(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना अशआ‘र।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८२ ☆
☆ पर्यावरण दिवस विशेष – अशआ’र☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (8 जून से 14 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम! मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपके सामने 8 जून से 14 जून 2026 तक के सप्ताह का साप्ताहिक राशिफल लेकर आया हूं। मगर सबसे पहले हम श्री हनुमान चालीसा के आज की चौपाई के बारे में चर्चा करेंगे। आज की चौपाई है :-
नासै रोग हरे सब पीरा | जपत निरन्तर हनुमत बीरा ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से समस्त प्रकार के रोग और पीड़ाओं का अंत हो जाता है।
“नासै रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
आइये अब मैं आपको इस सप्ताह अर्थात 8 जून से 14 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।
इस सप्ताह सूर्य वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, बुध मिथुन राशि में, गुरु और शुक्र कर्क राशि में शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।
आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। भाई बहनों के प्रति प्रेम बढ़ेगा। व्यापारियों के व्यापार में वृद्धि होगी। नौकरी पेशा वालों के लिए यह सप्ताह सचेत रहने का है। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के मामलों में बहुत सावधानी वरतना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 जून कार्यों को करने के लिए सफलता दायक है। 9 और 10 जून को आपको सतर्क रहना चाहिए। 13 और 14 जून को आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
वृष राशि
कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको विजय मिल सकती है। परंतु आपको सभी कार्य पूरी सावधानी के साथ करने होंगे। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छा रहेगा। व्यापार में वृद्धि होगी। धन आने की उम्मीद है। नौकरी पेशा लोगों को अपनी जिव्हा को काबू में रखना होगा। किसी से फालतू की बहस में उलझना नहीं चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए आठ और 13 था 14 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। 11 और 12 तारीख को आपको कोई भी कार्य करने के पहले पूरी सावधानी बरतना चाहिए। 13 और 14 तारीख को आपका मन काफी प्रसन्न रह सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन स्नान करने के उपरांत तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मिथुन राशि
यह सप्ताह आपके लिए काफी शुभ रह सकता है। आपके व्यापार में वृद्धि होगी। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। थोड़े मेहनत से ज्यादा धन प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। नौकरीपेशा लोगों के लिए भी सप्ताह ठीक-ठाक है। परंतु आपको अपने सकर्मियों से थोड़ा सावधान रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको बहुत कम मदद मिल पाएगी। भाग्य की जगह अपने कर्मों पर विश्वास करें। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 जून लाभदायक है। 13 और 14 जून को आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
यह सप्ताह आपके लिए उत्तम रहेगा। भाग्य भी आपका साथ देगा। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में लाभ हो सकता है परंतु अत्यधिक धन लगाना पड़ेगा। नौकरी करने वालों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। आपके पिताजी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े कटु हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख फलदायक हैं। 8 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने की अच्छी उम्मीद है। आपका व्यापार बहुत उत्तम चलेगा। भाग्य भी आपका साथ देगा। कुछ अच्छे काम हो सकते हैं जिसमें अत्यधिक धन व्यय हो जैसे विवाह आदि। दुर्घटनाओं से सावधान रहने का प्रयास करें। नौकरी करने वालों के लिए इस सप्ताह सावधान रहना आवश्यक है। उनको अपने अधिकारियों से बहुत सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 13 तथा 14 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। 9 और 10 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
कन्या राशि
कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा है। आपका कार्य बहुत अच्छा चलेगा। अधिकारी और साथी दोनों ही आपसे प्रसन्न रहेंगे। धन आने का भी अच्छा योग है। भाग्य से इस सप्ताह आपको थोड़ा सावधान रहना चाहिए। भाग्य के भरोसे कार्य करने के प्रयास कम करें। हालांकि भाग्य आपका एकाएक मदद करेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे परन्तु समाप्त नहीं हो पाएंगे। आप दुर्घटनाओं से आराम से बच जाएंगे। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख अनुकूल है। आठ और 11 तथा 12 तारीख को आपको जागरूक रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें तथा शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
अगर आप अधिकारी या कर्मचारी हैं तो आपके लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। कार्यालय में आपकी स्थिति मजबूत होगी। आप सही स्थान पर पहुंच सकते हैं। भाग्य आपके साथ पूर्ण सहयोग करेगा। भाग्य की मदद आपको विभिन्न कार्यों के लिए लेना चाहिए। धन आने का भी योग है। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु यह संभव है कि वे समाप्त नहीं हो। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। आपके सन्तान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
वृश्चिक राशि
इस सप्ताह भाग्य आपका अच्छा साथ देगा। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। भाग्य के सहयोग के कारण आपके कई कार्य हो जाएंगे। इस सप्ताह आप शत्रुओंको थोड़े से प्रयास से ही समाप्त कर सकते हैं। उनको समाप्त करने का आपको निरंतर प्रयास करना चाहिए। आपको संतान से मामूली सहयोग मिल पाएगा। छात्रों की पढ़ाई थोड़ी ठीक-ठाक चलेगी। आपको अपने माताजी और पिताजी के स्वास्थ्य के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके जीवनसाथी के स्वास्थ्य में थोड़ी समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए आठ तथा 13 और 14 जून विभिन्न प्रकार के कार्यों हेतु शुभ हैं। 11 और 12 तारीख को आपको कार्यों के प्रति बहुत सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपके व्यापार में वृद्धि होगी। आपको लंबी यात्रा का योग है। यात्रा सफल रहेगी। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। संतान की मानसिकता उत्तम रहेगी। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। धन आने के मार्ग में कुछ परेशानियां आ सकती हैं। कृपया उन परेशानियों को समाप्त करने का प्रयास करें। इस सप्ताह आपको अपने दुश्मनों से भी सतर्क रहना चाहिए। दुश्मन कुछ बुरा करने का प्रयास कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख परिणाम मूलक हैं। 13 और 14 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह अविवाहित जातकों के लिए बहुत उत्तम है। विवाह के बहुत अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। विवाह होने का या तय होने का पूर्ण योग है। इस सप्ताह आप अपने विवाह हेतु प्रयास करें। प्रेम संबंधों के भी बढ़ने का योग है। नए प्रेम संबंधों के बनने का भी अच्छा योग है। इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों से संबंध पहले जैसा ही रहेगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि संभव है। अधिकारी एवं कर्मचारियों को अपने कार्यालय में थोड़ा सावधान रहना चाहिए। आपको पेट संबंधी कष्ट हो सकता है। धन आने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी के दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
कुंभ राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। संतान की उन्नति हो सकती है। आपके व्यापार में बुद्धि संभव है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे। नए शत्रु नहीं बन सकते हैं। पुराने शत्रुओं से भी संबंध सुधर सकते है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से विशेष मदद नहीं मिल पाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 13 तथा 14 तारीख प्रभावशाली है। सप्ताह के बाकी दिनों में भी आप छोटे-मोटे कार्य कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि संभव है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। भाई बहनों के साथ आपके संबंध थोड़े खराब हो सकते हैं। धन आने की उम्मीद है। आपके संतान को सुख प्राप्त होगा। संतान से आपको भी अच्छी मदद मिल सकती है। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से आपको अच्छी मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों में उपयोगी है। 8 जून को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ५३ आणि ५४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ५३ – –
सदा आर्जवी प्रिय जो सर्व लोकी ।
सदा सर्वदा सत्यवादी विवेकी |
न बोले कदा मिथ्य वाचा त्रिवाचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा ||५३||
अर्थ : नेहमी नम्रतेने बोलणारा आणि आपल्या मधुर वाणीने लोकांना आपलेसे करणारा, सत्यवचनी आणि विवेकी असणारा, त्याचप्रमाणे कधीही वायफळ आणि असत्य न बोलणारा असा जो परमेश्वराचा भक्त असतो तो जगामध्ये खरोखरच धन्य होय.
(आर्जवी – नम्र, मिथ्य वाचा – खोटे बोलणे, त्रिवाचा – त्रिवार /निश्चित / ठामपणे. परंतु येथे बोलण्यात एकवाक्यता नसलेला असा अर्थ घेता येतो)
विवेचन : भक्ताने कसे असावे ते या श्लोकातही समर्थ सांगत आहेत. त्याचे बोलणे आर्जवी असते. आर्जवी म्हणजे नम्र. आर्जवी म्हणजे लाचार नव्हे. ज्याला (ईश्वराचे) ज्ञान झाले आहे असा भक्त आपोआपच नम्र होतो. फळांनी लगडलेले झाड जसे झुकलेले दिसते त्याप्रमाणे खरा ज्ञानी, विद्वान आणि भगवंताचा भक्त नम्र असतो. ही नम्रता त्याला कोठून उसनी आणावी लागत नाही. ती त्याच्या आतूनच उत्स्फूर्तपणे येते.
समर्थांना मधुर बोलणे अतिशय प्रिय आहे. दासबोधामध्ये ते म्हणतात,
पेरिले ते उगवते, बोलण्यासारखे उत्तर येते|
तरी मग कर्कश बोलावे ते, काय निमित्ये ||
आपण जसे बोलू तसे उत्तर समोरून मिळेल. मग विनाकारण दुसऱ्याला लागेल असे बोलण्यात काय अर्थ? काही लोक बोलण्यात अत्यंत फटकळ असतात. आपल्या बोलण्याने लोकांची मने दुखावतात. अशी माणसे अप्रिय होतात. मग भलेही ती स्वतःला स्पष्टवक्ता म्हणवून घेतात. परंतु त्यांचा स्पष्टवक्तेपणा इतरांना जखम करणारा असतो. आपण गोंदवलेकर महाराजांची प्रवचने वाचली असतील तर त्यातील भाषा किंवा कधी के वि बेलसरे यांचे निरूपण ऐकले असेल तर त्यांचे बोलणे किती नम्र आणि मधुर होते याचा प्रत्यय आपल्याला येतो. हीच खऱ्या भक्ताची लक्षणे आहेत.
“सत्यम ब्रूयात, प्रियम ब्रूयात. ” गोडही बोलायचे आणि सत्यही बोलायचे ही तारेवरची कसरत असते. परंतु दुसऱ्याला न दुखवता देखील सत्य सांगता येते. असा भक्त समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे सदा सर्वदा म्हणजे नेहमी सत्य बोलतो. परंतु या सत्य बोलण्यात विवेकाचा वापर तो करतो. एखाद्या अत्यवस्थ किंवा शेवटच्या घटका मोजत असणाऱ्या रुग्णाला जर आपण भेटायला गेलो आणि त्याला म्हटले की आता ही तुझी शेवटची अवस्था आहे. त्यातून तू बरा होणार नाहीस. असे बोलणे सत्य जरी असले तरी ते अविवेकाचे आहे. म्हणून अशा वेळी विवेकाचा वापर करून, ” तू बरा होणार आहेस. तुला लवकरच बरे वाटेल. ” अशा प्रकारचा धीर देणे उपयुक्त ठरते.
खोटे बोलणे आणि स्वतःच्या असत्य वागण्याचे लटके समर्थन करीत राहणे ही सवय बऱ्याच लोकांना असते. परंतु काही काळानंतर लोकांना अशा माणसांचा स्वभाव लक्षात येतो आणि मग त्यांच्या बोलण्यावर ते फारसा विश्वास ठेवत नाहीत. ते बोलतात एक करतात दुसरे आणि वागतात तिसऱ्या प्रकारचे. अशा वागणाऱ्यांसाठी समर्थांनी त्रिवाचा हा शब्द वापरला आहे. म्हणजे ज्यांच्या वागण्याबोलण्यात एकवाक्यता नसते अशा व्यक्ती. परमेश्वराचा खरा भक्त कधीही असत्य बोलून आपली जीभ विटाळत नाही. त्याला खोटे बोलण्याची गरजही भासत नाही. कारण त्याला काही लपवायचे नसते. खोटे ते बोलणाऱ्या माणसाला आपल्या बोलण्याची वेगवेगळी कारणे सांगावी लागतात. आणि आपण आधी काय बोललो होतो हे लक्षात ठेवावे लागते. भक्त हा निर्मळ मनाचा आणि सरळ स्वभावाचा असतो. त्यामुळे त्याच्या वागण्या बोलण्यात एकवाक्यता असते. त्यामुळे तो जे बोलतो ते सत्यच असते. त्याचे शब्द त्याच्या निर्व्याज आणि निरलस व्यक्तिमत्त्वाचे प्रतिबिंब असतात.
– – आणि ज्याच्या शब्दांत सत्य, नम्रता आणि विवेक असतो, तोच खरा “सर्वोत्तमाचा दास” ठरतो.
स्वसंवाद :
१) माझ्या बोलण्यात नम्रता आणि माधुर्य आहे का?
२) “स्पष्ट बोलतो” या नावाखाली मी कधी दुसऱ्याला दुखावतो का?
३) सत्य बोलताना मी विवेकाचा वापर करतो का?
४) माझे विचार, बोलणे आणि वागणे यात सुसंगती आहे का?
– – – –
श्लोक क्र. ५४
सदा सेवि आरण्य तारुण्यकाळी |
मिळेना कदा कल्पनेचेनि मेळी |
चळेना मनी निश्चयो दृढ ज्याचा |
जगी धन्य तो दास सर्वोत्तमाचा |५४|
अर्थ : जो भक्त तरुणपणी एकांतात राहून आपला काळ घालवतो, कल्पनेच्या राज्यात जो रमत नाही, ज्याची भगवंतावरील श्रद्धा अढळ असते, असा भक्त खरोखरच त्या सर्वोत्तम असलेल्या भगवंताचा जगामध्ये धन्य असलेला दास आहे.
(सेवि – काळ घालवणे, आरण्य – एकांतवास, मिळेना – मिसळत नाही, मेळी – समूह, चळणे – परावृत्त होणे)
विवेचन : ज्या व्यक्तीला भगवंताची ओढ लागलेली अशी व्यक्ती तरुणपणातच एकांतात राहून त्याचे ध्यान किंवा नामस्मरण करणे पसंत करते. इथे समर्थांनी अरण्य हा शब्द जरी वापरलेला असला तरी प्रत्यक्षात अरण्यातच जाऊन राहिले पाहिजे असा त्याचा अर्थ नाही तर भगवंत प्राप्तीसाठी एकांतात जाऊन तपश्चर्या करणे आवश्यक आहे हा त्याचा अर्थ घेता येतो. आजच्या काळात ही गोष्ट थोडीशी विचित्र वाटेल. तरुणपणातच कसे काय एकांतात राहायचे आणि भगवंताचे ध्यान करायचे? ती तर म्हातारपणी करण्याची गोष्ट आहे अशी आपली समजूत असते. पण साधना ही पुढे ढकलण्याची गोष्ट नव्हे तर तरुणपणीच करण्याची गोष्ट आहे.
एकांताची सवय होण्यासाठी घरातील एखादा निवांत कोपरा किंवा जवळचे एखादे शांत मंदिर अशा ठिकाणी जाऊन स्वसंवाद करता येईल. काही काळ टीव्ही, मोबाईल यासारख्या गोष्टींपासूनही दूर राहण्याची सवय करावी लागेल.
पण समर्थ या अनुभवातून गेले आहे. “आधी केले मग सांगितले” असेच त्यांचे बोल आहेत. अगदी तरुणपणी त्यांनी नाशिक जवळील टाकळी येथे राहून बारा वर्षांचा काळ एकांतात घालवला. ज्ञानेश्वरादी भावंडांनी एकांतात राहूनच तपश्चर्या केली. संत तुकाराम महाराज भंडारा डोंगरावर एकांतात आपला काळ घालवित असत.
तरुण वयात उत्साह असतो, काहीतरी करण्याची जिद्द असते अशावेळी एकांताचे सेवन सहज होऊ शकते. जेव्हा सगळी गात्रे थकलेली असतात अशावेळी एकांतात राहणे मनुष्याला शक्य होत नाही. वृद्धापकाळी मुलांशी पटत नाही म्हणून जंगलात जाऊन राहणे हे लादलेले वैराग्य म्हणता येईल. तीर्थयात्रा, निरनिराळ्या ग्रंथांचा अभ्यास, भजन, प्रवचन, कीर्तन इत्यादी गोष्टी तरुणपणीच उत्तमरीत्या करता येतात. मुखात रामाचे नाव तरुणपणीच यायला हवे. आयुष्यभर जर जिभेवर राम नाही आला तर अंतिम समयी तरी तो कसा येईल? त्यावेळीही कामच आठवेल.
तरुणपणीच भगवत भजनात रमलेला माणूस चुकूनही कल्पनेच्या राज्यात रममाण होत नाही. जी माणसे कल्पनेच्या राज्यात रमतात, ती कोणतेच कर्तव्य नीट पार पाडू शकत नाहीत. एकांताची सुद्धा सवय व्हावी लागते. एकांत पचावा लागतो. त्याची सवय व्हावी लागते. काही लोकांना समूहात राहण्याची एवढी सवय असते की ते एकांत सहन करू शकत नाहीत. पण सदैव लोकांमध्ये राहिले तर काही काळाने माणसाचे मन मलिन होते आणि मग अशा वेळी एकांत आणि स्व चिंतन आवश्यक असते. म्हणूनच पूर्वीची माणसे काही काळ साधनेसाठी म्हणून घरातून निघून जात असत. आणि काही काळानंतर परत येत असत. दैनंदिन जीवनातील ताणतणाव, धावपळ इत्यादी गोष्टींना कंटाळलेली काही माणसे वर्षातून काही दिवस नियमितपणे विपश्यनेसाठी जातात त्याचाही उद्देश हाच असतो.
एखाद्याला भगवंत प्राप्तीची ओढ लागली तरी त्याचा उत्साह काही दिवस टिकतो आणि पुन्हा येरे माझ्या मागल्या सुरू होते. कारण लोकांमध्ये राहून त्याच्या मनात वेगवेगळे विचार येतात. तर कधी त्याचा बुद्धिभेद होतो आणि त्याचा जो निश्चय असतो तो ढळतो. माणसाचे मन अतिशय चंचल असते. बंधनात राहणे, एकच एक गोष्ट करणे त्याला आवडत नाही. म्हणून करुणाष्टकामध्ये समर्थ म्हणतात, ” घडी घडी बिघडे हा निश्चयो अंतरीचा, म्हणवुनी करुणा हे बोलतो दीनवाचा… “परंतु परमेश्वराचा जो खरा भक्त असतो आणि तरुणपणापासूनच जाऊ भगवंत प्राप्तीसाठी प्रयत्नशील असतो अशा व्यक्तीचा निश्चय कधीही ढळत नाही अशी व्यक्ती म्हणजे परमेश्वराची खरोखरच प्रिय भक्त असते.
स्वसंवाद :
१) मी साधना/नामस्मरण “नंतर करू” असे पुढे ढकलतो आहे का?
२) माझ्या दिवसात मला एकांतासाठी किती वेळ मिळतो? की मी तो जाणीवपूर्वक टाळतो?
३) मी वास्तवात कृती करतो का, की कल्पनांच्या जगातच रमतो?
४) माझा आध्यात्मिक निश्चय किती दृढ आहे? अडचणी आल्या की तो ढळतो का?
५) आजपासून मी एक छोटी पण सातत्यपूर्ण साधना सुरू करू शकतो का?
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “यह कैसा स्वागत ?”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
अस्पताल में एक उच्च पद पर कार्यरत महिला ने बच्ची को जन्म दिया । अस्पताल की सबसे सीनियर महिला डाॅक्टर आई और उस।अधिकारी को बुरा सा मुंह बना कर कहने लगी-हमने सोचा था कि आप पढ़ी लिखीं हैं और आपने अल्ट्रासाउंड करवा रखा होगा । पर हमें क्या मालूम था कि आपने भगवान् भरोसे सब कुछ छोड़ रखा है ।
महिला अधिकारी चौंकी । फिर पूछा -यदि मैंने पहले से सब कुछ करवा रखा होता तो फिर क्या फर्क पड़ता?
– कम से कम हमारे स्टाफ को तो इनाम मिल जाता । महिला डाॅक्टर ने बड़ी बेशर्मी से कहा ।
– बस । इसी कारण आपने मेरी नवजात बच्ची का स्वागत् नहीं किया ?
– हां । हमारे स्टाफ को कुछ ऐसी ही उम्मीद थी आपसे ।
– कोई बात नहीं । आप स्टाफ को बुलाइए ।
सारा स्टाफ आ गया और महिला अधिकारी ने सबको इनाम दिया लेकिन उसके बाद अपने पति को बुलाकर अपना सारा सामान समेट लिया । पति ने पूछा -ऐसा क्यों कर रही हो ?
महिला अधिकारी ने पति के गले लगकर रोते कहा -इस अस्पताल में मैं एक पल और नहीं रहूंगी क्योंकि इन लोगों ने मेरी बच्ची का स्वागत् नहीं किया ।
☆ लघुकथा ☆ ~ पिता की चिंता ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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ट्रेन में बड़ी भीड़ थी, लेकिन देवीदयाल को अपनी बिटिया के घर जाना जरुरी था। बेटी की ससुराल की तरफ से आयी एक खबर ने देवी दयाल को डरा दिया था । उन्हें हर हाल में आज ही अपनी बेटी की ससुराल जाना था । ट्रेन में बहुत भीड़ थी, लेकिन उन्हें हर हाल में ट्रेन पर चढ़ना ही था।
आइए बाबूजी, आप ऊपर आ आइए,यह कहते हुए उस युवक ने देवीदयाल की बांह को पकड़कर ट्रेन के अंदर खींच लियाl बाबूजी आपने अपने इन्हीं हाथों से सुधा का हाथ मेरे हाथ में दिया थाl आप सुधा की चिंता मत कीजिए, उसे कोई भी इस घर से निकाल नहीं सकताl अब वह मेरे पास ही रहेगीl देवीदयाल ने युवक के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,बेटा..मेरी यात्रा का उद्देश्य पूरा हो गया, अब अगले स्टेशन पर उतर जाऊँगाl
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता पर्यावरण!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ५ ☆
☆ पर्यावरण ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
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वृक्ष काटते निशदिन मानव, होगा क्या परिणाम रे।
शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।
०
खो जाएंँगे मौसम सारे, नहीं मिलेगी बूंँद रे।
जागो अब कब तक बैठोगे, ऐसे आंँखें मूंँद रे।।
निशिदिन जंँगल खाली होते, धरती करती शोक रे।
धानी चुनर फटती जाती, मानव इसको रोक रे।।
रौद्र रूप जब धारे माता, होगा क्या परिणाम रे।
शीतलता कह कहाँ मिलेगी, जब आएगी घाम रे।।
०
पर्यावरण दिवस जब आए, आती सबको याद रे।
वृक्ष नीर हम लोग बचाएंँ, भूले इसके बाद रे।।
दिव्य संपदा का अति दोहन, होगा ये अभिशाप रे।
भारत माँ आवाज लगाती, बंद करो ये पाप रे।।
हरित क्रांति से वसुंधरा का, दृश्य बनें अभिराम रे।।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३५ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
भेड़ाघाट से बिजना घाट: 15 अक्टूबर 2018
एक दिन पहले, जैसे ही हम तिलवारा घाट के पुल पर जाकर खड़े हुए, वहाँ पान की दुकान वाले ने बताया कि नर्मदा के किनारे से रास्ता बहुत दलदली है। आप लोगों को घूँसोर होते हुए सिवनी गाँव से होकर लम्हेंटा पहुँचना होगा। हमने उससे आगे की जानकारी ली। जबलपुर और आसपास में दूधिया कत्था और मलाईदार चूना का जैसा ज़ायक़ेदार बीड़ा मिलता है वैसा कहीं नहीं मिलता सिवाय बनारस के अतः हमने एक मीठा पत्ता पान चटनी, चमन-बहार, लोंग, इलायची, पिपरमिंट का बनवा कर मुँह में दबाया और निकल पड़े। हम घूँसोर गाँव पहुँचे वहाँ पहले घर में पीने को पानी माँगा तो वे पानी देने में हिचकिचा रहे थे। हमने कहा हम छुआछूत नहीं मानते। आप साफ़-सफ़ाई से रहते हो बस यही हमारे लिए काफ़ी है। वे सतनामी समाज के थे। यह सतनामी समाज नर्मदा घाटी में कब, कैसे और कहाँ से आया। नर्मदा के उस पार दक्षिण के गाँवो में सतनामी समाज की सघन वसाहट है। जबलपुर जिले में नर्मदा के दक्षिण तट की तरफ़ बसे गाँवों में सतनामी बसे हैं।
जब भारत में ग्यारहवीं सदी से मुस्लिम तेग़ की ख़ूनी ख़ूँख़ार आँधी चली तब हिमालय की तराई, दक्षिण के पथरीले पहाड़ और सतपुड़ा-विंध्याचल में नर्मदा के दोनों तरफ़ दो सौ किलोमीटर चौड़ी और एक हज़ार किलोमीटर लम्बी घाटी हिंदुओं के लिए सुरक्षित अभयारण्य बन गई। जहाँ भी इस्लामी सुल्तान या बादशाह का अत्याचारी दबाव पड़ता था वहाँ के रघुवंशी, गूज़र, लोधी, कुर्सी, कलार, काछी, सतनामी और उनके साथ लगे-लगे ब्राह्मण, चमार, बँसोड, भंगी नर्मदा घाटी की गोद में आकर बस जाते थे। सघन जंगलों से पूरी तरह ढँकी रहने वाली घाटी आबाद होने लगी थी। अंग्रेज़ों द्वारा रेल लाइन बिछाने के पहले तक नर्मदा घाटी में पहुँच दुरूह हुआ करती थी।
1672 में वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार चोपड़ा, पुरी और श्रीदास ने मैकमिलन कम्पनी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ए सोसल कल्चरल एंड इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के भाग तीन में लिखा है। “18वीं शताब्दी में अवध के बाबा जगजीवनदास ने एक अलग धार्मिक पंथ बनाया जो कि सत्य और ज्ञान पर विश्वास करने वाला सतनाम पंथ कहलाया।”
इस पंथ के लोग उत्तरी भारत में विस्तृत रूप से फैले थे। औरंगज़ेब के शासनकाल में कट्टर नीतियों के चलते सिक्ख, जाट, मराठों के साथ-साथ सतनामी लोगों ने भी विद्रोह का परचम लहराया था। इस सम्प्रदाय के गुरू घासीदास माने जाते हैं। जो मध्य युगीन सतनामी समाज में विश्वास और उपासना विधि को जीवित रखना चाहते थे तथा उनमें अभिनव चेतना लाने की आकांक्षा रखते थे। उन्होंने प्रचारित किया कि वास्तविक भगवान कर्मकांड में निहित नहीं है सतनाम ध्यान में प्रकट होते हैं। उन्होंने अक्षर ब्रह्म का शब्द देकर ध्यान लगाने और निर्गुण ईश्वर के भजन गाने की प्रणाली सतनामी समाज में विकसित की थी। ईश्वर की नजर में सभी समान हैं। इसलिये मानव समाज में कोई भेद नहीं होना चाहिये जैसा कि जाति प्रथा से भेदभाव परिलक्षित होता है। छतीसगढ में सतनाम आंदोलन पिछड़े, निम्न और अछूत समझे जाने वाले वर्गो में धार्मिक और सामाजिक चेतना लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यह कबीर, नानक, दादू पंथ की कड़ी को मानने वाले हैं।
सतनामी मत के अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत का पालन करते हैं। एक सतनामी किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान मानते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी ने मुग़ल कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न होकर तूल पकड गया और एक बड़े संघर्ष में बदल गया। धीरे धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें सशक्त शाही फौज निहत्थे सतनामी समूह से मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में ये बात फैल गई कि सतनामी कोई जादू टोना करके शाही फौज को हरा रहे हैं। इसके लिये औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखे तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फ़र्क़ नहीं पडा था। उन्हें ये पता नहीं था कि सतनामी साधों के पास आत्मदान करने वाले भक्तों की शक्ति के कारण यह स्थिति थी।
सतनामी संघर्ष को मुग़लों द्वारा बेरहमी से कुचलने की प्रक्रिया में बचे-खुचे सतनामी अपनी जान बचा कर अलग अलग दिशाओं में भाग निकले थे। जिनमें घासीदास के पूर्वजों का भी एक परिवार रहा जो कि महानदी के किनारे-किनारे वर्तमान छत्तीसगढ तक जा पहुचा था। जहाँ पर संत घासीदास जी का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार किया। वे गिरौदपुरी तहसील बलौदाबाजार जिला रायपुर में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ पैदा हुये थे। गुरूजी को सतनाम पंथ सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी पंथ के प्रवर्तक कहा जाता है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिभेद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिया। गुरू घासीदास का जन्म 1756 में रायपुर जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर कुठाराघात किया था। ब्राम्हणों और मन्दिर के पुजारियों द्वारा हिन्दुओं के धार्मिक शोषण का विरोध करने का यही मार्ग उनको सूझा था। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाई जाती है। बिलासपुर के विश्वविद्यालय का नाम गुरु घासीदास विश्वविद्यालय है। सतनामियों के घरों से चाय-पानी प्रसाद पाकर आगे बढ़ते जा रहे थे।
भेड़ाघाट से बिजना घाट की यात्रा सबसे लम्बी थकाऊ और उबाऊ थी। पहले हमने तय किया था कि रामघाट में रुककर रात गुज़ारेंगे। मंगल सिंघ परिहार जी वहाँ से चार किलोमीटर आगे रास्ता देख रहे थे। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के दम पर सभी को खींचे जा रहे थे। चार घण्टे पैदल चल चुके थे। दोपहर में तेज़ धूप में चलने से शरीर का ग्लूकोस जल जाता है और हवा में ऑक्सिजन भी कम हो जाती है। मांसपेशियाँ जल्दी थकने लगतीं हैं और साँस फूलने लगती है। दो बजे के बाद सूर्य की किरणे सामने से परेशान करने लगती है। ऐसे माहौल में नदी किनारे रास्ता भी नहीं था। बर्मन लोगों ने नदी के कछार को हल चलाकर मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले में बदल दिया था। खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं था। साथियों को बाटी-भर्ता का लालच देकर खींचे जा रहे थे, जबकि भोजन का कहीं कोई ठिकाना नहीं था। उधर दनायक जी को परिहार जी मोबाइल से जल्दी पहुँचने को कह रहे थे। सब थक कर चूर थे। ऐसे में दल को खींच कर आगे ले जाना ज़रूरी था।
मंगल सिंग परिहार बहुत पुराने परिचित सहकर्मी रहे हैं। उन्होंने दिन के ग्यारह बसे से, जब हम भेड़ाघाट से चले ही थे, तब से बिजना गाँव से नर्मदा पार करके मुरकटिया घाट आकर मोबाईल से सम्पर्क साध कर हमारी स्थिति लेना शुरू कर दिया। वे हर आधा घंटे में दनायक जी को मोबाईल से सम्पर्क साध कर स्थिति पूछते जा रहे थे। कभी मोबाईल लगता था और कभी नहीं लगता था। हम लोग रामघाट से सड़क छोड़ नर्मदा किनारे आ गए, वहाँ से अत्यंत दुरुह यात्रा शुरू हुई। छोटी नदी, नाले, झरने, सघन हरियाली और ताज़े गोंड़े गए खेतों की मिट्टी के बड़े-बड़े ढेलों के बीच से घुटनों और ऐडियों की परीक्षा का समय था क्योंकि कहीं भी समतल ज़मीन नहीं थी। आगे छोटी पहाड़ियों का जमघट एक के बाद एक घाटियाँ का सिलसिला जिनको स्थानीय बोली में ड़ांगर कहते हैं। चम्बल में जैसे बीहड़ होते हैं जिनमे कँटीले पेड़-पौधे होते हैं वैसे नर्मदा के आजु-बाजु ड़ांगर का साम्राज्य है उनके बीच से पानी झिर कर जंगली नालों को आकार देते हैं। उनको पार करने के लिए ऊपर चढ़ाई चढ़ना फिर उतरना फिर चढ़ना। यात्रियों का दम निकलने लगता है। पसीने से तरबतर शरीर में पूरी साँस धौंकनी के साथ भरकर पहाड़ियों को पार करने के बीच में नर्मदा दर्शन से हिम्मत बनती टूटती रहती है। चार बजे हाल-बेहाल और निढ़ाल-पस्त हालत में बिजना घाट के सामने वाले मुरकटिया घाट पर मंगल सिंघ परमार बिस्कुट और केले फल के साथ स्वागत आतुर मिले। वहाँ उनकी सिकमी ज़मीन थी। उसी पर खड़े थे। बैठने को कोई छायादार जगह नहीं थी। यात्री बिस्कुट और केलों को क्षणभर में चट कर गए। नाव से नर्मदा पार करके दूसरी पार उतरे वहाँ एक बर्मन दादा पूड़ी और खीर का भंडारा करा रहे थे। यात्रियों ने भंडारा खाया। ख़ूब पानी पिया तो कुम्लाए चेहरों की रंगत और ढीले शरीरों में जान लौटने लगी।
15 अक्टूबर को मंगल सिंग परिहार के आश्रम नुमा फ़ार्म हाऊस में विश्राम का अवसर मिला। मंगल सिंघ परिहार ने प्राकृतिक छटाओं में बसा अपना आश्रम दिखाया। जिसमें पारिजात और रुद्राक्ष के वृक्ष लगे हैं। सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत सुंदर नज़र आता है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज नागौद रियासत के राजा रहे हैं। परमार, परिहार, बुंदेले और बघेल सब गहडवाल राजपूत हैं। परमारों ने महोबा, परिहारों ने नागौद, बुन्देलों ने छतरपुर और बघेलों ने रीवा रियासत स्थापित की थी। ये सब पहले अजमेर के पृथ्वीराज़ चौहान या कन्नौज के जयचंद राज्यों के सरदार थे। 1091-92 में मुहम्मद गोरी के हाथों अजमेर, दिल्ली और कन्नौज हारने के बाद इन्होंने इन राज्यों को स्थापित किया था। नागौद कभी स्वतंत्र राज्य और कभी रीवा के बघेलों का करद राज्य हुआ करता था। उसके उत्तर-पश्चिम में केन नदी का अत्यंत ऊपजाऊ कछारी भाग था लेकिन दक्षिण-पूर्व में पथरीली ज़मीन थी। अतः राजपूतों ने नर्मदा के कछारी मे बसने का निर्णय लिया था।
अंग्रेज़ों ने 1861 में जबलपुर को राजधानी बनाकर सेंट्रल प्रोविंस राज्य बनाया तो रीवा, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल रियासत छोड़कर मध्य प्रांत के नागौद सहित बाक़ी सब इलाक़े उसमें रख दिए। तब ही नर्मदा घाटी का सर्वे करके जबलपुर की सीमा नर्मदा के दक्षिण में चरगवाँ-बरगी तक निर्धारित कर दी। परिहारों को ज़मींदारी में मगरमुहां का इलाक़ा दिया गया। कई परिहार सौ-सौ एकड़ के ज़मींदार बनकर आज के पाटन और शाहपुरा इलाक़े में आ बसे। उनमें मंगल सिंघ परिहार के पूर्वज भी थे। मंगल सिंघ के पिताजी मुल्लुसिंघ परमार निरक्षर थे परंतु उन्होंने अपने आठ बेटों को पोस्ट-ग्रेजुएट कराया।
मंगल सिंघ जी से देर रात तक बातें होतीं रहीं। वे हमें एक वेदान्ती साधु के दरबार में ले गए। हमसे कहा कि साधु जी वेदों के प्रकांड विद्वान हैं। आप उनसे गूढ़ प्रश्न कीजिए तब उनकी ज्ञान गंगा बहने लगेगी। हम लोग उनके दरबार मे पहुँचे पाँव-ज़ुहार होने के बाद बातचीत चली तो मौक़ा देखकर हमने एक सवाल का तीर चलाया कि हमारी जानने कि इच्छा है कि महाराज रुद्र और शिव का अंतर बताएँ, तो बड़ी कृपा होगी। स्वामी जी ने थोड़ा इधर-उधर घुमाया। फिर विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि प्रश्न गूढ़ है और उनका ज्ञान वेदों तक ही सीमित है उन्होंने पुराण नहीं पढ़े हैं। वे नेपाल से नर्मदा की गोद में आकर बस गए हैं। नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। वापस आकर परिहार जी ने शिमला मिर्च की साग-रोटी और दाल-चावल का बढ़िया भोजन कराया। उसके बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा। परिहार जी की बातें सुनते रहे। उनकी बातों के क्रम को बीच में बोलकर तोड़ना उनके रुतबे को कम करने जैसा होता है यह बात हम जानते थे परंतु अन्य लोगों को नहीं पता था। एक सहयात्री ने टोकने की कोशिश कि तो हमने उसे चुपके से समझा दिया कि भैया:-
बंभना जाय खाय पीय से
क्षत्री जाय बतियाय
लाला जाय लेय-देय से
शूद्र जाय लतियाय।
इस बुंदेलखंड की कहावत को गाँठ बाँध लो और क्षत्री की बातें चुपचाप सुनो। सुबह दो-दो रोटियाँ तोड़कर आश्रम से फिर नर्मदा की गोद मे पहुँच गए। इस प्रकार 13, 14 और 15 अक्टूबर की यात्रा पूरी हुई। यहाँ से हमारे एक और साथी प्रयास जोशी ने हमसे विदा ली।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “कॉकरोच…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – शिक्षा की महत्ता…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६९ ☆
☆ शिक्षा की महत्ता… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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शिक्षा ही देती इस जग में, सबको समुचित ज्ञान है
शिक्षा से ही संभव इस जीवन में हर कल्याण है।
शिक्षा के बिन अंधकार है, फीका हर व्यवहार है
शिक्षा से ही पाता मानव धन उन्नति सम्मान है ।।1।।
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सदा सुशिक्षित विनयशील का युग करता गुणगान है
अपने विद्वानों पर ही होता सबको अभिमान है।
दूर दूर इससे ही जाते शिक्षा पाने लोग हैं
सुख दुख में सब साथ निभाती विद्या मित्र समान है ।।2।।
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शिक्षा ही इस जग में सचमुच हर विकास का प्राण है
शिक्षा से ही संभव गहराई का अनुसंधान है।
शिक्षा सचमुच अक्षय धन है, शिक्षा सुख की खान है
शिक्षा बिन भटकाव बहुत हैं, मुश्किल निज अधिकार है ।।3।।
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सुलभ कामना पूर्ति मंत्र-शिक्षा पर केन्द्रित ध्यान है
ज्ञानवान ही कर सकता भावी का कुछ अनुमान है।
मिली न शिक्षा सही अगर तो पग-पग पर कठिनाई है
संकट की रक्षा करने को सही ज्ञान भगवान है ।।4।।
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शिक्षा बिन अंधा सा औ’ निर्बल जैसा इन्सान है
शिक्षा के प्रकाश से होती हर मुश्किल आसान है।
शिक्षा ने ही सुलभ कराई सुविधाएं विज्ञान कीं
शिक्षा से ही हुआ विश्व का चतुर्मुखी उत्थान है ।।5।।