हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१५ ☆ व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है!  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१५ ☆

? व्यंग्य –  हम पूछेंगे तो बोलोगे की पूछता है! ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

इन दिनों देश-विदेश के राजनीतिक मौसम की रंगत बड़ी अजब है। बाहर हवा ठंडी हो या गरम, लेकिन सत्ता के गलियारों में अंतरराष्ट्रीय दबाव का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है। कल तक जो विदेशी नुमाइंदे हमारे देश में  सिर्फ पर्यटन के खूबसूरत ठिकानों की बातें करते थे, व्यापारिक सौदों पर दस्तखत करते थे और हमारे विशाल बाजार को देखकर लार टपकाते थे, वे आज अचानक हाथ में माइक थामकर और चेहरे पर दुनिया भर की फिक्र ओढ़कर हमारे अभिभावक की भूमिका में नजर आने लगे हैं।

अभी हाल ही में, जब देश के सर्वोच्च ‘प्रधान’ सुदूर यूरोप के एक खूबसूरत, ट्यूलिप के फूलों और पवन चक्कियों वाले साइकिल-प्रिय मुल्क की यात्रा पर थे, तब वहां की एक तीखे तेवरों वाली विदेशी महिला पत्रकार साहिबा ने सात समंदर पार से लोकतंत्र, अल्पसंख्यकों और प्रेस की आजादी के कुछ  सुलगते हुए सवाल दाग दिए कि दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी में भी पूरे सचिवालय का एसी अचानक फेल होने लगा।

इस नजारे को देखकर पृष्ठभूमि में वही पुराना और घिसा-पिटा फिल्मी गाना बजने लगता है, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा!”

हमारे विदेश मंत्रालय को इन विदेशी पड़ोसियों का यह मुफ्त में बंटने वाला ज्ञान और अपनी धोती को छोड़कर पूरे जमाने की चिंता करने की आदत बड़ी नागवार और चिंतनीय लग रही है। उनका पत्रकारिता इंडेक्स नम्बर एक होगा , हम अपने 157 नम्बर में ही खुश बने रहना चाहते हैं।

पड़ोसियों का तो शाश्वत धर्म ही यही होता है कि वे अडोस-पड़ोस के हर फटे में टांग अड़ाएं। जब आपका घर एकदम सुचारू रूप से चल रहा हो, रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही हो, तब वे अपनी खिड़की से झाँककर बड़े मासूम चेहरे से पूछते हैं कि, “अरे भाई, आपके घर में जो कड़ाही चढ़ी है, उसके तेल की बू कुछ तीखी सी आ रही है। सब खैरियत तो है?”

उस नीले-सफेद आसमान वाले ठंडे मुल्क की उन विदेशी पत्रकार महोदया को भी हमारे यहाँ की इस तपती हुई लोकतांत्रिक गर्मी की कुछ ज्यादा ही फिक्र हो रही थी। उनकी यह फिक्र बिल्कुल वैसी ही दिखाई देती है जैसे किसी मोहल्ले की कोई  बुजुर्ग ‘ताई’ किसी नए-नवेले दूल्हे को घेरकर पूछने लगे कि, “सुना है तुम अपनी दुल्हन को बोलने ही नहीं देते, उसकी आवाज बाहर तक क्यों नहीं आती?”

ताई रूपी इन जोशी पड़ोसियों के तीखे सवालों पर हमारे सिस्टम का बिल्कुल खामोश हो जाना और अपने फोन को साइलेंट मोड पर डाल लेना एक बेहद मजेदार और सोची-समझी प्रतिक्रिया थी। यह एक ऐसी सधी हुई ‘कूटनीतिक चुप्पी’ थी जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाती है। एक ऐसी चुप्पी जो सामने वाले के चेहरे पर देखकर मुस्कुराते हुए कहती है कि, “तुम ठहरे परदेसी, तुम्हें हमारे घर के अंदरूनी झगड़ों की कड़वाहट और हमारे आपसी प्यार की गहराई के बारे में भला क्या खाक पता होगा!”

जब उस अंतरराष्ट्रीय मंच से लोकतंत्र और जन अधिकारों जैसे भारी-भरकम शब्दों के गोले फेंके जा रहे थे, तब हमारा पूरा तंत्र मन ही मन सोच रहा था कि तुमने पूछा तो पूछा, पर हम तुम्हें जवाब देकर मुफ्त का फुटेज और टीआरपी क्यों दें? आखिर कैमरे के सामने ‘नो कॉमेंट्स’ कहकर रहस्यमयी मुस्कान बिखेरने की जो कला हमारे साहब को आती है, वह दुनिया की किस यूनिवर्सिटी में सिखाई जाती है?

 इस पूरे अंतरराष्ट्रीय नाटक का सबसे दिलचस्प और यू-टर्न वाला मोड़ तब आता है, जब यही सुलगता हुआ सवाल देश के भीतर का ही कोई विपक्षी या अपना स्वदेशी और घरेलू पत्रकार पूछ बैठता है। यहाँ आकर सत्ता का व्याकरण और नियम एकदम सीधे और स्पष्ट हो जाते हैं।

सात समंदर पार का  गोरी चमड़ी वाला विदेशी पत्रकार सवाल पूछे, तो हम होठों पर वैश्विक मुस्कान बिखेरकर और ‘जोशी पड़ोसी’ गाते हुए बगल से सुरक्षित निकल सकते हैं। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ‘अतिथि देवो भव’ का पालन करते हुए उन्हें चाय-समोसा खिलाना और हाथ मिलाकर विदा करना हमारी कूटनीति की महान कला है।

लेकिन जैसे ही वही सुलगता हुआ सवाल अपने ही घर का कोई पत्रकार पूछ लेता है, तो तंत्र की भौहें तन जाती हैं और आँखों में अंगारे उतर आते हैं कि,”अच्छा! तुम्हारी इतनी जुर्रत कि तुम सवाल करो? तुम देशद्रोही हो या किसी विदेशी टूलकिट का हिस्सा?”

विदेशी मेहमानों के सामने जिस खामोशी को कूटनीति का मास्टरस्ट्रोक बताया जाता है, वही चुप्पी जब घर के अंदर देश के नागरिकों पर लागू होती है तो उसे ‘अनुशासन’ और ‘राष्ट्रभक्ति’ से  जोड़ दिया जाता है। घरेलू पत्रकार अगर ज्यादा समझदार या सयाना बनने की कोशिश करे तो उसे बहुत सलीके से याद दिला दिया जाता है कि, “बेटा! इस मोहल्ले का राशन कार्ड, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारी फाइलें हमारे ई डी, आई  टी दफ्तर की दराजों में ही बंद हैं।

हमारे यहाँ अब सवालों की भी  ‘नागरिकता’ तय कर दी गई है। अगर सवाल विदेशी पासपोर्ट के साथ आए तो उसे ‘इंटरनेशनल प्रोपेगेंडा’ बताकर खारिज किया जाता है, और अगर सवाल देसी जुबान में निकले तो उसे ‘देश को बदनाम करने की साजिश’ मानकर सीधे कूड़ेदान के हवाले कर दिया जाता है।

महामंत्र है , हे संजय !  “तू पूछता बहुत है, पूछ मत , सुन और ताली बजा!”

इसलिए अगली बार जब भी समाज, तंत्र या दफ्तर में कोई ऐसा तीखा सवाल पूछ ले जिसका सीधा जवाब  मौजूद न हो, या जिसे सुनते ही ब्लड प्रेशर बढ़ने लगे, तो बिल्कुल घबराने की जरूरत नहीं है।

बस एक गहरी सांस लीजिए, सामने लगे कैमरे की तरफ देखकर एक सम्मोहक, टेलीप्रॉम्प्टर वाली मुस्कान बिखेरिए और मन ही मन गुनगुनाना शुरू कर दीजिए, “जोशी पड़ोसी कुछ भी बोले, हम कुछ नहीं बोलेगा…”

सच तो यह है कि ट्यूलिप के फूल तो सिर्फ कुछ दिन महकते हैं, असली खुशबू तो अपनी कड़ाही के तीखे तेल में ही होती है!

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९७ ☆ प्रेरक रचना – ज्ञान मय, आकाश हो… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९७ ☆ 

☆ गीत – पक्षी अपनी तान में ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

ना किसी से द्वेष रक्खूँ,

हे!प्रभु मुझको बचा दो।

दो सरलता आचरण में,

प्रेम की गंगा बहा दो।

क्रोध पर पालूँ विजय में,

छल, कपट का नाश हो।

जिंदगी निर्मल बनालूँ,

ज्ञान मय, आकाश हो।

 *

ना हटूँ कर्त्तव्य-पथ से ,

सत्य-पथ  मुझको दिखा दो।

 **

वेद के पथ पर चलें जन,

गुरुकुलों की शान हो।

हर मनुज गीता पढ़े नित,

सर्वजन विद्वान हों।

 *

युग पुनः चाणक्य का हो,

दीप अनगिन तुम जला दो।

 **

देश मेरा गगन चूमे।

देश भारतवर्ष हो।

एक शिक्षा-नीति होवे,

हर तरफ ही हर्ष हो।

 *

ना भिखारी कोई होवे,

हाथ सबके शिल्प ला दो।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग १०४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग १०४ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- “बाबा तुम्ही सहन करू शकणार नाही अशी एक गोष्ट आहे. आता रात्र बरीच झालीय.. पण हे तुम्हाला आत्ताच सांगणं गरजेचं आहे. तुम्ही त्रास करून घेणार नसाल तरच सांगतो. ” सलिल म्हणाला.

“नाही त्रास करून घेणार. तू सांग.. काय झालंय?”

त्याने जे कांही सांगितलं ते ऐकून मी सून्न झालो. अक्षरशः गोठून गेल्यासारखा क्षणभर बसून राहिलो. तो म्हणाला होता तसं पैशाने ज्याची भरपाई होऊच शकणार नाही असं बरंच कांही मी गमावून बसलो होतो!!)

महापुरामुळे घरी झालेल्या संपूर्ण विध्वंसाचं शक्य तितक्या मोजक्या शब्दात वर्णन करून तो म्हणाला होता,.. “बाबा आपल्या बंगल्यात ८. ५० फूट उंचीपर्यंत पाणी आलेलं होतं. घरात आता फक्त ओल मुरलेल्या भिंती आणि दिवसभर राबून घरातला सगळा चिखल उचलून बाहेर बागेत रचल्या नंतरचे चिखलमाखलेले फ्लोअर अशी अवस्था आहे. ते सगळं पुन्हा मिळवता येईल बाबा पण तुमचं लेखन… ” तो बोलायचा थांबला. त्याने न सांगताही मला अंदाज आला होता… “लाॅफ्टवर ठेवलेल्या माझ्या बॅगा ना.. ?”मी शांतपणे विचारलं.

“हो. त्या तुमच्या सर्व बॅगांमधे तुम्ही जपून ठेवलेलं पूर्वीपासूनचं तुमचं सगळं लेखन भिजून, कुजून लगदा झाल्याने टाकून द्यावं लागलंय बाबा… “

ऐकून मी सून्न झालो. त्या सर्व बॅगांपैकी कुठल्या बॅगेत काय आहे हे मला फक्त माहित होतं असं नाही तर ते तोंडपाठ होतं. माझ्या आजवरच्या सर्व कथांची मासिके, माझी नाटके, एकांकिका, बालनाट्ये यांची हस्तलिखिते, सेन्साॅर सर्टिफिकेटस्, मला मिळालेले सगळे लेखन-पुरस्कार, ‘प्राजक्त’ या मासिक पत्रिकेत दरवर्षी वेगवेगळे विषय घेऊन गेली अकरा वर्षे मी लिहित असलेल्या सदरलेखनाच्या छापील प्रतींचे गठ्ठे ज्यात ‘प्राजक्त’चे तोवरच्या माझ्या लेखांच्या एकूण १३२ छापील प्रतींचे अंक होते… आणि असंच बरंच कांही! सगळं एका रात्रीत स्वाहा झालं होतं!त्या सदरलेखांमधील जवळजवळ सर्वच आशयांवरून एकेक कथा, एकांकिका, किंवा एखादं दोन अंकी नाटकही.. अशा अनेक नव्या साहित्यकृतींना आकार देण्याचा माझा मनोदय होता. त्याचं नियोजन सुरू होतं आणि अचानक माझं सगळं अक्षरधनच पाण्याच्या प्रचंड प्रवाहाने लुटून नेलं होतं!!

माझ्या खरंच ते जिव्हारीच लागलं. त्या रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली. आणि त्या अस्वस्थ मनःस्थितीत या विध्वंसात देवघरातील ती दत्ताची मूर्ती? ती.. तीही.. अशीच.. ? या विचाराचाच फटका बसावा तसा मी ताडकन् उठून बसलो. बाकी सर्वजण झोपले होते. सलिल/अनघा दोघांचं उद्याच्या घरस्वच्छतेच्या कामांच्या नियोजनाबद्दलचं बोलणं अस्पष्टसं कानावर आलं न् मी त्या दिशेला धाव घेतली. , !ती.. ती.. दत्तमूर्ती न् इतर सगळे देवही चिखलात वहात जाऊन रुतले गेले असतील तर? तेही चुकून त्या कचऱ्याच्या ढीगात टाकले गेले नसतील ना? नुसत्या कल्पनेनेच मी धास्तावलो.

“बाबा.. तुम्ही झोपला नाहीत अजून? असे घाबरलायत कां? काय झालंय?” मला पहाताच सलिलने विचारलं.

” मला सांग.. आपल्या देवघरातल्या देवांचं काय? ते पण वाहून गेलेत कां? ते.. ते.. चिखलाबरोबर त्या कचऱ्याच्या ढीगात तर टाकले गेले नसतील ना रे?” मी काकुळतीने विचारलं.

सलिलने अनघाकडे पाहिलं

“नाही बाबा… अहो, दिवसभराच्या गडबडीत तुम्हाला सांगायचं राहूनच गेलं. बाबा.. एक आश्चर्य वाटेल अशी आनंदाची बातमी आहे. “

इतक्या सगळ्या विध्वंसातही आनंदाची बातमी?… मला कांही समजेचना.

“बाबा, घरातला निम्मा शिम्मा चिखल बाहेर बागेत टाकून झालाय. राहिलेला उद्या दिवसभरात टाकून होईल. पण आश्चर्य म्हणजे आपण देव मांडतो ते ते छोटं देवघर तिथंच तिरकं होऊन चिखलात रुतून राहिल्याने त्यातले देव आणि ती दत्तमूर्तीही त्यावरच विखुरलेले दिसले. मी ते देवघर आणि ती मूर्ती स्वच्छ धुवून तिथे घरच्या किचन कट्ट्यावर ठेवलीय बाबा… ” हे ऐकताच माझ्या अंगावर शहाराच आला एकदम.. ! माझं सगळं अक्षरधन वाहून गेलं तरी ‘तो’ आहे! मग आणखी काय हवं? मनाला झालेल्या त्या अनपेक्षित आनंदाने मी भारावून गेलो होतो. सगळं ‘त्या’च्यावर सोपवून होईल ते पहात रहायचं असं मनोमन ठरवलं आणि निश्चिंत झालो.. !!

अंथरुणाला पाठ टेकली तेव्हा मध्यरात्र उलटून गेली होती. त्या निश्चिंत मनात आपल्याला या प्राप्त परिस्थितीत काय करता येईल याचे विचार सुरु झाले आणि झोप निघूनच गेली. मी झरकन् उठून शेजारच्या टीपाॅयवर ठेवलेला माझा मोबाईल उचलला. आजवर माझी नाटके आणि एकांकिका स्पर्धेत सादर केलेल्या मुंबई, पुणे, अहमदनगर, डोंबिवली, नाशिक, अमरावती, नागपूर, इंदौर अशा विविध ठिकाणच्या सर्व संस्थांची व्हाॅटस् अॅप काॅन्टॅक्स उपलब्ध होती. मी लगेचच सर्वांना सविस्तर मॅसेज पाठवून पुरामुळे निर्माण झालेल्या गंभीर परिस्थितीची कल्पना दिली आणि त्यांनी सादर केलेल्या माझ्या नाटक/एकांकिका यांच्या संहिता त्यांच्याकडे उपलब्ध असतील तर त्याची एक प्रत प्लीज मला पाठवावी अशी विनंती केली. मी यापेक्षा जास्त कांहीच करू शकत नव्हतो.

माझ्या या नाट्यसंहितांपेक्षाही माझ्यासाठी कणभर जास्तच महत्वाचं होते ते ‘प्राजक्त’ मधल्या जाने. २०१० ते जुलै २०१९ या जवळजवळ साडेनऊ वर्षातल्या माझ्या सदर लेखनाचे १३२ अंक पुन्हा मिळवणे. पण तो प्रश्न अजून अधांतरीच होता.

दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी ‘प्राजक्त’ च्या ऑफिसमधे फोन करून विचारणा केली. पुरापूर्वी कांही दिवस आधीच साफसफाई करताना कपाटांमधे जागा करण्यासाठी तिथे साठलेले सगळे जुने अंक त्यांनी रद्दीत विकून टाकले होते!

अखेर एक शेवटचा उपाय म्हणून त्या महिन्याच्या सदरासाठी लिहिलेल्या लेखाबरोबर मी एक जाहीर निवेदन पुढच्या अंकात प्रसिद्ध करण्यासाठी लिहून दिलं. त्यात माझी नेमकी अडचण विशद करून प्राजक्तचे सुरूवातीपासूनचे अंक कुणाकडे उपलब्ध असतील तर मला कळवावे असं वाचकांना आवाहन केलं आणि मी त्याच्या झेरॉक्स कॉपीज् स्वखर्चाने काढून घेईन हेही लिहिलं. या सगळ्या सदरलेखनाला आजपर्यंत कितीतरी वाचकांनी कौतुक करणाऱ्या प्रतिक्रिया वेळोवेळी आवर्जून पाठवल्या होत्या. त्यांच्यापैकी अगदी एकाने जरी ते अंक जपून ठेवले असतील तर त्या अंकांची मला गरज आहे हे निवेदन दिल्याशिवाय त्याच्यापर्यंत पोचणार कसं? हाच विचार ते निवेदन दिलं तेव्हा माझ्या मनात आलं. आणि ध्यानीमनी नसताना खरंच चमत्कार घडला! जादूची कांडी फिरावी तशी सगळी सूत्रं वेगाने हलत गेली आणि… !

दुसऱ्याच दिवशी सर्व नाट्यसंस्थांकडून मी पाठवलेल्या मेसेजेस् ना सकारात्मक उत्तरे आली आणि पुढे दोन-तीन दिवसात त्यापैकी काहींनी पीडीएफ् रुपात तर बाकीच्यांनी त्या संहितेची झेराॅक्स काॅपी मला पाठवून माझ्या हरवलेल्या अक्षरधनाची कांही प्रमाणात कां होईना भरपाई केली. हा एक सुखद धक्काच होता माझ्यासाठी! नंतर मधे आठदहा दिवसही उलटले नसतील आणि अचानक एक फोन आला.

“आपण अरविंद लिमये बोलताय ना?” आवाज अपरिचित. कांहीसा थकलेला. माधवनगरचे कुणी सुधाकर फाटक आजोबा बोलत होते.

“मी प्राजक्तमधलं तुमचं निवेदन वाचलं. त्यातले तुमचे लेख मला आवडतात. त्यामुळेच मी सभासद झाल्यापासूनचे म्हणजे साधारण २०१५पासूनचे सगळे अंक क्रमवार अॅरेंज करून ते जपून ठेवलेत. पण अट एकच. तुम्ही स्वतः येऊन ते घेऊन जायचे. त्यामुळे निदान आपली भेट तरी होईल. आणि हो.. त्याच्या झेराॅक्स काढायची तसदी नका घेऊ. आज माझे वय आहे ८५. मी प्राणपणाने जपलेले ते अंक योग्य माणसाच्या हाती गेल्याचं समाधान मला मिळतंय याचा मला आनंदच आहे… !” ते बोलत होते. मी थक्क होऊन ऐकत होतो. हे एवढंच नव्हतं. दुसऱ्याच दिवशी ‘प्राजक्त’चं मुद्रण कोल्हापूरला ज्या प्रेसमधे होत असे त्या प्रेसचे श्री. डबीर यांचाही निरोप आला. त्यांच्याकडून २०१० च्या आधीचेही सगळे अंक सेव्ह असल्याने त्यांनी ते पेनड्राईवमधे डाऊनलोड करून देण्याचे आश्वासन दिले.. !

जे मला कधीच परत मिळू शकणार नाही असं मला वाटलं होतं ते माझं सगळं अक्षरशः मला अचानक परत मिळणं हा चमत्कारच होता माझ्यासाठी !!

हे सगळं इतकं अनपेक्षित, इतकं सहज, आणि इतकं अल्पावधीत घडलं की हे एखादं सुखद स्वप्नच आहे असंच वाटत राहिलं! प्रतिकूल परिस्थितीत हे असं हवं ते हवं तसं मला बहाल करण्याची ‘त्या’ची किमया म्हणजे अंधारून आलेल्या मनात भरून राहिलेला मिट्ट काळोख क्षणार्धात उजळून टाकणाऱ्या लख्ख प्रकाशासारखी ‘त्या’च्या अलौकिक स्पर्शाची अनुभूती वाटली मला!

नुकतेच घडून गेल्यासारखे मला इतक्या वर्षांनंतरही स्वच्छ आठवणाऱ्या स्वेच्छानिवृत्ती नंतरच्या काळातले हे दोन प्रातिनिधिक प्रसंग.. ! खरंतर तो आणि मी या विषयाशी संबंधित मनात घर करून राहिलेल्या अशा असंख्य आठवणींचा या प्रदीर्घ अशा सदरलेखनाच्या निमित्ताने मी घेतलेला वेध म्हणजे एकापरीने ‘त्या’चा स्पर्श जाणवलेल्या आजवरच्या आठवणीत साठलेल्या अनेक अनुभवांकडे माझे मागे वळून पहाणेच होते! यातून माझ्या नकळत्या वयापासून मी मनात जपलेला ‘तो’ आज वानप्रस्थात प्रवेश केलेल्या माझ्या आयुष्याच्या उतरत्या वळणावर उभ्या मला कसा दिसतो ते आता या सदराच्या पुढच्या समारोपाच्या भागात.. !

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४६ ☆ कागज की पतंग ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कागज की पतंग”।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४६ ☆

☆ कागज की पतंग ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पेड़ पर लटकी हुई है

एक काग़ज़ की पतंग।

 

डोर कच्ची थी

समय ने तोड़ दी

हवाओं ने दिशा

उसकी मोड़ दी

राह से भटकी हुई है

एक उच्छल सी उमंग।

 

उछलता बचपन

बजाता तालियाँ

हँसी फूलों सी

विचरती तितलियाँ

आस में अटकी हुई है

साँस भर उठती तरंग।

 

हौसले सबके

नचें इक डोर पर

होड़ बादल से

रुके सब छोर पर

जिंदगी बहकी हुई है

उम्र के उड़ते विहंग। 

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

२८.१.२६

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५३ ☆ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गिला शिकवा नहीं करते“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५३ ☆

✍ गिला शिकवा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

अभी हिम्मत नहीं हारी हमारी

फ़तह की अब रही बारी हमारी

 *

न होना रार है माशूक़ से फिर

ख़ता बतलाइये सारी हमारी

 *

मुसीबत कोई आये बे-असर है

अगर रहती है तैयारी हमारी

 *

तू नामुमकिन तभी बतला रहा है

अभी देखी न दमदारी हमारी

 *

अमानत दोसतों की जान बोला

परखने आ गए यारी हमारी

 *

गिला शिकवा नहीं करते वो हरगिज़

समझते है जो लाचारी हमारी

 *

तुम्हारी हरकतों को रोक तो दूँ

खड़ी है बीच बेज़ारी हमारी

 *

सिखाया इल्म है उस्ताद का ये

ग़ज़ल में कब कलाकारी हमारी

 *

न रंभा मेनका के है ये वश का

अरुण जो तोड़ दें तारी हमारी

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५७ – इतना बेबस भी न हो… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  – इतना बेबस भी न हो।)

☆ हेमंत साहित्य # ५७ ☆

✍ इतना बेबस भी न हो… ☆ श्री हेमंत तारे  

कर लेते थे दीदार बन्द आंखों से कभी

अब वो बीनाई न रही, ये उम्र का सितम होगा

*

फिज़ा में तहलील महक का इशारा है

तू परीशाँ न हो, वो यहीं कहीं, आस-पास होगा

*

सुना है के वो घिरा रहता है रकीबों से

तू गर वफ़ादार है, तो ईश्क में क़ामियाब होगा

*

लाजिमी है के कोई राज पोशिदा ना रहे

किया है ईश्क, तो ऐतिमाद भी  रखना होगा

*

मलाल न कर ये वक्त भी गुजर जायेगा

चन्द लम्हों कि है बात, अब शम्स जलवागार होगा

*

इतना बेबस भी न हो, कुछ कदम और चल,

यकीन कर, अगले ख़म पर वाके मयकदा खुला होगा

*

तू खुशहाल है “हेमंत”, ये महज इत्तेफ़ाक नही

बहुत किया है धूप का सफ़र, ये उसका असर होगा

बीनाई = आंखों की रोशनी, फिज़ा = वातावरण , तहलील = घुली हुई, रकीब = मुहब्बत में प्रतिद्वंदी, पोशिदा = छिपा हुआ, शम्स = सूरज, ख़म = मोड, वाके = स्थित, ऐतिमाद = भरोसा

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “भरोसा“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६६ ☆

✍ लघुकथा – भरोसा… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

शंकर दयाल जी के रिटायर होने में दो साल बाकी रह गए हैं। उनका बड़ा बेटा राम रतन अभी बारहवीं क्लास में है। दसवीं में अच्छे अंक लाने पर भी बारहवीं में बड़ी मुश्किल से एडमिशन हुआ।

बारहवीं में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की और बिना कोचिंग क्लास के पचानवे प्रतिशत अंक लेकर आया। उसके पिता बहुत खुश हुए। साइंस बायोलॉजी में से उसने साइंस और मैथ्स लिया ताकि वह तकनीकी क्षेत्र में यानी इंजीनियरिंग क्षेत्र में जा सके, परंतु इंजीनियरिंग में एडमिशन से पहले नीट की परीक्षा पास करनी होती है। वह नीट की परीक्षा में शामिल हुआ, परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए उसने बहुत मेहनत की। उसे पूरी उम्मीद थी की अच्छे अंकों से में पास हो जाएगा। लेकिन रिजल्ट आने से पहले पता चला की नीट का पेपर लीक हो गया और परीक्षा फल रोक दिया गया। यह देख कर उसका दिल बैठ गया। शंकर दयाल को भी चक्कर आने लगे कि इतना पैसा और मेहनत और नतीजा कुछ नहीं। भविष्य अंधकारमय लग रहा है।

ऐसी स्थिति में वह क्या करें यह समझ नहीं आ रहा। शंकर दयाल भी बहुत दुखी हुए कि उनके बेटे ने इतनी मेहनत की लेकिन वह किसी काम नहीं आई। व्यवसाय करने के लिए उनके पास इतने पैसे नहीं है कि वह कोई दुकान खोल सके या कोई अन्य व्यवसाय शुरू कर सके। उनकी समझ में नहीं आ रहा है। बड़े बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने बेटी का विवाह टाल दिया। छोटा बेटा जो दसवीं में है उसके लिए क्या करें आगे पढ़ाई किस तरह करें। इसी सोच में डूबे थे कि उनकी पत्नी आई कहा चलो खाना खा लो। ईश्वर सब ठीक करेंगे उनका ही भरोसा है। जो सबके साथ होगा वही हमारे साथ होगा।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन की छाँव।)

☆ लघुकथा # ११५ – जीवन की छाँव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

गर्मियों के दिन के 12:00 बजे थे  बालकनी में झूले में बैठकर रामचंद्र जी अखबार पढ़ रहे।

और अपने गांव को और पुराने दिनों को याद कर रहे थे।

तभी उनकी पत्नी कमला ने आवाज दिया- “अंदर आ जाओ दोपहर में बाहर क्यों बैठे हो  लू चल रही है?”

“कच्चे आम का पन्ना बनाया है अंदर आओ बैठकर पी लो यह गाँव नहीं है जो आम के पेड़ के नीचे बैठे रहते थे?”

रामचंद्र जी ने कहा कमल-” तुम्हें तो पता है कूलर, ए.सी सूट नहीं करता।”

रामचंद्र जी ने गंभीर स्वर में कहा- “कमला इधर आओ मेरे पास बैठो चलो हम गाँव चलते हैं कुछ दिनों के लिए।”

कमला ने कहा- “अब गाँव में क्या रखा है घर की साफ सफाई करनी पड़ेगी बेटे बहू के साथ यही जब रहते हैं हम ठंड में चलेंगे। “

रामचंद्र जी ने कहा- “देखो कमला तुम बातें मत बनाओ तुम्हें नहीं जाना तो मैं जा रहा हूँ यहाँ तो पेड़ फल हुए आम देखने को तरस जा रहा हूँ।”

वैसे तुम्हारी बातों से मुझे शीतल छाया मिलती है लेकिन यहाँ पर घूमने फिरने भी कहाँ  जाऊॅं पार्क में जाओ तो इतनी भीड़ है।

कमला ने मुस्कुराते हुए कहा-

“क्या तुम्हें गाँव में भी छाँव मिलेगी वहां भी तो विकास हो रहा है।”

रामचंद्र जी ने कहा- इस नव विकास के ऑंधी में जीवन की छाँव खोती जा रही है, उनकी ऑंखों से ऑंसू बहने लगते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१६ ☆ गजल… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१६ ?

☆ गजल ☆ प्रभा सोनवणे ☆

सोसला  दुष्काळ हा, आता तरी,

पावसाच्या बरसु दे झरझर सरी

*

जातिधर्माचे कशाला दाखले

वाढते आहे विषमतेची दरी

*

तू किती नाकारल्या काळ्या मुली

भांडते रात्रंदिनी गोरी परी

*

कष्ट करणे टाळले वरचेवरी

देत आहे कोण भाजी भाकरी ?

*

ना इथे ना राहते आहे तिथे

भेटला मज विश्वव्यापी तो हरी

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २६ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २६ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

नाटककार रविंद्रनाथ (१)

वैश्विक काव्य जगतात मानाचं स्थान प्राप्त केलेल्या रविंद्रनाथांनी नाट्य जगताला लहान मोठ्या अशा जवळपास ५०-५५ उत्कृष्ट नाटकांनी समृद्ध केले आहे. परंतु दुर्दैवाने हे सत्य कुठेच अधोरेखित झालेलं नाही. त्यांच्या नाटकांमधील डाकघर, रक्त करबी, विसर्जन, राजा ही नाटके तसेच चित्रांगदा, श्यामा, नटीरपूजा, चंडालिका, ताशेर देश या नृत्यनाटिका जास्त चर्चिल्या गेल्या आहेत. पण त्यांची छोटी छोटी नाटकं, आपल्या वगनाट्य सदृश नाटिका, प्रहसनं, नाट्यछटा देखील समाजमनावर छाप सोडणाऱ्या आहेत. तसेच त्या थट्टा विनोदाच्या अंगानं सामाजिक, धार्मिक व राष्ट्रीय जीवनातील विसंगतीवरही प्रकाश टाकणाऱ्या आहेत. रविंद्रनाथांची नाटके कलात्मक सौंदर्याचा अनुभव देता देता सामाजिक प्रबोधनही करतात. त्यांच्या कवितांप्रमाणेच त्यांची नाटके देखील त्यांच्या अंतरात्म्याचा आवाज आहेत. आत्ताच्या भाषेत आपण ज्यांना प्रायोगिक नाटके म्हणतो तशी प्रायोगिक नाटके देखील त्यांनी प्रायोगिकतेचं कसलेही अवडंबर न माजवता लिहिली, बसवली व प्रस्तुत केली.

परंतु त्या काळातली मेलोड्रॅमॅटिक नाटके बघण्याची सवय असलेल्या बंगाली प्रेक्षकांना रविंद्रनाथांच्या नाटकांतील तरलता, अस्फुट संघर्ष लक्षात येत नसल्यामुळे म्हणा किंवा धार्मिक, सामाजिक व्यंगावर भाष्य असल्यामुळे म्हणा रविंद्रनाथांना नाटककार म्हणून जे स्थान कलाजगतात मिळायला हवं होतं ते कांही मिळालं नाही. अर्थात टागोरांनीही हे मान्य केलं होतं. ते म्हणत, “मला नाटक लिहिता आलं नाही. एक मध्यवर्ती कल्पना घेऊन त्यावर नाटक तोलण्याची कला माझ्यात नाही. ” अर्थात त्यांच्या नाटकांकडे पाहिलं असता लक्षात येतं की, हा त्यांचा विनय होता. त्यांच्या मधला कवी त्यांच्या नाटकांतही डोकावतो, हे मात्र खरे आहे. त्यांची कांही नाटकं तर गद्य काव्य असल्यासारखी वाटतात.

वयाच्या बाराव्या वर्षी त्यांनी शेक्सपिअरच्या ‘मॅकबेथ’ नाटकाचं बंगालीत भाषांतर केलं होतं. त्या काळात इंग्रजी नाटकांच्या अनुकरणाचं वारं होतं. त्यामुळे पारंपरिक बंगाली नाट्यकला व नवदरबारी लोकांची नाट्यकला यात मोठं अंतर आलं होतं. रविंद्रनाथांनी लोकरंगमंचातली शक्ती ओळखून, त्यावर आपले संस्कार करून हे अंतर कमी करण्याचा प्रयत्न केला. नाटकाविषयी त्यांच्या मनात कोणतेही व्यावसायिक विचार नसल्यामुळे त्यांनी कुठल्याही नाटक कंपनीसाठी नाटक लिहिले नाही.

(अपूर्ण–पुढील भागात)

—–

गीत : ७६

DAY after DAY, O lord of my life, shall I stand before thee face to face? With folded 

hands, O lord of all worlds, shall I stand before thee face to face? 

Under thy great sky in solitude and silence, with humble heart shall I stand before thee 

face to face? 

In this laborious world of thine, tumultuous with toil and with struggle, among hurrying crowds shall I stand before thee face to face? 

And when my work shall be done in this world, O King of kings, alone and speechless shall I stand before thee face to face? 

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ७६

*

हे परमेशा, नित्य, प्रतिदिन

मला भेटशील का रे?

कर दोन्ही जोडूनि उभा मी

मला भेटशील का रे?

*

गगनाखाली निळ्या, अथांग, अतल

नतमस्तक मी शांत, एकाकी, निर्मल

मला भेटशील का रे?

*

दुष्कर जीवन, संकटे कितीक आली

या गर्दीत ना उसंत क्षणाची मिळाली

मला भेटशील का रे?

*

जीवनी, कर्तव्ये सारी पुरी करुनी

येतो मूकपणे, एकांताचे बोट धरुनी

मला भेटशील का रे?

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

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गीत : ७७

I KNOW thee as my God and stand apart ⎯ I do not know thee as my own and come 

closer. I know thee as my father and bow before thy feet ⎯ I do not grasp thy hand as 

my friend’s.

I stand not where thou comest down and ownest thyself as mine, there to clasp thee to 

my heart and take thee as my comrade.

Thou art the Brother amongst my brothers, but I heed them not, I divide not my earnings 

with them, thus sharing my all with thee.

In pleasure and in pain I stand not by the side of men, and thus stand by thee. I shrink to give up my life, and thus do not plunge into the great waters of life.

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ७७

 *

तुज काय म्हणू मी, कोण म्हणू?

न कळे नाते काय आपुले

पिता, बंधु की सखा म्हणू?

*

जेथे तव पदचिन्हें रमणीय

ती भूमी मज असे पूजनीय

तू माझा समजुनि मी तेथे

उभा कसा राहू?

*

पिता म्हणू, तर जवळ न जाईन

नतमस्तक तव सामोरी होईन

आदर ठेवी दूर जरा मज,

हात कसा तव हाती धरू?

*

सखा सोबती, तू माझा जर

जवळी तुझ्या राहू का निरंतर

कवटाळुनि मम हृदयापाशी 

तुला कसा घेऊ?

*

बंधु तुला जर मानत असतो

तव आज्ञेचे पालन ना करतो

संचित माझे तुझिया सोबत 

वाटुनि का घेऊ?

*

दुःखाचे क्षण, सुखाची पखरण

अनुभवता ये, तुझी आठवण 

जीवन नौका वल्हविसी का,

भवसागर हा पार करू?

*

तू परमात्मा, तुज जीवन अर्पिन

नश्वर या जगती, पुन्हा न येईन

एकरूप तुजसवे होउनि 

मुक्ती का पावू?

 

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

गीत ७८

WHEN the creation was new and all the stars shone in their first splendour, the gods 

held their assembly in the sky and sang “Oh, the picture of perfection! The joy 

unalloyed!” 

But one cried of a sudden ⎯ “It seems that somewhere there is a break in the chain of light and one of the stars has been lost. ” 

The golden string of their harp snapped, their song stopped, and they cried in dismay ⎯

“Yes, that lost star was the best, she was the glory of all heavens!” 

From that day the search is unceasing for her, and the cry goes on from one to the other that in her the world has lost its one joy! 

Only in the deepest silence of night the stars smile and whisper among themselves ⎯

“Vain is this seeking! Unbroken perfection is over all!” 

—–

मराठी भावानुवाद : गीत : ७८

*

तारे गगनी चमकत होते

जेंव्हा झाली विश्वनिर्मिती

वैभव पाहून देवांच्या तर

आनंदा ना राहिली मिती

*

तुटली ताऱ्यांची साखळी

एक तारा कुठे हरवला

मोजीत बसला होता रात्री

कोणी एक रडू लागला

*

घाबरले देवही, गीत थांबले

सुवर्ण तारच तुटली वीणेची

हरवला ताराच म्हणती

शान होता स्वर्गाची

*

सारे होते शोधत अविरत

इकडे तिकडे, तिकडे इकडे

आनंद हरवून बसले विश्व

समजून असे मूढ रडे

*

शांत, गर्द रात्रीच्या डोही

हसती तारे अन् कुजबुजती 

व्यर्थ शोध हा वेदनेचा 

परिपूर्णता आहे जगती

– क्रमशः भाग २६

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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