हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१२ ☆ भावना के दोहे – फागुन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – फागुन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१२ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – फागुन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

आया फागुन मास अब, सुन्दर चले बयार।

हर आँगन में गूँजती, ढोलक की झंकार।।

धरा सजी है आज तो, करे लाल शृंगार।

मन में सबके उठ रहे, सुखकर प्रीति विचार।।

 *

बैर मिटेगा आज तो, रंग भरा त्यौहार।

रंग बरसता प्यार का, नेह  भरी बौछार।।

 *

गुझिया मीठी रसभरी, स्वाद लगे हर बार।

घर-घर बनती है यही, होली  प्रिय त्योहार।।

 *

श्याम संग राधा सजी, बरस रहा है प्यार।

प्रेम सुधा की धार है, आओ सब नर-नार।।

 *

भाई बहन के प्यार का, भाई दूज त्यौहार।

हर रूप में अमर रहे, भाई बहन का प्यार।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९४ ☆ मीरा पर कुछ दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके – मीरा पर कुछ दोहे आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९४ ☆

☆ मीरा पर कुछ दोहे☆ श्री संतोष नेमा ☆

मीरा मानक प्रेम की, जिनका पावन प्यार

लड़ती रहीं समाज से, मानी कभी न हार

*

कृष्ण प्रेम में डूब कर, लोक लाज दी छोड़

संतों के सत्संग से, आया नूतन मोड़

*

मीरा सी दीवानगी, मधुर प्रेम का राग

इस जग में दूजा नहीं, मीरा-सा अनुराग

*

स्वामी समझें कृष्ण को, मन में प्रेम अपार

मीरा सुध-बुध भूलकर, करतीं जय जयकार

*

रसिक बिहारी में रमी, करतीं नृत्य कमाल

मन मथुरा तन द्वारिका, मीरा के ये हाल

*

वृंदावन-सा है हृदय, बहे प्रेमरस धार

मनमोहन मन में बसे, यही एक शृंगार

*

मीरा ने जग की कभी, करी नहीं परवाह

साधक मोहन की बनूँ, यही एक थी चाह

*

कृष्णमयी लगता रहा, मीरा को संसार

जित देखें उत कृष्ण ही, दिखते थे हर बार

*

हे मनमोहन हमें भी, शरण लीजिए आप

मन में हो ‘संतोष’ धन, करूँ सदा ही जाप

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३५ ⇒ उधार प्रेम की कैंची है ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उधार प्रेम की कैंची है !।)

?अभी अभी # ९३५ ⇒ आलेख – उधार प्रेम की कैंची है ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

आज नक़द, कल उधार और उधार प्रेम की कैंची है, लिखने वाले दुकानदार, कितना नकद से प्रेम करते हैं, और कितना भगवान समान ग्राहक से, यह छुपा नहीं है ! मैंने हमेशा नक़द ही सौदा लिया है, लेकिन किसी दुकानदार ने प्रेम के वशीभूत हो, मुझे गले नहीं लगाया। ऐसा कई बार हुआ है कि मैं नकद पैसे लिए, सौदे के लिए खड़ा रहा, और एक बहनजी उधारी का सामान और अपने सुंदर से बच्चे के लिए मुफ़्त में एक्लेयर्स ले, रवाना हो गई और दुकानदार मेरी उपेक्षा करते हुए उधारी के सामान को डायरी में नोट करता रहा। बाबूजी ! उधारी का मामला है, बाद में भूल जाता हूँ। यानी उधार की कैंची मुझ पर, और प्रेम बहनजी के लाड़ले पर।

यूँ तो नकद का मतलब रोकड़ा ही होता है, लेकिन जब से नोटबन्दी के पश्चात कैशलेस का चक्कर चला है, सरकारी भीम और paytm, कैश काउंटर पर विराजमान हो गए हैं। न सड़े गले, फटे-टूटे नकली नोटों की चिंता, न चोर-डाकुओं का डर ! रात को कैश घर ले जाते समय का खतरा, और घर पर भी भारी भरकम नकदी रखने के खतरे से तो बचे ही, ग्राहक को भी डिस्काउंट का फ़ायदा। हुआ न एक पंथ दस काज।।

लेकिन जब कोई दोस्त या रिश्तेदार उधार माँगता है तो वह यह नहीं कहता कि भैया मेरे खाते में हज़ार-पांच सौ जमा कर देना। बाकायदा भाव-ताव होता है। पाँच हज़ार की माँग नीचे आते आते पाँच सौ तक आ जाती है और वह आप पर एक तरह से अहसान जताता हुआ, उक्त राशि स्वीकार कर ही लेता है। मुझे मालूम था, आप इससे ज़्यादा नहीं दे पाओगे। अब किसी और के आगे हाथ पसारने पड़ेंगे।

मैंने किसी बैंक में उधार प्रेम की कैंची है, जैसी तख्ती लगी नहीं देखी ! आकर्षक दरों पर ऋण लीजिये के अंतर्गत, अगर बीवी को छोड़ दिया जाए, तो घर की हर चल, अचल सम्पत्ति पर प्रेम से उधार मिल सकता है। घर से लगाकर फ्रिज, टीवी, गीज़र, फर्नीचर और मोबाइल से ऑटो-मोबाइल तक ! पत्नी चल सम्पत्ति है या अचल, यह तो अटलजी भी नहीं जान पाए।।

कैंची से कपड़े कटते हैं, पार्लर में बाल कटते हैं, जिनकी ज़बान कैंची जैसी चलती है, वे सामने वाले की बात तक काट देते हैं, लेकिन उधार एक ऐसी कैंची है जो प्रेम के रिश्ते को काटती है।

पैसा रिश्ते को जोड़ता है, फिर चाहे वह नकद का हो, या उधारी का। कहने वालों का क्या, वे तो दहेज को भी प्रेम की कैंची कहने लग गए। अंगूर खट्टे हों, तो आदर्शवाद बुरा नहीं।

मैं न उधार देता हूँ, न लेता हूँ। फिर भी माथे पर इतना कर्ज़ है कि कितने ही जन्म ले लूँ, उतार नहीं पाऊँगा। माटी का कर्ज़, माता पिता, गुरुजन, समाज, परिजन, हितैषी और सद्गुरु के ऋण से कौन उऋण हो पाया है। यह ऋण उधार नहीं, प्रेम की कैंची नहीं, प्रेम का सागर है। लेकिन हमारी मज़बूरी यही कि हमारे पास सिर्फ़ एक गागर है।

प्रेम की यह गागर कभी खाली न हो। प्रेम के रिश्तों को भुनाया नहीं जाता, और अधिक मजबूत किया जाता है। किसी पर अहसान जताया नहीं जाता, अहसान चुकाया जाता है। उस ऊपर वाले के ही इतने कर्ज़ हैं, इतने अहसान हैं, लेकिन वह कोई साहूकार नहीं, सिर्फ मेहरबान है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(ई-अभिव्यक्ति में बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी का स्वागत.  गद्य एवं छंद विधा में अभिरुचि के साथ ही महिला उद्यमी। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय लेख सपने बड़े देखें।)

? आलेख – सपने बड़े देखें…  ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

हम हमारे जीवन की जो अवधारणा रखते हैं, उसका हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव होता है l यदि जीवन की अवधारणा बड़ी है, तो हमारे सपने बड़े होंगे l

सोलह वर्ष की उम्र में व्यक्ति जिंदगी जीने के लिये जो सपने देखता है उन्हें पूरा करने की लिये वो जी जान लगा देता है l इसीलिये कहते भी हैं कि युवा पीढ़ी का रहन सहन, उनकी भाषा, उनके अधरों पर गाने सुनकर उस राष्ट्र का भविष्य बताया जा सकता है l जीने के लिये यदि विशाल और सृजनशील सपने देखें तो हम स्वयं का, समाज का और राष्ट्र का नक्शा बदल सकते हैं l

बाबा आमटे के अनुसार ऐसे सृजनशील व साहसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो जो अच्छी योजनाएं बनाये और उस पर काम भी करे l

चादर देखकर पैर पसारो इस कहावत को भूल कर पैर कितने पसारने हैं उसके हिसाब से चादर का निर्माण करना जरूरी है l

आज की दौर में नई राहें, नये सपने पूरे करने हेतु संघर्ष करना पड़े तो करो l बिपदाओं का सामना कर आगे बढ़ो l

अपयश अपराध नहीं बल्कि आगे जाने की सीढ़ी है l हमारा लक्ष्य बड़े सपने देखना होना चाहिए l उन सपनों को पूरा करने की जिद होनी चाहिए l उन सपनों को कैसे साकार करें इसका चिंतन होना चाहिए l

जीजा माता की प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी महाराज ने सिर्फ सोलह वर्ष की आयु में हिन्दवी स्वराजय का सपना देखा था और उसे साकार भी किया l स्वातंत्र वीर विनायक दामोदर सावरकर जी ने सोलह वर्ष की उम्र में अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र करने का इतिहास लिख दिया l

कहने का तातपर्य है कि ऐसे बड़े सपने जीवन की हर क्षेत्र में देखे जाते हैं और उन्हें पूरा करने हेतु अथक प्रयास भी करने होते हैं l एक समय कि बात हैं कि एक पेट्रोल पम्प पर एक लड़का पेट्रोल भरने का काम करता था l एक दिन किसी ने उससे कहा कि पूरी जिंदगी ऐसे पेट्रोल भरता रहेगा कि कोई सपने भी देखें हैं तूने जिंदगी में?

उसने कहा पेट्रोल केमिकल क्षेत्र में मेरी मालिकी की एक बड़ी कम्पनी खोलूंगा ऐसा मेरा सपना है l वहाँ खड़े लोग उसपर हसे l इतना बड़ा सपना?

लोगों ने मजाक उड़ाया कि पहले पेट्रोल तो भर ले….

और वह सपने देखने वाला लड़का और कोई नहीं बल्कि धीरुभाई अम्बानी था जिन्होंने सिद्ध किया कि सपने बड़े देखना चाहिए और उन्हें पूरा करने शिद्द्त से जोर लगा देना चाहिए l

हम सभी अपने कार्य क्षेत्र में ऐसे बड़े सपने देख, उन्हें पूरा कर अपने जीवन को एक नया रूप नया आकार दे सकते हैं l इस बात का मुझे भी स्वानुभव है और पूरा विश्वास भी है कि बड़े सपने देखना जरूरी है और वो पूरे भी होते हैंl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – गोपी संग रास रंग… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता गोपी संग रास रंग।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – गोपी संग रास रंग…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

ओ रे कान्हा, तू कितना सयाना,

जाने कब गगरी में मेरी,

तूने केसर रंग मिलाया,

मैं तो हूं निपट अनाड़ी,

भोली भाली, सीधी सादी,

जान सकी ना, तेरी शरारत,,

तुझे अपनी और देख निहारत,

मैं शरमाई, मैं सकुचाई,

धड़कते दिल, लरजते हाथों से,

मटकी उठा, कमर से लगा, फिर सर पर चढ़ाई,,

मैं चल दी पनघट से घर की राह,

ना पा सकी, तेरे मुस्काते नैनन की थाह,,

होले से फिर कुछ तूने फेंका,,

हाये, , महकते फूल या कोई प्रेम निशानी ???

लेकिन, अरे रे रे रे,,

कंकड़ी मोहे मारी,

गागरिया फोड़ डाली,,

केसर के रंग में रंग गई,

मेरी चोली चुनर सारी…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ नाते असावे असे… ☆ प्राची अभय जोशी ☆

प्राची अभय जोशी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ नाते असावे असे… ☆ प्राची अभय जोशी ☆

माती आणि दगडाचे

असे आगळे वेगळे नाते

सृष्टी मात्र दोघांनाही

स्वतः सारखेच जपते.

 

पहिल्या पावसाची माती

ओला सुगंध पसरवते

दगड भिजतो तेंव्हा मात्र

त्याला लकाकी येते

 

पावसातील माती ही

अवखळपणे वाहते अन्

दगडाचे दिसून येते

एकाच जागी स्थिरावणे.

 

माती आणि दगडाचे हे

प्रतिक आहे भावनांचे

प्रत्येक वेळी विरघळताना

असे स्थिरतेने पाहणे

 

दोघांकडेही पाहताना वाटे असे सारखे,

दगडाचे फक्त पाण्यात भिजणे…

अन्

मातीचे अगदी निरागसतेने विरघळणे…

 

भिजणे आणि विरघळणे जणू

हे असे निसर्गाचे सांगणे

या मानवाचे,

एकमेकांचे असे होऊ शकते का

स्वच्छ आणि नितळ नाते ?

©  प्राची अभय जोशी

मो 9822065666 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १० … ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १० ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अभंगातून समजलेले संत तुकाराम

गाथेतील एकेक अभंगांचे वाचन करत असताना संत तुकारामांचे पांडुरंगाशी असलेले भक्तीचे नाते आपल्याला हळु. हळू उलगडत चालले आहे. हे भक्तीचे नाते कायम तसेच राहावे एवढेच त्यांचे देवाकडे मागणे आहे. म्हणून ते म्हणतात, “अनेक जन्मात माझे आचरण चांगले नव्हते. म्हणून हे देवा मला तुमच्या पायांचा वियोग झाला. मात्र या जन्मात काहीतरी चांगले कर्म माझ्या हातून घडले असावे, आणि म्हणूनच तुमची माझी भेट झाली. आता तुम्ही कृपा करा. मी अपराधी, दुराचारी आहे. संसाराच्या तापाने त्रस्त झालो आहे. माझ्या अंतरंगातील काम, क्रोध, कल्पना विक्षेप यामुळे मी तुमच्या पर्यंत पोहोचत नाही असे झाले आहे. इकडे संसार धड नाही, तिकडे परमार्थात गती नाही, अशी माझी कुचंबणा झाली आहे मी निरुपयोगी ठरलो आहे”

 हा न तोसा ठाव झाला पांडुरंगा/

 नयेची उपेगा काय करू/

 आपुलिया नावा धावुनिया धावे/ लवकर यावे तुका म्हणे//

 अशा परिस्थितीत हे पतितपावना, तुझे नाव सार्थ कर आणि माझ्याकरता धावत ये.

 आता या अभंगात तुकाराम बुवा काय म्हणतात?

 कारे तुम्ही ठेवा बहुतानिमित्ते/

 माझीया संचिते वोढवले/

 भक्ती प्रेम गोडी बैसली जिव्हारी/

 आनंद अंतरी येणे झाला/

 पुसले पडळ तिमिर विठ्ठले/

 जगती भरले ब्रह्मानंदे//

 तुका म्हणे केलो कामने वेगळा/

 आवडी गोपाळा असे वरी//

तुकाराम लोकांना सांगत आहेत की जन हो, मी संसाराचा त्याग केला म्हणून तुम्ही माझ्यावर आरोप करता, पण खरं सांगायचं तर हेच माझं संचित आहे. माझ्या अंतःकरणातील विठूच्या प्रेमामुळे माझ्या दृष्टीतील अज्ञानाचा अंधार दूर झाला आहे, आणि मला सर्व जग ब्रह्मानंदाने भरलेले दिसत आहे. मी कामनाशून्य होऊन माझ्या मनात फक्त एका कृष्णाची प्रीती आहे.

या ठिकाणी संत तुकारामांची देह बुद्धी पूर्णतया  विनाश पावली आहे.

 आमुची विश्रांती/ तुमचे चरण कमळापती/

 हेचि एक जाणे/ काया वाचा आणि मने/

 नीच जना लोका/ तळील पायरीस तुका//

या ठिकाणी तुकाराम महाराज स्वतःस सर्वांहून नीच म्हणजे खालच्या पातळीवरचा असे संबोधित आहेत. देवा, तुमच्या चरणांवर अनेक भक्त लोटांगण घालतात, त्या सर्व भक्तात मी खालच्या तळाच्या पायरीवर आहे.

खरा भक्त हा नेहमी लीन असतो, विनम्र असतो हेच आपल्याला तुकारामांचे रूप या अभंगात पहावयास मिळते.

 संत प्रवृत्तीचे तुकाराम महाराज कसे होते यासंबंधी अधिक माहिती या खालील अभंगातून आपल्याला मिळते.

  होईल तो भोग/ भोगीन आपुला/

 न घालीन विठ्ठला/ भार तुज//

 तुम्हा पासाव हे / इच्छितसे दान/

 अंतरीचे ध्यान/ मुखी नाम//

 नये काकुळती/ गर्भवासासाठी/

 न धरी हे पोटी/ भय काही//

 तुका म्हणे मज/ उदंड एवढे/

 नाचेन मी पुढे/ मायबापा//

“विठ्ठला, प्रारब्धाने मला जे भोग भोगायचे असतील, ते मी आनंदाने भोगीन. तुझ्यावर त्याचा जराही भार टाकणार नाही. मला तुझ्याकडून हेच दान हवे आहे. तुझे ध्यान माझ्या अंतरंगात सदैव राहो आणि तुझे नाम माझ्या मुखी अखंड राहो. मला गर्भवासाचे भय नाही.

अनेक जन्म मला मिळाले तरी हरकत नाही, फक्त माझी एकच मागणी तू पूर्ण केलीस तर तुझ्यापुढे मी प्रेमभराने सदैव नाचत राहीन. “

सदैव भगवंताची भक्ती आणि प्रीती अंतरंगात राहावी एवढी एकच इच्छा तुकाराम त्यांच्या अनेक अभंगांतून वेळोवेळी व्यक्त करतात. परमेश्वराच्या दर्शनासाठी कितीही जन्म घेण्याची त्यांची तयारी आहे. ते देवाकडे मोक्षाची याचना करत नाहीत.

कधी कधी तुकाराम महाराज लहान होऊन आपल्या मायबापांकडे बाल हट्ट करतात.

 भोगलो मी आता/ आपुल्या स्वभावे/

 कृपा करून देवे/आस्वासीजे//

मी सांसारिक नित्य कर्म करून फार थकलो आहे, तेव्हा कृपा करून तुम्ही मला असे आश्वासन द्या की,

 देऊनी आलिंगन/ प्रीतीच्या पडीभरे/

 अंगेही दातारे/ निववावी//

 उदार अंतकरणाने हे देवा, तुम्ही मला आलिंगन देऊन माझ्या थकलेल्या शरीराला शांत कराल.

 अमृताची दृष्टी/ घालूनिया वरी/

 शीतळ हा करी/ जीव माझा//

 तुमच्या अमृतरुपी कृपादृष्टीचा वर्षाव करून माझ्या जीवाची तळमळ शांत कराल.

 घेई उचलोनी /पुसे तहानभूक/

 पुसी माझे मुख/ पितांबरे//

माझी तहानभूक जाणून मला कडेवर उचलून घ्याल, आणि माझे मुख आपल्या पितांबराने स्वच्छ कराल.

 बैसोनिया माझी धरी हनुवटी/

 ओवाळूनी दिठी करुनी सांडी//

  तुका म्हणे बापा अहो विश्वंभरा/

 आता कृपा करा ऐसी काही//

मला आपल्या मांडीवर घेऊन माझी हनवटी धराल, माझी दृष्ट काढाल, अशा प्रकारे विश्वंभरा तुम्ही माझ्यावर कृपा कराल. मला असे आश्वासन द्या.

काय हा तुकारामांचा बालहट्ट! भक्ताचे व देवाचे नाते कसे अधिकाराचे होऊ शकते हे आपल्याला या अभंगातून अगदी सहज समजते.

सतत पांडुरंगाचा धावा केल्याने तुकाराम महाराजांना पंढरीच्या विठोबाचे आता दर्शन घडलेले आहे आणि त्यामुळे धन्यता पावलेले तुकाराम ब्रह्मानंद अवस्थेत बेधुंद होऊन गात आहेत.

 पावलो पंढरी वैकुंठ भुवन/

 धन्य आजी दिन सोनियाचा//

 पावलो पंढरी आनंद गजरे/

 वाजतील तुरे शंखभेरी//

पावलो पंढरी क्षेम आळिंगणी/

 संत या सज्जनी निवविलो//

 पावलो पंढरी पार नाही सुखा/

 भेटला हा सखा मायबाप//

 पावलो पंढरी येरझार खुंटली/

 माऊली वोळली प्रेम पान्हा//

 पावलो पंढरी आपुले माहेर/

 नाही संसार तुका म्हणे//

भू वरचे वैकुंठ म्हणजे पंढरपूर, या ठिकाणी तुकाराम महाराज येऊन पोहोचले आहेत आणि त्यांचा दिवस धन्य धन्य झाला आहे. पंढरीत संत जनांनी त्यांना प्रेमाने आलिंगन दिल्यामुळे त्यांचे सर्व श्रम निमाले आहेत. मायबाप पांडुरंगाच्या भेटीने त्यांच्या आनंदाला पारावार नाही. आता जन्म मरणाच्या फेऱ्यातून त्यांची कायमची सुटका झाली आहे. विठाईच्या प्रेम पान्ह्याने त्यांना आता संसाराचे बंधन राहिले नाही. या ठिकाणी परमेश्वराशी ते संपूर्णपणे एकरूप झाले आहेत.

 जय जय विठ्ठल/ श्री हरी विठ्ठल/

 विठ्ठल विठ्ठल/ पांडुरंग//

 क्रमशः… १०  

© अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # तू नाही म्हणू नकोस… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # तू नाही म्हणू नकोस… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

#तू नाही म्हणू नकोस.. #

होकार तुझा ऐकण्यासाठी कान माझे आसुसलेले आपल्या त्या पहिल्या भेटी पासूनचे…

चांदण्याचा गालीचा अंथरून बसला चंद्र केव्हाचा अन शालू कितीएक बदलून गेले रात्रीचे…

कुंतलांच्या चुकार बटांनी ओढून धरला तलम पडदा नयनासमोरी रोखण्या रस्ता तुझ्या भावपूर्ण नजरेचा…

तरीही मौनात दडलेला होकार तो तुझेच भावविभोर बोलके डोळे विसरून नाही गेले तेच सांगायचा…

काय पाहशी मजला तू अशी भावुक नजरेने.. तुझ्या अंतरीच्या खळबळलेल्या लाटांची गाज अधरावरी धडकते…

नकाराचा विकल शब्द झुंजत राही अधर विलगण्यास… परी असमर्थ ठरले थरथर ती ओठांची थोपविण्यास..

सांगायचं काय तुला समजले आहे मला एकही शब्द न बोलता. ,. लपविण्याचा तू केलास कितीही आटापिटा तरीही चेहरा तुझा सारं काही बोलून गेला…

मनात जे आहे बोल एकदा मोकळेपणाने..

अडचणींच्या कोंदणात दडलेल्या होकाराला बोलतेस का जाहीरपणे…

अमुर्त नात्याला मुर्त रूप देण्याचा अवधी जवळी आला.. एक होकार तुझा ऐकण्यासाठी जीव आतुरला…

माझ्या तनमनाला दिठी बसावी तुझ्या होकाराची मिठी.. हिच आहे मनीची आस…

विलंब लाविलास होकार देण्यास तरी माझी त्याला ना नाही..

नाही सांगितलसं तरीही मी समजून घेईन… असतात काही गोष्टी बऱ्याच अडचणींच्या मुक्तपणे बोलता येत नसताना.. होकार देण्याची अडचण तुझी मला समजली.. पण पण माझीही एक हळवी

अट इतकीच कि तू मला कधीच नाही म्हणू नकोस हं!

##

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – क्षण सृजनाचा ☆ ‘राष्ट्रीय सुरक्षितता सप्ताह..’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

☆ क्षण सृजनाचा ☆ ‘राष्ट्रीय सुरक्षितता सप्ताह..’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे

प्रतिवर्षी ४ ते १० मार्च या काळात ‘राष्ट्रीय सुरक्षितता सप्ताह’ देशभर साजरा केला जातो. औद्योगिक क्षेत्रात याचे विशेष महत्व आहे. या वर्षीच्या- आजच्या ४मार्चला सुरू होत असलेल्या – सुरक्षितता सप्ताहानिमित्त वाचकांना एका कवितेची अल्पशी भेट आणि सर्वांना सुरक्षित जीवन लाभावे ही ईश्वरचरणी ‘यंत्रदासा’ची मनोमन प्रार्थना.

☆ तुझा तूच त्राता ☆

पहा मानवा, यंत्रक्रांतीमुळे आज

मानेवरी बैसली जोखडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।धृ।।

 *

जसा लागला शोध चक्रा-गतीचा

जगाने गती घेतली केवढी

कुणाला नसे थांबण्या वेळ आता

मढ्यांना इथे स्वस्थता तेवढी!

अशा जीवघेण्या प्रवाहातुनीही

तुला जायचे पैलतीराकडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।१।।

 *

किती वादळी वेग हे वाहनांचे

तयातून जाणेच आहे सुखे

वितीचे तुझे पोट! जे जाळण्याला

पडे खेळणे अग्निसंगे इथे

तरी पाळ सारे इशारे दिलेले

जराही नको वागणे वाकडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।२।।

 *

पहा, वाहते गोगलीशंख पाठी

ढके वादळी उंटनाका सुखे

अती दक्षतेने चले सूरवंट

मधूमक्षिकांची पहा कौतुके

वनी अस्वलेभाकऱ्या साठवीती

मनू का असे हीन त्यांच्या पुढे?

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।३।।

 *

तुझा तूच त्राता, नसे अन्य कोणी

मनी जाण हे सत्य जे सांगतो

अती दक्षतेने सदा वागतो जो

तयाचीच चिंता हरी वाहतो!

न घे काळजी देह, यंत्रा-धनाची

असा जीव देवा कदा नावडे

सुरक्षीतता पाहणे काम तूझे

जरी ध्यान कोणी न दे त्याकडे।।४।।

🙏🏽

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ मृत्युला सामोरं जाताना… –  लेखिका : ज्योती रानडे ☆ प्रस्तुती – उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

? जीवनरंग ?

☆ मृत्युला सामोरं जाताना… –  लेखिका : ज्योती रानडे ☆ प्रस्तुती – उज्ज्वला केळकर

– एक बोधकथा

आजी तिचं आयुष्य तिनं केलेल्या आयुष्याच्या नियमाप्रमाणे जगली. सत्तरीत फुलांचे हार करून देवाला घालताना ती सुईत दोरा कसा ओवू शकायची हे तिचं तिलाच माहित! पोथी वाचताना डोळ्यातून आसवं का गाळायची हे पण तिचं तिलाच माहित. कामाच्या सरूबाईचा काळा निळा झालेला दंड बघून “सरू, सोड त्याला आता” म्हणून कडाकडा बोलताना ती रागवायची का हळवी व्हायची हे पण तिचं तिलाच माहित!

काही का असेना.. तिच्यातील सच्चेपणा मात्र प्रत्येकाला जाणवत असे. स्वत:ला जे पटतं तेच करण्याची तिची जी धडपड चाले ती बघून घर दार थक्क होत असे. वयाला तिनं कधीच प्राधान्य दिलं नाही. जोवर हात पाय चालत आहेत तोवर आपण कुठलीही गोष्ट करू शकतो हा गाढा विश्वास तिच्याजवळ होता. वर्तमानपत्रात “तुमची आजी” सदर लिहणे काय, पंचाहत्तर वर्षाला स्पॅनिश भाषा शिकणं काय किंवा कराटेचा क्लास लावणं काय.. सारं तिला शोभून दिसायचं.

तिनं स्वत:च्या मृत्युपत्रात लिहून ठेवलं होतं की कुठल्याही परीस्थितीत मला हॅास्पिटलमध्ये नळ्या जोडलेल्या अवस्थेत ठेवू नका. काय वाट्टेल ते झालं तरी. मी माझं आयुष्य माझ्या पध्दतीने जगले आहे आणि माझा मृत्युपण मला हवा तसाच यावा अशी माझी इच्छा आहे! नैसर्गिक पणे येणारा मृत्यु शरीर सुध्दा फार त्रास न होता स्वीकारतं अशी तिची खात्री होती.

आता आजी ऐशीला टेकली होती. पण मनाने वाकली नव्हती. हल्ली शरीर मात्र तिच्या दुर्दम्य इच्छा शक्तीला दाद देत नव्हतं.

एक दिवस सकाळी रोजनिशी लिहित बसलेली असताना ती अचानक जमिनीवर कोसळली…त्या आवाजाने मुलगा व सून धावत आले! त्यांनी क्षणभर विचार केला व तिला ॲंब्युलन्स बोलवून जवळच्या हॅास्पिटलला नेले.

डॉक्टरांनी त्वरीत उपचार करून अर्धांगापासून होणारे नुकसान थांबवण्याचा प्रयत्न केला तरी शरीराची उजवी बाजू पहिल्यासारखी होऊ शकली नाही.. जीव मात्र वाचला होता.

आजी शुद्धीवर आली व स्वत:ला नळ्या जोडलेल्या स्थितीत हॉस्पिटल मधल्या ICU मधे बघताच तिला हे स्वप्न असावं असं वाटलं. तिने स्वत:ला एक चिमटा काढला.. आणि हे स्वप्न नसून सत्य आहे याची तिला जाणीव झाली.

ती भडकली…

मुलगा येताच त्याला म्हणाली, “माझी काय इच्छा होती तुला माहित होतं.. पक्कं माहित होतं. माझ्या व ईश्वराच्या भेटीच्या आड येण्याचा अधिकार तुला कोणी दिला? ”

“अग आई, तू कशामुळे पडलीस हे तरी बघायला नको का? बघ उजवा हात नीट चालत नाही या व्यतिरिक्त तू ठणठणीत आहेस. ” मुलगा काकुळतीला येऊन बोलत होता. “आई, तुला वैद्यकिय उपचार दिले नसते तर तू कदाचित पूर्ण लुळी पांगळी झाली असतीस. त्याचा तुला किती त्रास झाला असता सांग बरं! ” मुलगा समजूत काढत होता.

आजी काही बोलली नाही. ती घरी आली पण घरी आलेली व्यक्ती आजीपेक्षा कुणी वेगळीच होती. रोजनिशी लिहिण्यासाठी हात वळत नव्हता.. प्रसादाचा शिरा अन् खमंग परतलेल्या बेसनाचे लाडू शेजारी पाजारी पाठवता येत नव्हते.. सुईत दोरा ओवता येत नव्हता आणि पोथी वाचण्याआधीच आसवं गळत होती.. तिच्यातलं चैतन्य हरपू लागलं होतं.. ती शुन्यात बघत अंथरुणात पडून रहात होती..

एक दिवस अशीच नैराश्यात पडून असताना तिनं खिडकीतून बाहेर बघितलं.. तीन पायावर चालणारा कुत्रा बघून तिला कौतुक वाटलं… फारसं उडता न येणारा एक पक्षी बागेत थोडं थोडं उडून चारा गोळा करत होता.. नातवानं त्याच्या फोनवर हात नसलेला माणूस पायाने लिहताना दाखवला…

स्वत:चं दु:ख कुरवाळत बसणाऱ्या मनाचा तिला राग आला. आपण कोणी न्यारे नाही! झाडाची फांदी तुटते, पक्षी उडू शकत नाही, कुत्र्याचा पाय तुटतो पण म्हणून ते काही निराश होऊन पडून रहात नाहीत. याच निसर्गाचा आपण एक भाग आहोत. शरीर नाशवंत आहेच! पण मी म्हणजे माझं शरीर नाही!

ती उठली व पूर्वीसारखी तयार झाली.. सुनेनं आश्चर्याने तिच्याकडे बघितलं..

तिनं रोजनिशीची वही घेतली.. डाव्या हातानं रोजनिशी लिहायचा प्रयत्न चालू केला. वेडीवाकडी लहान मुलासारखी लिहिलेली अक्षरे बघून मनापासून हसली.. तिनं ठरवलं की डाव्या हातानेच इतकं सुंदर लिहायचं की सर्वांनी बघत रहावं. एकदा मनाने घेतलं की शरीर पण साथ देऊ लागतं.. डाव्या हाताने परत एकदा श्रीगणेशा सुरू झाला.. जशी अक्षरं सुधारू लागली तशी तिच्या डोळ्यातील चमक वाढू वागली.

तिनं मुलाला जवळ बोलावलं.

“तुझं काही चुकलं नाही रे! माझी आई अशी पडली असती तर मी पण तिला लगेच डॅाक्टर कडेच नेलं असतं.. तू नाही आलास माझ्या व ईश्वराच्या मधे.. अजून ईश्वराला भेटायची वेळ आलेली नाही. रागाच्या भरात बोलले मी.. माफ कर मला! ” मुलाच्या डोळ्यातून येणारं पाणी पुसत ती त्याला म्हणाली, “ज्या वयात उद्याची खात्री नाही त्या वयात सहा महिने मी नैराश्यात वाया घालवले! ”

तिनं वर्तमानपत्रात पाठवण्यासाठी लेख लिहायला घेतला..

मृत्युला सामोरं जाताना..

नुकतीच मी वर जाऊन दार ठोठावून आले आहे. परत आले म्हणून चार गोष्टी सांगते.. अर्धांगाचे निदान झाले आणि माझे मन भरकटले.

कसं मरण हवं असतं माणसाला? शांत, भीतीरहित, झोपेत, नकळत! डॉक्टर नको, हॉस्पिटल नको, नळ्या जोडलेल्या नकोत, व्हेंटिलेटर नको वगैरे लिहणं सोपं असतं.. पण खरी इमर्जन्सी जेव्हा उद्भवते तेव्हा आपण कुठलाच निर्णय घेण्याच्या परिस्थितीत नसतो.. अशा परिस्थितीत आपला ज्याच्यावर पूर्ण विश्वास आहे अशा व्यक्तीला पुढचे निर्णय घेण्यासाठी नेमा. तुमचं मन वाचणारी अशी व्यक्ती तुमच्या आयुष्यात असावी यासाठी हात पाय धड असताना सतत प्रयत्न करा. मुलगा, सून, नातवंड यांच्याशी अत्यंत विश्वासाचं नात आधीच निर्माण करा.

त्यानंतर मात्र जे घडेल तिच देवाची इच्छा होती हे समजून घ्या.. पण इतरांवर व स्वत:वर रागवण्यात वेळ घालवू नका..

शरीर नश्वर आहे. असेना का! शरीराला झाली इजा, मला नाही हे सतत स्वतःला सांगा.. तुम्ही म्हणजे तुमचे शरीर नाही. तुम्ही म्हणजे तुमची अर्धांगाने लुळी पडलेली बाजू नाही आणि तुम्ही म्हणजे तुमच्या व्याधी नाहीत हे समजून घ्यायचा प्रयत्न करत रहा.

जे त्याने दिले ते घ्यायचे व त्यातील सौंदर्य शोधायचं! मला कधी वाटले नव्हते की डाव्या हाताने मी लिहू शकेन.

आयुष्य शेवटच्या श्वासापर्यंत जगायचं असतं.. राग, लोभ, हेवे दावे, मान-अपमान यात वाया घालवायचं नसतं!

काल मी तीन पायावर चालणारा कुत्रा बघितला. तो नाही हो रडत बसत. तो उठून अन्नाच्या शोधात हिंडत होता मग आपण आपल्या शरीराकडे बघून का रडत बसायचे?

आलेला दिवस आनंदात घालवा. सांभाळून रहा.

– तुमची आजी

तिनं पेन बंद केलं व सुनबाईला सांगितलं, “आज मी शिरा करते ग.. नैवेद्याला! जमेल मला डाव्या हाताने करायला!

 

लेखिका : ज्योती रानडे

प्रस्तुती :  उज्ज्वला केळकर 

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈संपादक –  श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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