हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३३ – कविता – सुभोर… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सुभोर…’।)

☆ शशि साहित्य # ३३ ☆

? कविता – सुभोर… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

तारे भी गंतव्य चले,

आंचल थामे रात का…

 

रश्मिरथी आ गए,

संग ले अलौकिक प्रकाश का…

 

आल्हादित हो भंवरे भी,

सुर निकालें गान का…

 

चटक कर कलियां खिल उठीं,

बिखरे रंग बहार का…

 

आसमान भी पटल बन,

बिखेरे रंग उल्हास का…

 

खुशबुओं को गले लगा,

देखो, डोलना बयार का…

 

छोड़ो कल की चिंताओं को,

पलकों में सजाओ सपना आज का…

 

सूर्य देव को नमन करो,

आशीष ले लो खुशहाली का…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मायोपिआ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मायोपिआ ? ?

वे रोते नहीं-

धरती की कोख में उतरती

रसायनों की खेप पर,

ना ही-

आसमान की प्रहरी

ओज़ोन की पतली होती परत पर,

दूषित जल, प्रदूषित वायु

बढ़ती वैश्विक अग्नि भी

उनके दुख का कारण नहीं,

अब-

विदारक विलाप कर रहे हैं

इन्हीं तत्वों से उपजी

एक देह के मौन हो जाने का….

मनुष्य की आँख के इस शाश्वत

मायोपिआ का इलाज ढूँढ़ना

अभी बाकी है।

(मायोपिआ-नेत्र विकार, जिसमें दूर की वस्तु दिखाई नहीं देती।)

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, अपराह्न 1:05 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “फ़रियाद-ए-क़लम……” ☆ श्री आशिष मुळे ☆

श्री आशिष मुळे

☆ कविता ☆

☆ “फ़रियाद-ए-क़लम…☆ श्री आशिष मुळे ☆

क़लम आज शर्मिंदा है,

हालात इतने बेहूदा हैं।

फूल कभी खिल ही न पाए,

धूप यहाँ कुछ ज़्यादा है।

 *

उम्मीद लगाई थी छाँव की,

समझे थे कि वह पेड़ है।

एक बार क़रीब से देखा तो,

वह बस सूखी-सी लकड़ी है।

 *

जिनको फलने की थी सहूलत,

अफ़सोस, उन्होंने नफ़रत बोई है।

ऐसी है कुछ हालत-ए-गुलिस्ताँ —

गुलों में अब रंग नहीं है।

© श्री आशिष मुळे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०५ ☆ बाल गीत – लप्पा – लोरी गाए राम… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०५ ☆ 

☆ बाल गीत – लप्पा – लोरी गाए राम ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

लप्पा – लोरी गाए राम।

मंद – मंद मुस्काए राम।।

कभी पकड़ अंगुली इतराएँ।

तनिक प्रेमरस वह बरषाएँ।।

हमको मन – मन भाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

कभी गाल पर करें गुदगुदी।

थोड़े नटखट बढ़े धुकधुकी।।

अपनेपन में नहाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

पकड़ – पकड़ दादा की टोपी।

बंसी धुन पर नाचें गोपी।।

निप्पल चूसें भाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

ठुमक – ठुमक वह घुटअन चलते।

घुँघरू , छल्ला टुन – टुन बजते।

मंत्र सुनें मुस्काए राम।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५४ ☆ कोल्हू का बैल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कोल्हू का बैल”।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५४ ☆

☆ कोल्हू का बैल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

निरंतर एक ही पथ पर

घूमता रहता है

आँखों पर बँधी होती है पट्टी

बस इसी आशा में

कि एक दिन निश्चित ही

पा जाऊँगा अपनी मंजिल

और नियति है जो घुमाती रहती है

आदमी भी घूमता रहता है

अपने द्वारा रचे गए चक्रव्यूह में

अभिमन्यु की जिसे

घुसना तो आता था चक्रव्यूह में

निकलना नहीं सीखा था

इसलिए मारा गया

मनुष्य भी कोल्हू का बैल

और अभिमन्यु की तरह ही

अपने आपको बेबस और लाचार

पाकर अभिशप्त है मरने को

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मुरारि ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मुरारि ? ?

काल बावरा

मेरी देह में

मुझे तलाशता रहा,

मुरारि की मानिंद

मेरा शब्द संसार

काल के माथे पर

नाचता रहा!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६१ ☆ गफ़लत न कीजियेगा निभाने में… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गफ़लत न कीजियेगा निभाने में “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६१ ☆

✍ गफ़लत न कीजियेगा निभाने में… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

दुनिया की भीड़ भाड़ में अपना न मिल सका

जो भी मिला है मुझसे से वो पूरा न मिल सका

 

मंज़िल की चाह जब न तलब मेरी बन सकी

मंज़िल का मेरी मुझको भी रस्ता न मिल सका

 *

उस पीर की मज़ार पै जाते थे चश्मे-नम

इक शख़्स वापसी में पै रोता न मिल सका

 *

इस हाई वे से हो गई रफ्तार तेज़  पर

राही को बचने धूप से साया न मिल सका

 *

विरसे में जो था बाँट लिए  भाई जब सभी

वो साथ देने माँ का ही जाया न मिल सका

 *

इस काहिली ने मुझपे सितम  ढाया इस तरह

तक़दीर में जो मेरी वो लिक्खा न मिल सका

 *

मुफ़्लिस की मुफ़्लिसी के सितम की ये इंतिहां

बच्चे को उसका चाहा खिलौना न मिल सका

 *

गफ़लत न कीजियेगा निभाने में कुछ कभी

करता रफ़ू जो रब्त की धागा न मिल सका

 *

शानों पे जिनको मैंने चढ़ा दी अरुण उड़ान

अंतिम सफ़र को उनका ही शाना न मिल सका

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६५ – ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये अखाड़ा निराला है।)

☆ हेमंत साहित्य # ६५ ☆

✍ ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे  

ये अखाड़ा निराला है,

ये वही पहलवान हैं,

जिन्हें अखाड़े में उतारा था हमने।

अपने ही हाथों से

अपने ही कंधों पर बिठाया,

फिर ताज भी पहनाया हमने।

 

मैं अकेला नहीं था,

माशरे के सभी मकीं थे

धर्म की घुट्टी पीकर

सो गये मदहोश,

और उँगली की एक स्याही

वर्षों की खामोशी बन गई।

 

हम सुनते रहें,

वे हमें सुनाते रहे रामधुन,

कि कहीं जाग ना जायें

हम

सुनकर सिसकियाँ

हमवतनों की

अपनों की.

हम सपनों में भारत गढ़ते रहे,

वे सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे।

 

मैं ढूँढ़ता रहा

उनकी आँखों में संवेदना।

पर वहाँ तो

कुर्सी का धुआँ था,

जिसने इंसान को ही ओझल कर दिया।

 

अगर संवेदना होती,

तो कलियाँ न कुचली जातीं।

पुस्तकों से भरे हाथ

ढाल न बनते,

गलियारों में धुआँ न उतरता,

लाठियाँ भविष्य की पीठ पर

इतिहास न लिखतीं।

 

अस्पतालों की खिड़कियों से

झाँकता हुआ कल,

पट्टियों में लिपटा पूछता रहा—

क्या यही था

उजाले का वादा?

 

फिर भी सिंहासन मुस्कुराता रहा,

जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अहंकार का मुकुट पहनकर

वह आईनों से भी

नज़रें चुराता रहा।

 

कौन समझाए उन्हें—

सिंहासन शाश्वत नहीं होते।

सोने की लंका भी

एक दिन राख हुई थी।

 

समय की मुट्ठी में

हर ताज की धूल लिखी है।

जनता देर से बोलती है,

मगर जब बोलती है,

तो अखाड़े बदल जाते हैं।

 

ये अखाड़ा निराला है…

यहाँ जीत उसी की नहीं होती

जो सबसे ऊँचा बैठा हो,

जीत अंततः उसी की होती है

जिसे कहते हैं

वोटर।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆ कविता – क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “क्रेता“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆

✍ कविता ☆ क्रेता☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हम सब बिके हुए हैं

किसके हाथों, पता नहीं

शायद,

विचारवानों के, विद्वानों के

सभ्यताओं के, शासनों के

सत्ताओं या सत्ताधीशों के।

 

या कि

अपने अहम् के, मद मोह के

समाज के, संसार के

द्वेष के, आग्रहों के

दुराग्रहों के,

पता नहीं।

 

बस यही पता करना है

हम किसके हाथों बिके हैं

यह पता चल जाए

तो मुक्त हो सकते हैं।

क्रेता से, छुटकारा

पा सकते हैं।

लेकिन, बहुत सजग रहने की

ज़रुरत है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९५ – काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९४ ☆

☆ –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

 

और हम

योजनाओं की के पीछे

भाग रहे हैं.

उपकारित कामों से

नींद की गोलियाँ रखी हैं

वे सोने का अभिनय कर रहे हैं।

मगर जान रहे हैं।

कैसी विडम्बना है-

सर्वोदय का दावा करने वाले

समस्याओं की भाषा कह रहे हैं।

सत्ताधारियों का सत्तामोह

आकांक्षियों का द्रोह

और विरोधियों का व्यामोह

देखने वाली नई पीढी

यदि हो रही है सौरभहीन

तो उसका क्या दोष है ?

उसका जो आक्रोश है

वह चाहे ठीक न हो

लेकिन गलत नहीं है.

कौन ऐसा माई का लाल है

जो स्वार्थी से आहत नहीं है।

तो आओ

हम अहिंसा को नई परिभाषा दें.

देश के पथराये मन प्राणों को

समाजवाद की आशा दो

हमें जन्मेजयी यज्ञ में

विषधरों का

हवन करना ही पड़ेगा.

समाजवाद के विध्वंसकों का

सरेआम हमें

दहन करना ही पड़ेगा।

यदि ऐसा नहीं किया

तो फिर क्या उपाय है?

 

सिरफिरे नेताओं

और

पचहत्तर घरानों की खातिर

करोड़ों लोगों को अभावों की भट्टी में

झोंकना कहाँ का न्याय है?

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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