हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ बादल का एक टुकड़ा (लघुकथा संग्रह) –  श्रीमती छाया त्रिवेदी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ बादल का एक टुकड़ा (लघुकथा संग्रह) – श्रीमती छाया त्रिवेदी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

जब साहित्यिक क्षेत्र में लघुकथा लेखन की बात आती है तो जबलपुर से अपने समय के प्रतिष्ठित शिक्षाविद और साहित्यकार स्व. पं. आनंद मोहन अवस्थी का समर्पित योगदान अपने आप मानस पटल पर उभर कर सामने आ जाता है। मेरी जानकारी के अनुसार शायद जबलपुर से लघुकथा लेखन की शुरुआत आनंद मोहन अवस्थी ने ही की थी और उसके बाद यहां से अन्य कथाकारों ने भी लघु कथा लेखन की गौरवशाली परंपरा को  आगे बढ़ाया ।इसी तारतम्य में महिला कथाकारों ने भी अत्यंत प्रभावी और सार्थक रुप से लघुकथाएं लिखीं और पाठक वर्ग ने इसे काफी पसंद भी किया।

लघुकथा लेखन के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साहित्य साधना से संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाली सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार और शिक्षाविद श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाएं भी पाठकों के बीच काफी चर्चित हुईं ।  उनका कहानी संग्रह और यशोदा हार गयी भी अपनी विषय सामग्री, शैली और रोचकता के कारण भी पाठक वर्ग के बीच लोकप्रिय रहा और उसके बाद लघुकथा संग्रह बादल का टुकड़ा ने भी आज साहित्यिक क्षेत्र में अपनी पठनीयता सिद्ध की है।लघुकथा संग्रह   बादल का टुकड़ा की अधिकांश कहानियां हमारे लिए इसलिए भी उत्सुकता उत्पन्न करती हैं क्योंकि छाया जी ने अत्यंत सरल भाषा और प्रभावी विषय सामग्री को लेकर ये कहानियां लिखी हैं। जब हम इस पुस्तक की कहानियां पढ़ते हैं तो वे हमें अपने जीवन के आसपास के प्रसंगों पर आधारित कहानियां प्रतीत होती हैं।इस संग्रह की लघुकथाएं अपनी डफ़ली अपना राग, दथरथ, ऐसा क्यों, मां, सफलता की उड़ान, देहरी, सीढ़ी, बादल का एक टुकड़ा, मानस पुत्र, मुआवजा, पीहर का नेग , आधुनिक गांधारी, प्रतीक्षा, विद्या मंदिर, किसका घर, कबाड़ वाला,  ढोंगी, भूल सुधार, हम पांच, उपहार, गंगा जल, संकल्प, हमें कुछ करना है, संकट की पाठशाला, मैं नेता नहीं हूं इत्यादि ऐसी ही लघुकथाएं हैं  जिन्हें पाठक वर्ग बार बार पढ़ना चाहता है और ये रचनाएं पाठकों को कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद महामहोपाध्याय आचार्य डा. हरिशंकर जी दुबे की इस कृति में प्रकाशित प्रतिक्रिया अत्यंत प्रभावी है जो पुस्तक की पठनीयता को सिद्ध करती है । उन्होंने लिखा है कि प्रस्तुत संग्रह की यह रचनाएं अपना विशेष संदर्भ रखती हैं।इन रचनाओं में समाज है, समाज के कसाव हैं, संबंधों की कसमसाहट है और तद्जन्य पीड़ा के परिणाम,प्रभाव , भी परिलक्षित होते हैं । दिव्यांगो की बात स्पष्ट करती स्पर्श की आंखें हैं तो देहदान पर आभार जैसी रचनाएं हैं तो मूक पालतू पशुओं का पक्ष स्पष्ट करती असंभव सी लघुकथाएं संजोई गई हैं।महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी श्रीमती छाया त्रिवेदी जी की लघुकथाओं को प्रेरक और प्रभावी निरुपित किया है। पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि नियमबद्ध और अनुशासन प्रिय छाया त्रिवेदी ने अपनी लघु कथाओं में समाज के विविध विषयों पर दिशाबोधक दृष्टि प्रदान की  है। उनकी लघुकथाओं में लघुकथा के मूल भाव का सार्थक प्रस्तुतिकरण है ।

प्रतिष्ठित शिक्षाविद डा. इला घोष भी छाया जी की लघुकथाओं से प्रभावित दिखती हैं। उन्होंने भी इस संग्रह में अपनी बात कही है कि छाया जी के पास सूक्ष्म दृष्टि, संवेदनशील हृदय और अभिव्यक्ति की क्षमता है जिसका परिचय उनकी उनके इस लघुकथा संग्रह में मिलता है।

साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं की विकास शील गतिविधियों के लिए समर्पित, साहित्य साधक श्री राजेश पाठक प्रवीण ने भी लघु कथाओं को सामयिक और सराहनीय बताते हुए लिखा है कि विदुषी साहित्यकार, समता, ममता, सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति, सम्माननीया श्रीमती छाया त्रिवेदी की लघुकथाएं बिन्दु में सागर को समोए  हैं। सामाजिक आलोक के लिए विकल इन लघु कथाओं की हृदय स्पर्शी पृष्ठभूमि सामाजिक संस्कार का आव्हान करती है।श्रीमती छाया त्रिवेदी जी के लघुकथा संग्रह बादल का एक टुकड़ा में 90 लघुकथाएं सम्मिलित हैं।

सुप्रसिद्ध साहित्य मनीषी श्री कृष्णकांत जी चतुर्वेदी, और अपने पूज्य पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. श्री रेवा प्रसाद दीक्षित, पूज्य मां स्व. श्रीमती सुशीला देवी दीक्षित को समर्पित यह पुस्तक  साहित्यिक क्षेत्र की एक श्रेष्ठ और संग्रहणीय कृति साबित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५५ ☆ # “रंग तो रंग है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “रंग तो रंग है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५५ ☆

☆ # “रंग तो रंग है…” # ☆

रंग तो रंग है

हर शै में उमंग है

 

कहीं पीला है कहीं नीला है

कहीं सफेद है कहीं लाल है

कहीं बैंगनी कहीं हरा है

कहीं जामुनी है कहीं काला है

हर कोई मतवाला है

 

सारा जमाना रंगों से सरोबार है

खूब रंगों का कारोबार है

पिचकारियों की धूम है

कहीं रंगों से झूमती टोली है

कहीं फूलों के रंगों की

सादगी पूर्ण होली है

 

कहीं इतराती, बचती बचाती बालाएं है

रंगों ने जिन्हें भिगो डाला है

उनके गले में रंग बिरंगी मालायें है

नये नये रंग लगायें है

नाचती हुई तरुणाई है

सब पर झूमती हुई होली आई है

 

वयस्क टीका लगा रहे हैं

भांग के नशे में युवा फाग गा रहे हैं

चंग और डफ बज रहे हैं

 रंग-बिरंगे परिधानों में सब सज रहे

 

चहु और उल्लास उमंग छाई है

यह होली खुशियां लेकर आई है

 

पर कहीं पर सन्नाटा है

जिनके घर अभी-अभी बुलडोजर से टूटा है

वह आंसुओं की होली मना रहे हैं

भूखे पेट फिर भी फाग गा रहे हैं

आसमान में बिखरे कई रंग है

क्या उनके जीवन में कोई रंग उतर आएगा ?

क्या उनका यह होलिकोत्सव रोते-रोते ही बीत जाएगा ?

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९८ – कृष्ण खेलें होली, राधा के संग… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कृष्ण खेलें होली, राधा के संग।)

☆ अभिव्यक्ति # ९८ ☆ कृष्ण खेलें होली, राधा के संग☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

रंगों में रंग, होली के रंग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

रंग गुलाबी, प्रेम भरा है,

लाल रंग विश्वास भरा है,

नीला रंग है, श्याम के जैसा,

रहें सदा संग संग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

रंगों की वर्षा, राधा करतीं,

सखियां भी न पीछे हटतीं,

रंग गुलाल की वर्षा होती,

गोकुल की गलियां रंगती,

नर नारी के संग, ,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग,

 

संग नहीं खेलना, मुझको ये रंग,

तेरे ही रंग में, अंग जाए रंग,

राधा खो जाए, श्याम में आकर,

जैसे ज्योति दीपक में जाकर,

आपस में एक रंग,

कृष्ण खेलें होली, राधा के संग.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, क्षितिज पुणे एवं हिंदी आंदोलन परिवार का आयोजन – भ’ से भाषा, ‘भ’ से भारत’ ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, क्षितिज पुणे एवं हिंदी आंदोलन परिवार का आयोजनभ’ से भाषा, ‘भ’ से भारत’  

महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, क्षितिज पुणे एवं हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे के संयुक्त तत्वाधान में शनिवार 7 मार्च को ‘भ’ से भाषा, ‘भ’ से भारत’ कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इस कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों की विविध भाषाओं की कविताओं और लोकगीतों की वाचन, गायन, नृत्य एवं अभिनय द्वारा प्रस्तुति की गई।

इसके लेखक, निर्देशक, सूत्रधार- संजय भारद्वाज थे। कार्यक्रम का निर्माण क्षितिज इन्फोटेनमेंट ने किया था। रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र के निदेशक डॉ. जवाहर कर्नावट आयोजन के मुख्य अतिथि थे। उद्घाटन सत्र के अपने वक्तव्य में हिंदी के वैश्विक होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि हमें राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए और अधिक काम करना होगा। आपने भाषाई स्वाभिमान को सदैव जगाए रखने पर भी बल दिया। कार्यक्रम का आरंभ संजय भारद्वाज की कविता और उदीयमान नृत्यांगना प्राची पुजारी के कथक की जुगलबंदी से हुई। तत्पश्चात विभिन्न भारतीय भाषाओं की कविताओं एवं उनके भावानुवाद, विभिन्न ललित कलाओं द्वारा मंच पर आते गए। प्रमुख रचनाकारों, वाचकों एवं कलाकारों में सुधा भारद्वाज, वीनु जमुआर, ऋता सिंह, विनीता सिन्हा, गौरी कुलकर्णी, अनिल अब्रोल, सतीश कुमार, आशीष त्रिपाठी, अपर्णा कडसकर, डॉ. ज्योति कृष्ण, कंचन त्रिपाठी, गौतमी चतुर्वेदी पांडेय, कंचन त्रिपाठी, ऊर्जा वाईकर, पूर्णिमा पांडेय, शशिकला गुंडलूपेट, अपूर्व शर्मा, प्राची पुजारी, अंगिता कुमार, अनुपम पांडेय, रितेश बुरूड आदि सम्मिलित थे। विशेष बात यह रही कि कविता या गीत प्रस्तुत करने वाले हर रचनाकार ने भारत के किसी राज्य विशेष का परिधान धारण किया था। कार्यक्रम में हिंदी, संस्कृत, मराठी, बंगाली, कन्नड़, पंजाबी, खोरठा, असमिया, बुंदेलखंडी, सधुक्कड़ी आदि भाषाओं की रचनाओं का पाठ हुआ। रंगमंचीय शैली में प्रस्तुत इस कार्यक्रम ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य तथा कलाप्रेमी उपस्थित थे। प्रमुख उपस्थितों में डॉ. केशव प्रथमवीर, डॉ. राजेंद्र श्रीवास्तव, श्री हेमंत बावनकर, डॉ. विपिन पवार, डॉ. रमेश गुप्त, डॉ. कांतिदेवी लोधी, डॉ. रजनी रणपिसे एवं अन्य अनेक प्रतिष्ठित हस्ताक्षर सम्मिलित थे।

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ साद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ साद… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

ओळखीची साद येता साथ तू ही देत जा

माणसा माणूस आता माणसांचा होत जा

*

भाट राजानें सारे ओसरीला बांधले

तू नको जाऊस तेथे दूर थोडा जात जा

*

लाभले स्वातंत्र्य आहे ते जरासे भोग ना

मौन तू पाळू नको रे गीत साधे गात जा

*

सातबारा नोंदलेला तोच आहे आपला

वतन आहे मालकीचे ते तुझे तू घेत जा

*

फसवणारे लोक जमले खूप झाले भामटे

आत्मरंगी रंगुनीया वेगळा तू -हात जा

*

गरजवंतांच्या पुढे जा पुरव त्यांच्या मागण्या

मागणारा भेटला की देत हाती हात जा

*

देह पुरता पोसण्याला अन्न पाणी घ्यायचे

लागते जगण्यास जितके तेवढे तू खात जा

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सावित्रीबाई खानोलकर ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

🔅 विविधा 🔅

☆ सावित्रीबाई खानोलकर ☆ शालिनी जोशी

(८ मार्च —- ‌महिला दिनानिमित्त, परदेशी असून भारतासाठी कार्य करणाऱ्या महिलांची ओळख –)

(साभार – यूट्यूब चैनल >> IMC Business Official)

जन्मभूमी निवडण्याचे स्वातंत्र्य आपल्याला नसते. तरीही प्रबळ इच्छाशक्तीच्या जोरावर आपली कर्मभूमी आपण निवडू शकतो आणि आपल्या कर्माचा ठसा तिथे उमटवूं शकतो. याचे उत्तम उदाहरण म्हणजेच सावित्रीबाई खानोलकर.

सावित्रीबाई म्हणजे एखाद्या मराठमोळ्या स्त्रीचे नाव वाटते. पण त्यांचे मूळचे नाव ‘इव्हा युओन लिंडा’. असे होते. जन्म २० जुलै १९१३ रोजी स्वित्झर्लंड मध्ये झाला. आई रशियन व वडील हंगेरीचे होते. आई लहानपणीच वारली. वडील समाजशास्त्राचे प्राध्यापक तसेच ग्रंथपालही होते. त्यामुळे इव्हाना लहानपणापासून विविध प्रकारची पुस्तके वाचायला मिळाली. त्यातून भारत व भारताचा इतिहास कळला. भारताविषयी ओढ निर्माण झाली.

मेजर विक्रम खानोलकर हे भारतीय लष्कर अधिकारी मुळचे महाराष्ट्रातील सावंतवाडीचे रहिवासी होते. रॉयल मिलिटरी अकॅडमी, सॅंडहस्ट येथे त्यांचे शिक्षण झाले. तेव्हा ते स्विझर्लंडला गेले असताना त्यांची व इव्हा यांची भेट झाली. १६ वर्षाची इव्हा २७ वर्षांच्या भारतीय तरुणांच्या प्रेमात पडली. आई-वडिलांचा विरोध पत्करून १९३२साली, आपल्या निर्णयावर ठाम असलेली ही मुलगी, भारतात आली. त्यावेळी त्या अठरा वर्षाच्या होत्या. २९ वर्षांच्या मेजर विक्रम यांचे बरोबर त्यांनी लग्न केले. हिंदू धर्म स्वीकारला. इव्हाच्या सावित्रीबाई खानोलकर झाल्या.

त्या पूर्णपणे बदलल्या. भारतीय संस्कृतीचा त्यांनी पूर्णपणे अंगिकार केला. साडी, कुंकू, साध्या चपला, शाकाहारी जेवण यांचा स्वीकार केला. भारतीय भाषा, वेद, उपनिषदे, संस्कृत काव्य यांचा अभ्यास सुरू केला. पाटणा विद्यापीठात प्रवेश घेतला व पदवी मिळवली. रामकृष्ण मिशनचा भाग बनल्या. चित्रकला, संगीत व नृत्याची आवड होती. त्यात प्राविण्य मिळवण्यासाठी उस्ताद पंडित उदयशंकर यांची शिष्या झाल्या. हे सर्व करून ‘सेंटस् ऑफ महाराष्ट्र’ आणि ‘संस्कृत डिक्शनरी ऑफ नेम्स’ ही पुस्तके त्यांनी लिहिली. ती खूप गाजली. हिंदी, मराठी, संस्कृत बोलू शकत. भारतीय संस्कृती आणि परंपरा यात त्या समरसून गेल्या.

देशाला स्वातंत्र्य मिळाले आणि लगेचच भारत पाकिस्तान युद्ध सुरू झाले. देशाच्या शुरानी बलिदान केलं. तेव्हा युद्धात प्राण्याची आहुती देणाऱ्या वीरांच्या सन्मानार्थ नवीन पदकांची रचना करण्याचे काम मेजर जनरल हिरालाल अटल यांच्याकडे आले. त्यासाठी त्यांनी सावित्रीबाईंची निवड केली. सावित्रीबाईंनी हे आव्हान स्वीकारले. भारतीय संस्कृती आणि वेद पुराणांच्या अभ्यासाचा उपयोग केला. काही दिवसांच्या अथक प्रयत्नानंतर पदकांची रचना मे. ज. अटल यांच्याकडे त्यांनी पाठवली. सर्वाना ती पसंत पडली. हे बनवत असताना इंद्राचे शस्त्र वज्राची प्रेरणा मिळाली. महर्षी दधिचीनी वृत्रासुराला मारण्यासाठी लागणारे अमोघ शस्त्र (वज्र) बनविता यावे म्हणून त्यांचे शरीर त्यागले होते. त्यांच्या अस्थी पासून बनवलेले वज्र हे समर्पणाचे प्रतीक. म्हणून परमवीर चक्राच्या मध्यभागी भारताची राजमुद्रा आणि त्या भोवती इंद्राच्या वज्राची चार चिन्हे कोरलेली आहेत. हे गोलाकार चिन्ह ३. ५ सेंटीमीटर व्यासाचे कास्य धातूचे आहे. दुसऱ्या बाजूला हिंदी व इंग्रजी मध्ये परमवीर चक्र असे कोरले आहे. या दोन शब्दांच्या मध्ये कमळ आहे. सैनिकाची शक्ती आणि बलिदान राष्ट्राचे रक्षण कसे करेल याचं ते चिन्ह म्हणजे प्रतीक. त्याग आणि शक्तीचे हे प्रतीक, यातून युगानुयुगे चालत आलेल्या संस्कृतीचा धागा मजबूत केला.

पहिलं परमवीर चक्र पाकिस्तान युद्धात शहीद झालेल्या मेजर सोमनाथ शर्मा यांना देऊन सन्मानित करण्यात आले. हे मेजर शर्मा सावित्रीबाई खानोलकर यांची कन्या कुमुदिनी हिचे दिर होते. परमवीर चक्रा प्रमाणेच अशोकचक्र, महावीरचक्र, कीर्तीचक्र, वीरचक्र, शौर्यचक्र अशा प्रमुख चक्रांची रचना सावित्रीबाईंनी केली. ही देशाला त्यांनी दिलेली देणगी. त्यामुळे भारताच्या इतिहासात त्यांचे नाव सुवर्ण अक्षराने लिहिले जाईल.

१९२९ मध्ये किंग्स कमिशन मध्ये जॉईन झालेल्या खानवीलकरानी वेगवेगळ्या ठिकाणी वेगवेगळ्या पदावर काम केले. पाच ऑगस्ट १९४९ रोजी दिल्ली क्षेत्राचे जी ओ सी नंतर १९५२ मध्ये कलकत्ता पायदळ तुकडीचे नेतृत्व त्यांनी स्वीकारले. ते कठोर, शिस्तप्रिय प्रशासक म्हणून ओळखले जात. पत्नीसह ट्रेन ने कलकत्त्याला परतत असताना २९ ऑगस्ट १९९२ रोजी सकाळी हृदयविकाराने त्यांचे निधन झाले. त्यांच्या मरणोत्तर मेजर जनरल पदावर त्यांना बढती देण्यात आली. त्याना दोन मुली व एक मुलगा होता.

विक्रम खानवीलकरांच्या मृत्यू नंतर सावित्रीबाईंनी पूर्णपणे अध्यात्माला समर्पित केले. हुतात्मा झालेल्या सैनिकांच्या कुटुंबासाठी आणि निर्वासितांसाठी त्यांनी भरपूर काम केले. १९९० मध्ये त्यांचे निधन झाले. अशी ही निसर्गाची आवड असणारी, स्वित्झर्लंडची कन्या पूर्ण भारतीय होऊन राहिली. आपल्या कार्याने अजरामर झाली.

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – ३ – कंदील -☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆

सुश्री विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – ३ – कंदील – ☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी

परवा रस्त्याने जाताना एक सुंदर सजावट दिसली. बाहेर ओळीने कंदील लावलेले होते. ते बघून मी एकदम बालपणात पोहोचले. माझे बालपण ज्या ठिकाणी गेले त्या गावात वीज नव्हती. त्यामुळे हे कंदीलच सर्वत्र उजेड करायचे. अगदी रस्त्याने जाताना सुद्धा रस्ता दिसण्यासाठी हातात कंदील असायचा. कारण बंदिस्त काच असल्याने त्याला वाऱ्यापासून संरक्षण मिळायचे. आणि उजेड पडायचा. घरात तर प्रत्येक खोलीत असा कंदील असायचा. आणि तो भिंतीवर खुंटीला अडकवला की सगळ्या घरात उजेड पडायचा. ज्याला अंगणात जायचे असेल त्याने तो वरच्या कडीला धरून आपल्या सोबत घेऊन जायचा. आणि आपल्या पुरता अंधार गायब व्हायचा. मला तर खूप मज्जा वाटायची. तो उजेडाचा गोल आपल्या बरोबर प्रवास करायचा. आणि लांबून येणाऱ्याला माणूस दिसायचाच नाही. फक्त उजेड आपल्या दिशेने येताना दिसायचा.

हा कंदील घेताना घरातून बजावून सांगितले जायचे, “प्रभाकर कंदीलच घ्या”. काच नीट बघून घ्या. काच ओगले यांची असेल तोच घ्या. त्यातही दोन, तीन रंग मिळायचे. हा कंदील मिळायचे पुण्यात दत्ताच्या देवळा जवळ दुकान होते. तेथूनच आणा असेही सांगितले जायचे. घरात कंदील आला की मोठेच कौतुक वाटायचे. त्याला हळदी कुंकू लावले जायचे आणि सुरक्षित ठिकाणी ठेवले जायचे. दुपार नंतर तो कंदील घेऊन त्यात चपटी वात घातली जायची. आणि रॉकेल भरायचे. त्याच्या काचेच्या खालची किल्ली वर खाली करुन ती वात रॉकेल मध्ये भिजली आहे का बघितले जायचे. मग त्यावर काच चढवली जायची.

आणि कडेचा स्टॅन्ड (आम्ही त्याला घोडा म्हणत होतो) वर खाली करुन मगच ही कंदील उजळण्याची प्रक्रिया पूर्ण व्हायची.

दुसऱ्या दिवसा पासून संध्याकाळी कंदीलची काच साफ करणे हे जोखमीचे पण आवडते काम रोज करावे लागे. आणि ती काच चमकवण्या साठी आमच्या लहान मुलांची स्पर्धा लागायची. त्या साठी विविध प्रयोग चालायचे. नुसत्या मऊ कपड्याने काच पुसणे. चुलीतली राख चाळून त्याने काच घासणे. मऊ कापडाने पुसणे. पाणी व साबण याने साफ करणे. पण त्यात हातातून निसटून पडून फुटण्याचा धोका असे. अशा काचा चकचकित केल्या की आम्ही शेजारी ठेवून कोणाची काच जास्त स्वच्छ झाली याचे निरीक्षण करत असू. विशेष म्हणजे तो उजळलेला कंदील चुकून पडला तरी आग लागत नसे.

याच्या उजेडात घरातली कामे व्हायचीच पण आमचे भविष्य पण उजळत होते. हा कंदील मध्ये ठेवून त्याच्या भोवती मी व माझ्या मैत्रिणी अभ्यास करत होतो. कारण दिवसभर शाळा आणि रात्री अभ्यास करावा लागायचा.

त्या कंदीलाचा वरचा भाग गरम व्हायचा. आणि त्याच्या उष्णतेने माझे माथ्यावरचे केस कायम जळायचे. पण बुद्धी मात्र उजळायची आणि अभ्यासाचा उजेड डोक्यात पडायचा.

मी असा कंदील खूप वर्षे जपून ठेवला होता. आणि लाईट गेल्यावर मेणबत्ती ऐवजी त्याचा वापर करत होते. तो बघून शेजाऱ्यांना खूप आश्चर्य वाटायचे. आणि मुलाला आकर्षण वाटायचे.

नंतर सगळीकडे विजेचे खांब उभे राहिले. घरात बल्बचा उजेड पडला आणि अत्यावश्यक कंदील माळ्यावर रवाना झाला. पण त्याच्या आठवणी मात्र अजून मनात आहेत.

© सुश्री विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “आनंदी…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? जीवनरंग ?

☆ “आनंदी…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

नमस्कार!! “मी आनंदी”

कोणी सेलिब्रिटी नाही.

तुमच्यासारखीच सामान्य माणूस.

आजचा दिवस एकदम खास,

माझा वाढदिवस,

सकाळी छान आवरलं.

रात्री आठवणीनं आणलेला केक स्वतःला भरवताना विचारचक्र सुरु झालं.

“आनंदीबाई, आतापवतो तब्येतीनं छान साथ दिलीय. डायबेटीस, बीपी हे पाहुणे अजून तरी लांबच आहेत. आज त्रेचाळीस पूर्ण, लवकरच पन्नास मग साठ 

बाप रे, इतकं आयुष्य नको.

हातीपायी धड आहे तेव्हाच कारभार उरकलेला बरा. त्यातही झोपेतच झालं तर सोन्याहून पिवळं. आतापर्यंत कोणाला त्रास दिला नाही. पुढेही नको. पुन्हा एकदा हॅपी बड्डे टु मी. ”आरशात पाहत स्वतःला भरभरून शुभेच्छा दिल्या.

खूप वर्षापूर्वी आई-वडील गेले.

तेव्हापासून एकटीच.

भाऊ-बहीण नाही.

जबाबदारी नको म्हणून नातेवाईकांनी अंतर राखलं.

ओळखी खूप आहेत परंतु मित्र-मैत्रिणी नाहीत.

लग्नाचा योग नव्हता.

एकदोन अनुभवानंतर त्या वाटेला परत गेले नाही.

असो.. जाऊ दे.

निदान आजतरी हे रडगाणं नको.

माझं जग फार छोटं.

राहती खोली आणि छोटी टपरी,

दोन्ही आई-वडिलांकडून मिळालेलं.

टपरी म्हणजे माझा जीव की प्राण…

कमाईचे एकमेव साधन.

सकाळी नऊ ते रात्री नऊ तिथचं.

२० वर्षे एकच रुटीन.

एकटेपणाची इतकी सवय झाली की आता सोबतीची भीती वाटते.

तशी मी एककल्ली, फटकळ, तापट स्वभावाची.

कोणाचाही मुलाहिजा न राखता बोलणारी,

खडूस, भांडखोर, फाटक्या तोंडाची म्हणून कुप्रसिद्ध..

म्हणूनच सगळे चार हात अंतर राखून.

खरं सांगायचं तर मी अशी नाहीये पण एकट्या बाईला जगात टिकायचं असेल तर 

काहीतरी मुखवटा घालावाच लागतो.

मी तेच केलं.

रोजच्याप्रमाणे दुकानात बसले होते.

वाढदिवसामुळे मन प्रसन्न अन छान मूड होता.

समोर दहा-बारा वर्षाची मुलं क्रिकेट खेळत होती.

दुकानाजवळच एकजण फिल्डिंग करत होता.

सहज मनात आलं. त्याला बोलावलं अन चॉकलेट दिलं.

अनपेक्षितपणे मिळालेल्या गिफ्टमुळे खुष झालेला पोरगा मनापासून हसला.

त्याचा खुललेला चेहरा पाहून मलाही मस्त वाटलं.

*आपल्यामुळं आनंदी झालेला चेहरा पाहणं यापेक्षा जगात सुंदर काहीही नाही. *

काही वेळानं लक्ष गेलं तेव्हा खेळ थांबलेला अन सगळे दुकानाकडे पाहत होते.

काय झालं असेल याची कल्पना आली.

सर्वांना बोलवून चॉकलेट दिलं. मुलं एकदम खुष.

‘बड्डे!!’एका पिटुकल्यानं विचारलं.

“हो, म्हणूनच चॉकलेट दिलं”

प्रत्येकानं शेकहँड करत ‘हॅप्पी बड्डे’ केलं.

फार फार भारी वाटलं. मुलं खेळायला गेली.

काही वेळानं घोळका परत आला.

“काय झालं. आता काही मिळणार नाही. ”मी विनाकारण डाफरले.

मुलं एकमेकांकडे टकमका बघायला लागली.

एकानं कुठून तरी तोडून आणलेलं पिवळं फुल पुढं केलं.

“माझ्यासाठी!!”मी हरखून विचारलं.

तेव्हा माना डोलावत सगळे म्हणाले “बड्डे गिफ्ट”

त्यावेळेस जे वाटलं ते सांगता येणार नाही.

खूप भरून आलं. मान फिरवून ओढणीनं डोळे पुसले.

प्रत्येकाला बिस्किट पुडा दिला. सगळे डबल खुष.

पुन्हा एकदा शेकहँड करत “हॅपी बड्डे”केलं अन खेळायला गेले.

मी मात्र बराच वेळ त्या फुलाकडे पाहत होते.

वाढदिवसाला मिळालेलं माझं पहिलंवहिलं गिफ्ट.

मुलांचं खूप कौतुक वाटलं. त्यांच्यामुळे माझा वाढदिवस स्पेशल झाला.

खूप सारं समाधान अन आनंद मिळाला.

मी आज फक्त नावापुरती नाही तर खरोखर *“आनंदी”* होते

 

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “ती… स्वयंसिद्धा…” – (अनुवादित) हिन्दी कवयित्री : निधी सक्सेना ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? मनमंजुषेतून ?

☆ “ती… स्वयंसिद्धा…” – (अनुवादित) हिन्दी कवयित्री : निधी सक्सेना ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

दाखले नकाच मागू तुम्ही…

ती आहेच स्वयंसिद्धा.

पण, प्रेमात आकंठ बुडालेली असते ना…

तेव्हा स्वतः ला विसरूनच जाते जशी

आपणहूनच बांधून घेते, बंधनात स्वतः ला,

घालून घेते शृंखला पायी…

आपणहूनच अडकवून घेते प्रेमाच्या धाग्यात स्वतः ला…

स्वतः च, स्वतः शी केलेल्या संकल्पासारखी.

तुझ्या प्रेम अंबरात आपल्या इच्छा अगदी सफाईने टाचून ठेवते.

असीम अशी शक्ती दडपून ठेवते

वात्सल्याच्या उतरंडी खाली.

ऐक ना…

पण तू नको हं नजरेआड करूस

तिचं हे स्व समर्पण! 

घालायचंच असेल तर घाल बंधन…

पण… शब्दांत हवं तेवढं, हवं तेव्हा… व्यक्त होण्याचं.

स्वाभिमानाचं आभूषण दे तिला, ल्यायला तिच्या मनावर.

बांधून ठेव तिला तुझ्या प्रेमाच्या रेशमस्पर्शी बेडीत.

तिचा स्व कर की स्वतंत्र… होऊ दे तिला मोकळी.

मग बघ… उत्साहाची कर्णफुले घालून…

सावरीच्या कापसासारखी हलकी होऊन,

आनंद लहरींवर कशी तरंगेल, हर्षोल्लासाने नाचेल.

तुझ्या कितीतरी अशा गोष्टी…

ज्या तिच्या कल्पनेतल्या ; पण तू कधीच न केलेल्या अशा कितीतरी गोष्टीतही

सप्तसुरांचं मधुर संगीत ऐकल्याच्या काल्पनिक आनंदात थिरकलीयं ती…

पण आता मात्र तू एखादं खरंखुरं मधुर गीत बनून येशील… तरच ना सगळं जुळून येईल मनाजोगतं…

येशील कां रे?? … येशील ना???

(‘स्वयंसिद्धा स्त्री’ या निधी सक्सेना यांच्या हिंदी कवितेचा स्वैर भावानुवाद…)

अनुवादिका / कवयित्री : प्रा.भारती जोगी.

पुणे. 

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “तुम्हीच ठरवा – योग्य की अयोग्य??” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

 

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“तुम्हीच ठरवा – योग्य की अयोग्य?? ☆ श्री संभाजी बबन गायके 

तुम्हीच ठरवा – योग्य की अयोग्य??

स्वामी सामर्थ्यावर विश्वास नाही काय?

समाज जीवनास संतांचा मोठा आधार वाटतो. मी तुझ्या पाठीशी आहे, असं स्वामी समर्थ म्हणतात तेंव्हा भक्तास आपण सामर्थ्यशाली आहोत अशी भावना निर्माण होते आणि त्या आत्मविश्वासाने तो संसारातील समस्यांना सामोरा जातो.

स्वतः नामस्मरण करणं आणि तसं इतरांना करायला उद्युक्त करणं ही गोष्ट पुण्यप्रद आहे, हे खरेच आहे. पण… श्री स्वामी समर्थ असं facebook post वरील comment section मध्ये type कर… म्हणजे तुझ्या समस्या दूर होतील, तुला अमुक इतक्या तासांत, दिवसांत धनलाभ होईल असं सांगणं हे कितपत योग्य आहे?

 Comment मध्ये type केल्याने नामस्मरण होत असेलही पण धनलाभ मात्र page निर्मात्यास होत असावा! कारण अशी कित्येक pages दिसू लागली आहेत. येनकेन प्रकारे लोकांना comments करण्यास उद्युक्त करण्याचा प्रयत्न केला जातो. जाहिरातीमध्ये लोकांच्या मनातील विविध भावनांना हात घातला जातो. त्यात भीती, आमिष, स्वामित्व, अभिमान इत्यादी भावनांना आवाहन करून वस्तू खपवली जाते… उदाहरणार्थ हम… वाले हैं! सारखी जाहिरात! असो.

लिहा comment मध्ये स्वामी समर्थ इत्यादी इत्यादी मार्गाने स्वामींशी संबंधित संस्थांना पैसे मिळत असतील तर ते एकवेळ ठीक आहे. पण अधिकृत संस्था हा मार्ग अवलंबत असतील, असं वाटत नाही!

यातील काही pages वाल्यांचा हेतू निव्वळ स्वामी नामाचा प्रसार करणे असा शुद्ध असूही शकतो आणि त्याबद्दल त्यांचे कौतुक आहे!

पंढरपूर मधील एका प्रसिद्ध मठात रामनाम लिहिलेले कागद जमा करून घेतले जात. काही लोक घरी वहीत नाम लिहित असतात. देवाचे, संतांचे नाव मुखातून उच्चारले जाणे महत्वाचे आहे. मनातल्या मनात नामस्मरण सुद्धा – – 

संतोषी मातेची पत्रे पाठवा, बालाजी आणि अनेक स्थानिक देवतांच्या नागांची कथा असलेली hand bills छापून वितरीत करणे इत्यादी प्रकार अजूनही प्रौढ लोकांच्या लक्षात असतील.

स्वामी अशक्य ते शक्य करतात असा विश्वास असल्यास भक्तांना कुठेही ऑनलाईन जाण्याची गरज पडणार नाही… त्यापेक्षा स्वामींच्या मंदिरात त्यांच्या दर्शनाच्या लाईन मध्ये उभे राहून नामस्मरण करीत दर्शनाची प्रतीक्षा करणे केंव्हाही श्रेयस्कर आहे, असे वाटते. जय स्वामी समर्थ, श्री स्वामी समर्थ!

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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