मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०३ – नातं मैत्रीचं…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # ३०३ – विजय साहित्य ?

☆ नातं मैत्रीचं…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

शब्द पडतात फिके

मैत्री काळजाची सर

तिच्या वर्णनात जाई

भरूनीया  प्रेम घर…! १

*

भेट असो रोज तरी

नाही भागत तहान

नातं मैत्रीचे देतसे

सुख दुःख वरदान…! २

*

मैत्री कर्तृत्वाचा झरा

मैत्री राग लोभ मोह

काळजात दडलेला

मैत्री भावनांचा डोह…! ३

*

मैत्री  मंदिराचा पाया

“मैत्र”  प्रासादिक नाते

असो नर किंवा नारी

दळी गुणदोष जाते…! ४

*

मान अपमाना नसे

मनी तिळमात्र जागा

नातं मैत्रीचे आगळे

एक स्नेहांकित धागा…! ५

*

अर्धा कप चहासाठी

मैत्री भांडणाचा पूर

दिठी आणि मिठीतून

लावी जीवा हुर हुर..! ६

*

मनातलं बोलताना

जपे गुपितांचा ठेवा

“मैत्री”  शब्दातीत नाते

नाही ईर्षा नाही हेवा…! ७

*

“मित्र”  आधाराचा हात

“मैत्री”  आयुष्याचे रूप

बंधनांच्या पलीकडे

जळे जीवनाचा धूप…! ८

*

हवी मैत्री पदोपदी

आयुष्याच्या प्रवासात

कधी “ओवी”  कधी “शिवी”

अंतरीच्या आरश्यात…! ९

*

मैत्री कधी मोबाईल

कधी फेसबुक नोट

नातं मैत्रीचं लाघवी

नको अंतरात खोट…! १०

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९६ ☆ सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९६ ☆

सावन का सुरम्य आँचल: शिव पूजा, हरियाली का उत्सव ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

हरी हरी सी चूड़ियाँ, कजरी वाले  राग ।

बहन बेटियाँ आ गयीं, प्रकृति सजाए बाग ।।

इनके बिन लगता सदा, ये जीवन बेकार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।

सावन मास आते ही धरती मानो नई दुल्हन-सी सज जाती है। चारों ओर बिछी हरियाली की चादर, बादलों की गड़गड़ाहट और बूँदों की रिमझिम—यह ऋतु केवल प्रकृति का ही नहीं, बल्कि आस्था और भक्ति का भी पर्व है। हिंदू पंचांग में श्रावण मास को भगवान शिव का प्रिय  माना गया है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान कर शिवजी नीलकंठ बने थे, और उसी विष की तपन शांत करने के लिए भक्त सावन में जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं।

सोमवार का व्रत, कांवड़ियों की टोली, शिवालयों में गूँजता “ॐ नमः शिवाय” का जयघोष—यह सब मिलकर सावन को एक अलग ही रंग देते हैं। महिलाएँ हरे वस्त्र और चूड़ियाँ पहनकर, झूला झूलकर, लोकगीत गाकर इस मास का स्वागत करती हैं। हरियाली तीज इसी उल्लास की पराकाष्ठा है, जब माता पार्वती और शिवजी के पुनर्मिलन को याद कर सुहागिनें अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

सावन केवल पूजा-पाठ का महीना नहीं, यह प्रकृति और परमात्मा के बीच के अटूट संबंध का प्रतीक भी है। जिस तरह वर्षा धरती को हरा-भरा कर नवजीवन देती है, उसी तरह भक्ति मन को निर्मल कर आत्मा को नवीनता प्रदान करती है। पेड़-पौधे, नदी-तालाब सब मानो शिव की जटाओं से बहती गंगा का ही विस्तार लगते हैं।

आज के भागदौड़ भरे जीवन में सावन हमें ठहरने, प्रकृति को निहारने और भीतर की शांति खोजने का अवसर देता है। यही कारण है कि यह मास सदियों से कवियों, भक्तों और आम जनमानस के हृदय में समान रूप से बसा हुआ है—हरियाली, आस्था और उल्लास का त्रिवेणी संगम बनकर।

हर किसान खुशहाल हो, ऐसा होवे देश ।

आओ मिलकर हम रचें, एक सुखद परिवेश।।

वर्षा बिन होता नहीं, धरती  का शृंगार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार ।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२४ ☆ पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२४ 

?  आलेख – जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा , पीढ़ियों के नए संक्षिप्त नाम ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

समय केवल कैलेंडर नहीं बदलता, वह मनुष्य की सोच, जीवन शैली और सामाजिक व्यवहार भी बदल देता है। इसी परिवर्तन को समझने के लिए समाजशास्त्रियों और जनसांख्यिकीय अध्येताओं ने विभिन्न आयु वर्गों को अलग अलग पीढ़ियों में एकीकृत संबोधन के रूप में वर्गीकृत किया है। इन्हें संक्षिप्त रूप में जेन एक्स, मिलेनियल, जेन जी, जेन अल्फ़ा और अब जेन बीटा जैसे नामों से जाना जाता है। ये केवल आयु का नहीं, बल्कि उस सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी परिवेश का संकेत हैं जिसमें कोई पीढ़ी विकसित हुई।

लगभग 1965 से 1980 के बीच जन्मे लोग जेन एक्स कहलाते हैं। यह पीढ़ी परंपरागत जीवन से आधुनिक तकनीकी युग तक के संक्रमण की साक्षी रही।

1981 से 1996 के बीच जन्मे मिलेनियल या जेन वाई ने इंटरनेट, मोबाइल संचार और वैश्वीकरण को अपनाकर नई कार्य संस्कृति को आकार दिया।

1997 से 2012 के बीच जन्मी जेन जी पहली वास्तविक डिजिटल पीढ़ी मानी जाती है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता इनके दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। सूचना तक त्वरित पहुंच, वैश्विक दृष्टिकोण और तकनीक के सहज उपयोग ने इस पीढ़ी की पहचान निर्मित की है।

2013 के बाद जन्मे बच्चों को जेन अल्फ़ा कहा जाता है। यह पीढ़ी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्मार्ट उपकरणों, आभासी दुनिया और स्वचालित प्रणालियों के बीच बड़ी हो रही है।

इसके बाद 2025 से जन्म लेने वाले बच्चों के लिए जेन बीटा शब्द प्रचलन में आ रहा है, जिनके जीवन में एआई, रोबोटिक्स और स्मार्ट परिवेश और भी गहराई से समाहित होंगे।

 

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन पीढ़ियों की समय सीमाओं में विभिन्न शोध संस्थानों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए इन्हें कठोर मानक नहीं, बल्कि सामाजिक अध्ययन के उपयोगी संकेतक मात्र माना जाता है।

 

आज जेन जी या जेन अल्फ़ा जैसे शब्द केवल फैशनेबल संबोधन नहीं हैं। ये उस युग की पहचान हैं जिसमें कोई पीढ़ी पली बढ़ी, उसने तकनीक को किस रूप में अपनाया और समाज को किस दिशा में प्रभावित किया। वस्तुतः पीढ़ियों के ये संक्षिप्त नाम बदलते समय का सामाजिक इतिहास हैं, जो मनुष्य और तकनीक के विकसित होते संबंधों की कहानी भी कहते हैं।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०५ ☆ बाल गीत – लप्पा – लोरी गाए राम… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०५ ☆ 

☆ बाल गीत – लप्पा – लोरी गाए राम ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

लप्पा – लोरी गाए राम।

मंद – मंद मुस्काए राम।।

कभी पकड़ अंगुली इतराएँ।

तनिक प्रेमरस वह बरषाएँ।।

हमको मन – मन भाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

कभी गाल पर करें गुदगुदी।

थोड़े नटखट बढ़े धुकधुकी।।

अपनेपन में नहाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

पकड़ – पकड़ दादा की टोपी।

बंसी धुन पर नाचें गोपी।।

निप्पल चूसें भाए राम।।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

 *

ठुमक – ठुमक वह घुटअन चलते।

घुँघरू , छल्ला टुन – टुन बजते।

मंत्र सुनें मुस्काए राम।

लप्पा – लोरी गाए राम।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५४ ☆ कोल्हू का बैल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कोल्हू का बैल”।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५४ ☆

☆ कोल्हू का बैल ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

निरंतर एक ही पथ पर

घूमता रहता है

आँखों पर बँधी होती है पट्टी

बस इसी आशा में

कि एक दिन निश्चित ही

पा जाऊँगा अपनी मंजिल

और नियति है जो घुमाती रहती है

आदमी भी घूमता रहता है

अपने द्वारा रचे गए चक्रव्यूह में

अभिमन्यु की जिसे

घुसना तो आता था चक्रव्यूह में

निकलना नहीं सीखा था

इसलिए मारा गया

मनुष्य भी कोल्हू का बैल

और अभिमन्यु की तरह ही

अपने आपको बेबस और लाचार

पाकर अभिशप्त है मरने को

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६१ ☆ गफ़लत न कीजियेगा निभाने में… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गफ़लत न कीजियेगा निभाने में “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६१ ☆

✍ गफ़लत न कीजियेगा निभाने में… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

दुनिया की भीड़ भाड़ में अपना न मिल सका

जो भी मिला है मुझसे से वो पूरा न मिल सका

 

मंज़िल की चाह जब न तलब मेरी बन सकी

मंज़िल का मेरी मुझको भी रस्ता न मिल सका

 *

उस पीर की मज़ार पै जाते थे चश्मे-नम

इक शख़्स वापसी में पै रोता न मिल सका

 *

इस हाई वे से हो गई रफ्तार तेज़  पर

राही को बचने धूप से साया न मिल सका

 *

विरसे में जो था बाँट लिए  भाई जब सभी

वो साथ देने माँ का ही जाया न मिल सका

 *

इस काहिली ने मुझपे सितम  ढाया इस तरह

तक़दीर में जो मेरी वो लिक्खा न मिल सका

 *

मुफ़्लिस की मुफ़्लिसी के सितम की ये इंतिहां

बच्चे को उसका चाहा खिलौना न मिल सका

 *

गफ़लत न कीजियेगा निभाने में कुछ कभी

करता रफ़ू जो रब्त की धागा न मिल सका

 *

शानों पे जिनको मैंने चढ़ा दी अरुण उड़ान

अंतिम सफ़र को उनका ही शाना न मिल सका

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६५ – ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – ये अखाड़ा निराला है।)

☆ हेमंत साहित्य # ६५ ☆

✍ ये अखाड़ा निराला है… ☆ श्री हेमंत तारे  

ये अखाड़ा निराला है,

ये वही पहलवान हैं,

जिन्हें अखाड़े में उतारा था हमने।

अपने ही हाथों से

अपने ही कंधों पर बिठाया,

फिर ताज भी पहनाया हमने।

 

मैं अकेला नहीं था,

माशरे के सभी मकीं थे

धर्म की घुट्टी पीकर

सो गये मदहोश,

और उँगली की एक स्याही

वर्षों की खामोशी बन गई।

 

हम सुनते रहें,

वे हमें सुनाते रहे रामधुन,

कि कहीं जाग ना जायें

हम

सुनकर सिसकियाँ

हमवतनों की

अपनों की.

हम सपनों में भारत गढ़ते रहे,

वे सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे।

 

मैं ढूँढ़ता रहा

उनकी आँखों में संवेदना।

पर वहाँ तो

कुर्सी का धुआँ था,

जिसने इंसान को ही ओझल कर दिया।

 

अगर संवेदना होती,

तो कलियाँ न कुचली जातीं।

पुस्तकों से भरे हाथ

ढाल न बनते,

गलियारों में धुआँ न उतरता,

लाठियाँ भविष्य की पीठ पर

इतिहास न लिखतीं।

 

अस्पतालों की खिड़कियों से

झाँकता हुआ कल,

पट्टियों में लिपटा पूछता रहा—

क्या यही था

उजाले का वादा?

 

फिर भी सिंहासन मुस्कुराता रहा,

जैसे कुछ हुआ ही न हो।

अहंकार का मुकुट पहनकर

वह आईनों से भी

नज़रें चुराता रहा।

 

कौन समझाए उन्हें—

सिंहासन शाश्वत नहीं होते।

सोने की लंका भी

एक दिन राख हुई थी।

 

समय की मुट्ठी में

हर ताज की धूल लिखी है।

जनता देर से बोलती है,

मगर जब बोलती है,

तो अखाड़े बदल जाते हैं।

 

ये अखाड़ा निराला है…

यहाँ जीत उसी की नहीं होती

जो सबसे ऊँचा बैठा हो,

जीत अंततः उसी की होती है

जिसे कहते हैं

वोटर।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆ कविता – क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “क्रेता“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७३ ☆

✍ कविता ☆ क्रेता☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

हम सब बिके हुए हैं

किसके हाथों, पता नहीं

शायद,

विचारवानों के, विद्वानों के

सभ्यताओं के, शासनों के

सत्ताओं या सत्ताधीशों के।

 

या कि

अपने अहम् के, मद मोह के

समाज के, संसार के

द्वेष के, आग्रहों के

दुराग्रहों के,

पता नहीं।

 

बस यही पता करना है

हम किसके हाथों बिके हैं

यह पता चल जाए

तो मुक्त हो सकते हैं।

क्रेता से, छुटकारा

पा सकते हैं।

लेकिन, बहुत सजग रहने की

ज़रुरत है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२३ – सावन का झूला… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय और अप्रतिम कथा – सावन का झूला।)

☆ कथा कहानी # १२३ – सावन का झूला श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सावन की रिमझिम फुहारों के बीच मालती जी अपने बगीचे में तुलसी के पास दीपक जला रही थीं। तभी उनकी नजर एक अनजान लड़की पर पड़ी, जो चुपचाप बगीचे में खड़ी झूले को निहार रही थी।

मालती जी चौंक उठीं।

“कौन हो तुम? और मेरे बगीचे में क्या करने आई हो?

कुछ चुराने का इरादा है क्या?”

लड़की सहम गई। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए।

“माफ कीजिए… मैं चोर नहीं हूँ।”

मालती जी ने गौर से देखा। लड़की के चेहरे पर मासूमियत थी। उसके कपड़ों और बातचीत से लग रहा था कि वह किसी अच्छे घर की पढ़ी-लिखी लड़की है।

“तो फिर अंदर कैसे आई?”

लड़की ने झेंपते हुए कहा, “गेट खुला था… इसलिए चली आई।”

मालतीने कहा-

“लेकिन क्यों?”

लड़की कुछ पल चुप रही। फिर उसकी आँखें झूले पर टिक गईं।

“मैं आपके बगल वाले घर में कुछ दिन पहले ही किराए से रहने आई हूँ।

सावन आया है… इस मौसम में तो हम मायके जाते थे, झूला झूलते थे, सहेलियों के साथ हँसते-गाते थे। लेकिन इस बार मायके नहीं जा पा रही हूँ।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“आज खिड़की से आपके आँगन में यह झूला दिखाई दिया। आपका इतना सुंदर बगीचा देखा तो बचपन याद आ गया। अब ऐसे बगीचे और झूले कहाँ देखने मिलते हैं?

पता नहीं क्यों… मैं खुद को रोक नहीं पाई और चली आई।”

मालती जी की कठोरता धीरे-धीरे पिघलने लगी।

लड़की ने संकोच से पूछा, “अगर आप कहें तो… क्या मैं थोड़ी देर झूला झूल सकती हूँ?”

मालती जी कुछ कह पातीं, उससे पहले लड़की ने अपने कान पकड़ लिए।

“सॉरी… मुझे बिना पूछे यहाँ नहीं आना चाहिए था। अब नहीं आऊँगी।”

वह मुड़कर जाने लगी।

“अरे, रुको बेटी!”

मालती जी की आवाज़ सुनकर लड़की रुक गई।

मालती जी झूले के पास गईं और उसके बैठने की जगह साफ करते हुए बोली—”इतने दिनों से इस झूले पर कोई बैठा ही नहीं?  आज कोई बचपन की याद लेकर आया है, तो मैं उसे कैसे मना कर दूँ?”

लड़की की आँखें भर आईं।

वह धीरे से झूले पर बैठ गई। मालती जी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

झूला आगे-पीछे होने लगा।

लड़की के चेहरे पर बरसों बाद बचपन लौट आया।

कुछ देर बाद वह उठी और जाने लगी।

मालती जी ने पूछा, “बेटी, कल फिर आओगी?”

लड़की ने पलटकर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।

“अगर… आपको बुरा न लगे तो।”

मालती जी मुस्कुराईं, मगर उनकी आँखें भी नम थीं।

“बुरा क्यों लगेगा?

यह बगीचा मेरा है, लेकिन यह झूला तुम्हारे बचपन का भी तो है। जब मन करे, चली आना।”

लड़की ने आगे बढ़कर मालती जी को गले लगा लिया।

दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

सावन की बारिश बाहर भी हो रही थी और दोनों के भीतर भी।

मालती जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—”बेटी, मायका दूर हो तो क्या हुआ… अब यह आँगन भी तुम्हारा है।”

लड़की ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा—”और आप… मेरी अपनी मालती माँ।”

झूला अब भी धीरे-धीरे हिल रहा था।

उस दिन उस झूले पर सिर्फ एक लड़की नहीं झूली थी…

एक माँ को बेटी मिली थी और एक बेटी को अपना मायका।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२४ ☆ आई… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२४ ?

☆ आई ☆  प्रभा सोनवणे ☆

बहरली अंगणी जाई

अन आठवली माझी आई!

*

मन आईचे निर्मळ

शुभ्र फुलांची ओंजळ!

*

दूर टेकडीच्या पलिकडे

माझे एक सानुले खेडे!

*

त्या हिरव्या वळणावर

आहे मायवेडे घर!

*

जरी माहेर माझे दूर

येई इथंवर आईचा सूर!

*

किती काढाव्या आठवणी

येई डोळ्याला गं पाणी!

*

आई मायेची रांगोळी

आई ममतेची पाकोळी!

*

आई शिवालयातील समई

आई… मुक्ताई ….जनाई!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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