वळणं न् पुढे त्यात प्रत्येकवेळी निर्माण होत गेलेली अनिश्चितता…!
वखरेसाहेब सांगत होते ते ऐकताना हे सगळंच अधांतर अतिशय अनपेक्षितपणे हळूहळू विरून गेलंय असंच मला वाटतं राहिलं. कारण जे घडलं होतं ते अतिशय अनपेक्षित आणि नेमकं मला हवं तसंच!!
आज पंचवीस वर्षं उलटून गेल्यानंतरही त्या संध्याकाळचे ते क्षण मी विसरूच शकत नाहीय.माझ्या अनोख्या भविष्यकाळासाठी माझ्या संपूर्ण आयुष्यालाच सकारात्मक कलाटणी देणारी ती संध्याकाळ माझ्यासाठी उर्वरीत आयुष्यातली नवी पहाटच ठरली होती..!
वखरेसाहेबांनी सांगितलं त्यानुसार नागपूर रिजनल मॅनेजर श्रीवास्तव साहेब अकोला ब्रॅंचमधील बुडीत कर्जांमधे घोळ घालून ठेवलेल्या आधीच्या मॅनेजर इतकंच नंतर चार्ज घेतलेल्या मलाही जबाबदार ठरवू पहात होते आणि सर्व सुरळीत होईपर्यंत मला स्वेच्छानिवृत्तीसाठी आवश्यक असणारी ‘क्लीनचिट’ द्यायला टाळाटाळ करीत होते.३१ डिसेंबर ही सदर योजनेच्या अंमलबजावणीची अखेरची तारीख उजाडली तेव्हा माझा एकट्याचाच अर्ज अजूनही पेंडिंग असल्याचं लक्षात येताच एम्.डी.आॅफीसने तिथे सर्वांना धारेवर धरलं होतं.मी पुढे चालून आलेली एक सुवर्णसंधी हातून निसटूनच गेलीय हेच गृहित धरुन सगळं नाईलाजाने स्विकारलं होतं त्याचवेळी तिकडं सेंट्रल आॅफिस पातळीवर मात्र या प्रकरणाला अचानक हे वेगळंच वळण लागलं. तिथे हे प्रकरण थेट स्वत:च्या ताब्यात घेतलं ते नेमकं मला व्यक्तिशः ओळखणाऱ्या जी.एम्. मॅडमनीच. आणि दुसऱ्याच क्षणी वखरेसाहेबांच्या फोनचा रिंगटोन! अकोला ब्रॅंचमधील चिघळलेल्या प्रश्नाची सविस्तर पार्श्वभूमी मॅडमनी त्यांच्याकडून समजून घेतली आणि थेट श्रीवास्तव साहेबांना फोन करुन कडक शब्दांत याप्रकरणातील त्यांच्या कॅज्युअल अॅप्रोच आणि टाईम किलींग टॅक्टीजवर ताशेरे ओढत ‘ लिमयेनी तिथे अल्पकाळात प्रतिकूल परिस्थितीत जे कांही काम केलंय त्याचं पूर्ण रेकाॅर्ड झोनल व सेंट्रल आॅफिसमधे सुरक्षित आहे’ असं त्यांना स्पष्ट शब्दात बजावून ‘ घ्याल तो निर्णय पूर्ण जबाबदारीने घ्या आणि त्याच्या परिणामांना सज्ज रहा’ असं त्यांना बजावलं.
पुढच्या पंधरा-वीस मिनिटातच मला क्लीनचीट देणारा फॅक्स श्रीवास्तव साहेबांनी सेंट्रल आॅफीसला पाठवला होता आणि त्याची एक प्रत वखरेसाहेबांकडे.
वखरेसाहेब काय किंवा या जी.एम्.मॅडम काय, या सर्व घटनाक्रमात तिथं दुसरं कुणीही असतं तर? हे असंच या क्रमाने घडलं असतं? सगळं योगायोगानेच घडावं तसंच घडत गेलेलं असूनही त्या मागचा सूत्रधार मात्र ‘तो’च होता. त्या शिवाय हे सगळं असंच घडणं शक्य तरी होतं का? माझ्या आयुष्यातल्या अशा असंख्य बिकट वाटांवरच्या प्रत्येक अंधाऱ्या वळणावर मला लख्ख प्रकाशवाट दाखवणाराही ‘तो’च तर होता!
“सोs..टूमारो वील बी ए लास्ट डे आॅफ युवर सर्व्हिस लाईफ. विश यू आॅल द बेस्ट!” वखरेसाहेबांचे शब्द ऐकून मी दचकून भानावर आलो.स्वप्नवत वाटावेत असे त्यांचे ते शब्द मला भानावर आणतानाच आतून हळवं करून गेले.
“नका काळजी करु.सगळं व्यवस्थित होईल. मी आहे ना?” या त्यांच्याच शब्दांनी कांही दिवसांपूर्वीच मला आश्वस्त केलं होतं आणि आज त्यांचेच शब्द मला आनंदाने नव्या हव्याहव्याशा अशा अनोख्या वाटेवर निश्चिंतपणे मार्गस्थ व्हायचे संकेत देत होते!!
“थॅंक्यू व्हेरी मच सर..थॅंक्स फाॅर एव्हरीथिंग..”
माझा आवाज भरून आला होता. कसंबसं स्वतःला सावरत मी त्यांचे आभार मानले आणि जाण्यासाठी उठलो.
आज पंचवीस वर्षे उलटून गेल्यानंतरही त्या संध्याकाळपर्यंतचे हे असे सगळे क्षण आपसूकच माझ्या मनात अलगद जपले गेलेयत. कारण माझा अनोखा भविष्यकाळ खऱ्या अर्थाने कृतार्थ करण्यासाठी माझ्या संपूर्ण आयुष्यालाच अतिशय रेखीव अशी सकारात्मक कलाटणी देणारी ती संध्याकाळ माझ्या उर्वरित आयुष्यासाठी एक नवी पहाटच ठरली होती!!
(नकळतच तिने आपले दोन्ही ओठ अंमळ विलग केले. मुलीने त्यात ओतलेले गंगाजलाचे थेंब तिच्या तोंडात गेले. तरीही ते थेंब घशातून गिळायचे त्राण काही तिच्यात शिल्लक नव्हते. आता आपल्या या देहाच्याने झाली तर केवळ एखादीच हालचाल होऊ शकेल याची कल्पना तिला आली.)
इथून पुढे – –
जीवाच्या करारावर मोठ्या कष्टाने तिने आपले डोळे उघडायचा प्रयत्न केला तिने. डोळे संपूर्ण तर उघडवेच ना तिला. मोठ्या मुश्किलीने तिने आपले डोळे किलकिले केले. अंधुकपणे का होईना पण तिला समोर लेक, सून, नातू आणि मुलगा दिसले – पण तेही क्षणभरच; दुसऱ्याच क्षणी तुला आपल्या नाभीत काही विचित्र संवेदना जाणवली आणि एकदम हलके हलके जाणवायला लागले. तिने आपले लक्ष्य क्षणभरासाठी जडददेहावर केंद्रित केले.
आता ना तिचे श्वसन होत होते ना इतर काही हालचाल; तिचा रजतरज्जू देखील तिच्या जडदेहापासून पूर्ण विलग झाला होता.
‘इथे नको आता, देवघरात जाऊ, ’ त्याच्या सूक्ष्मदेहाची स्पंदने तिला जाणवली. आता तिच्या बरोबरच त्याचा सूक्ष्मदेहातही जांभळट छटा पसरू लागली होती. ‘नाही म्हटले तरी आपल्या अपत्यांचा दुःखाचा आक्रोश विचलित करणारच ना!
विचारहीन अवस्थेन दोघेही देवघरात संक्रमित झाले. लेकरांच्या टाहो मुळे दोघांच्याही विचारात अंमळ नैराश्य आले आणि त्यांच्या सूक्ष्मदेहावर निळसर छटा झाकोळू लागली.
‘संपलं, ’ क्षणभरात सावरल्याने तिचा सूक्ष्मदेह पुन्हा नारिंगी झाला.
‘काय संपलं?’ त्याचाही सूक्ष्मदेह पुनरपि पूर्ववत झाला.
‘या इहलोकीचे लागेबांधे संपले; आप्तेष्टांचे तर संपलेच, आता आपली ओळख सांगणाऱ्या त्या नश्वर देहाचे देखील संपले. आता जो काय कालखंड या सूक्ष्मपातळीवर काढायचा तेवढाच, ’ तिच्या विचारातील स्पष्टपणा त्याला जाणवू लागला.
‘मुलांवरची माया… ’ तो जरासा चकितच झाला.
‘तेव्हा तू मला – आम्हाला सगळ्यांना सोडून गेलास आणि मला जीवनाचे फार मोठे तत्वज्ञान शिकवून गेलास, तिचा सूक्ष्मदेह आता विलक्षण तोजोम्य झाल्याचे त्याला जाणवले. ‘नश्वर देहात आहोत तोपर्यंत सगळे आपले किंवा परके ; आणि आपण सगळ्यांचे, नातेसंबंध तेवढ्यापुरताच! त्यानंतर कोण कुठे जाणार कोणालाच ठाऊक नसते. मग कशाला या भावनांमध्ये गुंतवून ठेवायचे!? देह सोडतांना आपल्या भावनाही त्या देहबरोबरच सोडून यावे हेच उचित! क्षणभर मलाही आपल्या मुलाबाळांचा वियोग असह्य झाला होता; पण तो केवळ क्षणभरच! तू गेल्यापासून मी माझ्या मनाला याबाबत वरचेवर पढवत आले आहे. खरं सांगायचं तर तुझी अशी आणि ही भेट अपेक्षितच नव्हती मला. ’
‘नाही रुचली आपली ही भेट तुला?’
‘आता गैरसमज करून घ्यायची वेळ नाही; आणि आपल्यापाशी कदाचित तेवढा वेळाही नसेल, ’ तिच्या विचारांतील स्पष्टता कल्पनतीत होती. ‘आपण एकत्वाचे जिणे जगलो; आणि मी देहात होते तोंवर तरी माझ्या मनात तीच भावना होती. ’
‘मग आता… ?’ त्याचे विचार कंपायमान झाले.
‘आता आपल्या हातात काय आहे याची काहीच कल्पना नाही. ’
‘पण एवढ्यासाठी तर मी इतकी वर्षे या सूक्ष्मपातळीवर अजून तग धरून आहे ना!’ आता मात्र त्याने पुढाकार घ्यायचे ठरविले.
‘ते देखील एक आश्चर्यच म्हणावे लागेल! तरीही मला वाटते की ज्या अर्थी तू या अवस्थेत इतकी वर्षे काढलीस त्या अर्थी तुझ्या सगळ्याच भावनांपासून एव्हाना तू मुक्त झाला असावास. अन्यथा तू पुन्हा कुठे तरी जन्म घेतलाच असतास, ’ तिने आपला कयास त्याच्यासमोर उघड केला.
‘खरे आहे, ’ त्याला पुन्हा हुरूप आला. ‘एक भावना सोडून मी यशस्वीपणे सगळ्या भावनांचा, वासनांचा त्याग करू शकलो. ’
‘कोणती भावना?’ या प्रश्नाची आवश्यकता नाही हे समाजात असून देखील तिच्यातून तो उद्भवलाच.
‘तुझ्यावरचं अमाप प्रेम, ’ त्याचे विचार खूप मुलायम झाले. ‘केवळ त्याच्यावरच मी जीवन जगलो आणि मरणही स्वीकारले. त्यापोटीच माझ्या इतर सगळ्या भावना एक एक करत गळून पडत होत्या. केवळ तुझीच प्रतीक्षा होती. ’
‘प्रतीक्षापूर्ती तर झाली; आता काय विचार आहे?’
‘आता आपण वेळ घालवायला नको, ’ आपल्या विचारांच्या मार्गावर ती आपोआपच आल्यामुळे तो जरासा सुखावला. ‘लगेचच पुढची कृती करूयात. ’
‘ती कोणती?’
‘सध्या पलीकडच्याच रस्त्यावर दोन जोडपी आहेत, ’ तो आपली योजना समजावून देऊ लागला. ‘शेजारीच आहेत ते एकमेकांचे. त्यांच्या बायका आता गरोदर आहेत; दोघीनाही पाचवा महिना चालू आहे. आपण त्यांच्या गर्भात शिरुयात. मग पुढच्या जन्मातही आपण पुन्हा एकत्र येऊ शकतो. ’
‘किती गोष्टी गृहीत धरल्या आहेस तू!’ जडदेहात असती तर ती अगदी खळखळून हसली असती. ‘दोघींच्या गर्भधारणा व्यवस्थित पार पडल्या तर आपण जवळजवळ जन्माला येऊ इतकेच! त्यानंतर आपले लग्न होणे किती तरी कौटुंबिक आणि सामाजिक घटकांवर अवलंबून असणार; त्या आपल्या हातात थोड्याच असणार?!’
‘पुढच्या जन्मात तुला माझ्याबरोबरच नाही रहायाचे?’ तिचा हा इतका व्यवहारी प्रतिसाद त्याला अगदीच अनपेक्षित होता.
‘पुन्हा गैरसमज! आपण एकत्वाचे जिणे जगलो ना रे? तुला सोडायचा विचार माझ्यात उद्भवेलच कसा?!’
‘मग असे का म्हणतेस?’
‘इतकी वर्षे तू या सूक्ष्मपातळीवर यशस्वीपणे तग धरून राहिलास, पुढच्या जन्माची आंस न बाळगता, ’ तिच्या सूक्ष्मदेहाला आता एक वेगळेच तेज प्राप्त झाल्याचे त्याला जाणवले. ‘म्हणजे आता तुझी कोणतीही अतृप्त वासना किंवा इच्छा उरलेली नाही. ’
‘केवळ एकच, ’ त्याने प्रांजळपणे कबुली दिली. ‘तुझ्याखेरीज मला दुसरे काहीच नको आहे. ’
‘आता माझा देह तर मागेच राहिला; अन् थोड्या वेळातच तो भस्मसात देखील होईल. ’ तिने पुन्हा त्याला परिस्थितीची जाणीव करून दिली.
‘आपले प्रेम काय केवळ देहापुरतेच मर्यादित होते – किंबहुना आहे? मी देहात असतांना देखील आपण आत्म्याने एकरूपच झालो होतो ना!’
‘हो ना? मग आता पुनर्जन्माची आंस का?’ तिचे विचार पुन्हा मूळपदावर आले. ‘तू म्हणतोस तसा जन्म घेतल्याने पुन्हा जननमरणाच्या फेऱ्यात अडकायचे, जीवनातील सगळे टप्पेटोणपे खायचे, कधी यश पदरी पडेल तर कधी अपयशाला तोंड द्यावे लागेल. पुन्हा नवे संबंध, नवी नाती! कोण केव्हा सोडून जातील सांगता येत नाही. बाकीच्यांचे तर सोडा, आपले काय? पुन्हा आपल्यातील एकजण आधी जाणार. मागे राहिल्याची काय अवस्था होते ते मी गेली काही वर्षे अनुभवते आहे – मरण जगणे म्हणजे काय ते समजले आहे मला. पुन्हा तसले अनुभव नकोत आता – ना मला, ना तुला. ’
तिच्या मुद्द्यांनी तो स्तंभितच झाला.
‘तुझ्या आता दुसऱ्या काही अतृप्त वासना शिल्लक राहिलेल्या नाहीत, माझ्याही नाहीत. त्यामुळे आता काही कर्मपूर्तीसाठी देह धारण करायचा प्रश्नच उद्भवत नाही. केवळ आपण पुन्हा एकत्र यायच्या हव्यासापोटी पुन्हा जन्म घ्यायचे म्हणजे सगळे जीवन पुन्हा जर-तरच्या भोवर्यात गटांगळ्या खायच्या!’
‘म्हणजे आता काही वेळानंतर आपण विलग व्हायचे एकमेकांपासून?’ त्याचे तेजोवलय पुन्हा काळवंडू लागले. ‘इतकी वर्षे तुझ्या प्रतीक्षेत सूक्ष्मपातळीवर ताटकळत राहिलो ते सगळे फोल जाणार?’
‘नाही रे राजा, ’ तिने त्याला उभारी द्यायचा प्रयत्न केला. ‘तथापि आपल्या एकत्र येण्यासाठी आता मला कोणत्याही प्रकारची अनिश्चितता नको आहे; किंवा त्यानंतर पुन्हा असे वियोगाचे जिणे नको आहे. जे काही निर्णय घ्यायचे ते पूर्ण विचारांतीच!’
‘म्हणजे काय करायचे?’ त्याचा तिच्यावर पूर्ण विश्वास होता.
‘आपली आत्मीयता केवळ देहांवर नव्हतीच – नाहीच; बरोबर? देह हे केवळ एकत्र येण्यासाठी एक साधन. आत्ता आपल्या दोघांचेही देह नसून देखील आपल्या आपलेपणात कुठे तरी कमतरता जाणवते आहे का आपल्यातील कोणालाही; नाही ना?’ तिला काहीही प्रतीविचार न देता केवळ विचारग्रहण करायचे ठरविले त्याने. ‘मग पुन्हा अवतरण करायच्या ऐवजी उद्धरण का करू नये!?’
‘म्हणजे नक्की काय करायचे आपण?’ तो पूर्णतः भांबावून गेला.
‘सूक्ष्मदेह, जडदेह, आणि आनंददेह या देहाच्या तीन अवस्था आहेत ना!’ आता ती अधिक मोकळी होऊ लागली. तिचे तेजोवलय विलक्षण तेजाने झळकू लागले. ‘सूक्ष्मदेहातून पुनरपि जडदेहात जायचे, पुनश्च जननमरणाच्या फेऱ्यात अडकायचे हे अवतरणच नव्हे तर काय! त्यापेक्षा काही वासना नसतांनाच सूक्ष्मदेहातून आनंददेहाकडे गेलो तर जीवनाच्या अनिश्चिततेपासून सुटका नाही का होणार?’
‘म्हणजे आता आपला शाश्वत वियोग होणार?’ भावनांच्या हिंदोळ्यांवर स्वतःला कसे सावरायचे हेच त्याला उमगेना. त्याच्या तेजोवलयाचे स्वरूप क्षणाक्षणाला बदलत होते.
‘नाही रे; समजून तर घे मला, ’ आता तिला त्याच्या प्रतीविचाराची आवश्यकता वाटेना. ‘या सूक्ष्मदेहातच आपण एकत्र होऊ. हे आपले शाश्वत अद्वैत असेल. अशा अद्वैतातच आपण आनंददेहात प्रवेश करू; तात्पुरताच! त्यानंतर आपण थेट ब्रह्मतत्वाकडे झेपावूयात ना! मग आपल्याला कोणीच विलग करू शकणार नाही. हेच शाश्वत अद्वैत आहे आपले!’
आणि विलक्षण समाधानाने, तृप्तीने त्याचा सूक्ष्मदेह पुन्हा झळाळू लागला.
‘ये’
‘त्याचे विचार जाणवतच, दुसऱ्याच क्षणी तिचा सूक्ष्मदेह त्याच्या सूक्ष्मदेहाच्या दिशेने सरकला. त्या दोन सूक्ष्मदेहाचे मीलन झाले; दोघांनाही वासनाविरहित एकत्वाची अनुभूती आली. आता कोणतीच इच्छा शेष नाही या भावनेने तत्क्षणी त्यांच्या अद्वैती सूक्ष्मदेहाचे आनंददेहात परिवर्तन झाले
तो सुप्रसिद्ध गायक स्व. मुकेश यांचा जन्मदिवस होता. आणि मला जुनी गाणी ऐकण्याची आवड असल्याने त्यांचे ‘ मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है.. ’ हे सदाबहार गीत योगायोगाने ऐकत होतो. हे गीत पडद्यावर राजेंद्रकुमार आणि वैजयंतीमाला यांच्यावर चित्रित झाले असून सुमन कल्याणपूर आणि मुकेश यांचे हे अजरामर आणि अवीट गोडीचे द्वंद्वगीत आहे. आपला असा समज होण्याची शक्यता आहे की मी आज स्व. मुकेश यांच्याविषयी किंवा या गीताविषयी बोलणार आहे पण खरे तर मला सांगायचे आहे ते वेगळेच. जेव्हा राजेंद्रकुमार वैजयंती मालाला म्हणतो की ‘ मेरा प्यार भी तू है…’ तेव्हा त्याला तिच्या ठायी निसर्गातील सगळ्या गोष्टी असलेल्या प्रतिबिंबित होतात. निसर्गातील फुलात, सगळ्या निसर्ग सौंदर्यात जणू तिचाच भास त्याला व्हायला लागतो. किंवा दुसऱ्या एखाद्या गीतात एखादा प्रियकर आपल्या सुंदर प्रेयसीकडे पाहून म्हणतो, ‘ तेरे चेहरेसे नजर नही हटती, नजारे हम क्या देखे…’ असे चित्रपटातील नायक आणि नायिकेचे प्रेम आपण नेहमी पडद्यावर पाहतो. किती छान वाटते हे सगळे बघायला आणि ऐकायला सुद्धा.. ! सगळे कसे romantic…! ‘ क्या यही प्यार है…? ‘
आपल्याला चित्रपटातील, टी व्ही वरील मालिकातून नायक नायिकेचे प्रेम बघायची इतकी सवय झालेली आहे की हे सगळे आपण पाहतो ते म्हणजेच प्रेम असा आपला समज होत असतो. इतकं ते आपल्या रक्तात भिनलेले असते जणू. मंगेश पाडगावकर यांची ‘ प्रेम म्हणजे प्रेम असतं, तुमचं आणि आमचं सेम असतं.. ’ या ओळी आम्हाला पाठ असतात किंवा ऐकून माहिती असतात. पण खरं प्रेम कसं असतं ? ‘ प्रेमा तुझा रंग कसा ?’ प्रेम हे सर्वव्यापी आहे. प्रेमाला स्वतःचा मुळचा रंग नाही. प्रेम हे पाण्यासारखे असते. ‘ पानी तेरा रंग कैसा, जिसमे मिला दो लगे उस जैसा… ’ एक सुंदर मराठी गीत आहे, ‘ प्रेमाला उपमा नाही, हे ते देवाघरचे देणे.. ’ खरंच किती सुंदर शब्द आहेत ! प्रेम हे देवाघरचे देणे आहे.
प्रेम हे जीवनाच्या वेलीवर उमललेले सर्वात सुंदर फुल आहे ! फुलासारखेच नाजूक आणि सुंदर. जणू काही ‘ जपून हाताळा ‘ दुष्ट आणि क्रूर मानवी भावनांनी ते करपून जाते. त्याला सतत मायेचे पाणी घालावे लागते नाही तर ते कोमेजण्याचा धोका असतो. प्रेमाचे एक वैशिष्ट्य आहे. प्रेम दिल्याने वाढते. जेवढे देऊ त्याच्या अनेक पटींनी परत मिळते. जसे शेतात काही मुठ दाणे पेरावे आणि अनेक पटींनी पीक घ्यावे. What we give, we get back in abundance. प्रेम दिले तर प्रेम मिळेल आणि द्वेष पेरला तर द्वेशाचेच पिक येईल. म्हणूनच तर आपण ‘ पेरावे तसे उगवते ‘ असे म्हणतो. एकदा गौतम बुद्धांकडे एक गरीब माणूस आला. तो म्हणाला, ‘ महाराज मी गरीब का आहे ते सांगावे. ’ बुद्ध त्याला म्हणाले, ‘ तू तुझ्याजवळ असलेले लोकांना देत नाहीस म्हणून तू गरीब आहेस. ’ त्याने विचारले की माझ्याजवळ काय आहे देण्यासारखे ? बुद्ध म्हणाले, ‘ अरे लोकांना प्रेम तर देऊ शकतोस की नाही, लोकांशी प्रेमाने तर बोलता येईल की नाही ?’ मग बघ तू गरीब राहणार नाहीस. किती सुंदर उपदेश बुद्धांचा… !
खरे प्रेम कसली अपेक्षा करीत नाही. आई आपल्या मुलांवर निरपेक्ष प्रेम करते. तिला कोणती अपेक्षा असते ? आपल्या वृद्धापकाळी आपल्याला हे मूल सांभाळील या भावनेनेच ती त्याचे सगळे करते का ? पित्याचेही मुलांवर असेच निरपेक्ष प्रेम असते. त्यांनी आपल्या आईवडिलांना वृद्धापकाळी सांभाळायचे की नाही हा प्रश्न या प्रेमापुढे गौण ठरतो. असेच प्रेम भावंडांचे एकमेकांवर असते. पण जिथे नात्यात स्वार्थ आला तिथे प्रेम संपते. स्वार्थ, कपटीपणा या सारख्या भावनांनी प्रेमाचे फुल करपते. पती पत्नींचे एकमेकांवरील प्रेम असेच निरपेक्ष असते, असले पाहिजे. लग्नानंतरचे मंतरलेले जादुई दिवस काही वर्षातच भुरकन उडून जातात. मग वास्तवाला सामोरे जावे लागते. एकमेकांच्या स्वभावातील दोष, उणीवा जाणवू लागतात. पण खरे प्रेम या सर्व गुणदोषांसह समोरच्याचा स्वीकार करते. तसे नसेल तर ते खरे प्रेम नाहीच असे समजायला हरकत नाही.
मी वाचलेली एक गोष्ट या ठिकाणी सांगण्याचा मोह आवरत नाही. एका डॉक्टरांचे हे निवेदन आहे. ते त्यांच्याच शब्दात. “ सकाळची ८. ३० ची वेळ. माझ्या दवाखान्यात कोणीही रुग्ण नव्हता. एवढ्यात एक ८० वर्षांचे वृद्ध गृहस्थ दवाखान्यात आले. त्यांच्या अंगठ्याला जखम झालेली होती. तिला टाके घातलेले होते. हे टाके काढण्यासाठी ते माझ्याकडे आले होते. ते मला म्हणाले डॉक्टर, लवकर माझी जखम बघा आणि टाके काढा. मला दुसरीकडे जायचे आहे. माझी नऊ वाजताची दुसरीकडे appointment आहे. दवाखान्यात गर्दी नसल्याने मी त्यांचा रक्तदाब इ. तपासला. आणि त्यांच्या जखमेचे परीक्षण करू लागलो. जखम बऱ्यापैकी भरली होती. मी सहाय्यक डॉक्टरांना टाके काढण्याचे साहित्य घ्यायला सांगितले.
जखमेचे टाके काढले आणि जखमेची मलमपट्टी करताना त्यांच्याशी बोलू लागलो. मी विचारले, तुम्हाला दुसऱ्या डॉक्टरांकडे जायचे आहे का ? त्यावर ते म्हणाले, मला माझ्या पत्नीला भेटायला जायचे आहे. ती शुश्रुषा गृहात आहे. मी दररोज सकाळी तिच्यासोबत नाश्ता करतो. मग मी विचारले की कशी आहे त्यांची तब्येत ? त्यावर ते म्हणाले ती वृद्धापकाळी होणाऱ्या विस्मृतीच्या आजाराने (Alzheimer Disease) ग्रस्त असून गेली पाच वर्षे अंथरुणावर आहे. मी विचारले की तुम्हाला उशीर झाला तर त्या काळजी करतील का ? यावर ते म्हणाले की गेली पाच वर्षे ती मला ओळखत नाही. त्यामुळे माझी काळजी करण्याचा प्रश्नच येत नाही.
मी आश्चर्यचकित होऊन विचारले की त्या तुम्हाला ओळखतही नाहीत आणि तरीही तुम्ही गेली पाच वर्षे त्यांना नियमाने भेटायला जात आहात ? यावर त्यांनी दिलेले उत्तर मला थक्क करणारे होते. ते म्हणाले, मग काय झाले ? ती जरी मला ओळखत नसली तरी मी तिला ओळखतो ना.. ! अशा वेळी साथ सोडायची का ? आणि त्यांनी माझा हात हलकेच थोपटला. माझ्या अंगावर रोमांच उभे राहिले. डोळ्यातील नकळत येणारे अश्रू मी रोखले. “
असे असते खरे प्रेम. खरे प्रेम केवळ शारीरिक नसते किंवा romantic ही नसते. खरे प्रेम म्हणजे जे काही आहे, असणार आहे या सगळ्यांचा स्वीकार करणे. जगातील सर्वात सुखी दिसणाऱ्या माणसांना सर्वच गोष्टी उत्तम मिळालेल्या असतात असे नाही पण जे काही मिळाले आहे त्यातून सर्वोच्च आनंद मिळवण्याची त्यांची क्षमता आणि मानसिक तयारी असते. म्हणूनच ते सुखी आणि समाधानी असतात.