हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३९ – तादात्म्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३९ तादात्म्य… ?

प्रकृति के चौरासी लाख प्राणियों में एक अदृश्य तादात्म्य है। इस तादात्म्य को हर सजीव अनुभव  करता है। इस अनुभूति की तीव्रता परिवेश के आधार पर कम या अधिक हो सकती है। इस तादात्म्य से जुड़ी कुछ घटनाओं का स्मरण हो रहा है।

उस दिन दर्शन के बाद मैं मंदिर से बाहर निकला। सीढ़ियों पर बैठकर जूते के फीते बाँध रहा था। स्पोर्ट्स शूज़ थे, फलत: फीते अधिक लंबे थे और बाँधने की प्रक्रिया में कुछ समय लग रहा था। एक जूता बाँधने  के बाद गरदन ऊपर उठाई तो देखता हूँ कि भूरे रंग का एक श्वान मुश्किल से एक हाथ की दूरी पर आकर खड़ा है। अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे निशब्द देख रहा है। मैंने उसकी आँखों में तैर रहे भावों को पढ़ने का प्रयास किया। फिर स्नेह से पूछा, “क्या बात है? कोई परेशानी है?” वह और निकट आया और अपना चेहरा मेरे घुटनों के पास रगड़ने लगा। मेरे घुटनों के नीचे अपना सिर डालने का प्रयास करने लगा। मैंने प्रेम से उसे अपने पास लिया। उसके चेहरे के बाएँ हिस्से को कुछ देर सहलाया। वह पूँछ हिलाते हुए उसका आनंद लेता रहा।

फिर उससे कहा कि अब दाईं तरफ का चेहरा ला। भाषा से अधिक भाव और संकेत समझ में आते हैं। अब उसके चेहरे का दायाँ भाग सहलाया गया। उसकी पीठ थपकाई और थपथपाई भी।

उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव थे। मैंने कहा, “तेरा काम हो गया न! अब जा।” वह थोड़ी दूर जाकर बैठ गया।

तादात्म्य का ऐसा ही अनुभव प्रचंड ट्रैफिक वाली एक सड़क को पार करते समय आया था। ट्रैफिक कम होने की प्रतीक्षा में जब मैं खड़ा था, मेरे साथ आकर एक श्वान खड़ा हो गया। हम दोनों की आँखें मिली। केवल आँखें मिलने तक मामला नहीं रुका। उसने मेरे साथ कदमताल की और सड़क पार हो गया।

अनुभवों की शृंखला में किसी शिकारी प्रजाति-सी खूँखार दिखती पूरी काली देह और उसमें काँच-सी चमकती पीली आँखों वाली बिल्ली भी याद हो आई। पार्क और एक सरकारी पाठशाला के बीच की साझा दीवार के पास बैठी वह मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी थी। फिर उछल-उछल कर म्याऊँ-म्याऊँ कर अपने पंजे मेरे पैरों पर टिका कर कुछ कहने लगी। उसके उछलने से मैंने अनुमान लगाया कि वह उस ऊँची दीवार पर जाना चाहती है। संभव है कि उस पार उसके बच्चे हों। मैंने उसे पुचकार कर धीरे से उठाकर दीवार पर बैठा दिया। उसकी म्याऊँ-म्याऊँ में अब धन्यवाद का भाव था।

प्रसिद्ध साहित्यकार अनातोले फ्रांस ने कहा था कि मनुष्य की आत्मा का एक अंश तब तक सुप्तावस्था में रहता है, जब तक वह किसी पशु या पक्षी से प्रेम नहीं करता। बिल्ली विशेषज्ञ पशु चिकित्सक डॉ. लुईस जे कम्युटी ने लिखा है, “बाई लविंग एंड अंडरस्टैंडिंग एनिमल्स, परहेप्स वी ह्यूमेन शेल कम टू अंडरस्टैंड ईच-अदर।” पशुओं से स्नेह करना और उन्हें समझना, हमें एक-दूसरे को व्यापक स्तर पर समझने में सहायक होता है।

प्रकृति के जीवों में परस्पर तादात्म्य के मूल में एक समान आवश्यकताएँ रही होंगी। यह तादात्म्य एक-दूसरे के प्रति संवेदना जगाता है, करुणा उपजाता है। साथ ही एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी पर हमला करने पर अपनी सुरक्षा का भाव या प्रत्याक्रमण भी उतने ही तेजी से जगाता है।

जो भी हो लेकिन प्रकृति के विशाल और विस्तृत परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मनुष्य का तादात्म्य उसे असीम आनंद और विशेष दृष्टि प्रदान करता है। इस दृष्टि पर अपने-अपने अनुभव के आधार पर हरेक का अलग-अलग मत हो सकता है। तथापि मत-मतांतर के परे यदि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव जाग्रत रहे तो जगत अधिक सुंदर और अधिक आत्मीय बन सकता है।

 

© संजय भारद्वाज 

15:17 बजे, 6.6.2026

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

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संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१२ ⇒ अरे बाबा शोर नहीं, सोर, सोर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अरे बाबा शोर नहीं, सोर, सोर।)

?अभी अभी # १०१२ ⇒ आलेख – अरे बाबा शोर नहीं, सोर, सोर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

भाषा में शुद्धता का शोर कोई नया नहीं है। उर्दू कोई भाषा नहीं, लेकिन अरबी फ़ारसी कौन जानता है। हम कहां ग्रीक और लेटिन जानते हैं, लेकिन फिर भी अंग्रेजी तो झाड़ ही लेते हैं। आज भी हमारे देश के ग्रामीण इलाकों में रामायण का सस्वर पाठ जिस शुद्धता, उत्साह और मधुरता से किया जाता है, आज की शहर की पढ़ी लिखी पीढ़ी में वह कम ही देखने को मिलता है।

तुलसीकृत रामचरितमानस शुद्ध हिंदी में नहीं, अवधी भाषा में लिखी गई है। मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो। निरगुन कौन देस को बासी ? मीरा बाई के पद भी देख लीजिए ! हे री, मैं तो प्रेम दिवाणी, मोरा दरद ना जाने कोय। कहीं बृज भाषा है तो कहीं कबीर की साखी। भक्ति काल आज भी हमारी हिंदी के लिए बैसाखी का काम कर रहा है। आप तुलसी और राम को अलग नहीं कर सकते। मीरा और सूर को श्याम से दूर नहीं किया जा सकता। सूर, सूर तुलसी शशि के आगे पंत, प्रसादनिराला, महादेवी, दिनकर और अज्ञेय ही नहीं, आज बहुत कुछ है।।

आज ऐसी हिंदी कौन बोलता है। भाषा और संस्कृति को आप अलग नहीं कर सकते। भक्ति काल को हिंदी का स्वर्ण काल कहा गया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट और

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हमें हिंदी और हिंदी के इतिहास से परिचय कराया। इंशा अल्ला खान द्वारा १८०३ ईस्वी में रचित रानी केतकी की कहानी संभवतः हिन्दी की पहली खड़ी बोली की कहानी है।

गंगोत्री की तरह भाषा का भी उद्गम और विकास होता है। वह देश के कई प्रांतों से बहकर देश की संस्कृति और बोली को एकाकार करती है। कहते रहें कहने वाले, राम तेरी गंगा मैली हो गई, हम तो गंगा में ही स्नान कर पुण्य कमाएंगे। हमारी हिंदी और हमारा व्याकरण एक होने के बावजूद बोली का फर्क तो पड़ेगा ही। होगा भाषा को भासा बोलना असुद्ध, लेकिन हम क्या करें, अगर हमसे शुद्ध ही नही बोला जाता। लोग हम पर बिस्वास नहीं करते, जब हम कहते हैं, हमसे विश्वास नहीं बोला जाता।।

आपने अटल जी को तो सुना है। हर भारतीय को उन पर गर्व है। उन्होंने विदेशों में भी हमारी हिंदी का मान बढ़ाया और देश में भी। क्या धाराप्रवाह ओजस्वी भाषण और झरने सी बहती कविता। वे भी स्कूल को इस्कूल ही बोलते थे। कर लो, जो करना हो। हमारी बोली और भाषा पर हमारे प्रांत का भी असर पड़ता है। है वही हिंदी, लेकिन लहजा और उच्चारण अलग हो सकता है।

भाषा में शुद्धता के साथ अगर रस्टिक टच (देहाती स्पर्श) हो तो वह कर्णप्रिय और मधुर लगती है। रेणु के मैला आंचल और परती परी कथा में यह स्पष्ट दिखाई देता हैं। आंचलिक साहित्य की यही तो विशेषता है। जो बहाव पद्य में है, अगर वही प्रवाह गद्य में हो, तो कंकर कांकर, अक्षर आखर और शक्कर साखर भी हो सकती है। उच्चारण दोष कहीं कहीं इतना सहज होता है कि हम उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। अगर आप हिंदी प्रेमी हैं तो उदार बनें। अगर पवन सोर करता है तो करने दें। हमारे शहर के डीजे से वह लाख गुना बेहतर है। सुक्ला जी और मिसरा जी को हमारा परनाम।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३८ – पर्यावरण दिवस ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३८ पर्यावरण दिवस… ?

– दो वर्ष पहले पर्यावरण महोत्सव में आपके एकल काव्य पाठ ने श्रोताओं का मन जीत लिया था। जैसे आपसे पहले बात हुई थी, इस वर्ष भी 5 जून को उसी स्थान पर आपका काव्य पाठ आयोजित होगा। नई सजावट के साथ कार्यक्रम स्थल की कुछ तस्वीरें भी आपको भेजी थीं।

– हाँ मैंने देखीं पर यह आयोजन स्थल तो भिन्न लग रहा है। यह कोई हॉल जैसा है। लग्जरी कुर्सियाँ लगी हैं। मंच बना हुआ है। एसी भी दिख रहा है। 2 वर्ष पहले तो मैंने विशाल बरगद के नीचे माटी के चबूतरे पर खुले में कविता पाठ किया था।

– जी हाँ, यह वही स्थान है। क्या है न कि खुले में मच्छर काटते थे। अचानक बारिश-अँधड़ आने का डर लगा रहता, सो अलग। इसलिए बरगद कटवा कर छोटा-सा एसी हॉल बनवा दिया है। इससे कवि को रचना सुनाने का और श्रोताओं को कविता सुनने का अधिक आनंद आएगा। एकॉस्टिक सिस्टम के प्रभाव से प्रस्तुति भी अलग ही स्तर की होगी। सारी व्यवस्था देखकर आपको बहुत अच्छा लगेगा।

– क्षमा कीजिएगा मैं नहीं आ पाऊँगा।

– अरे ऐसा क्या हो गया? तैयारी में या आपकी सुविधा में कुछ कमी दिख रही है क्या?

– एक तो मैं केवल संवेदनशील लोगों के बीच कविता पढ़ता हूँ। दूसरे, कथनी से नहीं अपितु करनी से मनाता हूँ मैं पर्यावरण दिवस, कहकर उसने फोन रख दिया।

© संजय भारद्वाज 

अपराह्न 12:56 बजे, 15 मई  2025

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💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ विश्व पर्यावरण दिवस विशेष – धरती की पुकार: क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचा पाएँगे? ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ धरती की पुकार: क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बचा पाएँगे? ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“जब आख़िरी पेड़ कट जाएगा, आख़िरी नदी सूख जाएगी और आख़िरी मछली मर जाएगी, तब इंसान को समझ आएगा कि पैसा खाया नहीं जा सकता।”

 

कुछ दिन पहले एक बच्चे ने अपने दादा से पूछा-

“दादाजी, क्या आपके बचपन में भी इतनी गर्मी पड़ती थी?”

दादा कुछ पल चुप रहे।

उन्होंने आँगन में खड़े पुराने नीम के पेड़ की ओर देखा और धीमे से कहा-

“नहीं बेटा, तब गर्मी भी इंसानों जैसी होती थी। आज की तरह गुस्से में नहीं।”

बच्चा उनकी बात पूरी तरह समझ नहीं पाया, लेकिन दादा समझ रहे थे कि सवाल मौसम का नहीं, बदलती हुई धरती का है।

 

सच तो यह है कि आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जब प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। कभी असमय बारिश, कभी भयंकर सूखा, कभी जंगलों में आग, कभी बाढ़ का कहर। ऐसा लगता है जैसे धरती हमें समझाना चाहती है कि उसके धैर्य की भी एक सीमा है।

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। बहुत से लोगों के लिए यह केवल एक तारीख है, लेकिन वास्तव में यह हमारी धरती के स्वास्थ्य की रिपोर्ट कार्ड जैसा दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति के मालिक नहीं हैं। हम केवल उसके मेहमान हैं।

दुर्भाग्य से आधुनिकता की दौड़ में हमने यह बात लगभग भुला दी है। हमने विकास के नाम पर जंगल काटे। नदियों को नालों में बदल दिया। मिट्टी को रसायनों से भर दिया और फिर आश्चर्य करते हैं कि मौसम इतना अस्थिर क्यों हो गया है।

कभी गाँवों में सुबह पक्षियों की आवाज़ से होती थी। आज अलार्म घड़ी की आवाज़ से होती है। पहले बच्चे पेड़ों की छाँव में खेलते थे। आज एयर-कंडीशनर वाले कमरों में मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ चलाते हैं। पहले बारिश आने से पहले मिट्टी की खुशबू पूरे गाँव को खुश कर देती थी। अब बारिश के साथ लोग ट्रैफिक जाम और जलभराव की चिंता करने लगते हैं।

बदलाव केवल पर्यावरण में नहीं आया है। बदलाव हमारे सोचने के तरीके में भी आया है। हमने प्रकृति को संसाधन समझ लिया, संबंध नहीं।

यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है। पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। समुद्र का स्तर बढ़ रहा है। लाखों जीव-जंतु अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं।

लेकिन इन सबके बीच एक उम्मीद भी है।

प्रकृति आज भी हमें रास्ता दिखा रही है।

एक जंगल हजारों एयर प्यूरीफायर से ज्यादा प्रभावी होता है। एक स्वस्थ नदी लाखों लीटर शुद्ध पानी दे सकती है। एक पेड़ केवल छाया नहीं देता, बल्कि कार्बन को सोखकर धरती का तापमान कम करने में मदद करता है। यानी प्रकृति कोई समस्या नहीं है। प्रकृति ही समाधान है।

लेकिन समाधान केवल सरकारों से नहीं आएगा। यह बदलाव हमारे घरों से शुरू होगा। जब हम बिना जरूरत बिजली बंद करेंगे। जब हम प्लास्टिक की थैली की जगह कपड़े का थैला इस्तेमाल करेंगे। जब हम पानी की एक-एक बूंद की कीमत समझेंगे। जब हम अपने बच्चों को पेड़ लगाने के साथ-साथ पेड़ बचाना भी सिखाएँगे।

 

अक्सर लोग कहते हैं-“मेरे अकेले के बदलने से क्या होगा?”

लेकिन इतिहास गवाह है कि हर बड़ा परिवर्तन एक छोटे कदम से शुरू हुआ है।

एक बूंद से नदी बनती है।

एक बीज से जंगल बनता है।

और एक जागरूक इंसान से समाज बदलता है।

 

मुझे हमेशा लगता है कि पर्यावरण संरक्षण का असली अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं है।

असली पर्यावरण संरक्षण है-प्रकृति के प्रति सम्मान विकसित करना।

जिस दिन हम नदी को केवल पानी नहीं, जीवन समझने लगेंगे…

जिस दिन हम पेड़ को केवल लकड़ी नहीं, साँस समझने लगेंगे…

जिस दिन हम धरती को केवल जमीन नहीं, माँ समझने लगेंगे…

उस दिन किसी पर्यावरण दिवस की जरूरत नहीं पड़ेगी।

 

दुनिया की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अपने बच्चों के लिए बैंक बैलेंस छोड़ने की चिंता करते हैं, लेकिन उनके लिए स्वच्छ हवा, साफ पानी और सुरक्षित धरती छोड़ने की चिंता कम करते हैं।

याद रखिए, आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमारे पास कितनी संपत्ति थी। वे यह पूछेंगी कि हमने उनके लिए कैसी पृथ्वी छोड़ी।

फंडा यह है कि-

धरती हमारी विरासत नहीं है, यह हमारे बच्चों से लिया गया उधार है। यदि हम आज प्रकृति की रक्षा नहीं करेंगे तो कल प्रकृति हमारे अस्तित्व की रक्षा नहीं कर पाएगी। इसलिए पर्यावरण संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०११ ⇒ असंग्रह (अपरिग्रह) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “असंग्रह (अपरिग्रह)।)

?अभी अभी # १०११ ⇒ आलेख – असंग्रह (अपरिग्रह) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

नैतिक नियमों को आप यम नियम कह सकते हैं। आवश्यकता से अधिक संग्रह की वृत्ति हमारी भौतिकता की देन है। अगर जीवन ही सादा होगा तो जीवन कितना फीका फीका होगा, हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

जब हमारा आचरण हमारे सिद्धांतों और आदर्श से मेल नहीं खाता, तो जीवन में कृत्रिमता और

बनावटीपन आ जाता है, सहजता कहीं गायब हो जाती है। कौन नहीं चाहता, अच्छा खाना और अच्छा पहनना। लेकिन जाने अनजाने सुविधाओं की आड़ में हमारे पास कई अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह होता चला जाता है, और हम उनसे बेखबर रहते हैं।।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है, हम आविष्कार किया करते हैं, और हमारी आवश्यकताओं को दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ाते रहते हैं। मूल भूत सुविधा भी आवश्यकता का ही अंग है, लेकिन संपन्नता के साथ सुविधा का ग्राफ भी बढ़ता ही रहता है। छोटे मकान से बड़ा मकान और छोटी गाड़ी से बड़ी गाड़ी समय की भी मांग है, और संपन्नता की निशानी भी। लेकिन जब हर अनावश्यक चीज भी आवश्यक लगने लगे, तब जीवन से यम नियम गायब हो जाता है।

आइना हम रोज देखते हैं, लेकिन हमें आइना दिखाने वाले लोग कम ही होते हैं। असंग्रह और अपरिग्रह की दुहाई देते हुए जब एक दिन अनायास मैने अपने कपड़ों की आलमारी खोली तो मुझे कई ऐसे पुराने कपड़े नजर आए, जो केवल अलमारी की शोभा बढ़ा रहे थे। पत्नी की अलमारी में तो मेरी नजर चली गई, कितनी अनावश्यक साड़ियां हैं, लेकिन अपनी अलमारी से मेरा साक्षात्कार मानो पहली बार हुआ हो। मुझे मेरा मुंह आईने में नजर आ गया, मुझे आज अपने गिरेबान में झांकना ही पड़ा, अपने हाथों से ही अपने कानों को उमेठना पड़ा।।

एक पंछी को रोज अपने दाना पानी की व्यवस्था करनी होती है। रोजाना अपने बाल बच्चों का भी पेट भरना होता है। आप उसे अपरिग्रह का पाठ नहीं पढ़ा सकते, क्योंकि वह कल के लिए कुछ संग्रह कर ही नहीं सकता। इंसान की बात अलग है, उसे दो जून की रोटी की भी व्यवस्था करनी पड़ती है। वह परिग्रह की श्रेणी में नहीं आता।

जो अपरिग्रह का पालन करते हैं, वे अनावश्यक वस्तुओं को नेकी के दरिए में बहा देते हैं। लेकिन संग्रह की प्रवृत्ति से छुटकारा पाना इतना आसान भी नहीं। अपने किताबों के संग्रह से कौन मुंह मोड़ सकता है, तिजोरी और लॉकर में रखे गहनों का भी खयाल रखना पड़ता है।।

कई घरों में आपको संग्रहालय नजर आ जाएंगे। किसी को जूतों का शौक तो किसी को टाइयों का। वॉर्डरोब होता ही काहे के लिए है। शान शौकत पर खर्च और धूमधाम से शादियां, हमारे समाज का ही प्रचलन है। कोई किसी का हाथ नहीं रोकता लेकिन फिर भी इसी समाज में कुछ लोग हैं जो फिजूलखर्ची को अपराध मानते हैं, और संयम और सादगी का जीवन व्यतीत करते हैं।

कल कॉलर ट्यून पर एक गीत बज रहा था, ये मोह मोह के धागे …. आगे के शब्द बेमानी हैं। समाज के नियम अपनी जगह हैं, हमारे जीवन के नियम हमें ही बनाने पड़ते हैं, खुद को अपनी ही कसौटी पर कसना पड़ता है, संयम, संतुलन के साथ तितिक्षा का भी अभ्यास करना पड़ता है। वैराग्य ना सही, विवेक का दामन तो थामना ही पड़ता है ;

बहुत दिया देने वाले ने तुझको।

आंचल ही न समाए

तो क्या कीजे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२४ ☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख शब्द-शब्द साधना। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मोहे ले चल मांझी उस पार / स्वर- रुखसार खान, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२४ ☆

☆ शब्द-शब्द साधना… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘शब्द शब्द में ब्रह्म है/ शब्द शब्द में सार। शब्द सदा ऐसे कहो/ जिन से उपजे प्यार।’ वास्तव में शब्द ही ब्रह्म है और शब्द में ही निहित है जीवन का संदेश…इसलिए सदा ऐसे शब्दों का प्रयोग कीजिए, जिससे प्रेम भाव प्रकट हो। कबीरदास जी का यह दोहा ‘ऐसी बानी बोलिए/ मनवा शीतल होय। औरहुं को शीतल करे/ ख़ुद भी शीतल होय’ …उपरोक्त भाव की पुष्टि करता है। हमारे कटु वचन दिलों की दूरियों को इतना बढ़ा देते हैं; जिसे पाटना कठिन हो जाता है। इसलिए सदैव मधुर शब्दों का प्रयोग कीजिए, क्योंकि ‘शब्द से खुशी/ शब्द से ग़म। शब्द से पीड़ा/ शब्द ही मरहम’ शब्द में निहित हैं ख़ुशी व ग़म के भाव– परंतु उनका चुनाव आपकी सोच पर निर्भर करता है।

वास्तव में शब्दों में इतना सामर्थ्य है कि जहाँ वे मानव को असीम आनंद व अलौकिक प्रसन्नता प्रदान कर सकते हैं; वहीं ग़मों के सागर में डुबो भी सकते हैं। दूसरे शब्दों में शब्द पीड़ा है और शब्द ही मरहम है। शब्द मानव के रिसते ज़ख्मों पर कारग़र दवा का काम भी करते हैं। यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस मन:स्थिति में किन शब्दों का प्रयोग किस अंदाज़ से करते हैं।

‘हीरा परखै जौहरी/ शब्द ही परखै साध। कबीर परखै साध को/ ताको मतो अगाध’ हर व्यक्ति अपनी आवश्यकता व उपयोगिता के अनुसार इनका प्रयोग करता है। जौहरी हीरे को परख कर संतोष पाता है, तो साधु शब्दों व सत्य वचनों अर्थात् सत्संग को ही महत्व प्रदान करता है और आनंद प्राप्त करता है। वह उनके संदेशों को जीवन में धारण कर सुख व संतोष प्राप्त करता है; स्वयं को भाग्यशाली समझता है। परंतु कबीरदास जी उस साधु को परखते हैं कि उसके भावों व विचारों में कितनी गहनता व सार्थकता है; उसकी सोच कैसी है और वह जिस राह पर लोगों को चलने का संदेश देता है; वह उचित है या नहीं? वास्तव में संत वह है; जिसकी इच्छाओं का अंत हो गया है और उसकी श्रद्धा को आप विभक्त नहीं कर सकते; उसे सत्मार्ग पर चलने से नहीं रोक सकते–वही श्रद्धेय है, पूजनीय है। वास्तव में साधना करने व ब्रह्मचर्य को पालन करने वाला ही साधु है, जो सीधे व सपाट मार्ग का अनुसरण करता है। इसके लिए आवश्यकता है कि जब हम अकेले हों, तो अपनी भावनाओं पर अंकुश लगाएं अर्थात् कुत्सित भावनाओं व विचारों को अपने मनोमस्तिष्क में दस्तक न देने दें। अहं व क्रोध पर नियंत्रण रखें, क्योंकि ये दोनों मानव के अजात शत्रु हैं, जिसके लिए अपनी कामनाओं-तृष्णाओं को नियंत्रित करना आवश्यक है।

अहं अर्थात् सर्वश्रेष्ठता का भाव मानव को सबसे दूर कर देता है, तो क्रोध सामने वाले को तो हानि पहुंचाता ही है; वहीं अपने लिए भी अनिष्टकारी सिद्ध होता है। अहंनिष्ठ व क्रोधी व्यक्ति आवेश में न जाने क्या-क्या कह जाता है; जिसके लिए उसे बाद में प्रायश्चित करना पड़ता है। परंतु ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’ अर्थात् समय गुज़र जाने के पश्चात् हाथ मलने अर्थात् पछताने का कोई औचित्य अथवा सार्थकता नहीं रहती। प्रायश्चित करना हमें सुख व संतोष प्रदान करने की सामर्थ्य तो रखता है, ‘परंतु गया वक्त कभी लौटकर नहीं आता।’ शारीरिक घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, परंतु शब्दों के ज़ख्म कभी नहीं भरते; वे तो नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु कटु वचन जहाँ मानव को पीड़ा प्रदान करते हैं; वहीं सहानुभूति व क्षमा-याचना के दो शब्द बोलकर आप उन पर मरहम भी लगा सकते हैं। शायद! इसीलिए कहा गया है गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी मधुर वाणी द्वारा दूसरे के दु:खों को दूर करने का सामर्थ्य रखता है। आपका दु:खी व आपदाग्रस्त व्यक्ति को ‘मैं हूं ना’ कह देना ही उसमें आत्मविश्वास जाग्रत करता है और वह स्वयं को अकेला व असहाय अनुभव नहीं करता। उसे ऐसा लगता है कि आप सदैव उसकी ढाल बनकर उसके साथ खड़े हैं।

एकांत में व्यक्ति के लिए अपने दूषित मनोभावों पर नियंत्रण करना आवश्यक है तथा सबके बीच अर्थात् समाज में रहते हुए शब्दों की साधना करना भी अनिवार्य है… सोच- समझकर बोलने की सार्थकता से आप मुख नहीं मोड़ सकते। इसलिए कहा जा सकता है कि यदि आपको दूसरे व्यक्ति को उसकी ग़लती का एहसास दिलाना है, तो उससे एकांत में बात करो, क्योंकि सबके बीच में कही गई बात बवाल खड़ा कर देती है। अक्सर उस स्थिति में दोनों के अहं का टकराव होता है। अहं से संघर्ष का जन्म होता है और उस स्थिति में वह दूसरे के प्राण लेने पर उतारु हो जाता है। गुस्सा चाण्डाल होता है… बड़े-बड़े ऋषि मुनियों के उदाहरण आपके समक्ष हैं। परशुराम का क्रोध में अपनी माता का वध करना व ऋषि गौतम का अहिल्या का श्राप देना आदि हमें संदेश देता है कि व्यक्ति को बोलने से पहले सोचना अर्थात् तोलना चाहिए। उस विषम परिस्थिति में कटु व अनर्गल शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और दूसरों से वैसा व्यवहार करना चाहिए; जिसे सहन करने की क्षमता आप में है। सो! आवश्यकता है, हृदय की शुद्धता व मन की स्पष्टता की अर्थात् आप अपने मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, दुर्भावना व दुष्भावनाएं मत रखिए, बल्कि बोलने से पहले उसके औचित्य-अनौचित्य का चिन्तन-मनन कीजिए। दूसरे शब्दों में किसी के कहने पर उसके प्रति अपनी धारणा मत बनाइए अर्थात् कानों-सुनी बात पर विश्वास मत कीजिए, क्योंकि विवाह के सारे गीत सत्य नहीं होते। कानों-सुनी बात पर विश्वास करने वाले लोग सदैव धोखा खाते हैं और उनका पतन अवश्यंभावी होता है। कोई भी उनके साथ रहना पसंद नहीं करता। बिना सोच-विचार के किए गए कर्म केवल आपको ही हानि नहीं पहुंचाते; परिवार, समाज व देश के लिए भी विध्वंसकारी होते हैं।

सो! दोस्त, रास्ता, किताब व सोच यदि ग़लत हों, तो गुमराह कर देते हैं; यदि ठीक हों, तो जीवन सफल हो जाता है। उपरोक्त उक्ति हमें आग़ाह करती है कि सदैव अच्छे लोगों की संगति करें, क्योंकि सच्चा मित्र आपका सहायक, निदेशक व गुरु होता है; जो आपको कभी पथ-विचलित नहीं होने देता। वह आपको ग़लत मार्ग व ग़लत दिशा की ओर जाने पर सचेत करता है तथा आपकी उन्नति को देख कर प्रसन्न होता है; आप को उत्साहित करता है। पुस्तकें मानव की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। इसलिए कहा गया है कि ‘बुरी संगति से इंसान अकेला भला’और एकांत में अच्छे मित्र के साथ न होने की स्थिति में सद्ग्रथों व अच्छी पुस्तकों का सान्निध्य हमारा यथोचित मार्गदर्शन करता है।

हाँ! सबसे बड़ी है मानव की सोच अर्थात् जो मानव सोचता है, वही उसके चेहरे के भावों से परिलक्षित होता है और व्यवहार उसके कार्यों में झलकता है। इसलिए अपने हृदय में दैवीय गुणों स्नेह, सौहार्द, त्याग, करुणा, सहानुभूति आदि  को पल्लवित होने दीजिए… ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर की भावना को दूर से सलाम कीजिए, क्योंकि सत्य की राह का अनुसरण करने वाले की राह में अनगिनत बाधाएं आती हैं। परंतु यदि वह उन असामान्य परिस्थितियों में अपना धैर्य नहीं खोता; दु:खी नहीं होता, बल्कि उससे सीख लेता है तो वह अपनी मंज़िल को प्राप्त कर अपने भविष्य को सुखमय बनाता है। वह सदैव शांत भाव में रहता है, क्योंकि ‘सुख- दु:ख तो अतिथि हैं’…’जो आया है, अवश्य जाएगा’ को अपना मूल-मंत्र स्वीकार संतोष से अपना जीवन बसर करता है। सो! आने वाले की खुशी व जाने वाले का ग़म क्यों? इंसान को हर स्थिति में सम रहना चाहिए, ताकि दु:ख आपको विचलित न करें और सुख आपके सत्मार्ग पर चलने में बाधा उपस्थित न करें अर्थात् आपको ग़लत राह का अनुसरण न करने दें। वास्तव में पैसा व पद-प्रतिष्ठा मानव को अहंवादी बना देते हैं और उससे उपजा सर्वश्रेष्ठता का भाव अमानुष। वह निपट स्वार्थी हो जाता है और केवल अपनी सुख-सुविधाओं के बारे में सोचता है। इसलिए ऐसा स्थान यश व लक्ष्मी को रास नहीं आता और वे वहां से रुख़्सत हो जाते हैं।

सो! जहां सत्य है; वहां धर्म है, यश है और वहीं लक्ष्मी निवास करती है। जहां शांति है; सौहार्द व सद्भाव है; मधुर व्यवहार व समर्पण भाव है और वहां कलह, अशांति, ईर्ष्या-द्वेष आदि प्रवेश पाने का साहस नहीं जुटा सकते। इसलिए मानव को कभी भी झूठ का आश्रय नहीं लेना चाहिए, क्योंकि वह सब बुराइयों की जड़ है। मधुर व्यवहार द्वारा आप करोड़ों दिलों पर राज्य कर सकते हैं…सबके प्रिय बन सकते हैं। लोग आपके साथ रहने व आपका अनुसरण करने में स्वयं को गौरवशाली व भाग्यशाली समझते हैं। सो! शब्द ब्रह्म है; उसकी सार्थकता को स्वीकार कर जीवन में धारण करें और सबके प्रिय बनें, क्योंकि हमारी सोच, हमारे बोल व हमारे कर्म ही हमारे भाग्य-निर्माता हैं और हमारी ज़िंदगी के प्रणेता हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०१० ⇒ शुद्ध घी और चित्त शुद्धि ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शुद्ध घी और चित्त शुद्धि…।)

?अभी अभी # १०१० ⇒ आलेख – शुद्ध घी और चित्त शुद्धि ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या शुद्ध घी और शुद्ध चित्त का आपस में कोई संबंध है,शुद्ध घी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है,इसमें दो मत नहीं,अधिकांश लोग बाजार का अमूल घी अथवा केबीसी ब्रांड गोवर्धन घी पर भरोसा करते हैं । कुछ भाग्यशाली गुजरात की गिर देसी गाय पालते हैं,और उसके शुद्ध सात्विक,ऑर्गेनिक देशी घी का सेवन करते हैं ।

कुछ लोग होते हैं, जो अपने ही घर पर उपलब्ध दूध का घी बनाकर उसका सेवन करते हैं । घर पर बनाए जाने वाला शुद्ध घी

का तरीका हमारे चित्त शुद्धि के तरीके से बहुत मेल खाता है । गुरु को रंगरेज तो कहा गया है,लेकिन किसी हलवाई को सदगुरु नहीं कहा गया । गुरु रंगरेज की तरह हमारे चित्त को अगर रंग सकता है तो घी बनाने का तरीका हमारे चित्त को शुद्ध करने के तरीके से पूरी तरह मेल खाता है ।।

काश जितनी चिंता हम शुद्ध घी की करते हैं,उतनी ही चिंता हमें अपने चित्त की शुद्धि की भी होती । घी बनाने से चित्त शुद्ध करने का नुस्खा हमने ईजाद किया है,लेकिन इस पर हमारा कोई कॉपीराइट नहीं, मैं जब घर पर घी बनाता हूं तो मुझे ऐसा लगता है, मैं अपना चित्त शुद्ध कर रहा हूं । एक पंथ दो काज ।।

सबसे पहले हम दूध को गर्म करते हैं,दूध की चाय बनती है,बच्चे दूध पीते हैं और हम उसकी मलाई निकाल लेते हैं । बिना मलाई के घी नहीं बनता । अपने आपको तपाए बिना चित्त कभी शुद्ध नहीं हो सकता ।जप,तप,साधन,सेवा,सत्संग सभी चित्त शुद्धि के साधन माने गए हैं ।

लो जी दूध को तपाया और मलाई निकाल ली । जितना दूध है,उतने की ही मलाई निकलेगी,इसलिए रोज दूध गर्म होगा,तपेगा,और उसकी मलाई निकलेगी,जिसे एक बर्तन में एकत्रित कर लिया जाएगा । मलाई निकालने अथवा खाने से चित्त शुद्ध नहीं होता । थोड़ा धैर्य धारण करना पड़ता है । इस मलाई में चाहें तो थोड़ा दही मिलाते जाएं,और मलाई फ्रीजर में रखते जाएं । पहले तप और उसके बाद धीरज, मन ललचाता है,मलाई के लिए । मन पर कंट्रोल भी जरूरी है चित्त शुद्धि के लिए ।।

चलिए कुछ दिन यही चलता रहा । अच्छी मलाई जमा हो गई । अब इसे एक बड़े बर्तन अथवा मटकी में रवई से ,खूब सारा पानी डालकर मथ लिया । थोड़ा परिश्रम और ऊपर मक्खन तैरने लग गया । कृष्ण की सभी बाल लीलाएं,मटकी,माखन और गोपियों के आसपास ही घटित होती रहती हैं । माखन चोर की तरह किसी का दिल चुराएं,मक्खन नहीं ।

लो जी यहां तो मक्खन देखते ही मुंह में पानी आ गया,और साथ में मलाई वाली छाछ भी । हम तो तर गए । लेकिन महाराज,अभी कहां चित्त शुद्धि हुई,घी तो अभी निकला ही नहीं । कंट्रोल कंट्रोल, नो चित्त शुद्धि विदाउट कंट्रोल ।।

जी हां अब मक्खन छाछ से अलग होगा,जैसे विकार चित्त से अलग होते हैं,चित्त शुद्धि के समय । लेकिन अभी तो मक्खन की भी परीक्षा होगी,उसको भी संयम और विवेक की अग्नि में तपना होगा । बिना भाड़ में गए कभी चना सिका है,बिना भट्टी के कभी रसोई पकी है।

तेज आंच में मक्खन की तरह चित्त की परीक्षा हो रही है,कड़ी परीक्षा,तेज आंच,धैर्य की परीक्षा,और आखिर वह घड़ी आ ही जाती है,जब शुद्ध विकार युक्त घी चित्त शुद्ध की तरह कढ़ाई में तैरने लगता है ।

साथ में कुछ विकार जलकर खाक नहीं होते,मावा बन जाते हैं । नर,सत्संग से क्या से क्या हो जाए । संसार में असार कुछ भी नहीं,फिर ज्ञानियों द्वारा सार सार ही ग्रहण किया जाता है,और थोथा उड़ा दिया जाता है ।।

हमने घी बनाने का तरीका नहीं सीखा,चित्त शुद्धि का तरीका सीखा । सतगुरु की सीख ऐसी ही होती है,इसीलिए उसे रंगरेज कहते हैं । आप अपने गुरु स्वयं बनें,घर पर ही घी बनाएं,अपना चित्त शुद्ध करें । मैंने अपनी मां से सीखा,तेरा तुझको अर्पण,क्या लागा मेरा ..!!

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© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २८८ ☆ अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २८८ ☆

अधिक मास : स्वयं परिवर्तन का पावन अवसर… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

अधिक मास भारतीय संस्कृति में केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मपरिवर्तन का सुंदर समन्वय है। यह हमें स्मरण कराता है कि संसार को बदलने की अपेक्षा यदि हम स्वयं को बदलना प्रारंभ करें, तो हमारी दृष्टि बदलती है और उसी के साथ हमारी सृष्टि भी बदलने लगती है।

हम प्रायः जीवन में परिस्थितियों, लोगों अथवा भाग्य को दोष देते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन भीतर से प्रारंभ होता है। जब हम अपने विचारों, आदतों और कार्यशैली में सुधार लाते हैं, तब उसके सकारात्मक परिणाम हमारे संबंधों, कार्यों और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देने लगते हैं।

अधिक मास हमें थोड़ी देर रुककर स्वयं से प्रश्न करने का अवसर देता है—क्या मैं कल से आज बेहतर हूँ? क्या मेरे व्यवहार, धैर्य, संवेदनशीलता और कर्म में गुणवत्ता बढ़ी है? यदि प्रतिदिन केवल एक छोटा-सा सुधार भी हो, तो समय के साथ वही परिवर्तन जीवन को नई दिशा दे सकता है।

जैसे माली पौधे की जड़ों को सींचता है और फिर हरियाली स्वयं प्रकट होती है, वैसे ही आत्मविकास के बीज बोने पर सफलता, संतोष और प्रसन्नता स्वतः फलित होते हैं। अधिक मास का वास्तविक संदेश भी यही है कि बाहरी उपलब्धियों से पहले अपने भीतर के दीप को प्रज्वलित किया जाए।

जब स्वयं में परिवर्तन आता है, तब वही संसार, वही लोग और वही परिस्थितियाँ भी नई प्रतीत होने लगती हैं। यही अधिक मास की साधना है और यही उसके आध्यात्मिक महत्व का सार।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००९ ⇒ बुरी नजर दूर हट (थू थू थू) ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बुरी नजर दूर हट (थू थू थू)।)

?अभी अभी # १००९ ⇒ आलेख – बुरी नजर दूर हट (थू थू थू) ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

सन् १९६१ में एक फिल्म आई थी ससुराल जिसका एक गीत बड़ा लोकप्रिय हुआ था, तेरी प्यारी प्यारी सूरत को, किसी की नजर ना लगे, चश्मे बद्दूर ! तब मेरी सूरत कोई खास प्यारी नहीं थी, लेकिन मैं तब भी नजर का चश्मा लगाता था। चश्मे का संबंध नजर से जरूर है लेकिन किसी चश्मा लगाने वाले का चश्मे बद्दूर से कोई लेना देना नहीं। लोग मुझे चश्मे बद्दूर सिर्फ इसलिए कहते थे, क्योंकि मैं चश्मा लगाता था।

अंग्रेजी और उर्दू में वैसे भी हमारा हाथ तंग ही रहता है। हमारे फिल्मी शायर इसीलिए इतने लोकप्रिय हो जाते हैं। कर्णप्रिय संगीत का श्रोता, शब्दों के फेर में नहीं पड़ता, वह गायक की मधुर आवाज और धुन में ही उलझ जाता है। शायर हसरत जयपुरी ने तो बस गीत लिख दिया और लोगों की ज़ुबान पर रातों रात यह गीत चढ़ गया, चश्मे बद्दूर ! जिसका आम भाषा में अर्थ होता है, बुरी नजर, दूर हट।।

जहां नजर है,  वहां चश्मा है, और अगर सूरत प्यारी हुई तो उस ओर नजर उठ ही जाती है और अनायास मुंह से निकल ही जाता है,  चश्मे बद्दूर। शायर ने अपना काम बखूबी किया, चश्मे बद्दूर का अर्थ भी बताया, किसी की नजर ना लगे। लेकिन रहा सहा काम हम जैसे नासमझों ने कर दिया। जहां किसी प्यारी सी सूरत पर चश्मा नज़र आया, उसे चश्मे बद्दूर कहना शुरू कर दिया।

आज पहले जैसी स्थिति नहीं। लोग पढ़ लिख गए हैं,  गुलज़ार की शायरी पढ़ते हैं और जगजीत सिंह को सुनते हैं, और समझकर उसका आनंद भी लेते हैं।

बात नजर की हो रही है।

बहुत दिनों से हिंदी के ही एक शब्द का प्रयोग मुझे विचलित कर रहा है। कोई आश्चर्य नहीं अगर आज का शायर कुछ इस तरह का गीत लिख मारे ;

तेरी प्यारी प्यारी सूरत को

किसी की नजर ना लगे

थू थू थू !

यह क्या वाहियात मजाक है,  आपको अनफ्रेंड किया जाता है। मैने भी जब पहली बार किसी के मुंह से थू थू थू सुना, तो मुंह फेर लिया। थू शब्द में क साइलेंट है। स्वच्छ भारत के पहले जहां दीवारों पर लिखा रहता था, यहां थूकना मना है, वहां पहले,  मना,  शब्द रंगबिरंगी पिचकारियों के बीच छुप जाता था और बाद में पूरी हिदायत को पान और पान पराग की बौछारों से नहला दिया जाता था।।

कोविड काल का मास्क अभी भी पूरी तरह से हमारे चेहरों से उतरा नहीं है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है कि हमारे थूक में बीमारियों के कीटाणु रहते हैं, इसलिए जिन लोगों के मुंह से बोलते वक्त फूल झरने की जगह थूक के छींटे स्प्रे मारते हैं, उनसे दो गज की दूरी बनाए रखें। लेकिन उन शुभचिंतकों का क्या किया जाए जो आपको बुरी नजर से बचाने के लिए पहले थू थू थू करते हैं और बाद में सफाई पेश करते हैं।

आप अन्यथा ना लें, लेकिन स्टार प्लस की अनुपमा भी बहुत थू थू थू करती है और उसी की देखा देखी मैंने आज की युवा पीढ़ी को भी पहले किसी की तारीफ और बाद में चश्मे बद्दूर की तरह थू थू थू करते देखा है। पहले थू, बाद में थू थू और उसके बाद थू थू थू, इस तरह नफरत से मोहब्बत की जानिब,  तय की हमने मंजिलें। हमारी मोहब्बत को किसी की नजर ना लगे। चश्मे बद्दूर, थू थू थू।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १००८ ⇒ साहब बीवी और श्वान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “साहब बीवी और श्वान।)

?अभी अभी # १००८ ⇒ आलेख – साहब बीवी और श्वान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ताश के बावन पत्तों में गुलाम बेगम और बादशाह के अलावा एक जोकर भी होता है जो खेल के अलावा सर्कस में भी अपना महत्व रखता है।

आपने विमल मित्र के उपन्यास पर आधारित, और मीनाकुमारी और गुरुदत्त अभिनीत फिल्म साहब बीवी और गुलाम भी देखी ही होगी। साहब अंग्रेज ने जब कलकत्ते से व्यापार के बहाने हमारे देश में प्रवेश किया था तब वे अपनी मेम साथ में लाए थे। उनकी मेम भी मेम साहब ही कहलाती थी। देश गुलामी से तो आजाद हो गया, लेकिन साहब और मेम साहब हमारी नौकरशाही व्यवस्था में रच बस गए।

साहब का एक दूसरा नाम नौकरशाह भी होता है। नौकरशाह, एक ऐसा साहब होता है, जिसका बिना नौकर के काम नहीं चलता। आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आप किसी से गुलामी तो नहीं करवा सकते लेकिन अगर कोई मानसिक रूप से गुलाम है तो उसका कोई इलाज नहीं।।

हर व्यक्ति आजकल अपने अधिकारों और दायित्व के प्रति सजग है। गए जमाने नौकरों से बेगार करवाने के। साहब के रिटायर होते ही नौकरशाही का ताना बाना इस तरह बिखर जाता है मानो किसी ने मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया हो। कब तक वाहन, बंगले और ड्राइवर की सुविधा रहेगी। कभी तो बंगला खाली करना पड़ेगा। बेटी बेटे अच्छा हुआ, समय रहते विदेश सेटल हो गए। आजकल तो साहबों की औलादें भी बिगड़ने लगी हैं।

जिस तरह डूबते को तिनके का सहारा होता है, एक सेवानिवृत्त अफसर दंपति को एक अदद श्वान का सहारा होता है। वह बेचारा साहब का आदेश भी सुन लेता है और डांट खाने पर भी पूछ हिलाता रहता है।

साहब का दिल ही जानता है एक मंत्री के आगे उनकी क्या हालत हो जाती थी। आज उन्हें अपने श्वान से सहानुभूति है। एक सेवामुक्त साहब और मेम साहब का अगर कोई अपना है,  तो बस यही एक बेजुबान श्वान।।

आज महानगरों के जंगल में ऐसे कई साहब बीवी हैं जिनके बुढ़ापे और अकेलेपन का सहारा सिर्फ एक श्वान है। बुढ़ापे की लाठी आजकल औलाद नहीं,  एक वॉकिंग स्टिक ही होती है। एक जानवर वैसे भी इंसान से ज्यादा वफादार होता है। कानून भी आजकल यही कहता है। अगर घर में कोई नौकर रखो तो सावधानी के लिए पहले नजदीक के थाने में उसकी पूरी जानकारी दो।

युवा पीढ़ी हो अथवा कोई वरिष्ठ नागरिक, हर परिवार में कुत्ता पालना एक जरूरत है अथवा फैशन, यह कहना इतना आसान नहीं। हमारी लुप्त होती मानवीय संवेदनाओं की ओर यह स्पष्ट संकेत है। क्या हम इतने आत्म केंद्रित हो गए हैं कि केवल एक मूक प्राणी से ही हमारा संवाद संभव है।

स्वार्थ, राजनीति, राग द्वेष और एकाकीपन भले ही इसके लिए जिम्मेदार हो, लेकिन आर्थिक आधार कतई नहीं। लोग भले ही किसी कुत्ते को मुंह नहीं लगाएं, लेकिन रोज सुबह आगे कुत्ता और पीछे उसकी डोर थामे, उन्हें आसानी से घूमते देखा जा सकता है। एक और बुकर पुरस्कार साहब बीवी और श्वान। अनुवाद जारी है।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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