हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९१ ☆ भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९१ ☆

भारतीय संस्कृति से जुड़ा मानसून आगमन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

मानसून भारतीय जीवन का केवल एक मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति के सुंदर मिलन का पर्व है। वर्षा की पहली फुहार के साथ ही धरती नवजीवन से भर उठती है और वातावरण में हरियाली का संदेश फैलने लगता है। यही कारण है कि पौधारोपण के लिए वर्षाकाल को सबसे उपयुक्त समय माना गया है।

पौधे लगाने से पूर्व भूमि की तैयारी, जैविक खाद का उपयोग तथा स्थानीय जलवायु के अनुकूल पौधों का चयन आवश्यक है। वर्षा का प्राकृतिक जल पौधों की जड़ों को मजबूती देता है और उनके विकास में सहायक बनता है। किंतु पौधारोपण का वास्तविक उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि उनकी देखभाल कर उन्हें वृक्ष बनने तक संरक्षित रखना है।

भारतीय संस्कृति में भी वर्षा और हरियाली का विशेष महत्व रहा है। सावन, हरियाली अमावस्या, तीज तथा नागपंचमी जैसे पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना को सुदृढ़ करते हैं। हमारे लोकगीतों, लोकपरंपराओं और धार्मिक मान्यताओं में वृक्षों को जीवनदाता और पुण्य का प्रतीक माना गया है। इस प्रकार मानसून की रिमझिम फुहारें केवल खेतों और बागों को ही नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी सिंचित करती हैं।

आज आवश्यकता है कि हम वर्षा ऋतु को केवल मौसम परिवर्तन के रूप में न देखें, बल्कि इसे हरियाली बढ़ाने और प्रकृति से अपने संबंधों को मजबूत करने के अवसर के रूप में अपनाएँ। एक पौधा लगाना पर्यावरण संरक्षण का कार्य है, तो उसकी देखभाल करना संस्कृति और संवेदना का निर्वाह। वास्तव में वर्षा, वृक्ष और संस्कृति का यह संगम जीवन को संतुलित, सुंदर और समृद्ध बनाता है।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अकेले आंगन का बचपन: एकल परिवारों में परवरिश का बदलता सच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ अकेले आंगन का बचपन: एकल परिवारों में परवरिश का बदलता सच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

अकेले आंगन का बचपन: एकल परिवारों में परवरिश का बदलता सच

संयुक्त परिवारों के सुरक्षा कवच से डिजिटल स्क्रीन तक: न्यूक्लियर पेरेंटिंग की चुनौतियाँ और समाधान

 

“दादी, आप हमारे साथ क्यों नहीं रहतीं?”

सात साल की नन्ही अन्वी ने वीडियो कॉल पर पूछा।

दादी मुस्कुराईं, लेकिन उनकी आँखों में हल्की नमी उतर आई।

“बेटा, तुम्हारे पापा का काम दूसरे शहर में है न।”

“अगर आप यहाँ होतीं तो कितना अच्छा होता। मम्मी ऑफिस जाती हैं, पापा भी व्यस्त रहते हैं। मैं स्कूल से आकर कभी-कभी अकेली हो जाती हूँ।”

दादी कुछ क्षण चुप रहीं।

फिर बोलीं, “जब तुम्हारे पापा छोटे थे तो घर में इतने लोग होते थे कि उन्हें अकेले रहने का मौका ही नहीं मिलता था।”

अन्वी ने मासूमियत से पूछा, “सच?”

“हाँ बेटा, तब घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन सब साथ रहते थे।”

कॉल समाप्त हो गई, लेकिन यह छोटी-सी बातचीत आज के समय की एक बड़ी सच्चाई को सामने लाती है।

हमारे घर बड़े होते जा रहे हैं, लेकिन परिवार छोटे होते जा रहे हैं।

सुविधाएँ बढ़ रही हैं, लेकिन साथ घट रहा है।

 

और शायद सबसे बड़ा बदलाव बच्चों के बचपन में दिखाई दे रहा है।

एक समय था जब बच्चे केवल माता-पिता के नहीं, पूरे परिवार के होते थे। उनकी शरारतों पर दादी हँसती थीं, गलतियों पर चाचा समझाते थे और उदासी के समय कोई न कोई उनका हाथ थाम लेता था।

 

सच ही कहा गया है –

“एक बच्चे को बड़ा करने के लिए पूरे गाँव की जरूरत होती है।”

लेकिन आज अधिकांश परिवार न्यूक्लियर हो चुके हैं। माता-पिता और बच्चे – बस यही परिवार की परिभाषा रह गई है।

इस बदलाव ने अनेक सुविधाएँ दी हैं।

 

माता-पिता अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सकते हैं। बच्चों की शिक्षा, खान-पान और जीवनशैली को अपनी सोच के अनुसार आकार दे सकते हैं। पारिवारिक हस्तक्षेप कम होता है और निजी स्वतंत्रता अधिक मिलती है।

 

लेकिन हर सुविधा की एक कीमत भी होती है।

न्यूक्लियर परिवारों की सबसे बड़ी चुनौती है – अकेलापन।

बच्चों का भी और माता-पिता का भी।

 

आज का बच्चा स्कूल से लौटकर अक्सर खाली घर में प्रवेश करता है। उसके स्वागत में दादी की आवाज़ नहीं होती, न चाचा की हँसी और न ही भाई-बहनों की भीड़।

ऐसे में उसके सबसे आसान साथी बन जाते हैं – मोबाइल, टैबलेट और टेलीविजन। धीरे-धीरे स्क्रीन नया परिवार बन जाती है।

यहीं से एक नया संकट जन्म लेता है।

डिजिटल दुनिया बच्चों का समय तो भर देती है, लेकिन भावनात्मक खालीपन नहीं भर पाती।

सोशल मीडिया दोस्ती का भ्रम दे सकता है, लेकिन कंधे पर रखा हुआ स्नेहिल हाथ नहीं दे सकता।

वीडियो गेम उत्साह दे सकते हैं, लेकिन साझा बचपन की यादें नहीं दे सकते।

 

संयुक्त परिवारों में बच्चे स्वाभाविक रूप से साझा करना सीखते थे। खिलौने भी साझा होते थे और जिम्मेदारियाँ भी। वे अलग-अलग उम्र के लोगों के साथ रहकर धैर्य, संवेदनशीलता और सामाजिक व्यवहार सीखते थे।

 

आज कई बच्चों के पास अपने खिलौने बहुत हैं, लेकिन खेलने वाले साथी कम हैं।

यह केवल बच्चों की समस्या नहीं है।

माता-पिता भी एक अलग संघर्ष से गुजर रहे हैं।

आधुनिक जीवन ने उन्हें अनेक भूमिकाएँ दे दी हैं।

वे कमाने वाले भी हैं, शिक्षक भी, मित्र भी, सलाहकार भी और हर समय उपलब्ध रहने वाले अभिभावक भी।

 

नतीजा यह है कि अनेक माता-पिता मानसिक थकान और तनाव का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञ इसे “पैरेंटल बर्नआउट” कहते हैं। कई बार माता-पिता अपराधबोध से भी घिर जाते हैं।

उन्हें लगता है कि वे बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे।

बच्चों को लगता है कि माता-पिता उन्हें नहीं समझते।

और इस तरह एक ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि संयुक्त परिवार ही एकमात्र समाधान हैं?

शायद नहीं।

 

समय बदल चुका है। हर परिवार संयुक्त परिवार में नहीं रह सकता। लेकिन संयुक्त परिवारों की कुछ खूबियाँ आज भी अपनाई जा सकती हैं।

 

सबसे पहले हमें अपने बच्चों के लिए एक “आधुनिक गाँव” बनाना होगा। ऐसा गाँव जहाँ रिश्तेदार न सही, लेकिन भरोसेमंद लोग हों। दादा-दादी दूर रहते हों तो नियमित संवाद हो। पड़ोसी, शिक्षक, कोच और  परिवार के मित्र भी बच्चे के जीवन का हिस्सा बनें। बच्चों को यह महसूस होना चाहिए कि उनके जीवन में केवल दो नहीं, कई ऐसे लोग हैं जिन पर वे भरोसा कर सकते हैं।

दूसरी बात, परिवार के भीतर गुणवत्तापूर्ण समय बढ़ाना होगा। कई बार बच्चों को घंटों का साथ नहीं चाहिए होता।

 

उन्हें कुछ ऐसे पल चाहिए होते हैं जब माता-पिता पूरी तरह उनके साथ हों।

एक साथ भोजन करना।

दिनभर की बातें सुनना।

सप्ताहांत में पार्क जाना।

रात को सोने से पहले कहानी सुनाना।

 

ये छोटी बातें बच्चों के मन में सुरक्षा का बड़ा भाव पैदा करती हैं।

तीसरी बात, हमें स्क्रीन को बेबीसिटर बनने से रोकना होगा। तकनीक आवश्यक है, लेकिन वह रिश्तों का विकल्प नहीं बन सकती। बच्चों को किताबों, खेलों, संगीत, प्रकृति और वास्तविक अनुभवों से जोड़ना होगा।

 

क्योंकि जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीखें किसी ऐप से नहीं, अनुभवों से मिलती हैं।

अंततः परवरिश केवल बच्चों को बड़ा करने का नाम नहीं है।

यह उनके भीतर आत्मविश्वास, संवेदनशीलता और जीवन के प्रति भरोसा जगाने की प्रक्रिया है।

संयुक्त परिवारों में यह काम कई हाथ मिलकर करते थे। आज एकल परिवारों में यह जिम्मेदारी कुछ कंधों पर आ गई है।

 

लेकिन यदि हम रिश्तों का दायरा थोड़ा बढ़ा दें, संवाद को थोड़ा गहरा कर दें और बच्चों को स्क्रीन से अधिक इंसानों से जोड़ दें, तो यह चुनौती अवसर में बदल सकती है।

क्योंकि

बच्चे केवल घरों में नहीं पलते। वे रिश्तों में पलते हैं। और जहाँ रिश्तों की गर्माहट होती है, वहाँ अकेला आँगन भी धीरे-धीरे फिर से खिल उठता है।

 

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ – आलेख – सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना है यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय आलेख “सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना है यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४९ 

आलेख –सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना है यानी अपनी रचनात्मकता को खत्म करना ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

          ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो हमें दुनिया भर के लोगों से जुड़ने, जानकारी साझा करने और अपनी राय रखने की अनुमति देता है. यह एक शक्तिशाली उपकरण है जिसका उपयोग अच्छे और बुरे दोनों के लिए किया जा सकता है. हालांकि, सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग हमारी रचनात्मकता को खत्म कर सकता है.

सोशल मीडिया पर हम हर समय नई चीजें देख रहे होते हैं. हम दूसरों की पोस्ट देख रहे होते हैं, हम उनके विचारों और राय पढ़ रहे होते हैं, और हम उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. यह सब इतना अधिक हो सकता है कि हमें खुद के विचारों और राय उत्पन्न करने का समय नहीं मिलता है. हम दूसरों के विचारों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि हम अपनी रचनात्मकता को खो देते हैं.

सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग हमारी एकाग्रता को भी प्रभावित करता है. जब हम सोशल मीडिया पर होते हैं, तो हम लगातार नए अपडेट देखने के लिए स्क्रॉल करते रहते हैं. इससे हमारा ध्यान भंग होता है और हम अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं. यह हमारी रचनात्मकता को भी प्रभावित करता है क्योंकि हम नए विचारों को उत्पन्न करने में सक्षम नहीं होते हैं.

यदि आप अपनी रचनात्मकता को बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करने की आवश्यकता है. आपको अपने समय को उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो आपको रचनात्मक बनाती हैं, जैसे कि पढ़ना, लिखना, चित्र बनाना, या संगीत सुनना. आपको सोशल मीडिया पर केवल उन समयों पर जाना चाहिए जब आपको वास्तव में इसकी आवश्यकता हो.

यहां कुछ उदाहरण दिए गए हैं कि कैसे सोशल मीडिया आपकी रचनात्मकता को खत्म कर सकता है:

जब आप सोशल मीडिया पर होते हैं, तो आप लगातार नए अपडेट देखने के लिए स्क्रॉल करते रहते हैं. इससे आपका ध्यान भंग होता है और आप अपने काम पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं.

सोशल मीडिया पर आप हर समय नई चीजें देख रहे होते हैं. आप दूसरों की पोस्ट देख रहे होते हैं, आप उनके विचारों और राय पढ़ रहे होते हैं, और आप उनसे जुड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं. यह सब इतना अधिक हो सकता है कि आपको खुद के विचारों और राय उत्पन्न करने का समय नहीं मिलता है. आप दूसरों के विचारों से इतना प्रभावित हो जाते हैं कि आप अपनी रचनात्मकता को खो देते हैं.

सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग आपके तनाव और चिंता को भी बढ़ा सकता है. जब आप सोशल मीडिया पर होते हैं, तो आप लगातार दूसरों की तुलना कर रहे होते हैं. आप देख रहे होते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, वे क्या खरीद रहे हैं, और वे कहां जा रहे हैं. यह आपको असुरक्षित और तनावग्रस्त महसूस करा सकता है.

यदि आप अपनी रचनात्मकता को बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करने की आवश्यकता है. आपको अपने समय को उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो आपको रचनात्मक बनाती हैं, जैसे कि पढ़ना, लिखना, चित्र बनाना, या संगीत सुनना. आपको सोशल मीडिया पर केवल उन समयों पर जाना चाहिए जब आपको वास्तव में इसकी आवश्यकता हो.

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© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

22-08-2023

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२९ ⇒ || रोंगटे || ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “|| रोंगटे ||।)

?अभी अभी # १०२९ ⇒ आलेख – || रोंगटे || ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(GOOSE BUMPS)

हमारा शरीर भी विचित्र है। हमारी त्वचा में असंख्य रोमकूप हैं। जो भक्त होते हैं, उनके रोम रोम में राम व्याप्त होते हैं। हम जब अनजाने में, तनिक से स्पर्श से सिहर उठते हैं, तो ये भी अपनी अपनी हैसियत के अनुसार सक्रिय हो जाते हैं। इन्हें हम रोएँ भी कहते हैं।

हमारे रोमांच में रोम का बड़ा हाथ होता है। Rome was not built in a day.

भारतीय नाट्य शास्त्र में केवल भाव भंगिमा से ही मन में उत्पन्न सभी भावों का सजीव चित्रण किया जाता है। चेहरे पर संचारी भावों का सफलतापूर्वक प्रदर्शन ही तो नृत्य है। जिनमें श्रृंगार, शांत, भय, रौद्र, वीर और वीभत्स रस भी शामिल है। कहीं नटवर है तो कहीं नटराज। वैसे भी तांडव नृत्य मंच पर ही देखना अच्छा लगता है।।

हम भी अजीब हैं। जब हमें गुस्सा आता है, तो हमारे तेवर देखिए और जब हम खुद डर जाते हैं, तो हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मानो उन्हें कक्षा में मास्टर जी ने जोर से डांटकर फटकारा हो, ऐ मिस्टर तुम ! खड़े हो जाओ। स्कूल में क्या नींद निकालने के लिए आते हो।

ये रोंगटे भी अजीब हैं। यूँ तो आराम से सोते रहेंगे, लेकिन जरा भी खतरे की घंटी बजी, तो खड़े हो जाते हैं, जैसे अफसर की घंटी से बाहर स्टूल पर ऊंघता चपरासी झट से आया साहब कहता हुआ खड़ा हो जाता है।।

क्या डर के मारे खड़े हुए रोंगटे किसी मास्टर जी के आदेश की प्रतिक्षा करते रहते हैं, कि ठीक है, बैठ जाओ, या खड़े ही रहते हैं। यह भी एक पहेली ही है। पहेली तो वैसे यह भी है कि ये संख्या में कितने हैं और इनकी आपस में एकता देखिए, मुसीबत में, या भय की स्थिति में, सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। और जब संकट टल जाता है, तब सभी निश्चिंत होकर एक साथ चैन से बैठ जाते हैं।

आप भी कभी डरे होगे, आपके भी रोंगटे खड़े होते होंगे। कभी इनसे बात कीजिए, इनके हालचाल पूछिए। आप कैसे हैं मिस्टर रोंगटे ! इनकी संख्या कितनी है और ये शरीर में कहाँ कहाँ विराजमान हैं, इन्हें कोई तकलीफ तो नहीं?

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२८ ⇒ गो ब र ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गो ब र।)

?अभी अभी # १०२८ ⇒ आलेख – गो ब र ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

गो ग्रीन के बाद जब गो ऑर्गेनिक का अभियान चला तब मुझे गाय,गोबर और गांव की याद सताने लगी । हम नर्मदा का जल पीने वाले नल से नहाते वक्त नर्मदे हर और कभी कभी हर हर गंगे बोल लेते हैं । यहां गांव में गौरी आसानी से मिल जाती है,गंगा नहीं । गांव में हमने कभी गोबर से परहेज़ नहीं किया ,क्योंकि पूरा कच्चा घर गोबर से ही लीपा जाता था । जब से शहर आए,आज यह हालत है कि गाय और गोबर दोनों के लिए तरस गए ।

शुरू में कुछ पता नहीं चला ! धीरे धीरे सब्जियों से स्वाद गायब होता चला गया । जो सब्जियां बिना मसाले के अच्छी और स्वादिष्ट बनती थी,उनकी गुणवत्ता छुपाने के लिए तरह तरह के मसाले डाले जाने लगे । लोग सब्जियों का स्वाद भूल गए बस मसालों में उलझ गए । होटलों में गए,मलाई कोफ्ता और काजू करी बुलाई,दो तीन नान बुलाई,और उंगलियां चाटते हुए घर आ गए । इसमें सब्जी कहां,बस घी,मक्खन और मलाई । तभी मोटे हो रहे हैं मोटा भाई ।।

रासायनिक खाद अपना ज़हरीला प्रभाव तो छोड़ेगी ही । खाने के साथ वही ज़हर शरीर में जाता है,और बीमारियां पनपने लगती हैं । पता ही नहीं चलता,और अन्दर ही अन्दर कैंसर जैसी बीमारी घर कर लेती है । आर्थिक अभाव और जागरूकता की कमी के कारण जो मिल गया,उसी को मुकद्दर समझ कर खा लिया और प्रभु का गुण गा लिया ।

गाय का गुणगान करिये,भैंस का दुग्धपान करिये । भैंस के दूध की हमारे देश में ज़्यादा खपत है । उसमें मलाई अधिक जो आती है । देसी गाय का स्थान जर्सी गाय ने ले लिया,क्योंकि वह दूध अधिक देती है । दुधारू गाय किसे बुरी लगती है ।

दूध पर गाय का कॉपीराइट नहीं ! दूध तो बकरी भी देती है और ऊंटनी भी । सुना है,शेरनी भी अपने बच्चों को दूध ही पिलाती है,इसीलिए उसके बच्चे शेर बच्चे निकलते हैं । गोबर पर गाय का कॉपीराइट है । गोबर शब्द में ही गो समाया हुआ है । यों तो भैंस भी गोबर ही देती है लेकिन वह भी गोबर ही कहलाता है । जिसमें अक्ल ज़्यादा होती है, दुनिया में उसी की पूछ होती है । बस एक इंसान ही ऐसा प्राणी है, जिसकी पूंछ न होते हुए भी इतनी पूछ परख होती है ।।

सुना है इस बार की होली लकड़ी से नहीं, गोबर के कंडों से जलाई गई । अगर पर्यावरण बचाना है,तो वृक्षों को काटने से बचाना होगा । बचपन में बड़ा बुरा लगता था,जब सबक याद नहीं होने पर मास्टरजी क्लास में खड़ा करके कहते थे, तुम्हारे दिमाग में गोबर भरा है । आज सोचता हूं,जिस दिमाग में गोबर भरा होगा,वह कितना उर्वरक यानी fertile होगा । गो ऑर्गेनिक, ग्रो ऑर्गेनिक, थिंक ऑर्गेनिक …!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२७ ⇒ एक दिन पिता का ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक दिन पिता का।)

?अभी अभी # १०२७ ⇒ आलेख – एक दिन पिता का ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

 father’s day

माता पिता का बराबरी का सौदा होता है,अगर मदर्स डे है तो फादर्स डे भी । महिला दिवस की तर्ज पर पुरुष दिवस कब मनाया जाता है,शायद इन तथाकथित “days” यानी “दिनों” का कोई कैलेंडर उपलब्ध हो, क्योंकि कभी कभी तो एक ही दिन में दो दो days टपक जाते है ।

खैर हमें इससे क्या,जिस तरह सुबह होती है,शाम होती है, इसी तरह कोई ना कोई day आता है,और चला जाता है । ऐसे ही पितृ दिवस यानी फादर्स डे कब आया और कब चला गया,हमें पता ही नहीं चला । हम भी कभी पिता थे,अब तो लोगों ने हमें अंकल से नाना जी और दादाजी बना दिया है ।।

हमने पिता को तो देखा है,लेकिन कभी परम पिता को नहीं देखा । पिता का और हमारा साथ 33 वर्ष का ही रहा । उसके बाद एक दिन हमारे पिता,परम पिता में विलीन हो गए, यानी हमारे सर से पिता का साया छिन गया और पिछले 42 वर्ष से हमें पिता का प्यार नहीं मिला । तब से हमने परम पिता को ही अपना पिता मान लिया है।

ईश्वर एक है,आप उसे खुदा कहें अथवा परम पिता परमेश्वर । लेकिन जिन अभागों ने अपने बाप को बाप नहीं माना,वे किसी पत्थर की मूरत को भगवान कैसे मान लेंगे । वास्तव में सबका मालिक एक का मतलब भी यही है,सबका बाप एक ।।

जिस तरह ईश्वर एक है,उसी तरह माता -पिता एक इकाई है,एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,दोनों एक दूसरे के पूरक हैं , और शायद इसीलिए उन्हें सम्मिलित रूप से पालक का दर्जा दिया गया है और साफ साफ शब्दों में कह दिया गया है ,”त्वमेव माता च पिता त्वमेव” । अंग्रेजी में एक शब्द है spouse, जिसका प्रयोग पति पत्नी दोनों के लिए किया जाता है,यानी दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं ।

पिताजी के गुजर जाने के बाद,जब तक माता का साया सर पर रहा,पिताजी का अभाव इतना नहीं खला,लेकिन मां के गुजर जाने के बाद महसूस हुआ,एक अनाथ किसे कहते हैं,और तब केवल नाथों के नाथ जगन्नाथ की शरण में जाना ही पड़ा । क्योंकि वही तो पूरे जगत का नाथ है ।।

जिंदगी तो ठहरती नहीं,लेकिन वक्त ठहर सा जाता है । अतीत में झांकने से अब क्या हासिल होना है, हां एक पछतावा जरूर होता है,क्योंकि हमने भी माता पिता की कदर जानी ना,हो कदर जानी ना ।

शायद इसीलिए हमारी संस्कृति में पितृ पक्ष की व्यवस्था भी है । उस पखवाड़े में श्रद्धा के प्रतीक स्वरूप ही श्राद्ध कर्म किया जाता है । श्रद्धा का अर्पण ही वास्तविक तर्पण है । पछतावे की भरपाई है । भूल चूक लेनी देनी का सत्यापन है । उनके प्रति नतमस्तक होना ,उस परम पिता परमेश्वर के समक्ष नतमस्तक होने के बराबर है । आज की पीढ़ी के लिए ही शायद यह गीत लिखा गया है ;

ले लो दुआएं

मां बाप की ।

सर से उतरेगी

गठड़ी पाप की ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८२ – देश-परदेश – ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८२ ☆ देश-परदेश – विश्व शरणार्थी दिवस : 20 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

करीब आठ दशक पूर्व,  अंग्रेजों ने भारत के नक्शे पर लकीर खींच कर देश को विभाजित कर दिया था। पारिवारिक बंटवारे होने पर घर और दुकान के बीच एक दीवार खड़े होते हुए तो बहुत बार देखा हैं। धर्म के नाम से बंटवारा होना एक अलग बात होती है।

“जिस तन लागे, सो तन जाने, कोई ना जाने पीर पराई” हमारे परिवार के बड़ों ने उस वेदना को झेला था, इसलिए आज तक गाजे बाजे उसकी चर्चा होती रहती है।

विभाजन का दर्द सबसे अधिक बंगाल, पंजाब और सिंध के लोगों ने झेला था। शरणार्थी बनकर आए अधिकतर लोग पुरुषार्थी बन गए, अल्प समय में अपनी मेहनत और लगन से समाज में ना अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा वापस ली, वरन देश के विभिन्न भागों में बस कर आज दूसरों को भी रोज़गार दे रहें हैं।

अस्सी के दशक के बाद हमारे कश्मीरी भाइयों ने तो बिना विभाजन के अपना घर बार छोड़कर देश के दूसरे भागों में जा कर आपकी जान बचाई थी।

सत्तर के दशक में बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को हमारे देश में पनाह लेनी पड़ी थी हम सब ने उनके नाम से अतिरिक्त टैक्स भरा और कई स्थानों पर तो ये बांग्लादेशी आज भी बसे हुए हैं। हमारे साधनों के उपयोग से फल फूल रहें हैं।

हमारे जैसे शरणार्थी परिवारों से लोग आज भी जब पूछते है, कि आपका गांव कौन सा है ? तब हमारी जुबां वेदना के दर्द का कड़वा घूंट पी कर रह जाती हैं। कुछ लोग तो ये भी पूछ लेते है, गाँव में खेती की कितनी जमीन है ? “सब भूमि गोपाल की” कहकर बात को टाल दिया जाता है।

हमारी आयु के लोग तो सिर्फ बातें सुनकर ही बड़े हुए हैं। धन्य थे हमारे पूर्वज जिन्होंने निजी तौर से उस दर्द से उबर कर हमारा पालन पोषण कर हमें बड़ा किया था।

© श्री राकेश कुमार

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०२६ ⇒ वर्क इज़ वर्शिप ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “वर्क इज़ वर्शिप।)

?अभी अभी # १०२६ ⇒ आलेख – वर्क इज़ वर्शिप ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शीर्षक अंग्रेज़ी में और निबंध हिंदी में ! जी हाँ, कुछ ऐसा ही होता था हमारे ज़माने में। जिसे अंग्रेज़ी नहीं आती थी, वह भी इस मुहावरे का बड़े आत्म-विश्वास के साथ प्रयोग करता देखा जा सकता था। बर्क इज बर्शिप एंड लव इज ब्लाइंड, यू नो।

यह अंग्रेजों का मुहावरा है, जिसका आज़ादी के बाद भारतीयकरण कर दिया गया। वर्क को हिंदी में कर्म कहते हैं। प्रेम की तरह ये दोनों ही ढाई आखर के हैं। इन दोनों हिंदी अंग्रेज़ी शब्दों की केमिस्ट्री देखिये, कितनी मिलती जुलती है। वर्क मने कर्म ! यही हिंदी अंग्रेज़ी प्रेम है, जिसके हम आज भी कायल हैं।।

अंग्रेज़ चले गए, नेहरू छोड़ गए, जिन्होंने वर्क इज़ वर्शिप को आराम हराम है, कर दिया। वे पूजा में नहीं, काम में विश्वास रखते थे। कर्म को ही काम भी कहते हैं। काम ही पूजा है। अगर विश्वास न हो तो खजुराहो का एक ट्रिप मार आएँ, जहाँ रजनीश के अनुसार सभी मूर्तियाँ समाधि अवस्था में हैं।

अंग्रेज़ भारत में पहले कर्म अर्थात् व्यापार करने आए। धंधा अच्छा चल निकला तो कर्म को पूजा से जोड़ दिया। खुद साहब बन बैठे और देश को गुलाम बना दिया। प्रसाद स्वरूप कुछ सिविल सर्वेंट भी बँटवारे के समय भारत में छोड़ गए। जो काम पूजा था, वह सेवा हो गया। आज़ादी के बाद सेवा ही पूजा हो गई।।

हम बड़े धार्मिक लोग हैं। जो सेवा करता है, उसके बदले दान दक्षिणा तो बनती ही है। एक शब्द और, टिप के रूप में, अंग्रेज़ हमें दे गए, बख्शीश ! हमारे आदर्श संस्कारों ने इसे बहुत ज़ल्द मान्यता भी दे दी। करोगे सेवा तो पाओगे मेवा। कर्म ही पूजा है, कर्म ही सेवा है। गीता में श्रीकृष्ण कह गए हैं, हम बिना गीता पढ़े कह सकते हैं, अनासक्त कर्म कर, फल की चिंता तू मत कर। तू मत कर। अरे भोले, अर्जुन सदाशिवराव मतकर !

एक कर्म की दूकान भी होती है, जहाँ कर्म का प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे वर्कशॉप भी कहते हैं। केवल पाठशाला ही नहीं होती, कार्यशाला भी होती है। महिलाओं की शॉपिंग से बढ़कर कोई कर्म नहीं ! ख़ाली दिमाग़ को शैतान का प्रशिक्षण केंद्र अर्थात devil’s workshop भी कहा जाता है। कर्म में कुशलता ही workmanship कहलाती है।।

सेवा ही पूजा है ! हम कितने भी उन्नत और प्रगतिशील क्यों न हो जाएं, लता जी का गीत तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, ही हमारा आदर्श रहेगा। हम पूजा और सेवा को अलग नहीं कर सकते। कर्म को पूजा समझें, या सेवा को पूजा, बात एक ही है।

सच तो यह है कि खाली पेट न तो सेवा होती है, और न ही पूजा। समय, काल और परिस्थिति अनुसार कभी रोटी और प्याज़ तो कभी बर्गर-पिज़्ज़ा ! पेट पूजा काम दूजा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४१ – क्या चल रहा है? ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४१ क्या चल रहा है? … ?

एक विज्ञापन बहुत लोकप्रिय हुआ था, ‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिलता था, ‘फलां-फलां बॉडी-स्प्रे चल रहा है।’ इसी तर्ज़ पर एक मित्र से पूछा,‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिला,‘यही सोच रहा हूँ कि इतना जीवन बीत गया, क्या किया और क्या कर रहा हूँ? जीवन में क्या चल रहा है?’ उत्तर चिंतन को दिशा दे गया।

स्तुतः यह प्रश्न हरेक को अपने आपसे अवश्य करना चाहिए-‘क्या चल रहा है?’ दिन में जितनी बार आईना देखते हो, उतनी बार पूछो खुद से-‘क्या चल रहा है?’ बकौल डॉ. हरिवंशराय बच्चन-‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’ चौबीस घंटे भौतिकता के संचय में डूबा मनुष्य जीवन में भौतिकता का भी उपभोग नहीं कर पाता। संचित धन को निहारने, हसरतें पालने और सब कुछ धरा पर धरा छोड़कर चले जानेवाले से बड़ा बावरा भिखारी और कौन होगा? पीछे दुनिया हँसती है-‘संपदा तो थी पर ज़िंदगी भर ‘मंगता’ ही रहा।’

बड़ा प्रश्न है कि क्या साँसें भी विधाता द्वारा प्रदत्त संपदा नहीं हैं? प्राणवायु अवशोषित करना-कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जित करना, इतना भर नहीं होता साँस लेना। मरीज़ ‘कोमा’ में हो तो रिश्तेदार कहते हैं-‘ कुछ बचा नहीं है, बस किसी तरह साँसें भर रहा है।’ हम में से अधिकांश लोग एक मानसिक ‘कोमा’ में हैं। साँसें भर रहे हैं, समय स्वतः जीवन में कालावधि जोड़ रहा है। काल के आने से पूर्व मिलनेवाली अवधि-कालावधि। हम अपनी सुविधा से ‘काल’ का लोप कर ‘अवधि’ के मोह में पड़े बस साँसें भर रहे हैं। फिर एक दिन एकाएक प्रकट होगा काल और पूछेगा-‘क्या चल रहा है?’ जीवन भर सटीक उत्तर देनेवाला भी काल के आगे हकलाने लगता है, बौरा जाता है, सूझता कुछ भी नहीं।

एक साधु से शिष्य ने पूछा कि क्या कोई ऐसी व्यवस्था की जा सकती है जिसमें मनुष्य की मृत्यु का समय उसे पहले से पता चला जाए। ऐसा हो सके तो हर मनुष्य अपने जीवन में किए जा सकनेवाले कार्यों की सूची बनाकर निश्चित समय में उन्हें पूरा कर सकेगा, मृत्यु के समय किसी तरह का पश्चाताप नहीं रहेगा। साधु ने कहा, ‘जगत का तो मुझे पता नहीं पर तेरी मृत्यु आठ दिन बाद हो जाएगी। सारे काम उससे पहले कर लेना।’ कहकर साधु आठ दिन की यात्रा पर चले गए।  इधर गुरु का वाक्य सुनना भर था कि शिष्य का चेहरा पीला पड़ गया। वह थरथर काँपने लगा। खड़े-खड़े उसे चक्कर आने लगा। कुछ ही मिनटों में उसने खटिया पकड़ ली। खाना-पीना छूट गया, हर क्षण उसे काल सिर पर खड़ा दिखने लगा। आठ दिन में तो वह सूख कर काँटा हो चला। यात्रा से लौटकर गुरु जी ने पूछा, ‘क्यों पुत्र, सब काम पूरे कर लिए न?’ शिष्य सुबकने लगा। आँखों में बहने के लिए जल भी नहीं बचा था। कहा, ‘गुरु जी, कैसे काम और कैसी पूर्ति? मृत्यु के भय से मैं तो अपनी सुध-बुध भी भूल गया हूँ। कुछ ही क्षण बचे हैं, काल बस अब प्राण हरण कर ही लेगा।’ गुरु जी मुस्कराए और बोले, ‘ यदि मृत्यु की पूर्व जानकारी देने की व्यवस्था हो जाए तो जगत की वही स्थिति होगी जो तुम्हारी हुई है।…और हाँ सुनो, तुमसे असत्य बोलने का प्रायश्चित करने मैं आठ दिन की साधना पर गया था।

तुम्हारी और मेरी भी मृत्यु कब होगी, मैं नहीं जानता।’

काल आया भी नहीं था, उसकी काल्पनिक छवि से यह हाल हुआ। वह जब साक्षात सम्मुख होगा तब क्या स्थिति होगी? जीवन ऐसा जिओ कि काल के आगे भी स्मित रूप से जा सको, उसके आगमन का भी आनंद मना सको। जैसा पहले कहा गया-साँस लेना भर नहीं होता जीवन। शब्द है-‘श्वासोच्छवास।’ प्रकृति में कोई भी प्रक्रिया एकांगी नहीं है। लेने के साथ देना भी जुड़ा है। जीवन भर लेने में, बटोरने में लगे रहे, भिखारी बने रहे। संचय होते हुए भी देने का मन बना ही नहीं, दाता कभी बन ही नहीं सके।

जीवन सरकती बालू वाले टाइमर की तरह है। रेत गति से सरक रही है, अवधि रीत रही है। काल निकट और निकट, सन्निकट है। कोई पूछे, न पूछे, बार-बार पूछो अपने आप से- ‘क्या चल रहा है?’ अपने उत्तर आप जानो पर हरेक पर अनिवार्य रूप से लागू होनेवाला मास्टर उत्तर स्मरण रहे-काल चल रहा है।

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे। 🕉️💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख = ☆ २१ जून – अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

ऋषि परंपरा से वैश्विक मंच तक: 21 जून और एक सूत्र में बंधती दुनिया

प्राचीन भारतीय धरोहर से वैश्विक कल्याण तक: ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संकल्प को साकार करता 12वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस

 

“वर्मा जी, आज पार्क में इतनी भीड़ क्यों है?”

सुबह की सैर करते हुए शर्मा जी ने पूछा।

“अरे भाई, आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। देखिए, बच्चे भी आए हैं, युवा भी और बुजुर्ग भी।”

शर्मा जी कुछ देर तक लोगों को योग करते हुए देखते रहे। फिर मुस्कुराकर बोले, “अद्भुत बात है। हजारों साल पहले हमारे ऋषियों ने जंगलों और आश्रमों में जो साधना की थी, आज वही पूरी दुनिया को जोड़ रही है।”

वर्मा जी ने सहमति में सिर हिलाया।

“यही तो भारत की सबसे बड़ी देन है। ऐसा ज्ञान जो किसी एक देश, जाति या धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है।”

उनकी बात सुनकर मन अनायास ही उस भारत की ओर चला जाता है, जहाँ ऋषि-मुनियों ने जीवन को केवल जीने का नहीं, बल्कि समझने का प्रयास किया। उन्होंने शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने की जो विधि खोजी, वही आगे चलकर योग के रूप में विश्व को मिली।

 

आज जब दुनिया 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाती है, तो यह केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं होता। यह उस सांस्कृतिक विरासत का उत्सव होता है जिसने मानवता को जोड़ने का मार्ग दिखाया है।

 

योग का अर्थ ही है – जोड़ना।

शरीर को मन से जोड़ना।

मन को आत्मा से जोड़ना।

और व्यक्ति को समस्त सृष्टि से जोड़ना।

 

शायद यही कारण है कि योग की यात्रा आश्रमों से शुरू होकर आज वैश्विक मंच तक पहुँच चुकी है।

वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारत के प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन देते हुए 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। इसके बाद से हर वर्ष दुनिया के कोने-कोने में लाखों लोग एक साथ योग का अभ्यास करते हैं। यह दृश्य केवल स्वास्थ्य जागरूकता का नहीं, बल्कि वैश्विक एकता का भी प्रतीक है।

भारत की संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” के दर्शन को मानती रही है।

अर्थात् पूरी पृथ्वी एक परिवार है।

आज जब दुनिया युद्धों, तनाव, मानसिक असंतुलन, अकेलेपन और जीवनशैली जनित रोगों से जूझ रही है, तब योग इस दर्शन को व्यवहार में बदलने का माध्यम बनकर सामने आया है।

 

योग किसी सीमा में बंधा हुआ विचार नहीं है।

न यह किसी धर्म का प्रचार है और न किसी विशेष वर्ग का अधिकार।

 

यह तो जीवन को संतुलित बनाने की सार्वभौमिक कला है।

इसी भावना को और अधिक अर्थपूर्ण बनाती है वर्ष 2026 के 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम –

“स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” (Yoga for Healthy Ageing)।

 

यह विषय केवल लंबी उम्र की बात नहीं करता।

यह स्वस्थ, सम्मानजनक और सक्रिय जीवन की बात करता है।

 

आज चिकित्सा विज्ञान ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ा दी है। लोग पहले से अधिक वर्षों तक जीवित रह रहे हैं। लेकिन क्या वे उतने ही स्वस्थ और आत्मनिर्भर भी हैं?

यही प्रश्न आज पूरी दुनिया के सामने है।

बढ़ती उम्र के साथ गठिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्मृति ह्रास, तनाव और अकेलापन जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे समय में योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने का माध्यम बनकर उभरा है।

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि नियमित योगाभ्यास शरीर की लचक बनाए रखने, संतुलन सुधारने, रक्तचाप नियंत्रित करने और मानसिक तनाव को कम करने में अत्यंत प्रभावी है। प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है, ध्यान मानसिक शांति देता है और योगासन शरीर को सक्रिय बनाए रखते हैं।

लेकिन योग की सबसे बड़ी शक्ति उसके शारीरिक लाभों से भी आगे है। आज का मनुष्य पहले से अधिक सुविधासंपन्न है, फिर भी भीतर से बेचैन है।

 

हमारे पास संवाद के अनेक साधन हैं, लेकिन संवाद कम होते जा रहे हैं।

हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन आत्मज्ञान कम होता जा रहा है।

हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन स्वयं से दूर होते जा रहे हैं।

 

योग हमें इसी खोए हुए संतुलन की ओर वापस ले जाता है।

महर्षि पतंजलि ने कहा था – “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् मन की चंचल वृत्तियों को शांत करना ही योग है।

 

यह सूत्र आज उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।

जब हम कुछ क्षणों के लिए अपनी साँसों पर ध्यान देते हैं, तो हम वर्तमान में लौट आते हैं।

जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हम स्वयं से मिलते हैं।

और जब हम स्वयं से जुड़ते हैं, तभी दूसरों से भी सही अर्थों में जुड़ पाते हैं।

 

यही योग का आध्यात्मिक पक्ष है।

यही उसकी वैश्विक शक्ति है।

 

योग हमें सिखाता है कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं है।

जीवन संतुलन का नाम है।

सफलता का भी महत्व है, लेकिन शांति का भी।

प्रगति आवश्यक है, लेकिन स्वास्थ्य भी।

भौतिक समृद्धि जरूरी है, लेकिन मानसिक संतोष भी।

 

आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वस्थ समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।

 

यदि व्यक्ति स्वस्थ होगा तो परिवार स्वस्थ होगा।

परिवार स्वस्थ होगा तो समाज स्वस्थ होगा।

और समाज स्वस्थ होगा तो विश्व में शांति और समरसता का मार्ग प्रशस्त होगा।

 

अंततः 21 जून केवल एक तिथि नहीं है। यह हमें अपनी जड़ों की याद दिलाने वाला दिवस है।

यह हमें बताता है कि भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर सकती है।यह हमें विश्वास दिलाता है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर संतुलन, करुणा और जागरूकता का दीप जलाएँ।

क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है, तब परिवार जुड़ता है। जब परिवार जुड़ते हैं, तब समाज जुड़ता है।

 

और जब समाज जुड़ते हैं, तब सचमुच पूरी दुनिया एक सूत्र में बंध जाती है।

यही योग का संदेश है। यही भारत की विरासत है और यही “वसुधैव कुटुम्बकम्” का साकार रूप है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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