हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 68 ☆ कोरोना काल और व्यंग्य लेखन ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का समसामयिक  विषय पर आधारित रचनाकारों की मनोदशा दर्शाता आलेख  कोरोना काल और व्यंग्य लेखन। इस अत्यंत सार्थक  व्यंग्य के लिए श्री विवेक जी का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 68 ☆

☆ व्यंग्य – कोरोना काल और व्यंग्य लेखन ☆

कोरोना जैसे वायरस के लगभग 100 वर्षों के अंतराल में एक बार आने की आवृत्ति देखी गई है । विकिपीडिया के अनुसार 1820 मैं वैश्विक प्लेग के बाद 1920 में स्पेनिश फ्लू और अब 2020 में  कोरोना का प्रकोप दुनियाभर में है । इस वायरस ने सबको अचानक एकाकी कर दिया है ।

प्रायः रचनाकार के एकाकी मन में अभिव्यक्ति की छटपटाहट होती है

कोरोना काल का यह अत्यंत दुखद पहलू रहा की यह समय विसंगतियों से भरपूर है,अनायास बिना स्पष्ट प्लानिंग के टोटल लाकडाउन सुदूर गांवों तक लागू हुआ जो जहां था वहीं अटक गया ।

सारे देश मे सोनूसूद की जिजीविषा, गुरुद्वारों के लंगर की  जरूरत महसूस हो रही थी,  छोटे छोटे प्रयास हर शख्स ने किए भी, मध्यवर्ग ने अपनी कामवाली, माली, चौकीदार,ड्राइवर को बिना काम वेतन दिए, सरकार ने भी उनकी समझ में बहुत कुछ किया पर यह सब नाकाफी सिध्द हो रहा है, देश, परिवार, संस्थाओं की आर्थिक स्थितियां गड़बड़ा गई हैं ।

व्यंग्यकार जो हर छोटी बडी घटना पर लिखता है, इस सब परिवेश पर चुप रह ही नही सकता, फिर खाली समय ने अतिरिक्त सहयोग किया ।

स्वयं मैंने लाकडाउन शीर्षक से एक व्यंग्य संकलन वैश्विक स्तर पर संकलित किया जो छपने को है, व्यक्तिगत स्तर पर अनेक व्यंग्य लिखे जो कोरोना की वैश्विक विसंगतियों पर केंद्रीय भाव के  साथ हैं।

इस परिचर्चा के संदर्भ में आशय यही है कि कोरोना जनित अभूतपूर्व स्थितियो में व्यंग्यकर्मियो के लिए असीमित कैनवास पर अपने अपने अनुभवों के आधार मनचाहे चित्रांकन के अवसर को हम व्यंग्य यात्रियों ने यथासम्भव सकारात्मक तरीके से उपयोग किया है ।

लेखन, प्रकाशन हमारी इसी ऊर्जा का सुपरिणाम है ।

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 31 ☆ अभिमान की डिजिटल गाथा ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु‘

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “अभिमान की डिजिटल गाथा” यह रचना एडमिन द्वारा संचालित सोशल साइट्स के कार्यप्रणाली और सदस्यों के मनोविज्ञान का सार्थक विश्लेषण करती है । इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 31 – अभिमान की डिजिटल गाथा ☆

भाव बढ़ने के साथ; प्रभाव का बढ़ना तय ही समझ लीजिए। जीवन में भले ही अभावों का दौर चल रहा हो किन्तु स्वभाव तो ऐसा रखेंगे; जिससे दुर्भाव ही उत्पन्न होता हो। क्या किया जाए ये अभिमान चीज ही ऐसी है कि जिसे हुआ समझो वो अपने साथ- साथ सबको ले डूबता है। घमंड का साथ हो और छप्पर फाड़ कर जब अनायास कुछ मिलने लगता है, तो बहुत सारे प्रतिद्वंद्वी भी तैयार हो जाते हैं। ऐसी ही कुछ कहानी डिजिटल समूहों के एडमिन की भी होती है।

जरा – जरा सी बात पर हाय तौबा करना, पूरे पटल को सिर पर उठा लेना। नए- नए नियमों को बनाना फिर लागू करवाना। अरे भई संख्या बल यहाँ भी आ टपकता है। जब अपनी पकड़ मजबूत हो तो जिसे जो जी चाहे कहते रहो, पूरे सदस्य का भरा- पूरा डिजिटल परिवार है। कुछ लोग रूठ कर चले भी जाएँ, तो क्या फर्क पड़ता है। जहाँ भी जायेंगे यही राम कहानी गायेंगे, इससे मुफ्त का प्रचार होगा। कि फलाँ ग्रुप बहुत अहंकारी है, नए नियमों की तो रोज ही बौछार करता है। और  जितनी भी बुराई हो सकती है, कर देंगे।

पर मजे की बात तो ये है, कि व्यक्ति वहीं आकर्षित होता है, जहाँ पूछ- परख कम होती हो। कुछ नया सीखने को मिलता हो। जब तक नयापन हो तभी तक लगाव जायज रहता है,जैसे ही वहाँ पहचान बढ़ी, तो  अड़ंगेबाज लोग अपनी असलियत पर उतर ही आते हैं और सुझावों का दौर शुरू कर देते हैं।

अरे भई जोड़- तोड़,और सलाह  देने में तो हम सबकी मास्टरी है, बस आवश्यकता उन लोगों की है जो नियमों का पालन करें।

ऐसे लोगों की खोजबीन में सारे एडमिन लगे रहते हैं, जैसे ही कोई जुझारू व्यक्ति मिला, बस उसकी धरपकड़  शुरू हो गयी। मीठी भाषा से रिझा कर कार्य करवाना व सम्मानित करना तो अभिमान की पहली सीढ़ी है। बस समझो सफल शुरुआत हो गयी। बदलाव करते रहिए, बढ़ते रहिए।

कुछ न कुछ करते रहने वालों का सम्मान तो बनता है, भले ही अभिमान क्यों न सिर पर चढ़ने लगे। धीरे- धीरे कब ये सारे चरण पार कर सुप्रीमों की श्रेणी में आ बैठता है, पता ही नहीं चलता। हद तो तब होती है जब ये एडमिन को ही अपना असली रूप दिखाने लगता है। बस फिर क्या एक झटके में रिमूव रूपी तलवार से काम तमाम।

अभिमान और अहंकार तो किसी के नहीं टिकते तो इन सामान्य डिजिटल सदस्यों के कैसे बचेंगे,इसी पर चिंतन – मनन जारी है।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 60 – अखबारों में छपी खबर है….. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’


(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  आपकी एक कालजयी रचना अखबारों में छपी खबर है…..…. । )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 60 ☆

☆ अखबारों में छपी खबर है….. ☆  

 

पढ़ने में आया है कि अब

नहीं किसी को कोई डर है

अखबारों में छपी खबर है।

 

भूखे कोई नहीं रहेंगे

खुशियों से दामन भर देंगे

करते रहो नमन हमको तुम

सारी विपदाएं हर लेंगे,

डोंडी पीट रहा है हाकिम

नगर – नगर है।

अखबारों में छपी खबर है।

 

पारदर्शी मौसम विज्ञानी

किस बादल में कितना पानी

अलादीन चालीस चोरों की

लोकतंत्र से जुड़ी कहानी,

घात लगाए राहों में

निर्मम अजगर है।

अखबारों में छपी खबर है।

 

बांध बनाए बिजली आई

खेतों में हो रही सिंचाई

खुश हैं साहूकार मन ही मन

जमकर होगी माल उगाही,

चिंता से कृषकों की अवगत

विकल नहर है।

अखबारों में छपी खबर है।

 

पूर्ण सुरक्षित कोमल कलियाँ

चौकस गाँव शहर घर गलियां

उदघोषित से शोर-शराबे

वन,उपवन में बैठे छलिया,

चौराहे बाजार भीड़ में

पग-पग डर है।

अखबारों में छपी खबर है।

 

इनमें-उनमें बैर नहीं है

मुख पृष्ठों पर लिखा यही है

इश्तहार कुछ और दिखाएं

पर सच जो वह छुपा नहीं है,

मौन जिन्हें रहना है वे ही

आज  मुखर हैं

अखबारों में छपी खबर है।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 41 – बापू के संस्मरण-15- काम की चीज को संभालकर रखना चाहिए ……… ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – काम की चीज को संभालकर रखना चाहिए ……… ”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 41 – बापू के संस्मरण – 15 – काम की चीज को संभालकर रखना चाहिए ……… ☆

 नहाते समय गांधीजी साबुन का प्रयोग नहीं करते थे । अपने पास एक खुरदरा पत्थर रखते थे।  वर्षों पहले मीराबहन ने उन्हें यह पत्थर दिया था । नोआखाली की यात्रा के समय एक बार पत्थर संयोग से पिछले पड़ाव पर छूट गया । उस समय मनु गांधीजी के साथ रहती थी । स्नानघर में जब उसने गांधीजी से कहा, बापूजी, नहाते समय आप जिस पत्थर का प्रयोग करते हैं, वह मैं कहीं भूल आई हूं । कल जिस जुलाहे के घर ठहरे थे, शायद वह वहीं छूट गया है । अब क्या करूं?”

गांधीजी कुछ देर सोचते रहे । फिर बोले, तुझसे गलती हुई, तू उस पत्थर को खुद खोजकर ला।”

सुनकर मनु सकपका गई। फिर झिझकते हुए पूछा,”गांव में बहुत से स्वयंसेवक हैं, उनमें से किसी को साथ ले जाऊं?”

बापू ने पूछा, “क्यों?”

मनु को क्रोध आ गया । बापूजी सब कुछ जानते हैं, फिर भी पूछते हैं. यहां नारियल और सुपारी के घने जंगल हैं । अनजान आदमी तो उसमें खो जाये । फिर ये तूफान के दिन हैं । आदमी, आदमी का गला काटता है। आदमी, आदमी की लाज लूटता है। राह एकदम वीरान और उजाड़ है । उस पर कोई अकेले कैसे जाये? मगर भूल जो हुई थी। उसने क्यों का कोई जवाब नहीं दिया । किसी को साथ भी नहीं लिया, अकेली ही उस राह पर चल पड़ी । कांप रही थी, पर उसके कदम आगे बढ़ रहे थे। पैरों के निशान देखती जाती थी, रामनाम लेती जाती थी और चलती जाती थी । आखिर वह उस जुलाहे के घर पहुंच गई । उस घर में उस वक्त केवल एक बुढ़िया रहती थी । वह क्या जाने कि वह पत्थर कितना कीमती था । शायद उसने तो उसे फेंक दिया था । मनु इधर-उधर ढ़ूंढने लगी। आखिर वह मिल गया । मनु के आनंद का पार न रहा ।  खुशी-खुशी लौटी ।

डेरे पर पहुंचते-पहुंचते एक बज गया । जोर की भूख लग आई थी और इस बात का दुख भी था कि इस भूल के कारण वह अपने बापू की सेवा से वंचित रह गई । इसीलिए वह उन्हें पत्थर देते समय रो पड़ी । उसे समझाते हुए गांधीजी बोले, “इस पत्थर के निमित्त आज तेरी परीक्षा हुई । इसमें तू पास हुई । इससे मुझे कितनी खुशी हो रही है । यह पत्थर मेरा पच्चीस साल का साथी । जेल में, महल में, जहां भी मैं जाता हूं, यह मेरे साथ रहता है । अगर यह खो जाता तो मुझे और मीराबहन को बहुत दुख होता ।

तूने आज एक पाठ सीखा । ऐसे पत्थर बहुत मिल जायेंगे, दूसरा ढ़ूंढ लेंगे, इस खयाल से बेपरवाह नहीं होना चाहिए । काम की हर चीज को संभालकर रखना सीखना चाहिए।”

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

 

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 40 ☆ सजल – फौलाद-वक्ष  हिन्द के हर  वीर  का तना है ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

( श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर  समसामयिक रचना  फौलाद-वक्ष  हिन्द के हर  वीर  का तना है । श्रीमती कृष्णा जी की लेखनी को  इस अतिसुन्दर रचना के लिए  नमन । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 40 ☆

☆ सजल – फौलाद-वक्ष  हिन्द के हर  वीर  का तना है ☆

 

गिरता  चरित्र   चीन  का  उदाहरण  घना  है

जग-आपदा के दोषों से उसका कर सना है

 

उसके लिए दो कौड़ी है मोल  मनुजता का

छल, दंभ, कपट, धोखे, औ’ स्वार्थ साधना है

 

घुसपैठ कर रहा है, छुप-छुप के वार करता

भारत   मगर   चबाता   नाकों  उसे  चना  है

 

इस मातृभूमि पर क्यों, है  कुटिल  दृष्टि  तेरी

भू-चोर तू भारत का, चोरों  का सरगना है

 

कितनी भी कोशिशें कर, तू वज्र भी चलाले

फौलाद-वक्ष  हिन्द के हर  वीर  का तना है

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 11 – शब्द की गाथा ☆ श्री प्रह्लाद नारायण माथुर

श्री प्रहलाद नारायण माथुर

( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें  सफर रिश्तों का तथा  मृग तृष्णा  काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा  जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता शब्द की गाथा।) 
अभी हाल ही में आपकी नवीन पुस्तक ” Wing Commander Abhinandan Varthaman, a Real Hero” प्रकाशित हुई है जो कि अमेजन पर भी उपलब्ध है। आपको ई – अभिव्यक्ति परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनायें ।

 

Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>>  मृग  तृष्णा  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 11 – शब्द की गाथा ☆

 

शब्द में समाया है फलसफा जिंदगी का,

शब्द में समाया है गम, शब्द में ही भरी है खुशी,

शब्द से मिलती अथाह पीड़ा, शब्द से ही भरता घाव ।।

 

शब्द रिश्तों में उलझन पैदा कराता,

शब्द राह में कांटे बिछाता, शब्द ही राह में फूल बिछाता,

शब्द रिश्तों में कराता टकराव, शब्द बढ़ाता रिश्तों में प्यार ।।

 

शब्द-जाल मधुमक्खी का छत्ता,

शब्द अपनों में जहर घोलता, शब्द ही अपनों में मधु घोलता,

शब्द बनाता अपने को पराया, शब्द बनाता पराये को अपना।।

 

तोड़ दो शब्दों का भ्रमजाल,

शब्द से वाणी पर रहे संयम, शब्दों में हो सबका मान,

शब्दों के निकाल दो विष बाण, शब्दों में हो सिर्फ अमृत वाण।|

 

©  प्रह्लाद नारायण माथुर 

8949706002
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 62 – पादाकुलक वृत्त ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  स्त्री विमर्श पर एक अतिसुन्दर काव्यात्मक अभिव्यक्ति पादाकुलक वृत्त। मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य को  साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 62 ☆

☆ पादाकुलक वृत्त ☆

मनी मानसी तूच राहसी

अखंड चाले तुझेच चिंतन

मला कळेना रोग कोणता

आत्म्या भवती कसले रिंगण ?

 

तूच राहसी श्वासांमध्ये

सदाकदा मी तुला घोकते.

राधा माधव मीरा गिरिधर

रूप तयांचे उभे ठाकते

 

तनामनाचा ताबा घेशी

अन हृदयीचा राजा होशी

तुझ्यावीण ना दूजा कोणी

आसपास तू सदा राहसी

 

तुझ्याच साठी सजते धजते

लाज न लज्जा  आता उरते

अविचारी की स्वैरपणा हा

म्हण काहीही तुला हवे ते

 

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 48 ☆ डाल और रिश्ते ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है।आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  एक भावप्रवण रचना “डाल और रिश्ते”। )

आप निम्न लिंक पर क्लिक कर सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी के यूट्यूब चैनल पर उनकी रचनाओं के संसार से रूबरू हो सकते हैं –

यूट्यूब लिंक >>>>   Neelam Saxena Chandra

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 48 ☆

☆ डाल और रिश्ते  ☆

जब भी मेरे बगीचे में

तेज़ बारिश होती है

और आँधियाँ सायें सायें चलती हैं,

एक न एक जामुन के पेड़ की डाल

दरख़्त से टूटकर गिर ही जाती है

और उसे यूँ ज़मीन पर गिरा हुए देख,

न जाने क्यों आँखों से आंसू आ जाते हैं!

 

शायद यह डालियाँ

याद दिलाती हैं मुझे

उन टूटते रिश्तों की

जो ज़रा सी मुश्किलें आने पर

बिखरकर गिर जाते हैं…

यह एक विपदा आई,

और यह एक रिश्ता झड़ा…

यह दूसरी अड़चन आई,

और यह रिश्ता टूट गया…

 

क्यों टूटती हैं यह डालें इतनी आसानी से?

क्या यह कोई क़ुदरत का नियम है?

या फिर यह डालें खोखली हो गयी हैं?

या फिर इन दरख्तों की जड़ ही

अन्दर से कमज़ोर हो गयी है?

 

टूटने का कारण सोचने चली थी,

कि अचानक नज़र उस डाल पर फिर पड़ गयी,

जो क़ुदरत को लाचार नज़रों से देख रही थी-

कभी उससे हाथ जोड़कर याचना कर रही थी,

कभी उसकी सिसकती हुई आवाज़ सुनाई आ रही थी,

कभी वो चीख रही थी, कभी चिल्ला रही थी,

“ऐ क़ुदरत! मुझे एक बार फिर से मिला दो न

मेरे उस बड़े से दरख़्त से!”

 

मुझे पता था

क़ुदरत ख़ुद ही लाचार है-

पता नहीं उसे वो चीखें सुनाई भी दे रही थीं या नहीं,

पर मैं अबस सी भाग गयी घर के भीतर

कि नहीं देखी गयी मुझसे उस डाल की

बेचारगी और बेबसी!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

 

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 61 – अनंत रुप ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  एक अतिसुन्दर एवं सार्थक लघुकथा  “अनंत रुप”।   अनंत चतुर्दशी के अवसर पर रचित यह रचना  पौत्र के सार्थक प्रयास से पारिवारिक मिलन को आजीवन अविस्मरणीय बना देने के कथानक पर आधारित है। इस सार्थक  एवं समसामयिक लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 61 ☆

☆ लघुकथा – अनंत रुप ☆

आज फिर अनंत चतुर्दशी के दिन छोटे से घर पर ‘गणपति बप्पा’ के सामने दीपक जला कंपकंपाते हाथों से अपने बेटे के फोटो को देखकर आंखें भर आई। बूढ़ी आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। पतिदेव ने गुस्से से कहा…. कब तक रोती रहोगी, वह अब कभी नहीं आएगा। हम मर भी जाएंगे तो भी नहीं आएगा। पर सयानी बूढ़ी अम्मा ने जोर से आवाज लगाई और चश्मा पोंछ कर बोली…. “आएगा। मेरा बेटा जरूर आएगा। मुझसे नाराज है पर बिछड़ा नहीं है। उसका गुस्सा होना जरूरी है पर वह हमसे दूर नहीं है।”

बारिश होने लगी थी। दीपक की लौ भी टिम टिम करने लगी। तेज हवा के चलते दरवाजा बंद करने जैसे ही बूढ़े बाबा ने हाथ बढ़ाया, दरवाजे पर हाथ किसी ने पकड़ लिया … “दादाजी” और जैसे चारों तरफ घंटी बजने लगी कंपकंपाते हाथों से छूकर आँखों से निहारा। उसी की तरह ही तो है। हाँ, यह अपना बेटा ही तो है????  परंतु दादाजी क्यों कह रहा है। आयुष ने चरण स्पर्श कर सब बातें बताई।

“पापा की डायरी से आपका नाम पता लिखकर मैं हॉस्टल से चला आया हूँ। अभी पापा को पता नहीं है। पोते ने जैसे ही कहा दादी कुछ देर सुनकर बोली…. “बेटा तुम अभी जाओ, नहीं तो कुछ अनर्थ हो जाएगा। तुम्हारे पापा बहुत ही जिद्दी हैं।” वह तो जैसे ठान कर आया हुआ था। जिद्द पकड़ ली कहा… “अभी और इसी वक्त आप मेरे साथ शहर चलेंगे। पोते की जिद से दादा दादी शहर रवाना हो गए।”

घर के दरवाजे पर जैसे ही पहुँचे बैंड बाजा बजने लगा। उन्होंने कहा…. “यहाँ क्या हो रहा है आयुष बेटा?” आयुष ने कहा… “दादा दादी आप अंदर तो चलिए यह आपका ही घर है। सारी प्लानिंग मम्मी- पापा ने मिलकर किया है।”  बेटे बहू ने भी माँ बाबूजी को घर के अंदर ले गए। बेटे ने कहा… “पिता जी आपकी बात और मेरी बात दोनों की जीत हो गई। परंतु, मेरे बेटे ने अनंत डिग्री के साथ अपनी खुशियों को लौटा लाया और उसने किसी की नहीं सुना। मेरी सारी गलतियों को क्षमा करें।” यह कह कर वह पिताजी से लिपट कर खुशी से रो पड़ा। पिताजी भी पुरानी बातें भूल बेटे को गले लगा गणपति बप्पा की जय जयकार करने लगे। बूढ़ी अम्मा कभी बेटे और कभी अपने पतिदेव को निहार कर गणपति बप्पा के अनंत रूप को प्रणाम कर मुस्कुराने लगी।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 61 ☆ रियाज ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक समसामयिक एवं भावप्रवण कविता  “रियाज”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 61 ☆

☆ रियाज ☆

पापण्यांनी उघडले

आज धरणाचे दार

गेला वाहून हुंदका

येता आसवांना पूर

 

स्वप्न मनात हिरवे

उडे आकाशात घार

फडफड ही स्वप्नाची

होता पायामधे दोर

 

ताल भांड्यांनी धरला

त्यात शिजवली तूर

दिसभरचा रियाज

नाही सापडला सूर

 

चुली सोबत जळते

नाही देत ती नकार

तिच्या कष्टाला ना मोल

रोज रांधते भाकर

 

गंध कापराचा होता

त्याने भरलेले घर

लक्ष दिले नाही कुणी

गेला उडून कापूर

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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