(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मैं शब्द : तुम अर्थ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३१० ☆
☆ मैं शब्द : तुम अर्थ… ☆
एक नन्ही सी परिभाषा है, जीवन साथी की ‘मैं शब्द तुम अर्थ/ तुम बिन मैं व्यर्थ,’परंतु आधुनिक युग में यह कल्पनातीत है। आजकल तो जीवन- साथी की परिभाषा ही बदल गई है…’जब तक आप एक-दूसरे की आकांक्षाओं पर खरा उतर सकें; भावनात्मक संबंध बने रहें व मौज-मस्ती से रह सकें’ उचित है, अन्यथा संबंध-निर्वहन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जीवन खुशी व आनंद से जीने का नाम है; ज़िन्दगी को ढोने अथवा तिल-तिल कर मरने का नाम नहीं। सो! इस परिस्थिति में तुरंत संबंध-विच्छेद के लिए कदम बढ़ाना ही बेहतर है, सार्थक व सर्वश्रेष्ठ विकल्प है, क्योंकि आजकल ‘तू नहीं और सही’ का सर्वाधिक प्रचलन है।
प्राचीन काल में विवाह को पति-पत्नी का सात जन्मों तक चलने वाला संबंध स्वीकारा जाता था। परंतु आजकल इसके मायने ही नहीं रहे। वैसे तो आधुनिक युग में युवा-पीढ़ी विवाह रूपी संस्था को नकार कर, ‘लिव-इन’ में रहना अधिक पसंद करती है। जब तक मन चाहे साथ रहो और जब मन भर जाए; अलग हो जाओ। आजकल लोग भरपूर ज़िंदगी जीने में विश्वास रखते हैं। ‘खाओ पीओ, मौज उड़ाओ’ उनके जीवन का मूलमंत्र है। चारवॉक दर्शन में उनकी आस्था है और वे प्रतिबंधों में जीना पसंद नहीं करते।
शब्द ब्रह्म है; सृष्टि का सार है। शब्द और अर्थ का शाश्वत व चिरंतन संबंध है, क्योंकि शब्द में ही उसका अर्थ निहित होता है। ‘मैं शब्द, तुम अर्थ/ तुम बिन मैं व्यर्थ’ का जीवन में विशेष महत्व है। जिस प्रकार शब्द को अर्थ से अलग नहीं किया जा सकता; उसी प्रकार प्राचीन काल में पति-पत्नी को भी एक-दूसरे से अलग करने की कल्पना बेमानी थी, जिसका प्रमाण पत्नी का पति के साथ चिता के समय जौहर के रूप में देखा जा सकता था। परंतु समय के साथ सती-प्रथा का अंत हुआ, क्योंकि पत्नी को ज़िंदा जला देने को सामाजिक बुराई अर्थात् अपराध के रूप में स्वीकारा गया।
परंतु समय ने तेज़ी से करवट ली और संबंधों के रूपाकार में अप्रत्याशित परिवर्तन हुआ; लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे। वे अनचाहे संबंध-निर्वाह को कैंसर के रोग की भांति स्वीकारने लगे। जिस प्रकार एक अंग के कैंसर-पीड़ित होने पर, उस अंग को शरीर से निकाल कर बाहर फेंक दिया जाता है, ताकि उसका विष पूरे शरीर को दूषित न कर दे। उसी प्रकार यदि जीवन-साथी से विचार-वैषम्य हो, तो उसे जीवन से अलग कर देने को ही कारग़र उपाय समझा जाता है। यदि अपने शरीक़े-हयात से संबंध अच्छे नहीं हैं, तो उन संबंधों को ज़बरदस्ती निभाने का क्या औचित्य है? तुरंत संबंध-विच्छेद ही उसका सर्वोत्तम उपाय है; इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है… तलाक़ की संख्या में निरंतर इज़ाफा होना। पहले पति-पत्नी एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे। एक के अभाव में अर्थात् न रहने पर दूसरे को अपना जीवन निष्प्रयोजन अथवा निष्फल लगता था, क्योंकि वे एक-दूसरे की ज़रूरत बन चुके होते थे। परंंतु आजकल यदि पति-पत्नी में विचार-वैषम्य होता है; वे तुरंत अलग हो जाने को श्रेष्ठ उपाय स्वीकारते हैं।
आधुनिक युग में अहंनिष्ठ मानव आत्मविश्लेषण करना अर्थात् अपने अंतर्मन में झांकना व गुण-दोषों का विश्लेषण करना ही नहीं चाहता; उससे स्वीकारने की उम्मीद रखना, तो बहुत दूर की बात है। उसके हृदय में यह बात घर कर जाती है कि वह तो कदापि कोई ग़लती कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो गुणों की खान है। सारे दोष तो दूसरे व्यक्ति अर्थात् सामने वाले में हैं। इसलिए वह स्वयं में नहीं, प्रतिपक्ष को अपने भीतर सुधार लाने की आवश्यकता पर बल देता है। यदि वह समर्पण कर देता है, तो समस्या स्वतः समाप्त हो जाती है। यदि पत्नी, पति के अनुकूल आचरण करने लगती है; कठपुतली की भांति उसके इशारों पर नाचने लगती है, तो दाम्पत्य संबंध सुचारू रूप से क़ायम रह सकता है, अन्यथा अंजाम आपके समक्ष है।
ज़िंदगी एक फिल्म की तरह है, जिसमें इंटरवल अर्थात् मध्यांतर नहीं होता; पता नहीं कब एंड अर्थात् समाप्त हो जाए। आजकल संबंध भी ऐसे ही हैं… कौन जानता है, कब अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाए। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना, जब विवाहोपरांत चंद घंटों में पति-पत्नी में संबंध-विच्छेद हो गया और पत्नी अपना ससुराल छोड़कर मायके चली गई। यदि आप कारण के बारे में जानेंगे, तो अचंभित रह जाएंगे। प्रथम रात्रि को बार-बार फोन आने पर, पति का पत्नी से यह कहना कि ‘बहुत फोन आते हैं तुम्हारे’ और पत्नी का इसी बात पर तुनक कर पति से झगड़ा करना; उस पर संकीर्ण मानसिकता का आरोप लगा, सदैव के लिए उसे छोड़कर चले जाना … हृदय को उद्वेलित कर सोचने को विवश करता है, ‘क्या वास्तव में संबंध कांच की भांति नाज़ुक नहीं हैं, जो ज़रा-सी ठोकर लगते दरक़ जाते हैं?’ परंतु यहां तो निर्दोष पति को अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रदान नहीं किया गया। बरसों से महिलाएं भी यह सब सहन कर रही थीं। उन्हें कहां प्राप्त है…अपना पक्ष रखने का अधिकार? पत्नी को तो किसी भी पल जीवन से बेदखल करने का अधिकार पति को प्राप्त था। महात्मा बुद्ध का यह कथन कि ‘संसार में जैसा व्यवहार आप दूसरों के साथ करते हैं, वही लौट कर आपके पास आता है।’ इसलिए सबसे सदैव अच्छा, उत्तम व शालीन व्यवहार कीजिए।
सो! आधुनिक युग में संविधान द्वारा महिलाओं को समानाधिकार प्राप्त हुए हैं, जो कागज़ की फाइलों में बंद हैं। परंतु कुछ महिलाएं इनका दुरुपयोग कर रही हैं, जिसका अनुमान आप तलाक़ के बढ़ते प्रचलन को देखकर लगा सकते हैं। आजकल ज़िंदगी लघु फिल्मों की भांति होकर रह गयी है, जो सीधे चरम सीमा पर पहुंचती हैं; जहां समझौते अथवा विकल्प की लेशमात्र भी संभावना नहीं होती।
कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं, जो दुआ से मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं, जो किस्मत ही बदल देते हैं। इसलिए अच्छे दोस्तों को संभाल कर रखना चाहिए। वे आपकी अनुपस्थिति में भी आपके पक्षधर होते हैं तथा सदैव ढाल बनकर खड़े रहते हैं। वे आप पर विश्वास करते हैं; कभी आपकी निंदा नहीं करते और न ही आपके विरुद्ध आक्षेप सुनते हैं, क्योंकि वे केवल आंखिन-देखी पर विश्वास करते हैं, कानों-सुनी पर नहीं।
चाणक्य का यह कथन ‘ रिश्ते तोड़ने नहीं चाहिएं, परंतु जहां खबर न हो; निभाने भी नहीं चाहिएं ‘ बहुत सार्थक संदेश देता है। वे संबंध- निर्वहन पर बल देते हुए कहते हैं कि संबंध- विच्छेद कारग़र नहीं है। परंतु जहां संबंधों की अहमियत व स्वीकार्यता ही न हो; उन्हें ढोने का क्या लाभ…उनसे मुक्ति पाना ही हितकर है, श्रेयस्कर है। जहां ‘ताल्लुक़ बोझ बन जाए, तो उसको तोड़ना अच्छा,’ क्योंकि वह आपको मानसिक रूप से तो विचलित करता ही है; आकस्मिक आपदा में भी डाल सकता है। वैसे भी आजकल सहनशीलता तो मानव जीवन से नदारद है। कोई भी दूसरे की भावनाओं को अहमियत नहीं देना चाहता; केवल स्वयं को सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम समझता है। सो! समन्वय व सामंजस्यता की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? जहां समझौता नहीं होगा; वहां साहचर्य व संबंध-निर्वहन कैसे संभव है? आजकल हमारा विश्वास भगवान पर रहा ही नहीं। ‘यदि भरोसा प्रभु पर है, तो जो तक़दीर में लिखा है– वही पाओगे। यदि भरोसा ख़ुद पर है, तो वही पाओगे, जो चाहोगे।’ आजकल मानव स्वयं को भगवान से भी बड़ा समझता है तथा मनचाहा पाना चाहता है। इसलिए वह ‘तू नहीं, और सही’ में विश्वास कर आगे बढ़ता जाता है और जीवन में एक पल भी सुक़ून से नहीं गुज़ार पाता। सो! उसे सदैव घोर निराशा का सामना करना पड़ता है।
असंतोष अथवा और अधिक पाने की चाहना व लालसा अहंनिष्ठ व्यक्ति के जीवन की पूंजी बन जाती है और भौतिक संपदा प्राप्त करना उसके जीवन का एकमात्र प्रयोजन। धन से मानव सुख- सुविधाएं खरीद सकता है, जो केवल क्षणिक सुख प्रदान करती हैं। भले ही उस स्थिति में सब उसकी वाहवाही करते हैं, परंतु वह आंतरिक सुख-शांति व सुक़ून से कोसों दूर रहता है। इसलिए मानव को शाश्वत संबंध-निर्वाह करने की शिक्षा दी गई है। अरस्तु के शब्दों में ‘श्रेष्ठ व्यक्ति वही बन सकता है, जो दु:ख और चुनौतियों को ईश्वर की आज्ञा मानकर आगे बढ़ता है।’ सो! जीवन में विपत्तियों को ईश्वर की रज़ा स्वीकार, निरंतर आगे बढ़ते रहिए और पराजय को कभी मत स्वीकारिए। साहस व धैर्य से उनका सामना कीजिए, क्योंकि समय ठहरता नहीं; निरंतर चलता रहता है। इसलिए आप भी अनवरत आगे बढ़ते रहिए। वैसे आजकल ‘रिश्ते पहाड़ियों की तरह खामोश हैं। जब तक न पुकारें, उधर से आवाज़ ही नहीं आती’ दर्शाता है कि रिश्तों में स्वार्थ के संबंध तेज़ी से व्याप रहे हैं और अजनबीपन के अहसास के कारण चहुंओर मौन व गहरा सन्नाटा तेज़ी से बढ़ रहा है। सो! इस संवेदनहीन समाज में ‘ मैं शब्द, तुम अर्थ ‘ की कल्पना करना बेमानी है, कल्पनातीत है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – श्याम पधारो…।
रचना संसार # ८२ – गीत – श्याम पधारो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना – द्वार हृदय के अब तो खोलो…। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – ऋतु बसंत।)
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘स्वागतम्… नई पीढ़ी का…‘।)
☆ शशि साहित्य # १३ ☆
कविता – स्वागतम्… नई पीढ़ी का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
मालकिन बाई जाग्या व्हा जाग्या व्हा… मध्यान रातीचा चांदवा डोईवर आलाय म्हंजी धनी घराकडं येन्याचा टाईम झालाय… आता येत असत्याल सोसायटीच्या मेन गेटवरून कधी लेफ्ट कधी राईट कडं झुकत.. तो गेटवरचा आगाऊ वाॅचमन बहाद्दूर बारा बेण्याचा हाय.. तो सायबास्नी ततचं आडवून ठूतो आणि सतराशेसाठ वंगाळ वंगाळ प्रश्न इचारून लै बैजार करून सोडतो… सायबास्नी आधीच लै चढलेली आनी त्यात ह्याची चवकशी… इचालरयं काय सायेब उत्तर काय देतात.. कश्याचा कशाला मेळच जमयाचा नाही.. तवा सायेबाचं टकूर सटाकलं मग बोलतात ये लै श्यान्या कोन पिलयं रं तू का मी… मगं माझ्यापेक्षाही तूच लै बडबडतोय कश्यापायी… गपगुमान गेट उघड मला माझ्या घराकडं जायाच़ आहे.. आधीच लै लेट झालाय… त्यात रोजचा हा खुटानात वाढूळ टाईम होतो… अन घरी गेल्यावर आमचा सिलेंडरचा स्फोट होतो… च्यामायला आमच्या पुरूषाची काही बी मर्दानगीची जिंदगीच राहिली नाही… अन तू रं माकड तोंड्या बेन्या.. रातच्याला गपगुमान शेपुट अंगाभवती गुंडाळून डोळं झाकून पडून राहयचं सोडून.. अगदी माझ्या येन्याच्या वेळेलाच जीव तोडून नि घसा फोडून जो भुंकायचा बिगुल वाजवून समंद्या सोसाटीला जाग आणतूस… मला काय चोर समजतोस काय रं तू रोज… इतकी वर्षे इथं राहतूय मला काय अजून बी वळखंना व्हयं रं… ये तू सकाळच्या पारी बटर नि बिसकुट खायच्या येळेला या चौकात… मग दावतू तुला चांगलाच धतुरा… आगाऊ भा*खाव मला वळखंत न्हाई… माजलास गड्या तू… माझ्यापेक्षा मालकिनीची लै काळजी घेतोस… तरीच म्हटलं मी सोसायटीच्या आत शिरतो न शिरतो तोच माझ्या फ्लॅटमध्ये दिवाळी सारखा चकाचक लाईटाचा उजेड कसा काय पडतू… तो तू बिगुल वाजवून मालकिनीला मी आल्याची वर्दी देतूस व्हयं रं… तरी बरं अजून माझं टकूरं ताळ्यावर असतयं… इतकं पिऊन तर्र होऊन बी मी आपल्या घराकडं बरोबरच जातू… अजून एकदा बी दुसऱ्याच्या घराची इतक्या रातच्याला बेल मारून झोप मोड केली न्हाई… अन तशी केली असती तर मला सोसाटीतनं कधीच हाकलला असता… थू तुझ्या कुत्र्या माझ्याशी बेईमानी करतोस अन मालकिनीला इमानदारी दावतोस… अरं तुझ्या मुळीच ती रात्री अपरात्रीला जागं होऊन माझ्याबरोबर भांड भांडून भुस्कट पाडते… अन मला तर त्या वक्ताला डोळ्यावर आलेली झोपेची झिंग नि खंबेवर खंबा संपवून जड झालेल्या डोक्यात चढलेली नशा यातनं काय बी बोलायचं सुधरतचं न्हाई… सारखं आपलं मॅडमला आय ॲम सो साॅरी.. ओके गुडनाईट याच्या पुढं गाडी सरकतच न्हाई… बाहेरच्या बाल्कनीत हा देह जाऊन पडतो तेव्हा निजानंदी तल्लीन होतो… मग दिवसा कधी जाग येते तेव्हा माझी बोलती बंद असते… कान उघडेच असतात नि बायको तिकडून एके फोरटी सेव्हनच्या फैरीवर फैरी झाडत राहते… मी कधीच शहीद झालेला असतो… पण तिचं समाधान काही झालेलं नसतं… आता आजपासून दारूच्या वाटेला जानार न्हाई नि रोज रातच्याला जंटलमन सारखं वेळेवर घराकडं येईन अशी जातमुचलक्यावर सुटका होते… अन रात्र झाल्यावर पुन्हा माझा मी राहतच नसतो.. मी देवदास होऊन जातो नि मन आधीच पोहचलेले असते मागाहून पायही तिकडेच वळतात… चार दिन कि जिंदगी है अपनी तो अपनेही हिसाबसे जियेंगे.. कल हो न हो… म्हणत एकेक जाम का प्याला रिचवत जातो… बार बंद झाल्यावर बाहेर आणून टाकतात मला तेव्हा भानावर येतो अरे बापरे लै रात्र झाली गड्या… गडाचे दरवाजे तर बंद झाले असतीलच… पण त्याशिवाय दुसरा कुठलाच थारा नसल्यानं पुन्हा पुन्हा इथचं यावं लागतयं… काय करणार साली जिंदगीभी ही ऐसी है… जिना यहा मरना यहा इसके सिवा जाना कहा… आणि तू कुत्र्या तर माझ्या वाईटावर टपकलेलाच असतो… मी लांबून येतानाचा वास आला कि तू जो केकटायला लागतोस बेंबीच्या देठापासून… घरातनं एकदा बायकोनं कायमचं हाकलून दिल्यावर का मलापन तुझ्यासारखं रस्त्यावर आलेलं बघितलं की तुझं समाधान हुनार आहे असा तर तुझा डावं नसंल ना!
☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ४५ आणि ४६ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले☆
।। श्री नारद उवाच ।।
भक्तीसूत्र ४५.
तरङ्गायिता अपीमे सङ्गात्समुद्रायन्ती ॥ ४५ ॥
अर्थ : दु:संगानें जडणारे विकार सुरुवातीला जरी मंद लहरींप्रमाणे वाटले तरी त्या दु:संगामुळेच ते सागराप्रमाणे विशाल बनतात.
विवेचन : विकार हे नेहमी सौजन्याचा बुरखा घालून येत असतात असे म्हटले तर वावगे होणार नाही. आपल्याकडे परिणामी जे चांगले असते, त्याला चांगले म्हटले जाते. गुढी पाडव्याला आपण कडुनिंबाची पाने खातो, ती खाताना आपल्याला कडू लागतात, पण अंतिमतः ते आपल्या फायद्याचे असते. विषय सुरुवातीला आपल्याला छान वाटतात, पण अंतिमतः मात्र ते मनुष्याचा घात करतात.
या विकारांची बाधा कळून येत नाही. कारण ते अगदी सूक्ष्म प्रमाणात असतात. पण जसा त्यांना विषयांचा संबंध होत जाईल तसे तसे ते समुद्राप्रमाणे वाढत जातात. अग्नीची ठिणगी लहान असते, पण पेंढ्यांची गंजी जाळायला पुरेशी ठरते.
ज्ञानेश्वर माउली सांगतात.
‘देखे खेळता अग्नि लागला । मग तो न सावरे जैसा उधवला । तैसा इंद्रिया लळा दिधला । भला नोहे ॥’
(द्न्यानेश्वरी ३-२०४)
पारध्यांनी पसरलेले जाळे हरिणास प्रथम बाधक वाटत नाही पण परिणामी त्यातच त्याचा सर्वनाश असतो. जोपावेतो हे विकार तरंगासारखे अल्प परिमाणात असतात तोपावेतो त्यांतील दोषदर्शन न झाल्यामुळे त्यांचा त्याग शक्य असूनही केला जात नाही. मग एकदा का ते समुद्रासारखे विशाल व्यापक झाले की आवरले जाणे शक्य नाही. सागराचा दृष्टांत देण्यात त्याची भयानकता, विशालता दाखविणे हा उद्देश असावा. सागर तरून जाणे जसे कठीण तसेच हे कामक्रोधादि विकार तरून जाणेही कठीण आहे.
आपण समाजात राहतो. समाजातील बऱ्यावाईट माणसांशी आपला संबंध येणे अगदीच स्वाभाविक आहे. पण त्या वाईट लोकांचा गुण आपल्या अंगी येणार नाही, यासाठी आपण दक्ष रहाण्याची नितांत गरज आहे. काही लोकं घराच्या वाशासारखे असतात, त्यांना टाळणे शक्य नसते. मग त्यांना सोबत घेऊनच जीवन जगावे लागते. यासाठी विशेष दक्षता घ्यावी लागते. क्रोध आणि काम या प्रमुख विकारांवर आपण ताबा मिळविला तर अर्धे मैदान जिंकले असे समजायला हरकत नाही.
जय जय रघुवीर समर्थ
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नारद भक्तिसूत्र ४६
कस्तरति कस्तरति मायाम्? यः सङगान्स्त्यजति यो
महानुभावं सेवते, निर्ममो भवति ॥ ४६ ॥
अर्थ : माया तरुन कोण जातो? मायेच्या पार कोण जातो? जो आसक्तींचा त्याग करतो. जो ममत्व रहित होतो. (तोच मायेच्या पलिकडे जातो.
विवेचन : मागील सूत्रातून दुःसंग हा कसा बाधक आहे व कामादिकांच्या द्वारे सर्वनाशास कारण आहे हे सांगितले. पण या सर्व विकारांचा समूल नाश झाला पाहिजे. केवळ कामक्रोधादिकांचा नाश झाला पण त्यांचे मूळ जी माया ती राहिली तर तिच्यापासून पुन्हा सर्व संसार निर्माण होण्यास वेळ लागणार नाही. म्हणून माया-तरण झाले पाहिजे. ते कोण करू शकतो याचा विचार या सूत्रात केला आहे. प्रथम माया म्हणजे काय पाहिले पाहिजे. उपनिषदे, पुराणे, स्मृती, गीता व संत-वाङ्मयातून, तसेच शास्त्रकारांच्या दर्शन-ग्रंथातून मायेचा फार विचार केला आहे. मायेचीच अविद्या, प्रकृती, प्रधान, कल्पना, संसार, भ्रम इत्यादी नावे आढळतात.
समर्थ म्हणतात,
*”माया दिसे परी नासे । वस्तु न दिसे परी न नासे । माया सत्य वाटे परी मिथ्या असे । निरंतर ॥”*
(दास. १४. १०. ०१)
शुद्ध चैतन्याला जीवदशेत आणून संसारात अडकवणारी ती माया असे श्री ज्ञानेश्वर महाराजांनी सांगितले आहे.
*”तैसे भूतजात सर्व । हे माझेचि कीर अवयव । परि मायायोगे जीव । दशे आले ॥”*
(ज्ञा. ७-६६)
मायेच्या दोन महत्त्वाच्या शक्ती आहेत. आवरण आणि विक्षेप. आवरणशक्तीने चैतन्याच्या विशेष स्वरूपास झाकून ती त्याला आपल्या स्वरूपाचा विसर पाडते हेच अज्ञान.
*”आपुला आपणपया । विसरू जो धनंजया । तेचि रूप यया । अज्ञानासी ॥”*
(ज्ञा. १४-७१.)
ही माया आपल्या विक्षेपशक्तीने ब्रह्मांडस्वरूप सर्व सृष्टी उत्पन्न करते. तसेच जीवाला देहद्वयाचा अहंकार घ्यावयास लावून त्याच्या ठिकाणी कर्तृत्व भोर्क्तृत्वादी धर्माचा तादात्म्य अध्यास निर्माण करते; असे वेदांतग्रंथांतून म्हटले आहे. माया ही भगवंताची सद्सद्विलक्षण अशी अनिर्वचनीय शक्ती आहे.
जीवाला दुःख शोकात्मक संसार भोगण्याचे कारण केवळ मायाच आहे असे श्री ज्ञानेश्वर महाराज सांगतात.
*”दुःख शोकाचिया घाई । मारिलिया सेचि नाही । हे सांगावया कारण काई । जे ग्रासिले माया ॥”*
(ज्ञा. ७-१०७)
वरील सूत्रात ‘तरति’ हे क्रियापद घेतले आहे ते महत्त्वाचे आहे. तरणे ही क्रिया एखाद्या मोठ्या नदीतून पोहून पलीकडे जाणे, तिचे अतिक्रमण करणे या अर्थी होत असते. गीतेमध्येही सातव्या अध्यायात ‘मायामेतां तरन्ति ते’ असे म्हटले आहे. पोहणे ही क्रिया एखाद्या नदीतून, सामान्य जलाशय, तळे, विहीर, इत्यादिकांतून होत असते. ती अल्पकाळ श्रमपरिहाराकरिता होते. पण पोहणे व तरणे यांत अंतर आहे. जलाशय, तळे, विहीर इत्यादिकांत पोहणारा जेथे पोहण्यास प्रारंभ करतो तेथेच परत येतो. पण तरून जाणे म्हणजे एका तीराहून निघून मधला पाण्याचा भाग ओलांडून परतीराला जाणे. याकरिता महानदी किंवा समुद्रच घ्यावा लागतो. तरुन जाण्यासाठी तर वापरली जाते. आपण सगळे या भवनदीत, अर्थात भवसागरात आहोत असे सर्व संत सांगतात. या मायेला जिंकल्याशिवाय हा भवसागर तरुन जाणे शक्य नाही. भगवंत म्हणतात,
*”माझी ही त्रिगुणी दैवी माया न तरवे कुणा| कासेस लागले माझ्या ते चि जाती तरुनिया|| “*
(गीताई ०७. १४)
अंतरंग व बहिरंग असे संगाचे दोन प्रकार आहेत. बहिरंग स्त्री, पुत्र, वित्त, गृहक्षेत्रादी व अंतरंग काम-क्रोध, लोभ, अहंकारादि हे दोन्हीही जीवाला परमात्म्याकडे जाऊ देत नाहीत. वास्तविक वर पुत्र, वित्त, कलत्रादी विषय बहिरंग म्हटले आहेत. जोपावेतो देह आहे तोपावेतो यांचाही संबंध राहील, मग त्याग कसा होणार? येथे संपूर्ण विषयांचा त्याग हा अर्थ अभिप्रेत नाही. कारण स्वरूपाने ते बाधक नाहीत. बाधक अंश संग म्हणजे आसक्ती, अभिनिवेश, अहंत्व, ममत्व, प्रियत्वबुद्धी होय. तीच साधकाला घातक असते, त्या आसक्तीचा त्याग म्हणजेच संगत्याग होय, पण या विषयांच्या ठिकाणी अनेक जन्माचा संबंध असल्यामुळे नित्यत्व बुद्धी, सुखरूपतेची बुद्धी, अनुकूल बुद्धी असते. केवळ मनच काय पण अंतःकरणचतुष्ट्य सर्व त्या विषयात रंगून जाते. असा हा संग दृढ झालेला आहे.
असे जरी आहे तरी जेव्हा अंतःकरणात विवेक निर्माण होतो तेव्हा अंतःकरण, बुद्धी, विषय यांचे अनित्यत्व पटते व एक वेळा अनित्यत्व, अनात्मत्व पटले म्हणजे तो साधक पुन्हा त्यात अडकला जात नाही. तो विवेक महात्म्यांच्या कृपेविना प्राप्त होऊ शकत नाही.
येथे ‘संगान्स्त्यजति’ असे बहुवचन आहे. संगाचे अंतरंग व बहिरंग असे दोन प्रकार वर सांगितले आहेत. बाह्यसंग काही अवांतर कारणाने म्हणजे दोषदृष्टीने सुटू शकतील पण फार बाधक असणारे अंतरसंग हे विना विवेक ज्ञानाच्या टाकले जाणार नाहीत. याकरिता ”यो महानुभावं सेवते” हे वाक्य सूत्रात आले आहे. येथे ‘महानुभाव’ हा शब्द महत्त्वाचा आहे. मागे अडतीस व एकूणचाळिसाव्या सूत्रात ‘महत्’ पद संतांच्याकरिता वापरले आहे. त्यांनाच येथे महानुभाव असे म्हटले आहे. महान म्हणजे मोठा आहे अनुभव ज्यांना, त्यांना महानुभाव म्हणावे. अनुभव हा एक जीवनाचा स्थायीभाव आहे. जीवनातून अनुभव वगळता येणार नाही. जीवन हे अनुभवस्वरूप असते. अनुभव हा एक ज्ञानाचा प्रकार आहे. मुख्य ज्ञानाचे दोन प्रकार वेदान्तशास्त्रात सांगितले आहेत. स्मृती आणि अनुभव. प्रमाणापासून झालेल्या ज्ञानास अनुभव म्हणतात व अनुभवापासून जे संस्कार होतात त्या संस्कारांपासून जे ज्ञान होते ते स्मृतिज्ञान होय.
अनुभवातही यथार्थ-अयथार्थ, प्रमा अप्रमा (भ्रम) असे प्रकार आहेत. योग्य प्रमाणाने योग्य विषयाचे जे यथार्थ ज्ञान होते त्यास प्रमा म्हणजे यथार्थ ज्ञान म्हटले जाते. जेव्हा प्रमाणात दोष शिरतो, विषय अयोग्य असतो म्हणजे बाधित असतो. त्याचे जे ज्ञान ते अप्रमा (भ्रम) म्हटले जाते. दोरीवर जर एखाद्याला सर्पज्ञान झाले तर तो भ्रम होय. कारण तो दोरीच्या अज्ञानाने इंद्रियदोषादिकांमुळे झालेला असतो व कालांतराने राहत नाही म्हणजे सर्पभ्रम बाधित होतो. म्हणून तो अनुभवही बाधित, अप्रमा, भ्रम म्हटला जातो. संसारात काही अनुभव प्रमाणभूत म्हणजे खरे असतात व काही अनुभव अप्रमा म्हणजे भ्रमरूप असतात, निष्फल नव्हे बाधक असतात. अनेक विषयांचा अनुभव मनुष्य घेत असतो पण तो टिकत नाही. सुखप्रद होत नाही. तसेच विषय कार्य असल्यामुळे अल्प आहेत. “यदल्पंतन्मर्त्य” जे अल्प ते मर्त्य म्हणजे विनाशी असते असा उपनिषदाचा सिद्धान्त आहे. सामान्यच काय पण इंद्रादिक देवांच्या स्वर्गीय अलौकिक अनुभवालाही तुच्छता आहे. तेही अनुभव घेणारे महान म्हटले जात नाहीत. महान अनुभव म्हणजे ज्या अनुभवाचा विषय मोठा, प्रमाण निर्दोष व अनुभव घेणारा अधिकारी योग्य तो महान एक परमात्माच आहे. याचा विचार मागे आला आहे. त्याचा प्रत्यक्ष तादात्म्याने अनुभव भक्तांना येत असतो.
जलात बुडणार्यांना जशी बळकट नौका तारून नेते त्याप्रमाणे या घोर संसारात गटंगळ्या खाणार्या जीवास शांत चित्त असलेले ब्रह्मवेत्ते संतच या संसारसागरांतून तरून जाण्याला मोठा आधार असतात.
जन्माला आलेला मनुष्य मरणार आहे, हे अंतिम सत्य आहे. येताना मनुष्य रिकाम्या हाताने येतो, आणि जाताना रिकाम्या हाताने जातो. इथुन जाताना जर तो सर्व गोष्टींची आसक्ती त्यागून जाऊ शकला, तर त्याला मुक्ति मिळण्याची शक्यता असते, असे सर्व संत सांगतात. सर्व संत असे सांगतात की प्रापंचिक मनुष्याला, साधकाला परमार्थ मार्गात पत्नी कधीही अडथळा ठरत नसते, तर तिच्याबद्दल असलेले *ममत्व* त्याला बाधक ठरत असते.
काळोखात मनुष्याला भीती वाटते. पण त्याचवेळी त्याला जर कुठे अग्नी दिसला, तर त्याची थंडी, भय आणि अंधार तिन्ही एकाच वेळी नष्ट होतात. त्यासाठी भगवंताचा आश्रय सर्वोत्तम ठरू शकतो.
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “फागुनी आहट : रंगों से पहले का उजास…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २७८ ☆फागुनी आहट : रंगों से पहले का उजास… ☆
फाल्गुन का शुक्ल पक्ष जैसे ही आरंभ होता है, प्रकृति के स्वभाव में एक सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देने लगता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं होता—यह धीमा, संयत और मधुर होता है। जैसे कोई कलाकार रंग भरने से पहले कैनवास पर हल्की रेखाएँ उकेर रहा हो।
हवा में एक नई पारदर्शिता है। धूप में कोमलता घुल गई है। वृक्षों की शाखाओं पर नवांकुरों की हरियाली केवल मौसम का संकेत नहीं, बल्कि जीवन की पुनरावृत्ति का संदेश है। सरसों के खेतों का पीत आभास, आम्र-मंजरियों की गंध, और दूर कहीं कोयल की प्रथम तान—ये सब मिलकर एक ऐसी भूमिका रचते हैं, जिसे हम “फागुनी आहट” कह सकते हैं।
यह वह समय है जब रंग अभी खुले नहीं हैं, पर उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। जैसे मन के भीतर कोई सुप्त ऊर्जा जाग रही हो।
और इसी जागरण को शब्द मिलते हैं—
खुशियाँ अपार लायी,
हौले-हौले मुस्कायी।
झूम के गुलाल संग,
देखो हमजोली आयी।।
*
तोड़ सारे बंधनों को,
बोलती उदासी देखो।
कलियाँ सजी हैं सारी,
रंग बिखराती देखो।।
फागुन केवल ऋतु नहीं, एक मनःस्थिति है। यह हमें याद दिलाता है कि ठहराव स्थायी नहीं होता। जमी हुई ठंडक के बाद ऊष्मा अवश्य आती है। रिश्तों में आई दूरी पिघल सकती है। संवाद फिर से आरंभ हो सकते हैं।
आज का युवा वर्ग, जो गति और प्रतिस्पर्धा के बीच जी रहा है, उसके लिए भी फागुन एक संदेश है—रुककर अपने भीतर के रंगों को पहचानो। जीवन केवल लक्ष्य नहीं, उत्सव भी है।
और शायद इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए—
भावनाओं के तो बाँध
टूट-टूट बहते हैं।
जाने-अनजाने सारे
भेद सदा कहते हैं।।
*
लाल, नीले, पीले, हरे—
करते कमाल रंग।
फाग और फगुआ का
साथी ये धमाल रंग।।
फागुनी आहट हमें सिखाती है कि परिवर्तन शोर से नहीं, संकेत से आता है। उत्सव अचानक नहीं उतरते, वे भीतर तैयार होते हैं।
अभी रंगों का उत्सव दूर है, पर यह प्रारंभिक स्पर्श ही सबसे कोमल और सच्चा होता है। यही वह क्षण है जहाँ प्रकृति और मन एक साथ मुस्कुराते हैं।
फागुन की यह धीमी दस्तक हमें आमंत्रित करती है—
अपने भीतर के धुंधले कोनों में भी थोड़ा उजास भरने के लिए।