हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 18– महात्मा गांधी की अहिंसा तथा क्रांतिकारी ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें.  आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अगला आलेख  “महात्मा गांधी की अहिंसा तथा क्रांतिकारी”

☆ गांधी चर्चा # 18 – महात्मा गांधी की अहिंसा तथा क्रांतिकारी

अक्सर यह प्रश्न उठता रहता है कि क्या महात्मा गांधी ने भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों को बचाने का प्रयास किया था? गांधी जी ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तुलना में पंडित नेहरू को क्यों अधिक पसंद किया? अनेक बार तो यह वाद विवाद  शालीनता की समस्त मर्यादाओं को पीछे छोड़ अत्याधिक कटु हो जाता है। पंडित नेहरू  ने अपनी आत्मकथा में इन विवादों पर कोई खास टिप्पणियाँ नहीं की हैं। गांधीजी के अन्य  प्रशंसकों, जिनकी लिखी पुस्तके पढ़ने का अवसर मुझे मिला उसमे भी इन विवादों पर कोई टीका टिप्पणी करने से परहेज किया गया है। कहते हैं कि गांधी वाङ्मय में भगत सिंह की फाँसी रोकने हेतु  महात्मा गांधी द्वारा वाइसराय  को  23 मार्च 1931 को  लिखा गया पत्र व वाइसराय  द्वारा  दिया गया उत्तर आदि संकलित हैं पर मैंने   गांधी वाङ्मय नही पढ़ा है।

यह सत्य है की गांधीजी व क्रांतिकारियों के मध्य स्वतंत्रता प्राप्ति के साधनों को लेकर गहरे मतभेद थे। काँग्रेस भी गांधीजी के भारत  आगमन से पहले ही गरम दल व नरम दल में बटी हुई थी। गरम दल का नेतृत्व लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक व विपिन चन्द्र पाल करते थे।  इनकी जोड़ी लाल बाल पाल के नाम से विख्यात है। गांधीजी के राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले नरम दल के थे व अंग्रेजों के प्रति  उग्रता के हिमायती नही थे। गांधीजी का काँग्रेस के अंदर गरम दल वालों से भी वैचारिक मतभेद था। जब कभी काँग्रेस के अधिवेशनों में हिंसा को लेकर चर्चा हुई या प्रस्ताव लाये गए गांधीजी और उनके समर्थकों ने सदैव उनका विरोध किया। प्राय: गरम दल के नेताओं द्वारा इस संबंध में लाये गए प्रस्ताव बहुत कम  मतों से गिर गए। इन सब वैचारिक मतभेदों के बाद भी दोनों पक्षों के नेताओं में एक दूसरे के प्रति प्रेम, आदर व सम्मान का भाव सदैव बना रहा।

23 दिसंबर 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तंभ वाइसराय की गाड़ी को बम से उड़ाने का असफल प्रयास किया। गांधी जी ने इस कृत्य की कठोर निंदा की व यंग इंडिया में एक लेख ” बम की पूजा” प्रकाशित किया। इसका जबाब ‘ हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र समाजवादी सभा’ की ओर से  26 जनवरी 1930 को एक पर्चे के माध्यम से  दिया गया जिसे भगवती चरण वोहरा ने लिखा  भगत सिंह ने जेल में इसे अंतिम रूप दिया था। इस लेख में  कथन है कि ” सत्याग्रह का अर्थ है, सत्य के लिए आग्रह । उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों ? क्रांतिकारी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक व नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास रखता है। देश को केवल क्रांति से ही स्वतंत्रता मिल सकती है। तरुण पीढ़ी मानसिक गुलामी व धार्मिक रुढिवादी बंधनों से मुक्ती चाहती है, तरुणों की इस बैचेनी में क्रांतिकारी प्रगतिशीलता के अंकुर देख रहा है। गांधीजी सोचते हैं कि अधिकतर भारतीय जनता को हिंसा की भावना छू तक नही गई है और अहिंसा उनका राजनैतिक शस्त्र बन गया है। गांधीजी घोषणा करते हैं की अहिंसा के सामर्थ्य से वे एक दिन विदेशी शासकों का हृदय परिवर्तन कर देंगे। देश में ऐसे लोग भी होंगे जिन्हे काँग्रेस के प्रति श्रद्धा नहीं , इससे वे कुछ आशा भी नही करते । यदि गांधी जी  क्रांतिकारियों  को उस श्रेणी में गिनते है तो वे उसके साथ अन्याय करते हैं।” इस प्रकार क्रांतिकारी   गांधीजी के साधन का विरोध करते थे, उनके विचारों में गांधीजी के अपमान की बात कतई नहीं दीखती।

सरदार भगत सिंह ने अपनी फाँसी के कुछ दिन पहले ही अपने नवयुवक राजनैतिक कार्यकर्ताओं को  02 फरवरी 1931 को एक पत्र लिखा था। अपने साथियों से वे कहते हैं कि ” इस समय हमारा आंदोलन अत्यंत महत्वपूर्ण परिस्थितियों में से गुजर रहा है। गोलमेज़ कान्फ्रेन्स के बाद काँग्रेस के नेता आंदोलन कि स्थगित कर समझौता करने को तैयार दिखाई देते है। वस्तुतः समझौता कोई हेय और निंदा योग्य वस्तु नहीं है, बल्कि वह राजनैतिक संग्रामों का एक अत्यावश्यक अंग है। भारत की वर्तमान लड़ाई ज्यादातर मध्य वर्ग के लोगों के बलबूते लड़ी जा रही है , जिसका लक्ष्य बहुत सीमित है। देश के करोड़ों मजदूर और किसान जनता का उद्धार इतने से नही हो सकता  है। काँग्रेस के लोग क्रांति नही चाहते वे सरकार पर आर्थिक दबाब डालकर कुछ सुधार और लेना चाहते हैं। हमारे दल का अंतिम लक्ष्य सोशलिस्ट समाज की स्थापना करना है। जब लाहौर काँग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता  का प्रस्ताव पास किया तो हम लोग इसे पूरे दिल से चाहते थे। परंतु काँग्रेस के उसी अधिवेशन में महात्मा जी ने कहा कि समझौते का दरवाजा अभी खुला है। इसका अर्थ है कि  उनकी लड़ाई का अंत इसी प्रकार किसी समझौते से होगा और वे पूरे दिल से स्वाधीनता की घोषणा नही  कर रहे थे। हम लोग इस बेदिली से घृणा करते है। मैं आतंकवादी नही हूँ। मैं एक क्रांतिकारी हूँ।  फाँसी की काल कोठरी में पड़े रहने पर भी मेरे विचारों में कोई परिवर्तन नही आया है पर मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हम बम  से कोई लाभ प्राप्त नही कर सकते हैं। केवल बम फेकना ना सिर्फ व्यर्थ है अपितु बहुत बार हानिकारक भी है।”  इस प्रकार सरदार भगत सिंह ने भी गांधीजी के प्रति अपने सम्मान को कभी कम न होने दिया। गांधीजी ने भी जनमत का मान रखते हुये अपने सिद्धांतों के विपरीत वाइसराय को पत्र लिखकर भगत सिंह की फाँसी रोकने का अनुरोध किया। हाँ यह अनुरोध पत्र बहुत जोरदार भाषा में न था केवल विनय से युक्त था। आज जब 29 सितंबर 2017 को यह सब मैं लिख रहा हूँ तो उसके एक दिन पहले ही 28 सितंबर 1907 को जन्मे अमर शहीद भगत सिंह का 111वाँ जन्म दिन था। मेरा उन्हे शत शत नमन। उन अमर क्रांतिकारी शहीदों को भी नमन जिन्होने देश के लिए बलिदान दिया और हँसते हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गये। गांधीजी पर अक्सर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने सरदार भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया। मैं पाठकों से अनुरोध करता हूँ कि इस सम्बन्ध में वे श्रीमती सुजाता चौधरी की पुस्तक “ राष्ट्रपिता और भगत सिंह “ अवश्य पढ़े। इसमें सुजाताजी ने विस्तार से यह सिद्ध किया है कि भगत सिंह की फांसी अंग्रेज टालना नहीं चाहते थे और भगत सिंह के प्रति जनता की भावना को ध्यान में रखते हुए अंग्रेजों ने यह चाल चली कि अगर महात्मा गांधी कहेंगे तो भगत सिंह की फांसी रोक दी जायेगी।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 16 ☆ लघुकथा – एहसास ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि‘

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  एक  अत्यंत विचारणीय लघुकथा  “एहसास। श्रीमती कृष्णा जी की यह लघुकथा  यह एहसास दिलाने में सक्षम है कि स्त्री ही स्त्री का दर्द समझ सकती है और यह एहसास कुछ अनुभव और समय के पश्चात ही हो पाता है। इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्रीमती कृष्णा जी बधाई की पात्र हैं।)

☆ साप्ताहक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य  # 16 ☆

☆ लघुकथा – एहसास ☆

बहू वो स्टूल ले लो और यहीं पास में बैठ जाओ. हमाई चप्पल और छत्ता सोई कल ले आने  आभा ने सासु माँ को ममत्व से भरी नजरों से देख उनके  सिर पर हाथ रख हाँ में सिर हिलाया. वह किसी तरह अपने आँसू रोकने का प्रयत्न कर रही थी. सिर घुमाकर वह सिस्टर को देखने लगी. थोड़ी दूर मामा जी खड़े सास-बहू की बातें  करते देख फफक-फफक कर रो पड़े थे.  बहन  से बोले …दीदी तुम चिन्ता मत करो जल्दी ठीक हो जाओगी फिर हम बैठकर खूब बातें करेंगे.

फिर डा. पाठक आ गये और आज ही इनका आपरेशन होना है आप इन्हें आपरेशन के लिये तैयार करवाने दें. उसी रात सासू माँ ने कहा था. आभा मैं तुम्हें बहुत दिनो बाद और देर से समझ पाई, हमें माफ करना बेटी तुम न होती तो कभी यह एहसास न होता कि औरत ही औरत का दुख समझ सकती है. तुमने मेरी और ससुर की खूब सेवा करी तुम्हें भगवान खूब खुशी दे चारो तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ हो.

अचानक बेटी के स्पर्श ने आभा को जगाया माँ क्या हुआ दादी को याद कर रहीं थी. आज चलिये दादी की याद में विकलांग बच्चों के साथ कुछ समय बिताकर  आते हैं और अनजाने बहते आँसुओं को पोंछ कर आभा उसके साथ  जाने को तैयार हो गई

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 29 ☆ क्यूँ? ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जीसुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एडिशनल डिविजनल रेलवे मैनेजर, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “क्यूँ ?”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 29☆

☆ क्यूँ ?

गाँठ जब भी लगती है

बता कैसे निकलती है?

 

रिश्तों की सुबह भला

शाम में क्यूँ ढलती है?

 

क्या कोई मस्त कश्ती

साहिल से मिलती है?

 

जिंदगी जब है कोहरा

धूप क्यूँ निकलती है?

 

राख ही होना है जब

शमा क्यूँ जलती है?

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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English Literature – Poetry (भावानुवाद) ☆ कैसे कह दूँ…?/How can I say ? ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी  द्वारा सुप्रसिद्ध  अर्थशास्त्री एवं  साहित्यकार श्रीमती मंजुला अरगरे शिंदे  जी की कालजयी कविता “कैसे कह दूँ…?”  का अंग्रेजी भावानुवाद  “How can I say ?” ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों तक पहुँचाने का अवसर एक संयोग है। 

भावनुवादों में ऐसे  प्रयोगों के लिए हम हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी के ह्रदय से आभारी हैं। 

आइए…हम लोग भी इस कविता के मूल हिंदी  रचना के साथ-साथ अंग्रेजी में भी आत्मसात करें और अपनी प्रतिक्रियाओं से कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी  को परिचित कराएँ।

श्रीमती मंजुला अरगरे शिंदे जी न सिर्फ एक अर्थशास्त्र की ज्ञाता हैं, अपितु साहित्य  के क्षेत्र में भी एक उच्च कोटि की रचनाकार हैं।  पठन-पाठन में आरम्भ से ही उनकी रुचि रही है । एक कवियत्री के रूप में उनकी रचनायें कल्पना की उड़ान भरते हुए मानवीय संवेदनाओं के चरम को छूते हुए पाठक को भीतर तक झकझोर कर रख देती हैं। वे चार वर्षों तक  विश्व गाथा नामक पत्रिका से जुड़ी रहीं। अपने विचारों को  काव्य  स्वरुप में परिवर्तित करने की अपार क्षमता की स्वामिनी, मंजुला जी के शब्द हृदय को छू जाते हैं। प्रस्तुत है उनकी एक भावपूर्ण रचना… *कैसे कह दूँ…*

☆ श्रीमती मंजुला अरगरे शिंदे जीकी मूल कालजयी  रचना – कैसे कह दूँ… ☆

 

कैसे कह दूं. स्वप्न विपुल हैं

पर कोई संसार नहीं है ।

प्रेम पूर्ण इस जीव जगत से.

कैसे कह दूं प्यार नहीं है ।

 

मन चंचल और विमल अभीप्सा,

अंतःकरण सदा अनुरागी ।

महके उपवन. औे’ नंदनवन,

खिलें प्रीति के सुमन  गुलाबी ।

 

यूं समझूं अब अर्थ प्रेम का

है संकोच कहां स्वीकारूं ।

वनमाली की इस बगिया को.

पुलकित हो कर  नित्य निहारूं ।

☆  English Version  of  Classical Poem of  Shrimati Manjula  Argare Shinde ☆ 

☆  “How can I say ? – by Captain Pravin  Raghuwanshi 

How can I say that

 dreams’re in abundance

  But there is no physical

    existence of them…

 

How can I ever say

 that there is no

  endearment of this

   love-filled world…

 

Flickering mind and

 translucent longings

  Conscience, always

    admiringly devoted…

 

Fragrant gardens, and the

 Astral garden  ‘Nandanvan’,

   Blossom with myriad

     hued roses of love…

 

Now, I understand the

 true meaning of love,

  But, still hesitant

   where to accept it…

 

Keep beholding the divine

 garden constantly,

  Being  enamoured with

   the  ethereal gardener…!

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति # 9 ☆ इंसानियत ☆ हेमन्त बावनकर

हेमन्त बावनकर

(स्वांतःसुखाय लेखन को नियमित स्वरूप देने के प्रयास में इस स्तम्भ के माध्यम से आपसे संवाद भी कर सकूँगा और रचनाएँ भी साझा करने का प्रयास कर सकूँगा। अब आप प्रत्येक मंगलवार को मेरी रचनाएँ पढ़ सकते हैं। आज प्रस्तुत है मेरी एक प्रिय कविता कविता “ इंसानियत ”।)

मेरा परिचय आप निम्न दो लिंक्स पर क्लिक कर प्राप्त कर सकते हैं।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति #

☆ इंसानियत  ☆

 

बचपन में सुना करते थे

पिताजी से

पंचतंत्र की कहानियाँ और

आज़ादी के शहीदों की

शहादत के किस्से।

आखिर,

हमें ही तो रखना है रोशन

उस शहादत की विरासत को?

 

क्या जरूरत है

कई रंग-बिरंगे झंडों की

वतन की फिजा में?

आखिर,

किसी को क्यूँ

इन झंडों का रंग

अपने तिरंगे में नज़र नहीं आता?

 

रंगों की बात चली है

तो यह पूछना भी है वाजिब

कि क्या काले रंग और काली स्याही

के मायने भी बदल गए हैं?

 

स्याही किसी भी रंग की क्यों न हो

कलम का तो काम ही है

हर हाल में चलते रहना।

आखिर क्यूँ और कैसे

कोई रोक पायेगा

किसी को आईना दिखाने से?

 

ज़िंदगी की राह में पड़ने वाले

हर मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च

और पीर पैगंबर की मजार पर भी

बचपन से माथा टिकाया था।

एक दिन

पिताजी ने बताया था कि

उसी राह पर पड़ती है

अमर शहीदों की समाधि !

 

काश!

कोई एक ऐसा भी प्रार्थनास्थल होता

भारत का भारत में

इंसानियत का

जो गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल होता।

जो सारी दुनिया के लिए मिसाल होता।

 

हम अपने-अपने घरों में

भले ही किसी भी मजहब को मानते

किन्तु,

इस प्रार्थनास्थल में आकर

साथ उठते, साथ बैठते

साथ-साथ याद करते

साथ-साथ नमन करते

वतन पर मर मिटने वालों को।

 

प्रार्थना करते इंसानियत की

और

प्रार्थनास्थल की छत के नीचे

सिर्फ एक ही मजहब को मानते

इंसानियत, इंसानियत और इंसानियत!

 

© हेमन्त बावनकर, पुणे 

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा # 28 ☆ व्यंग्य संग्रह – निज महिमा के ढ़ोल मंजीरे – श्री अजीत श्रीवास्तव ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  श्री श्रवण कुमार उर्मलिया के  व्यंग्य  संग्रह  “निज महिमा के ढ़ोल मंजीरे” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 28☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य संग्रह  –  निज महिमा के ढ़ोल मंजीरे

पुस्तक –  (व्यंग्य  संग्रह )निज महिमा के ढ़ोल मंजीरे

लेखक – श्री श्रवण कुमार उर्मलिया

प्रकाशक –भारतीश्री प्रकाशन , दिल्ली ३२

मूल्य – २५० रु , पृष्ठ १२८, हार्ड बाउंड

 ☆ व्यंग्य संग्रह   – निज महिमा के ढ़ोल मंजीरे – श्री श्रवण कुमार उर्मलिया–  चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव

इस सप्ताह मुझे इंजीनियर श्रवण कुमार उर्मलिया जी की बढ़िया व्यंग्य कृति ‘निज महिमा के ढ़ोल मंजीरे पढ़ने का सुअवसर सुलभ हुआ.

बहुत परिपक्व, अनुभव पूर्ण रचनायें इस संग्रह का हिस्सा हैं. व्यंग्य के कटाक्षो से लबरेज कथानको का सहज प्रवाहमान व्यंग्य शैली में वर्णन करना लेखक की विशेषता है.पाठक इन लेखो को पढ़ते हुये  घटना क्रम का साक्षी बनता चलता  है. अपनी रचना प्रक्रिया की विशद व्याख्या स्वयं व्यंग्यकार ने प्रारंभिक पृष्ठो में की है. वे अपने लेखन को आत्मा की व्यापकता का विस्तार बतलाते हैं. वे व्यंग्य के कटाक्ष से विसंगतियो को बदलना चाहते हैं और इसके लिये संभावित खतरे उठाने को तत्पर हैं.

पुस्तक में ५२ व्यंग्य और २ व्यंग्य नाटक हैं. ५२ के ५२ व्यंग्य, ताश के पत्ते हैं, कभी ट्रेल में, तो कभी कलर में, लेखों में कभी पपलू की मार है, तो कभी जोकर की. अनुभव की पंजीरी से लेकर निज महिमा के ढ़ोल मंजीरे पीटने के लिये ईमानदारी की बेईमानी, भ्रष्टाचार का शिष्टाचार व्यंग्यकार के शोध प्रबंध में सब जायज है. हर व्यंग्य पर अलग समीक्षात्मक आलेख लिखा जा सकता है, अतः बेहतर है कि पुस्तक चर्चा में मैं आपकी उत्सुकता जगा कर छोड़ दूं कि पुस्तक पठनीय, बारम्बार पठनीय है.

 

चर्चाकार.. विवेक रंजन श्रीवास्तव,

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #39 – वेदवाणी ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता “वेदवाणी।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 39☆

☆ वेदवाणी ☆

 

वेद आता वाचण्याचे वेड नाही

चार वेदांना जगी या तोड नाही

 

संपवाया वेद सारे जे निघाले

येत त्यांची का तुम्हाला चीड नाही ?

 

वेद सांगे सूक्ष्म गणना या जगाला

संकृतीची त्या तरीही चाड नाही

 

वेद म्हणजे बहरलेला वृक्ष वेड्या

ते झुडुप वा बाभळीचे झाड नाही

 

वेदवाणी जीवनाचा ज्ञान सागर

कोणतेही ज्ञान इतके गोड नाही

 

वाचलेला वेद नाही तो बरळतो

माणसाची चांगली ही खोड नाही

 

जीवनाच्या सागराचा मार्ग खडतर

आणि माझ्या गलबताला शीड नाही

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 38 – लघुकथा – भुतहा पीपल ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं  एक अनुकरणीय एवं प्रेरक लघुकथा  “भुतहा पीपल ” जो हमें अपरोक्ष रूप से  पर्यावरण संरक्षण का सन्देश भी देती है।  श्रीमती सिद्धेश्वरी जी  की यह लघुकथा  हमें कई शिक्षाएं देती है जैसे  अंधविश्वास  के विरोध के अतिरिक्त ईमानदारी, परोपकार, पर्यावरण संरक्षण  आदि का पाठ सिखाती है। श्रीमती सिद्धेश्वरी जी  ने  मनोभावनाओं  को बड़े ही सहज भाव से इस  लघुकथा में  लिपिबद्ध कर दिया है ।इस अतिसुन्दर  लघुकथा के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई। 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 38☆

☆ लघुकथा –  भुतहा पीपल 

गाँव के बाहर बहुत बड़ा पीपल का वृक्ष। चारों तरफ से हरी घनी छाया। संभवत सभी गाँव वालों का कहना कि यह भगवान या किसी भूत प्रेत का भूतहा पीपल है। शाम ढले वहां से कोई निकलना नहीं चाहता था। सभी अपना अपना काम करके जल्द से जल्द गाँव के अंदर आ जाते या फिर जो बाहर होते वह दिन होने का इंतजार कर दूसरे दिन आते थे।

एक प्रकार से दहशत का माहौल बन गया था। दिन गुजरते गए। गांव में अचानक एक गुब्बारे वाला आया। बहुत अधिक बारिश होने के कारण वापस जा रहा था पर नहीं जा सका। उसी पीपल के वृक्ष के नीचे खड़ा होकर बारिश के रुकने का इंतजार करने लगा।

कहते हैं कि भाग्य पलटते देर नहीं लगती। अचानक वहां पर कुछ लुटेरे आकर खड़े हो गए। जिनके पास शायद बहुत सारा रुपया पैसा, सोना चांदी था। उन्होंने देखा कि कपड़ों से फटा बेहाल मनुष्य खड़ा है। उसमें से एक ने कहा… इसे यहीं टपका  दे, परंतु बाकी लोग कहने लगे… नहीं हमेशा पाप की कमाई से जीते आए हैं। आज इसे कुछ नहीं करते। इसको मालामाल कर देते हैं।

उस गुब्बारे वाले को पास बुलाकर लुटेरे ने कहा… तुम अच्छी जिंदगी जी सकते हो बड़े आदमी बन सकते हो, परंतु हमारी शर्त है… हमारी बात जिंदगी भर राज ही रहने देना। हम तुम्हें धन दौलत दिए जा रहे हैं। तुम इसका चाहे जैसा इस्तेमाल करो। गुब्बारे वाला तुरंत मान गया। गरीब बेचारा सोचता रहा। लुटेरों ने अपना सामान उठाया और  चले गए।

उसी समय जोरदार बिजली कौधी  और जैसे गुब्बारे वाले को ज्ञान प्राप्त हो गया। उसने सुबह होते ही पीपल के चारों तरफ साफ सफाई करके सब कचरा एकत्रित कर जला दिया और लूट का सामान जो दे गए उसे पोटली बना अपने पास रख लिया।

सुबह होते ही गाँव के लोगों का आना जाना शुरू किए। एक से दो और दो से चार बाते होते देर नहीं लगी। पूरा गाँव इकट्ठा हो गया गुब्बारे वालों ने बताया कि…. रात बारिश की वजह से मैं यहीं पर रुक गया था। रात में पीपल देव दर्शन देकर गांव की उन्नति और इसे अच्छे कामों में लगाने के लिए यह सारा सोना चांदी और रुपया पैसा दिए हैं। गांव वालों के मन से उस भुतहा पीपल का डर निकल गया। गुब्बारे वाले से रुपए लेकर गांव के पंच ने वहां पर सुंदर बाग बगीचा मंदिर बनाने का निर्णय लिया और गुब्बारे वाले को भी परिवार सहित गांव में रहने के लिए मकान दिया गया।

इस प्रकार उन लुटेरों के धन से ईमानदार गुब्बारे वाले ने सदा के लिए उस गाँव का डर मिटा दिया और अब पीपल देव के नाम से पूजा होने लगी। सभी गाँव वाले प्रसन्न और उत्साहित थे। सभी ने ईश्वर का धन्यवाद किया और अपनी गलती की क्षमा प्रार्थना की। गाँव  में पर्यावरण को बढ़ावा दिया गया। गुब्बारे वाले ने सभी से कहा… कि गांव के बाहर खेतों पर एक एक पेड़ जरूर लगाएं। और वह गांव भूतहा पीपल वाला गांव की जगह पीपल देव  गांव कहलाने लगा। चारों तरफ हरियाली फैल गई। सरकार ने भी उस गांव की हरियाली देख गांव को पुरस्कृत करने का  फैसला किया।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य ☆ कविता ☆ माँ ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ (स्वर – श्री आर डी वैष्णव, जोधपुर, राजस्थान )

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध।  ये रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं । यदि गंभीरता से  रचनाओं के शब्दों – पंक्तियों  को  आत्मसात करने  का प्रयास करें तो मनोभावनाएं हृदय से लेकर नेत्र  तक को नम कर देती हैं । ऐसी ही कुछ कवितायेँ अभी हाल ही में पढ़ने को मिली जिनमें माँ के रिश्ते पर रचित डॉ गंगाप्रसाद शर्मा  ‘गुणशेखर’ जी  की रचना और उनके मित्र श्री आर डी  वैष्णव जी के भावुक स्वर में  काव्य पाठ हृदय नेत्र नम कर देता है। प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘ गुणशेखर ‘ जी  की कविता “माँ “।) 

संयोगवश आज के ही अंक में कर्नल अखिल साह जी की कविता “माँ ” प्रकाशित हुई है। ऐसे प्रयोग हम निरंतर करते रहने का प्रयास करेंगे। 
मेरा विनम्र अनुरोध है कि  कृपया कविताओं की तुलना न करें अपितु उनमें निहित भावनाओं को आत्मसात करें एवं उनका सम्मान करें। 

 सस्वर काव्य -पाठ का  ई-अभिव्यक्ति ने प्रयोग स्वरुप एक प्रयास किया है, आशा ही इस प्रयोग को प्रबुद्ध पाठकों का प्रतिसाद अवश्य मिलेगा। 

 इस सन्दर्भ में डॉ गुणशेखर जी के ही शब्दों में  – “इसे स्वर दिया है मेरे अभिन्न मित्र श्री आर डी वैष्णव ने।इसे लिखने पर आँसू नहीं आए पर सुनकर ज़रूर आए।सुनकर लगा कि इसमें माँ को गज़ल और गज़ल को माँ होते हुए भी महसूसा जा सकता है।इसे आप भी ज़रूर सुनें। कृपया श्री आर डी वैष्णव जी के चित्र पर या यूट्यूब लिंक पर क्लिक कर उनका भावप्रवण काव्य पाठ अवश्य आत्मसात करें।

श्री आर डी वैष्णव, जोधपुर, राजस्थान 

यूट्यूब लिंक  >>>>  https://youtu.be/OHaanAx11hk

  ☆ कविता  – माँ 

 

थोड़े में खुश माँ होती है

नाखुश  ही कब माँ होती है

फूलों की बगिया में फैली

खुशबू जैसी  माँ होती है

चौका-चूल्हा,बर्तन करती

दिन भर खटती माँ होती है

शैशव का मखमली बिछौना

तकिया, कंबल माँ होती है

दूध-बतासा,पुआ, पँजीरी

माखन मिसरी माँ होती है

घने  अँधेरे साँझ – सकारे

छाया जैसी माँ  होती है

जहाँ-जहाँ पग पड़ें हमारे

हर मग में बस माँ होती है

सारे रिश्ते बुझ जाएँ तब

जगमग जगमग माँ होती है

सारे जग में ढूंढ़  के जाना

माँ की उपमा माँ होती है

एक जनम के रिश्ते सारे

जनम जनम की माँ होती है

जिसने खोया उससे पूछो

किस कीमत की माँ होती है

उससे धनी कौन इस जग में

जग में  जिसकी माँ होती है

 

©  डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

रात्रि-22:10,15-02-2020

सूरत,  गुजरात

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – परिवर्तन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – परिवर्तन

जब नहीं रहूँगा मैं

और बची रहेगी सिर्फ़ देह,

उसने सोचा….,

सदा बचा रहूँगा मैं

कभी-कभार नहीं रहेगी देह,

उसने दोबारा सोचा…,

पहले से दूसरे विचार तक

पड़ाव पहुँचा

उसका जीवन बदल गया…,

दर्शन क्या बदला

जो नश्वर था कल

आज ईश्वर हो गया..!

 

©  संजय भारद्वाज

(रात्रि 11:53 बजे, 28 फरवरी 2020)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य 0अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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